चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 661–670

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 661–670

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५७२ चरकसंहिता १८. चर्मदल, १ ९. श्वित्र ( सफेद कुष्ठ ), २०. पामा २१. कोठ, २२. रक्तमण्डल ये रोग रक्त के दुष्ट होने से होते हैं ॥ ११-१२ ॥ - शृणु मांसप्रदोषजान् ॥ १३ ॥

अधिसार्बुदं कीलं गलशालूकशुण्डिके । पूतिमांसालजी गण्डगण्डमालो पजिह्विकाः ॥ १४ ॥

विद्यान्मांसाश्रयान्, – दुष्टमांसज रोग -- मांस - प्रदोष से होनेवाले रोगों को सुनो, १. अविमांस, २. अर्बुद, ३. मांसकील, ४. गलशालक, ५. गलझुण्डी, ६. पूतिमांस, ७. अलजी, ८. गण्ड - ( वा ), ९. गण्ड-नाला, १०. उपजिडिका ये रोग दूषित मांस से होते हैं ॥ १३-१४ ॥

- मेदःसंश्रयांस्तु प्रचच्महे । निन्दितानि प्रमेहाणां पूर्वरूपाणि यानि च ॥ १५ ॥

दुष्टमेदज रोग - दूषित भेद के आश्रित रोगों का वर्णन कर रहा हू, अष्टौ निन्दितीय नामक सूत्र स्थान के २१ अध्याय में जो आठ रोग निन्दित नाने गए हैं और प्रमेह के जितने भी पूर्वरूप होते हैं वे सभी मेत्र के दोष से होते हैं ॥ १५ ॥

अध्यस्थिदन्तौ दन्तास्थिभेदशूलं विवर्णता । केशलोमन खश्म थुदोषाश्चास्थिप्रदोषजाः || १६ || दुष्ट अस्थि के रोग - अध्यस्थि ( हड्डी के ऊपर अधिक हड्डियों का निकलना ), २. अधिदन्त ( दाँत पर अधिक दाँत निकलना ) ३. दन्तमेव, ४. दन्तशूल, ५. अस्थिभेद, ६. अस्थिशूल, ७. अस्थि और दाँतों में विवर्णता, ८. केश, लोम, नख, और दाड़ी के दोष, ये अस्थिदोष से होते हैं ॥ १६ ॥

रुक् पर्वणां भ्रमो मूर्च्छा दर्शनं तमसस्तथा । अरुषां स्थूलमूलानां पर्वजानां च दर्शनम् ॥ मज्जप्रदोषात्, --विकृत मज्जा के रोग - १. शरीर की ग्रन्थियों में वेदना, २. चक्कर का आना, ३. मूर्च्छा, ४. आँख के सामने अन्धकार के न रहते हुए भी अन्धकार का दिखाई पड़ना, ५. पर्वों में स्थूल मूलवाली फुंसियों का दिखाई पड़ना, ये मज्जा की विकृति से होते हैं ॥ १७ ॥

- शुक्रस्य दोपात् कुव्यमहर्षणम् । रोगि वा क्लीवमल्पायुर्विरूपं वा प्रजायते ॥ १८ ॥

न चास्य जायते गर्भः पतति प्रस्रवत्यपि । शुक्रं हि दुष्टं सापत्यं सदारं वाधते नरम् || शुक्र में हो जाने से नपुंसकता, २. मैथुन में उत्साह का न होना, दुष्ट शुक्रज रोग यदि सन्तान होती है तो नहीं, गर्म रखने पर गर्म का पाना अल्पायु अथ होती है या सन्तान होती ही हो जाया का है, दुष्ट हुआ शुक्र स्त्री औ " सन्तान के साथ उसके शरीर में बाधा उत्पन्न करता है ॥ १८-१९ ॥ इन्द्रियाणि समाश्रित्य प्रकुप्यन्ति यदा मलाः । उपवालोपतापाभ्यां योजयन्तीन्द्रियाणि ते । इन्द्रियोपज रोग - जब ये बात, वित्त, कफ दोष इन्द्रठा में जाकर कुपित होते है तो इन्द्रियों में उपनाम ( विकृति ) या उपधान ( नाश ) कर देते हैं ॥ २० ॥

स्नायौ सिराकण्डराभ्यो दुष्टाः क्लिश्नन्ति मानवम् । स्तम्भसंकोच खल्लीभिर्ग्रन्थिस्फुरण सुप्तिभिः ॥ ना आदि दोषज रोग www स्नायु, शिरा और कण्डरा ये जव दोष से दूषित होती है तो उनमें जकड़ाहट, मङ्कोच, खली, ग्रन्थि, स्फुरण और शून्यता से मनुष्य को कष्ट होता है ॥ २१ ॥

