चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 511–520

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 511–520

पृष्ठ 511

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 511 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४२२ चरकसंहिता नहीं है उस समय में निद्रा नहीं आती है ), विकार ( रोग जैसे -- सन्निपातज्वर, उन्माद, रक्तचाप रोग आदि में निद्रा नहीं आती है ), प्रकृति ( वात एवं पित्त प्रकृति के मनुष्यों में निद्रा नहीं आती है ) तथा विकृत रूप में पित्त और वायु के बढ़ जाने से निद्रा नहीं आती हैं ॥ ५७ ॥

विमर्श - - यहाँ ' वायुरेव च ' में ' च ' से पित्त वृद्धि का भी ग्रहण किया जाता है । निद्रा को कफ और तमोगुण की वृद्धि से होना बताया है, यथा - ' निद्राश्लेष्म नमोभवा ' इसलिए वायु और पित्त की वृद्धि को निद्रानाश का कारण माना जाता है सुश्रुत ने - ' निद्रानाशोऽनिलात्पित्तान्मनस्तापात् क्षयादपि । संभवत्यभिघाताच्च प्रत्यनीकैः प्रशाम्यति ॥ ' ( सु ० शा ० ४ ) । इसका तात्पर्य यह है कि यदि ऊपर बताए हुए किसी भी कारण के वशीभूत मनुष्य होता है तो उचित समय पर आने वाली निद्रा भी उसे नहीं आती है जैसे अधिक निद्रा आने पर चिन्ता, शोक, क्रोव आदि उत्पन्न कर दिया जाय जो अति निद्रा का नाश हो जाता है । स्वाभाविक रूप से यदि चिन्ता, शोक, क्रोक आदि के वशीभूत मनुष्य हो जाय तो उचित समय पर आनेवाली निद्रा भी नहीं आती है ।

तमोभवा श्लेष्मसमुद्भवा च मनःशरीरश्रमसंभवा च ।

आगन्तुकी व्याध्यनुवर्तिनी च रात्रिस्वभावप्रभवा च निद्रा ॥ ५८ ॥

रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां भूतधात्रीं प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।

तमोभवामाहुरघस्य मूलं, शेषाः पुनर्व्याधिषु निर्दिशन्तिं ॥ ५ ९ ॥

निद्रा के भेद - ( १ ) तमोभवा, ( २ ) इलेष्मसमुद्भवा, ( ३ ) मनःशरीरश्रमसम्भवा, ( ४ ) आगन्तुकी, ( ५ ) व्याध्यनुवर्तिनी, ( ६ ) रात्रिस्वभावप्रनवा | इनमें रात्रिस्वभावप्रभवा निद्रा को विद्वान् लोग भूतधात्री कहते हैं और तमोभवा निद्रा को पाप का ( दुःख का ) मूल मानते हैं । शेष चार निद्रायें विभिन्न प्रकार के रोगों में होती हैं ॥ ५८-५९ ॥ विमर्श - ( १ ) शरीर में तमोगुण के प्रधान से जो निद्रा उत्पन्न होती है उसे तमोभवा कहते हैं प्रायः यह निद्रा मृत्यु के समय में आती हैं जिससे अरिष्ट की सूचना मिलती है । इसे ही तामसी निद्रा सुश्रुत ने माना है यथा- ' तत्र यदा संज्ञावहानि स्रोतांसि तमोभूविष्ठः श्लेष्मा प्रतिपद्यत ता तामसी नाम निद्रा सम्भवत्यनववोधिनी सा प्रलयकाले । ' ( सु ० शां ० अ ० ४ ) ( २ ) कफ की अधिकता से आनेवाली निद्रा का नाम इलेष्मसमुद्भवा है । ( ३ ) जब अधिक शारीरिक एवं मानसिक कार्य करने से मन और शरीर थक जाता है तो जो निद्रा आती है उसे मनः शरीरश्रमसम्भवा कहते हैं । कहा भी है- ' यदा तु मनसि कान्ते कर्मात्मानः कुमान्विताः । विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥ ' ( ४ ) आगन्तुकी - यह निद्रा विना किसी कारण के अरिष्ट रूप में आती है यद्यपि तमोभवा निद्रा भी अरिष्ट के रूप में आती हैं पर यह निद्रा सकारण है, इसमें तमोगुण की अधिकता होकर सारे स्रोत अवरुद्ध हो जाते हैं तब वह आती है, यही भिन्नता है । १. ' नमोभवा तमोगुणोद्रेकभवा, मनःशरीरश्रमसंभवा मनःशरीरयोः श्रमेण क्रियोपरमे सति नेन्द्रियाणि नच मनो विषयेषु प्रवर्तते ततश्च निद्रा भवति, आगन्तुकी रिष्टभूता, व्याध्यनुवर्तिनी सन्निपातज्वरादिकार्या, रात्रिस्वभावात्प्रभवतीति रात्रिस्वभावप्रभवा, दिवा प्रभवन्ती तु निद्रा तमः-प्रभृतिभ्यस्त्रिभ्य एव भवति ' चक्रः । २. भूतानि प्राणिनो दधातीति भूतधात्री, धात्रीव धात्री; अघस्य पापस्य मूलमिति कारणं, तनोगृहीतो हि सदा निद्रात्मकत्वेनानुष्ठेयं सद्वृत्तं न करोति, ततश्चाधर्मोत्पादः व्याधिपु शारीरव्या-धिषु ' चक्रः ।

पृष्ठ 512

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 512 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

