चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 471–480
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 471–480
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३८२ चरकसंहिता ( ३ ) साध्यासाध्यता तथा विकार - नाम समस्या ( Problem of Prognosis & Diagnosis ) * सन्ति ह्येवंविधा रोगाः साध्या दारुणसंमताः । ये हन्युरनुपक्रान्ता मिथ्याचारेण वा पुनः ॥ साध्याश्चाप्यपरे सन्ति व्याधयो मृदुसंमताः । यत्त्रायलकृतं येषु कर्म सिध्यत्यसंशयम् ॥३८ ॥
साध्यासाध्यता - इस प्रकार के भी भयंकर रोग हैं जो साध्य हैं । समय पर उनकी चिकित्सा न करने से या मिथ्या आहार - विहार करने से रोग रोगी को मार डालता है । और दूसरे रोग हैं जो मृदु और साध्य है जिनमें यनपूर्वक या विना यल के ही चिकित्सा की जाय तो अवश्य ही रोगी बच जाता है ॥ ३७-३८ ॥ विमर्श - रोहिणी रोग के मारक होने से प्रकरणानुसार रोगों के दारुण इत्यादि भेद का वर्णन किया जा रहा है । * असाध्याश्चापरे सन्ति व्याधयो याप्यसंज्ञिताः । सुसाध्वपि कृतं येषु कर्म यात्रार्करं भवेत् ॥ गर्म न सिध्यति । अपि यत्त्रकृतं बालैर्न तान् विद्वानुपाचरेत् ॥ साध्याश्चैवाप्यसाध्याश्च व्याधयो द्विविधाः स्मृताः । मृदुदारुणभेदेन ते भवन्ति चतुर्विधाः ॥ और भी - अन्य ऐसी ही असाध्य व्याधियाँ हैं जिन्हें याप्य कहा जाता है जिनमें अच्छी प्रकार की चिकित्सा लाभकर होती है और जिससे मनुष्य अपना कार्य कर सकता हैं । और दूसरे ऐसे असाध्य रोग हैं जिनमें मूर्ख वैद्यों द्वारा चिकित्सा करने पर भी लाभ नहीं होता है । विद्वान् वैद्य इस प्रकार के रोगों में चिकित्सा न करें । इस भाँति १. साध्य और २. असाध्य भेद से दो प्रकार की व्याधियाँ होती हैं और पुनः वे साध्य और असाध्य व्याधियाँ मृदु और दारुण भेद से दो प्रकार की होकर ४ प्रकार की होती हैं ॥ ३ ९ -४१ ॥ विमर्श - यहाँ पर साध्य - असाध्य व्याधियों का भेद बताया गया है । साध्य व्याधि के दो भेद होते हैं १ - मृदु ( सुखसाध्य ) २ - दारुण ( कृच्छ्रसाध्य ) | रोहिणी व्याधि कृच्छ्रसाध्य है और सभी कृच्छ्रसाध्य रोगों में समय से उचित चिकित्सा करना परमावश्यक होता है । सुखसाध्य व्याधि में यदि विशेष सावधानीपूर्वक चिकित्सा न भी की जाय, तो भी सामान्य चिकित्सा से ही या केवल पथ्य सेवन से ही लाभ हो सकता है । ( १ ) याप्य रोग में यह विशेषता है कि जब तक चिकित्सा की जाय तब तक लाभ होता है और चिकित्सा छोड़ देने पर रोग का ज्यों का त्यों पुन-रागम हो जाता है । जिस प्रकार एक गिरते हुये घर की छत में यदि एक खम्भा लगा दिया जाय तो गिरती हुई छत बच जाती है और जब खम्भा हटा दिया जाय तो छत गिर जाती है । उसी प्रकार याप्य व्याधि की भी स्थिति रहती है । जब चिकित्सा करें तो लाभ और जब चिकित्सा बन्द कर दी जाय तो रोग की वृद्धि हो जाती है - रोग का निर्मूल नहीं होता है । जैसे- ' तमक श्वास आदि रोग । २ - अनुपक्रम - उस व्याधि को कहते हैं जिसमें औषधि सफल नहीं होती है । रोगी की आयु समाप्त हो गयी है, तो कोई भी चिकित्सा लाभ नहीं करती हैं । अतएव इसमें रोगी के अभिभावकों से स्पष्ट कह कर ( प्रत्याख्येय ) चिकित्सा करनी चाहिये । संक्षेप में व्याधि के भेदों का निम्नलिखित रूप में संग्रह ( वर्णन ) किया जा रहा है-१. ' मिथ्यारम्भेण ' इति पा ० । ३. ' वैद्यैः ' इति पा ० । २. ' यात्राकरं यापनाकरम् ' चक्रः ।
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त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् व्याधि ( Disease ) असाध्य ( Incurable ) ३८३ साध्य ( Curable ) मृदु ( Mild ) ( सुखसाध्य ) दारुण ( Severe ) मृदु ( Mild ) ( कृच्छ्रसाध्य ) ( याप्य ) I दारुण ( Severe ) ( प्रत्याख्येय ) * त एवापरिसंख्येया भिद्यमाना भवन्ति हि । रुजावर्णसमुत्थानस्थानसंस्थाननामभिः ॥४२ ॥
व्यवस्थाकरणं तेषां यथास्थूलेषु संग्रहः । तथा प्रकृतिसामान्यं विकारेषूपदिश्यते ॥ ४३ ॥