मलानाश्रित्य कुपिता भेदशोषप्रदूषणम् । दोषा मलानां कुर्वन्ति सङ्गोत्सर्गावतीव च ॥

नलगत दोषज रोग wwwwvale मलों ( मल, मूत्र, स्वेद ) में जब वातादि दोष कुपित होते है तो, १. ' न वा संजायते गर्भः ' इति पा. । २. स्नायुसिराकण्डराभ्यो दुष्टा ' इति पाठान्तरन् ।

पृष्ठ 662

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विविधाशितपीतीयाध्यायः २ = ] सूत्रस्थानम् ५७३ मलों का भेदन, शोषण और दूषित ( वर्ण, गन्ध में परिवर्तन ) करते हैं और कभी मलों की रुकावट, एवं कभी मात्रा से अधिक मों को प्रवृत्ति करते हैं ॥ १२ ॥

विविधादशितात् पीतादहिताल्लीढखादिनात् । भवन्त्येते मनुष्याणां विकारा य उदाहृताः ॥

तेषामिच्छन्ननुत्पत्तिं सेवेत मतिमान् सदा । हितान्येवाशितादीनि न स्युस्तज्जास्तथाऽऽभयाः ॥ अहित अशित आदि के गुण I अनेक प्रकार के अहितकर अशित, पीन, लांड और खादिन इन ४ प्रकारों के आहार सेवन से जो रोग मनुष्यों को होते हैं उनका वर्णन यहाँ कर दिया गया है । जो बुद्धिमान व्यक्ति यह चाहता है कि ये गे मुझे न हों तो उसे अशित आदि ४ प्रकार के हितकर आहार का सेवन करना चाहिए । ऐसा करने से अहितकर आहार से होने वाले रोग नहीं होते ॥ २३-२४ ॥ * रसजानां विकाराणां सर्वं लङ्घनमौषधम् । विधिशोगितिकेऽध्याये रक्तज्ञानां भिषग्जितम् ॥ रसजरोगों की चिकित्सा - रसज रोगों में सभी प्रकार के लङ्घनों का पालन करना ही औषध है । रक्तज रोगों की चिकित्सा सूत्र स्थान के २४ विधिशोगितिक नामक अध्याय में बनायी गई है ॥ २५ ॥

मांसजानांतु संशुद्धिः शस्त्रक्षाराग्निकर्म च । अष्टौनिन्दिति केऽध्याये मेदोजानां चिकित्सितम् ॥ मांसज रोगों की चिकित्सा मांस रोगों में संशुद्धि ( वननविरेचन ), शस्त्रकर्म, क्षारकर्म और अग्निकर्म के द्वारा उपचार किया जाता है । मेदोज रोगों की चिकित्सा अष्टौनिन्दितीय नानक २ अध्याय में बतायी गई है ॥ २६ ॥

अस्थ्याश्रयाणां व्याधीनां पञ्चकर्माणि भेषजम् । वस्तयः क्षीरसपीषि तिक्तकोपहितानि च ॥ अस्थिगत रोग की चिकित्सा - अस्थिओं के आश्रित रोगों में पञ्चकर्म कराना औषध है । इसमें विशेषकर बस्तियाँ और तिक्त वर्गों से सिद्ध किये गये दूध और घृत का प्रयोग करना हितकर होता है ॥ २७ ॥

शुक्रसमुत्थानामौषधं स्वादुतिक्तकम् । अन्नं व्यवायव्यायामौ शुद्धिः काले च मात्रया ॥ मज्जा और शुक्रगत रोगों की चिकित्सा -- मज्जा एवं शुक्रगत रोगों में मधुर और तिक्त अन्न, मैथुन, व्यायाम और उचित काल ( वसन्त में वमन, शरद में विरेचन इत्याद ) में और मात्रा से शोधन कराना, औषध है ॥ ३८ ॥

शान्तिरिन्द्रियजानां तु त्रिममये प्रवच्यते । स्वाय्वादिजानां प्रशमो वच्यते वातरोगिके ॥ इन्द्रियजन्य रोगों की चिकित्सा - • चिकित्सा स्थान के त्रिममय अध्याय में और स्नायु, शिरा, कण्डरा में होनेवाले रोगों की चिकित्सा, वात रोगों की चिकित्सा प्रकरण में कही जायगी || नवेगान्धारणेऽध्याये चिकित्सासंग्रहः कृतः । मलजानां विकाराणां सिद्धिश्रोक्ता कचित्कचित् ॥ मलज रोगों की चिकित्सा - मलज रोगों की चिकित्सा का संग्रह नवेगान्धारणीय अध्याय किया गया है, इसके अतिरिक्त भी कहीं कहीं चिकित्सा बतायी गयी है ॥ ३० ॥

