चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 481–490
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 481–490
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३६२ चरकसंहिता विमर्श -- कृमियों का वर्णन विमान के ७ वें अध्याय में, प्रमेह का वर्णन निदान के चौथे
में, योनि रोग का वर्णन चि ० ३० वे अ ० में किया गया हैं ।
केवलश्चायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्टो भवति ॥ ४ ॥
यह सम्पूर्ण रोगों के अधिकारों का वर्णन क्रम के अनुसार कर दिया गया है ॥ ४ ॥
सर्व एव निजा विकारा नान्यत्र वातपित्तकफेभ्यो निर्वर्तन्ते; यथा हि- शकुनिः सर्व दिवसमपि परिपतन् स्वां छायां नातिवर्तते, तथा स्वधातुवैषम्यनिमित्ताः सर्वे विकारा वातपित्तकफान्नातिवर्तन्ते; वातपित्तश्लेप्मणां पुनः स्थानसंस्थानप्रकृतिविशेषानभिसमीक्ष्य तदात्मकानपि च सर्वविकारांस्तानेवोपदिशन्ति बुद्धिमन्तः ॥ ५ ॥
त्रिदोष ( वात - पित्त कफ ) ही सब रोगों के आधार - सभी प्रकार के निज रोग वात, पित्त, और कफ को छोड़कर नहीं होते हैं अर्थात् निज रोग वात, पित्त और कफ के ही द्वारा उत्पन्न होते हैं, जिस प्रकार शकुनि ( पक्षी ) सारे दिन आकाश में चारों तरफ उड़कर देश - देशान्तर को लाँघ जाती है पर वह अपनी छाया को कभी भी नहीं लाँघ सकती है ठीक उसी प्रकार अपने धातु ( वान पित्त कफ ) की विषमता से उत्पन्न होनेवाले सभी शारीर दोषजन्य रोग भले ही शास्त्रों में बताई हुई संख्या और लक्षणों का अतिक्रमण कर जाँय पर वात, पित्त और कफ का अतिक्रमण नहीं करते हैं । इन्हीं बात, पित्त, कफ के स्थान ( रस- रक्तादि धातुएँ, आमाशय, पक्काय आदि ), संस्थान ( लक्षण ), प्रकृति ( कारण ) विशेष को देखकर वात, पित्त, कफ से होने वाले सभी रोगों के भिन्न - भिन्न नाम का उपदेश बुद्धिमान् वैद्य लोग करते हैं ॥ ५ ॥
विमर्श इसी बात का समर्थन किया है - ' दोषा एव हि सर्वेषां रोगाणामे-- - वाग्भट में भी ककारर्णम् । यथा पक्षी परिपतन् सर्वतः सर्वमप्यहः ॥ छायामत्येति नात्मीयां यथा वा कृत्स्नमप्यदः । विकारजातं विविधं त्रीन् गुणान्नातिवर्तते ॥ तथा स्वधातुवैषम्यनिमित्तमपि सर्वदा । विकारजातं त्रीन्दोषान् ॥ ' ( अ ० हृ ० सू ० अ ० १२ ) । सुश्रुत ने भी यही बान बनाया है पर उनका उदाहरण भिन्न है यथा - ' सर्वेषां च व्याधीनां वातपित्तइलेष्माण एवं मूलं तलिङ्गत्वाद्द्द्दृष्टफलत्वादागनाच्च । यथा हि कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितं मत्वरजस्तमांसि न व्यतिरिच्यन्ते, एवमेव कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितमव्यतिरिच्य वातपित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते । ' ( सु ० सू ० अ ० २४ ) । इस प्रकार सभी रोग त्रिदोष के ही द्वारा उत्पन्न होते हैं यह सिद्धान्त निश्चित हो जाने पर यह शंका होती है कि रोग और दोष का सम्बन्ध नित्य है या अनित्य । यदि नित्य सम्बन्ध माना जाय तो शरीर में वातादि दोष सर्वदा वर्तमान रहते हैं अतः सभी प्राणी सर्वदा रोगी ही रहेंगे पर ऐसा देखा नहीं जाना, अतः रोग और दोष का सम्बन्ध नित्य नहीं माना जाता है । यदि इनका सम्बन्ध अनित्य माना जाय तो शरीर के बाहर रोग और शरीर के अन्दर दोष रहते हैं तो इनका सम्बन्ध ही नहीं बनेगा, अतः अनित्य सम्बन्ध भी नहीं है, इन बानों को देखकर दोष को रोग का निमित्त कारण माना जाता है । जिस प्रकार वर्षा का निमित्त कारण मेघ होता है और मेघ के रहते भी वर्षा नहीं होती है, पर जब वर्षा होगी तब मेघ के ही द्वारा होगी, बिना मेघ के वर्षा हो ही नहीं सकती उसी प्रकार जब रोग होंगे तब १. ' सर्वा दिशोऽपि ' इति पा. । २. ‘ स्थानं रसादयो बस्त्यादयश्च, संस्थानमाकृतिर्लक्षणमिति यावत्, प्रकृतिः कारणम्, एषां विशेषानभिसमीक्ष्य तांस्तानुपदिशन्ति ' अष्टावुदराणि ' इत्येवमाद्युपदिशन्तिः तदात्मकानपीति वाता-दिजनितानपि ' चक्रः । ' समुत्थानस्थानसंस्थान वेदनावर्णनामप्रभावचिकित्सतप्रकृतिविशेषान् ' यो ।
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अष्टोदरीयाध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् ३६३ दोष से ही होंगे दोष के रहते हुए भी रोग नहीं हो सकते हैं अतः निमित्ततः दोष से रोग की उत्पत्ति होती है । कुछ लोग कुपित दोष और रोग का सम्बन्ध नित्य मानते हैं, यथा बताया है-' सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः । ' ( मा. नि. ) । इन्हीं दोषों से होनेवाले रोगों का नाम करण कहीं स्थान के अनुसार किया गया है जैसे ग्रहणी में विकार होने से ग्रहणी रोग, शिरो रोग, कर्ण रोग आदि, कहीं आकृति के अनुसार, जैसे अर्बुद, ग्रन्थि रोग, कहीं लक्षण के अनुसार जैसे ' अतीव सरतीति अतिसारः ', प्रवाहिका, वीसर्प आदि । कहीं कारण के अनुसार जैसे वद्धोद्धर, परिस्राब्युदर, जलोदर आदि ।
