चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 621–630
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 621–630
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५३२ चरकसंहिता
- वच्यन्ते वारिचारिणः । हंसः क्रौञ्चो बलाका च बकः कारण्डवः प्लवः ॥ ४१ ॥
शरारिः पुष्करोह्वश्च केशरी मणितुण्डकः । मृणालकण्ठो मद्गुश्च कादम्बः काकतुण्डकः ॥
उत्क्रोशः पुण्डरीकाक्षो मेघरावोऽम्बुकुक्कुटी । आरा नन्दीमुखी वाटी सुमुखाः सहचारिणः ॥
रोहिणी कामकाली च सारसो रक्तशीर्षकः । चक्रवाकस्तथाऽन्ये च खगाः सन्त्यम्बुचारिणः ॥
वारिचर वर्ग - अब वारिचर वर्ग को कहते हैं । हंस, क्रौञ्च ( बड़ा बगुला घाटो ), बलाका ( लघु बगुला ), बक ( सामान्यतः श्वेत बगुला ), कारण्डव ( हंस का भेद - ' कारण्डवः काकवस्त्रो दीर्घाङ्घ्रिः कृष्णवर्णभाक् ), प्लव ( सारस पक्षी का भेद ), शरारि ( शराली ), पुष्कराड ( सारस पक्षी का भेद ), केशरी, मणितुण्डक, ( मातुण्डी ), मृणालकण्ठ, मद्गु ( जलकाक ), कादम्ब, काक-तुण्डक, उत्क्रोश ( कुररी पक्षी का भेद ), पुण्डरीकाक्ष, मेघराव ( मेघनाद ), अम्बुकुक्कुटी ( जलमुर्गी ), आरा, नन्दीमुखी, वाटी, सुमुख, सहचारी, रोहिणी, कामकाली, सारस, रक्तशीर्षक ( रक्त शिरवाल । सारस ), चकवा चकई और इनके अतिरिक्त और जो भी पक्षी जल से गमनागमन करते है के सभी जलचर वर्ग में संगृहीत होते है ॥ ४१-४४ ॥ पृषतः शरभो रामः श्वदंष्ट्रो मृगमातृका । शशोरणौ कुरङ्गश्च गोकर्णः कोट्टकारकः ॥ ४५ ॥
चारुको हरिणैौ च शम्बरः कालपुच्छकः । ऋव्यश्च वरपोतश्च विज्ञेया जाङ्गला मृगाः ॥
जाङ्गल पशुवर्ग - पृषत ( विन्दु से चिह्नित मृग ), शरभ ( अष्टापद उष्ट्रप्रमाणे महावङ्गः पृष्ठगत-चतुष्पादः, काश्मीरे प्रसिद्ध:, इति चक्रः ), राम ( महामृग जो हिमालय में प्रायः पाया जाता है ), श्वदंष्ट्र ( चार दाँतवाला मृग — ' श्वदंष्ट्रः चतुर्दष्ट्रोऽतिदुष्टः ' कर्कटक ' इति कार्तिकपुरप्रसिद्ध इति योगीन्द्रः ), मृगमानुका ( छोटे शरीर और लम्बे उदर वाला मृग ), शश ( खरहा ) उरण ( खरहा का भेद ), कुरङ्ग, गोकर्ण ( गौ के कर्ण के समान कानवाला मृग ), कोट्टकारक, चारक ( सुन्दर और छोटे शरीर का मृग ), हरिण ( ताम्रवर्ण का हरिण ), एण ( कृष्णसार मृग ' एणः कृष्णस्तयोर्ज्ञेयो हरिणस्तान उच्यते । न कृष्णो न च ताम्रश्च कुरङ्गः सोऽभिधीयते । ' ( सु. सू. अ. ४६ ) ) शम्बर, ( बारह सिंघा ), कालपुच्छक ( काले पूछवाले मृग ), ऋष्य ( नीले वर्ण के अण्डकोष वाला मृग ), वरपोत, ये सभी जाङ्गल पशु वर्ग में संगृहीत हैं ॥ ४५-४६ ॥
लावो वर्तीरचैव वाकः सकपिञ्जलः । चकोरश्वोपचक्रश्च कुक्कुभो रक्तवर्त्मकः ॥ ४७ ॥
लावाद्या विष्किरास्त्वेते वच्यन्ते वर्तकादयः । वर्तको वर्तिका चैव वह तित्तिरिकुक्कुटौ ॥ कङ्कशारपदेन्द्राभगोनर्द गिरिवर्तकाः । क्रकरोऽवकरश्चैव वारश्चेति विष्किराः ॥ ४ ९ ॥ विष्किर वर्ग - लवा, वर्तीर ( चटक ) वार्तीक ( छोटा चटक ), कपिञ्जल ( गौर तित्तिर ), चकोर, उपचक्र ( चकोर का भेद जिसका काला चोंच होता है ), कुक्कुभ और रक्तवर्त्मक ( रक्त वर्ण का चटक ) ये सब लवा आदि विष्किर कहे जाते हैं । वर्तक आदि विष्किर आगे बता रहे हैं । वर्तक, वर्तिका, मोर, तित्तिर ( काला तित्तिर ), कुक्कुट ( मुर्गा ), कङ्क ( डोमकाक ' कङ्कः ब्यात् कङ्कमल्लाख्यो बाणपत्राईपक्षकः । लोहपृष्ठो दीर्घपादः पक्षाधः पाण्डुवर्णभाक् । ' ) शारपद, इन्द्राभ, गोनर्द, ( ये सभी कंक पक्षी के भेद है ), गिरिवर्तक ( पहाड़ी वटेर ), क्रकर, अवकर और वारड ये वर्तकादिविष्किर वर्ग में संगृहीत हैं ॥ ४७-४९ ॥ विमर्श - विष्किर के दो वर्ग अलग - अलग बताये गये हैं । इसका कारण यह है कि इन १. ' पुष्करारी च ' ग., ' पुष्कराक्षश्च ' यो । २. ' माणतुण्डिकः ' ग. । ३. ' कशिकानी ' इति पा ० ।
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अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् ५३३ दोनों वर्गों के अलग - अलग गुण हैं जिनका वर्णन आगे करेंगे । यहाँ गुण भेद बताने के लिए ही इन्हें अलग - अलग पढ़ा गया है । शतपत्रो भृङ्गराजः कोयष्टिर्जीवजीवकः । कैरातः कोकिलोऽत्यूहो गोपापुत्रः प्रियात्मजः ॥ ट्टा लट्ट ( टू ) को बभ्रुर्वटहा डिण्डिमानकः । जटी दुन्दुभिपोक्कार लोहपृष्ठ कुलिङ्गकाः ॥ ५१ ॥
