चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 631–640
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 631–640
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५४२ चरकसंहिता भव्यादल्पान्तरगुणं काश्मर्यफलमुच्यते । तथैवात्पान्तरगुणं तदमम्लं परूपकात् ॥: ३५ ॥ वम्भारी का फल - कमरख अल्प गुग वाला होना है । इसी प्रकार खट्टा तून फालसा से अल गुण वाला होता है ॥ १३५ ॥
कषायमधुरं टङ्कं वातलं गुरु शीतलं । कपित्थमामं कण्ठघ्नं विषघ्नं ग्राहि वातलम् ॥ १३६ ॥
मधुराम्ल पायत्वात् सौगन्ध्याञ्च रुचिप्रदम् । परिपक्कं च दोषघ्नं विषघ्नं ग्राहि गुर्वपि ॥ टंक ( नासपाती ) - रस में कषाय, मधुर, वातवर्धक, गुरु, वीर्य में शीतल होता है । कच्चा कैंय — स्वरभेदकारक, विषनाशक, मल को रोकने वाला और वातकारक होता है । रस मैं मधुर, अम्ल, कषाय होने से और सुगन्धित होने से पका कैंद - रुचिवर्धक, दोषों को नष्ट करने वाला, विष का नाश करने वाला, ग्राही और भारी होता है ॥ १३६-१३७ ॥ बिल्वं तु दुर्जरं पक्कं दोषलं पूतिमास्तम् । स्निग्धोष्णतीच्णं तद्वालं दीपनं कफवातजित् ॥ पके हुए बिल्व का फल -- पचने में कठिन, दोषों को बढ़ाने वाला, दुर्गन्ध के साथ अपान वायु को निकालने वाला होता है । कच्चा बेल का फल - स्निग्ध, वीर्य में उष्ण, तीक्ष्ण, अग्निदीपक और कफ - बान को जीतने वाला होता है ॥ १३८ ॥
रक्तपित्तकरं बालमापूर्ण पित्तवर्धनम् । पक्कमात्रं जयेद्वायुं मांसशुक्रबलप्रदम् ॥ १३ ९ ॥ बच्चा आन का फल - रक्त और पित्त को बढ़ाने वाला होता है । तरुग आम का फल – पित्तत्रर्थक होता है | पक्के आम का फल - वायु को दूर करना है, मांस, शुक्र और दल का वक होता है ॥ १३ ९ ॥ कषायमधुरप्रायं गुरु विष्टम्भि शीतलम् । जाम्बवं कफपित्तघ्नं ग्राहि वातकरं परम् ॥ १४० ॥
पक्का जामुन का फल - प्रायः रस में कषाय, मधुर, गुरु, कब्जकारी, वीर्य में शीट, कप-पित्त नाशक, मल को बाँधने वाला और अधिक रूप में वानवर्धक होता है ॥ १४० ॥
बदरं मधुरं स्निग्धं भेदनं वातपित्तजित् । तच्छुष्कं कफवातघ्नं पित्ते न च विरुध्यते ॥१ ९ १ ॥ र - रस में मधुर, स्निग्ध मल का भेदक और बात - पित्त को नष्ट करने वाला होता ताजा है | सूखा हुआ वैर कफ - दात को दूर करता है और पित्त विकार में विरुद्ध नहीं होता ॥ १४१ ॥
कषायमधुरं शीतं ग्राहि सिम्वि ( ञ्चि ) तिकाफलम् । गाङ्गेरुकी करीरं च विम्बी तोदनधन्वनम् ॥
मधुरं कषायं च शीतं पित्तकफापहम् । संपक्कं पनसं मोचं राजादनफलानि च ॥ १४३ ॥
स्वानि कषायाणि स्निग्धशीतगुरूणि च । कुपायविशदत्वाच्च सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् ॥
अवदंशक्षमं हृद्यं वातलं लवलीफलम् । नीपं शताह्वकं पीलु तृणशून्यं विकङ्कतम् ॥ १४५ ॥
प्राचीनामलकं चैव दोषघ्नं गरहारि च । ऐङ्गुदं तिक्तमधुरं स्निग्धोष्णं कफवातजित् ॥ १४६ ॥
सिञ्चितिका फल ( सेव ) - सेत्र रस में कषाय और मधुर, वीर्य में शीत और ग्राही होता है । गांगेरुक - ( गंगेरन ) करील, बिम्बी, तोदन ( तुन ), धन्वन ( धामन ) - इनके फल रस में मधुर, कुछ कषाय, वीर्य में शीतल, पित्त तथा कफनाशक होते हैं । कटहल, केला, खिरनी पके हुए इनके फल - रस में मधुर, कुछ कषाय, स्निग्ध, वीर्य में शीतल और गुरु होते हैं । लवली फल- ( हरफारेवरी ) रस में कषाय और विशद होने से तथा सुगन्धित होने के कारण भोजन में रुचिकारक हैं | यह चटनी बनाने योग्य होता है । हृदय के लिए हितकर होता है तथा वायु-वर्धक होता है । कदम्ब, सोआ पीलू का फल, तृणशून्य ( केवड़े का फल या मल्लिका का फल ), विकंकत, ( यह एक जंगली फल होता है ), प्राचीनामलक - इनके फल त्रिदोषनाशक १. ' तदेव पक्कम् ' इति पा ० । ४. ‘ सभार्गक ' ग. । ' शताक्षकम् ' इति ' शतारुकन् ' इति च पा. । २. वातपित्तकरम् ' इति पा । ३. ' रुक्षं ' ग. रुच्यम् ' ' इति पा ।
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अन्नपानविध्यध्यायः २७ } सूत्रस्थानम् ५४३ और कृत्रिम विष को दूर करने वाले होते हैं । इङ्गुदी -- ( नापस फल ) यह रस में तिक्त और मधुर, स्निग्ध, वीर्य में उष्ण, कफ और वायु को नष्ट करने वाला होता है ॥ १४२-१४६ ॥ तिन्दुकं कफपित्तघ्नं कषायं मधुरं लघु । विद्यादामलके सर्वान् रसांल्लत्रणवर्जितान् ॥ १४७ ॥