भवतश्वात्र-ॐ स्वधातुवैषम्यनिमित्तजा ये विकारसङ्घा बहवः शरीरे ।
न ते पृथक पित्तकफानिलेभ्य आगन्तवस्त्वेव ततो विशिष्टाः ॥ ६ ॥
निज और आगन्तुज रोग - शरीर के अन्दर अपनी धातुओं ( वात - पित्त कफ ) की विषमता के कारण होनेवाले व्याधियों का समुदाय बहुत ही अधिक होते हैं, पर वे अधिक व्याधियाँ वात, पित्त, कफ से अलग नहीं होती हैं । आगन्तुक रोग, धातु विषमता से होनेवाले रोगों से विशिष्ट अर्थात् भिन्न होते हैं ॥ ६ ॥
विमर्श - ' रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता ' यह पहले भी कहा जा चुका है और इसी के अनुसार - ' चतुर्थी भिषगादीनां शस्नानां धातुवैकृते । प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्थी चिकित्सेत्यभिधीयते ॥ ( च ० सू ० अ ० ९ ) भी कहा गया है पर आगन्तुक रोग जो अभिघातादि कारणों से होते हैं उनमें धातुसाम्य करने से ही लाभ नहीं होता है, अतः विशेष चिकित्सा उन रोगों में करते हुए धातु साम्य करने को आवश्यकता होती है । इन्हीं बातों को सूचित करने के लिए, धातुवैषम्य से होनेवाले रोगों से आगन्तुक रोगों को विशिष्ट कहा गया है ।
$ आगन्तुरन्वेति निजं विकारं निजस्तथाऽऽगन्तुमपि प्रवृद्धः ।
तत्रानुबन्धं प्रकृतिं च सम्यग् ज्ञात्वा ततः कर्म समारभेत ॥ ७ ॥
निज और आगन्तुक का परस्पर सम्बन्ध - आगन्तुक रोग होने के बाद वह निज विकारों ( बान, पित्त, कफ से होने वाले विशेष लक्षणों ) से अनुबन्ध ( सम्बन्ध ) स्थापित करता है । और बढ़ा हुआ निज विकार वाद में आगन्तुक रोगों में होने वाले लक्षणों का अनुसरण करता है । जब आगन्तुक विकार निज से, और निज आगन्तुक से सम्बन्ध कर लेते हैं तो दोनों विकार एक ही तरह के हो जायगें तब चिकित्सा की क्या व्यवस्था होगी, इसपर आचार्य ने कहा है कि इस तरह के रोगों में अनुबन्ध ( अप्रधान ) कौन विकार हैं अर्थात् कौन बाद में हुआ है । और प्रकृति कौन ( मूलभूत विकार ' चक्र ० ) है अर्थात् पहले कौन हुआ है, इसका विचार कर तब चिकित्सा कार्य का आरम्भ करना चाहिए ॥ ७ ॥
विमर्श - प्रधान रोग की चिकित्सा पहले की जाती है और अप्रधान की बाद में, पर यदि अप्रधान के ही द्वारा अधिक कष्ट पहुंच रहा हो तो उसी को पहले शान्त करना चाहिए । इस सिद्धान्त के अनुसार पहले प्रधान और अप्रधान का निश्चय करके तव चिकित्सा करनी चाहिए । तत्र श्लोकौ -विंशकाश्चैककाश्चैव त्रिकाश्वोक्तास्त्रयस्त्रयः । द्विकाञ्चाष्टौ चतुष्काश्च दश, द्वादश पञ्चकाः ॥८ ॥
२. ' मतिप्रवृद्धः ' ग. ।
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३६४ चरकसंहिता चत्वारश्वाष्टका वर्गाः, षट्कौ द्वौ, सप्तकास्त्रयः । अष्टोदरीये रोगाणां रोगाध्याये प्रकाशिताः ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के अष्टोदयो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ अध्यायगत विषयों का उपसंहार बीस - बीस के एक - एक, और तीन - तीन का तीन - तीन रोग, दो - दो के आठ रोग, चार - चार के दश रोग, पांच - पांच के बारह रोग, आठ - आठ के चार रोग, छ, छ के दो रोग, सात - सात के तीन रोग, इस अष्टोदरीय नामक अध्याय में कहा गया है ॥ ८ - ९ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततंत्र ( चरक संहिता ) के सूत्रस्थान में रोगचतुष्क विषयक ' अष्टोदरीय ' नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः अथातो महारोगाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इत ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ ॥ २ ॥
अब इसके बाद महारोगाध्याय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - पहले अध्याय में वातादिजन्य सामान्य ( General ) रोगों का वर्णन है । अब इस अध्याय में वातादिजन्य विशिष्ट ( Specific ) रोगों का वर्णन किया जायगा, ऐसा चक्रपाणि का मत है । शिवदास सेन के मतानुसार ' महा ' शब्द पिछले अध्याय की तुलना में वर्णित है यथा - ' महत्त्वं चास्य पूर्वाध्यायापेक्षया, न तु महायाससाध्यानां रोगाणामभिधायकोऽध्यायो महा-रोगाध्यायः । " ॐ चत्वारो रोगा भवन्ति - आगन्तु वातपित्तश्लेप्मनिमित्ताः । तेषां चतुर्णामपि रोगाणां त्वमेकविधं भवति, रुक्सामान्यात् । द्विविधा पुनः प्रकृतिरेषाम्, आगन्तु निजविभागात् । द्विविधं चैषामधिष्ठानं, मनःशरीरविशेषात् । विकाराः पुनरपरिसंख्येयाः प्रकृत्यधिष्ठान-लिङ्गायतन विकल्पविशेषापरिसंख्येयत्वात् ॥ ३ ॥