कपोत शुकशारङ्गाश्चिरटीकङ्कुयष्टिकाः । सारिका कलविङ्कश्च चटकोऽङ्गारचूडकः ॥ ५२ ॥
पारावतः पाण्ड ( न ) विक इत्युक्ताः प्रतुदा द्विजाः । प्रतुद्रपक्षि वर्ग ( चोंच या पओं से चोट करके खानेवाले पक्षी ) - शतपत्र, ( कठफोरनी पक्षी ), भृङ्गराज ( पक्षिराज जो भौरे के समान काले वर्ण का होता है ), कोयष्टि ( कोरुक् जो पक्षी कोरुक् कोरुक् का ही उच्चारण करता है ), जीवजीवक ( जो विष देख कर मर जाती है ), कैरात, ( पपीहा ) कोयल, अत्यूह, गोपापुत्र, प्रियात्मज, लट्टा, लट्टषक ( भरद्वाज पक्षी का भेद ), वभ्रु, वटहा, डिण्डिमानक ( नगारे को तरह मोटा भयंकर शब्द करनेवाला पक्षी ), जटी ( गीध ), दुन्दुभि, पाक्कार, लोहपृष्ठ ( चटक भेद ), कुलिङ्गक ( वन्य चटक ), कपोत ( कबूतर ), सुग्गा, शारङ्ग, चिरटी, कङ्कुयष्टिका, सारिका ( मैना ), कलविङ्क ( ग्राम्य चटक ), चटक ( गौरैया ), अङ्गार-चूड़क ( बुलबुल ), पारावत ( परेवा कबूतर ), पाण्डविक ( कबूतर का भेद या पण्डूक पक्षी ), इस प्रकार प्रतुद पक्षियों का वर्ग कह दिया गया है ॥ ५०-५२ ॥ प्रसह्य भक्षयन्तीति प्रसहास्तेन संज्ञिताः ॥ ५३ ॥
भूशया बिलवासित्वादानूपानूपसंश्रयात् । जले निवासाजलजा जलेचर्याजलेचराः ॥५४ ॥
स्थलजा जाङ्गलाः प्रोक्ता मृगा जाङ्गलचारिणः । विकीर्यं विष्किराश्चेति प्रतुद्य प्रतुदाः स्मृताः ॥ योनिरष्टविधा त्वेषा मांसानां परिकीर्तिता । प्रसह आदि मांसवर्गों की परिभाषा: - १. प्रसह - जो पक्षी या पशु दूसरे से आहार द्रव्य को बलात्कार छीन कर खा जाते हैं उन्हें प्रसह कहा जाता है । १. भूशय - जो बिल में निवास करते हैं उसे भूशय कहते हैं । ३. अनूप - आनूप देश में जो रहते हैं उन्हें आनूप कहते हैं । ४. वारिशय ( जलज ) – जो जल में निवास करते हैं उन्हें जलज कहते हैं । ५. जलेचर – जो जल मैं चला करते हैं उन्हें जलचर ( वारिचर ) कहते हैं । ६. जांगल - जो स्थल ( भूमि ) पर उत्पन्न होते हैं और जंगल में चलते - फिरते हैं उन्हें जाङ्गल कहते हैं । ७. विष्किर पक्षी - जो पक्षी अपनी चोंच या पैर से कुरेद कर आहार द्रव्य को खोज कर खाते हैं उन्हें विष्किर कहते हैं । ८. प्रतुद पक्षी — जो पक्षी अपनी चोंच से या पैर से बार - बार आघत कर आहार करते हैं उन्हें प्रतुद कहा जाता है । इस प्रकार यह मांस की योनि आठ प्रकार की बताई गई है ॥ ५३-५५ ॥ प्रसहा भूशयानूपवारिजा वारिचारिणः ॥ ५६ ॥
* गुरूणस्त्रिग्धमधुरा बलोपचयवर्धनाः । वृष्याः परं वातहराः कफपित्तविवर्धनाः ॥ ५७ ॥
हिता व्यायामनित्येभ्यो नरा दीप्तान्नयश्च ये । प्रसहानां विशेषेण मांसं मांसाशिनां भिषक ॥ जीर्णाशग्रहणीदोषशोषार्तानां प्रयोजयेत् । प्रसहादि मांस वर्ग के गुण - प्रसह, भूशय, आनूप, वारिज और वारि ( जल ) चारी प्राणियों का मांस सामान्यतः भारी, उष्ण, स्निग्ध और रस में मधुर होता है । बल का उपचय ( वृद्धि ) करने १. ' धाङ्कोर ' यो । २. ' आनूपानूपसंश्रयादिति पूर्वत्रासिद्धविधेरनित्यत्वादानूपाऽनूपसंश्रयादित्यत्र लोपस्य सिद्धत्वे-नैवं संहिता ज्ञेया ' चक्रः । अनूपोऽनूपसंश्रयात् ' यो. । ३. ‘ त्वेषाम् ' ग. ।
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५३४. चरकसंहिता वाला होता है । वीर्य को अधिक रूप में बढ़ाता है, वातशामक होता है, कफ और पित्त को बढ़ाने वाला होता है । जो व्यक्ति निरन्तर व्यायाम करता है और जिसकी अनि दीप्त है ऐसे व्यक्तियों के लिए इन प्रसह आदि प्राणियों के मांस हितकर होता है । विशेषकर मांस खाने वाले व्यक्तियों के लिए प्रसह आदि पशु - पक्षियों के मांस को वैद्य पुराना अर्श रोग, पुरानी ग्रहणी और पुराना शोष ( यक्ष्मा ) में प्रयोग करावें ॥ ५६-५८ ॥ लावाद्यो वैष्कि वर्गः प्रतुदा जाङ्गला मृगाः ॥ ५ ९ ॥ लघवः शीतमधुराः सकषायो हिता नृणाम् । पित्तोत्तरे वातमध्ये सन्निपाते कफानुगे || ६० ॥ ९ और भी - लवा आदि विष्किर, प्रतुद और जांगल मृगों का मांस गुण में लघु, वीर्य में शात, रस में मधुर और कषाय होता है । इनके मांस पित्तप्रधान, मध्यवात और हीनकफ वाले संन्निपात रोग में रोगियों के लिए हितकर होता है ॥ ५ ९ -६० ॥ विष्किरा वर्तकाद्यास्तु प्रसहाल्पान्तरा गुणैः । वर्त्तक आदि विष्किर पक्षी का मांस, प्रसह पक्षी के मांस के समान गुण वाला होता है । पर