लङ्घनबृंहणीयाध्यायः २२ ] सूत्रस्थानम् ४२३ ( ५ ) रोग के अनुसार - जैसे कफज रोगों में निद्रा अधिक रूप में आती है इसे व्याध्यनु-वर्तनी कहते हैं । ( ६ ) स्वस्थ मनुष्यों में जो स्वाभाविक रूप से रात्रि में निद्रा आती है उसे रात्रिस्वभावप्रभवा निद्रा कहते हैं । सुश्रुत ने निद्रा ( १ ) वैष्णवी ( २ ) वैकारिकी ( ३ ) तामसी निद्रा यह तीन भेद माना है । चरक के इन ६ भेदों को उपर्युक्त तीन में ही अन्तर्भाव किया जाता है । वैष्णवी निद्रा में रात्रिस्वभावप्रभवा का, तामसी में तमोभवा का और वैकारिकी निद्रा में शेष चार निद्राओं का अन्तर्भाव कर लिया जाता है । वृद्ध वाग्भट ने भी चरक के अनुसार ६ निद्राओं का ही वर्णन किया है यथा - ' कालस्वभावामयचित्तदेहखेदैः कफागन्तुतमोभवा च । निद्रा विभत्ति प्रथमा शरीरं पापा-त्मिका व्याधिनिमित्तमन्या ॥ ' ( अ ० सं ० सू ० अ ० ९ ) । तत्र श्लोकाः-निन्दिताः पुरुषास्तेषां यौ विशेषेण निन्दितौ । निन्दिते कारणं दोषास्तयोर्निन्दितभेषजम् ॥ येभ्यो यदा हिता निद्रा येभ्यश्चाप्यहिता यदा । अतिनिद्रायानिद्राय भेषजं यद्भवा च सा ॥ या या यथाप्रभावा च निद्रा तत् सर्वमन्त्रिजः । अष्टौनिन्दितसंख्याते व्याजहार पुनर्वसुः ॥ इत्यनिवेशने तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के अष्टौनिन्दितीय नामैकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥

अध्यायगत विषयों का उपसंहार - इस अष्टौनिन्दितीय अध्याय में आत्रेय पुनर्वसु ने निन्दित पुरुष, उनमें जो विशेषरूप से दो ( स्थूल, कृश ) निन्दित है, निन्दित होने में कारण, उनके दोप, उन दोनों निन्दित व्यक्तियों की चिकित्सा, जिन व्यक्तियों के लिए जब निद्रा हितकारिणी होती है और जिन व्यक्तियों के लिए अहितकारिणी होती है, अतिनिद्रा और अनिद्रा की चिकित्सा, यह अतिनिद्रा और अनिद्रा जिस कारण से उत्पन्न होती है भिन्न - भिन्न प्रभाव वाली उन - उन निद्राओं का वर्णन किया है ॥ ६०-६२ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में योजना चतुष्क-विषयक अष्टौनिन्दतीय नामक इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ २१ ॥ अथ द्वाविंशतितमोऽध्यायः अथातो लङ्घनवृंहणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद लङ्घनबृंहणीय अध्याय की व्याख्या की जायगी, जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - पूर्व अध्याय में निन्दित अतिस्थूल, अतिकृश व्यक्तियों का उल्लेख किया जा चुका है, इनकी चिकित्सा क्रमशः लङ्घन और बृंहण के द्वारा की जाती है अतः उसका वर्णन करने के लिए यह अध्याय प्रारम्भ किया जाता है । १. ' अतिनिद्रा निद्रयोश्च ' इति पा. । २. ' ५ था यत्प्रभवा ' ग. ।

पृष्ठ 513

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 513 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४२४ १. ' जानीयात् स भवेद्भिषकू ' ग. । ३. ' किं त ' ग. । ५. ' तिवृत्तानाम् ' ग. । चरकसंहिता २. ' शिष्या ऊचुः ' यो. । ४. ' स्नेहनम् ' इति पा. । ६. ' गुरुरुवाच ' यो । ७. ' विष्यन्दो विलयनम् ' चक्रः । तपःस्वाध्यायनिरतानात्रेयः शिष्यसत्तमान् । पडग्निवेशप्रमुखानुक्तवान् परिचोदयन् ॥ ३ ॥

लङ्घनं बृंहणं काले रूक्षणं स्नेहनं तथा । स्वेदनं स्तम्भनं चैव जानीते यः स वै भिषक् ॥ ४ ॥

छः प्रकार की चिकित्सा - तपस्या और स्वाध्याय में लगे हुए अग्निवेश प्रधान है जिस शिष्य - मण्डली में, ऐसे उत्तम ६ शिष्यों को शिक्षा देने हुए ( आचार्य पुनर्वसु ने ) कहा कि, लङ्घन, बृंहण, रूक्षण, स्नेहन, स्वेदन, और स्तम्भन औषधियों का उचित रूप से प्रयोग करना जो जानता है उसे ही वैद्य कहा जाता है ॥ ३-४ ॥ तेमुक्तवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच ह । भगवंल्लङ्घनं किंस्विल्लङ्घनीयाश्च कीदृशाः ॥ ५ ॥

बृंहणं बृंहणीयाश्च रूक्षणीयाश्च रूक्षणम् । के स्नेहाः स्नेहनीयाश्च स्वेदाः स्वेद्याश्च के मताः ॥६ ॥

स्तम्भनं स्तम्भनीयाश्च वक्तुमर्हसि तद्गुरो । लङ्घनप्रभृतीनां च पण्णामेषां समासतः ॥७ ॥

कृताकृतातिवृत्तानां लक्षणं वक्तुमर्हसि । तदग्निवेशस्य वँचो निशम्य गुरुरब्रवीत् ॥ ८ ॥

