चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 501–510

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 501–510

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४१२ चरकसंहिता ष्प्रकारा संशुद्धिः पिपासा नारुतातपौ । पाचानान्युपवासश्च व्यायामश्चेति लङ्घनम् ॥ ' ( च. सू. अ. २२ ) इन सभी क्रियाओं से है । ' क्रियातियोग ' का तात्पर्य कुछ लोग वमन विरेचनादि का अतियोग मानते हैं पर उनका कहना उचित नहीं है क्योंकि उसका ग्रहण लङ्कन से ही हो जाना है | इसलिये सामान्यतः शारीरिक, मानसिक क्रियाओं को अधिक रूप में करना क्रियानियोग कहा जाता है । सुश्रुत ने अनिकृश होने के कारणों के निर्देश के साथ ही उसकी सम्प्राप्ति भी बताई है । यथा— ' तत्र पुनर्वानलाहारसेविनोऽतिव्यायामव्यवायाध्ययनभयशोकध्यानरात्रिजागरणपिपासा-क्षुत्कषायाल्पाशनप्रभृतिभिरुपशोषितो रसधातुः शरीरमननुक्रामन्नल्पत्वान्न प्रीणाति, तस्मादतिका च जायते । ' ( सू. अ. १५ ) अर्थात्, वान को बढ़ाने वाले आहार का सेवन करने वाला मनुष्य जब अधिक व्यायाम, अधिक मैथुन, अधिक अध्ययन, अधिक भय, शोक और चिन्ता करता है । तथा रात्रि में जागता है, प्यास और भूख को अधिक सहन करता है, कषाय रस का और अल्प भोजन आदि का सेवन करता है तो इन कारणों से रस धातु सूख जाती है । सूखी हुई रस धातु शरीर में चलती हुई अल्प होने के कारण रक्तादि धातुओं का पोषण नहीं कर पाती है जिससे शरीर अत्यन्त कृश हो जाता है । यद्यपि अतिकुश होने के कारणों का निर्देश दोनों आचार्यों ने किया है पर इतने ही कारण पर्याप्त हैं ऐसा नहीं मानना चाहिये, संक्षेप में वातवर्धक जो भी

आहार - विहार होता है वह मनुष्य को कृश करता है जैसे अधिक दौड़ना, अधिक चलना, आदि ।

* व्यायाममतिसौहित्यं तुत्पिपासामयौषधम् । कृशो न सहते तद्वदतिशीतोष्णमैथुनम् ॥

प्लीहा कासः क्षयः श्वासो गुल्मोऽर्शांस्युदराणि च । कृशं प्रायोऽभिधावन्ति रोगाश्च ग्रहणीगताः अतिकृश से होनेवाले रोग - अतिकृश मनुष्य व्यावान को अधिक भोजन को, भूख - प्यास को, रोगको, औषधियों को, अत्यन्त शीतल, अत्यन्त उष्ण आहार - विहार को तथा अति मैथुन को सहन नहीं कर सकता है । और प्रायः अत्यन्त कृश मनुष्य के शरीर में प्लीहावृद्धि, कास, क्षय, श्वास, गुल्म, अर्श, उदर और ग्रहणीगत रोग हो जाते हैं ॥ १३-१४ ॥ विमर्श - सुश्रुत ने भी अत्यन्त कृश मनुष्यों में होनेवाले कष्टों का उल्लेख विस्तृत रूप से किया है जैसा कि - ' सोऽनिकृशः क्षुत्पिपासाशीतोष्णवानवर्षभागदानेष्वसहिष्णुर्वातरोगप्रायो ऽ-ल्पप्राणश्च क्रियासु भवति, श्वासकासशोषप्लीहोराग्निसाइगुल्नरक्तपित्तानामन्यतममासाद्य मरण-मुपयाति । " ( सु ० सू ० अ ० १५ ) * शुष्कस्फिगुदरग्रीवो धमनीजालसंततः । त्वगस्थिशेषोऽतिकृशः स्थूलपर्वा नरो मतः ॥१५ ॥

अतिकृश की परिभाषा अत्यन्त कृश पुरुष का नितम्ब, उदर और ग्रीवा अधिक सूख जाती है, जिससे शरीर की धमनियों का जाल दृष्टिगोचर होता है । शरीर में त्वचा और अस्थि मात्र ही शेष है ऐसा देखने में प्रतीत होता है तथा अनिकृश पुरुष की सन्धियाँ मोटी हो जाती हैं ॥ १५ ॥

सततं व्याधितावेतावतिस्थूलकृशौ नरौ । सततं चोपचयौं हि कर्शनैर्ब्रहणैरपि ॥ १६ ॥

चिकित्सा- सिद्धान्त -- अतिस्थूल और अनिकृश पुरुष सदा रोग से पीड़ित रहते है इनकी चिकित्सा कर्षण और वृंहण के द्वारा सदा करनी चाहिये ॥ १६ ॥

विमर्श - अतिकृश और अतिस्थूल ये दोनों पुरुष निन्दित हैं इन दोनों में धातुओं की पुष्टि उत्तम विधि से नहीं होती अतः मनुष्य दुर्बलताजन्य रोग से सदा पीड़ित रहता है । इनकी चिकित्सा करते समय यह ध्यान दिया जाता है कि यदि पुरुष स्थूल है तो उसके लिये कर्षण अर्थात् शरीर को कृश करने वाले आहार विहार का प्रयोग किया जाता है । और यदि अधिक कृश है तो सदा बृंहण आहार - विहार का ही प्रयोग करना चाहिये । १. ' लुत्पिपासा महौषधम् ' इति पा. । २. ' ऽभिबाधन्ते ' यो । ३. ' धमनीजालसंवृतः ' यो.

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अष्टौनिन्दितीयाध्यायः २१ ] सूत्रस्थानम् ४१३ * स्थौल्यकाश्यें वरं काश्यं समोपकरणौ हि तौ । यद्युभौ व्याधिरागच्छेत् स्थूलमेवातिपीडयेत् ॥ स्थौल्य तथा कार्य में कौन अच्छा? - अति स्थूलता और अति कृशता में कृशता अच्छी होती है । क्योंकि दोनों चिकित्सा कराने के समान अधिकारी होते हैं, पर दोनों को रोग हो जाय तो स्थूल मनुष्य को ही रोग अधिक कष्ट देता है ॥ १७ ॥