व्यायामादूष्मणस्तैक्ष्ण्याद्वितस्यानवचारणात् । कोष्टाच्छाखा मला यान्ति द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ तन्रस्थाश्च विलम्बन्ते कदाचिन्न समीरिताः । नादेशकाले कुप्यन्ति भूयो हेतुप्रतीक्षिणः ॥ कोष्ठ से शाखाओं में दोषों के गमन के कारण १ अधिक व्यायाम करने से, २. ऊष्मा की तीक्ष्णता से, ३. हिनकर आहार और विहार का सेवन न करने से, ४. वायु की अतिशीत्र गति से दोष, कोष्ठ से शाखा ( रक्तादिधातवस्त्वक्च ) में चले जाते है और वहीं पर स्थित होकर प्रेरणा न मिलने पर कभी विलम्ब कर जाते हैं, पुनः दूसरे हेतु की प्रतीक्षा करनेवाले वे दोष बिना स्थान और समय के कुपित नहीं होते हैं ॥ ३१-३२ ॥

पृष्ठ 663

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५७४ चरकसंहिता विमर्श - इसी बात को वाग्भट ने स्पष्ट बताया है यथा- ' तत्रस्वाञ्च विलम्बेन भूयो हेतुप्रती क्षिणः । तें कालादिवलं लब्ध्वा कुप्यन्त्यन्याश्रयेष्वपि ॥ ' ( अ.हृ.सू. अ. १३ ) | यदि अपने कुपित होने का कारण दोषों को मिल जाता तो देश और अकाल में भी वे कोष्ठ से शाखा में जाकर रोग उत्पन्न करते हैं ।

वृद्वा विप्यन्दनात् पाकात् स्रोतोमुखविशोधनात् ।

शाखमुक्त्वा मलाः कोष्टं यान्ति वायोश्च निग्रहात् ॥ ३३ ॥

दोषों का शाखा से कोठ में जाने का कारण - १. वातादि दोपों के अधिक बढ़ने से, २. बहने का स्वभाव होने से, ३. दोषों का पाक हो जाने से, ४. स्रोतों के नुस्खों के शोधन से, ५. शरीर के अन्दर वायु के निग्रह से, मल ( दोष ) शादा को छोड़कर कोष्ठ में चले जाते हैं || ३३ || विमर्श - यद्यपि यहाँ मर्मास्थि सन्धियों में दोष कंसे जाते हैं इस पर प्रकाश नहीं डाला गया है, फिर भी वाग्भट ने इसे स्पष्ट बताया है । यथा – ' व्यायामाद्ष्मणस्तैक्ष्ण्याडहिनाचरणादपि । कोष्ठाच्छासास्थिमर्माणि द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ' ( अ. हृ. अ. १३ ) अजन्तानामनुत्पत्तौ जातानां विनिवृत्तये । रोगाणां यो विधिर्दृष्टः सुखार्थी तं समाचरेत् ॥ स्वस्थ और रोगियों के लिए लाभकर विवि - सुख की अभिलाषा रखने वाले पुरुषों के लिए यह आवश्यक है कि जो नहीं उत्पन्न हुए हैं उन रोगों की उत्पत्ति न होने दें और जो रोग उत्पन्न हो गये हैं उनकी शान्ति का जो उपाय बताया गया है उसका पालन अच्छी प्रकार करें ॥ ३४ ॥

सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः । ज्ञानाज्ञानविशेषात्तु मार्ग मार्गप्रवृत्तयः ॥ औरभी सभी प्राणियों की सभी प्रवृत्ति ( कार्य ) सुख के लिए ही होती है, पर जो मनुष्य ज्ञानपूर्वक कार्य करना है वह नुकर नार्ग में रहता है और जो अज्ञानपूर्वक कार्य करता है वह अकार्य ( दुःख ) का भागी होता है ॥ ३५ ॥

* हितमेवानुरुध्यन्ते प्रपरीचय परीक्षकाः । रजोमोहावृतात्मानः प्रियमेव तु लौकिकाः ॥३६ ॥

विद्वान और मूर्ख में अन्तर -: परीक्षक मनुष्य हिनकर और अहितकर कार्यों की परीक्षा करके जो हितकर कार्य होते हैं वही करते हैं । जिन लौकिक मनुष्यों की आत्मा रजोगुण और मोह ( तमोगुण ) से आवृत ( आच्छादित ) है, वे तत्काल प्रिय लगने वाले कार्य को ही करते है ॥ श्रुतं बुद्धिः स्मृतिर्दाच्यं धृतिर्हितनिषेवणम् । वाग्विशुद्धिः शमो धैर्यमाश्रयन्ति परीक्षकम् । लौकिकं नाश्रयन्त्येते गुणा मोहरजः श्रितम् । तन्मूला बहवो यान्ति रोगाः शारीरमानसाः ॥ परीक्षक मनुष्यों के गुण - १. शास्त्र का अभ्यास, २. सद् - असद् विवेकिनी बुद्धि, ३. स्मरग शक्ति, ४. कार्यदक्षता, ५. धारणा शक्ति, ६. हितकर वस्तुओं का ही सेवन, ७. वाणी की शुद्धता, ८. शान्ति, ९. धीरता ये नव गुण परीक्षकों में रहते हैं । रज और तम से जिन लोगों की आना आच्छादित है ऐसे लौकिक ( संसारी ) मनुष्यों में ये गुण नहीं रहते हैं । इन्हीं रज और मोह के कारण वह मनुष्य अनेकों शारीरिक एवं मानसिक रोगो का आश्रय होता है ॥ ३७-३८ ॥ ज्ञापराधाद्वय हितानर्थान् पञ्च निषेवते । संधारयति वेगांश्व सेवते साहसानि च ॥ ३ ९ ॥ तदात्वसुखसंज्ञेषु भावेष्वज्ञोऽनुरज्यते । रज्यते न तु विज्ञाता विज्ञाने ह्यमलीकृते ॥ ४० ॥