उसका मांस कुछ गुण में न्यून होता है ।
नातिशीत गुरुस्निग्धं मांसमाजमदोषलम् ॥ ६१ ॥।
शरीरधातुसामान्यादनभिष्यन्दि बृंहणम् । बकरे के मांस का गुण – बकरे का मांस न अधिक शीतल, न अधिक गुरु, न अधिक स्निग्ध होता है इसलिए यह अदोषकर होता है । इसका मांस शारीरिक धातुओं के समान होता है । इसलिए सेवन करने पर दोष, धातु, मल के स्रोतों में कुंड उत्पन्न नहीं करता है और मांस को बढ़ाने वाला होता है ॥ ६१ ॥
मां मधुरशीतत्वाद् गुरु बृंहणमाविकम् ॥ ६२ ॥
भेड़ के मांस का गुग • भेड़ का मांस रस में मधुर, वीर्य में शीत गुण में भारी और मांस-वर्धक होता है ॥ ६२ ॥
* योनावजाविके मिश्रगोचरत्वादनिश्चिते । सामान्येनोपदिष्टानां मांसानां स्वगुणैः पृथक् ॥ । सामान्यतः आठ प्रकार के मासवर्ग ऊपर बताये गये हैं, उन वर्गों में वकरी और भेड़ की गणना नहीं की गई है । इसका कारण यह है कि ये सभी देश में पाये जाते है इसलिये इन्हें न आनूप न जांगल वर्ग में रखा जा सकता है । अतः उनकी योनि अनिश्चित होने के कारण उन दोनों के गुणों को अलग बनाया गया है ॥ ६३ ॥
केषांचिद्गुणवैशेष्याद्विशेष उपदेक्ष्यते । सामान्य रूप से बनाये हुए मांस वर्गों के गुणों में कुछ ऐसे भी मांस होते है जिनमें अपना
विशिष्ट गुण होता है ऐसे कुछ द्रव्यों की गुण विशेषता का उपदेश किया जाता है ।
दर्शनश्रोत्रमेधाग्निवयोवर्णस्वरायुषाम् ॥ ६४ ॥
वहीं हितमो बल्यो वातघ्नो मांसशुक्रलः । गुरूणस्त्रिग्धमधुराः स्वरवर्णवलप्रदाः ॥ ६५ ॥
बृंहणाः शुक्रलाोक्ता हंसा मारुतनाशनाः । स्निग्धाश्रोष्णाश्च वृष्याश्र बृंहणाः स्वरबोधनाः ॥ * बल्याः परं वातहराः स्वेदनाश्चरणायुधाः । गुरूष्णो मधुरो नातिधन्वानूपनिषेवणात् ॥६७ ॥
तित्तिरिः संजयेच्छीघ्रं त्रीन् दोषाननिलोल्बणान् । पित्तश्लेष्मविकारेषु सरक्तेषु कपिञ्जलाः ॥ मन्दवातेषु शस्यन्ते शैत्यमाधुर्यलाघवात् । मयूर के मांस का गुण - मयूर का मांस नेत्र, कान, धारणा शक्ति, जठराग्नि, वय, वर्ण, स्वर १. ' योनावजावी व्यामिश्र ' ग. ।
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अन्नान विध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् और आयु के लिए अधिक हितकारी होता है यह बलवर्धक, वातशामक, मांस और वाला होता है । शुक्र ५३५, को बढ़ाने हंस के मांस का गुण इंस का मांस गुरु, उष्ण, स्निग्ध और रस में मधुर होता है । स्वर, वर्ण और वल को देने वाला होता है, मांस और शुक्र को बढ़ाता है और वातशामक होता है ॥ मुर्गे के मांस का गुण - मुर्गे का मांस स्निग्ध, उष्ण, शुक्रवर्धक, मांस वर्धक, स्वर बोधक, बलवर्धक, स्वेदवर्धक और विशेष रूप से वात को नष्ट करता है । तित्तिर के मांस का गुण -- ' तित्तर का मांस गुरु, उष्ण, रस में मधुर होता है । तित्तिर न अधिक जांगल देश में निवास करता है और न अधिक आनूप देश में अर्थात् साधारण देश में यह. निवास करता है । इसलिए वातप्रधान सन्निपात ज्वर का नाशक होता है ॥ गौरतित्तिर के मांस का गुण - गौर तित्तिर का मांस वीर्य में हलका होने के कारण रक्त के साथ पित्त एवं कफ से होने वाले रोगों में सन्निपात में लाभकारी होता है ॥ ६४-६८ ॥ लावाः कषायमधुरा लघवोऽग्निविवर्धनाः ॥ ६ ९ ॥ शीत, रस में मधुर और और हीनवात से उत्पन्न
सन्निपातप्रशमनाः कटुकाश्च विपाकतः । गोधा विपाके मधुरा कषायकटुका रसे ॥ ७० ॥
* वातपित्तशमनी बृंहणी बलवर्धनी । शलको मधुराम्लव विपाके कटुकः स्मृतः ॥ ७१ ॥
वातपित्तकफघ्नश्च कासश्वासहरस्तथा । कषायविशदाः शीता रक्तपित्तनिबर्हणाः ॥ ७२ ॥