अग्निवेश के प्रश्न – लङ्घन, बृहण आदि ६ विषयों को जो जानना है उसे ही वैद्य कहा जाता है ऐसा भगवान् आत्रेय के कहने पर उनसे अग्निवेश ने पूछा कि हे भगवन्! ( १ ) लङ्घन किसे कहते हैं, ( २ ) लङ्घन के योग्य कौन पुरुष होता है, ( ३ ) बृंहण किसे कहते हैं, ( ४ ) बृंहण के योग्य कौन पुरुष होता है, ( ५ ) रूक्षण किसे कहते हैं, ( ६ ) रूक्षण के योग्य कौन पुरुष होता है, ( ७ ) स्नेहन किसे कहते हैं, ( ८ ) स्नेहन के योग्य कौन पुरुष होना है, ( ९ ) स्वेद किसे कहते हैं, ( १० ) स्वेद के योग्य कौन पुरुष होता है, ( ११ ) स्तम्भन किसे कहते हैं, ( १२ ) स्तम्भन के योग्य कौन पुरुष होता है । हे गुरु इन प्रश्नों का उत्तर आप मुझे बताने के योग्य हैं अर्थात् बतावें । लङ्घन आदि ६ विषयों को संक्षेप में कृत ( सम्यक् कृत ), अकृत ( इनका अयोग ), अतिवृत्त ( इनका अतियोग ) का लक्षण भी कहने योग्य हैं । अर्थात् इन छहों के समयोग, अयोग और अतियोग का लक्षण संक्षेप में बतावें ॥ ५-८ ॥ * यत्किचिल्लाघवकरं देहे तल्लङ्घनं स्मृतम् । बृहत्त्वं यच्छरीरस्य जनयेत्तच्च बृंहणम् ॥ ९ ॥

रौक्ष्यं खरत्वं वैशद्यं यत् कुर्यात्तद्वि रूक्षणम् । स्नेहनं स्नेहविष्यन्दमार्दवक्केदकारकम् ॥ १० ॥

स्तम्भगौरवशीतघ्नं स्वेदनं स्वेदकारकम् । स्तम्भनं स्तम्भयति यद्वतिमन्तं चलं ध्रुवम् ॥१५ ॥

आत्रेय के उत्तर - अग्निवेश के इन वचनों को सुनकर गुरु ने कहा - ( १ ) लङ्घन का लक्षण -- देह में लाघव ( हल्कापन ) उत्पन्न करने वाला जो द्रव्य या उपाय होता है उसे लङ्घन कहते हैं । ( २ ) वृंण का लक्षण -- शरीर में जो द्रव्य या उपाय स्थूलना उत्पन्न करता है उसे बृंहग कहते हैं । ( ३ ) रूक्षण का लक्षण - जो द्रव्य या उपाय शरीर में रूखापन, खुरदरापन और विशवपन उत्पन्न करना है उसे रुक्षण कहते हैं । ( ४ ) स्नेहन का लक्षण - जो द्रव्य विष्यन्दना, मृदुता और क्लेद उत्पन्न करना है उसे स्नेहन कहते हैं । ( ५ ) स्वेदन का लक्षण - जो द्रव्य या उपाय शरीर की जकड़ाहट, भारीपन और शीत को नष्ट करता है तथा पसीना को बाहर निकालना है उसे स्वेदन कहते हैं । ( ६ ) स्तम्भन का लक्षण - जो द्रव्य या उपाय गतिशील एवं चल द्रव्यों को निश्चित रूप से रोकता है उसे स्तम्भन कहते है ॥ ९ -११ ॥ विमर्श - यहाँ ६ चिकित्सा सूत्रों का वर्णन किया गया है चिकित्सा इन्हीं के अन्दर आ जाती हैं । वाग्भट ने इन्हें दो के अन्दर किया है पहली चिकित्सा संतर्पण, इसके अन्दर बृंहण, स्नेहन और स्तम्भन को रखा है । दूसरी चिकित्मा अपतर्पण, इसके अन्दर लंघन, रूक्षण और

पृष्ठ 514

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 514 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

लङ्घन बृंहणीयाध्यायः २२ ] सूत्रस्थानम् ४२५ स्वेदन को रखा है । बृंहण - ' वृंदणं यद् वृहत्त्वाय ' जिससे शरीर की वृद्धि हो उसे वृंहण कहते है या सामान्यतः दोष, धातु और मलों की जिससे वृद्धि होती है उसे बृंहण कहा जाता है । स्नेहन-जिससे शरीर में या दोष, धातु एवं मलों में स्निग्धता उत्पन्न हो उसे स्नेहन कहते हैं । स्तम्भन — जिससे शरीर, दोष, धातु और मलों में रुकावट हो उसे स्तम्भन कहते हैं । इन तीनों से हो वृद्धि की सम्भावना है और जब तक शरीर आदि तृप्त नहीं होते है तब तक उनमें वृद्धि की सम्भावना नहीं होती है । लंघन --- ' लङ्घनं लाघवाय यत् ' जिससे शरीर, दोष, धातु एवं मलों में लघुता उत्पन्न हो उसे लंघन कहते हैं । रूक्षण - जिससे शरीर आदि में रूक्षता उत्पन्न होती है उसे रूक्षण कहते हैं । स्वेदन - जो पसीना को निकालता है और शरीर को हलका करता है उसे स्वेदन कहते हैं । स्वेदन द्रव्य प्रायः उष्णवीर्य होता है । अतएव वह शीत का नाश करता है । यह तीनों क्रियायें अपतर्पण से ही सम्बन्ध रखती हैं । इसलिये तीनों को अपतर्पण में माना है । यथा - ' उपक्रमस्य हि द्वित्वाद् द्विधैवोपक्रमो मतः । एकः सन्तर्पणस्तत्र द्वितीयश्चापतर्पणः ॥ बृंहणो लङ्घनश्चेति तत्पर्याया-वुदाहृतौ । बृंहणं यद् बृहत्त्वाय लङ्घनं लाघवाय यत् ॥ देहस्य भवतः प्रायो भौमापमितरच्च ते । स्नेहनं रूक्षणं कर्म स्वेदनं स्तम्भनं च यत् ॥ भूतानां तदपि द्वैध्याद् द्वितयं नातिवर्तते । ' ( अ.हृ. सू.अ. १४ ) यद्यपि तर्पण से सभी की वृद्धि होती है जैसा कि – ' प्रायोवृद्धितिर्पणात्, वायोरन्यत्र सज्जांस्तु तैरेवोत्क्रमयोजितैः । ' ( अ. हृ. सू. अ. ११ ) अर्थात् सभी की वृद्धि तर्पण से होती है पर वायु की वृद्धि तर्पण से नहीं होती किन्तु अपतर्पण से होती है और वायु का क्षय तर्पण से होता है । यद्यपि अन्य दोषों से वायु की वृद्धि और क्षत्र में विपरीतता है फिर भी संतर्पण और अपतर्पण इन दोनों चिकित्साओं से भिन्न चिकित्सा नहीं की जाती है । अतः चरक के इन ६ चिकित्साओं को वाग्भट ने दो चिकित्सा में ही अन्तर्भाव कर लिया है ।