असंख्य व्याधियाँ – सामान्यतः यहाँ दो प्रकार का रोग, साध्य और असाध्य बनाकर पुनः मृदु और दारुण भेद से चार बनाये गये हैं, फिर वही व्याधियाँ वेदना, वर्ण, निदान, स्थान और लक्षण एवं नाम के भेद से असंख्य होती हैं । पर सभी की गणना करना और उसका लिखना असम्भव है इसलिये स्थूल रूप से चिकित्सा करने के लिये उनका संग्रह किया गया है । इसी प्रकार रोगों में प्रकृति - सामान्य का भी निर्देश करेंगे ॥ ४२-४३ ॥ विमर्श - जैसे निदान के भेद रूक्ष भोजन, रात्रि जागरण, प्रतरण, धावन आदि कारण - भेद भिन्न - भिन्न होते हैं । वेदना-से कुपित वायु की भिन्न - भिन्न चिकित्सा होती है और उनके लक्षण तोद भेद आदि वेदना की भिन्नता से रोग भिन्न होते हैं तथा उनकी चिकित्सा भी भिन्न होती है । वर्ण - दोष के द्वारा नील, पीत, कृष्ण आदि अनेक वर्ण होने से व्याधि भिन्न - भिन्न होती हैं । स्थान- दोषों का आमाशय, पक्वाशय, रसादि धातुओं में गमन होने पर भिन्न - भिन्न वेदनायें और लक्षण होते हैं तथा उनकी चिकित्सा भी भिन्न - भिन्न होती है । संस्थान - जैसे गुल्म, अर्बुद ग्रंथि, गण्डमाला, गलगण्ड आदि का स्वरूप भिन्न - भिन्न होता है । नाम - जैसे एक ही यक्ष्मा के राजयक्ष्मा, शोष, क्षय आदि भिन्न - भिन्न नाम होते हैं । इन विशेषताओं से यदि रोगों का वर्गीकरण किया जात तो वे असंख्य हो जायेंगे । अतः स्थूल रूप से १ ९ वें अध्याय में इन रोगों का संग्रह किया जायगा । * विकारनामाकुशलो न जिहीयात् कदाचन । न हि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवास्थितिः ॥
स एव कुपितो दोषः समुत्थानविशेषतः । स्थानान्तरगतश्चैव जनयत्यामयान् बहून् ॥४५ ॥
तस्माद्विकारप्रकृतीरधिष्ठानान्तराणि च । समुत्थानविशेषांश्च बुद्ध्वा कर्म समाचरेत् ॥ ४६ ॥
यो ह्येतत्त्रितयं ज्ञात्वा कर्माण्यारभते भिषक् । ज्ञानपूर्वं यथान्यायं स कर्मसु न मुह्यति ॥ सब रोगों का विकार नाम ( निदान ) कठिन - यदि सुज्ञानी वैद्य किसी रोग का नामकरण करने में असमर्थ हो तो उसे अपने अज्ञान पर लज्जा न करनी चाहिये क्योंकि जगत् में जितने रोग होते हैं उन सबका नामकरण करना असम्भव है । किन्तु वे ही कुपित दोष कारण की भिन्नता से भिन्न - भिन्न रोग भिन्न - भिन्न स्थानों में जाकर उत्पन्न करते हैं । अतः रोग की प्रकृति, अधिष्ठान, समुत्थानविशेष को ठीक - ठीक जान कर वैद्यों को चिकित्सा कार्य करना चाहिये । जो ज्ञानी वैद्य १. ' निदान वेदनावर्ण ' इति पा ० । २. ' व्यवस्थाकरणं चिकित्साव्यवहारार्थं संख्याकथनं, यथास्थूलेष्विति ये ये स्थूला उदरमूत्रकृच्छ्रा-दयस्तेषु संग्रहोऽष्टोदये संग्रह इत्यर्थः ' चक्रः । ' व्यवस्थाकारणं ' यो । ३. ' विकारान् कुरुते ' यो । ४. ' अधिष्ठानान्तराणि आशयान्तराणि ' चक्रः ।
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३८४ चरकसंहिता इन तीनों को ठीक - ठीक जानकर ज्ञानपूर्वक यथान्याय किसी भी रोग की चिकित्सा करता है तो उसे मोह नहीं प्राप्त होता है ॥ ४४-४७ ॥ विमर्श - तीन ही दोष अनेक प्रकार के रोगों को कैसे उत्पन्न करते हैं यह एक यहाँ शंका उत्पन्न होती है इसका समाधान एकमात्र यही है कि वे ही दोष कारण तथा स्थान भेद से भिन्न - भिन्न रोग उत्पन्न करते हैं जैसा कि कहा भी है- ' वायुः प्रकुपितो दोषावुदीयभौ प्र ( वि ) धावति । स शिरःस्थः शिरःशूलं करोति गलमाश्रितः । कण्ठोड़वंसंच कासं च स्वरभेदमरोचकम् ॥ पार्श्वशूलं च पार्श्वस्थो वर्चोभेदं गुदे स्थितः । जम्भां ज्वरं च सन्धिस्थ उरस्थश्चोरसो रुजम् ॥ ' ( च. चि. अ. ८ ) इससे यह स्पष्ट है कि केवल वात, पित्त, कफ का पूर्ण रूप से ज्ञान रखने वाला वैद्य इसी के आधार पर सभी रोगों की चिकित्सा कर सकता है । नित्याः प्राणभृतां देहे वातपित्तकफास्त्रयः । विकृताः प्रकृतिस्था वा तान् बुभुत्सेत पण्डितः ॥ दोष ही ज्ञातव्य - प्राणियों के देह में विकृतावस्था अथवा समावस्था में वात, पित्त, कफ तीनों ही सदा रहते हैं । विद्वान् वैद्यों को सदैव इन्हें जानने में सचेष्ट रहना चाहिये ॥ ४८ ॥
विमर्श - वात, पित्त, कफ ही शरीर को प्राकृतावस्था में धारण करते है तथा विकृतावस्था में नाश करते हैं । यथा - ' वातपित्तश्लेष्माण एव देहसम्भवहेतवः । ' ( सु. सू. अ. २१ ) । ये वातादि दोष अपने - अपने स्थानों में रह कर पुनः गति, ऊष्मा और स्निग्धता उत्पन्न कर यथाक्रम शरीर का धारण करते हैं, यथा - ' तैरेवाव्यापन्नैरधोभध्योर्ध्वसन्निविष्टैः शरीरमिदं धार्यतेऽगार-भिव स्थूणाभिस्तिसृभिरतस्त्रिस्थूणमित्याहुरित्येके । ' ( सु. सू. अ. २१ ) । अतः जब ये प्राकृत रूप में रहते हैं तब शरीर की उत्पत्ति, पोषण और धारण करते हैं और जब विकृत होते हैं तब देह का नाश कर देते हैं । जैसा कि वाग्भट ने बताया भी है- ' ते व्यापिनोऽपि हन्नाभ्योरधोम-योर्ध्वसंश्रयाः । विकृताऽविकृता देहं घ्नन्ति ते वर्तयन्ति च ॥ ' ( अ.