रूक्षं स्वादु कषायाम्लं कफपित्तहरं परम् । तिन्दुक ( तेंडु ) का फल – कफ - पित्तनाशक रस में कषाय, मधुर और लघु होता है । आँवला- इसमें नमक रस को छोड़कर सभी रस वर्तमान हैं । गुण में रूक्ष, रस में मधुर, कषाय, अम्ल होता है । विशेष रूप में कफ और पित्त का शामक होता है ॥ १४७ ॥
विमर्श - आँवले में अम्ल रस पाया जाना है पर अम्ल द्रव्यों में आंवले की गणनानाम तक नहीं होती क्योंकि यह अम्ल तो होता है पर अम्ल रस के कार्यों को नहीं करना । अतः पित्त का नाशक ही माना जाता है और अपने रस प्रभाव के कारण यह त्रिदोषशामक होता है । सुश्रुत ने भी आँवले का गुण बताया है यथा- ' अम्लं समधुरं तिक्तं कषायं कटुकं सरम् । चक्षुष्यं सर्वदोषघ्नं वृष्यमामलकीफलम् || ' ( सू. अ. ४६ ) रसासृयांसमेदोजान्दोषान् हन्ति विभीतकम् ॥ १४८ ॥
स्वरभेदको दपित्तरोगविनाशनम् । अम्लं कपायमधुरं वातघ्नं ग्राहि दीपनम् ॥१४ ९ ॥
स्त्रिग्धोष्णं दाडिमं हृद्यं कफपित्ताविरोधि च । रूक्षाम्लं दाडिमं यत्तु तत् पित्तानिलकोपनम् ॥ • बहेड़ा रस, रक्त, मांस और मैदा की विकृति से होने वाले रोगों को दूर करता है । एवं स्वरभेद कफ का उत्क्लेद और पित्त रोग को दूर करता है । खट्टा अनार - कषाय, मधुर, वात शामक, मल को बाँधने वाला, अग्निदीपक, स्निग्ध, वीर्य में उष्ण, हृदय के लिए लाभदायी, कफ और पित्त का विरोधी नहीं होता है । जो अनार रूक्ष और अम्ल होता है वह पित्त और वायु को कुपित करने वाला होता है ॥ १४८ - १५० ॥ मधुरं पित्तनुतेषां पूर्वं दाडिममुत्तमम् । वृत्ताम्लं ग्राहि रूक्षोष्णं वातश्लेष्मणि शस्यते ॥ १५१ ॥
मीठा अनार - • जो केवल मीठा होता है वह पित्तनाशक होता है । और वही अनारों में उत्तम होता है । वृक्षाम्ल - यह मल को बाँधने वाला, रूक्ष और वीर्य में उष्ण होता है 1 वान और कफ की विकृति में लाभकर होता हैं ॥ १५१ ॥
अम्लिकायाः फलं पक्कं तस्मादल्पान्तरं गुणैः । गुणैस्तैरेव संयुक्तं भेदनं त्वम्लवेतसम् ॥१५२ ॥
पकी इमली. - इसका फल गुणों में वृक्षाम्ल से कुछ न्यून होता है । अम्लवेतस - अम्लवेनस इमली के फलों के समान ही गुण वाला होता है । पर यह भेदक ( मलनिस्सारक ) होता है || १५२ || शूलेऽरुचौ विबन्धे च मन्देऽग्नौ मद्यविप्लवे । हिक्काश्वासे च कासे च वम्यां वर्चोगदेषु च ॥ वातश्लेप्मसमुत्थेषु सर्वेष्वेवोपदिश्यते । केसरं मातुलुङ्गस्य लघु शेषमतोऽन्यथा ॥ १५४ ॥
मातुलुङ्ग ( बिजौरा नीबू ) का केशर - यह उदरशूल, अरुचि, विबन्ध, मन्दाग्नि, मदात्यय रोग, हिचकी, दमा, कास, वमन और पुरीष की विकृति से होने वाले और वात - कफ से होने वाले सभी रोगों में लाभकर और लघु होता है । विजौरा नीबू की त्वचा आदि का गुण इससे विपरीत होता है ॥ १५३-१५४ ॥ रोचनो दीपनो हृद्यः सुगन्धिस्त्वग्विवर्जितः । कर्चूरः कफवातन्नः श्वासहिक्कार्शसां हितः ॥ कचूर - • छिलका से रहित कचूर भोजन में रुचि उत्पन्न करने वाला, अग्निदीपक, हृदय को चल देने वाला, सुगन्धयुक्त, वात और कफ को शान्त करने वाला, श्वास, हिचकी एवं अर्श रोगों लाभप्रद होता है ॥ १५५ ॥
१. ' विक्लवे ' इति पा. ।
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५४४ चरकसंहिता मधुरं किंचिदम्लं च हृद्यं भक्तप्ररोचनम् । दुर्जरं वातशमनं नागरङ्गफलं गुरु ॥ १५६ ॥
नारंगी - इसका फल रस में मधुर और कुछ खट्टा होता है । हृदय के लिए लाभप्रद, भोजन में रुचिकारक, पचने में भारी, वातशामक एवं गुरु होता है ॥ १५६ ॥
वातामाभिषुकाक्षोटमुकूलकनिकोचकाः । गुरूष्णस्त्रिग्वमधुराः सोरुमाणा बलप्रदाः ॥ १५७ ॥
वातघ्ना बृंहणावृप्याः कफपित्ताभिवर्धनाः । प्रियालमेषां सदृशं विद्यादौष्ण्यं विना गुणैः ॥ बादाम, अभिषेक, अक्षोट ( अखरोट ), मुकूलक ( पिस्ता ), निकोचक ( चिलगोजा ), उरुमाण ( खुरमानी ) - इन सत्रों के फल पतने में भारी, वीर्य में उष्ण, स्निग्ध, रस में मधुर, बलकारक, वातशामक, मांसवर्धक, शुक्रवर्धक और कफ एवं पित्त को बढ़ाने वाले होते हैं । प्रियाल ( चिरौंजी ) -यह बादाम आदि के फलों में रहने वाली उष्णता को छोड़कर उन सभी फलों के शेष गुणों के समान होता है || १५७-१५८ ॥ श्लेष्मलं मधुरं शीतं श्लेष्मातकफलं गुरु । श्लेष्मलं गुरु विष्टम्भि चाङ्को टफलमग्निजित् ॥ १५ ९ ॥ गुरूणं मधुरं रूचं केशनं च शमीफलम् । विष्टम्भयति कारअं वातश्लेष्माविरोधि च ॥ १६० ॥