विमर्श - यद्यपि स्थूल और कृश ये दोनों व्यक्ति समान रूप से निन्दित हैं फिर भी अपेक्षाकृत स्थूल से कृश कुछ अच्छा होता है इसका कारण यह बताया है कि यदि एक समान ही जिसकी चिकित्सा है ऐसी कोई व्यावि इन दोनों व्यक्तियों में आ जाय तो स्थूल व्यक्ति को ही व्याधि अत्यधिक सताती है । जैसे स्थूल व्यक्ति के लिये मेदा को नष्ट करने वाली, अग्नि को नष्ट करनेवाली तथा वायु को नष्ट करनेवाली औषधियों का प्रयोग किया जाता है । मोटे आदमी के लिये बृंहण और लंघन ये दोनों औषधियाँ प्रयोग में नहीं लाई जातीं । बृंहण के द्वारा मैदा का उपचय बहुत अधिक देखा जाता है । लंघन से मैदा का नाश और अग्नि वायु की वृद्धि होती है । इस प्रकार यदि स्थूल और कृश व्यक्ति को बृंहण साध्य कोई भी रोग हो जाय तो कृश व्यक्ति के लिये बृंहण उपाय के द्वारा शीघ्र ही साध्य हो जाता है । और स्थूल व्यक्तियों के लिये वह रोग कृच्छ साध्य होता है क्योंकि बृंहण चिकित्सा स्थूल व्यक्ति के लिये विरुद्ध होती है । यदि लंघन साध्य कोई रोग होता है तो भी स्थूल पुरुष के लिये कृच्छ साध्य होता है । क्योंकि लंघन से मैदा का क्षय अवश्य होता है पर साथ ही वह अग्नि और वात को अधिक रूप में बढ़ाने वाला होता है । स्थूल पुरुष के शरीर में अग्नि और वायु स्वयं अधिक बढ़ी रहती हैं अतः लंघन - साध्य व्याधि भी स्थूल के लिये कृच्छसाध्य होती है, अपेक्षाकृत लंघन साध्य भी रोग कृश के लिये सुखसाध्य होते हैं । वाग्भट ने भी — ' कार्यमेत्र वरं स्थौल्याद् नहि स्थूलस्य भेषजम् । बृंहणं लंघनं वाऽलमतिमेोऽग्निवातजित् ॥ मधुरस्निग्ध मौहित्यैर्यत्सौख्येन च नश्यति । क्रशिमा स्थविमाऽत्यन्तविपरीतनिषेवणैः ॥ ' ( अ ० हृ ० सू ० अ ० १४ ) तथा जिन्हें लंघन करना चाहिये उन्हें बृंहण कदापि नहीं करना चाहिये पर जो बृंहण करने योग्य हैं उन्हें हल्का रूक्ष लंघन कराया जा सकता है, यथा - ' न बृंहयेलंघनीयान् बृंह्यास्तु मृदु लंघयेत् । युक्त्या वा देशकालादिबलतस्ता-नुपाचरेत् ॥ ' ( अ ० हृ ० सू ० अ ० १४ ) । तात्पर्य यह होता है कि स्थूल पुरुष लंघन करने योग्य होते है इन्हें यदि लंघन कराया जाय तो अग्नि और वायु की वृद्धि अधिक हो जाती है और पहले से भी अग्नि और वायु की वृद्धि रहती है, कृश पुरुष के लिये लंघन करना यद्यपि उत्तम नहीं होता है फिर भी मृदु लंघन अत्यन्त हानि नहीं करता है और बृंहण चिकित्सा स्थूल के लिये हानिकर विशेष रूप से होती ही है क्योंकि चिकित्सा में विरुद्ध होता है । कृश के लिये वृंण चिकित्सा परम लाभकारी और चिकित्सा में अविरुद्ध होता है । इसीलिये एक समान व्याधि यदि दोनों व्यक्तियों को हो जाती है तो स्थूल को अधिक कष्ट देती है । इसीलिये स्थूल से कृश को

उत्तम माना है ।

सममांसप्रमाणस्तु समसंहर्ननो नरः । इन्द्रियो विकोराणां न वलेनाभिभूयते ॥ १८ ॥

- जिस व्यक्ति के मांस का प्रमाण सम हो अंगों में मांस आदि संगठन सम स्वस्थ पुरुष हो, इन्द्रियाँ दृढ़ हों तो वे मनुष्य रोगों के बल से अधिक कष्ट नहीं पाने है ॥ १८ ॥

विमर्श - सम मांस से यह स्पष्ट किया गया है जो, अतिकश या अतिस्थूल न हो, समप्रमाण १. ' सममंहनन इति समं यथायोग्यं संहननं शरीरमांसादीनां संनिवेशो दा यस्य सः ' गङ्गाधरः । २. ' दृढेन्द्रिय विकाराणाम् ' यो ।

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४१४ चरकसंहिता से अतिस्त्र, अतिदीर्घ न हो तथा समप्रमाण से अतिलोमा, अलोमा, अतिगौर, अनिकृष्ण भी न हो, इसको भी सूचित किया गया है अर्थात् शरीर की रचना के अनुसार जो पूर्वीक दोषों से शून्य हो वह व्यक्ति तथा यद्यपि निन्दित के प्रकरण में केवल आठ ही दोष बनाए हैं फिर भी लेगड़े, पंगु, कुब्ज, अन्थे, काने आदि भी पुरुष निन्दिन समझे जाते है । सुखपूर्वक जीवन यापन के लिए इन दोषों का रहना भी उत्तम नहीं माना जाता । यह बान ' समसंहनन ' से नष्ट की गई है कि जिन व्यक्तियों के अंग - प्रत्यंगों की बनावट सम हो तो इन तीन गुणों के कारण उसकी बाह्य तथा आभ्यन्तर सभी इन्द्रियाँ बलवान् होती हैं । यदि संयोगवश कोई रोग हो भी जाय तो उसे अधिक कष्ट नहीं होता है । यथा - ' समधातुत्वान्मध्यशरीरो भवति सर्वक्रियासु समर्थः क्षुत्पिपासाशीतोष्णवर्षातपसहो बलवांश्च ' । ' ( सु ० सू ० अ ० १५ )

चुत्पिपासात पसहः शीतव्यायामसंसहः । समपक्ता समजरः सममांसचयो मतः ॥ १ ९ ॥

और भी - जिन व्यक्तियों के शरीर में मांसपेशियों का संगठन उचित रूप से हुआ रहता है वे व्यक्ति भूख, प्यास के वेगों को तथा धूप को सहन करनेवाले होते हैं । वे शीत ( जाड़ा ), व्यायाम ( अधिक परिश्रम ) को सहनेवाले होते हैं, उनकी जठराग्नि सम रहती है । नियमतः प्रकृति और सात्म्य के अनुसार जो भी भोजन करते हैं उसका पाचन अपने समय पर उचित रूप से होता है ॥ १ ९ ॥ गुरु चातर्पणं चेष्टं स्थूलानां कर्शनं प्रति । कृशानां बृंहणार्थं च लघु संतर्पणं च यत् ॥२० ॥