विपाके मधुराचैव कपोता गृहवासिनः । तेभ्यो लघुतराः किंचित् कपोता वनवासिनः । शीताः संग्राहिणश्चैव स्वल्पमूत्रकराश्च ते । लवा के मांस का गुण लवा का मांस रस में कषाय और मधुर हलका, अग्निवर्धक, विपाक में कटु और सन्निपातजन्य विकारों को शान्त करने वाला होता है । गोह के मांस का गुण - • विपाक में मधुर रस में कषाय और कटु, मांसवर्धक, बलवर्धक वात और पित्त को शान्त करने वाला होता है । साही के मांस का गुण - साही का मांस रस में मधुर और खट्टा, विपाक में कटु, वात पित्त और कफ का नाशक, कास और श्वास रोग को दूर करनेवाला होता है । कबूतर के मांस का गुण - पालतू कबूतर का मांस रस में कषाय और गुण में विशद, वीर्य में शीत, विपाक में मधुर और रक्तपित्त रोग को दूर करनेवाला होता हैं । जङ्गली कबूतर का मांस गृहवासी ( पालतू ) कबूतरों की अपेक्षा कुछ लघु शीतवीर्य, संग्राही और मूत्र को अल्प मात्रा में उत्पन्न करना है ( अर्थात् बहुमूत्रनाशक है ) ॥ ६ ९ -७३ ॥ शुक्रमांसं कषायाम्लं विपाके रूक्षशीतलम् ॥ ७१ ॥
शोषकासक्षयहितं संग्राहि लघु दीपनम् । चटका मधुराः स्त्रिग्धा बलंशुकविवर्धनाः ॥ ७५ ॥
सन्निपान प्रशमनाः शमना मारुतस्य च । कपायो विशदो रूक्षः शीतः पाके कटुर्लघुः ॥
शशः स्वादुः प्रशस्तश्च संनिपातेऽनिलावरे । सुग्गे के मांस का गुण - मुग्गा का मांस रस में कषाय और अम्ल, रूक्ष और वीर्य में शीतल होता है । यह संग्राही, लघु और अग्निदीपक हैं, रोग में हितकारी होता है । चटक ( गौरैया ) के मांस का गुण -१. कपाया विशदाः ' ग. । विपाक में कटु, गुण में शोप, काम और क्षय • गौरैया का मांस रस में मधुर, स्निग्ध, बल और २. ' स्वल्पं मृदुतराच ' ग. । ३. ' कशीतलम् ' इति पा । ४. ' कफशुक्राभिवर्धनाः ' ग. ।
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५३६ चरकसंहिता वीर्य को बढ़ानेवाला होता है, सन्निपात रोगों का शामक और वृद्ध वात को शान्त करनेवाला है । खरहे के मांस का गुण खर का मांस रसमें कषाय और गुण में विशद, रूक्ष, वीर्य में शीत, विपाक में कटु और लघु और मधुर होता है । हीन वातवाले सन्निपात रोगों में लाभदायक होता है ॥ ७४-७६ ॥ मधुरा मधुराः पाके त्रिदोषशमनाः शिवाः ॥ ७७ ॥
लघवो बद्धविण्मूत्राः शीताचैणाः प्रकीर्तिताः । स्नेहनं बृंहणं वृष्यं श्रमन्नमनिलापहम् || ७८ ||
वराहपिशितं बल्यं रोचनं स्वेदनं गुरु । गव्यं केवलवातेषु पीनसे विषमज्वरे ॥ ७ ९ ॥
शुष्ककासश्रमात्यग्निमांसक्षयहितं च तत् । स्निग्धोष्णं मधुरं वृष्यं माहिषं गुरु तर्पणम् ॥ दार्थं बृहत्त्वमुत्साहं स्वप्नं च जनयत्यपि । ऐण ( मृगविशेष ) के मांस का गुण - एण का मांस रस और विपाक में मधुर, त्रिदोष शामक, शिव ( आरोग्यदायक ), लघु, वीर्य में शीतल और मल मूत्र को बाँधनेवाला होता है । सूअर के मांस का गुण - सूअर का मांस शरीर को स्निग्ध करता हैं, मांसवर्धक और शुक्र वर्धक है, श्रम एवं वृद्ध वात को शान्त करता है । बलवर्धक, रुचिकर, स्वेदकारक और पचने में भारी होता है । गोमांस का गुण - गौ का मांस केवल वानजन्य रोगों में, पीनस रोग में, विषम ज्वर में, सूखी खाँसी में, परिश्रम करने पर, भस्मक रोग में और मांसक्षयजन्य रोगों में हितकारी होता है ॥ I भैंस का मांस शरीर भैंस के मांस का गुण में स्निग्धता लानेवाला, उष्ण, रस में मधुर, शुक्रवर्धक, पचने में गुरु और शरीर को तृप्त करता है, दृढ़ता, मोटापन, उत्साहवर्धक और निद्रा लानेवाला होता है ॥ ७७-८० ॥ 8 गुरूष्णा मधुरा बल्या बृंहणाः पवनापहाः ॥ ८१ ॥
मत्स्याः स्निग्धाश्च वृप्याश्च बहुदोषाः प्रकीर्तिताः ।
* शैवालशप्पभोजित्वात्स्वप्नस्य च विवर्जनात् ॥ ८२ ॥
रोहितो दीपनीयश्च लघुपाको महाबलः । वेर्ण्यो वातहरो वृप्यश्चतुष्यो बलवर्धनः ॥ ८३ ॥
मेधास्मृतिकरः पथ्यः शोषघ्नः कूर्म उच्यते । मछली का गुण - सामान्यतः सभी मछलियों का मांस, पचने में भारी, गरम, मधुर् बलवर्धक, मांसवर्धक, वातनाशक, स्निग्ध और शुक्रवर्धक होता है, और दोषों को अधिक मात्रा में बढ़ताहै रोहू मछली का गुण शेवाल ( सेवार ) का भोजन करने, घास खाने और निद्रा नहीं सेवन करने से, रोहू का मांस अग्निदीपक, पकने में हल्का और महाबलकारक होता है । कछुए के मांस का गुण - कछुए का मांस शरीर में वर्ण ( रूप ) को निखारता है । वात-नाशक, शुक्रवर्द्धक, नेत्र के लिए लाभकारी, वलवर्द्धक, धारणा शक्ति और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला, पथ्य है और यक्ष्मा को दूर करता है ॥ ८१-८३ ॥ खड्गमांसमभिष्यन्दि चलकृन्मधुरं स्मृतम् ॥ ८४ ॥
स्नेहनं बृंहणं वर्ण्यं श्रमध्नमनिलापहम् । धार्तराष्ट्रचकोराणां दक्षाणां शिखिनामपि ॥ ८५ ॥