श्लेष्मातक ( वहुवार - लसोड़ा ) 1- यह कफवर्धक, रस में मधुर, वीर्य में शीत और गुरु होता है | अकोलफल ( ढेरा ) - कफ को बढ़ाने वाला, भारी, कब्ज करने वाला और अत्यग्नि रोग ( भस्मक ) को शान्त करने वाला होता है । शमी का फल - गुरु, वीर्य में उष्ण, रस में मधुर, रूक्ष और बालों को नष्ट करता है । करञ्ज का फल - कब्जकारक, पित्त और कफ का विरोधी नहीं है अर्थात् अनुकूल होता है ॥ १५ ९ -१६० ॥
आम्रातकं दन्तशठमम्लं सकरमर्दकम् । रक्तपित्तकरं विद्यादैरावतकमेव च ॥ १६१ ॥
वातघ्नं दीपनं चैव वार्ताकं कटु तिक्तकम् । वातलं कफपित्तघ्नं विद्यात् पर्पटकीफलम् ॥१६२ ॥
आम्रातक, दन्तशठ ( जम्बीरी नीबू ), करौंदा, ऐरावतक ( नारङ्गी ) - इनके फल रस में अम्ल, रक्त एवं पित्त को बढ़ाने वाले होते हैं । वार्ताक ( वैगन ) का फल वातनाशक, दीपक, रस # टु और तिक्त होता है । पर्पटी फल - यह वात को बढ़ाने वाला, कफ एवं पित्त का नाशक होता है ॥ १६१ - १६२ ॥ पित्तश्लेप्मन्नमम्लं च त्रातलं चाक्षिकीफलम् । मधुरोण्यम्लपाकीनि पित्तश्लेष्महराणि च ॥१६३ ॥
अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षन्यग्रोधानां फलानि च । कषायमधुराम्लानि वातलानि गुरूणि च ॥१६४ ॥
भल्लातकास्थ्यग्निसमं तन्मांसं स्वादु शीतलम् । पञ्चमः फलवर्गोऽयमुक्तः प्रायोपयोगिकः ॥ आक्षिकीफल ( आच्छूक वृक्ष का फल ) - यह पित्त और कफ को नष्ट करने वाला, रस में अम्ल और वातवर्धक होता है । अश्वत्थ ( पीपल ), उदुम्बर ( गूलर ), प्लक्ष ( पाकड़ ), न्यग्रोध ( वट ) --इनके फल कसैले, मीठे, और खट्टे होते हैं । ये तीनों प्रकार के फल रस में मधुर विपाक में अम्ल कफ - पित्तशामक, वातवर्धक और गुरु होते हैं । भल्लातक ( भिलावा ) की गुठली - अग्नि की तरह उष्ण होती है । भिलावे के फल का छिलका और मांस ( गूदा ) - रस में मधुर और वीर्य में शीतल होता है । इस प्रकार प्रायः सदा काम में आने वाले फल वर्गों का यह पाचवाँ वर्ग समाप्त हुआ || १६३-१६५ ॥ अथ हरित वर्ग: -* रोचनं दीपनं वृष्यमार्द्रकं विश्वभेषजम् । वातश्लेष्मविबन्धेषु रसस्तस्योपदिश्यते ॥१६६ ॥
१. ' सुगन्धि मधुरं साम्लं विशदं भक्तरोचनम् ' ग. । २. ' मधुराण्यनुपाकीनि वातपित्तहराणि च ' इति पा. । ३. ' त्वांसम् ' इति पा. ।
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अन्नपानविध्यव्याय: २७ ] सूत्रस्थानम् ६. हरित वर्ग ( Class of Greens ) ५४५ अदरख - • भोजन में रुचि उत्पन्न करता है, अग्नि को बढ़ाता और वीर्यवर्धक होता है । इसका रस, बात और कफ से होने वाले विबन्धों को दूर करने वाला होता है ॥ १६६ ॥
ॐ रोचनो दीपनस्तीच्णः सुगन्धिर्मुखशोधनः । जम्बीरः कफवातन्नः क्रिमिघ्नो भक्तपाचनः ॥ जम्बीर - यह भोजन में रुचिकारक, अग्निदीपक, तीक्ष्ण, सुगन्धित है और मुख को साफ रखता, कफ, वात और कृमि को नष्ट करता है एवं भोजन को पचाने वाला होता है ॥ १६७ ॥
ॐ बालं दोषहरं, वृद्धं त्रिदोपं, मारुतापहम् । स्निग्धसिद्धं विशुष्कं तु मूलकं कफवातजित् ॥ कोमल बाल्यावस्था की मूली - सभी दोषों को दूर करने वाली होती है । स्नेह से पकाई हुई मूली का शाक - वायु को दूर करने वाला होता है । सूखी मूली वात और कफ को नष्ट करने वाली होती है ॥ १६८ ॥
हिक्काकासविषश्वासपार्श्वशूलविनाशनः । पित्तकृत् कफवातघ्नः सुरसः पूतिगन्धहा ॥ १६ ९ ॥ सुरस ( तुलसी ) – यह हिचकी, कास, विष विकार, दमा, और पार्श्वशूल को दूर करने वाली होती हैं । यह पित्त कारक, कफ, वान को नष्ट करने वाली और शरीर या भोज्य द्रव्यों की दुर्गन्ध को दूर करने वाली होती है ॥ १६ ९ ॥ यवानी चार्जकश्चैव शिशुशालेयमृष्टकम् । हृद्यान्यास्वादनीयानि पित्तमुत्क्लेशयन्ति च ॥१७० ॥
अजवायन, अर्जक, सहिजन, शालेय ( सौंफ ), मृष्टक – ये हृदय के लिये लाभकारी, स्वाद में उत्तम और पित्त को प्रकपित करने वाले होते हैं ॥ १७० ॥
गण्डीरो जलपिप्पल्यस्तुम्बरुः शृङ्गवेरिका । तीच गोष्णकटुरूक्षाणि कफवातहराणि च ॥१७१ ॥
गण्डीर, जलपिप्पली ( जलधनियाँ ), तुम्बरु ( नेपाली धनियाँ, तुम्बल ) शृङ्गवेरिका – ये तीक्ष्ण, वीर्य में उष्ण, कटु, रूक्ष, कफ और वात को दूर करनेवाले होते हैं ॥ १७१ ॥
पुंस्त्वन्नः कटुरूतोष्णो भूस्तृणो वक्त्रशोधनः । खरौह्वा कफवातघ्नी बस्तिरोगरुजापहा ॥१७२ ॥
तृण ) 1- यह पुरुषत्व - शक्ति को नष्ट करती है । कटु, रूक्ष, वीर्य में उष्ण भूस्तृण ( हरद्वारी और मुख को साफ करने वाली होती है । खराबा ( स्याहजीरा चक्र ० ) - यह कफ और बात को नष्ट करनेवाली, बस्ति के शूल और रोगों को दूर करने वाली होती है ॥ १७२ ॥