* लघुष्णतीक्ष्ण विशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं सरम् ।

कठिनं चैव यद्द्द्रव्यं प्रायस्तल्लङ्घनं स्मृतम् ॥ १२ ॥

( १ ) लंघन के द्रव्य - जो द्रव्य लघु, उष्ण, तीक्ष्ण, विशद, रूक्ष, सूक्ष्म, खर, सर और कठिन गुणयुक्त होते है वे प्रायः लंघन करने वाले होते है ॥ १२ ॥

विमर्श - यहाँ प्रायः शब्द का उल्लेख किया गया है । इसका तात्पर्य यह है कि कुछ द्रव्य इन गुणा सयुक्त होने पर भी लङ्घन नहीं करते हैं जैसे पिपली, भिलावा, ये उष्ण होते हुये भी रसायन और बृंहण है ।

* गुरु शीतं मृदु स्निग्धं बहलं स्थूलपिच्छिलम् ।

प्रायो मन्दं स्थिरं लचणं द्रव्यं बृंहणमुच्यते ॥ १३ ॥

( २ ) बृंहण के द्रव्य - प्रायः जो द्रव्य गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, बहल, स्थूल, पिच्छिल, मंद, ( स्थर और श्लक्ष्ण गुणयुक्त होते हैं व बृंहण कहें जाते है ॥ १३ ॥

विमर्श - यहाँ भी प्रायः शब्द का उल्लेख है और पप्पली, मिलावा उष्णवीर्य होते हुये बृहंण, प्रियंगु, सावा आदि शीतल होते हुये शरीर को कृश अर्थात् लङ्घन करते है इसलिये यहाँ भी प्रायः कहा गया है ।

* रूक्षं लघु खरं तीच्णमुष्णं स्थिरमपिच्छिलम् ।

प्रायशः कठिनं चैव यद् द्रव्यं तद्धि रूक्षणम् ॥ ९ ४ ॥

( ३ ) रूक्षण के द्रव्य - प्रायः जो द्रव्य रूक्ष, लघु, खर, तीक्ष्ण, उष्ण, स्थिर अपिच्छिल ( विशद ) और कठिन गुण युक्त होते हैं वे रूक्षण करने वाले होते हैं ॥ १४ ॥

पृष्ठ 515

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 515 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४२६ चरकसंहिता

* द्रवं सूक्ष्मं सरं स्निग्धं पिच्छिलं गुरु शीतलम् ।

प्रायो मन्दं मृदु च यद्द्द्रव्यं तत् स्नेहनं मतम् ॥ १५ ॥

( ४ ) स्नेहन के द्रव्य - प्रायः जो द्रव्य द्रव, सूक्ष्म, सर, स्निग्ध, पिच्छिल गुरु, शीतल, मन्द और मृदु गुणयुक्त होते हैं वे स्नेहन करने वाले होते हैं ॥ १५ ॥

उष्णं तीक्ष्णं सरं स्निग्धं रूक्षं सूक्ष्मंद्रवं स्थिरम् ।

द्रव्यं गुरु च यत् प्रायस्तद्धि स्वेदनमुच्यते ॥ १६ ॥

( ५ ) स्वेदन के द्रव्य - प्रायः जो द्रव्य उष्ण, तीक्ष्ण, सर, स्निग्ध, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव, स्थिर और गुरु गुण विशिष्ट होते हैं वे स्वेदन कार्य करते हैं ॥ १६ ॥

शीतं मन्दं मृदु लचणं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।

द्रव्यं लघु चोद्दिष्टं प्रायस्तत् स्तम्भनं स्मृतम् ॥ १७ ॥

( ६ ) स्तम्भन के द्रव्य - प्रायः जो द्रव्य शीत, मन्द, मृदु, लक्षण, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव, स्थिर और लघु गुण युक्त होते हैं वे स्तम्भन करते हैं ॥ १७ ॥