चटकानां च यानि स्युरण्डानि च हितानि च । क्षीणरेतःसु कासेषु हृद्रोगेषु क्षतेषु च ॥८६ ॥
मधुराण्यविदाहीनि सद्योबलकराणि च । १. ' बल्यः ' इति पा ० ।
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अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् ५३७ खड्ग ( गेड़ा ) का मांस - कफकारक, बलकारक और मधुर होता है । यह स्नेहन और वृंहण के लिए प्रयुक्त होता है । वर्ण को निखारता, श्रम और वातविकार को दूर करता है । हंस आदि पक्षियों के अंडों के गुण - धार्तराष्ट्र ( हंस का भेद ), चकोर, मुर्गी, मोर, चटक, आदि पक्षियों के अण्डे, जिन मनुष्यों की धातु क्षीण हो गई है उनके लिए और कास, हृदय रोग एवं उरःक्षत में हितकारी होते हैं । रसमें मधुर, विदाह को नहीं करनेवाले और शीघ्र ही बल को देनेवाले होते हैं ॥ ८४-८६ ॥ विमर्श - धार्तराष्ट्र हंस का एक भेद माना जाता है जैसा कि - ( चरकोपस्कार में कहा है ) “ राजहंसास्तु ते चञ्चचरणैर्लोहितैः सिताः । मलिनैर्मल्लिकाख्यास्तु धार्तराष्ट्राः सितेतरैः ॥ ' शरीरबृंहणे नान्यत् खाद्यं मांसाद्विशिष्यते ॥ ८७ ॥
इति वर्गस्तृतीयोऽयं मांसानां परिकीर्तितः । शरीर को बढ़ानेवाले मांस को छोड़कर अन्य दूसरा कोई खाद्य पदार्थ नहीं है । इस प्रकार यह मांस का तीसरा वर्ग कह दिया गया है ॥ ८७ ॥
अथ शाकवर्गः: -पाठाशुषाशटीशाकं वास्तुकं सुनिषण्णकम् ॥ ८८ ॥
B विद्याग्राहि त्रिदोषघ्नं भिन्नवर्चस्तु वास्तुकम् । त्रिदोषशमनी वृष्या काकमाची रसायनी ॥
नात्युष्णशीतवीर्या च भेदिनी कुष्ठनाशिनी । राजतवकशाकं तु त्रिदोषशमनं लघु ॥ ९ ० ॥
ग्राहि शस्तं विशेषेण ग्रहण्यर्शोविकारिणाम् । कालशाकं तु कटुकं दीपनं गरशोफजित् ॥९ १ ॥ ४. शाक वर्ग ( Class of Vegetables ) पाठा, शुषा ( कसौंजी ), शटी ( कचूर ), वथुआ, तीनपतिया ( चांगेरी, ) इनके शाक ग्राही ( दस्त को बन्द करने वाले ) और त्रिदोषनाशक होते हैं । वथुआ तो मल को पतला करनेवाला होता है । मकोय का शाक - त्रिदोषशामक, शुक्रवर्द्धक, रसायन, कुष्ठनाशक और मल का भेदन करने-वाला होता है । इसका शाक वीर्य में अत्यन्त न उष्ण है न अत्यन्त शीतल है । राजक्षवक का शाक - दोष का शामक, गुग में लघु, मल, मूत्र को बाँधनेवाला, विशेषकर ग्रहणी, अर्श के रोगियों के लिये हितकारी होता है । कालशाक का गुग — यह रस में कटु, अग्निदीपक, कृत्रिम विष और शोध को दूर करनेवाला होता है ॥ ८८ - ९ १ ॥ लघुष्णं वातलं रूक्षं कालायं शाकमुच्यते । दीपनी चोप्णवीर्या च ग्राहिणी कफमारुते ॥९ २ ॥ प्रशस्यतेऽम्लचाङ्गेरी ग्रहण्यशहिता च सा । मधुरा मधुरा पाके भेदिनी श्लेष्मवर्धनी ॥ वृष्या स्निग्धा च शीता च मदघ्नी चाप्युपोदिका । मटर के शाक का गुण - मटर का शाक गुण में लघु, वीर्य में उष्ण, वातवर्धक और रूक्ष होता है । खट्टी चांगेरी - अग्निदीपक, वीर्य में उष्ण, मल को बाँधनेवाली, कफ और वातजन्य विकारों में लाभकारी तथा ग्रहणी और अर्श रोग में हितकारी है । पोई का शाक - • रस और विपाक में मधुर, मल को भेदन करनेवाला, कफ को बढ़ानेवाला, शुक्र का वर्धक, स्निग्ध, वीर्य में शीतल और मद को नष्ट करनेवाला होता है ॥ ९ २ - ९ ३ ॥ १. ' वचभेदि च ' ग. । २. ' कालाख्यम् ' इति पा ० ।
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५३८ चरकसंहिता * रूक्षो मदविषघ्नश्च प्रशस्तो रक्तपित्तनाम् ॥ ९ ४ ॥
मधुरो मधुरः पाके शीतलस्तण्डुलीयकः । मण्डूकपर्णी वेत्राग्रं कुचेला वनतिक्तकम् ॥
कर्कोटकावल्गुजको पटोलं शकुलादनी । वृषपुष्पाणि शार्ङ्गष्टा केम्बुकं सकठिल्लकम् ॥ ९ ३ ॥ नाडी कलायं गोजिह्वा वार्ताकं तिलपर्णिका | कौलकं कार्कशं नैवं शाकं पार्पटकं च यत् ॥ कफपित्तहरं तिक्तं शीतं कटु विपच्यते । चौराई का शाक - रूक्ष, मद और सभी प्रकार के स्थावर एवं जंगम विष को दूर करनेवाला होता है । रक्तपित्त रोग के लिए लाभकारी है । रस और विपाक में मधुर और वीर्य में शीतल है । मण्डूकपर्णी आदि शाक ( मेढकपर्णी ), वेत्राग्र ( वेत के अग्रभाग के कोमल अंश ), कुचेला ( पाठा ), वनतिक्तक, कर्कोटक ( खेक्सा ), अवल्गुज ( वकुची की पत्ती ), पटोल ( परवर ) पत्र, शकुलादनी ( कुटकी की पत्ती ), वृषपुष्प ( अडूसा का फूल ), शार्गेष्टा ( कालीनकोय ), केम्बुक ( करेमू ), कठिल्लक ( करैला ) नाडी ( नाडी का शाक ), कलाय ( मटर का शाक ), गोजिहा, वार्ता ( बैगन ), तिलपर्णिक ( हुरहुर ), कौलक, कार्कश, नैम्ब ( नीम की पत्ती ), पाटक ( पित्तपापड़ा ) ये सभी शाक वर्ग कफ और पित्त के शामक रस में तिक्त, वीर्य में शीत और विपाक में मधुर होता है ॥ ९ ४ - ९ ७ ॥ सर्वाणि सूप शाकानि फञ्जी चिल्ली कुतुम्बकः ॥ ९ ८ ॥