हृ. सू. अ. १ ) । अत: इन दोषों की प्राकृत अवस्था और वैकृत अवस्था का ज्ञान पण्डित वैद्य को अवश्य ही रखना चाहिए । उत्साहोच्छ्वासनिःश्वासचेष्टा धातुगतिः समा । समो मोक्षो गतिमतां वायोः कर्माविकारजम् ॥ कार्य करने में उत्साह, श्वास वायु का मानसिक चेष्टायों को प्रवृत्त करना, सम रखना, गतिशील मल - मूत्रादि के ( १ ) प्राकृत ( अविकारज ) वात का कार्य बाहर निकालना और अन्दर ले जाना, शारीरिक और धातुओं की गति को शरीर में ठीक रखना, धानुओं को वेगों को बाहर निकालना, ये अविकृत ( प्राकृत ) वात के कार्य है ॥ ४ ९ ॥ विमर्श - - वायु के प्राण, उदान, व्यान, समान, अपान ये ५ भेद होते हैं । जब ये वायु अपने प्राकृतिक रूप में रहते हैं तो उदान वायु के द्वारा उत्साह, प्राण वायु के द्वारा श्वास-प्रश्वास, व्यान वायु के द्वारा शारीरिक एवं मानसिक चेष्टायें, समान वायु के द्वारा धातुओं की समानता और अपान वायु द्वारा गतिशील मलमूत्र के वेग का निःसरण होता रहता है । इसी बात को वाग्भट ने भी बताया है, यथा - ' उत्साहोच्छ्वासनिश्वासचेष्टावेगप्रवर्त्तनैः । सम्यग्गत्या च धातूनामक्षाणां पाटवेन च । अनुगृह्वात्यविकृत: । ( अ. हृ. सू. अ. ११ ) । * दर्शनं पक्तिरूप्मा च क्षुत्तृष्णा देहमार्दवम् । प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम् ॥ --( २ ) प्राकृत ( अविकारज ) पित्त का कार्य --- देखना, पक्ति ( पचाना ), शरीर में नापांश को नियमित रखना, भूख - प्यास लगाना, शरीर में कोमलता बनाये रखना, शरीर की १. ' गतिमतां पुरीषादीनां बहिर्निःसरतान् ' चक्रः ।
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त्रिशोथीयाध्यायः १८ ] १. ' बन्धः सन्धिबन्धः ' चक्रः । २५ च ० सं ० ३८५ सूत्रस्थानम् रूप का उचित रूप से ज्ञान शरीर में रहने वाली ऊष्मा २. ' चैतत् ' यो । कान्ति, मन की प्रसन्नता और धारण शक्ति को बनाये रखना, यह अविकृत पित्त का स्वाभाविक कार्य होता है ॥ ५० ॥
विमर्श-, आलोचक और भ्राजक भेद से पित्त ५ प्रकार का होता है । - पाचक, रक्षक, साधक १. आलोचक पित्त का कर्म दर्शन है । २. पाचक पित्त का कर्म आहार का पाचन तथा भूख - प्यास को लगाना है । ३. रंजक पित्त का कार्य खाये हुये आहार के रस को रक्त रूप में परि-वर्तित करना है । वह रक्त सारे शरीर में भ्रमण कर तापांश को नियमित रखता है । ४. साधक पित्तका कर्म मैथा और प्रसन्नता को बनाये रखना है । ५. भ्राजक पित्त का कर्म शरीर में कोमलना एवं कान्ति को बनाये रखना है जैसा कि वाग्भट ने भी बताया है, यथा -..... पित्तं पक्त्यूष्मदर्शनैः । क्षुत्तृचिप्रभा मेधाधी शौर्य तनुमार्दवैः ॥ ' ( अ.हृ.सू. अ. ११ )
स्नेहो बंन्धः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम् । क्षमा धृतिरलोभश्च कफकर्माविकारजम् ॥
( ३ ) प्राकृत ( अविकारज ) कफ का कार्य - शरीर में स्नेह को बनाये रखना, सन्धिबन्धनों को ठीक रखना, शरीर में या सन्धियों में शिथिलता का न होना, शरीर में गुरुता बनाये रखना, मैथुन करने की शक्ति और बल को स्थिर रखना, सहन शक्ति, धीरता और लोभ का न करना यह कफ का स्वाभाविक कार्य है ॥ ५१ । विमर्श - - यह सामान्य रूप से कफ को अविकृत अवस्था का कार्य है, वाग्भट ने भी कहा है-' इलेष्मा स्थिरत्वस्निग्धत्वसन्धिबन्धक्षमादिभिः ॥ ( अ.हृ.सू. अ. ११ ) * वाते पित्ते कफे चैबे क्षीणे लक्षणमुच्यते । कर्मणः प्राकृताद्वानिर्वृद्धिर्वाऽपि विरोधिनाम् ॥ क्षीण दोषों के संक्षेप में लक्षण - दोषों के स्वाभाविक रूप से जो कार्य बताये गये हैं उनमें न्यूनता होना और विरोधी कार्यों की अधिकता होता यह संक्षेप में वात, पित्त, कफ के क्षीण होने के लक्षण है ॥ ५२ ॥
विमर्श - वायु के न्यून होने पर उचित उत्साह का न होना, श्वास - प्रश्वास क्रिया में रुकावट होना, चेष्टाओं में कमी होना, धातुओं की गति का ठीक से न होना, धातुओं में समता का न होना, मल - मूत्र के वेगों का न निकलना, क्षीण वायु का कार्य होता है । न होना, अन्न का ठीक से पाचन न होना स्वाभाविक रूप से ( ताप ) की कमी, भूख - प्यास न लगना, शरीर में रूक्षता, कान्ति का अभाव, मन का खिन्न होना और धारणा शक्ति का न होना, क्षीण पित्त का कार्य है । शरीर में स्नेह की न्यूनता, सन्धियों के बन्धन में शिथिलता, शरीर में हल्कापन का होना, नपुंसकता, बल की कमी, सहन शक्ति का अभाव, धैर्य का नाश, लालच का बढ़ना, कफ के क्षीण होने पर ये कार्य होते हैं । वाग्भट में वात, पित्त, कफ के क्षीण होने पर उनका कार्य निम्न बताया है - ' लिङ्गं क्षीणेऽनिलेऽङ्गस्य सादोऽल्पं भाषितेहितम् | संज्ञा मोहस्तथा इलेष्मवृद्धयुक्तामय सम्भवः ॥ पित्ते मन्दोऽनलः शीतं प्रभाहानिः कफे भ्रमः । श्लेष्माशयानां शून्यत्वं हृद्रवः श्रथसन्धिता ॥ ' ( अ. ह. सू. अ. ११ ) । * दोषप्रकृतिवैशेष्यं नियतं वृद्धिलक्षणम् । दोषाणां प्रकृतिर्हानिर्वृद्धिश्चैवं परीचयते ॥५३ ॥