विमर्श - उपर्युक्त चिकित्सा के ६ भेदों का गुणविषयक कोष्ठक निम्न रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है । लङ्घन बृंहण रूक्षण स्नेहन स्वेदन स्तम्भन लघु गुरु लघु गुरु गुरु लघु उष्ण शीन उष्ण शीत उष्ण शीत तीक्ष्ण मृदु तीक्ष्ण नृदु तीक्ष्ग मृदु X X X द्रव द्रव द्रव विशद पिच्छिल विशद पिच्छिल X X बहल X I x X X X स्क्ष स्निग्ध रूक्ष स्निग्ध रूक्ष -स्निग्ध रूक्ष X मन्द X मन्द X मन्द सूक्ष्म स्थूल X सूक्ष्म सूक्ष्म सूक्ष्म सर लक्ष्म खर् X X लक्ष्ण सर स्थिर स्थिर मर् स्थिर सर स्थिर कठिन X कठिन X X x इस कोष्ठक के द्वारा यह बताया गया है कि ये गुण जिस द्रश्य में पाये जाते हैं वह द्रव्य, लङ्घन आदि कार्य करते है तथा इस कोष्ठक से चिकित्सा के ६ भेदों की परस्पर समानता और भिन्नता का भी ज्ञान हो जाता है । वाग्भट के सन्तर्पण ( बृंहण ) में हो चरक के स्नेहन और स्तम्भन का अन्तर्भाव हो जाता है क्योंकि बृंहण के गुणों से उपर्युक्त दोनों की समानता है । १. ' स्थूलम् ' यो ।

पृष्ठ 516

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 516 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

लङ्घनबृंहणीयाध्यायः २२ ] सूत्रस्थानम् बृंहण स्नेहन गुरु गुरु शीत शीत मृदु मृदु पिच्छिल पिच्छिल स्निग्ध स्निग्ध मन्द मन्द X स्थूल X लक्षण स्थिर X से स्तम्भन की समानता ५ अंशों में है । रूक्षण लङ्घन लघु लघु उष्ण उष्ण नोक्ष्ण तीक्ष्ण विशद विशद X रूक्ष X सूक्ष्म X सर कठिन कठिन ॐ चतुष्प्रकारा संशुद्धिः पिपासा मारुतातपौ । २. ' पिपासेति पिपासानिग्रहः ' चक्रः । ४२७ स्तम्भन X शीत मृदु X X मन्द x लक्ष्म स्थिर स्वेदन X उष्ण तीक्ष्ण X रूक्ष सूक्ष्म सर X उपर्युक्त कोष्ठक से समझाया गया है कि वृहंग से स्नेहन की समानता ६ अंशों में है तथा बृंहण इन कोष्ठक से यह स्पष्ट है कि लङ्घन से रूक्षय की समानता ५ अंशों में, और स्वेदन की समानता भी पांच अंशों में है । अत: अधिक समानता को देखकर वाग्भट ने सन्तर्पण ( बृंहण ) और

अपतर्पण ( लड्डून ) यह दो ही चिकित्सा के प्रकार माने हैं ।

पाचनान्युपवासश्व व्यायामश्चेति लङ्घनम् ॥ १८ ॥

लङ्घन के दश प्रकार - ( १ ) वमन, ( २ ) विरेचन, ( ३ ) शिरोविरेवन ( नस्य ), ( ४ ) निरूह वस्ति, ये चार संशोधन, ( ५ ) पिपासा ( ६ ) वायु का सेवन, ( ७ ) धूप का सेवन ( ८ ) पाचन औषध द्रव्यों का प्रयोग, ( ९ ) उपवास, ( १० ) व्यायाम ये दश प्रकार के लङ्घन होते हैं ॥ १८ ॥

विमर्श -- यहाँ दस प्रकार के लड्डूनों का वर्णन किया गया है इनके सेवन से शरीर में लघुता १. ' चतुष्प्रकारा संशुद्धिरिति अनुवासनं वर्जयित्वा तस्य बृंहणत्वात् ' चक्रः ।

पृष्ठ 517

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 517 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४२८ चरकसंहिता उत्पन्न होती है इन दश में पाँच - १. दमन, २. विरेचन, ३. नस्य, ४. निरूहवस्ति और ५. पाचन ये द्रव्य स्वरूप लङ्घन है । अर्थात् इसमें द्रव्यों का प्रयोग किया जाना है और १. प्यास को रोकना, २. हवा, २. धूप का सेवन, ४. भूख को रोकना, ५. श्रम करना ये पांच अद्रव्य रूप लङ्घन हुँ । वाग्भटने लङ्घन के दो भेद किये है- १. शोधन, २. शमन । शोधन में रक्तमोक्षण और वमन, विरे-चन, नस्य, निरूह को लिया है और दामन में पाचन, दीपन, भूख, प्यास, व्यायाम, धूप और हवा का सेवन बताया है, यथा- ' शोधनं शमनं चेति द्विधा तत्रापि लङ्घनन् । यदीरयेद्वहिर्दोषान् पञ्चधा शोधनं च तत् ॥ निरूहो वमनं कायझिरोरेकोऽस्रवित्र तिः ॥ न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीरयत्यपि । समीकरोति विषमाञ् शमनं तच्च सप्तथा ॥ पाचनं दीपनं क्षुत्तृव्यायामातपमारुताः ॥ ' ( अ.हृ. वा. सू. अ. १४ ) । शुद्धि में अनुवासन को नहीं माना है क्योंकि उससे वल की वृद्धि होती है । मुख्य रूप से शोधन और पाचन यह लङ्घन का भेद चरक ने भी माना है यह बात आगे के श्लोक से स्पष्ट हो जाती है ।

प्रभूतश्लेष्मपित्तास्रमलाः संसृष्टमारुताः ।

बृहच्छरीरा बलिनो लङ्घनीया विशुद्धिभिः ॥ १ ९ ॥

शोधन से लङ्घनीय पुरुष - जिस व्यक्ति के शरीर में कफ, पित्त, रक्त और मल अधिक मात्रा में हो तथा जिनके शरीर में कफ, पित्त, रक्त और मल वायु से युक्त हो, जिनका शरीर बड़ा हो और बलवान् हो उसे संशोधन के द्वारा लङ्घन कराना चाहिये ॥ १ ९ ॥ विमर्श - केवल वात विकार में लङ्घन नहीं किया जाता है इसी लिये यहाँ अन्य द्रोत्रों से युक्त वायु के होने पर टङ्घन का विधान किया गया है । यद्यपि शोधन में निरूहवस्ति वातशामक होती है फिर भी रूक्ष होने के कारण यदि उसका अधिक प्रयोग किया जाय तो वातवर्धक होती है इसलिये केवल वात में सर्वथा शोधन के द्वारा लङ्घन करना मना किया गया है