( १ ) सामान्य रोगभेद - विमर्श रोगों के विविध प्रकार से भेद - रोग ४ प्रकार के होते है ( १ ) आगन्तुज, ( २ ) वातज, ( ३ ) पित्तज, ( ४ ) कफज । इन चारो रोगों का रोगत्व एक प्रकार का ही होता है क्योंकि सभी में सामान्य रूप से रुजा होती है । फिर रोग की प्रकृति ( कारण ) दो प्रकार की होती है- ( १ ) आगन्तुज ( २ ) निज ( वातज - पित्तज कफज ) । इन रोगों के अधिष्ठान ( स्थान ) दो होते है -( १ ) मन ( २ ) शरीर । फिर रोग की ( १ ) प्रकृति ( सन्निकृष्ट कारण ), ( २ ) अधिष्ठान ( स्थान ), ( ३ ) लिंग ( लक्षण ), ( ४ ) आयतन ( बाहरी हेतु दुष्ट आहार - आचार आदि ) इनका विकल्प
अपरिसंख्येय होता है । इसलिये रोग असंख्येय होते है ॥ ३ ॥
१. ' प्रहृत्यधिष्ठानलिङ्गायतनवेदना विकल्पानामपरिसंख्येयत्वात् यो ।
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महारोगाध्यायः २० ] वैषम्यम् ॥ ४ ॥
' ' मुखानि कारणानि ' चक्रः । ३. ' न चान्योन्यसंदेह ' इति पा ० । ३६५ सूत्रस्थानम् २. ‘ प्रेरणं कारणम् ' चक्रः! विमर्श - सामान्यतः रोग के होने वाले ४ कारणों का उल्लेख किया गया है और इसी को ४ प्रकार का रोग भी कहते हैं । इनमें सामान्यतः सभी में कष्ट होता है अतः सभी को एक ही रोग माना है । पुनः कारण - भेद से आगन्तुज और निज यह दो भेद किया है और पुनः स्थान भेद से शारीरिक और मानसिक यह दो भेद किया है । पुनः सन्निकृष्ट कारण की विभिन्नता, अधि-ष्ठान की विभिन्नता में लक्षणों की विभिन्नता मानी है । आगन्तुक रोगों के बाहरी कारण जैसे अभिघात-अभिचार - अभिशाप अभिपङ्ग आदि के असंख्य भेद होने से रोग भी असंख्य हो जाते है । कहने का तात्पर्य यह है कि रोगों की प्रकृति ( सन्निकृष्ट कारण ) वातादि दोष होते है । इनका स्थूल भेद ६२ होना है और सूक्ष्म भेद तरतम के भेद से असंख्येय होते है तो उससे रोग भी अगणित होंगे । रोग का अधिष्ठान मन और शरीर होता है, शरीर में अंग - प्रत्यंग, धातु मल, शिरा - धमनी - स्रोत आदि अग-णित हैं । उन उन स्थानों में जब दोष आश्रित होते है तो असंख्येय रोगों का जन्म देते हैं । लिङ्ग-रोग के लक्षण भिन्न - भिन्न रोगों में भिन्न - भिन्न प्रकार के होते है जिसका कहना असम्भव है 1 आयतन - बाहरी कारण, यद्यपि वर्णन की सुविधा के अनुसार ( १ ) असात्म्येन्द्रियार्थं संयोग का अयोग, अतियोग और मिथ्यायोग, ( २ ) प्रज्ञाप्रराव, ( ३ ) परिणाम ये तीन ही कारण बताये है पर भिन्न इन्द्रियों के इन्द्रियार्थों की संख्या असंख्य होती है इसलिये रोग भी असंख्य होते हैं । यद्यपि शारीरिक, मानसिक, आगन्तुक इन तीन रोगों का ही यहाँ पर नाम लिया गया है पर अन्यत्र स्वाभाविक रोगों का भी वर्णन किया गया है, यथा - ' स्वाभाविका-गन्तुककायिकान्तरारोगा भवेयुः किल कर्मदोषजाः ॥ ' ( शार्ङ्गवर ) । किन्तु यहाँ केवल शारीरिक रोग का ही वर्णन अभीष्ट है इसीलिये इस अध्याय में मानसिक रोगों का भी वर्णन नहीं किया गया है अतः स्वाभाविक रोगों का भी निर्देश नहीं किया गया है । मुखानि तु खल्वागन्तोर्नखदशन पतनाभिचाराभिशापाभिषङ्गाभिघातव्यध- वन्ध नवेष्टनपीडनरज्जुदहनशस्त्राशनिभूतोपसर्गादीनि निजस्य तु मुखं वातपित्तश्लेष्मणां आगन्तुक रोग के कारण नख, दांत का लगना, गिरना, अभिचार ( मारण आदि का प्रयोग ), अभिशाप ( सिद्ध महर्षियों का शाप ), अभिषंग ( भूत - प्रेत आदि का संसर्ग ), अभिधान ( चोट लगना ), व्यध ( किसी कांटे आदि का चुभ जाना ), बन्धन ( रस्सी आदि से बाधना ), वेष्टन ( किसी अगों का लपेट जाना ), पीटन ( किसी का दब जाना ), रज्जु ( रस्सी से बंध जाना ), दहन ( अग्नि से जल जाना ), शस्त्र ( चाकू आदि तेज औजार से कट जाना ), अशनि ( बिजली ) का गिर जाना, भूतों का उपसर्ग हो जाना आदि है । निज रोग का कारण - वात, पित्त, कफ का विषम हो जाना है ॥ ४ ॥
* द्वयोस्तु खल्वागन्तुनिजयोः प्रेरणमसात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः, प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति ॥ आगन्तुक और निज रोगों के कारण ( बाहरी हेतु ) - ( १ ) असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग, ( २ ) प्रज्ञापराध, ( ३ ) परिणाम ये तीन होते हैं ॥ ५ ॥
ॐ सर्वेऽपि नु खल्वेतेऽभिप्रवृद्धाश्चत्वारो रोगाः परस्परमनुबध्नन्ति, न चान्योन्येन सह संदेहमापद्यन्ते ॥ ६ ॥
विभिन्न भेदों का आपसी संबन्ध — ये चारों रोग जब अधिक मात्रा में बढ़ जाते हैं तो आपस में सम्बन्ध कर लेते है पर एक दूसरे रोग के अनुबन्ध होते हुये भी चिकित्सा में सन्देहजनक नहीं होते क्योंकि उनका लक्षण अत्यन्त स्पष्ट रूप में होता है ॥ ६ ॥