स्थौल्य तथा काश्यं चिकित्सा सिद्धान्त - - अत्यन्त मोटे व्यक्तियों को कृश बनाने के लिए आहार गुरु देना चाहिए और उसे अपतर्पण कराना इष्ट है । जो व्यक्ति अत्यन्त कृश हैं उन्हें कृशता दूर ' करने के लिए वृंहण के लिए लघु और संतर्पण आहार द्रव्य का प्रयोग करना चाहिए ॥ २० ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि अतिस्थूल व्यक्तियों की जठराग्नि अत्यन्त तीव्र होती है इसलिए गुरु भोजन देना चाहिए । गुरु भोजन, मधुर द्रव्य और संस्कार से बने हुए मालपुआ आदि भी गुरु होते हैं, ऐसे शारीरिक धातुओं को तृप्त करने वाले आहार द्रव्य को न देकर अपतर्पण, जो शारीरिक धातुओं को तृप्त न करें किन्तु शोषण करे उसे देना चाहिए । स्थूल व्यक्तियों में मेद की वृद्धि इतनी अधिक रहती है । जिससे सारे खोत अवरुद्ध हुए रहते हैं । तीव्र अनि गुरु आहार को पकाती है और उन द्रव्यों में जो रूक्षता होती है वह मेद धातु का शोषण कर लेती हैं । और मालपुआ आदि गुरु आहार द्रव्य का प्रयोग किया जाय तो वह तीक्ष्ण अग्नि के लिए अनुकूल होते हुए भी मेद धातु की अन्यन्त वृद्धि करेगा, इन बातों को दृष्टि में रख कर गुरु और अपतर्पण आहार द्रव्यों का प्रयोग बताया है । अतिकृश व्यक्तियों की जठराग्नि मन्द रहती है अतः लघु आहार द्रयों का सेवन करने का आदेश दिया है पर लघु आहार द्रव्य स्वभावतः कृश करने वाले होते हैं क्योंकि इससे बात की वृद्धि होती है इसलिए ' संतर्पण ' यह विशेषण दिया है अर्थात् लघु होते हुए जो रसादि धातुओं को तृप्त करने वाला है ऐसा आहार द्रव्य का प्रयोग करना चाहिए | इस प्रकार के आहार द्रव्यों का उल्लेख आगे की पंक्तियों में आचार्य ने स्वयं किया है । चातघ्नान्यन्नपानानि श्लेष्ममेदोहराणि च । रूक्षोष्णा वस्तयस्तीक्ष्णा रूक्षाण्युद्वर्तनानि च ॥ गुडूचीभद्र मुस्तानां प्रयोगस्त्रैफलस्तथा । तक्रारिष्टप्रयोगश्च प्रयोगो माक्षिकस्य च ॥ २२ ॥

९. गुरु चातपॆणं यथा - मधु, एतद्धि गुरुत्वादृद्धमग्निं यापयति, अपतर्पगत्वान्मेदो हन्ति; लघु संतर्पणं च शालिषष्टिकैणेय मांसादि ।

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अष्टौनिन्दितीयाध्यायः २१ ] सूत्रस्थानम् ४१५

विडङ्गं नागरं क्षारः काललोहरजो मधु । यवामलकचूर्ण च प्रयोगः श्रेष्ठ उच्यते ॥ २३ ॥

बिल्वादिपञ्चमूलस्य प्रयोगः क्षौद्रसंयुतः । शिलाजतुप्रयोगश्च सान्निमन्थरसः परः ॥ २४ ॥

अतिस्थूलता ( मेदोरोग ) की चिकित्सा - वायु, श्लेष्मा तथा मेद को नष्ट करने वाले अन्न - पान, तीक्ष्ण, रूक्ष एवं उष्ण वस्तियाँ, रूक्ष उबटन तथा गुड़ची, नागरमोथा, त्रिफला, तक्रारिष्ट ( अर्शोधिकार ) और मधु का प्रयोग करना चाहिए तथा वायविडंग, सोंठ, क्षार, तीक्ष्ण लोहभस्म, मधु, जौ का आटा, आमलकी चूर्ण इन सवों का प्रयोग श्रेष्ठ होता है । तथा बृहत् पंचमूल का शहद के साथ प्रयोग तथा अग्निमन्ध के रस के साथ शिलाजतु का प्रयोग उत्तम बताया है ॥ २१-२४ ॥ प्रशातिका प्रियङ्गुश्च श्यामाका यवका यवाः । जूर्णाह्वाः कोद्रवा मुद्राः कुलत्थाचक्रमुद्भकः ॥

आढकीनां च बीजानि पटोलामलकैः सह । भोजनार्थं प्रयोज्यानि पानं चानु मधूदकम् ॥

अरिष्टांश्चानुपानार्थे मेदोमांसकफापहान् । अतिस्थौल्यविनाशाय संविभज्य प्रयोजयेत् ॥ अतिस्थूल के लिए पथ्य - प्रशातिका, प्रियंगु ( कंगुनीधान्य ), साँवा, जई, यव ( जौ ) जू ( मसुरिया ), कोदो, मूँग, कुल्थी, चकमुद्गक ( ऋषिमुद्भक इति चक्रः ), अरहर के बीज, परवल तथा आमलकी इनका प्रयोग भोजन में करना चाहिए । अनुपान के रूप में मधु का पानक ( Honey Syrup ) तथा मैद, मांस और इलेष्मानासक अरिष्टों का प्रयोग अतिस्थूलता को दूर करने के लिए बल आदि का विचार कर प्रयोग करें ॥ २५-२७ ॥ प्रजागरं व्यवायं च व्यायामं चिन्तनानि च । स्थौल्य मिच्छन् परित्यक्तुं क्रमेणाभिप्रवर्धयेत् ॥ अतिस्थूलता में बिहार - जो व्यक्ति स्थूलता से मुक्त होने की कामना करता है उसे प्रजागरण, व्यवाय ( मैथुन ), व्यायाम ( शारीरिक परिश्रम ) एवं मानसिक परिश्रम क्रमशः बढ़ाना चाहिए ॥ २८ ॥

विमर्श –‘क्रमशः ' से यह स्पष्ट किया गया है कि इन्हें सहसा नहीं बढ़ाना चाहिए क्योंकि सहसा बढ़ाने से अन्य उपद्रव के उत्पन्न होने का भय रहता है । स्वप्नो हर्षः सुखा शय्या मनसो निर्वृतिः शमः । चिन्ताव्यवायव्यायामविरामः प्रियदर्शनम् ॥ नवान्नानि नवं मद्यं ग्राम्यानूपौदका रसाः । संस्कृतानि च मांसानि दधि सर्पिः पयांसि च ॥ इक्षवः शालयो माषा गोधूमा गुडवैकृतम् । बस्तयः स्निग्धमधुरास्तैलाभ्यङ्गश्च सर्वदा ॥ स्निग्धमुद्वर्तनं स्नानं गन्धमाल्यनिषेवणम् । शुक्लं वासो यथाकालं दोषाणामवसेचनम् ॥