येषां मध्यबला रोगाः कफपित्तसमुत्थिताः ।

वम्यतीसारहृद्रोगविसूच्यलसकज्वराः ॥ २० ॥

विबन्धगौरवोद्गारहल्लासारोचकादयः ।

पाचनैस्तान् भिषक् प्राज्ञः प्रायेणादावुपाचरेत् ॥२१ ॥

पाचन के द्वारा लंघनीय पुरुष - जिस पुरुष के शरीर में कफ एवं पित्त के द्वारा उत्पन्न रोग मध्य बल वाले हों; वमन, अतिसार, हृदयरोग विसूचिका, अलसक तथा ज्वर से जो मनुष्य युक्त हों और जिन्हें विबन्ध का रोग हो, शरीर में गुरुना हो, डकार अधिक आता हो, जी मचलाता हो, अगेचक आदि से पीड़ित हों तो उन व्यक्तियों को सर्वप्रथम विद्वान् वैद्यों के द्वारा प्रायः पाचन द्वारा लंघन कराना चाहिये ॥ २०-२१ ॥ विमर्श – यहाँ ' आदौ उपाचरेत् ' का तात्पर्य यह है कि वनन आदि रोगों में दोषों का पाचन हो जाने पर संशमन चिकित्सा की जाती है अतः आदि में अर्थात् निरामावस्था में पाचन द्वारा लङ्घन करना चाहिए तथा यहाँ प्रायः का तात्पर्य यह है कि कभी - कभी केवल पाचन द्वारा लंघन कराने से रोग नहीं भी शान्त होते हैं । अतः अन्य लंघन का भी आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिये । अथवा पाचन औषधि और लंघन ( उपवास ) के द्वारा लंघन कराना चाहिये । जैसा कि —— लंघनपाचने तु मध्यबलदोषाणां लंघनपाचनाभ्यां हि सूर्यसंताप मारुताभ्यां पांशुभस्माव किरणैरिव चानतिवहूदकं मध्यबलो दोषः प्रशोषमापद्यते ' ( वि. अ. ३ ) । यहाँ ' मध्यबला रोगाः ' इस पत्र का वमन, अतिसार आदि सभी के साथ संयोग किया जाता है अर्थात् सामान्यतः ये रोग

पृष्ठ 518

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 518 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

लङ्घनबृंहणीयाध्यायः २२ ] सूत्रस्थानम् ४२६ यदि मध्यबल के हों तो उन्हें पाचन द्वारा लंघन कराना चाहिये । विमान स्थान में लंघन का उप-वास अर्थ है यहाँ लंघन का ' लंघनं लाघवाय यत् ' जो शरीर को हल्का करने वाला हो उसे लंघन माना गया है ।

एत एव यथोद्दिष्टा येषामल्पबला गदाः ।

पिपासानिग्रहैस्तेषामुपवासँश्च ताञ्जयेत् ॥ २२ ॥

उपर्युक्त में त्रिशेषता - जिन पुरुषों के शरीर में ऊपर बताये हुए ये ही रोग अल्प बलवान् ( अर्थात् दुर्बल हों ) तो उन रोगों को पिपासा रोक कर और उपवास कराकर जीतना चाहिए ॥२२ ॥

रोगीञ्जयेन्मध्यबलान् व्यायामातपमारुतैः ।

बलिनां किं पुनर्येषां रोगाणामेवरं बलम् ॥ २३ ॥

शेष उपायों से लंघनीय पुरुष - वलवान् व्यक्तियों के शरीर में यदि कोई भी रोग मध्यबल वाले हो जाँय तो व्यायाम, तीव्र धूप और तीव्र वायु का सेवन कराकर जीतना चाहिए । यदि बलवान् व्यक्तियों में अल्पवल वाले रोग हो जाँय तो वे व्यायाम आदि लङ्घन के द्वारा सुख-पूर्वक जाने जा सकते है ॥ २३ ॥

विमर्श - मध्यबल रोग जो कफ, पित्त से उत्पन्न वमन आदि हैं उनमें पाचन और उपवास का विधान २० - २२ श्लोक बनाया है । यहाँ समान्यतः सभी प्रकार के मध्यवल रोगों में व्यायाम धूप, वात द्वारा शरीर में लघुता उत्पन्न कर उन्हें नष्ट कर देने का आदेश दिया है । इससे यह भी स्पष्ट है कि दुर्बल रोग तो व्यायामादि से शीघ्र ही नष्ट होते हैं । पर ये व्यायामादि बलवान व्यक्तियों में ही कराये जाते है । २०-२२ लोक का विषय मध्यवल या दुर्बल रोगियों के लिए है । वाग्भट नेभी इसका निर्देश इसी रूप में किया है, यथा- ' तत्र संशोधनैः स्थौल्यबलपित्तकफाधिकान् । आम-दोषज्वरच्छदिरतीसारहृदामयैः ॥ विबन्धगौरवोद्गारहृल्लासादिभिरातुरान् । मध्यस्थौल्यादिकान् प्रायः पूर्वं पाचनदीपनैः ॥ एभिरेवामयैरार्तान् हीनस्थौल्यबलादिकान् । क्षुत्तृष्णानिग्रहैर्दोषैस्त्वार्तान् मध्य-बलैर्दृढान् ॥ समीरणातपायासैः किमुताल्पबलैर्नरान् । ' ( अ. हृ. सू. अ. १४ ) ।