अज्ञानी व्यक्ति में दोष - अज्ञ ( अज्ञानी ) मनुष्य प्रज्ञापराध के द्वारा अहितकर पाँचो ज्ञानेन्द्रियों के पाँच विषयों का सेवन करता है; मल - मूत्रादि के वेगों को धारण करता है; अधिक रूप में साहसों का सेवन करता है । नाकालिक सुखकर ( पर परिगान ने असुखकर ) भावों में अनुराग १. शाखा इति ' रसादिधातून् ' शिवदासः । २. ‘ बहुवश्चैव ' ग. ।

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विविधाशितपीतीयाध्यायः २८ ] सूत्रस्थानम् ५७५ करता है और उसे सेवन करता है । जिन लोगों की आत्मा ज्ञान के प्रकाश से अमल ( स्वच्छ ) हो गई है ऐसे ज्ञानी पुरुष तात्कालिक सुखकर परन्तु परिणाम में अमुखकर भावों का सेवन नहीं करते हैं ॥ ३ ९ -४० ॥ * न रागान्नाप्यविज्ञानादाहारानुपयोजयेत् । परोच्य हितमश्नीयाद्देहो ह्याहारसंभवः ॥४१ ॥

आहारस्य विधाष्टौ विशेषा हेतुसंज्ञकाः । शुभाशुभसमुत्पत्तौ तान् परीचय प्रयोजयेत् ॥

हितकर आहार के फल - नग ( प्रिय होने के कारण ) से या अज्ञान से अहितकर आहार का प्रयोग नहीं करना चाहिए । परीक्षा करके हितकर आहार का ही सेवन करना चाहिए । क्योंकि शरीर आहार से ही उत्पन्न होता है । आहार की विधि में शुभ और अशुभ की उत्पत्ति में आठ विशेष कारण विमानस्थान के प्रथम अध्याय में बनाए जायेंगे । उनकी उचित परीक्षा करके प्रयोग करना चाहिए || ४१-४२ ॥ परिहार्याण्यपथ्यानि सदा परिहरन्नरः । भवत्यनृर्णतां प्राप्तः साधूनामिह पण्डितः ॥ ४३ ॥

अपथ्य त्याग का फल - त्याग करने योग्य अपथ्यों का सदा त्याग करता हुआ पण्डित मनुष्य साधु पुरुषों के ऋण से रहित हो जाता है ॥ ४३ ॥

यत्त रोग समुत्थानमशक्यमिह केनचित् । परिहर्तुं न तत् प्राप्य शोचितव्यं मनीषिभिः ॥

और --भी • जो रोगों का कारण किसी से अनेक उपाय करने पर भी दूर न किया जा सके, ऐसे रोगियों को प्राप्त कर बुद्धिमान वैद्य को शोक नहीं करना चाहिए ॥ ४४ ॥

तत्र श्लोकाः—

आहारसंभवं वस्तु रोगाश्चाहारसंभवाः । हिताहितविशेषाञ्च विशेषः सुखदुःखयोः ॥ ४५ ॥

सहस्वे चासत्वे च दुःखानां देहसच्ययोः । विशेषो रोगसङ्घाश्च धातुजा ये पृथक्पृथक् ॥

तेषां चैव प्रशमनं कोष्टाच्छाखा उपेत्य च । दोषा यथा प्रकुप्यन्ति शाखाभ्यः कोष्टमेत्य च ॥ प्राज्ञाज्ञयोर्विशेषश्च स्वस्थातुरहितं च यत् । विविधाशितपीतीये तत् सर्वं संप्रकाशितम् ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने विविधाशितपीतीयो नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