रसायनानां वृष्याणां योगानामुपसेवनम् । हत्वाऽतिकायमाधत्ते नृणामुपचयं परम् ॥

अतिकृशता ( कार्य ) की चिकित्सा - निद्रा, हर्ष, सुखद विद्यावन, मानसिक विश्राम, मानसिक शान्ति, चिन्ता, मैथुन तथा व्यायाम का त्याग, प्रिय वस्तु या प्रिय दृश्य आदि का देखना, नया अन्न, नवनिर्मित मद्य, ग्राम्य, आनूप तथा जलवासी जीवों का मांसरस, कटु आदि द्रव्यों से संस्कारित, मांस, दही, घी, दुग्ध, इक्षु, शालिचावल, उड़द, गेहूं, गुड़ निर्मित वस्तुएँ ( शक्कर, खांड आदि ), स्निग्ध एवं मधुर द्रव्य, सदा तैल की मालिश, स्निग्ध उबटन, स्नान, सुगन्ध तथा सुगन्धित पुष्ष निर्मित माला का धारण, श्वेत वस्त्र, समय - समय पर दोषों की शांति के लिए उनका निर्हरण तथा रसायन एवं वाजीकरण योगों का सेवन करने से अनि कृश पुरुष क्रमशः बलवान होकर परम पुष्ट ( बलशाली ) हो जाता है ॥ २ ९ -३३ ॥ * अचिन्तनाञ्च कार्याणां ध्रुवं संतर्पणेन च । स्वप्रप्रसङ्गाच्च नरो वराह इव पुण्यति ॥ ३४ ॥

१. ' कुलत्थाश्च मकुष्ठकाः ' ग. । २. ' अस्वप्नं च ' यो । ३. ' विरतिः ' यो ।

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४१६ चरकसंहिता ( ३ ) निद्रा ( Sleep ) विमर्श निद्रा का कार्य - चिकित्सा में महत्त्व किसी भी कार्य के विषय में निश्चिन्त रहने एवं परम पौष्टिक द्रव्यों तथा श्लेष्मवर्द्धक आहार - विहार करने तथा अधिक निद्रा लेने से मनुष्य वराह ( सूअर ) के समान अतिस्थूल हो जाता है ॥ ३४ ॥

विमर्श - प्रतिदिन आहार के द्वारा जो शक्ति शरीर को प्राप्त होती हैं वह अनेक शारीरिक एवं मानसिक कर्मों के सम्पादन में व्यय होती है और जब कर्म अधिक करना पढ़ना है एवं पोषक तत्त्व अपेक्षाकृत कम मिलते हैं तो मनुष्य कृश होता है । इसके विपरीत जब पौष्टिक भोजन एवं मधुर पदार्थ अधिक सेवन करते रहने पर और व्यायाम एवं मानसिक चिन्तन से रहित जीवन व्यतीत करते रहने पर शरीर में शक्ति एकत्रित होकर धातुओं की वृद्धि होती है तब मनुष्य अतिस्थूल हो जाता है । यदातु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः कुमान्विताः । विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥ निद्रा की परिभाषा - जब कार्य करते - करते मन थक जाता है एवं इन्द्रियाँ भी थकने के कारण अपने - अपने विषयों से निवृत्त हो जाती हैं तब मनुष्य शयन करता है ॥ ३५ ॥

विमर्श - इन्द्रियाँ अपने - अपने विषयों को मनोधिष्ठित हो ग्रहण करती हैं । मन और इन्द्रिय का निरन्तर विषय ग्रहणार्थ संयोग रहता है अतः कार्य करते - करते जब इन्द्रियाँ थक जाती हैं तो मन भी थक जाता है । इसलिए उपर्युक्त श्लोक में कहा गया है कि जब मन के थक जाने पर थको हुई इन्द्रियाँ अपने विषयों से हट जाती हैं अर्थात् उनका ग्रहण नहीं करती हैं तो मन और इन्द्रियों के विश्रामार्थ मनुष्य सोता है । मन और इन्द्रियों की थकान काल, स्वभाव तथा परिश्रम से हो सकता है । इस प्रकार मनोयुक्त इन्द्रियों का विषय से मुक्त होना ही निद्रा की स्थिति है । क्योंकि जब केवल इन्द्रियाँ अपने विषयों से मुक्त होती हैं परन्तु मन मुक्त नहीं होता है अर्थात् वह चिन्तादि विषयों में लगा रहता है तब मनुष्य स्वप्न देखता है । कहा भी है- ' सर्वेन्द्रिय-व्युपरतौ मनोऽनुपरतं यदा । विषयेभ्यस्तदा स्वप्नं नानारूपं प्रपश्यति ॥ ' ( अ. सं. सु. अ. ९ ) । अर्थात् इन्द्रियाँ विषय - निवृत्त हो जाँय पर मन न निवृत्त हुआ हो तो मनुष्य नाना प्रकार के स्वप्नों को देखता है । इस विषय की विशेष व्याख्या इन्द्रिय - स्थान में देखें । जीवन के तीन उपस्तम्भों में एक उपस्तम्भ निद्रा भी मानी गई है - ' त्रय उपस्तम्भा इति – आहारः, स्वप्नो, ब्रह्मचर्यमिति ॥ ' ( सू. अ. ११ ) । सुश्रुत में निद्रा को वैष्णवी अर्थात् विष्णु की माया कही गई है, इसका अभिप्राय यह है कि विष्णु जिस प्रकार जगत् की सृष्टि का आधार और पोषक होता है उसी प्रकार निद्रा भी शरीर का धारण - पोषण करने वाली होती है । आगे चलकर कहा है कि - ' सा स्वभावत एव सर्वप्राणिनोऽभिस्पृशति । ( मु. शा. अ. ४ ) अर्थात् वह स्वभाव से ही सभी प्राणियों को वश में लाती है उसकी उत्पत्ति तम से मानी गई है । अतः इसे ' पाप्मा ' का विशेषण दिया गया है ' पाप्मा ' शब्द निद्रा का उत्पत्तिबोधक तथा गुणदोषक विशेषण है । इसका अभिप्राय यह है कि निद्रा शरीर धारक होने पर भी पापमूलक है । इसकी टीका में ढल्हणाचार्य ने १. ' कुमं गताः ' यो । २. ' मनसीति चेतसि, क्लान्ने कुमान्विते, कर्मात्मान इन्द्रियाणि विषयेभ्यः शब्दस्पर्शादिभ्यः; कालस्वभावात् श्रमादिहेत्वन्तरतो वा मनसि चेष्टाहीने मनःप्रयुज्यानीन्द्रियाणि कुमान्वितानि भूत्वा विषयेभ्यः शब्दस्पर्शादिभ्यो निवर्तन्ते यदा तदा मानवो राशिपुरुप: स्वपिति; एतेन समन स्केन्द्रियाणां विषयतो निवृत्तिनिद्रेति ख्यापितम् ' गङ्गाधरः ।