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३६६ चरकसंहिता विमर्श - तात्पर्य यह है कि आगन्तुक रोग अत्यन्त वृद्ध होकर वात - पित्त - कफ से अपना संबन्ध कर लेते हैं और वातज, पित्तज, कफज रोग जब अधिक बढ़ जाते है तो आगन्तुक रोगों से संबन्ध कर लेते है । यह बात पिछले अध्याय में कही जा चुकी है । ऐसा होने पर भी यह आगन्तुक रोग है या निज रोग है उसमें सन्देह नहीं होता क्योंकि इनमें रोग का लक्षण स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है तथा जो प्रथम होता है और वाद को बढ़ता है उसे प्रधान कहते हैं । और जो बढ़ने के बाद लक्षण शरीर में प्रतीत होते हैं वे अप्रधान होते है । इस प्रधान और अप्रधान के द्वारा सन्देह का निराकरण हो जाता है 1 * आगन्तुर्हि व्यथापूर्वं समुत्पन्नो जघन्यं वातपित्तश्लेप्मणां वैषम्यमापादयति; निजे तु वातपित्तश्लेष्माणः पूर्वं वैषम्यमापद्यन्ते, जघन्यं व्यथामभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ७ ॥
आगन्तुज तथा निज रोगों की परिभाषा - आगन्तुक रोग पहले शरीर में कष्ट देकर उत्पन्न होता है । और बाद में वात, पित्त, कफ की विषमता उत्पन्न करता है । निज रोग में पहले वान, पित्त, कफ की विषमता होती है और बाद में व्यथा ( कष्ट ) उत्पन्न होती है ॥ ७ ॥
* तेषां त्रयाणामपि दोषाणां शरीरे स्थानविभोग उपदेच्यते, तद्यथा - बस्तिः पुरीषाधानं कटिः सक्थिनी पादावस्थीनि पक्वाशयश्च वातस्थानानि, तत्रापि पक्वाशयो विशेषेण वात-स्थानं; स्वेदो रसो लँसीका रुधिरमामाशयश्च पित्तस्थानानि, तत्राप्यामाशयो विशेषेण पित्तस्थानम्; उरः शिरो ग्रीवा पर्वाण्यामाशयो मेदश्च श्लेष्मस्थानानि, तत्राप्युरो विशे-पेण श्लेष्मस्थानम् ॥ ८ ॥
त्रिदोष ( वात पित्त कफ ) का शरीर में अधिष्ठान - वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों का शरीर में स्थान - विभाग विषयक व्याख्या कर रहा हूँ । यथा -वात के स्थान - वस्ति ( मूत्राशय ), पुरीषा-धानकटी, दोनों ऊरु, अस्थियाँ और पक्काशय यह वायु का स्थान है । इनमें भी विशेष कर पक्काशय वायु का स्थान है । पित्त के स्थान - स्वेद, रस, लसीका, रक्त, आमाशय ये पित्त के स्थान हैं । इनमें भी विशेष कर आमाशय पित्त का स्थान है । कफ का स्थान -- उर ( वक्षःस्थल ), सिर, ग्रीवा, पर्व, आमाशय, मैदा ये कफ के स्थान हैं । इनमें भी विशेष रूप से वक्षःस्थल कफ का स्थान होता है ॥ ८ ॥
विमर्श -वात के स्थान के विषय में वाग्भट ने - ' पक्वाशयकटीसक्थिश्रोत्रास्थिस्पर्शनेन्द्रि-यम् । स्थानं वानस्य, तत्रापि पक्काधानं विशेषतः ॥ ' ( अ. हृ. सू. अ. १२ ) तथा - ' वातपित्त-श्लेष्मणां पुनः सर्वशरीरचराणां सर्वाणिस्रोतांस्ययनभूतानि । ( च. वि. अ. ५ ) वातपित्तकफा देहे सर्वस्रोतोऽनुसारिणः ॥ ' ' सर्वशरीरचरास्तु वातपित्तश्लेष्माणो हि सर्वस्मिन्छरीरे कुपिताकुपिताः शुभाशुभानि कुर्वन्ति । ' ( च. सू. अ. २० ) । इस प्रकार वान, पित्त, कफों को सर्वशरीचर तथा सर्वत्रोतोनुमारी कहा गया । अर्थात् उक्त उद्धरणों से इनका सर्वशरीरव्यापकत्व तथा सर्व-स्रोतोनुसारित्व प्रतिपादिन होता है । इन वर्णनों के साथ - साथ इनके लक्षणों के व्यक्त होने के स्थान तथा इनके विशिष्ट स्थानों का निर्देश उक्त मूल सूत्र में स्पष्ट रूप से किया गया है । वाग्भट ने — ' ते व्यापनोऽपि हन्नाभ्योरधोमध्योर्ध्वसंश्रयाः ' इस सूत्र से स्पष्ट कर दिया है कि २. ' स्थानविभागमनुत्र्याख्यास्यामः ' ग. । १. ' जघन्यमिति पश्चात् ' गङ्गाधरः । ३. ' पुरीषाधानं पक्वाशयः ' चक्रः । ४. ' लसीका देहोदकस्य पिच्छाभागः ' गङ्गाधरः । ५. ‘ ' पित्तस्थाने आमाशय इत्यामाशयाधोभागः, श्लेष्मस्थाने आमाशय इति आमाशयोर्ध्वभागः ' चक्रः ।
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महारोगाध्यायः २० ] सूत्रस्थानम् ३१७ वे बात, पित्त, कफ सर्वशरीरव्यापी होने पर भी क्रमशः हृदय और नाभि के अधःप्रदेश, मध्यप्रदेश और कवं प्रदेश में संचित रहते हैं । अर्थात हृदय और नाभि प्रदेश के अधःप्रदेश में वायु मध्य प्रदेश में पिस और ऊर्ध्व प्रदेश में कफ रहता है । यह वर्णन उपर्युक्त विशिष्ट स्थान अर्थात् वायु का विशिष्ट स्थान पक्काशय, पित्त का आमाशय, कफ का उरःप्रदेश से साम्य रखता है । इस वर्णन का तात्पर्य यह है कि वात आदि के लक्षणों की स्पष्ट उपलब्धि इन निर्दिष्ट स्थानों पर होती है । इस वर्णन के समर्थन में यही कहा गया है कि इन विशिष्ट स्थानों के प्रतिकार ( शुद्धि ) से इनकी शुद्धि या शान्ति होती है । जैसे वातव्याधि में वस्ति क्रिया - से ( जो पकाशवमात्र की शुद्धि करती है ) सभी वात रोगों में लाभ होता है । चक्रपाणि ने अपनी व्याख्या में इसे स्पष्ट किया है कि— ' यद्यपि प्राणादिभेदभिन्नस्य वायोः पृथगेव स्थानानि यति तथापी वैशेषिकं स्थानं शेयं वतीन प्रायो वातविकारा भवन्ति । भूताश्च दुर्जयाः अत्र च विजिते वाने सर्ववातविकारावजय इति ॥ ' और भी - ' द्धि ( वस्तिकर्म ) आदित एव पक्वाशय मनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं वातमूलं छिनत्ति । ” बस्तिशीर्षाधान या पक्वाशय की रचना मांसपेशियों तक इस प्रकार हुई है कि इनके अन्दर यथेष्ट अवकाश बना रहता है । यह अवकाश मूत्र तथा मल के एकत्र होने के लिये होता है । जब मूत्र तथा मल इनमें एकत्र होता है तो इनके दबाव से नत्रस्थ नाडियों ( Nerves ) में प्रेरणा होकर इन अवयवों में संकोच और प्रसार की क्रिया होने लगती है और फलस्वरूप मल - मूत्र बाहर निकल जाता है । अवकाश स्थान में वायु का निवास तथा संकोच प्रसार कार्य सर्वविदित है । अतः इन्हें वायु का स्थान कहना सर्वधा युक्त है । उक्त दोनों अवयव कटिप्रदेश में स्थित है । अतः कटि को भी वायु का स्थान कहा गया है । अस्थि के निर्माण में वात धातु का अधिक भाग होता है । अतः हड्डियों को भी वात का स्थान माना गया है । कान और त्वचा को भी वात का स्थान माना गया है, क्योंकि वान की उत्पत्ति, और आकाश वायु प्रधान महाभूतों से होती है और शब्द एवं स्पर्श ये दोनों गुण आकाश के स्वाभाविक है इन्हीं की विशेषता से कान से शब्द का और त्वचा से स्पर्श का ज्ञान ( ग्रहण ' होता है । इन्द्रियों को आयुर्वेद ने भौतिक माना है, बान की उत्पत्ति के कारण आकाश और वायु, कान और त्वचा में रहते हैं अतः ये दोनों स्थान वात के हैं ऐसा कहा गया है । ऊरू, एवं पैर को भी वात स्थान बताया है, इन दोनों अवयवों का कार्य ( गमन - आगमन आदि ) वायु के द्वारा ( वात नाड़ियों के नियंत्रण द्वारा ) ही सम्पन्न होता है । अतः ऊरु और पैर को वात का स्थान माना है । यहाँ यह सामान्यतः वात का स्थान बताया गया है विशेष रूप से चिकित्सा के २८ वें अध्याय में बताया जायगा । पित्त के स्थान का निर्देश करते हुए कहा गया है कि स्वेद, लसीका, रुधिर, आमाशय, दृक्, त्वचा, तथा नाभि पित्त के स्थान हैं । इनमें भी चरक के अनुसार आमाशय और वाग्भट के अनुसार नाभि पित्त का विशिष्ट स्थान माना गया है । सुश्रुत ने पित्त का स्थान आमाशय और पक्काशय का मध्य माना है । चरक ने जो आमाशय की स्थिति बतलाई है, उससे कफ स्थान आमाशय का संशय दूर हो जाता है I जैसे- ' नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः ' ( च ० वि ० अ. २ ) । इस प्रकार चरक का आमाशय आधुनिक ( Stomach ) से लेकर ग्रहणी ( Duodenum ) पर्यन्त का भाग है । प्रत्यक्ष शारीर के अनुसार यहाँ पर प्रधानतः दो क्रियाएँ सम्पन्न होती है । इसके आधे भाग से अम्ल ( Gastric juice ) स्रुत होकर अन्न का पाचन करता है और ग्रहणी में यकृत् से पित्त आकर तथा अग्नाशय से आग्नेय रस आकर तथा आन्त्ररस आकर अन्न के विविध घटकों पर अपनी पाक क्रिया करते हैं । पर्य यह
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३६८ चरकसंहिता है कि यह स्थान वित्त के प्रधान कर्म का प्रधान क्षेत्र है । अतः इसे पित्त का विशिष्ट स्थल कहा गया है । नाभि का क्षेत्र भी यही स्थान है । अतः इनका कोई विरोध नहींहोता । यहाँ नाभि से नाभि प्रदेश अर्थात् आमाशय ( Stomach ) के निचले भाग से ग्रहणी तक समझना चाहिए । महास्रोत में अन्न का अवस्था - पाक हो जाने पर पाकजन्य अन्नरस का पुनः धात्वग्नियों द्वारा धातुओं में भी पाक होता है । इसीलिए रस, रक्त, लसोका, तथा स्वेद को भी पित्त का स्थान कहा है । यहाँ स्वेद से स्वेद ग्रन्थियों का ग्रहण करना चाहिए जो त्वचा के निचले स्तर पर स्थित रहती हैं । कफ का स्थान निर्देश करते समय उर, सिर, ग्रीवा, पर्व, आमाशय का ( पहला भाग ) मेद, कण्ठ, क्लोम, घ्राण और जिह्वा को स्थान कहा गया है । इनमें भी उर: प्रदेश को कफ का विशिष्ट स्थान कहा गया है । उरःप्रदेश के प्रधान अवयव फुफ्फुस और हृदय हैं । ये अवयव दोहरी आवरक कलाओं द्वारा ढके होते हैं । इन कलाओं के मध्य में कफ का स्थान है । हृदय तथा फुफ्फुस के संकोच तथा प्रसार को सुकर तथा अक्षुण्ण वनाये रखने के लिए इनका स्नेहन उक्त कफ के द्वारा होता रहता है । इस प्रधान कार्य को सम्पन्न करने से उरः प्रदेश को कफ का विशिष्ट स्थान कहा गया है । शिरः करोटि में मस्तिष्क