* धान्यकं चाजगन्धा च सुमुखश्चेति रोचनाः । सुगन्धा नातिकटुका दोषानुत्केशयन्ति च ॥
धनियाँ ( हरी धनियाँ ), अजगन्धा ( ममरी ), सुमुख ( तुलसी का भेद ) - ये भोजन में रुचि उत्पन्न करने है । मुख की दुर्गन्धि को दूर कर सुगन्ध उत्पन्न करते हैं । ये अधिक कटु नहीं होते हैं पर बात, पित्त, कफ को प्रकुपित करनेवाले होते है ॥ १७३ ॥
ॐ ग्राही गृञ्जनकस्तीक्ष्णो वातश्लेष्मार्शसां हितः । स्वेदनेऽभ्यवहारे च योजयेत्तमपित्तिनाम् ॥ गृअनक ( गाजर ) - यह मल को बाँधनेवाला, तीक्ष्ण, वात, कफ और अर्श के रोगियों के लिये हितकारी होता है । जो व्यक्ति पित्तप्रकृति के नहीं है उनको पसीना लाने के लिये और भोजन में प्रयोग करना चाहिये ॥ १७४ ॥
श्लेष्मलो मारुतघ्नश्च पलाण्डुर्न च पित्तनुत् । आहारयोगी बल्यश्च गुरुर्वृप्योऽथ रोचनः ॥१७५ ॥
पलाण्डु ( प्याज ) 1- यह कफवर्धक, वातनाशक और पित्त को नष्ट नहीं करने वाला है 1 १. ' मुखबोधन: ' इति पा. । २. ' जलपिप्पली गण्डीरः शृङ्गवेर्यथ तुम्बरु ' ग. । ३. ' भूस्तृणो गन्धतृणः ' गङ्गाधरः । तत्र ' पारसीययवानी ' ग. । ३५ च ० सं ० ४. ' खराह्वा कृष्णजीरकम् ' चक्रः ' खराश्वा ' इति पा. ५. ' न च पित्तकृत् ' यो ।
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५४६ चरकसंहिता आहार के काम में आनेवाला, बलवर्धक, भारी, शुक्रवर्धक, और भोजन में रुचि उत्पन्न करने वाला है ॥ १७५ ॥
* क्रिमिकुष्टकिलासघ्नो वातघ्नो गुल्मनाशनः । स्त्रिग्धश्श्रोष्णश्च वृप्यश्च लशुनः कटुको गुरुः ॥ लशुन ( लहशुन ) - कृमि रोग, कुष्ठ, किलास ( श्वेत कुष्ठ ) वात विकार और गुल्म रोग नाशक होता है । यह स्निग्ध, वीर्य में उष्ण, शुक्रवर्धक, रस में कटु और गुरु होता है || १७६ || शुष्काणि कफवातघ्नान्येतान्येषां फलानि च । हरितानामयं चैप पष्टो वर्गः समाप्यते ॥१७७ ॥
इस हरित वर्ग में जिन - जिन फलो का वर्णन आया है उन सभी के सूखे फल, वात और कफ को दूर करनेवाले होते हैं । इस प्रकार यह हरित वर्ग नामक छटाँ वर्ग समाप्त हुआ || १७७ ॥ अथ मद्यवर्गः— प्रकृत्या मद्यमग्लोष्णमम्लं चोक्तं विपाकतः । सर्वं सामान्यतस्तस्य विशेष उपद्वेक्ष्यते ॥१७८ ॥
७. मद्य वर्ग ( Class of Wines or Fermentative Products ) सामान्यतः सभी मद्य स्वभाव से रस में अन्न, वीर्य में उष्ण और विपाक में अम्ल होते हैं । इन मद्यों में जिनका विशेष गुण होता है उनका विशेष रूप से वर्णन किया जा रहा है ॥ १७८ ॥
* कृशानां सक्तमूत्राणां ग्रहण्यर्शोविकारिणाम् । सुरा प्रशस्ता वातघ्नी स्तन्यरक्तक्षयेषु च: मुरा - यह कृश ( पतले ) मनुष्यों के लिये, जिन लोगों का सूत्र रुक गया है, जो व्यक्ति
ग्रहणी और अर्श रोग से पीड़ित है उन लोगों के लिये हितकारी होती है । वान नाशक है ।
रक्त और दूध के क्षीण होने पर इसके प्रयोग में लाभ होता है ॥ १७२ ॥
हिक्काश्वासप्रतिश्यायकासवचग्रहारुचौ । वस्यानाहविबन्धेषु वातघ्नी मदिरा हिता ॥ १८० ॥
मदिरा ( प्रसन्ना ) - यह हिचकी, दमा, प्रतिश्याय, खाँसी, मल की रुकावट, भोजन में अरुचि, वमन, आनाह और विवन्ध रोगों में हितकारी होती है और वातनाशक है ॥ १८० ॥
शूलप्रवाहिकाटोप कफवातार्शसां हितः । जगलो ग्राहिरुक्षोष्णः शोर्पानो भक्तपाचनः ॥१८६ ॥
जगल ( मद्य का नीचे का गाढ़ा भाग ) - यह शूल, प्रवाहिका, पेट में गुड़गुड़ाहट, कफ, वात और अर्श रोग में निकारी है । मल को बाँधनेवाला, रुक्ष, वीर्य में उष्ण, शोथनाशक और अन्न को पचानेवाला होता है ॥ १८१ ॥
* शोषार्शोग्रहणीदोपपाण्डुरोगारुचज्वरान् । हन्त्यरिष्टः कफकृतान् रोगान् रोचनदीपनः ॥ अरिष्ट - यह शोष, अर्श, ग्रहणी, पाण्डु रोग, भोजन में अत्रि, ज्वर और कफजन्य अनेकों रोगों को दूर करना है । भोजन में कवि और अग्नि को तेज करने वाला है ॥ १८२ ॥
मुखप्रियः सुखमदः सुगन्धिर्बस्तिरोगनुत् । जरणीयः परिणतो हृद्यो वर्ण्यश्च शार्करः ॥१८३ ॥
शार्कर ( शर्करा से बनाया हुआ मद्य ) - पुख के लिये प्रिय, सुखकारी, नशा लानेवाला, मुख में सुगन्ध लानेवाला, वस्ति रोग को दूर करनेवाला, भोज्य पदार्थ को पचानेवाला, पत्र जाने पर हृदय के लिये और वर्ण के लिये हितकारी होता है ॥ १८३ ॥