दोषों की वृद्धि के लक्षण - दोषों के स्वाभाविक कार्यों में विशेषता ( अधिकता ) होना ही निश्चित रूप से दोषों की वृद्धि का लक्षण हैं । इस प्रकार दोषों का प्राकृतिक अवस्था में रहना, दोषों का क्षीण होना और दोषों की वृद्धि होना इन तीनों को परीक्षा की जाती है ॥ ५३ ॥
३. ' दोषेत्यादि प्रकृतिः स्वभावः, तस्य वैशेष्यमाधिक्यम् ' चक्रः ।
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३८६ चरकसंहिता विमर्श - स्वाभाविक कार्य होने पर दोष सम माने जाते है । प्राकृतिक कार्य का क्षय और विरोधी कार्य की वृद्धि से दोषों का क्षय और दोपों के प्राकृतिक कार्य की वृद्धि और विरोधी कार्य का क्षय में दोषों की वृद्धि की परीक्षा की जाती है । तत्र श्लोकाः— संख्या निमित्तं रूपाणि शोधानां साध्यतां न च । तेषां तेषां विकाराणां शोधांस्तांस्तांश्च पूर्वजान् ॥ विधिभेदं विकाराणां त्रिविधं वोध्यसंग्रहम् । प्राकृतं कर्म दोषाणां लक्षणं हानिवृद्धिषु ॥ ५५ ॥
चीर्तमोहरजोदोषलोभमानमदस्पृहः । व्याख्यातवांस्त्रिशोथीये रोगाध्याये पुनर्वसुः ॥ ५६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के त्रिशोथीयो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अध्यायगत विषयों का उपसंहार - • नष्ट हो गया है मोह, राग, दोष, लोभ, मान, मद और इच्छा जिनका, ऐसे आचार्य पुनर्वसु ने इस त्रिशोफीय रोगाध्याय में शोधों की संख्या, कारण, लक्षण, साध्यता, असाध्यता और उन उन रोगों के जिनके पूर्वरूप में शोध होते हैं और बाद में रोग व्यक्त होते हैं जैसे - उपजिह्निका आदि । रोगों के विधि भेद जैसे साध्य, असाध्य और उनके भेद मृदु, दारुण, तीन प्रकार के जानने योग्य वस्तुओं का संग्रह जैसे रोग की प्रकृति, अधिष्ठान ( स्थान ) और समुत्थानविशेष ( कारण ) दोषों के प्राकृतिक कार्य और दोषों के क्षीण होने तथा वृद्धि होने के लक्षण की व्याख्या की है ॥ ५४-५६ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशतकृतन्त्र ( चरक संहिता ) के सूत्रस्थान में रोगचतुष्क-विषयक त्रिशोथीयनामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ || १८ | अथैकोनविंशोऽध्यायः अथातोऽष्टोदरीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद अष्टोदरीय अध्याय की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - प्रथम अध्याय में बताया गया है कि ' व्यवस्थाकरणं तेषां यथास्थूलेषु संग्रहः ’ अर्थात् व्यवस्था के हेतु स्थूल रूप से रोगों का संग्रह यहाँ किया गया है । अब उन्हीं रोगों का स्थूल रूप से इस अध्याय में संग्रह किया जा रहा है । इह खल्वष्टावुदराणि, अष्टौ मूत्राघाताः, अष्टौ क्षीरदोषाः, अष्टौ रेतोदोषाः संप् कुष्टानि, सप्त पिडकाः, सप्त वीसर्पाः, षडतीसाराः, षडुदावर्ताः पञ्च गुल्माः, पञ्च प्लीहदोषा, पञ्च कासाः, पञ्च श्वासाः, पञ्च हिक्काः, पञ्च तृष्णाः, पञ्च छर्दयः, पञ्च भक्तस्यानशनस्थानादि, १. ' वीतरागरजोदोष ० ' इति पा. । २. ' यद्यपि चिकित्सितेऽष्टादश कुष्ठानि तथाऽपीह महाकुष्ठाभिप्रायेण सप्तोच्यन्ते ' चक्रः । ३. ' स्थानमिव स्थानं कारणं तेन अनशनस्थानान्यरोचकानि अनेन कारणेन कार्याण्यरोच-कानि गृह्यन्ते, तेन रोगसंग्रहे कारणाभिधानमन्याय्यमिति न भवनि ' चक्रः ।
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अष्टोदरीयाध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् ३८७ पञ्च शिरोरोगाः, पञ्च हृद्रोगाः पञ्च पाण्डुरोगाः, पञ्चोन्मादाः चत्वारोऽप-स्माराः, चत्वारोऽक्षिरोगाः, चत्वारः कर्णरोगाः, चत्वारः प्रतिश्यायाः, चत्वारो मुखरोगाः चत्वारो ग्रहणीदोषाः, चत्वारो मदाः, चत्वारो मूर्च्छायाः, चत्वारः शोषाः, चत्वारि कुब्यानि त्रयः शोफाः, त्रीणि किलासानि, त्रिविधं लोहितपित्तं; द्वौ ज्वरो, द्वौ व्रणौ द्वावायामौ द्वे गृध्रस्यौ, द्वे कामले, द्विविधमामं, द्विविधं वातरक्तं, द्विविधान्यर्शासि; एक ऊरुस्तम्भः, एकः संन्यासः, एको महागदः, विंशतिः क्रिमिजातयः, विंशतिः प्रमेहाः, विंशतियनिन्यापदः इत्यष्टचत्वारिंशद्रोगाधिकरणान्यस्मिन् संग्रहे समुद्दिष्टानि ॥ ३ ॥
