चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 421–430
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 421–430
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३३२ चरकसंहिता ' लम्भसुप्तिगुरुत्वाद्याः श्लैष्मिकाः, शिरःकम्पादितादयः वातात्मकाः ' तथा ' रक्तवित्तादिरोगाः ' का भी उल्लेख किया है । शिरोरोग के लिये शिरःशूल, शिरोऽभिताप तथा शिरोवेदना शब्द का व्यवहार होता है । अंग्रेजी में इसे है डेक ( Headache ) कहते है । आयुर्वेद में जका विभिन्न रोगों में होने वाले लक्षण के अतिरिक्त स्वतन्त्र रोग भी मान कर वर्णन किया गया है । किन्तु आधुनिक विद्वान् इसे एक लक्षण मात्र मानते हैं जो अनेक रोगों में मिल सकता है । शिरःशूल मस्तिष्कगत रोगों का प्रधान लक्षण है । सिर के निम्न भागों पर प्रभाव पड़ने से शिरःशूल की उत्पत्ति होती है । ( १ ) करोटिवहिर्गत कारण - इसमें कपालास्थि तथा उसकी पेशियाँ और रक्तवाहिनियाँ इन पर आघात या दबाव पड़ने से शिरःशूल होता है । ( २ ) कपालान्तर्गत कारण – कपालास्थियों के भीतर की बड़ी - बड़ी रक्तवाहिनियों तथा पञ्चम, नवम व दशम शीर्षण्य नाडी पर प्रभाव होने से भी शिरःशूल होता है । उपर्युक्त रचनाओं पर मस्तिष्कगत रोग का प्रभाव होने से शिरःशूल की उत्पत्ति होती है । मस्तिष्क के निम्न रोगों में शिरशूल पाया जाता है - ( क ) मस्तिष्क के अर्बुद ( ख ) मस्तिष्कावरणशोथ ( Meningitis ) ( ग ) मस्तिष्क - सुषुम्ना जल ( Cerebro Spinalfluid ) की वृद्धि, नेत्र, नासिका, कर्ण तथा दाँत के व्रणशोथ ( Inflammation ) में भी शिर में दर्द होता है । कारणभेद से शिरःशूल के निम्न भेद किये जा सकते हैं - ( १ ) स्थानीयकारणजन्य शूल - पुरःकपालवायुविवरशोथ तथा अस्थिशोथ से यह अवस्था उत्पन्न होती है । ( २ ) संवाहित शूल ( Referred pain ) - प्रतिश्याय, नासाजवनिका की स्थानच्युति ( Deviation of the septum ), तारामण्डलशोथ ( Iritis ), अधिमन्थ ( Glaucoma ), दन्नगनशोथ एवं मध्य-कर्णशोथ ( Otitis media ) के परिणामस्वरूप यह शूल होता है । ( ३ ) वातजन्य शिरःशूल ( Nervous headache ) -- त्रिशाखानाडीशूल, मस्तिष्कगत फिरंग, मस्तिष्कावरणशोथ, मस्ति-कार्बुद व विद्रविसे यह शूल होता है । ( ४ ) अन्य शारीरिक कारणजन्य शूल -- जीर्ण वृक्कशोथ ( Chronic nephritis ), मूत्रविषमयता ( Uraemia ), रक्तदाब की वृद्धि ( High B. P. ), योषापम्मार, अर्धावभेदक, आन्त्रिक ज्वर, मसूरिका आदि के कारण यह शूरु होता है । प्राणाः प्राणभृतां यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च । यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते ॥ सिर की परिभाषा - जिस अवयव में प्राणियों का प्राण और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ रहती है और जो अंगों में उत्तम अंग है -- उसे सिर कहा जाता है १२ ॥ विमर्श - यहाँ मिर को उत्तम अंग माना है । तथा सुत्रान अ. २ में चक्रपाणि ने टीका में बताया है कि ' अनामये यथा मूले वृक्षः सम्यक् प्रवर्धते । अनामये शिरस्येवं देहः सम्यक् प्रवत तथा सुश्रुत ने भी शिर को प्रधान अंग माना है । यथा - ' गर्भस्य हि सम्भवतः पूर्वं शिरः सम्भवत्याह शौनकः, शिरोमूलत्वाद् देहेन्द्रियाणाम् । वाग्भव ने इसे और अधिक रूप में सष्ट किया है । यथा-ऊर्ध्वमूलमधःशाखनृपयः पुरुषं विदुः । मूलप्रहारिणस्तस्माद् रोगान् शीघ्रतरं जयेत् ॥ सर्वेन्द्रियाि येनास्मिन् प्राणा येन च संश्रिताः । तेन तस्योत्तमाङ्गस्य रक्षायामादृतो भवेत् ॥ ' इस प्रकार शरार को एक वृक्ष और झिर को मूल नाना है जिस तरह वृक्ष के मूल की रक्षा से उसकी शाखा प्रशाखाओं की रक्षा होती है ठीक उसी प्रकार शरीर का मूल सिर की रक्षा करने से नारी शाखा प्रशाखाओं की रक्षा होती है । आधुनिक दृष्टि से भी सिर को ( Vital part ) माना है । अवभेदको वा स्यात् सर्वं वा रुज्यते शिरः । प्रतिश्यामुखनासाक्षिकर्णरोगशिरोभ्रमाः ॥
अदितं शिरसः कम्पो गलमन्याहनुग्रहः । विविधाश्चापरे रोगा वातादिक्रिमिसंभवाः ॥ १४ ॥
शिरोरोग के उदाहरण - अर्थावभेदक [ Hemierania ] या सम्पूर्ण सिर में वेदना
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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] मैं कर रहा हूँ उसे सुनो ॥ १५ ॥