समाप्तोऽयं सप्तमोऽन्नपानचतुष्कः । अध्याय - उपसंहार - १. आहार से उत्पन्न होने वाली रसादि धातुयें २. अविधि आहार से उत्पन्न होने वाले रोग, ३. हिनकर और अहितकर भेदों से होने वाले सुख और दुःख, ४ दुःखों को महने और न सहने में जो शरीर एवं मन में विशेषता होती है, ५. धातुओं की विकृति से होने वाले रोगों के अलग - अलग समुदाय, ६. उन रोगों की चिकित्सा, ७. दोष, कोष्ठ से शाखाओं में आकर और शाखाओं से कोष्ठ में आकर जैसे कुपित होते हैं, ८. ज्ञानी और अज्ञानी में भेद, ९. स्वस्थ, आतुर के लिए हितकर उपदेश, ये सभी बातें इस विविधाशितपीत्रीय नामक अध्याय में प्रकाशित ( स्पष्ट ) कर दी गई है ॥ ४५-४८ ॥ चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के सूत्रस्थान में योजनाचतुष्का-विषयक ' विविधाशितपीतीय ' नामक अठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ || २८ ॥ १. ' अनृणतामिव प्राप्तोऽनृणतां प्राप्तः, एतेन परिहार्यपरिहारेण पुरुषकारेऽनपराधः पुरुषो भव-तीति दर्शयति ' चक्रः ।

पृष्ठ 665

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५७६ चरकसंहिता अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः अथातो दशप्राणायतनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद दशप्राणावतनीय नामक अध्याय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ दशैवायतनान्याहुः प्राणा येषु प्रतिष्ठिताः । शङ्खौ मर्मत्रयं कण्ठो रक्तं शुक्रौजसी गुदम् ॥ ( १ ) दश प्राणायतन ( Ten Life - Spots ) दश प्राणायतन - दो शंखप्रदेश तीन मर्मस्थान ( शिर, हृदय और वस्तिप्रदेश ), कण्ठ, रक्त, शुक्र, औज और गुद्रा ये दश प्राणायतन कहे जाते हैं, जिनमें प्रधान रूप से प्राणप्रतिष्ठित रहता है ॥ ३ ॥

विमर्श - उपर्युक्त को चरक शारीरस्थान सातवें अध्याय में इस प्रकार बताया है यथा— ' देश प्राणायतनानि - ' तद्यथा - मूर्धा, कण्टः, हृदयं, नानिः, गुदं वस्तिः, ओजः शुक्रं, शोणितं, मांमनिति । तथा— ' दश प्राणायतनानि, मूर्धा, जिड़ाबन्धनं, कण्टो, हृदयं, नाभिर्वन्तिर्गुद्रः शुक्रमोजो रक्तं चेति ( अष्टाङ्गसंग्रह ) तानीन्द्रियाणि विज्ञानं चेतनाहेतुमामयान् । जानीते यः स वै विद्वान् प्राणाभिसर उच्यते ॥ प्राणाभितर वैद्य का लक्षण - जो वैद्य १. दशाणायतन, २. इन्द्रियाँ ३. आयुर्वेदशास्त्र का विशेष ज्ञान, ४. चेतना - हेतु ( आत्मा ), ५. और रोगों को जानता है उस विद्वान वैद्य को प्राणा-भिसर कहते हैं ॥ ४ ॥

द्विविधास्तु खलु भिषजो भवन्त्यग्निदेश! प्राणानामेकेऽभिसरा हन्तारो रोगाणां, रोगाणामेकेऽभिसरा हन्तारः प्राणानामिति ॥ ५ ॥

( २ ) प्राणाभिसर ( Saviours of Lives ) तथा रोगाभिसर ( Votaries of Diseases ) चिकित्सक दो प्रकार के चिकित्सक - हे अग्निवेश! वैद्य दो प्रकार के होते हैं, एक वैद्य वे मुख्य रूप से प्राणों को देने वाले और रोगों का नाश करने वाले होते हैं । दूसरे वे मुख्य रूप से रोगों को बढ़ाने वाले और प्राणों को नष्ट करने वाले होते हैं ॥ ५ ॥

होते हैं जो वैद्य हैं जो विमर्श - इस प्रकार १. प्राणाभिसर, २. रोगाभिसर ये दो भेद वैद्य के यहाँ माने गये हैं । तिम्रैषणीयं अध्याय में १. छद्मचर, २. सिद्धसाधित, ३. प्राणाभिसर ये तीन भेद वैद्य के बताये है । पर यहाँ रोगामिसर में ही छद्मचर और सिद्धसाधित का अन्तर्भाव करके दो ही भेद माने है । * एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - भगवंस्ते कथमस्माभिर्वेदितव्या भवेयुरिति ॥ इस तरह कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा कि हे भगवन् हम कैसे समझें कि कौन प्राण, मिसर वैध और कौन रोगाभिसर वैद्य है? ॥ ६ ॥