सामान्य विकार ( General Diseases ) ४८ रोगों के भेद - इस स्थूल रोगों के संग्रह प्रकरण में ८ प्रकार के उदर रोग, ८ प्रकार के मूत्राघात, ८ प्रकार के माता के दूध के दोष से होने वाले रोग ( क्षीरदोष ), ८ प्रकार के शुक्र-विकार, ७ प्रकार के कुष्ठ, ७ प्रकार के प्रमेह पिडिका, ७ प्रकार के विसर्प रोग, ६ प्रकार के अति-सार, ६ प्रकार के उदावर्त, ५ प्रकार के गुल्म, ५ प्रकार के प्लीहा के विकार, ५ प्रकार के कास, ५ प्रकार के श्वास, ५ प्रकार की हिक्का ( हिचकी ), ५ प्रकार की तृष्णा, ५ प्रकार की छदि ( वमन ), ५ प्रकार के अरुचि, ५ प्रकार के शिगे रोग, ५ प्रकार के हृदय रोग, ५ प्रकार के पाण्डु रोग, ५ प्रकार के उन्माद, ४ प्रकार के अपस्मार रोग, ४ प्रकार के नेत्र रोग, ४ प्रकार के कान के रोग, ४ प्रकार के प्रतिश्याय, ४ प्रकार के मुख रोग, ४ प्रकार की ग्रहणी, ४ प्रकार के मदात्यय रोग, ४ प्रकार की मूर्च्छा; ४ प्रकार के शोष ( राजयक्ष्मा ), ४ प्रकार की नपुंसकता ( क्लेव्य रोग ), ३ प्रकार के शोध, ३ प्रकार के किलास, ३ प्रकार के रक्तपित्त, २ प्रकार के ज्वर, २ प्रकार के व्रण, २ प्रकार के आयाम रोग, २ प्रकार की गृध्रसी, २ प्रकार की कामला, २ प्रकार के आम दोष, २ प्रकार के वातरक्त, २ प्रकार के अर्श, १ ऊरुस्तम्भ, १ संन्यास, १ महारोम, २० प्रकार के कृमि - रोग, २० प्रकार के प्रमेह, २० प्रकार के योनिव्यापद् रोग । इस प्रकार यह ४८ रोगा-विकार इस प्रकरण में संक्षेप में बताये गये हैं ॥ ३ ॥
एतानि यथोद्देशमभिनिर्देदयामः - अष्टावुदराणीति वातपित्तकफसन्निपातप्लीहबद्ध-च्छिदकोदराणि, अष्टौ मूत्राघाता इति वातपित्तकफसन्निपाताश्मरीशर्करे । शुक्रशोणितजाः, अष्टौ क्षीरदोषा इति वैवर्ण्य वेगन्ध्यं वैरस्यं पैच्छिल्यं फेनसङ्घातो रौक्ष्यं गौरवमतिस्नेहश्व, अष्टौ रेतोदोषा इति तनु शुष्कं फेनिलमश्वेतं पूत्यतिपिच्छलमन्यधातूपहितमवसादि च ( १ ) । ( १ ) ८ भेद वाले ४ रोग - अब संक्षेप में बताये हुये इन ४८ रोगों को विस्तार से कह रहे है । ८ प्रकार के उदर रोग होते हैं । १. वातोदर, २. वित्तोदर, ३. कफोदर, ४ सन्नि-पातोदर, ५. प्लीहोदर, ६. बद्धोदर ७. छिद्रोदर ८. दकोदर । ८ मूत्राघात रोग होते हैं— १. वातज, २. पित्तज, ३. कफज, ४. सन्निपातज, ५. अश्मरीजन्य, ६. शर्कराजन्य, ७. शुक्रदोषजन्य, ८. रक्तदोषजन्य । ८ प्रकार के क्षीरदोष मातृदुग्ध के विकार होते हैं - १. दूध के वर्ण में परिवर्तन हो जाना, २. दूध में दुर्गन्धि हो जाना, ३. दूध के प्राकृतिक स्वाद में परिवर्तन हो जाना, ४. दूध का चिपचिपा होना, ५ दूध में फेन का अधिक होना, ६ दूध में स्निग्धता की कमी होना, ७. दूध में भारीपन का होना, ८ दूध का अधिक चिकना होना । ८ शुक्र के दोष होते हैं— १. शुक्र का पतला होना, २. शुक्र का शुष्क होना, ३. शुक्र में फेन का होना, ४. शुक्र का सफेद
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३८५ चरकसंहिता होना, ५. शुक्र में दुर्गन्ध होना, ६. शुक्र का चिपचिपा होना, ७. शुक्र में अन्य रक्तादि धातुओं का मिला हुआ होना, ८. शुक्र का अवसादि होना अर्थात् शुक्र निकलते समय शरीर में शून्यता और दुर्बलता का अधिक होना ॥ ( १ ) ' विमर्श - विशेष रूप से चिकित्सा के १३ वें अध्याय में उदर रोग का वर्णन किया गया है । मूत्राघात का वर्णन चिकित्सा के २६ वें अध्याय में, क्षीर दोष और शुक्र दोष चिकित्सा के ३० वें अध्याय में वर्णित है सप्त कुष्ठानीति कपालोदुम्बर मण्डलजिह्वपुण्डरीक सिध्मकाकणानि, सप्त पिडका इति शराविका कच्छपिका जालिनी सर्वप्यलजी विनता विद्रधी च सप्त विसर्पा इति वातपित्त-कफानिकर्दमकग्रन्थिसन्निपाताख्याः ( २ ) । ( २ ) सात भेट वाले ३ रोग - ७ कुष्ठ के भेद - १. कपाल २. उदुम्बर, ३. मण्डल, ४. ऋभ्यजिह्व, ५. पुण्डरीक ६. सिध्म, ७. काकण । ७ प्रमेहपिडकाओं के भेद - १. शराविका, २. कच्छपिका, ३. जालिनी, ४. सर्षपी, ५. अलजी, ६. विनता, ७ विद्रधि । ७ विसर्प के भेद -१. वातज, २. पित्तज, ३. कफज, ४. अग्निविसर्प, ५. कर्दम विसर्प, ६. ग्रन्थि विसर्प, ७. सन्निपातज विसर्प ( २ ) विमर्श - कुष्ठ का विशेष वर्णन निदान के ५ वें अध्याय में । पिडकाओं का वर्णन सूत्र स्थान के १७ वें अध्याय में । और विसर्प का वर्णन चिकित्सा के २१ वें अध्याय में किया है । पडतीसारा इति वातपित्तकफस न्निपातभयशोकजाः, पडुदावर्ता इति वातमूत्रपुरी-शुक्रच्छर्दिक्षवथुजाः ( ३ ) । ( ३ ) ६ भेद वाले २ रोग - ६ प्रकार के अतिसार - १. वातज, २. पित्तज, ३. कफज, ४. सन्निपातज, ५. भयज, ६. शोकज । ६ उदावर्त - १. अपान वायु के वेग को रोकने से, २. मूत्र के वेग को रोकने से, ३. मल के वेग को रोकने से, ४. शुक्र के वेग को रोकने से ५. वमन के वेग को रोकने से, ६. छीक के वेग को रोकने से, ( ३ ) । विमर्श - यहाँ ६ प्रकार का उदावर्त बताया है पर भेल संहिता में केवल ४ प्रकार का ही उदावर्त बनाया है । उदावर्त में अपान वायु का ऊपरी भाग में आ जाना ही दोष माना है यथा-' वातमूत्रपुरीषाणां निरोधान्मेहनस्य च । एतैरन्यैश्च गुरुभिर्हेतुभिः कुपितोऽनिलः ॥ निगृह्णाति गुदद्वारं शरीरं चास्य सर्वशः । संशोषयति तत्रस्थः शरीरं शोषयेद् भृशम् ॥ अधोवहानि स्रोतांसि-पित्तश्लेष्मवहान्यपि । वहन्त्यन्नमलान् वापि बध्नाति पवनो भृशम् ॥ वानसंदूषितास्ते ' तु धावन्तो ह्य्-र्ध्वमास्थिताः । आमपक्वाशय स्थानमुन्माद्यन्ति सुदारुणम् ॥ ऊर्ध्वं ह्यपानः संप्राप्य उदानेन समागतः । उदावर्त्त इति प्रोक्तः शस्त्रसर्पविषोपमः ॥ इति ( भेल ० चि ० अ. १७ ) । पर चरक ने यहाँ छींक और वमन इन दोनों को रोकने से भी अपान वायु की ऊर्ध्वं गति मानी है । अन्तर इतना है कि वातादि ४ प्रत्यासन्न कारण है । छर्दि और छींक का रोकना विप्रकृष्ट कारण है । सन्निकृष्ट एवं विप्रकृष्ट कारण को मानकर सुश्रुत ने १३ प्रकार का उदावर्त माना है । यथा - ' वातविण्मू-त्रजृम्भाश्रुक्षवोद्गारवमीन्द्रियैः । व्याहन्यमानैरुदितैरुदावर्तो निरुच्यते ॥ क्षुत्तृष्णाश्वासनिद्राणामु-दावतों विधारणात् । तस्याभिवास्ये व्यासेन लक्षणं च चिकित्सितम् । त्रयोदशविवश्वासौ भिन्न एतैस्तु कारणैः ॥ ' इति ( सु ० उ ० अ. ५५ ) । पञ्च गुल्मा इति वातपित्तकफसन्निपातशोणितजाः, पञ्च प्लीहदोपा इति गुल्मैर्व्याख्याताः, पञ्च कासा इति वातपित्तकफक्षतक्षयजाः, पञ्च श्वासा इति महोर्ध्वच्छिन्नतमक क्षुद्राः, पञ्च हिक्का इति महती गम्भीरा व्यपेता क्षुद्राऽन्नजा च पञ्च तृष्णा इति वातपित्तामक्षयोपस-
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अटोरीयाध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् ३८६ गत्मिकाः, पञ्च छर्दय इति द्विष्टार्थसंयोगजा वातपित्तकफसन्निपातोद्रेकोस्थाश्च पञ्च भक्तस्यानशनस्थानानोति वातपित्तकफसन्निपातद्वेषाः, पञ्च शिरोरोगा इति पूर्वोद्देशमभि-समस्ये वातपित्तकफसन्निपात क्रिमिजाः, पञ्च हृद्रोगा इति शिरोरोगैर्व्याख्याताः, पञ्च पाण्डुरोगा इति वातपित्तकफसन्निपातमृद्भक्षणजाः, पञ्चोन्मादा इति वातपित्तकफसन्नि-पातागन्तुनिमित्ताः ( ४ ) । ( ४ ) पाँच भेद वाले १२ रोग - ५ गुल्म के प्रकार - ( १ ) वातज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) सन्निपातज, ( ५ ) रक्तज । ५ प्लीहा के रोग - गुल्म की तरह इसके भी ५ भेद होते है— ( १ ) वातज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) सन्निपातज, ( ५ ) रक्तज । ५ प्रकार के कास— ( १ ) वातज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) क्षतज, ( ५ ) क्षयज । पाँच प्रकार के श्वास-( १ ) महाश्वास, ( २ ) ऊर्ध्वश्वास, ( ३ ) छिन्नश्वास, ( ४ ) तमकश्वास, ( ५ ) छुद्रश्वास । ५ प्रकार की हिक्का - ( १ ) महती, ( २ ) गम्भीरा, ( ३ ) व्यपेता, ( ४ ) क्षुद्रा, ( ५ ) अन्नजा । ५ प्रकार की तृष्णा - ( १ ) वातज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) आमज, ( ४ ) क्षयज, ( ५ ) उपसर्गज | ५ प्रकार की छर्दि -- ( १ ) दुष्टार्थसंयोगज ( मन के विपरीत अन्न, पान या गन्ध के संयोग से ), ( २ ) वातज, ( ३ ) पित्तज, ( ४ ) कफज, ( ५ ) सन्निपातज । ५ प्रकार की अरुचि-( १ ) वातज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) सन्निपातज, ( ५ ) द्वेषजन्य । ५ प्रकार के शिरोरोग - पहले १७ वें अध्याय में शिरोरोग का संक्षेप में उपदेश किया जा चुका है । वे ( १ ) वातज, ( २ ), पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) सन्निपातज, ( ५ ) कृमिज भेद से पाँच होते हैं । ५ प्रकार के हृदय रोग - शिरोरोग के समान इसकी भी व्याख्या समझनी चाहिये । वे ( १ ) वातज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) सन्निपातज, ( ५ ) कृमिज भेद से पाँच होते हैं । ५ प्रकार के पाण्डु रोग - ( १ ) वातज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) सन्निपातज, ( ५ ) मृद्भक्षणजन्य । ५ प्रकार के उन्माद - ( १ ) वातज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) सन्निपातज, ( ५ ) आगन्तुक । ( ४ ) । विमर्श - गुल्म का विशेष वर्णन चिकित्सा के ५ वें अध्याय में, प्लीहा - रोग का वर्णन चिकित्सा के १३ वें अध्याय में, कास का वर्णन चिकित्सा के १८ वें अध्याय में, हिक्का श्वास का वर्णन चिकित्सा के १७३ अध्याय में तृष्णा का वर्णन चिकित्सा के २२ वें अध्गय में, छर्दि का वर्णन चिकित्सा के २० वें अध्याय में, अरोचक का वर्णन चिकित्सा के २६ वें अध्याय में, शिरो रोग का तथा हृदय रोग का वर्णन सूत्र स्थान के १७ वें अध्याय तथा चिकित्सा के २६ वें अध्याय में, पाण्डु रोग का वर्णन चिकित्सा के १६ वें अध्याय में, उन्माद रोग का वर्णन चिकित्सा के ९वें अध्याय में विशेष रूप से किया गया है । चत्वारोऽपस्मारा इति वातपित्तकफसन्निपातनिमित्ताः चत्वारोऽक्षिरोगाः, चत्वारः कर्णरोगाः, चत्वारः प्रतिश्यायाः, चत्वारो मुखरोगाः, चत्वारो ग्रहणीदोषाः, चत्वारो मदाः, चत्वारो मूर्च्छाया इत्यपस्मारैर्व्याख्याताः चत्वारः शोषा इति साहससंधारणक्षयविष-माशनजाः, चत्वारि क्लैब्यानीति बीजोपघातावजभङ्गाज्जरायाः शुक्रक्षयाच्च ( ५ ) । ( ५ ) चार भेद वाले १० रोग - ४ प्रकार के अपस्मार - ( १ ) वानज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) सन्निपातज । ( १ ) ४ नेत्र रोग ( २ ) ४ कर्णरोग, ( ३ ) ४ प्रतिश्याय १. ' वातपित्तकफद्वेषायासाः ' ग. २. ' पूर्वोद्दे शमभिसमस्येनिः शिरसीये विस्तरोक्तान् संक्षिप्य ' चक्रः ।
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३६० चरकसंहिता ( ४ ) ४ मुख रोग, ( ५ ) ४ ग्रहणी रोग, ( ६ ) ४ मदात्ययरयोग, ( ७ ) ४ मूर्च्छारोग । अपस्मार की तरह इसकी व्याख्या समझनी चाहिये अर्थात् ये सभी रोग ( १ ) वातज ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज, ( ४ ) सन्निपातज ये चार प्रकार के होते हैं । चार प्रकार का शोप-( १ ) साहसजन्य, ( २ ) वेगसंधारणजन्य, ( ३ ) धातुक्षयजन्य, ( ४ ) विषमाशनजन्य | ४ प्रकार की नपुंसकता - ( १ ) बीजोपघातजन्य, ( २ ) ध्वजोपघातजन्य, ( ३ ) जराजन्य, ( ४ ) शुक्रक्षयजन्य । ( ५ ) । विमर्श - अपस्मार रोग का वर्णन चिकित्सा के १० वें अध्याय में किया गया है । नेत्ररोग, कर्णरोग, प्रतिश्याय, मुखरोग इन सबका वर्णन २६ वें अध्याय में किया गया है । यद्यपि ये रोग स्थान और लक्षण के भेद से अनेक होते हैं । पर सभी में वात, पित्त, कफ और सन्निपात यही दोष होते हैं । इसलिये संक्षेप में चार ही बताया हैं । ग्रहणी का वर्णन चिकित्सा के १५ वें अध्याय में, मदात्यय का चि. के २४ वें अ. में, मूर्च्छा का सू. स्था. के २४ वें अ. में, शोष का चि. ८ अ. में, क्लव्य का चि. ३० अ. में वर्णित है । त्रयः शोथा इति वातपित्तश्लेष्म निमित्ताः, त्रीणि किलासानीति रक्तताम्रशुक्लानि, त्रिविधं लोहितपित्तमित्यूर्ध्वभागमधोभागमुभयभागं 1 ( ६ ) । ( ६ ) तीन भेद वाले ३ रोग - ३ प्रकार के शोथ - - ( १ ) वानज, ( २ ) पित्तज, ( ३ ) कफज । ३ प्रकार के किलास - ( १ ) रक्त, ( २ ) ताम्र और ( ३ ) श्वेत । ३ प्रकार के रक्त - पित्त - ( १ ) ऊर्ध्वग, ( २ ) अधोग और ( ३ ) उभयमार्गग । ( ६ ) । विमर्श - त्रिशोधीय अध्याय में द्वन्दज और सन्निपातज शोथ बताया है उसका इन तीन दोपों में ही अन्तर्भाव कर दिया है । किलास का वर्णन चिकित्सा के ७ वें अध्याय में, रक्तपित्त का चि. चौथे अध्याय में वर्णन किया गया है । ज्वराविति उष्णाभिप्रायः शीतसमुत्थश्च शीताभिप्रायश्चोपणसमुत्थः, द्वौ व्रणाव निजश्चागन्तुजश्च द्वावायामाविति बाह्यश्चाभ्यन्तरश्च द्वे गृध्रस्याविति वाताद्वातकफाच्च, काम इति कोष्टाश्रया शाखाश्रया च द्विविधमाममित्यलसको विसूचिका च, द्विविधं वातरक्तमिति गम्भीरमुत्तानं च, द्विविधान्यर्शासीति शुष्कान्यार्द्राणि च ( ७ ) । ( ७ ) दो भेद वाले ८ रोग - २ प्रकार के ज्वर - ( १ ) शीत आहार - विहार से उत्पन्न, जिसमें रोगी उष्ण आहार - विहार की इच्छा रखता हो, ( २ ) उष्ण आहार - विहार से उत्पन्न जिसमें रोगी शीतल आहार - विहार की इच्छा रखता हो । २ प्रकार के व्रण - ( १ ) निज ( वात, पित्त, कफजन्य ), ( २ ) आगन्तुज ( जो बाहरी कारणों से उत्पन्न हो ) । २ प्रकार के आयाम— । ( १ ) बहिरायाम, ( २ ) अन्तरायाम । २ प्रकार की गृध्रसी - ( १ ) वानज, ( २ ) वातकफज २ प्रकार की कामला - ( १ ) कोष्ठ के आश्रयीभूत, ( २ ) शाखा के आश्रयीभूत । २ प्रकार के आमदोष -- ( १ ) अलसक, ( २ ) विसूचिका । २ प्रकार के वातरक्त - ( १ ) गम्भीर, ( २ ) उत्तान | २ प्रकार के अर्शरोग - ( १ ) आर्द्र, ( २ ) शुष्क । ( ७ ) । विमर्श - यद्यपि ज्वर प्रकृतिभेद से ८ प्रकार का होता है । फिर भी यहाँ रोगी की इच्छानुसार दो भेद किये गये हैं । इसका वर्णन चिकित्सा के तीसरे अन्याय में, व्रण इसका चि. के २५ वें अ. में, आयाम और गृध्रसी, इसका वर्णन चि के २८ वें अ. में, कामला का चि. १६ वें अ.