आलुकानि च सर्वाणि सपत्राणि कुटिञ्जरम् । शणशाल्मलिपुष्पाणि कर्बुदारः सुवर्चला ॥
निष्पावः कोविदार पत्रपर्णिका । कुमारजीवो लोट्टाकः पालङ्कया मारिषस्तथा ॥
कलम्वनालिकासुर्यः कुसुम्भवृकधूमकौ । लक्ष्मणा च प्रपुन्नाडो नलिनीका कुठेरकः ॥१०१ ॥
लोणिका यवशाकं च कुष्माण्डकमवल्गुजम् । यातुकः शालकल्याणी त्रिपणीं पीलुपर्णिका ॥
शाकं गुरु व रूक्षं च प्रायो विष्टभ्य जीर्यति । मधुरं शीतवीर्यं च पुरीषस्य च भेदनम् ॥ स्विन्नं निष्पीडितरसं स्नेहाढ्यं तत् प्रशस्यते । सभी सूक्ष्य शाक ( अर्थात् जिनके दानों का दाल बनती है ) - उन सभी मूंग, मटर, उर्द, रहर आदि की पत्ती का शाक, फजी ( भारंगी, बभनेठी ), चिल्ली ( वनवथुवा ), कुतुम्बक ( गूमा की पत्ती ), आलू ( सभी प्रकार के आलू की पत्ती का साग ), कुटिअर ( ताम्रमूली ), शण ( सन की पत्ती या फूल ), सेमर का फूल, कर्बुदार ( कचनार ), सुवर्चला, निष्पाव ( सेम ), कोविदार ( लाल कचनार का फूल ), पत्तूर ( चौराई का भेद ), चुच्चपर्णी ( बड़ी चेत्र का भेद ), कुमारजीव ( जीवंती ), लोट्टक ( मसी का भेद, ) पालक्य ( पालक ), मारिष ( मर्सा ), कलम्बी ( करेमू ), नालिका ( नाई ), आसुरी ( राई ), कुसुम्भ ( बरें ), वृकधूमक, लक्ष्मणा ( लक्ष्मणा की पत्ती का शाक ), प्रयुन्नाड ( चकवड़ ), नलिनी ( कमल के डंठल, पत्ती, फूल आदि ) अथवा नील की पत्ती, कुठेरक ( वन तुलसी ), लोणिका ( नोनी ), यवशाक ( दथुवा ), कुष्माण्ड ( सफेद कोहड़ा ), अब्ज ( त्रकुची की पत्ती ), यातुक ( सफेद सरिवन ), शालकल्याणी ( चौराई का भेद ), त्रिवणीं ( हंसपदी ), पीलुषणिक ( मूर्खों की पत्ती ), इन सभी शाक वर्गों का गुण गुरु और रूक्ष होता है । प्रायः कब्जियत करने के बाद पचता है । रस में मीठा, वीर्य में शीतल और मल का भेदन करनेवाला होता है । इन सभी शाकों को उबाल कर, रस को निचोड़ कर, घी में मूनकर खाने से लाभकारी सिद्ध होता है ॥ ९८-१०३ ॥ शणस्य कोविदारस्य कर्बुदारस्य शात्मलेः ॥ १०४ ॥
पुष्पं ग्राहि प्रशस्तं च रक्तपित्ते विशेषतः । न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्नक्षपद्मादिपल्लवाः ॥ १०५ ॥
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अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम्
कषायाः स्तम्भनाः शीता हिताः पित्तातिसारिणाम् ।
वायुं वत्सादनी हन्यात् कफं गण्डीरचित्रकौ ॥ १०६ ॥
५३६ श्रेयमी बिल्वपर्णीच बिल्वपत्रं तु वातनुत् । भण्डी शतावरीशाकं बला जीवन्तिकं च यत् ॥ पर्वण्याः पर्वपुण्याश्च वातपित्तहरं स्मृतम् । लघु भिन्नशकृत्तित्तं लाङ्गलक्युरुबूकयोः ॥ तिलवेतसशाकं च शाकं पञ्चाङ्गुलस्य च । वातलं कटुतिक्ताम्ल मधोमार्ग प्रवर्तनम् ॥१० ९ ॥ रूक्षाम्लमुष्णं कौसुम्भं कफनं पित्तवर्धनम् । सन, कोविदार ( लाल कचनार ), कर्बुदार ( सफेद कचनार ) और सेमर का फूल -मल को बांधनेवाला और रक्त पित्त रोग में विशेष लाभकारी हैं । न्यग्रोध ( वट ), उदुम्बर ( गुल्लर ), पीपल, पकड़ो और कमल आदि की पत्तियाँ ----- रस में कषाय, स्तम्भन, वीर्य में शीतल और पित्तजन्य अतिसार को दूर करनेवाली होती हैं । वत्सादनी ( गुडूची ) का -शाक - खाने से बढ़ी हुई दायु नष्ट होती है । गण्डीर और चित्रक की पत्ती का शाक — बढ़े हुए कफ को दूर करता है । श्रेयसी ( गज पीपल ), बिल्वपर्णी और बेल - पत्र का शाक वातविकार को दूर करता है । भण्डी ( निशोथ ) की पत्ती का शाक, शतावर की पत्ती, बरियारा की पत्ती, जीवन्ती की पत्ती, पर्वगी ( दूब ) और पर्वपुष्पी - इनके शाक, वात पित्त को दूर करने वाले होते हैं । लाङ्गलकी ( कलिहारी ) की पत्ती के, उरुवूक ( रक्त एरण्ड ) की पत्ती के शाक – लघु, तिक्त और मल का भेदन करते हैं । तिल, बेंत और श्वेत एरण्ड की पत्ती के शाक - वातल, कटु, तिक्त और अम्ल होते हैं, वायु को अधो मार्ग से अर्थात् मल - मूत्र के मार्ग से निकालने वाले होने हैं । बर्रे का शाक - रुक्ष, अम्ल, उष्ण, कफशामक और पित्तवर्धक होता है ॥ १०४-१०९ ॥ पुर्वारुकं स्वादु गुरु विष्टम्भि शीतलम् ॥ ११० ॥