ॐ भगवानुवाच य इमे कुलीनाः पर्यवदातश्रुताः परिदृष्टकर्माणो दक्षाः शुचयो जित-हस्ता जितात्मानः सर्वोपकरणवन्तः सर्वेन्द्रियोपपन्नाः प्रकृतिज्ञाः प्रतिपत्तिज्ञाश्च ते ज्ञेयाः प्राणानामभिसरा हन्तारो रोगाणाम्;

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दशप्राणायतनीयाध्यायः २ ९ ] सूत्रस्थानम् ५७७ तथाविधा हि केवले शरीरज्ञाने शरीराभिनिर्वृत्तिज्ञाने प्रकृतिविकारज्ञाने च निःसंशयाः, सुखसाध्यकृच्छ्रसाध्ययाप्यप्रत्याख्येयानां च रोगाणां समुत्थानपूर्वरूपलिङ्गवेदनोपशयविशे-षज्ञाने व्यपगतसंदेहाः, त्रिविधस्यायुर्वेदसूत्रस्य ससंग्रहव्याकरणस्य सत्रिविधौषधग्रामस्य प्रवक्तारः, पञ्चत्रिंशतो मूलफलानां चतुणो च स्नेहानां पञ्चानां च लवणानामष्टानां च मूत्राणामष्टानां च क्षीराणां क्षीरत्वग्वृक्षाणां च षण्णां शिरोविरेचनादेव पञ्चकर्माश्रयस्यो -पधगणस्याष्टविंशतेश्च यवागूनां द्वात्रिंशतश्वर्णप्रदेहानां षण्णां च विरेचनशतानां पञ्चानां च कषायशतानां प्रयोक्तारः, स्वस्थवृत्त विहितभोजनपाननियमस्थानचङ्क्रमणशयनासनमा-ब्राङ्ग्व्याञ्जनधूमनावनाभ्यञ्जनपरिमार्जनवेगाविधारणविधारणव्यायामसात्म्येन्द्रियपरीक्षो-पक्रमणसद्वृत्तकुशलाः, चतुष्पादोपगृहीते च भेषजे षोडशकले सविनिश्वये सत्रिपर्येषणे सवातकलाकलज्ञाने व्यपगतसन्देहाः, प्राणाभिर वैद्य के लिए ज्ञातव्य - भगवान् आत्रेय ने अग्निवेश से कहा १. जो वैद्य अच्छे कुल में या वैद्य वंश में उत्पन्न हो, २. जो शास्त्र - ज्ञान में मंदेहरहित हो, ३. जो चिकित्सा का प्रत्यक्ष कर्नाभ्यास किया हो, ४. निपुण हो, ५. पवित्र रहता हो, ६. जितहस्त हो ( यशस्त्री कायचिकित्सक हो या यदि शल्यचिकित्सक हो तो शस्त्रकर्म करने में हाथ न कँपता हो ) ७. जितात्मा हो, ८. चिकित्सा कर्म में आने वाले सभी साधनों से सम्पन्न हों, ९. सभी इन्द्रियों से युक्त हो, १०. रोगी और रोग के कारणों का जानकार हो, ११ प्रतिपत्ति को जानने वाला हो, जिस रोग में जिस प्रकार की औषध उपयुक्त हो रोगी को और किन आहार - विहारों पर रखना हितकर होगा आदि का समयोचित ज्ञान ऐसे वैद्य को प्राणाभिसर जानना चाहिए । ये मुख्य रूप में प्राणों को बढ़ाने वाले और रोगों के नाशक होते हैं । इस प्रकार के वैद्य शरीर - ज्ञान ( शरीर रचना और शरीर क्रियाविज्ञान ) में, शरीर की उत्पत्ति किस प्रकार होती है इस ज्ञान में ( अर्थात् गर्भ - विज्ञान में ), प्रकृति ( Physiology ) ज्ञान में, विकार - ( Pathology ) ज्ञान में सन्देहरहित होते हैं । सुखसाध्य, कृच्छ्रसाध्य, याप्य और प्रत्याख्येय रोगों का कारण, पूर्वरूप, लक्षण, वेदना, उपशय इनकी विशेषताओं के ज्ञान में संदेह - रहित होते हैं । तीन प्रकार के आयुर्वेदीय सूत्रों ( हेतु, लक्षण, औषध ) का संक्षेप और विस्तार के ज्ञान के साथ - साथ तीन प्रकार ( जाङ्गम, पार्थिव, औद्भिद या देवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय, सत्त्वावजय ) के औषध- समुदाय का व्याख्यान करने वाले होते हैं । ३५ मूलिनी और फलिनी का, ४ महास्नेहों का, पाँचों लवणों का, आठों मूलों का, आठों दुग्धों का, जिनका दूध और छाल दोनों प्रयोग में आते हैं उन ६ वृक्षों का, शिरोविरेनन आदि पञ्चकर्म में प्रयुक्त होने वाले औषध समुदायों का, २८ यवागुओं का, ३२ चूर्णों और प्रदेहों का, ६०० सौ विरेचनकारक और ५०० सौ कपायों का व्याख्यान करने वाले होते है । स्वस्थावस्था में स्वस्थ होने के लिए बताए गये भोजन - पान के नियमों, स्थान, चङ्क्रमण, शयन, आसन, मात्रा, द्रव्य और अञ्जन, धूमपान, नस्य, अभ्यङ्ग, परिमार्जन, वेग का अविधारण, वेगधारण, व्यायाम, सात्म्य, इन्द्रियों की परीक्षा, उनकी चिकित्सा और सद्वृत्त के ज्ञान में कुशल होते हैं । चिकित्सा के चार पाद से ग्रहण करने योग्य सोलहों गुणों से युक्त औषधों के निश्चय करने में तीनों एपणाओं के और वातकलाकल ज्ञान में सन्देहशून्य होते है । १. ' संग्रहः संकरय्य कथनं, व्याकरणं च विवरणम् ' शिवदाससेनः । २. ' स्वस्थवृत्तावपि च भोजनपाच ' इति पा । ३७ च ० सं ०