३. ' ब्यायामा ' ग. ५. घाटा ग्रीवायाः पश्चाद्भागः । ३३३ सूत्रस्थानम् ४. ' वैधमनीर्वायु ' ग. | ६. ' भ्रुवोर्मध्यं ' न. । ७. ‘ बध्येते इव वध्येते इत्यर्थः, पीडायुक्तत्वेन ' चक्रः । ‘ बाध्येते ' यो.। ( Headache ), प्रतिश्याय ( Coryza ), मुखरोग, नासिका रोग, नेत्र रोग, कर्ण रोग, शिर में चक्कर आना ( Giddiness ), अदित ( Facial Paralysis ), शिरःकम्प, गलग्रह, मन्याग्रह ' ( मन्यास्तम्भ ', हनुग्रह ( Lock Jaw ) और वातादि दोष एवं कृमियों से उत्पन्न होने वाले अनेक रोग होते हैं ॥ १३-१४ ॥ पृथग्दिष्टास्तु ये पञ्च संग्रहे परमर्षिभिः । शिरोगदांस्ताञ्छृणु मे यथास्वैर्हतुलक्षणैः ॥ १५ ॥
पाँच प्रकार के शिरोरोग यहाँ बताये हुए शिरोरोग से अतिरिक्त अष्टोदरीय अध्याय में जो पाँच शिरोरोग कहे हैं । वे अपने - अपने कारणों और लक्षणों द्वारा जैसे होते है उनका वर्णन विमर्श - तात्पर्य यह हैं कि यहाँ ऊपर के दो लोकों में जत्रु से ऊपर होने वाले सभी रोगों को शिरो रोग माना है । लेकिन अष्टोदरीय अध्याय में केवल शिरः प्रदेश में होने वाले पाँच रोगों का ही वर्णन है । इसलिए यहाँ भी उन्हीं पाँच रोगों का विशेष रूप से वर्णन मिलता है । उच्चैर्भाष्यातिभाष्याभ्यां तीक्ष्णपानात् प्रजागरात् । शीतमारुतसंस्पर्शाद्व्यवायाद्वेग निग्रहात् ।
उपवासादभीघाताद्विरेकाद्वमनादति । बाष्प शोकभयत्रासाद्भारमार्गाति कर्शनात् ॥ १७ ॥
शिरोगताः सिरा वृद्धो वायुराविश्व कुछति । ततः शूलं महत्तस्य वातात् समुपजायते ॥
( १ ) वातजन्य ( वातिक ) शिरो रोग का कारण ( निदान ) - उच्च स्वर से बोलना, अधिक वोलना, तीक्ष्ण मद्य आदि का पीना, रात्रि में जागना, शीतल वायु का लगना, अधिक मैथुन करना, मल - मूत्र के वेगों को रोकना, उपवास करना, सिर में चोट लगना, अधिक विरेचन का होना, अधिक वमन का होना, अधिक आँसुओं का गिरना, शोक, भय, त्रास, भार ढोना, अधिक रास्ता चलना आदि कारणों से जब शरीर अत्यन्त कृश हो जाता है तो वायु वढ़ कर सिर में रहने वाली सिरा और धमनियों में जा कर कुपित हो जाती है तब उस व्यक्ति के सिर में वात से भयंकर शूल होता है ॥ १६-१८ ॥ निस्तुद्येते भृशं शङ्खौ घाटौ संभिद्यते तथा । संभ्रूमध्यं ललाटं च तपतीवातिवेदनम् ॥ १ ९ ॥ वैध्ये स्वतः श्रोत्रे निष्कृप्येते इदाक्षिणी । घूर्णतीव शिरः सर्वं संधिभ्य इव मुच्यते ॥२० ॥
स्फुरत्यतिसिराजालं स्तभ्यते च शिरोधरा । स्निग्धोष्णमुपशेते च शिरोरोगेऽनिलात्मके ॥ वातज ( वातिक ) शिरोरोग का लक्षण - वातजन्य शिरःशूल में शंख प्रदेश में सूई छेदने सी अधिक पीड़ा होती है, घाटा ( ग्रीवा का पिछला भाग ) में आरी से चीरने के समान वेदना होती है, दोनों भौं के बीच और ललाट प्रदेश में अत्यन्त जलते हुए के समान अधिक वेदना होती है । कानों में अत्यन्त शब्द होता है और उससे सुनाई नहीं देता तथा वेदना अधिक होती है, नेत्र को कोई बाहर खींच रहा है इस तरह की वेदना होती सिर पूर्णरूप से चा तरफ घूम रहा है और शिरः प्रदेश की सभी संधियाँ अलग हो रही हैं इस प्रकार की वेदना होती है, शिरः प्रदेश में होने वाली सभी शिराओं और धमनियों में अधिक स्फुरण होता है । सिर को धारण करने वाली जो गले में शिरायें है, अर्थात् मन्या उसमें जकड़ाहट हो जाती है, स्निग्ध और उष्ण औषध आहार - विहार का प्रयोग करने पर वेदना शान्त हो जाती है ॥ १ ९ -२१ ॥ विमर्श - वाग्भट शिरःशूल के दो भेद करते हैं - ( १ ) सारे सिर में पीडा ( २ ) आधे १. ' पृथग्दृष्टास्तु ' ग. २. ' तीक्ष्णघ्राणात ' ग. ।
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३३४ चरकसंहिता सिर में पीड़ा । इस प्रकार वाग्भट के अनुसार अर्धावभेदक भी वातिक के अन्तर्गत ही समझा जाता है— ' माईवं मर्दनस्नेहस्वेदवन्धैश्च जायते । शिरस्तापोऽयमर्धन्तु मूर्ध्नः सोऽवभेदकः ॥ ' आधुनिक दृष्टि से इस प्रकार के शिरःशूल को न्यूरेल्जिया ( Neuralgia ) या न्यूरेल्जिक हैडेक ( Neuralgic Headache ) कहते हैं । यह वातसंस्थानीय अपजनन ( Deyeneration of
nervous system ), रक्तविकार, निर्बलता, दन्तविकार तथा चिन्ता से उत्पन्न होता है ।
कट्वम्ललवणक्षारमद्यक्रोधातपानलैः । पित्तं शिरसि संदुष्टं शिरोरोगाय कल्पते ॥ २२ ॥