मुखप्रियं च रूक्षं च मूत्रलं त्रपुसं त्वति । एर्वारुकं च संपक्कं दाहतृष्णाकुमातिनुत् ॥१११ ॥
वर्चोभेदीन्यलाबूनि रूक्षशीतगुरूणि च । चिर्भटैर्वारुके तद्वद्वचभेदहिते तु ते ॥ ११२ ॥
सत्तारं पक्ककूष्माण्डं मधुराम्लं तथा लघु । सृष्टमूत्रपुरीषं च सर्वदोषनिवर्हणम् ॥ ११३ ॥
केलूटं च कदम्बं च नदीमापकमैन्दुकम् । विशदं गुरु शीतं च समभिव्यन्दि चोच्यते ॥
पुष ( खीरा ), एर्वारुक ( ककड़ी ), ये मधुर, गुरु, कब्ज करने वाले, शीतल, मुख के लिये प्रिय, रूक्ष और विशेष कर खीरा अति मूत्रल होता है । पकी हुई ककडी अन्तर्दाह, प्यास, क्लम - जन्य कष्ट को दूर करने वाली होती है । अलावू ( कद्द्द्द् ) का शाक - मल को भेदन करने वाला, शीतल, रूक्ष और भारी होना है । चिरभटी ( फूट ) और एर्वारुक इन दोनों के कच्चे फल का शाक - उसी प्रकार मल को भेदन करने वाले, रूक्ष, शीतल और गुरु होते हैं । पर विशेषकर वर्चोभेद ( अतिसार ) रोग में एकत्रित मल को निकाल कर अतिसार को दूर करते हैं । पके हुये कूष्माण्ड ( श्वेत कोहड़ा ) का शाक - क्षारयुक्त, मथुर और अम्ल, गुण से हल्का होता है । मल, मूत्र को निकालने वाला और सभी दोपों को दूर करने वाला होता है । केलूट ( कठगुल्लर ), कदम्ब, नदीमाषक, ऐन्दुक इनके शाक विशद, गुरु, वीर्य में शीत, और कफकारक होते हैं ॥ ११०-११४ ॥
उत्पलानि कषायाणि रक्तपित्तहराणि च । तथा तालप्रलम्बं स्यादुरःक्षतरुजापहम् ॥११५ ॥
खर्जूरं तालशस्यं च रक्तपित्तक्षयापहम् । तरूटविसशालूकक्रौञ्चादनकशेरुकम् ॥ ११६ ॥
शृङ्गाटकाङ्क लोड्यं च गुरु विष्टम्भि शीतलम् । कुमुदोत्पलनालास्तु सपुष्पाः सफलाः स्मृताः ॥
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I चरकसंहिता शीताः स्वादुकपायास्तु कफमारुतकोपनाः । उत्पल ( नील कमल की पत्ती का शाक ) D यह कषाय और रक्तपित्त नाशक होता है । ताल के बाल ( जो लटका हुआ होना है जिसे काटकर ताड़ी निकाली जाती है ) का शाक उरक्षत- रोगजन्य वेदना को शान्त करने वाला होता है । खजूर का फल और ताड़ फल के भीतरी भाग की मज्जा ( खज्जा ) का शाक - रक्तपित्त और क्षय रोग को दूर करता है । तरूट ( कुमदनी ) का कन्द, विष ( भिसाड़ ), शालूक ( कमलकन्द ) क्रौञ्चादन ( छोटा कशेरू ), कशेरुक ( बड़ा चिचोर ), श्रृंगाटक ( सिघाड़ा ), अङ्क लोड्य ( कमल का बीज ) इन सभी के शाक गुरु, विम्भी और वीर्य में शीत होते हैं ॥ ११५-११७ ॥ कोई और नील कमल की नाल, फूल, फल -- शीतल, मधुर और कषाय तथा कफ और वायु
को कुपित करने वाले होते हैं ।
कषायमीपद्विष्टम्भ रक्तपित्तहरं स्मृतम् ॥ ११८ ॥
पौष्करं तु भवेद्वीजं मधुरं रसपाकयोः । बल्यः शीतो गुरुः स्त्रिग्धस्तर्पणो बृंहणात्मकः ॥ वातपित्तहरः स्वादुर्वृष्यो मुञ्जातकः परम् । जीवनो बृंहणो वृष्यः कण्ट्यः शस्तो रसायने ॥ विदारिकन्दो बल्यश्च मूत्रलः स्वादुशीतलः । कमल के बीजों का शाक - रस में कषाय और कुछ कब्जकारी होता है तथा रक्तपित्त का नाशकरने वाला है । और रस एवं विपाक में मधुर होता है । मुञ्जातक ( यह एक कन्द होता है जो उत्तर भारत में अधिकांश होता है ) का शाक - बल को बढ़ाने वाला, वीर्य में शीत, गुरु, स्निग्ध, तर्पक और मांस को बढ़ाने वाला होता है । वात - पित्त नाशक, रस में मधुर और अधिक शुक्रवर्द्धक होता है । विदारीकन्द्र का शाक - जीवन शक्ति को देने वाला, बृंहण, शुक्र को बढ़ाने वाला, कण्ठ रोगों में लाभकारी और रसायन प्रयोग में श्रेष्ठ होता है । बलवर्धक, मूत्रवर्धक, रस में मधुर और वीर्य में शीतल होता है ॥ ११८-१२० ॥ अम्लिकायाः स्मृतः कन्दो ग्रहण्यर्शोहितो लघुः ॥ १२१ ॥
नात्युष्णः कफवात ग्राही शस्तो मदात्यये । त्रिदोषं बद्धविण्मूत्रं सार्षपं शाकमुच्यते ॥ ( तद्वत् स्याद्रक्तनालस्य रूक्षमम्लं विशेषतः । ) तद्वत् पिण्डालुकं विद्यात् कन्दत्वाच्च मुखप्रियम् । सर्पच्छत्रक वर्ज्यास्तु वह्नयोऽन्याश्छन्न्रजातयः ॥ शीतः पीनसकश्च मधुरा गुर्व्य एव च । चतुर्थः शाकवर्गाऽयं पत्रक्रन्दफलाश्रयः ॥ १२४ ॥