धम्मिल्लक, तथा सुषुम्नाशीर्षक आदि अवयव रहते हैं । ये अवयव भी अपनी दोहरी कलाओं द्वारा परिव्याप्त रहते हैं इन कलाओं के मध्य में कफ उक्त स्नेहन करने के लिए रहना है । अतः सिर को भी कफ का स्थान कहा गया है । ग्रीवा में स्वरतंत्री, स्वरयंत्र तथा श्वासनलिका है । इन अवयवों को सदा स्निग्ध बनाये रखने के लिए इनका स्नेहन आवश्यक है । अतः वहाँ की श्लेष्मघर कलाओं में स्नहनार्थ कफ रहता है । इसके अतिरिक्त इस प्रदेश में अनेक ग्रन्थियाँ हैं, जिनमें नानाविध स्राव होने है । जैसे लालाग्रन्थियाँ, चुल्लिकाग्रन्थियाँ | इन ग्रन्थियों के अन्दर भी कफ का स्थान है । सन्धियों के सन्धारण के लिए सन्धियों में स्नेहार्थं ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनसे निकला कफ ( Synovial fluid ) उनका स्नेहन करता है । इसी प्रकार आमाशय में अन्न को क्लिन्न करने के लिए कफ का स्राव होता रहता है । क्योंकि जब तक कि मुक्त आहार का विलयन नहीं तैयार हो जाता तब तक उन पर पाचक रसों का पाक क्रिया नहीं सम्पन्न होती हैं । इसी प्रकार रसना स्थित ग्रन्थियों से स्राव शुष्क रूप भोज्य पदार्थों का विलयन बनाने के लिए तथा स्वाद ग्रहण के लिए होता रहता I * सर्वशरीरचरास्तु वातपित्तश्लेप्माणः सर्वस्मिन्छरीरे कुपिताकुपिताः शुभाशुभानि कुर्वन्ति - प्रकृतिभूताः शुभान्युपचयबलवर्णप्रसादादीनि अशुभानि पुनर्विकृतिमापन्ना विकारसंज्ञकानि ॥ ९ ॥
दोष ही रोग तथा आरोग्य के कारण - • सम्पूर्ण शरीर में गमन करने वाला वात - पित्त - कफ सम्पूर्ण शरीर में कुपित और अकुपित होकर शुभ और अशुभ कार्यो को करने वाले होते हैं । जब ये अपने स्वाभाविक रूप में रहते हैं तो शरीर में उपचय ( वृद्धि ) बल वर्ण, प्रसन्नता आदि शुभ कार्य को करते हैं । जत्र ये विकृत होते हैं तो अनेक प्रकार के रोगस्वरूप अशुभ कार्यों को करने वाले होते हैं ॥ ९ ॥
तत्र विकाराः- सामान्यजाः, नानात्मजीश्च । तत्र सामान्यजाः पूर्वमष्टोदरीये व्याख्या-१. ' सामान्यजा इति वातादिभिः प्रत्येकं मिलितैश्च ये जन्यन्ते, नानात्मजा इति ये वातादिभि-दोषान्तरा संपृक्तैर्जन्यन्ते ' चक्रः ।
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महारोगाध्यायः २० ] सूत्रस्थानम् ३६६ ताः, नानात्मजांस्त्विहाध्यायेऽनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा - अशीतिर्वातविकाराः, चत्वारिंश-पित्तविकाराः, विंशतिः श्लेष्मविकाराः ॥ १० ॥
( २ ) नानात्मज विकार ( Specific Diseases of Doshas ) रोग के सामान्यज तथा नानात्मज भेट -शरीर में अशुभ कार्य करने वाले विकार सामान्यज और नानात्मज होते हैं । इनमें सामान्यज रोग की व्याख्या पहले अष्टोदरीय अध्याय ( सू. २० )
में की गई है । नानात्मज रोगों की व्याख्या इस अध्याय में कर रहा हूँ ।
वातज रोग, ४० प्रकार के पित्तज रोग, २० प्रकार के कफज रोग ॥ १० ॥
जैसे- ८० प्रकार के विमर्श - सामान्यज रोग उसे कहते हैं जो वात - पित्त - कफ किसी एक दोष से या दो दोष से या सन्निपात से या आगन्तुक अभिघात आदि कारण से होते हैं । जैसाकि -'त एवमेते क्रमशो द्विशो वा दोषाः प्रदुष्टा युगपत् त्रयो वा । कुर्वन्ति रोगान् विविधाञ् शरीरे सामान्यजास्ते ह्यदरा-दयः स्युः! ' ( चरकोपस्कार ) और नानात्मज रोग उसे कहने हैं जो केवल बात या पित्त या कफ से ही होते हैं । इनमें दूसमें दूसरे दोषों का सम्बन्ध नहीं होता है जैसे - केवल वायु से ८० रोग, पित्त से ४० रोग और कफ से २० रोग होते हैं । तत्रादौ वातविकाराननुव्याख्यास्यामः तद्यथा - नखभेदश्व, विपादिका च पादशूलं च, पादभ्रंशश्च पादसुप्तता च, वातखुड्डता च, गुल्फग्रहश्च, पिण्डिकोद्वेष्टनं च, गृध्रसी च, जानुभेदश्व, जानुविश्लेषश्च ऊरुस्तम्भश्च ऊरुसादश्व, पाङ्गुल्यं च, गुदभ्रंशश्च, गुदातिश्च, वृषणाचे पश्व, शेफः स्तम्भश्व, वङ्गणानाहश्च श्रोणिभेदश्च विड्भेदश्व, उदावर्तश्च खञ्जत्वं च, कुंजत्वं व, वामनत्वं च, त्रिकग्रहश्व, पृष्ठग्रहश्व, पार्श्वाविमर्दश्व, उदरवेष्टव, हृन्मो ४ श्व हृद्रवश्व, वक्षउद्वर्षश्च, वक्षउपरोधश्च, वक्षस्तोदश्व, बाहुशोषश्च, ग्रीवास्तम्भश्च, मन्यास्त-म्भश्च कण्ठोंसश्च हनुभेदश्व, ओष्ठभेदश्व, अक्षिभेदश्च दन्तभेदश्च दन्तशैथिल्यं च, मूकत्वं च वाक्सङ्गश्च कपायास्यता च, मुखशोषश्च, अरसज्ञता च घ्राणनाशश्च, कर्णशूलं च, अशब्दश्रवणं च, उचैःश्रुतिश्च, बाधिर्यं च वर्त्मस्तम्भश्च वर्त्मसंकोचश्च, तिमिरं न्च, अक्षिशूलं च, अक्षिव्युदासश्च भ्रूव्युदासश्च शङ्खभेदश्व, ललाटभेदश्व, शिरोरुक् च, केशभूमिस्फुटनं च, अदितं च, एकाङ्गरोगश्च सर्वाङ्गरोगश्च, पक्षवैवश्व, आक्षेपकश्च, दण्डकश्च, तमर्श्व, भ्रमश्च, वेपथुश्च, जृम्भा च, हिक्का च, विषादश्च, अतिप्रलापश्च, रौच्यं च, पारुष्यं च, श्यावारुणावभासता च, अस्वशश्च, अनवस्थितचित्तत्वं च इत्यशीतिर्वातविकारा वात-विकाराणामपरिसंख्येयानामाविष्कृततमा व्याख्याताः ॥ ११ ॥