( २ ) पित्तजन्य ( पैत्तिक ) शिरोरोग का कारण ( निदान ) - कटु, अम्ल, लवण रसों का अधिक सेवन तथा क्षार तथा मद्य का अधिक सेवन, अधिक क्रोध करना, अधिक धूप में बैठना और अधिक आग का सेवन करना, इन कारणों से सिर में दृष्ट हुआ पित्त शिरःशूल उत्पन्न करता है ॥ दह्यते रुज्यते तेन शिरः शीतं सुषूयते । दह्येते चतुषी तृष्णा भ्रमः स्वेदश्च जायते ॥ २३ ॥
पित्तजन्य ( पैत्तिक ) शिरोरोग का लक्षण – जब शिरःप्रदेश में जाकर पित्त रक्त को दूषित करना है तो सिर में दाह तथा वेदना होती है, शीतल वस्तु का प्रलेप आदि करने से उसमें लाभ होता है । नेत्रों में जलन अधिक होती है । प्यास, सिर में चक्कर और पसीना अधिक निकलता है | विमर्श - आधुनिक दृष्टि से इसे विलियस हैडेक ( Bllious Headache ) कह सकते हैं । इस प्रकार का शूल पचन संस्थान की विकृति ( मन्दाग्नि, अजीर्ण, अम्लपित्त, यकृत् रोग तथा आन्त्र शोध आदि ) में होता है । आस्यासुखैः स्वप्नसुखैर्गुरुस्निग्धातिभोजनैः । श्लेष्मा शिरसि संदुष्टः शिरोरोगाय कल्पते ॥ ( ३ ) कफजन्ध ( शृष्मिक ) शिरोरोग का कारण ( निदान ) - जिन व्यक्तियों को सुख्ख पूर्व अधिक बैठना पड़ता है । या सुखपूर्वक अधिक शयन करना पड़ता है i और जो अधिक गुरु, afra fa ग्धं और अधिक भोजन करते हैं । उन व्यक्तियों के शिरः प्रदेश में कुपित हुआ कफ शिरोरोग को उत्पन्न करता है ॥ २४ ॥
शिरो मन्दरुजं तेन सुप्तस्तिमितभारिकम् । भवत्युत्पद्यते तन्द्रा तथाऽऽलस्यमरोचकः ॥२५ ॥
कफजन्य ( श्लैष्मिक ) शिरोरोग का लक्षण - जब दूषित कफ शिरोगत वाहिनियों को दूषित करता है । तो सिर में वेदना मन्द होती है और उसमें शून्यता प्रतीत होती है । सिर स्तमित
( शीतल ) और भारी होता है । तन्द्रा, आलस्य और भोजन में अरुचि हो जाती है ॥ २५ ॥
विमर्श --- कफज शिरः शूल में रात्रि में दिन की अपेक्षा अधिक वेदना होती है । नेत्र के चारों ओर शोथ, कानों में खुजली और वमन भी होता है । इन लक्षणों को वाग्भट ने अधिक बनाया है, यथा - ' अरुचिः । शिरानिष्पन्दताऽऽलस्यं रुङ्मन्दाऽह्रयधिका निशि । तन्द्रा शूनाक्षिकूटत्वं कर्णकण्डू-यनं वमिः ॥ ' सुश्रुत ने भी इन्हीं लक्षणों पर अधिक जोर दिया है । ' शिरोभवेद् यस्य कफोपदिग्धं गुरु प्रतिष्टब्धमथो हिमं च । शूनाक्षिकूटं वदनं च यस्य शिरोभितापः स कफप्रकोपात् । ' इस शूल को प्रसेकज ( Catarrhal ) या संवाहित पीडा ( Referred pain ) की श्रेणी में रखा जा सकता है । इस प्रकार का शूल प्रतिश्याय, दृष्टिशक्ति की कमी, दन्त रोग, मध्यकर्णशोथ, आमाशय तथा गर्भाशय की विकृतियों में होता है । वाताच्छूलं भ्रमः कम्पः पित्ताद्दाहो मदस्तृषा । कफाद्गुरुत्वं तन्द्रा च शिरोरोगे त्रिदोषजे ॥ ( ४ ) मन्निपातज शिरोरोग का लक्षण - त्रिदोष में वान से शूल, भ्रम और कम्प, पित्त मे सिर में दाह, मद ( नशा की तरह प्रतीत होना ), प्यास तथा कक से सिर का भारीपन और तन्द्रा ये लक्षण होते हैं । २६ ॥ १. ' शीतं सुश्रूयते शीतमिच्छनि ' चक्रः । ' शीतं सुखायते ' यो ।
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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३३५ विमर्श -- यद्यपि सभी शिरोरोग त्रिदोषज होते हैं तथापि विकृतिविषमसमवायजन्य शिरोरोग का प्रतिपादन करने के लिये इसका पृथक वर्णन किया गया है । दोपोल्वणता के आधार पर वातिक आदि शिरोरोगों का वर्णन किया गया है । उपर्युक्त प्रकार के लक्षण आधुनिक ग्रन्थों में वर्णित पुरःकपालीय वायु विवर - शोथ ( Frontal Sinusitis ) में पाया जाता है । तिलक्षीरगुडाञ्जीर्णपूतिसंकीर्णभोजनात् । क्केदोऽसृक्कफमांसानां दोषलस्योपजायते ॥ २७ ॥
ततः शिरसि संक्केदात् क्रिमयः पापकर्मणः । जनयन्ति शिरोरोगं जाता बीभत्सलक्षणम् ॥
( ५ ) क्रिमिजन्य शिरःशूल का कारण ( निदान ) - - तिल, दूध, गुड़ इनके अत्यधिक सेवन से, भोजन के जीर्ण न होने पर ही पुनः भोजन कर लेने से, सड़े, गले द्रव्यों के खाने से तथा संकीर्ण ( वीर्यादि- विरुद्ध बहुत से द्रव्यों को एकत्र ) भोजन से अधिक दोषयुक्त पुरुष के रक्त, कफ तथा मांस में क्लेद उत्पन्न हो जाता है, उस क्लेद से, पापकर्मा पुरुष के शिरः प्रदेश में क्रिमियाँ उत्पन्न होकर घृणित लक्षणों से युक्त शिरोरोग को उत्पन्न करती हैं ॥ २७-२८ ॥ विमर्श -- आधुनिक दृष्टि से विचार करने पर कृमिज शिरोरोग के दो भेद कर सकते हैं— ( १ ) साक्षात् कृमिजन्य, ( २ ) परम्परया या अप्रत्यक्ष कृमिजन्य । साक्षात्कृमिजन्य में नासिका द्वारा स्राव के साथ कृमि भी गिरते हैं, इनका प्रत्यक्ष किया जा सकता है । इस प्रकार की अवस्था वायुविवरशोथ ( Sinusitis ) के कारण मिल सकती है । दूसरे प्रकार में कृमि दिखाई नहीं पड़ते और न तो नासिका से किसी प्रकार का स्राव ही होता है । उदर में गण्डूपदक्रिमि, अंकुशमुखकृमि की उपस्थिति से सिर से संवाहित या साम्वेदनिक पीडा होती है । किन्तु यह प्रायः अधिक तीव्र स्वरूप की नहीं होती । ये कृमि आन्त्रस्थ रक्त पर अपना निर्वाह करते हैं जिसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क में रक्ताल्पता होकर शिरःशूल होना है । व्यधच्छेदरुजाकण्डूशोफदौर्गन्ध्यदुःखितम् ' । क्रिमिरोगातुरं विद्यात् क्रिमीणां दर्शनेन च ॥ क्रिमिज शिरःशूल के लक्षण - व्यथ ( विधे जाने की तरह पीड़ा ), छेद, रुजा ( वेदना ), कण्डू, शोफ, दुर्गन्ध, इनसे दुःखित तथा क्रिमि के लक्षणों को देखकर क्रिमि रोग से ग्रसित पुरुष को जानना चाहिये ॥ २ ९ ॥ विमर्श - मिर्मीय चिकित्सा में वातपित्त, कफ और सन्निपात जन्य क्रिमियों के भिन्न - भिन्न लक्षण बताया है, यथा-- भृशार्ति ' शूलं स्फुरतीह वातात् पित्तात् सदाहर्ति कफाद् गुरु स्यात् । सर्वैस्त्रिलिङ्गं क्रिमिजं सकण्डु दौर्गन्ध्यतोदादियुतं शिरः स्यात् ॥ ' इससे यह ज्ञात होता है कि आचार्य ने अलग - अलग दोष से क्रिमियों की उत्पत्ति मानी है । पर वाग्भट ने सन्निपात से ही सिर में क्रिमियों की उत्पत्ति बताई है । जैसा कि - ' सङ्कीर्णै भोजनैर्मूर्ध्नि केदिते रुधिरामिषे । कोपिते सन्नि-पाते च जायन्ते मूर्ध्नि जन्तवः । शिरसस्ते पिबन्तोऽत्रं घोराः कुर्वन्ति वेदनाः । पित्तविभ्रंशजननी-र्व्वरः कासो बलक्षयः ॥ रौक्ष्य शोफव्यधच्छेददाहस्फुरणपूतिताः । कपाले तालुशिरसोः कण्डूः शोषः प्रमीलकः ॥ ताम्राच्छसिङ्घाणकता कर्णनादश्च जन्तुजे ॥ ' ( अ. हृ. उ. अ. ३२ ) । सुश्रुत ने इन्हीं लक्षणों को विशेष रूप से स्पष्ट किया है । जिससे सुगमतापूर्वक क्रिमिज शिरोरोग का ज्ञान हो जाता है - ' निस्तुद्यते यस्य शिरोऽतिमात्रं संभक्ष्यमाणं स्फुरतीव चान्तः । घ्राणाच्च गच्छेत् सलिलं सपूयं शिरोभितापः क्रिमिभिः स घोरः ॥ ( मु. उ. अ. २५ ) इस अध्याय में शिरोरोग पाँच ही होते हैं । इसकी प्रतिज्ञा आचार्य ने पहले की है । उसके अनुसार पाँच शिगे रोगों का वर्णन यहाँ किया है । किन्तु ' रोगा विविधलक्षणाः शिरसि जायन्ते ' १. ' छेदव्यधनकण्डू शोफदौगंत्यदुःखितम् ' इति पा. । २. ' लक्षणेन ' इति पा ० ।
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३३६ चरकसंहिता यह भी बता कर अर्द्धावभेदक आदि का नाम गिनाया है । सुश्रुत ने शिरोरोग ११ ग्यारह बताये हैं और वाग्भट ने १० दश बताये है । सुश्रुत और वाग्भट कथित शंखक, अर्धावभेदक, सूर्यावर्त, अनन्तवात और इसके अतिरिक्त शिरःकम्प, इनका वर्णन त्रिममय नामक चिकित्सा के २६ वें अध्याय में इन रोगों का वर्णन आचार्य ने किया है । क्षय और रक्त इन दोनों का वर्णन आचार्य ने किया है । क्यों कि यह कोई स्वतंत्र दोप नहीं होता और वात, पित्त के अतिरिक्त कोई भिन्न लक्षण इसमें नहीं होता, इसे चि के २६ वें अध्याय के विमर्श में देखना चाहिये ।
शांकोपवा व्यायामरूक्षशुकाल्पभोजनैः । वायुराविश्य हृदयं जनयत्युत्तमां रुजम् ॥३० ॥
( २ ) हृद्रोग ( Cardiac Diseases ) ( १ ) वातजन्य हृदय रोग के कारण --- शोक, उपवास, अत्यधिक व्यायाम, इनसे और सूखे, रूखे, व मात्रा में अल्प भोजन करने से बढ़ी हुई वायु, हृदय प्रदेश में जाकर अत्यविक वेदना को उत्पन्न करती है ॥ ३० ॥
वेपथुर्वेष्टनं स्तम्भः प्रमोहः शून्यता देरेः । हृदि वातातुरे रूपं जीर्णे चात्यर्थवेदना ॥ ३१ ॥
वातजन्य हृदय रोग के लक्षण - हृदय जब कुपित वायु से पीड़ित होता है तो उसमें वेपथु ( धड़कन ), वेष्टन ( ऐंठन ), स्तम्भ ( हृदय की गति में रुकावट होना ), प्रमोह ( मूर्च्छा ), शून्यता, दर ( हृदय में दरदर या मरमर ध्वनि की प्रतीति होना ) ये लक्षण वातजन्य हृदय रोग में होते हैं और विशेष रूप से ये लक्षण भोजन के पच जाने पर अधिक रूप में बढ़ जाते हैं ॥ ३१ ॥
उष्णाम्ललवणचार कटुकाजीर्णभोजनैः । मद्यक्रोधात पैश्वाशु हृदि पित्तं प्रकुप्यति ॥ ३२ ॥
( २ ) पित्तज हृदय रोग का कारण - उष्ण, लवण, रस और क्षार, कटु वस्तुओं के सेवन से, अजीर्ण रहने पर भी भोजन करने से, मदिरा अधिक पीने से, अधिक क्रोध करने से और अधिक धूप में बैठने से हृदय में जाकर पित्त कुपित हो जाता है ॥ ३२ ॥