रोचनो दीपनो हृद्यः शोपशोफार्शसां हितः । स्नेहश्लेम्मविकारघ्नो वर्ण्यः पक्करसो मतः १८४ पक्करस शीधु - यह भोजन में रुचि उत्पन्न करनेवाला, अग्निदीपक, हृदय के लिये सुखकर, शोष, शोफ और अर्श रोग में हितकारी होता है । खंड और कफजन्य रोगों को दूर करनेवाला एवं शरीर के वर्ण के लिये हितकारी होता है ॥ १८४ ॥
जरणीयो विबन्धघ्नः स्वरवर्णविशोधनः । लेखनः शीतरसिको हितः शोफोदरार्शसाम् १८५ १. ' शोषन्नः ' इति पा. । २. ' दीपनपाचनः ' ग. । ३. ' कर्शन: ' इति पा. ।
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अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् ५४७ अपक्करस शीधु - यह आहार द्रव्य को पकाने वाला, विबन्ध को दूर करनेवाला, स्वर और वर्ण को शुद्ध करनेवाला एवं लेखन होता है । शोथ, उदर रोग और अर्श के रोगियों के लिये हितकारी होता है ॥ १८५ ॥
सृष्टभिन्नशकृद्वातो गौडस्तर्पणदोपनः । पाण्डुरोगन गहिता दोपनी चाक्षिकी मती ॥। १८६ ॥ गौड ( गुड़ से बना हुआ मद्य ) -- यह मल को भेदन कर निकालनेवाला और अपान वायु को निकालनेवाला होता है । शरीर को तृप्त करता है और अनि दीपक होता है । बहेड़े की
मदिरा - यह पाण्डु रोग और वर्ण के लिये लाभप्रद है । और अभि को तेज करती है ॥ १८६ ॥
सुरासवस्तीचमदो वातघ्नो वदनप्रियः । छेदी मध्वासवस्तीचगो मैरेयो मधुरो गुरुः ॥ १८७ ॥
सुरासव - यह तीव्र नशा को लानेवाला, वातनाशक और मुख के लिये प्रिय होता है । मध्वामत्र - यह दोषों का छेदन करनेवाला और तीक्ष्ण है । मैरेय - यह मधुर और भारी होता है ॥ विमर्श - सुगमत्र - ' मुख्य सूयते तोयकार्य क्रियते यस्मिन् स सुगमत्रः " जिस मदिरा के सन्धान में जल के स्थान पर सुग का ही प्रयोग किया जाता है, उसे सुरासव करते हैं । मध्यामंत्र -- मदुए और गुड के संयोग से बनाये हुये मद्य को कहा जाता है । मैरेय - सुरा और आसव के वन जानेपर इन दोनों का एक पात्र में सुन्धान करने को मैरेय कहा जाता है । जैसा कि वृद्ध शौनक का वचन है- ' आमवस्य सुरायाच द्वयोरेकत्र भाजने । संवानं नद्विजानीयान्मैरेय-मुभयात्मकम् ॥ ' ( चक्रपाणि । धातक्याऽभिपुतो हृद्यो रूक्षो रोचनदीपनः । माध्वीकवन्न चात्युग्णो मृडीकेसुरसासवः १८८ धव के फूल से बने हुये मद्य - हृदय के लिये हितकारी, रूक्ष, भोजन में रुचि उत्पन्न करने वाला और अग्नि को तेज करनेवाला है । अंगूर के रस और ऊब के रस से नन्धान किया हुआ आसव माध्वीक के समान गुणवाला होता है, पर माध्वीक के समान अधिक गर्म नहीं होता ॥ रोचनं दीपनं हृद्यं बल्यं पित्ताविरोधि च । विबन्धघ्नं कफघ्नं च मधु लध्वल्पमारुतम् || १८ ९ || मधु ( मधुबनी हुई मदिरा ) - यह भोजन में रूचि उत्पन्न करनेवाला, अग्निदीपक, हृदय को बल देनेवाला, बलवर्धक, पित्त का अविरोधी, विवन्ध एवं कफजन्य विकारों को दूर करने वाला होता है । लघु और वायु को अल्प मात्रा में बढ़ाने वाला होता है ॥ १८ ९ ॥ सुरासमण्डा रूक्षोष्णा यवानां वातपित्तला । गुर्वी जीर्यति विष्टभ्य लेप्मला तु मधूलिका ॥ जौ की बनी मण्ड सहित सुरा रूक्ष, वीर्य में उष्ण, वात - पित्तवर्धक होती है, गुरु एवं कब्ज करके पचनेवाली होती है । मधूलिका ( गेहूं से बनी सुरा ) - कफ को बढानेवाली होती है ॥ दीपनं जरणीयं च हृत्पाण्डुक्रिमिरोगनुत् । ग्रहण्यशहितं भेदि सौवीरकतुषोदकम् ॥ १ ९ १ ॥ सौवीरक एवं नुषोदक - ये दोनों अग्निदीपक, अन्न को पचानेवाले, हृदय विकार, पाण्डु और कृमि रोग को दूर करने वाले होते हैं । ग्रहणी और अर्श रोग में हिनकारी एवं नल का भेदन करने
वाले होते हैं । १ ९ १ ॥
दाहज्वरापहं स्पर्शात् पानाद्वातकफापहम् । विबन्धघ्नमवसंसि दीपनं चामलकाञ्जिकम् ॥
अन्लकाक्षिक ( धान्यान्ल आरनाल ) - स्पर्श से ( कपड़े आरनाल में भिगो कर ओढ़ लेने से या आरनाल से परिषेचन करने से ) दाह और ज्वर दूर होता है । पीने से वात और कफ जन्य विकार शान्त होते हैं । यह विबन्ध को दूर करता है, अवस्रंसी ( मल - मूत्र को निकालने वाला ) और अग्निदीपक है ॥ १२२ ॥
१. आशिकी विभीतकवृना सुरा । २. ' मध्विति मधुप्रधान आम: ' चक्रः ।
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५४८ चरकसंहिता
* प्रायशोऽभिनवं मद्यं गुरु दोषसमीरणम् । स्रोतसां शोधनं जीर्ण दीपनं लघु रोचनम् ॥