अम्लिका का कन्द - • ग्रहणी, अर्श रोगों में हितकारी और लघु होता है । यह रोग अविक में उष्ण नहीं होता, कफ एवं वायु - नाशक होता है । मलों को बाँधता है । मदात्यय लाभकारी होता है । सरसों का शाक - • त्रिदोषवर्धक, मल को बाँधने वाला, मूत्र को रुक - रुक कर निकालने है | ) वाला होता है । ( इसी प्रकार रक्तनाल ( पटुवा ) का शाक - रूक्ष और विशेषकर अम्ल होता पिण्डालु - यह भी सरसों की भाँति त्रिदोषकारक, मल, मूत्र को बाँधने वाला होता है । कन्द होने के कारण यह मुख के लिये अत्यन्त प्रिय होता है । सर्पच्छत्रक को छोड़ कर अन्य सभी छत्रक जाति के शाक -कारक, रस में मीठे, गुण में गुरु होते हैं । इस प्रकार यह पत्र, शाक वर्ग समाप्त हुआ ॥ १२१-१२४ ॥ वीर्य में शीत, पीनस रोग चौदा कन्द, फल का आश्रयभूत
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अन्नपानविध्यध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् ५४१ अथ फलवर्गः-तृष्णादाहज्वरश्वासरक्तपित्तक्षतक्षयान् । वातपित्तमुदावर्त स्वरभेदं मदात्ययम् ॥ १२५ ॥
तिक्तास्यतामास्यशोषं कासं चाशु व्यपोहति । मृद्दोका बृंहणी वृप्या मधुरा स्निग्धशीतला ॥ ५. फल वर्ग ( Class of Fruits ) मुन्नका —— यह प्यास, अन्तर्दाह, ज्वर, दमा, रक्तपित्त, उरःक्षत, क्षयरोग, वात, पित्त, उदावर्तरोग, स्वरभेद, मदालयरोग, मुख में तिक्त रस का होना, मुखशोष और कास रोग को शीघ्र दूर करने वाला होता है । यह मांसवर्धक, शुक्रवर्धक, रस में मधुर, स्निग्ध और वीर्य में शीतल होता है ॥ १२५-१२६ ॥ ॐ मधुरं बृंहणं वृष्यं खर्जूरं गुरु शीतलम् । क्षयेऽभिवाते दाहे च वातपित्ते च तद्धितम् ॥ खजूं ( छोहाड़ा ) रस में मधुर, मांस को बढ़ाने वाला, शुक्रवर्धक, गुरु और वीर्य में शीतल है । क्षय, आघात लगने पर, अन्तर्दाह होने पर और वात - पित्तजन्य रोगों में हितकारी होता है ॥ १२७ ॥
बृंहणं फल्गु गुरुविष्टम्भि शीतलम् । परूपकं मधूकं च वातपित्ते च शस्यते ॥ १२८ ॥
फल्गु ( अंजीर ) - शरीर को तृप्त करने वाला मांसवर्धक, गुरु, विष्टम्भी और शीतल होता है । फालसा और महुवा - ये दोनों वान पित्तज रोगों में अधिक उपकारी होते हैं ॥ १२८! मधुरं बृंहणं बल्यमाम्रातं तर्पणं गुरु । सस्नेहं श्लेष्मलं शीतं वृज्यं विष्टभ्य जीर्यति ॥ १२ ९ ॥ आम्रातक ( आमड़ा ) - रस में मधुर, मांसवर्धक, बलवर्धक और गुरु होता है । यह कुछ स्नेह से युक्त और कफवर्धक है । वीर्य में शीत, शुक्र को बढ़ाने वाला है और कब्ज कर के पचता है ॥ १२ ९ ॥
तालशस्यानि सिद्धानि नारिकेलफलानि च । बृंहणस्निग्धशीतानि बल्यानि मधुराणि च ॥
पका हुए ताल का फल और पका हुआ नारियल का फल - मांसवर्धक, स्निग्ध, वीर्य में शीत, बलवर्द्धक और मधुर होता है ॥ १३० ॥
मधुराम्लकषायं च विष्टम्भि गुरु शीतलम् । पित्तश्लेष्मकरं भव्यं ग्राहि वक्त्रविशोधनम् ॥ भव्य ( कमरख ) का फल - मधुर, खट्टा, कषाय, कब्ज करने वाला, गुरु और वीर्य में शीतल होता है । पित्त और कफ को बढ़ाने वाला, मल को बाँधने वाला और मुख को शुद्ध करने वाला होता है ॥ १३१ ॥
8 अम्लं परूपकं द्राक्षा बदराण्यारुकाणि च । पित्तश्लेष्मप्रकोपीणि कर्कन्धुनिकुचान्यपि ॥१३२ ॥
परुषक ( फालसा ) खट्टा फालसा, मुनक्का, खट्टी बेर, आलूबोखारा, छोटी बेर और बड़हल के फल पित्त और कफ को कुपित करने वाले होते हैं ॥ १३२ ॥
नात्युष्णं गुरु संपक्कं स्वादुप्रायं मुखप्रियम् । बृंहणं जीर्यति क्षिप्रं नातिदोपलमारुकम् ॥ आलू बोखारा — इसका पक्का फल अधिक उष्ण नहीं होता, गुरु होता है । प्रायः मधुर और खाने में प्रिय होता है । बृंहण, शीघ्र पचने वाला और अधिक मात्रा में दोषों को नहीं बढाता है ॥ १३३ ॥
द्विविधं शीतमुष्णं च मधुरं चाम्लमेव च । गुरु पारावतं ज्ञेयमरुच्यत्यग्निनाशनम् ॥ १३४ ॥
पारावत ( अमरूद ) - • मधुर और अम्ल दो तरह का होता है । मधुर पारावत - वीर्य में शीत, रस में मधुर और भारी होता है । अम्ल पारावत- वीर्य में उष्ण, अरुचिनाशक और अत्यग्नि को दूर करने वाला होता है ॥ १३४ ॥
१. ‘ संशुष्कं ’ यो. । २. ' संबृंहणं शीघ्रजरं ' ग. ।