हहाहस्तिक्तता वक्रे तिक्तौग्लोद्विरणं कुमः । तृष्णा मूर्च्छा भ्रमः स्वेदः पित्तहृद्रोगलक्षणम् ॥ पित्तन हृदय रोग का लक्षण - हृदय में दाह, मुख मे तानापन, तीता और खट्टा के होना, लम, तृष्णा, मूर्च्छा, चक्कर का आना, पसीना आना ये सब लक्षण पित्तजन्य हृदय रोग में होते है ॥ ३३ ॥
विमर्श - चिकित्सा स्थान के २६ अभ्याय में त्रास, ज्वर, ताप और शरीर में पीलापन का हो जाना ये अधिक लक्षण बनाये गये है, यथा- ' पित्तात्तमो दूयनदाहमोहाः संत्रासतापज्वरपीत-भावाः । ' सुश्रुत में - ' तृष्णोष्मदाह चोपाः स्युः पैत्तिके हृदयकुमः । धूमायनं च मूर्च्छा च स्वेदः शोपो मुखस्य च ॥ ' अत्यादानं गुरु स्त्रिग्धमचिन्तनमचेष्टनम् । निद्रासुखं चाभ्यधिकं कफहृद्रोगकारणम् ॥ ३४ ॥
( ३ ) कफजन्य हृदय रोग के कारण - अधिक भोजन करना, गुरु, स्निग्ध पदार्थों का अधिक सेवन करना, कभी भी किसी प्रकार की चिन्ता न करना, चेष्टा न करना, सदा सोये रहना ये सब कफजन्य हृदय रोग के कारण होते है ॥ ३४ ॥
उदयं कफहृद्रोगे सुप्तं स्तिमितभारिकम् । तन्द्रारुचिपरीतस्य भवत्यश्मावृतं यथा ॥ ३५ ॥
कफजन्य हृदय रोग का लक्षण कफजन्य हृदय रोग में तन्द्रा, भोजन में अरुचि से युक्त १. ' शीत रूक्षाल्प भोजनैः ' यो । २. ' भ्रमः ' ग । ' द्रवः ' यो । ३. ' पित्ताम्लोद्गिरणम् ' ग. ।
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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३३७ पुरुष का हृदय शून्य सा प्रतीत होता है, स्तिमित होता है, भारी होता है तथा हृदय के ऊपर पत्थर का भार रक्खा हुआ है, ऐसा प्रतीत होता है ॥ ३५ ॥
विमर्श - सुश्रुत में कफज हृदय रोग में गुरुता, मुख से जल का स्राव, भोजन में अरुचि, हृदय का जकड़ना, अग्नि का मन्द होना, मुख का मोठा होना बताया यथा - ' गौरवं कफसंस्रावो s-रुचिः स्तम्भोऽग्निमार्द्रवम् । माधुर्यमपि चास्यस्य बलासागतते हृदि ॥ ' ( सु. उ. अ. ४३ ) । हेतुलक्षणसंसर्गादुच्यते सान्निपातिकः । ( हृद्रोगः कष्टदः कष्टसाध्य उक्तो महर्षिभिः । ) ( ४ ) त्रिदोषज हृदय रोग के कारण और लक्षण - सन्निपातजन्य हृदय रोग में वात, पित्त, कफजन्य हृदय रोग के जो कारण होते हैं और उन रोगों में जो लक्षण होते हैं, उन सभी के कारण और लक्षणों का जिसमें समावेश हो जाता है. उसे त्रिदोषज हृदय रोग कहते हैं । [ यह हृदय रोग कष्ट देने वाला होता है और कष्टसाध्य होता है । ऐसा ऋषियों ने बताया है । ] त्रिदोषजे तु हृद्रोगे यो दुरात्मा निषेवते ॥ ३६ ॥
तिलक्षीरगुडादीनि ग्रन्थिस्तस्योपजायते । ममैकदेशे संक्लेदं रसश्चास्योपगच्छति ॥ ३७ ॥
संक्लेदात् क्रिमयश्चास्य भवन्त्युपहतात्मनः । मर्मैकदेशे संजाताः सर्पन्तो भक्षयन्ति च ॥ ( ५ ) किमिजन्य हृदय रोग का कारण और सम्प्राप्ति - त्रिदोष के कोप से होने वाले हृदय रोग में जो दुरात्मा ( अजितेन्द्रिय ) पुरुष तिल, दूध और गुड़ आदि पदार्थों को अधिक रूप में सेवन करता है उसके मर्म स्वरूप हृदय के एक प्रदेश में ग्रन्थि बन जाती है, उस ग्रन्थि में रस धातु आकर कुंड उत्पन्न कर देता है । तब उस उपहतात्मा ( अजितेन्द्रिय ) मनुष्य के हृदय में कुंद से क्रिमियाँ उत्पन्न हो जाती हैं । प्रथम तो वे क्रिमियाँ मर्मस्वरूप हृदय के एक प्रदेश में उत्पन्न होती हैं पर वहाँ से हृदय के सभी प्रदेश में चलती हुई शनैः शनैः - सम्पूर्ण हृदय का भक्षण कर जाती हैं ॥ ३६-३८ ॥ तुद्यमानं स हृदयं सूचीभिरिव मन्यते । छिद्यमानं यथा शस्त्रैर्जातकण्डूं महारुजम् ॥ ३ ९ ॥ हृद्रोगं क्रिमिजं त्वेतैर्लिङ्गैर्बुङ्खा सुदारुणम् । त्वरेत जेतुं तं विद्वान् विकारं शीघ्रकारिणम् ॥ कृभिजन्य हृदय - रोग का लक्षण - जत्र कृमियाँ हृदय प्रदेश में काटती हैं तो हृदय में सूई से छेदने की तरह, शस्त्र से काटने की तरह वेदना होती है । हृदय में खुजली और वेदना अधिक होती है । इन लक्षणों को देख कर भयंकर कृमिजन्य हृदय रोग समझना चाहिये । यह एक भयंकर रोग है और शीघ्र ही प्राणघातक होता है अतः विद्वान् वैद्य को चाहिये कि शीघ्र ही इसकी चिकित्सा करे ॥ ३ ९ -४० ॥ विमर्श - रक्त के आवार एवं रक्त का समस्त शरीर में परिचालन करने वाले यंत्र विशेष को ही हृदय कहते है । यह अनैच्छिक पेशियों का बना हुआ होता है और वक्ष - प्राचीर के अन्दर दोनों फुफ्फुस के मध्य में अवस्थित रहता है । युवा पुरुष का हृदय लगभग ५३ इञ्च लम्बा, २३ इञ्च चौड़ा और २३ इञ्च मोटा तथा भार में लगभग पांच छटांक होता है । स्त्रियों में इसका आकार तथा भार अपेक्षाकृत कुछ कम होता है । हृदय की आकृति ठीक बन्द की हुई मुट्ठी के समान होती है । हृदय का अधिकांश भाग वृक्ष के बाम भाग में अवस्थित रहता है । इसके दोनों ओर वान और दक्षिण फुफ्फुस रहते हैं । वाम पार्श्व के फुफ्फुस में इसके अधिक सान्निध्य के कारण एक गर्त बना रहता है जिसे हार्दिक खात या गर्न ( Cardiac notch ' कहते है । इसके सामने उर: फलक तथा वाम पार्श्व की द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ तथा पञ्चम पर्शुकाओं की तरुणास्थियां ( Costal ५. अयमर्धश्लोकचक्रासंमतः । २. ' ते जाताः ' ग. । २२ च ० सं ०
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३३८ चरकसंहिता cartilages ) रहती हैं । उसके पृष्ठ भाग में पञ्चम, षष्ठ, सप्तम तथा अष्टम कशेरुकाओं के गात्र तथा चक्रिकार्ये ( Discs ) रहती हैं । हृदय और इनके बीच में बृहद्धमनी ( Aorta ) अवस्थित रहती है । रचना की दृष्टि से हृदय एक कोष्ठ ही है । यह कोष्ठ अन्दर से एक मांस के पतले परदे से वाम और दक्षिण दो भागों में विभक्त रहता है । इन दोनों कोष्ठों का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं रहता । प्रत्येक कोष्ठ दो भागों में विभक्त हैं । दक्षिणी ऊपर का भाग रक्त परिभ्रमण से लौटे हुए अशुद्ध रक्त का ग्रहण करता है अतः उसे दक्षिण ग्राहक कोष्ठ या दक्षिण अलिन्द ( Right auricle ) कहते हैं । यहां से गया हुआ रक्त नीचे के भाग द्वारा फुफ्फुसीय धमनी में फेंक दिया जाता है अतः इसे दक्षिण क्षेपक कोष्ठ या दक्षिण निलय ( Right ventricle ) कहते हैं । ऊपर और नीचे के दक्षिण कोष्ठ पतले कपायें ( Auriculo ventricular or Tricuspid valve ) के द्वारा परस्पर पृथक् रहते हैं । ये कपाट सौत्रिकतन्तु ( Fibrous tissue ) के बने होते हैं और सदा नीचे की ओर निलय में ही खुलते हैं । इस प्रकार रक्त एक ही दिशा में बहता है, पीछे नहीं लौट पाता । वाम पार्श्व में भी इसी तरह दो कोष्ठ होते हैं । वाम ग्राहक कोष्ठ फुफ्फुसीय सिराओं ( Pulmonary veins ) द्वारा लौटे हुए शुद्ध रक्त का ग्रहण करता है और वह रक्त पुनः वाम अलिन्द्र - निलय मध्यगत द्वार या द्विपत्रक कपाट ( Mitral Valve ) के द्वारा नाम निलय ( Left ventricle ) में चला आता है और वहां से हृदय संकोच के द्वारा बृहद् धमनी में फेंक दिया जाता है । इन दोनों द्वारों में भी कपाट लगे रहते है । द्विपत्रक कपाट ( Bicuspid -valve ) निलय की ओर तथा बृहद् धमनी कपाट वृहद् धमनी की ओर ही खुलते हैं । इस प्रकार इनके अविकृत रहने पर रक्त अपनी प्रकृत दिशा की ओर ही गमन करता है, विरुद्ध दिशा में नहीं लौट पाना । हृदय का सम्पूर्ण आन्तरिक भाग एक कला से आच्छादित रहता है जिसे हृदन्तः कला ( Endocardium ) कहते हैं । हृदय के उक्त सब अङ्गों के प्रकृत रहने पर हृदय तथा शरीर का कार्य भी प्रकृत रहता है । इनमें से किसी के भी विकृत हो जाने से हृदय का कार्य विकृत हो जाता है और इसको ही हृद्रोग कहते हैं । हृदय रस का स्थान है अतः दोनों के हृदयगत होने पर रसदृष्टि तथा हृदय के रोग प्रारम्भ हो जाते हैं । हृद्रोग के सामान्य लक्षणों का वर्णन आचार्य ने निम्न प्रकार से किया है, यथा- ' वैवर्ण्यमूर्च्छाज्वरका सहिक्काश्वासास्यवैरस्यतृषा प्रमोहाः । छर्दिः कफोत्क्लेशरुजोऽरुचिश्च हृद्रोगजाः स्युर्विविधास्तथाऽन्ये ॥ ' ये हृदरोग के सामान्य लक्षण हैं । पाश्चात्य रोगविज्ञान में वर्णित विविध हृद्रोगों में ये लक्षण ठीक इसी रूप में पाये जाते हैं । -वैवर्ण्य ( Discolouration ) इसमें पाण्डुता ( Pallor ), श्यावता ( Cyanosis ) तथा कपोलारुण्य ( Malar flush ) इन तीनों का समावेश होता है । पाण्डुता रक्ताल्पता की द्योतिका हैं जो कि हृत्कपार्टी की विकृति से होती है । शोणवर्तुलि ( Haemoglobin ) की कमी से श्यावता आती है । इसकी प्रतीति विशेषतया ओष्ठ, नासाग्र तथा नख सदृश स्थानों में होती है जहां केशि-कार्ये उत्तान ( Superficial ) रहती हैं । इसका कारण सिरागत रक्तावरोव ( Venous Stasis ) है । कपोलारुण्य ( Malar flush ) का कारण द्विपत्रक संकोच ( Mitral stenosis ) है । मूर्च्छा— यह हृदयजन्य श्वास ( Cardiac asthma ) का विशेष लक्षण है । ज्वर - आमवातजन्य या औपसर्गिक हृदन्तःकला शो ( Rheumatic or Septic endocarditis ) में यह लक्षण प्रधान रहता है । कास, हिक्का तथा श्वास को अवरोधजन्य लक्षण ( Pressure symptoms ) कहते