प्रायः सभी नवीनमद्य 1- गुरु, वात, पित्त और कफ को कुपित करने वाले होते हैं । प्रायः सभी पुराने मद्य स्रोतों के शोधक, अग्निदीपक, लघु और भोजन में रुचि उत्पन्न करते हैं ॥ १ ९ ३ ॥ * हर्षणं प्रीणनं मद्यं भयशोकश्रमापहम् । प्रागल्भ्यवीर्यप्रतिभातुष्टिपुष्टिवलप्रदम् ॥ १ ९ ४ ॥ सात्त्विकेंर्विधिवद्युक्तथा पीतं स्यादमृतं यथा । वर्गोऽयं सप्तमो मद्यमधिकृत्य प्रकीर्तितः ॥ विधिपूर्वक सेवित मद्य का गुण - नियमित रूप में पिया गया मद्य आनन्ददायक, तर्पक, भय, शोक और थकावट को दूर करने वाला होता है । प्रागल्भ्य ( धृष्टता ), वीर्य ( पराक्रम ), प्रतिभा, सन्तोष, शरीर - पुष्टि और बल देने वाला होता है । सात्त्विक मनुष्यों द्वारा विधिपूर्वक सेवित मद्य अमृत के समान फल देता है । यह मद्य का अधिकार प्रारम्भ करके सातवाँ मद्यवर्ग कहा है ॥ १ ९४-१९ ५ ॥ अथ जलवर्गः— जलमेकविधं सर्वं पतत्यैन्द्रं नभस्तलात् । तत् पतत् पतितं चैव देशकालावपेक्षते ॥१ ९ ६ ॥ ८. जलवर्ग ( Class of Waters ) आकाश से मेघजन्य सभी जल एक ही प्रकार का गिरता है । गिरते हुए आकाशका जल देश-काल के अनुसार गुण या दोष की अपेक्षा करता है ॥ १ ९ ६ ॥
खात् पतत् सोमवाय्वकैः स्पृष्टं कालानुवर्तिभिः ।
शीतोष्णस्त्रिग्धरूक्षाद्यैर्यथासन्नं महीगुणैः ॥ १ ९ ७ ॥
आकाश से गिरा हुआ जल, समय के अनुसार गमन करने वाले चन्द्रमा, वायु, सूर्य से स्पर्श हो जाने के बाद समीप के पृथ्वी में गुण के अनुसार शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि गुणों से युक्त होना है ॥ १ ९ ७ ॥ शीतं शुचि शिवं मृष्टं विमलं लघु षड्गुणम् । प्रकृत्या दिव्यमुदकं, -आकाशीय जल के स्वाभाविक गुण - यह वीर्य में शीत, पवित्र, सुखकर, स्वादु, विमल, लघु
इन ६ गुणों से युक्त स्वभाव से दिव्य जल होता है ।
-भ्रष्टं पात्रमपेक्षते ॥ १ ९ ८ ॥
श्वेते कषायं भवति पाण्डरे स्यात्त तिक्तकम् । कपिले क्षारसंसृष्टमूषरे लवणान्वितम् ॥ कटु पर्वतविस्तारे मधुरं कृष्णमृत्तिके । एतत् षाड्गुण्यमाख्यातं महीस्थस्य जलस्य हि ॥ भूमि के अनुसार जल का स्वाद - आकाश का जल भूमि पर गिरने पर पात्र की अपेक्षा करना है । अर्थात् जैसी भूमि में गिरता या स्थिर होता है उस भूमि के अनुसार गुण वाला होता है । सफेद मिट्टी वाली भूमि पर गिरने पर रस में कषाय, पाण्डु वर्ण की भूमि पर गिरने पर रस में तिक्त, कपिल वर्ण की भूमि पर गिरने से क्षार, ऊपर भूमि पर गिरने पर लवण, पर्वत पर गिर कर बहने वाला जल कटु, काले वर्णं की मिट्टी पर गिरने वाला जल मधुर होता है । इस प्रकार भूमि जल के ६ गुण होते हैं । १ ९८-१९९ ॥ तथाऽव्यक्तरसं विद्यादैन्द्र कारं हिमं च यत् । २०० ॥ १. ऐन्द्र ( धारा द्वारा आकाश से गिरा जल ), २. कार ( ओले का जल ), ३. हिम ( बरफ का जल ), ये अव्यक्त रस वाले होते हैं ॥ २०० ॥
यदन्तरीक्षात् पततीन्द्रसृष्टं चोक्तैश्च पात्रैः परिगृह्यतेऽम्भः ।
तदैन्द्रमित्येव वदन्ति धीरा नरेन्द्रपेयं सलिलं प्रधानम् ॥ २०१ ॥
जो जल इन्द्र से छोड़ा गया आकाश से गिरता है वह चाँदी आदि स्वच्छ पात्रों में एकत्रित
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अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् ५४६ किया जाता है, उस जल को विद्वान् लोग ऐन्द्र जल कहते हैं । वह जलों में सबसे प्रधान होता है और राजाओं के पीने योग्य होता है ॥। २०१ ॥ विमर्श -- इसी जल को दिव्य जल भी कहा जाता है । सुश्रुत ने इसे त्रिदोषशामक, बलवर्द्धक, रसायन और मैधावर्धक बताया है । अर्थात् ये गुण शुद्ध जल के हैं । वही जल जब भूमि पर गिरता है तो भूमि के अनुसार उसके गुण में विभिन्नता हो जाती है । ईषत्कषायमधुरं सुसूक्ष्मं विशदं लघु । अरूक्षमनभिष्यन्दि सर्वं पानीयमुत्तमम् ॥ २०२ ॥
सभी उत्तम प्रकार के जल कुछ कषाय, मधुर, सूक्ष्म, विशद, हल्का होते हैं और ये जल रूक्ष एवं कफकारक नहीं होने है ॥ २०२ ॥
गुर्वभिव्यन्दि पानीयं वार्षिकं मधुरं नवम् । तनु लध्वनभिव्यन्दि प्रायः शरदि वर्षति २०३ तत्तु ये सुकुमाराः स्युः स्त्रिग्धभूयिष्टभोजनाः । तेषां भोज्ये च भच्येच लेह्ये पेये च शस्यते ॥ ऋतु के अनुसार बरसे हुए जल के गुण - वर्षा ऋतु का नवीन जल रस में मधुर, भारी और कफकारक होता है । शरद् ऋतु का जल पतला, हल्का और कफकारक होता है । जो सुकुमार व्यक्ति हैं और जो व्यक्ति प्रायः स्निग्धाहार करते हैं उनके भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और पेय इन चारों प्रकार के भोजन में वह उपयोगी होता है ॥ २०३ - २०४ ॥
हेमन्ते सलिलं स्निग्धं वृष्यं बलहितं गुरु । किंचित्ततो लघुतरं शिशिरे कफवातजित् ॥