त्वग्दोषिणां प्रेमीढानां स्निग्धाभिष्यन्दिवृंहिणाम् ।

शिशिरे लङ्घनं शस्तमपि वातविकारिणाम् ॥ २४ ॥

लंघन का काल ( ऋतु ) 1- त्वचा के रोगी, प्रमेह के रोगी, अतिस्निग्ध व्यक्ति, अभिष्यन्दी पुरुष जिनके शरीर के स्रोतों में कफ भरा हो । स्थूल व्यक्ति और वार्तानि कार से पीडित पुरुष को भी शिशिर ऋतु में दश प्रकार के बताए गए लङ्घन का प्रयोग करना चाहिए ॥ २४ ॥

विमर्श - सामान्यतः सभी ऋतुओं में उपर्युक्त रोगों में दशविध लङ्घन कराया जाता है, वातज रोगों में लङ्घन का सर्वथा निषेध किया गया है क्योंकि दशविध लङ्घन से बात की वृद्धि होती है ' बताया भी है- ' कफपित्ते द्रवे धातू सहते लङ्घनं बहु । आमक्षयादूर्ध्वमपि वायुर्न सहते क्षणम् ॥ ' ( भा. प्र. ज्वर. चि. ) अर्थात् पित्त और कफ ये दोनों द्रव स्वरूप है इसलिये लङ्घन को अधिक रूप में सहन करते हैं पर वायु लंघन को बिलकुल नहीं सहता है । यदि वायु में आम - दोष का सम्बन्ध रहे तो कुछ अंश में अर्थात् आम- पाचन होने तक लङ्घन को सहन करता है । शिशिर ऋतु में स्वाभाविक रूप से धातुओं की वृद्धि विसर्ग काल होने से होती रहती है । १. ‘ दोपान् ’ यो.। २. ' दोषाणामवरम् ' यो. । ३. ‘ प्रमीढानाम् ' ग. 1 प्रमीढानां प्रमेहिणाम् ।

पृष्ठ 519

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 519 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४३० चरकसंहिता वृद्धि में कफ का सम्बन्ध रहता है यदि उस समय वातज रोगों में या वात प्रकृति के मनुष्यों में लङ्घन कराया जाय तो हानि नहीं होती है । इसी बात की सूचना देने के लिये ' अपि ' शब्द का प्रयोग किया गया है । वाग्भट ने भी इसी बात का समर्थन किया है । यथा - ' मेहामदोषातिस्निग्ध ज्वरो रुस्तम्भकुष्ठिनः । विसर्पविद्रधिप्लीहशिरः कण्ठाक्षिरोगिणः ॥ स्थूलांश्च लंघयेन्नित्यं शिशिरे त्वपरानपि । ' ( सु. अ १४ ) यहाँ शिशिर से हेमन्त काल का ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि हेमन्त और शिशिर दोनों ऋतुयें समान रूप से मानी जाती हैं ।

अदिग्धविद्धमेक्किष्टं वयःस्थं सात्म्यचारिणाम् ।

मृगमत्स्यविहङ्गानां मांसं बृंहणमुच्यते ॥ २५ ॥

बृंहण द्रत्य - सात्म्य देश में चलने - फिरने वाले मृग ( पंशु ), मछली और पक्षियों का विषैलेशस्त्र से नहीं बेधा हुआ, रोग रहित और युवावस्था का मांस बृंहण कहा जाता है || २५ || विमर्श - बृंहण का अर्थ बढ़ाना होता है ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ' के अनुसार यदि शरीर में मांस की वृद्धि करनी हो अथवा मांसादि, धातुओं की वृद्धि करनी हो तो मांस का उपयोग करना चाहिये । क्योंकि शरीर के मांस से और पशु - पक्षियों के मांस का सामान्य है कहा भी है- ' नहि मांससमं किञ्चिदन्यदेह बृहत्त्वकृत् ॥ ' ( अ. हृ. सू. अ. १४ ) ।

क्षीणाः क्षताः कृशा वृद्धा दुर्बला नित्यमध्वगाः ।

स्त्रीमद्यनित्या ग्रीष्मे च बृंहणीया नराः स्मृताः ॥ २६ ॥

बृंहण के योग्य पुरुष -- जो पुरुष क्षीण, क्षत, कृश, वृद्ध, दुर्बल, नित्य रास्ता चलने वाले सर्वदा मैथुन करने वाले, नित्य मद्य पान करने वाले हैं उनको सदा और ग्रीम ऋतु में सभी को बृंहण कराना चाहिये ॥ २६ ॥

विमर्श - यहाँ सामान्यतः बृंहण करने योग्य पुरुषों का वर्णन किया गया है पर ग्रीष्म ऋतु में सामान्यतः सभी स्वस्थ पुरुषों के लिये बृंहण करना आवश्यक होता है । क्योंकि स्वाभाविक रूप से उस समय बल का हास होता है और काल भी आदानकाल रहता है - ' जैसा कि वाग्भट में बताया गया है - ' बृंहयेद्वयाधिभैषज्यमद्यस्त्रीशोककर्शितान् । भाराध्वोरःक्षतक्षीण-रूक्षदुर्बलवातलान् ॥ गर्भिणीसूतिकाबालवृद्धान् ग्रीष्मेऽपरानपि । ' ( सू ० अ ० १४ )

शोपाशग्रहणदोषैर्व्याधिभिः कर्शिताश्च ये ।

तेषां क्रव्यादमांसानां बृंहणा लघवो रसाः ॥ २७ ॥

मांसरस द्वारा बृंहण करने योग्य पुरुष - जो व्यक्ति शोष, अर्श, ग्रहणी रोग से या अन्य किसी भी रोग से कृश हो गये हों उन्हें कच्चे मांस खानेवाले पशु - पक्षियों के लघु मांसरस से बृंहण कराना चाहिये ॥ २७ ॥