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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३३६ हैं । ये द्विपत्रक प्रत्युद्गरण ( Mitral regurgitation ) में तथा विशेषतया द्विपत्रक -संकोच ( Mitral Stenosis ) में पाये जाते हैं । द्विपत्रक - संकोच में रक्त का वमन भी होता है । हृदय-वाहिनी की घनास्रता ( Coronary thrombosis ) में वमन, अरुचि तथा श्वासकृच्छ्रता के लक्षण मिलते हैं । वातिक हृद्रोग में पीडा की विशेषता रहती है । हृच्छूल ( Angina pectoris ) तथा हृदयाघनास्त्रता ( Coronary thrombosis ) का यह विशिष्ट लक्षण है । सुश्रुत ने हृल्लास, आंखों के आगे अंधेरा प्रतीत होना, अरुचि, नेत्रों की मलिनता तथा शोध ये क्रिमिज हृद्रोग के प्रधान लक्षण माने हैं । अंकुशमुख क्रिमि के उपसर्ग से रक्ताल्पता होने पर समस्त शरीर विशेषतया नेत्रों की कला में पाण्डुता की प्रतीति होती है । आँखों के आगे अंधेरा सा दिखाई देना भी रक्ताल्पता का ही कार्य है । क्रिमि के उपसर्ग से हृदय विस्फारित हो जाता और परिणामस्वरूप हार्दिक द्वार भी इतने विस्तृत हो जाते हैं कि हार्दिक कपाट उन्हें पूर्णतया बन्द नहीं कर पाते । इससे हृदय में प्रत्युद्भिरण ( Regurgitation ) का दोष हो जाता है । हृदय में रक्तज ( Haemic ) मर्मर सुनाई पड़ता है । रक्तवाहिनी के अन्तस्तर के अपजनन से रक्त रस - वाहिनी की दीवार से निकल कर धातुओं में एकत्रित होने लगता है, अतएव शरीर में सूजन आ जाती है । परन्तु आचार्य ने तो अपथ्य से त्रिदोषज हृद्रोग की प्रवर्धमानावस्था को ही क्रिमिज हृद्रोग माना है । * द्वयुल्बणैकोल्वणैः षट् स्युर्हीनमध्याधिकैश्च षट् । समैश्चैको विकारास्ते सन्निपातास्त्रयोदश ॥ ( ३ ) दोषों के मान के अनुसार ६२ व्याधियाँ ( Sixty - two Permutations and Combinations of Doshas ) १३ प्रकार के सन्निपात - मान विकल्प से वातादि दोष के कितने भेद और कितने रोग होते हैं इस प्रश्न का उत्तर - युवण अर्थात् दो दोषों की प्रधानता से तीन, एक दोष की प्रधानता से तीन, इस प्रकार ६ । हीन, मध्य और एक दोष अधिक होने से ६, और एक भेद दोषों के समान रूप में बढ़ने से । इस प्रकार बढ़े हुये दोषों के मान- विकल्प से १३ प्रकार का सन्निपात होता है ॥ ४१ ॥
विमर्श - जब कुछ दोष अपनी मात्रा से अधिक बढ़ते हैं और कुछ कम तो इसके अनुसार सन्निपात के १३ भेद हो जाते हैं जैसे— वृद्ध वृद्धतर १ कफ वातपित्त २ वात कफपित्त ३ पित्त कफवात ये दो दोषों के बढ़ने से सन्निपात के तीन भेद होते हैं । वृद्ध १ वात - पित्त २ कफ - पित्त ३ कफ - वात ये एक दोष के बढ़ने से सन्निपान के ३ भेद होते हैं । वृद्धतर कफ वात पित्त
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३४० चरकसंहिता वृद्ध ( हीन ) वृद्धतर ( मध्य ) वृद्धतम ( अधिक ) वृद्ध ( हीन ) वृद्धतर ( मध्य ) वृद्धतम ( अधिक ) १ वात पित्त कफ ४ पित्त कफ वात २ वान कफ पित्त ५ कफ पित्त वात ३ पित्त वात कफ ६ कफ वात पित्त ये हीन, मध्य और अधिक दोषों के भेद से सन्निपात के ६ भेद होते हैं । वृद्ध ( समान रूप से बढ़े हुये ) १ वात - पित्त - कफ । यह सन्निपात के १३ भेद होते हैं । * संसर्गे नव षट् तेभ्यं एकवृद्ध्या समैस्रयेः । पृथक् त्रयश्च तैर्वृद्धैर्व्याधयः पञ्चविंशतिः ॥४२ ॥
द्वन्द्वज दोषों के ९ भेद तथा पृथकू दोषों के ३ भेद - दो दोषों के मिलने पर ९ भेद होते हैं, उसमें एक के बढ़ने पर तथा दूसरे के कम होने पर ६ भेद होते हैं । और दोनों दोषों के सम रूप में बढ़ने से ३ भेद हो जाते हैं इस भाँति ९ होते हैं । और अलग बढ़े हुये वृद्ध वात, वृद्ध पित्त, वृद्ध कफ ये ३ | इस तरह बढ़े हुये दोष के २५ भेद ( सन्निपात १३ + संसर्ग ९ + पृथक् ३ = २५ ) होते है ॥ ४२ ॥