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५७८ चरकसंहिता चतुर्विधस्य च स्नेहस्य चतुर्विंशत्युपनयस्योपकल्पनीयस्य चतुःषष्टिपर्यन्तस्य च व्यवस्थापयितारः, बहुविधविधानयुक्तानां च स्नेह्यस्वेद्यवम्य विरेच्यविविधौषधोपचाराणां च कुशलाः, शिरोरोगादेर्दोषांशविकल्पजस्य च व्याधिसंग्रहस्य सक्षयपिडकाविदधेस्त्रयाणां च शोफानां बहुविधशोफानुबन्धानामष्टचत्वारिंशतश्च रोगाधिकरणानां चत्वारिंशदुत्तरस्य च नानात्मजस्य व्याधिशतस्य तथा विगर्हितातिस्थूलातिकृशानां सहेतुलक्षणोपक्रमाणां स्वप्नस्य च हिताहितस्यास्वगतिस्वप्नस्य च सहेतूपक्रमस्य षण्णां च लङ्घनादीनामुपक्र-माणां संतर्पणापतर्पणजानां च रोगाणां सरूपप्रशमनानां शोणितजानां च व्याधीनां मदमूर्च्छायसंन्यासानां च सकारणरूपौषधोपचाराणां कुशलाः, कुशलाश्चाहारविधिविनि-श्वयस्य प्रकृत्या हिताहितानामाहारविकाराणामय्यसंग्रहस्यासवानां च चतुरशीतेर्द्रव्यगुण-कर्मविनिश्चयस्य रसानुरससंश्रयस्य सविकल्पवैरोधिकस्य द्वादशवर्गाश्रयस्य चान्नपानस्य सगुणप्रभावस्य सानुपानगुणस्य नवविर्धस्यार्थसंग्रहस्याहारगतेश्च हिताहितोपयोगविशेषा-त्मकस्य च शुभाशुभविशेषस्य धात्वाश्रयाणां च रोगाणां सौषधसंग्रहाणां दशानां च प्राणायतनानां यं च वच्याम्यर्थे दशमहामूलीये त्रिंशत्तमाध्याये तत्र च कृत्स्नस्य तन्त्रो -द्देशलक्षणस्य तन्त्रस्य च ग्रहणैधारणविज्ञानप्रयोग कर्मकार्यकालकर्तृकरणकुशलाः, कुशलाश्च स्मृतिमतिशास्त्र युक्तिज्ञानस्यात्मनः शीलगुणैर विसंवादनेन च संपादनेन सर्वप्राणिषु चेतसो मैत्रस्य मातापितृभ्रातृबन्धुवत् एवंयुक्ता भवन्त्यग्निवेश! प्राणानामभिसरा हन्तारो रोगाणामिति ॥ ७ ॥