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अष्टौनिन्दितीयाध्यायः २१ ] सूत्रस्थानम् ४१७ अग्रांकित कहा है — ' कृत्स्नशुभ व्यापारनिरोधात् । " अर्थात् पूर्वोक्त काल में सभी शुभ व्यापार बन्द हो जाते हैं अतः इसे ' पाप्मा ' कहते हैं । निद्रा की प्रकिया के सम्बन्ध में आधुनिक विचार का वर्णन डा ० घाणेकर ने इस प्रकार प्रकट किया है । निद्रा स्वभाव से होती हैं, परन्तु इस प्रकार से होती है कि इसका ज्ञान बहुत कुछ खोज करने पर भी अत्यल्प है । आधुनिक विद्वानों ने जो कुछ इस सम्बन्ध में पता लगाया है वह निम्न प्रकार से है । ब्रह्मगुह । ( Third Ventricle ) के तल के धूसर भाग में और कन्दाधरीय भाग में ( Hypothalamus ) निद्रा से सम्बन्ध रखने वाला कुछ भाग रहता है । जिसमें विकार होने पर निद्रा तथा तन्द्रा आती है । निद्रा उत्पन्न होने के प्रत्यक्ष कारणों में अनेक मत हैं, जो निम्नांकित है । ( १ ) ' हावेल ' नामक अमेरिकन वैज्ञानिक का मत है कि मस्तिष्क में रक्त की कमी और अन्य अंगों में रक्त की अधिकता होने से निद्रा उत्पन्न होती है । भोजन के बाद पचन संस्थान में रक्त संचाराधिक्य होकर मस्तिष्क में रक्त संचार की कमी होने से भोजनोत्तर निद्रा तथा तन्द्रा का होना इसका पुष्ट प्रमाण है । जाड़े के दिनों में रात को शरीर ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र न होने से निद्रा नहीं आनी क्योंकि त्वचा की रक्तवाहिनियों के सिकुड़ जाने से मस्तिष्क में रक्ता-धिक्य हो जाता है । प्रतिदिन रात को त्वचा की रक्तवाहिनियाँ विस्तृत होती हैं, जिससे मस्तिष्क में रक्त की कमी होकर नींद आती है । परन्तु इससे नींद आती है या नींद के कारण मस्तिष्क में रक्त की कमी होती है यह विवादास्पद है । ( २ ) कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि जाग्रत अवस्था में शरीर ऐसा रासायनिक द्रव्य उत्पन्न करता है जो उचित मात्रा में संचित होकर मस्तिष्क पर निद्रा का प्रभाव डालता है और वैसे ही निद्रितावस्था में ऐसे द्रव्य उत्पन्न होते हैं जो निद्रा को हटाने का काम करते हैं । ( ३ ) कुछ तत्त्वज्ञों का कहना है कि जाग्रत अवस्था में मस्तिष्कगत नाडीकेन्द्रों ( Neurones ) के दन्द्र ( Dandrites ) परस्पर भली भाँति मिले रहते हैं । जिससे परस्पर संवहन अवाध रूप से होता रहता है । और जिसका परिणाम संज्ञा या जाग्रत अवस्था है । निद्रावस्था में ये दन्द्र सिकुड़ कर गाँठदार हो जाते है जिससे इनका आपस का सम्बन्ध टूट जाता है और एक से दूसरे का सम्बन्ध रुक जाता है । जिसका परिणाम संज्ञानाश या निद्रा होता है । परन्तु यह सिद्धान्त भी अभी विवादास्पद हैं । ( ४ ) ' पावलोव ' नामक सुप्रसिद्ध रुसी वैज्ञानिक का मत है कि - निद्रा सांकेतिक निवारण ( Conditional inhibition ) का परिणाम है । प्राणी के शरीर में कई सहज प्रत्यावर्तन क्रियाएँ ( Reflex action ) होती है यथा - अन्नदर्शन से लालास्राव । यदि कुत्ते को नियत समय पर घंटिका - वादन के साथ भोजन दिया जाय तो कुत्ता घंटिका - वादन का सम्बन्ध भोजन से जोड़ लेता है । जिससे कुछ समय बाद केवल घंटिका - वादन से ही लाला स्राव होने लगता है । यह कार्य जन्मोत्तर होने से तथा सांकेतिक होने से सांकेतिक प्रत्यावर्तन ( Conditioned reflexaction ) कहा जाता है । इसी प्रकार यदि कुत्ते को कोई दूसरा संकेत बताया जाय जिससे वह अन्न न मिलने का संकेत समझ ले और उस संकेत का प्रयोग अन्न के बाद किया जाय तो कुछ काल तक अन्न - दर्शन होने पर भी लाला स्राव रूप प्रत्यावर्तन का होना रुक जाय अर्थात् उसका निवारण हो जाय, यह निवारण का कार्य संकेत के अनुसार होता है अतः इसे सांकेतिक निवारण कहते हैं । प्रत्यावर्त्तन तथा निवारण दोनों कार्यं मस्तिष्क के धूसर वस्तु में होते हैं । प्रत्येक कार्य का स्थान भिन्न - भिन्न होता है । एक स्थान में निवारण का कार्य होने से यह अन्य स्थानों में भी विकिरण द्वारा फैलता । इस परीक्षण से डाक्टर पावलोव ने यह निष्कर्ष निकाला कि २७ च ० सं ०

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४१८ चरकसंहिता रात्रि के समय शय्या आदि निद्रा के अनुकूल संकेतों का निवारण - परिणाम मस्तिष्क के ऊपर पड़ता है । जिससे मनुष्य को स्वयमेव नींद आ जाती है । उपर्युक्त सभी मत - मतान्तरों को अपने - अपने स्थान पर उचित मान लेने पर भी निद्रा के कारण और प्रक्रिया का विशद ज्ञान उपलब्ध नहीं होता । निद्रा एक शरीर का स्वाभाविक धर्म है यह कहा जा चुका है । इससे शरीर के यंत्रों को अधिकाधिक विश्राम मिलता है । यह आयुर्वेद का सिद्धान्त आधुनिक खोजों से भी पुष्ट होता है । इसी से किसी ने कहा है कि - ' देहं विश्रमते यस्मात्तस्मान्निद्रा प्रकीर्तिता । देहवृत्तौ यथाहारस्तथा निद्रा समासतः ॥ ' अर्थात् इससे शरीर को सर्वाधिक विश्राम मिलता है । अतः इसे निद्रा कहते हैं । देह को धारण करने में जिस प्रकार आहार का स्थान है वही स्थान निद्रा का भी है । निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्यं बलाबलम् । वृषता क्लीबता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ निद्रा से लाभ और अनिद्रा से हानि - ' सुखपूर्वक निद्रा के आ जाने से शरीर में आरोग्य, शरीर का पोषण, बल की वृद्धि, शुक्र की वृद्धि, ज्ञानेन्द्रियों की उचित रूप में प्रवृत्ति और आयु नियत रूप से यथाकाल बनी रहती है । निद्रा के न आने पर शरीर में रोग, कृशता, बल की हानि, नपुंसकता, ज्ञानेन्द्रियों का अपने विषयों में उचित रूप से प्रवृत्त न होना और निद्रा के न आने से अनेक प्रकार के भयंकर रोग होने से मृत्यु की भी सम्भावना हो जाती है || ३६ || * अकालेऽतिप्रसङ्गाच्च न च निद्रा निषेविता । सुखायुषी पराकुर्यात् कालरात्रिरिवापरा ॥ और भी - यदि अकाल में अर्थात् विना समय के निद्रा का सेवन किया जाय या अधिक मात्रा में निद्रा का सेवन किया जाय या निद्राका सर्वथा परित्याग किया जाय तो मुख ( आरोग्य ) और ' आयु को दूसरी काल रात्रि की तरह निद्रा नष्ट कर देती है ॥ ३७ ॥