विमर्श - संसर्ग ( दो दोष ) में एक दोष के बढ़ने पर तथा दूसरे दोष के घटने पर ६ भेद होते हैं जैसे-वृद्ध वृद्धतर वृद्ध वृद्धतर १. वात पित्त ४ पित्त कफ २ वान कफ ५ कफ वात ३ पित्त वात ६ कफ पित्त इस प्रकार ६ भेद होते हैं । समान रूप से दोनों दोष बढ़े हुये तीन हैं, यथा - १. वातपित्त २. वातकफ ३. कफपित्त इस प्रकार ९ होते हैं । अलग - अलग एक दोप के बढ़ने पर तीन, यथा-१. वृद्ध वात २. वृद्ध पित्त ३. वृद्ध कफ इस प्रकार सन्निपात के १३, द्वन्द्वज के ९ और अलग ३ मिलाकर कुल २५ भेद हुये । चरक चिकित्सा स्थान के प्रथम अध्याय में इन तेरहों प्रकारों के सन्निपातों में होने वाले लक्षणों का वर्णन किया गया है । अन्य ग्रन्थों में इस प्रकार बढ़े और घटे हुये दोषों से होने वाले सन्निपात का नाम ( भावप्रकाश ज्वर चिकित्सा प्रकरण में ) बतलाया गया है । यह वहीं द्रष्टव्य है! * यथा वृद्धैस्तथा क्षीणैर्दोषैः स्युः पञ्चविंशतिः । क्षीण दोषों के २५ भेद दोपों के भी २५ भेद होते हैं । - - जिस प्रकार बढ़े हुये दोपों के २५ भेद होते हैं उसी प्रकार क्षीण विमर्श - तात्पर्य यह • है कि ये अपनी मात्रा से जब न्यून होते है तो भी रोग की उत्पत्ति करते है । दोषों के क्षीण होने पर भी सन्निपात के १३ भेद होते है । जैसे --क्षीण १ वान २ पित्त ३ कफ श्रीमतर वित्त - कफ वातकफ पित्त - वान ये तीन विकल्प को दोपों के अधिक क्षीण होने पर होते है । १. ' ंसर्गेण नवैते षट् ' ग. । २. ' समैस्त्रय इति वृद्धैः समैः ' चक्रः ।
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कियन्तः शिरसीयाध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् ३४१ श्रीण क्षीणतर १ वात - पित्त कफ २ कफ - वात ३ कफ - पित्त पित्त वात ये तीन भेद एक दोष के अधिक क्षीण होने पर होते हैं । क्षोण ( हीन ) क्षीणतर ( मध्य ) क्षोणतम ( अधिक ) क्षीण ( हीन ) क्षीणतर ( मध्य ) क्षीणतम ( अधिक ) १ वात पित्त कफ ४ पित्त वात कफ २ वात ३ पित्त कफ पित्त ५ कफ वात पित्त कफ वान ६ कफ पित्त वान ये विकल्प दोषों के हीन, मध्य और अधिक क्षीण होने पर ६ होते हैं । और तेरहवाँ समान रूप से क्षीण वात - पित्त - कफ एक भेद, इस प्रकार दोषों के क्षीण होने पर ये १३ विकल्प सन्निपान के होते हैं । द्वन्दज के विकल्प ९ होते हैं यथा-क्षीण १ वात क्षोणतर पित्त २ वात कफ ३ पित्त वात क्षीण क्षीणतर ४ पित्त कफ ५ कफ वात ६ कफ पित्त और समान रूप से घटे हुये १. वात - पित्त २. वात - कफ ३. पित्त - कफ व इस प्रकार ये ९ विकल क्षीण दोष के होते हैं । और समान रूप से घटे हुये अलग - अलग १. क्षीण वात २. क्षीण पित्त ३. क्षीण कफ इस प्रकार क्षीण दोष के २५ विकल्प और वृद्ध दोष के २५ विकल्प कुल मिला कर ५० विकल्प होते हैं । 8 वृद्धिक्षयकृतश्चान्यो विकल्प उपदेच्यते । वृद्धिरेकस्य समता चैकस्यैकस्य संक्षयः । द्वन्द्ववृद्धिः क्षयश्चैकस्यैकवृद्धिर्द्वयोः क्षयः ॥ ४४ ॥
१. ' उपदिश्यते ' यो । २ ' व्याधीनां द्व्यधिका षष्टिरित्युक्तं विवृगोति- ह्युल्वणै कोल्बणैरिति । वृद्धैर्दोषैः पञ्चविंशतिर्व्याधयो भवन्ति । तद्यथा - संनिपाते त्रयोदश, संसर्गे नव, पृथक् त्रयश्चेति; व्ह्युल्बणैकोल्बणैर्दोषैः षट्ः, संनिपतितानां दोषाणां मध्ये द्वयोरतिशये त्रयः, एकस्यातिशये त्रयः इति ह्युल्बणैकोल्बणैः षट् ् हीनमध्याधिकैः संनिपतितैः षट् समैः तुल्यवृद्वैर्दोषैश्चैकः, इति संनिपाताः त्रयोदश; तथा च - कफः वृद्धः वातपित्ते अधिकवृद्धे १, पित्त बृद्धं वातकफावधिकवृद्धौ २, वातो वृद्धः पित्तकफावधिकवृद्धौ ३, इति युवणैस्त्रयः; पित्तकफौ वृद्ध वातोऽधिकवृद्धः १, वातकफौ वृद्धौ पित्तमधिकवृद्धं २, वातपित्ते वृद्धे कफोऽधिकवृद्धः ३, इति एकोल्वणैस्त्रयः; वातो वृद्धः पित्तं वृद्धतरं श्लेष्मा वृद्धतमः १, वातो वृद्धः श्लेष्मा वृद्धतरः पित्तं वृद्धतमम् २, पित्तं वृद्धं श्लेष्मा वृद्धतरः वातो वृद्धतमः ३, पित्तं वृद्धं वातो वृद्धतरः इलेष्मा वृद्धतमः ४, श्लेष्मा वृद्धो वातो वृद्धतरः पित्तं वृद्धतमम् ५, इलेष्मा वृद्धः पित्तं वृद्धनरं वातो वृद्धतमः ६, इति हीनमध्याधिकैः षट्; तुल्यवृद्धा वातपित्तश्लेष्माण इति समैरेकः । संसर्गेण नत्र । तत्र एकवृद्धथा षट्, समैश्च त्रयः । संसृष्टयोर्दोषियोर्मध्ये एकस्य वृद्धया अतिशयेन षट् । तद्यथा - वातो वृद्धः पित्तं वृद्धतरम् १, पित्तं वृद्धं वातो वृद्धतरः २, इलेमा वृद्धः पित्तं वृद्धतरम् ३, पित्तं वृद्धं श्लेष्मा वृद्धतरः ४, वातो वृद्धः श्लेष्मा वृद्धतरः ५, लेष्मा वृद्धो वातो वृद्धतरः ६, इति एकवृद्धया घट् । समैर्दोषयोः समानवृद्धया यः तद्यथा - वातपित्ताभ्यां वृद्धाभ्यामेकः, वातश्लेग्मभ्यां वृद्धाभ्यां