कषायमधुरं रूक्षं विद्याद्वासन्तिकं जलम् । ग्रैष्मिकं व्यनभिष्यन्दि जलमित्येव निश्चयः ॥ ऋतावृताविहाख्याताः सर्व एवाम्भसो गुणाः ॥ २०६ ॥
हेमन्त ऋतु का जल — हेमन्त ऋतु में बरसा हुआ जल स्निग्ध, शुक्रवर्द्धक, बलवर्धक और गुरु होता है । शिशिर ऋतु में बरसा हुआ जल हेमन्त ऋतु के जल की अपेक्षा अधिक हल्का होता है । कफ और वायु को नष्ट करने वाला होता है । बसन्त ऋतु में बरसा हुआ जल कषाय, मधुर और रूक्ष होता है । ग्रीष्म ऋतु में बरसा हुआ जल कफकारक नहीं होता, यह निश्चित सिद्धान्त है । प्रत्येक ऋतुओं में वर्षा से गिरने वाले जलों के गुण अलग - अलग इस प्रकार बता
दिये गये । २०५-२०६ ॥
विभ्रान्तेषु तु कालेषु यत् प्रयच्छन्ति तोयदाः । सलिलं तत्तु दोषाय युज्यते नात्र संशयः ॥ वित्रान्न काल में अर्थात् काल के अतियोग, हीनयोग और मिथ्या योग होने पर जब मेघ जल बरसाते है तो वह जल दोषों को उत्पन्न करने वाले होते हैं इसमें सन्देह नहीं है ॥ २०७ ॥
विमर्श -- ऊपर ऋतु के अनुसार बरसने वाले जल के गुण का निर्देश किया गया है पर वह गुण ऋतुओं के समयोग से युक्त होने पर ही होता है । राजभी राजमात्रैश्च सुकुमारैश्व मानवैः । सुगृहीताः शरद्यापः प्रयोक्तव्या विशेषतः ॥२०८ ॥
विशेषकर राजाओ को, राजा के समान धनाढ्य सर्वगुण सम्पन्न पुरुषों को, सुकुमार पुरुषों को, शरदऋतु में बरसे हुए जल को एकत्रित कर प्रयोग में लाना चाहिए ॥ २०८ ॥
नद्यः पाषाणविच्छिन्नविक्षुब्धाभिहतोदकाः । हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः ॥ नदियों के जल के गुण - हिमालय पर्वत से निकली नदियों के तट पर ऋषिलोग निवास करते हैं अतः वे नदियाँ पुण्य ( पवित्र ) होती हैं । उनका जल नदियों के मध्य में रहने वाले पाषाण के टुकड़ों से विच्छिन्न हो जाता ( टूट जाता ) है, विक्षुब्ध ( क्षुभित - उछल उछल कर १. ' वृ हेमन्तिकजलं स्निग्धं वृष्यं हितं गुरु ' यो ।
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५५० चरकसंहिता चलता है ), और छिन्न - भिन्न हुए जल वाली नदियाँ सर्व प्राणियों के लिए पथ्य ( हितकर ) होती हैं ॥ २० ९ ॥
नद्यः पाषाणसिकतावाहिन्यो विमलोदकाः । मलयप्रभवा याश्च जलं तास्वमृतोपमम् ॥
जो नदियाँ मलयाचल पर्वत से निकली हैं, उनमें पत्थर के टुकड़े, और बालू बहा करते है अत: उनका जल स्वच्छ और अमृत के समान मिष्ट होता है ॥ २१० ॥
पश्चिमाभिमुखा याश्च पथ्यास्ता निर्मलोदकाः । प्रायो मृदुवहा गुन्र्यो याश्च पूर्वसमुद्रगाः ॥ पश्चिमी समुद्र में जाने वाली नदियों का जल पथ्य और निर्मल होता है । पूर्वी समुद्र में जाने वाली नदियाँ मन्द वेग से बहती है और उनका जल गुरु होता है ॥ २११ ॥
पारियात्रभवा याश्च विन्ध्यसह्यभवाश्च याः । शिरोहदोगकुष्ठानां ता हेतुः श्लीपदस्य च ॥ पारियात्र, विन्ध्य, सह्य नामक पर्वत से निकलने वाली नदियों का जल शिर के रोग, हृदय के रोग, कुष्ठ रोग और श्लीपद रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है ॥ २१२ ॥
वसुधा कीटसर्पाखुमल संदूषितोदकाः । वर्षाजलवहा नद्यः सर्वदोषसमीरणाः ॥ २१३ ॥
बरसाती नदियों के जल के गुण - अधिकतर वर्षा ऋतु में नदी का जल कीट, सांप और चूहा के मलों से दूषित हो कर बहना है अतः बरसात में नदी का जल पीने से सभी दोषों को प्रकुपित करने वाला होता है ॥ २१३ ॥
वापीकूपतडागोत्ससरःप्रस्रवणादिषु । आनूपशैलेधन्वानां गुणदोषैर्विभावयेत् ॥ २१४ ॥
वापी ( बावली जोइंट से बॅधी हो और उसमें अन्दर प्रवेश के लिए सीढ़ियाँ बनी हों ), कून ( ईट से बँधा हो ), तडाग ( पोखरा ), उत्स ( भूमि फोड़कर नीचे के भाग से जिस नदी का जल ऊपर आता हो ), सर, प्रस्रवण ( झरना ), इनके जल का गुण या दोष अनूप, पर्वत, और जङ्गल के अनुसार होता है ॥ २१४ ॥
विमर्श - यहाँ आदि पद से हद, विकिर, केदार, परवल, चुण्डी आदि के जलों का ग्रहण होता है । पिच्छिलं क्रिमिलं क्लिन्नं पर्णशैवालकर्दमैः । विवर्णं विरसं सान्द्रं दुर्गन्धं न हितं जलम् ॥ अहतकर जल -- जो जल पिच्छिल ( चिकना ), क्रिभियुक्त, मड़ा और पत्ते, सेवार, कीचड़ से दूषित हो, चिवर्ग ( वर्णहीन ), विकृत रस युक्त, सान्द्र ( गाढ़ा जो कपड़े में न छन सके ) और दुर्गन्धयुक्त होता है वह हिनकर नहीं होता है ॥ २१५ ॥