विमर्श - शोष में मांस का प्रयोग अधिक किया जाता है इसी प्रकार जो व्यक्ति अधिक दुर्बल हो गये होते हैं उन्हें मांस या मांसरस ही पुष्ट करता है । यथा - ' मांसमेवाश्नतः शोषो माध्वीकं पिवनोऽपि च । अविधारितवेगस्य यक्ष्मा न लभतेऽन्तरम् ॥ शुष्यतां क्षीगमांसानां कल्पि तानि विधानवित् । दद्यान्मांसादमांसानि बृंहणानि विशेषतः ॥ ' ( च ० चि ० अ ० ८ ) १. ' अदिग्धवि विषाक्तशस्त्राविद्धम् ' चक्रः । २. अक्लिष्टं रोगानुपहतप्राणिमांसम् । ३. ' सात्म्ये देशे चरन्तीति सात्म्यचारिणः तेषाम् ' चक्रः ।

पृष्ठ 520

चरक संहिता हिन्दी भाष्य, पृष्ठ 520 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

लङ्घनबृंहणीयाध्यायः २२ ] सूत्रस्थानम् ४३१

स्नानमुत्सादनं स्वशो मधुराः स्नेहवस्तयः ।

शर्कराक्षीरसपषि सर्वेषां विद्धि बृंहणम् ॥ २८ ॥

सभी व्यक्तियों के लिये बृंहण द्रव्य – स्नान, उबटन लगाना, निद्रा, मधुर द्रव्यों का सेवन, अनुवासन बस्ति, चीनी, दूध, घृत ये सामान्यतः सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिये बृंहण होते हैं ॥ २८ ॥

कटुतिक्तकषायाणां सेवनं स्त्रीष्वसंयमः ।

खलिपिण्याकतत्राणां मध्वादीनां च रूक्षणम् ॥ २ ९ ॥

रूक्षण द्रव्य – कटु, तिक्त, कषाय रसवाले द्रव्यों का सेवन, मैथुन में संयम का न रखना-सरसों की खली, तिल की खली, मट्ठा और बधु आदि द्रव्यों का सेवन शरीर को रूक्ष बनाता है | अभिष्यण्णा महादोषा मर्मस्था व्याधयश्च ये । ऊरुस्तम्भप्रभृतयो रूक्षणीया निदर्शिताः ॥ रूक्षण -करने योग्य रोग • अभिष्यन्दवाने, बहुत दोषयुक्त और मर्मस्थान में उत्पन्न हुए व्याधियाँ, ऊरुस्तम्भ आदि रोगों में रूक्षता की जाती है ॥ ३० ॥

स्नेहाः स्नेहयितव्याश्च स्वेदाः स्वेद्याश्च ये नराः ।

स्नेहाध्याये मयोक्तास्ते स्वेदाख्ये च सविस्तरम् ॥ ३१ ॥

स्नेह और स्नेहन करने योग्य व्यक्ति, स्वेद और स्वेदन करने योग्य पुरुष का वर्णन -विस्तारपूर्वक क्रमशः सूत्र स्थान के तेरहवें स्नेहाध्याय और चौदहवें स्वेदाध्याय में मेरे द्वारा ( आचार्य चरक ) कहा गया है ॥ ३१ ॥

द्रवं तन्वसरं यावच्छतीकरण मौषधम् ।

स्वादु तिक्तं कषायं च स्तम्भनं सर्वमेव तत् ॥ ३२ ॥

स्तम्भन - जितने द्रव्य द्रव, तनु, असर ( स्थिर ) और शरीर में शीतलता उत्पन्न करनेवाले हैं और रस में स्वादु, तिक्त, कषाय है वे सभी द्रव्य स्तम्भन है ॥ ३२ ॥

पित्तदाराग्निदग्धा ये वम्यतीसारपीडिताः ।

विषस्वेदातियोगार्ताः स्तम्भेनीया निदर्शिताः ॥ ३३ ॥

स्तम्भनीय पुरुष - जो व्यक्ति पित्त प्रकृति का हो, क्षार अग्नि से जला हो, वमन, अतिसार से पीड़ित हो, विष और स्वेद के अधिक निकलने से कष्ट पा रहा हो, इस प्रकार के व्यक्ति स्तम्भन करने योग्य होते हैं ॥ ३३ ॥

* वातमूत्रपुरीषाणां विसर्गे गात्रलाघवे ।

हृदयोद्गारकण्ठास्यशुद्धौ तन्द्राकुमे गते ॥ ३४ ॥

स्वेदे जाते रुचौ चैव चुत्पिपासासहोदये ।

कृतं लङ्घनमादेश्यं निर्व्यथे चान्तरात्मनि ॥ ३५ ॥

सम्यक् लंघन के लक्षण - अपान वायु, मूत्र तथा मल का त्याग उचित रूप से होता हो, शरीर में लघुता का अनुभव होता हो, हृदय, उद्गार, कंठ और मुख शुद्ध हों, नन्द्रा और कुम नष्ट हो चुके हों, स्वेद उत्पन्न होने या भोजन में रुचि हो, भूख और प्यास एक साथ लगी हो, आत्मा में किसी भी प्रकार का कष्ट न हो तो लंघन कार्य उचित रूप में हुआ है यह समझना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ १. ' खलिः निःस्नेहसर्षपखलिः, पिण्याको निःस्नेहतिलखलि: ' गङ्गाधरः । २. ' स्तम्भनीया निदशिताः ' यो; ' स्तम्भनीयास्तथाऽपरे ' ग. ।