विमर्श - यहाँ अकाल - निद्रा- सेवन से निद्रा का मिथ्यायोग, अधिक मात्रा में निद्रा - सेवन से निद्रा का अनियोग और सर्वथा निद्रा परित्याग से निद्रा का हीनयोग का होना सूचित किया गया है । * सैव युक्ता पुनर्युङ्क्ते निद्रा देहं सुखायुषा । पुरुषं योगिनं सिद्ध्या सत्या बुद्धिरिवागता ॥ उचित निद्रा से लाभ - • यदि निद्रा का उचित समय पर सेवन किया जाय तो वह शरीर को सुख ( आरोग्य ) और आयु से युक्त करती है जिस प्रकार सत्या बुद्धि जब योगी पुरुष के पास आ जाती है तो उसे सिद्धि से युक्त करती है ॥ ३८ ॥

विमर्श - सत्यावुद्धि का वर्णन शारीर स्थान के प्रथम अध्याय में किया जायगा । सत्या-बुद्धि से तत्त्वज्ञान अर्थात् सत्यज्ञान समझा जाता है । यदि योग सिद्ध करने वाले पुरुषों के पास सत्यावुद्धि रहे तो सिद्धि अवश्य होती है । उसी प्रकार यदि निद्रा का सेवन उचित रूप में किया जाय तो आरोग्य और जीवन - चक्र सुखपूर्वक चलता रहता है । निद्रा के महत्त्व की सूचना पहले ' त्रय उपस्तम्भाः ' में आहार, स्वश, ब्रह्मचर्य बताकर दी गई है । गीताध्ययनमद्यस्त्रीकर्मभाराध्वकशिताः । अजीर्णिनः क्षताः क्षीणा वृद्धा वालास्तथाऽवलाः ॥ तृष्णातीसार शूलार्ताः श्वासिनो हिक्विनः कृशाः । पतिताभिहतोन्मत्ताः कान्ता यानप्रजागरैः ॥ क्रोधशोकभयक्कान्ता दिवास्वप्नोचिताश्च ये । सर्व एते दिवास्वप्नं सेवेरन् सार्वकालिकम् ॥ दिन में शयन करने के योग्य पुरुष जो व्यक्ति गीत, अध्ययन, मदिरापान, मैथुन, संशो-धन कर्म, भार ढोना और रास्ता चलना आदि कर्म से क्षीण हो गए हैं, अजीर्ण के रोगी, उरःक्षत के रोगी और जिनका शरीर धातुक्षय से क्षीण हो गया है, वृद्ध, बालक और स्त्री तथा प्यास, अतिसार एवं शूल रोग से पीड़ित, दमा के रोगी, हिचकी के रोगी, कृदा व्यक्ति, किसी ऊँचे स्थान

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अष्टौनिन्दितीयाध्यायः २१ ] सूत्रस्थानम् ४१६ से गिरे हुए व्यक्ति, अभिहत ( चोट खाए हुए व्यक्ति ), पागल, सवारी पर चलने से या रात्रि जागरण से थके हुए व्यक्ति, क्रोध, शोक, भय से पीडित व्यक्ति और जिन्हें दिन में शयन करने का अभ्यास हो गया है ऐसे व्यक्ति सभी ऋतुओं में दिन में शयन कर सकते हैं ॥ ३ ९ -४१ ॥ विमर्श - अजीर्ण के रोगियों को दिन में शयन कराना चाहिए ऐसा विधान है, पर दिवाशयन से कफ की भी वृद्धि बताई है, यथा- ' रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ॥ ' ( च.सू. २१,५० ) अतः कफ के बढ़ जाने से अग्नि विशेष रूप से मन्द हो जायगी तो अजीर्ण कैसे शान्त होगा? इस प्रश्न का समाधान ४२ वें श्लोक से किया गया है कि दिवाशयन से धातुओं में समता होती है जिससे सभी दोष अपने - अपने स्थान में चले जाते हैं ऐसी दशा में दोषों से अनाक्रान्त जाठर-अग्नि अन्न का पाचन कर देती हैं, यदि कफ की वृद्धि होती भी है तो अपने स्थान में, अतः उसका प्रभाव अग्नि पर नहीं पड़ता है इसीलिए किसी ने कहा भी है- ' अजीर्णस्य किमौषधम् ' इस प्रश्न का उत्तर- ' वमन, विरेचन, निद्रा, वारि ' बनाया है । अन्यत्र भी दिवाशयन के योग्य पुरुषों का उल्लेख किया गया है, यथा — ‘ व्यायामप्रमदाध्ववाहन रतान्कान्तानतीसारिणः, शूलश्वासवतस्तृषापरिगता-न्हिक्कामरुत्पीडितान् । श्रीणान्क्षीणकफान्शिशून्मदहतान्वृद्धावसाजीणिनो, रात्रौ जागरितान्नरान्निर-शनान्कामं दिवा स्वापयेत् ॥ ' तथा ' उचितो हि दिवास्वापो नित्यं येषां शरीरिणाम् । वातादयः प्रकुप्यन्ति तेषामस्वपनां दिवा ॥ ' ( यो. र. सद्वृत्त ) धातुसाम्यं तथा ह्येषां बलं चाप्युपजायते । श्लेष्मा पुष्णाति चाङ्गानि स्थैर्यं भवति चायुषः ॥ निद्रा से लाभ - उपरि निर्दिष्ट व्यक्तियों को दिन में शयन करने से धातुओं में सन्ना होती है, बल की वृद्धि होती है, कफ उनके अङ्गों को पुष्ट बनाता है और आयु स्थिर होती है || ४२ || ग्रीष्मे स्वादानरूक्षाणां वर्धमाने च मारुते । रात्रीणां चातिसङ्क्षेपादिवास्वप्नः प्रशस्यते ॥ ग्रीष्म ऋतु में दिन में शयन - ग्रीष्म ऋतु में आदान काल के कारण रूक्ष शरीर वाले मनुष्यों के शरीर में वायु के वढ़ जाने से तथा रात्रि के अत्यन्त छोटे होने के कारण दिन में शयन करना उत्तम होता है ॥ ४३ ॥