में, आमदोष का विमान के दूसरे अध्याय में, वान रक्त का चि. २ ९वें अ. में अर्श का चि. १४ वें अ. में वर्णन किया गया है ।
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अष्टदरीयाध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् ३६१ एक ऊरुस्तम्भ इति आमत्रिदोषसमुत्थः, एकः संन्यास इति त्रिदोषात्मको मनः शरीराधिष्ठानः, एको महागढ़ इति अतत्त्वाभिनिवेशः ( ८ ) । ( ८ ) एक भेद वाले ३ रोग - एक उरुस्तम्भ - जो आम और त्रिदोष के सम्बन्ध से होता है । एक संन्यास - मन और शरीर में आश्रयी होकर वह त्रिदोष से उत्पन्न होता है । स्क महागद - जिसे अतत्त्वाभिनिवेश कहा जाता है । ( ८ ) । विमर्श - ऊरुस्तम्भ का वर्णन चि. के २७ अ. में, संन्यास का वर्णन सूत्रस्थान के २४ वें अ. में, अतत्त्वाभिनिवेश का वर्णन चि. १० वें अ. में किया गया है । विंशतिः क्रिमिजातय इति यूकाः पिपीलिकाचेति द्विविधा बहिर्मलजा:, केशादा लोमादा लोमहीपाः सौरसा औदुम्बरा जन्तुमातरश्चेति षट् शोणितजाः, अन्त्रादा उदरवेष्टा हृदयादारवो दर्भपुष्पाः सौगन्धिका महानुदाचेति सप्त कफजाः, ककेरुका मा लेलिहाः सशूलकाः सौसुरादाश्चेति पञ्च पुरीषजाः विंशतिः प्रमेहा इति उदकमेहश्रेक्षुबालि-कारसमेहश्च सान्द्रमेहश्व सान्द्रप्रसाद मेहश्च शुक्रमेहश्च शुक्रमेहश्च शीतमेहश्व शनैर्मेहश्व सिकतामेहश्व लालामेहश्चेति दश श्लेष्मनिमित्ताः, क्षारमेहश्च कालमेहश्च नीलमेहश्व लोहित-मेहश्र मञ्जिष्टा मेहश्व हरिद्रामेहश्रेति षट् पित्तनिमित्ताः, वसामेहश्च मज्जा मेहश्व हस्तिमेहश्व मधुमेहति चत्वारो वातनिमित्ताः इति विंशतिः प्रमेहाः विंशतियनिव्यापद इति वाति की पैत्तिकी श्लैष्मिकी सान्निपातिकी चेति चतस्रो दोषजाः, दोषदूप्यसंसर्गप्रकृति-निर्देशैरवशिष्टाः षोडश निर्दिश्यन्ते, तद्यथा - रक्तयोनिश्चारजस्का चाचरणा चातिचरणाच प्राक्चरणा चोपप्लुता च परिप्लुता चोदावर्तिनी च कणिनी च पुत्रघ्नी चान्तर्मुखी च सूचीमुखी च शुष्का च वामिनी च षण्ढयोनिश्च महायोनिश्चेति विंशतिय निव्यापदो भवन्ति ( ९ ) । ( ९ ) बीस भेद वाले ३ रोग -२० प्रकार की कृमिजातियाँ - ( १ ) यूका, ( २ ) पिपी-लिका ये दो कृमियाँ बाहरी मल में होती हैं । ( १ ) केशाद, ( २ ) लोमाद, ( ३ ) लोमद्वीप, ( ४ ) सौरस, ( ५ ) औदुम्बर, ( ६ ) जन्तुमाता ये ६ कृमियाँ रक्त में उत्पन्न होती हैं । ( १ ) अन्त्राद, ( २ ) उदरावेष्ट, ( ३ ) हृदयाद, ( ४ ) चुरु, ( ५ ) दर्भपुष्प, ( ६ ) सौगन्धिक, ( ७ ) महागुद ये ७ कृमियाँ कफ से उत्पन्न होती हैं । ( १ ) ककेक, ( २ ) मकेरुक, ( ३ ) लेलिह, ( ४ ) सशूलक, ( ५ ) सौसुराद ये ५ कृमियाँ मल में उत्पन्न होती हैं । २० प्रकार के प्रमेह - ( १ ) उदकमेह, ( २ ) इक्षुमेह, ( ३ ) सान्द्रमेह, ( ४ ) सान्द्रप्रसाद मेह, ( ५ ) शुक्ल मेह, ( ६ ) शुक्रमेह, ( ७ ) शीतमेह, ( ८ ) शनैर्मेह, ( ९ ) सिकतामेह, ( १० ) लालामेह, ये १० प्रमेह कफजन्य होते हैं । ( १ ) क्षार-मेह, ( २ ) कालमेह, ( ३ ) नीलमेह, ( ४ ) लोहितमेह, ( ५ ) मञ्जिष्ठामेह, ( ६ ) हरिद्रामेह ये ६ प्रमेह पित्तजन्य होते है । ( १ ) वसामेह, ( २ ) मजमेह, ( ३ ) हस्तिमेह, ( ४ ) मधुमेह, ये चार प्रमेह वातजन्य होते हैं । ( १ ) वातजन्य, ( २ ) पित्तजन्य, ( ३ ) कफजन्य, ( ४ ) सन्नि-पातजन्य ये चार योनि व्यापद् ( रोग ) वातादि दोषजन्य होते हैं और दोपदूष्य के संसर्ग तथा प्रकृति के अनुसार से शेष १६ रोग होते हैं । जैसे - ( १ ) रक्तयोनि, ( २ ) अरजस्का, ( ३ ) अचरणा, ( ४ ) अतिचरणा, ( ५ ) प्राक्चरणा, ( ६ ) उपप्लुता, ( ७ ) परिप्लुता, ( ८ ) उदावर्तिनी, ( ९ ) कर्णिनी, ( १० ) पुत्रनी, ( ११ ) अन्तर्मुखी, ( १२ ) सूचीमुखी, ( १३ ) शुष्का-( १४ ) वानिनी, ( १५ ) पण्डयोनि, ( १६ ) महायोनि इस प्रकार ये २० व्यापद् ( रोग ) योनि में होते हैं । ( ९ ) । १. ‘ अतत्त्वाभिनिवेशो मानसो विकारः, स च सर्वसंसारिदुःखहेतुतया गद इत्युच्यते ' चक्रः ।