विसं त्रिदोषं लवणमम्बु यद्वरुणालयम् । इत्यम्बुवर्गः प्रोक्तोऽयमष्टमः सुविनिश्चितः ॥ समुद्र के जल का गुण - जो वरुण भगवान् का आलय ( निवास स्थान ) है उस समुद्र का जल विस्र, त्रिदोषकोपक और लवण होता है । इस प्रकार यह आठवां जल का वर्ग निश्चित रूप से कह दिया गया है ॥ २१६ ॥
अथ गोरसवर्गः-* स्वादु शीतं मृदु स्निग्धं वहलं लचणपिच्छिलम् । गुरु मन्दं प्रसन्नं च गव्यं दशगुणं पयः ॥ तदेवं गुणमेवजः सामान्यादभिवर्धयेत् । प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तं रसायनम् ॥ २१८ ॥
९. गोरस वर्ग ( Class of Milks and its Prodcucts ) गोदुग्ध का गुण - - गौ का दूध, रस में ( १ ) स्वादु, वीर्य में ( २ ) शीत और गुणमें ( ३ ) मृदु, ( ४ ) स्निग्ध, ( ५ ) बहल ( गाढ़ा ), ( ६ ) लक्षण, ( ७ ) पिच्छिल, ( ८ ) गुरु, १. ‘ आनूपधन्वशैलेषु ' इति पा. ।
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अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् ५५१ ( ९ ) मन्द और ( १० ) प्रसन्न इन दश गुणों से युक्त होता है । इन दश गुणों से युक्त दूध, इन्हीं दश गुणों वाले ओज का साम्य रखने के कारण उसकी वृद्धि करता है, यह दूध जीवनी शक्ति प्रदान करने वाले द्रव्यों में सबसे श्रेष्ठ और रसायन है ॥ २१७-२१८ ॥
* महिषीणां गुरुतरं गव्याच्छीततरं पयः । स्नेहान्यूनमनिद्राय हितमत्यग्नये च तत् ॥
भैंस के दुग्ध का गुण - • भैंस का दुग्ध गाय के दूध से अधिक गुरु और शीत होता है, पर स्नेह में अन्यून होता है अर्थात् गोदुग्ध से भैंस के दुग्ध में घृत अधिक होता है । जिन व्यक्तियों को निद्रा न आती हो या अग्नि अधिक बढ़ गई हो तो उन दोनों के लिए हितकारी है । अर्थात निद्राकारक और अत्यग्निनाशक है ॥ २१ ९ ॥ रूक्षोष्णं क्षीरमुष्ट्रीणामीषत्सलवणं लघु । शस्तं वातकफानाह क्रिमिशोफोदरार्शसाम् || २२० ॥ ऊंटनी के दुग्ध का गुण -- ऊँटनी का दुग्ध रूक्ष, वीर्य में उष्ण कुछ लवण और लघु होता है, वात और कफ से होने वाले आनाहरोग, कृमिरोग, शोथ रोग, उदर रोग और अर्शरोगियों के लिये लाभकर है ॥ २२० ॥
बल्यं स्थैर्यकरं सर्वमुष्णं चैकशफं पयः । साम्लं सलवगं रूक्षं शाखावातहरं लघु ॥ २२१ ॥
घोड़ी आदि एक खुर वाले पशुओं के दुग्ध का गुण - सभी एक खुर वाले घोड़ी आदि का दुग्ध बलवर्द्धक, शरीर में स्थिरता लाने वाला उष्ण, कुछ खट्टा व कुछ नमकीन होता है एवं रूक्ष, लघु और शाखागत वायु को दूर करने वाला होता है ॥ २२१ ॥
छागं कषायमधुरं शीतं ग्राहि पयो लघु । रक्तपित्तातिसारघ्नं क्षयका सज्वरापहम् ॥२२२ ॥
बकरी के दुग्ध का गुण - • बकरी का दुग्ध रम में कषाय व मधुर, वीर्य में शीत, मल को बाँधने वाला और लघु होता है । रक्तपित्त, अतिसार, क्षय, कास व ज्वर को दूर करता है ॥ २२२ ॥
हिक्काश्वासकरं तूष्णं पित्तले मलमाविकम् । हस्तिनीनां पयो बल्यं गुरु स्थैर्यकरं परम् ॥ भेंड़ के दुग्ध का गुण यह हिचकी और दमा रोग को उत्पन्न करने वाला होता है । वीर्य में उष्ण, पित्त व कफ की वृद्धि करता है । हथिनी के दूध का गुण - यह वलवर्द्धक, पचने में गुरु और शरीर में स्थिरता करने वाला होता है ॥ २२३ ॥
जीवनं बृंहणं सात्म्यं स्नेहनं मानुषं पयः । नावनं रक्तपित्ते च तर्पणं चाक्षिशूलिनाम् ॥ स्त्री के दुग्ध का गुण यह शरीर में जीवनी शक्ति को देने वाला होता है । बृंह्ण होता है । साम्य ( जन्म से ही प्रत्येक मनुष्य के लिये अनुकूल होना है ) शरीर में स्निग्धता लाता है । रक्तपित्त रोग में नव देने से, नेत्रशूल में नेत्र में तर्पण करने से लाभप्रद होता है ॥ २२४ ॥
विमर्श - दुग्ध के गुणों का विशेष वर्णन सुश्रुत के सू. स्था. अ. ४५ में किया गया है । उसे वहीं देखना चाहिये । * रोचनं दीपनं वृत्यं स्नेहनं बलवर्धनम् । पाकेऽम्लमुष्णं वातघ्नं मङ्गल्यं बृंहणं दधि ॥२२५ ॥
पीनसे चातिसारे च शीतके विषमज्वरे । अरुचौ मूत्रकृच्छ्रे च काश्ये च दधि शस्यते ॥
शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम् । रक्तपित्तकफोत्थेषु विकारेष्वहितं च तत् ॥ त्रिदोषं मन्दकं जातं वातघ्नं देधि, शुक्रलः । सरः, श्ले मानिलघ्नस्तु मण्डः स्रोतो विशोधनः ॥ दधि का गुण- यह भोजन में रुचि उत्पन्न करता है । अग्नि को दीप्त करता है । शुक्र वर्द्धक है । शरीर में स्निग्धता लाता है । बलवर्द्धक है । विपाक में खट्टा है । वीर्य में उष्ण, वात १. ' दवि शुक्रलम् । सरः पित्तानिलघ्नस्तु मस्तु स्रोतोविशोधनम् ' इति पा ० ।