ग्रीष्मवर्ज्येषु कालेषु दिवास्वप्नात् प्रकुप्यतः । लेप्मपित्ते, दिवास्वप्रस्तस्मात्तेषु न शस्यते ॥ अन्य ऋतु में दिन में शयन से हानि - ग्रीष्म ऋतु को छोड़ कर अन्य ऋतुओं में दिन में शयन करने से कफ और पित्त का प्रकोप होता है, अतः ग्रीष्म से अतिरिक्त ऋतुओं में दिन में शयन नहीं करना चाहिए ॥ ४४ ॥

मेदस्विनः स्नेहनित्याः श्लेष्मलाः श्लेष्मरोगिणः । दूषीविषार्ताश्व दिवा न शयीरन् कदाचन ॥ सर्वथा दिवाशयन के अयोग्य पुरुष I जो व्यक्ति मेदस्वी अर्थात् अधिक मोट हैं, घृत - दुग्ध आदि स्नेह का सेवन प्रतिदिन पूर्ण रूप से करते हैं, कफ प्रकृति वाले हैं, कफजन्य रोग से पीडित हैं और जो दृषीविष से पीडित हैं उन्हें किसी भी ऋतु में या किसी भी अवस्था में दिन में शयन नहीं करना चाहिए ॥ ४५ ॥

विमर्श - वाग्भट ने विषार्त और कण्ठ के रोगियों को रात्रि में भी शयन करना मना किया है । यथा - ' विषार्तः कण्ठरोगी च नैव जातु निशास्त्रपि । ' ( वा. सू. अ. ७ ) । * हलीमकः शिरःशूलं स्तैमित्यं गुरुगात्रता । अङ्गमर्दोऽग्निनाशश्च प्रलेपो हृदयस्य च ॥४६ ॥

शोफारोचकहृल्लासपीनसार्धावभेदकाः । कोठारुः पिडकाः कण्डूस्तन्द्रा कासो गलामयाः ॥

स्मृतिबुद्धिप्रमोहश्च संरोधः स्रोतसां ज्वरः । इन्द्रियाणामसामर्थ्यं विषवेगप्रवर्तनम् ॥४८ ॥

१. ' कोठो s रुः पिडकाः ' इति पा. ।

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४२० चरकसंहिता

भवेनृणां दिवास्वप्नस्याहितस्य निषेवणात् ।

तस्माद्धिताहितं स्वप्नं बुद्ध्वा स्वप्यात् सुखं बुधः ॥ ४ ९ ॥

असमय काल में दिन में शयन से हानियाँ. I - हलीमक, शिरःशूल, स्तैमित्य ( गीले कपड़े से शरीर ढका हुआ प्रतीत होना ), शरीर का भारीपन, अंगों का टूटने के समान पीड़ित होना, अग्नि-मान्द्य, हृदय पर कुछ लेप कर दिया गया है इस तरह भारीपन की प्रतीनि होना, शोथ, भोजन में अरुचि, जी मिचलाना, पीनस, आधे शिर में वेदना, शरीर में चकत्ते, फुन्सियाँ, पिडकाएँ, कण्डू, तन्द्रा, कास, गले के रोग, स्मरणशक्ति एवं बुद्धि का नाश, स्रोतों में रुकावट, ज्वर, ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय में अपने - अपने विषयों को ग्रहण करने में असमर्थता, यदि मनुष्य विष का सेवन किया रहता हैं तो विष का वेग अधिक बढ़ जाता है । ये सब हानियाँ दिन में अनुचित शयन करने से मनुष्यों में उत्पन्न होती हैं । इस लिए विद्वान् व्यक्तियों को चाहिए कि हित और अहित शयन का विचार कर तब दिन में सुखपूर्वक शयन करें ॥ ४६-४९ ॥ विमर्श - ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर शेष ऋतुओं में दिन में शयन का सर्वथा निषेध किया गया है । यहाँ हित और अनि स्वप्न ( निद्रा ) का विचार कर शयन करने को बताया है । इसका तात्पर्य यह है कि रात्रि में जागरण भी अहित होता है अतः रात्रि का जागरण भी त्याग करने के योग्य होता है । क्योंकि रात्रि के जागरण से ये ही उपद्रव होते हैं जैसा कि सुश्रुत ने कहा है- ' रात्रावपि जागरितवतां वातपित्तनिमित्तास्त एवोपद्रवा भवन्ति । ' ( शा. अ. ४ ) इसका तात्पर्य यह है कि यदि कोई व्यक्ति विशेष परिस्थिति के कारण रात्रि में जागरण करता है और दिन में शयन करता - है तो उसके लिए यह विधान नहीं है क्योंकि अभ्यास के अनुसार दिन में शयन करना ही हितकर होता है । यथा - ' अकालशयनान्मोहज्वरस्तैमित्यपीनसाः । शिरोरुक्शोफहला सस्रोतोरो-धाग्निमन्दताः ॥ ' ( अ.हृ.सू. अ. ७ ) यहाँ अकाल का तात्पर्य, जिस व्यक्तिका जो समय शयन करने का नहीं है उसमें शयन करना है । इस प्रकार अभ्यास के अनुसार किसी भी समय में शयन करना हानिकर नहीं होता है पर अभ्यास के विरुद्ध समय में शयन करना हानिकारक होता है । जैसा कि - ' दिवा वा यदि वा रात्रौ निद्रा सात्म्यीकृता तु यैः । न तेषां स्वपतां दोषो जाग्रतां चोपजायते । ' ( यो र दिनचर्या ) रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा । अरुक्षमनभिप्यन्दि त्वासीनप्रचलायितम् ॥ जागरण तथा निद्रा के गुण - • अनुचित रात्रि जागरण से बात की वृद्धि हो जाती है जिससे शरीर रूक्ष हो जाता है । दिन में शयन से कफ की वृद्धि हो जाती है जिससे शरीर में स्निग्धता बढ़ जाती है और सामान्य रूप से बैठे हुए व्यक्ति में कुछ निद्रा का सेवन करना न कफ बढ़ाता है । और न वात बढ़ाता है इसलिए शरीर न रूक्ष होता है न स्निग्ध ॥ ५० ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि विष से पीड़ित और कण्ठ रोग से भी शयन का निषेध है पर यदि सर्वथा शयन न करें तो व्यक्तियों को बैठे - बैठे झपकी के रूप में निद्रा का सेवन व्यक्तियों को दिन में शयन सर्वथा निषिद्ध है यदि वे पीड़ित व्यक्तियों को रात्रि में शरीर में अधिक कष्ट होगा, अतः ऐसे कराया जा सकता है । इसी प्रकार जिन बैठे - बैठे झपकी के रूप में कुछ निद्रा का सेवन कर लेते है तो उन्हें भी हानियाँ नहीं होती है । ऋदेहवृत्तौ यथाऽऽहारस्तथा स्वप्नः सुखो मतः । स्वप्नाहारसमुत्थे च स्थौल्यकायै विशेषतः ॥ निद्रा का महत्त्व - शरीर धारण के लिए जिस प्रकार नियमपूर्वक सेवन किया गया आहार १. ‘ आसीनप्रचलायितमुपविष्टस्य किंचिन्निद्रासेवनम् ' चक्रः । ' आसीनप्रचलायितमुपविष्टस्य घूर्णनं ' वृणितं प्रचलायितम् ' इत्यमरः ' शिवदासः ।