१. ' तत्रादित एव ' यो । ३. ' कुब्जत्वं च ' इति क्वचित्पुस्तके न पठ्यते । ५. ' हनुताडश्च ' च.; ' हनुस्तम्भश्च ' इति पा. । ७. ' पक्षवच ' इति क्वचित्पुस्तके न पठ्यते । २. ' वृषणोत्क्षेपश्च ' इति पा ० । ४. ' उन्मादश्च ' ग. । ६. ' तालुभेदश्च ' इत्यष्टाङ्गसंग्रहे पा. । ८. ' तमश्च ' पा । ९. ' नखभेदः नखभङ्गुरता, विपादिका पाणिपादस्फुटनं, पादभ्रंशः पादस्यारोपदेशविषयादन्यत्र पतनं, जानुविश्लेषः जानुसन्धिशैथिल्यम्, ऊरुस्तम्भः ऊरुस्तम्भनमात्रं, हृद्रवः हृदयस्य द्रुतिः स्फुरणं, कण्ठोदभ्वंसः शुष्ककासः, ओष्ठनेद ओष्ठस्तम्भः, अक्षिभेद: अक्षिगोलक भ्रमणाभावरूपोऽक्षिस्तम्भः, दन्तभेदः, दन्तभङ्गः, वाक्संग:, अस्फुटवचनत्वम्, अशब्दश्रवणं शब्दाभावेऽपि शब्दश्रवणन, उच्चः श्रुतिः बृहदध्वनिश्रवणं न स्वल्पध्वनेः, अक्षिव्युदासः नेत्रस्य स्वस्थानच्युतता, श्रृव्युदासः श्रुवोः स्वस्थानादधो
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४०० चरकसंहिता ( १ ) वात के ८० नानात्मज विकार - इन नानात्मज व्याधियों में सर्वप्रथम वातविकार की व्याख्या कर रहा हूं । जैसे - ( १ ) नखभेद - नखों का टूटना, ( २ ) विपादिका ( हाथ - पैर का. फट जाना ), ( ३ ) पादशूल ( पैर में वेदना का होना ), ( ४ ) पादभ्रंश ( अपनी इच्छा के अनुसार पैर का न पड़ना जैसे कलाय खंज ), ( ५ ) पादसुप्तता ( पैर का शून्य हो जाना ), ( ६ ) वातखुडता ( पैर और जंघा की संधियों में वातजन्य वेदना का होना ), ( ७ ) गुल्फग्रह ( गुल्फ प्रदेश का जकड़ जाना ), ( ८ ) पिडिकोद्वेष्टन ( पैर की पिण्डलियों में ऐंठन सी वेदना का होना ), ( ९ ) गृध्रसी, ( १० ) जानुभेद, ( ११ ) जानुविश्लेष ( जानु की संधियों का शिथिल हो जाना ), ( १२ ) ऊरुस्तम्भ, ( १३ ) ऊरुसाद ( ऊरुप्रदेश में अवसाद अर्थात् शिथिलता का अनुभव होना ), ( १४ ) पांगुल्य, ( १५ ) गुदभ्रंश ( कांच निकलना ) ( १६ ) गुदा प्रदेश में वेदना, ( १७ ) वृषणोत्क्षेप ( अण्ड ग्रन्थियों का ऊपर चढ़ जाना ), ( १८ ) शेफः स्तम्भ ( मूत्रेन्द्रिय में जकड़ाहट होना ), ( १ ९ ) वंक्षणानाह ( वंक्षण प्रदेश में बन्धन के समान पीड़ा होना ), ( २० ) श्रोणिभेद, ( २१ ) विभेद, ( २२ ) उदावर्त, ( २३ ) खंजता, ( २४ ) कुब्जत्व, ( २५ ) वामनत्व, ( २६ ) त्रिकग्रह, पृष्ठग्रह, ( २७ ) पार्श्वावमर्द ( पार्श्व प्रदेश में मर्दन के समान पीड़ा होना ), ( २८ ) उदरावेष्ट, ( २ ९ ) हृदय में अन्धकार का भर जाना, ( ३० ) हृद्रव ( हृदय में द्रवता अर्थात् शीघ्रता से गति का होना ), ( ३१ ) वक्षोद्धर्प ( वक्षप्रदेश में घिसने के समान पीड़ा ), ( ३२ ) वक्षोपरोध ( वक्षःस्थल की गतियाँ अर्थात् फुफ्फुस एवं हृदय की गतियों का रुकते हुए अनुभव होना ), ( ३३ ) वक्षस्तोद, ( ३४ ) बाहुशोष, ( ३५ ) ग्रीवास्तम्भ, ( ३६ ) मन्यास्तम्भ, ( ३७ ) कण्ठोदध्वंस, ( ३८ ) हनुभेद, ( ३ ९ ) ओष्ठभेद, ( ४० ) अक्षिभेद, ( ४१ ) दन्तभेद, ( ४२ ) दन्तशैथिल्य ( दाँतों का हिलना ), ( ४३ ) मूकत्व ( गूंगापन ), ( ४४ ) वाक्संग ( बोली का बन्द हो जाना ), ( ४५ ) कषायास्यता ( मुख का कंषैला होना ), ( ४६ ) मुखशोष, ( ४७ ) अरसज्ञता ( रस का ज्ञान न होना ), ( ४८ ) प्राणनाश ( गंध का ज्ञान न होना ), ( ४ ९ ) कर्णमूल, ( ५० ) अशब्दश्रवण ( शब्द न होते हुए शब्दों को सुनना ), ( ५१ ) उच्चैःश्रुति ( ऊँचा सुनना ), ( ५२ ) बहरापन, ( ५३ ) वर्त्मस्तम्भ, ( ५४ ) वर्त्मसंकोच ( ५५ ) तिमिर, ( ५६ ) नेत्रशूल, ( ५७ ) अक्षि व्युदास ( नेत्र का टेढ़ा होना ), ( ५८ ) भ्रूव्युदास ( भौंहों का टेढ़ा होना ), ( ५ ९ ) शंखभेद, ( ६० ) ललाटभेद, ( ६१ ) शिरःशूल, ( ६२ ) केशभूमिस्फुटन ( बालों के स्थान का फट जाना ), ( ६३ ) अर्दित, ( ६४ ) एकाङ्गरोग, ( ६५ ) सर्वागरोग, ( ६६ ) आक्षेपक, ( ६७ ) दंडक, ( ६८ ) तम, ( ६ ९ ) भ्रम, ( ७० ) वेपथु, ( ७१ ) जम्भाई, ( ७२ ) हिचकी, ( ७३ ) विषाद, ( ७४ ) अतिप्रलाप ( बिना प्रयोजन का निरर्थक बोलना ), ( ७५ ) शरीर में रूक्षता, ( ७६ ) शरीर में परुषता, ( ७७ ) शरीर का काला हो जाना, ( ७८ ) शरीर का लालवर्ण का हो जाना, ( ७ ९ ) निद्रा का आना, ( ८० ) चित्त स्थिर न रहना । ये अस्सी प्रकार के वात रोग अगणित वात विकारों में प्रगट होने वाले अर्थात् जो व्यक्त रूपसे लक्षित होते है उनकी व्याख्या की गई है ॥। ११ ॥ निपतनं, शङ्खभेदः शङ्खो ललाटैकदेशस्तस्य वेदना न तु शङ्खकरोगः, शिरोरुगिति केवलं शिरःपीडा नतु पञ्च शिरोरोगा ये उक्ताः, हिक्केति न पञ्च हिक्का या सामान्यजा उक्ताः किंतु हिक्कनमात्रम्, अति-प्रलापश्चेति वातकृतः प्रलापस्तु पित्तकृत इति अतिप्रलाप प्रलापयोर्भेदान्न सामान्यजत्वम् ' इति गङ्गाधरः । ' एकाङ्गरोगः सर्वाङ्गरोगश्चेति ज्वरादिषु उष्णत्वशीतत्वादीनां कदाचिदेकाङ्गव्यापकत्वेनै-काङ्गरोगः, तेषामेव कदाचित्सर्वाङ्गव्यापकत्वेन सर्वाङ्गरोगः, दोषान्तरसंबन्धेऽपि व्याप्त्यव्याप्ती वातकृते एव ' इति चक्रः । ' अदितादयः षड् वातव्याधिचिकित्सिते वक्ष्यन्ते ' इति योगीन्द्रनाथसेनः ।
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महारोगाध्यायः २० ] सूत्रस्थानम् ४०१ विमर्श -यहाँ ये अस्सी प्रकार के रोग गिनाये गये हैं यद्यपि इन रोगों में अन्य दोष भी सम्बन्धित रहते है, पर प्रधान रूप से वायु दोष ही रहता है । इसकी संख्या में भी त्रिकग्रह, व पृष्ठग्रह को अलग - अलग मान लिया जाय और श्वाव व अरुण को एक - एक में मान लिया जाय तो भी यह अस्सी ही प्रकार होगा । पर कुछ टीकाकार श्याव, अरुण को अलग - अलग माने हैं । उसी के अनुसार यहाँ भी संख्या दी गयी है । सर्वेष्वपि खल्वेतेषु वातविकारेषूक्तेष्वन्येषु चानुक्तेषु वायोरिदमात्मरूपमपरिणामि कर्मणश्च स्वलक्षणं यदुपलभ्य तदवयवं वा विमुक्तसंदेहाः वातविकारमेवाध्यवस्यन्ति कुशलाः; तद्यथा - रौच्यं शैत्यं लाघवं वैशद्यं गतिरमूर्तत्वमनवस्थितत्वं चेति वायोरात्म-रूपाणि; एवंविधत्वाच्च वायोः कर्मणः स्वलक्षणमिदमस्य भवति तं तं शरीरावयवमाविशतः; नद्यथा - संसंभ्रंशन्याससङ्गभेदसादहर्षत र्षक पवर्तचालतोदन्यथा चेष्टादीनि, तथा खरपरुष-विशदसुपिरारुणवर्णकषायविरसमुखत्वशोषशूल सुप्तिसंकोचनस्तम्भनखञ्जतादीनि च वायोः कर्माणि तैरन्वितं वातविकारमेवाध्यवस्येत् ॥। १२ ॥ वायु के रूप तथा कर्म - सभी प्रकार के इन अस्सी प्रकार के वात रोगों में जो यहाँ बनाये गये हैं अथवा यहाँ जो रोग नहीं बनाये गये हैं, उन का यह आगे कहे जाने वाला अपना लक्षण है, जो कभी भी सभी प्रकार के वात रोगों में वायु नहीं बदलता है और इसी प्रकार नहीं बदलता है । जिन कर्म तथा वायु का कर्म और लक्षण जो आगे बताया जायगा. वह भी कभी लक्षणों को देख कर या वायु के कर्म और लक्षणों को कुछ हिस्से में देख कर कुशल वैद्य सन्देह रहित होकर यह बात का ही विकार है, ऐसा निश्चित कर लेते हैं वह अग्रांकित है । यथा — रूक्षता, शीतलता, लघुता, विशदता, गति ( चंचलस्वभाव ), अमूर्तना ( स्वरूप का न होना ), यह वायुका अपना स्वरूप होता है । इस प्रकार वायु के कर्म और लक्षण यह जो आगे बताये जाते हैं, वह होता है । जब इस प्रकार की वायु शरीर के भिन्न - भिन्न भागों में प्रवेश करती है तो प्रवेश करते ही उन-उन प्रदेशों में, ( १ ) स्रंस ( अपने स्थान से उन उन अंगों का थोड़ा हट जाना ), ( २ ) भ्रंश ( उन-उन अंगों का अपने स्थान से दूर हट जाना ), ( ३ ) व्यास ( उन उन अंगों का अपने स्थान से अधिक विस्तृत हो जाना ), ( ४ ) संग ( मल - मूत्र को अपने स्थान में रोक देना ), ( ५ ) भेद ( चीरने के समान पीड़ा ), ( ६ ) साद ( शरीर में अवसाद ), ( ७ ) हर्ष ( रोमांच का होना ), त ( प्यास का लगना ), ( ८ ) कम्प ( शरीर का कांपना ), ( ९ ) वर्त ( मल का गोला बनाना ), ( १० ) चाल ( शरीर में चंचलता या स्पन्दन उत्पन्न करना ), ( ११ ) तोद ( सूई चुभोने सी पीड़ा होना ), ( १२ ) व्यधा ( अंगो को दबाने की तरह पीड़ा ), ( १३ ) चेष्टा ( शारीरिक अंगों में तथा मन में चंचलता का होना ) तथा खर, परुष, विशद, सुषिर, अरुण वर्ग, कषाय रस, विरस ( मुख का स्वादहीन होना ), मुखशोप, शरीर या अंगों में शूल, शून्यता, संकोच, जकड़ाहट, लगड़ापन आदि कर्म वायु के होते हैं । इन लक्षणों से युक्त कोई भी रोग शरीर में उत्पन्न हो तो उसे वात विकार ही माना जाता है ॥ १२ ॥
तं मधुराम्ललवणस्त्रिग्धोष्णैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्नेहस्वेदास्थापनानुवासननस्तः कर्मभोज-१. ' अपरिणामीति सहज सई नान्योपाधिकृतमित्यर्थः कर्मणश्चेति विकृतस्य वायोः कर्मणः ' चक्रः । ' अपरिणाम अव्यभिचारि ' इति योगीन्द्रनाथसेनः । २. ' स्रंसः किंचिदवस्थानचलनं, भ्रंशस्तु दूरगतिः, व्यासो विस्तरणं, वर्तुलीकरणं वर्नः, चाल: स्पन्दः, रसवण वायुना रसवर्णरहितेनापि प्रभावात् क्रियेते ' चक्रः । ३. ' व्यासङ्ग ' ग. । ' व्यासङ्ग इत्यनासक्तिरित्यर्थः ' गङ्गाधरः । २६ च ० सं ०