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अष्टौनिन्दितीयाध्यायः २१ ] सूत्रस्थानम् ४२१ लाभकारी होता है और उसको आरोग्य बनाये रहता है, उसी प्रकार वह नियनपूर्वक राजन का सेवन करने से वह स्वस्थ एवं नही रहना है । शरीर की स्थूलना और कृशना विशेषकर निद्रा और आहारजन्य ही होती है ॥ ५१ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि अधिक मात्रा में निद्रा सेवन और अधिक भोजन से स्थूलता और निद्रा के अभाव और भोजन के अभाव से कृशता होती है । पर अहिनकर अधिक निद्रा या अधिक भोजन से शरीर में स्थूलता नहीं होती है । अतः यदि स्थूलता और कृशता लाने के लिए इनका सेवन किया जाय तो हितकर और अहितकर दोनों का विचार कर सेवन करना चाहिए । अभ्यङ्गोत्सादनं स्नानं ग्राम्यान्पौदका रसाः । शाल्यन्नं सदधि क्षीरं स्नेहो मद्यं मनःसुखम् ॥

मनसोऽनुगुणा गन्धाः शब्दाः संवाहनानि च । चतुषोस्तर्पणं लेपः शिरसो वदनस्य च ॥

स्वास्तीर्ण शयनं वेश्म सुखं कालस्तथोचितः । आनयन्त्य चिरान्निद्रां प्रनष्टा या निमित्ततः ॥ निद्रानाश ( Insomnia ) की चिकित्सा -- अभ्यंग, उत्सादन ( उबटन लगाना ) स्नान, ग्राम्य, आनूप और जलीय पशु - पक्षियों का मांसरस, धान का भात दही के साथ खाना, दूध, घृत, मदिरा आदि का सेवन, जो मन को सुख देनेवाला हो और मन के अनुकूल गन्ध एवं शब्दों का सुनना, संवाहन ( शरीर का दबवाना ), नेत्र का तर्पण, सिर और मुख पर शीतल द्रव्यों का लेप लगाना, सुन्दर, स्वच्छ, मन के अनुकूल बिस्तरा से युक्त खाट पर सोना, घर का सुन्दर होना और जिस व्यक्ति के लिए जो समय शयन करने के लिए अभ्यस्त हो उस समय पर जो निद्रा, किसी रोग या विशेष कारण से नष्ट हो गई हो वह शीघ्र ही आ जाती है ॥ ५२-५४ ॥ विमर्श - किसी कारणवशेष से जो निद्रा नहीं आती है वह उपर्युक्त उपायों से आ जाती है । निद्रा के द्वारा अरिष्ट का भी ज्ञान किया जाता है यथा - ' हीयतेऽसुक्षये निद्रा नित्या भवति वा न वा ॥ ' ( च ० इ ० अ ० १२ ) । अरिष्ट बिना कारण का होता है, अतएव तद्गत अनिद्रा या अति-निद्रा की चिकित्सा नहीं होती है, इसलिए किसी विशेष कारणजन्य अनिद्रा की चिकित्सा ऊपर बताई गई है । वाग्भट ने निद्रा लाने के लिए निम्न उपायों का वर्णन किया है - ' शोलयेन्मन्दनिद्रस्तु क्षोर-मद्यरसान् दधि । अभ्यङ्गोहनस्नानमूर्ध कर्णाक्षितर्पणम् । कान्ताबाहुलताश्लेषो निर्वृतिः कृतकृत्यता । मनोऽनुकूला विषयाः कामं निद्रासुखप्रदाः ॥ ब्रह्मचर्यरतेर्ग्राम्यसुखनिःस्पृहचेतसः । निद्रा सन्तोष-तृप्तस्य स्वं कालं नातिवर्तते ॥ ' ( वा ० सू ० अ ० ७ ) कायस्य शिरसश्चैव विरेकश्छर्दनं भयम् । चिन्ता क्रोधस्तथा धूमो व्यायामो रक्तमोक्षणम् ॥ उपवासोऽसुखा शय्या सत्त्वौदार्यं तमोजयः । निद्राप्रसङ्गमहितं वारयन्ति समुत्थितम् ॥ अनिद्रा का चिकित्सा - कायविरेचन, शिरोविरेचन ( नस्य ), वमन, भय, चिन्ता, क्रोध, धूम पीना, व्यायाम करना, रक्तमोक्षण, उपवास, शय्या का मनोनुकूल न होना, सुख गुण की प्रधानता होना, तमोगुण का नाश होना, ये शरीर के लिए अहितकारी अधिक रूप में आने वाली निद्रा को नष्ट करते हैं ॥ ५५-५६ ॥ विमर्श - किसी भी कारण से जब निद्रा अधिक आती है तो उपर्युक्त उपायों द्वारा उसे रोका जा सकता है । वाग्भट ने – ' योजयेदतिनिद्रायां तीक्ष्णं प्रच्छर्दनाञ्जनम् । नावनं लङ्घनं चिन्तां व्यवायं शोकभीक्रुधः ॥ ' ( वा ० सू ० अ ० ७ ) तथा सुश्रुत ने ऐसा कहा है- ' निद्रानियोगे वमनं हितं संशोधनानि च । लंघनं रक्तमोक्षश्च मनोव्याकुलनानि च ॥ ' ( सु ० शा ० ४ ) एत एव च विज्ञेया निद्रानाशस्य हेतवः । कार्य कालो विकारश्च प्रकृतिर्वायुरेव च ॥५७ ॥

निद्रानाश के कारण - ये ही ऊपर बताये हुए कारण निद्रानाश के भी हैं तथा कार्य ( किसी विशेष कार्य में लग जाने पर निद्रा नहीं आती है ), काल ( जो समय शयन के लिए अभ्यस्त