और भी: चारों प्रकार के खेड़ों का प्रयोग करने में, २४ विचारणा से लेकर ६४ विचारणा तक की उचित प्रकार से चिकित्सा की व्यवस्था करने वाले होते हैं । अनेक प्रकार के विधि और विधानों के साथ स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन क्रियायों में प्रयुक्त होने वाले औषधों के प्रयोग में चतुर होते हैं । शिरोरोग आदि के दोषों की अशांशकल्पना के अनुसार होने वाले रोग - समुदाय के संग्रह, क्षय, पिडका और विद्रधि, तीनों प्रकार के शोध ( वातज, पित्तज, कफज ) और शोथ के अनेकों प्रकार के अनुबन्ध ( अप्रधान भेद ), ४८ रोगों का प्रकरण ( जो १ ९ वें अध्याय में है ) १४० प्रकार के रोग ( नानात्मज ) जो अनेक कारणों से उत्पन्न होते हैं जिनका वर्णन २० अध्याय में है, निन्दनीय अधिक मोटे होने और अधिक कृश होने के कारण, लक्षण और चिकित्सा के ज्ञान में, हितकारी और अहितकारी स्वप्न ज्ञान में, निद्राभाव और अतिनिद्रा के कारण और चिकित्सा - ज्ञान में, ६ प्रकार के लङ्घन आदि ( लङ्घन, बृंहण, संहन, रूक्षण, स्वेदन, स्तम्भन ) चिकित्सा के भेद-ज्ञान में, सन्तर्पणजन्य और अपतर्पणजन्य रोगों के लक्षण और चिकित्सा ज्ञान में, शोणित ( रक्त ) विकृति से होने वाले रोगों के और मद, मूर्च्छा एवं संन्यास रोगों के हेतु, लक्षण और चिकित्सा ज्ञान में कुशल ( चतुर ) होते हैं । प्रकृति, करण आदि आठ आहार विधि विधान के निश्चय करने में, स्वाभाविक हितकर और अहितकर आहार - विकार के प्रयोग ज्ञान में, प्रधान द्रव्यों के ( जैसे- ' अन्नं वृत्तिकराणाम् ) संग्रह ज्ञान में, ८४ प्रकार के आसूत्रों के ज्ञान और प्रयोग में, द्रव्यगुण-कर्म के विनिश्चय - ज्ञान में, रस- अनुरस के आश्रयभूत द्रव्यों के संग्रह में, वैरोधिक अन्न - पान के १. ' चतुर्विंशत्युपनयस्येति उपनयो विचारणा ' शिवदाससेनः । २. ' उपकल्पनीयस्य ' इति ह. पु. न पठ्यते । ३. ' आहारविहाराणाम् ' इति पा ० । ४. ' नवविधस्य चरः शरीरावयवाः ' इत्यादेः ' चक्रः । ५. ' गृहीतस्योत्तरकालस्मरणं धारणं, विज्ञानमर्थतो ज्ञानं, प्रयोगश्चिकित्साप्रयोगः, कर्म अनेकवि-धचिकित्साकरणं, कार्ये धातुसाम्यं, कालः क्रियाकाल:, कर्तेह भिपक्, करणं भेषजम् ' चक्रः ।

पृष्ठ 668

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दशप्राणायतनीयाध्यायः २ ९ ] सूत्रस्थानम् ५७६ विकल्प ( भेद ) ज्ञान में, बारह वर्गों में निर्दिष्ट अन्न - पान, और उनके गुण प्रभाव और अनुपान एवं उनके गुणों के ज्ञान में, नव प्रकार के अर्थ ( परीक्ष्य विषयों के ) संग्रह ज्ञान में, आहार की गति ( पाचन ) हिनकर अहितकर आहार द्रव्यों के भेद से शुभ और अशुभ फल के ज्ञान में, धातुओं के आश्रित रोग और उनकी चिकित्सा संग्रह के ज्ञान में, इस दशप्राणायननीय अध्याय के विषयों के ज्ञान में, और जो आगे के अर्थदशमहामूलीय नामक तीसवें अध्याय में विषय कहे जायेगें, उन विषयों के ज्ञान नें, उसमें भी सभी तन्त्रों के उद्देश और लक्षण ज्ञान में, तन्त्र के श्रवण, ग्रहण, धारण, विज्ञान, प्रयोग, कर्म, कार्य, काल, कर्ता और करण इन विषयों को समझने में चतुर होते हैं । स्मरणशक्ति, मनि, शास्त्र वाक्यों की योजना, शास्त्रों के ज्ञान के साथ अपने शील और गुणों की एकता से, सभी प्राणियों के चित्त के अनुसार मित्रभाव के साथ माता, पिता, भाई, बन्धु वर्गों के समान चिकित्सा करने में कुशल होते हैं । हे अग्निवेश! इन गुणों से युक्त जो कोई भी चिकित्सक होता है वह मुख्य रूप से प्राणों को देने वाला और रोगों का नाश करने वाला होता है ॥ ७ ॥

* अतो विपरीता रोगाणामभिसरा हन्तारः प्राणानां भिषक्छुद्मप्रतिच्छन्नाः कण्टक-भूता लोकस्य प्रतिरूपकसधर्माणो राज्ञां प्रमादाच्चरन्ति राष्ट्राणि ॥ ८ ॥

गाभिसर वैद्य की परिभाषा - इन उपर्युक्त गुणों से विपरीत चिकित्सक रोगों को बढ़ाने वाले और प्राणों का नाश करने वाले होते हैं । वैद्य के स्वरूप में अपने को छिपाए हुये, संसार के लिए कण्टक स्त्ररूप होते हैं । ये प्रतिरूपक ( अर्थात् वैद्य न होते हुए भी वैद्य के समान स्वरूप ग्रहण करने वाले ) वैद्य राजा के प्रमाद से देश में चलते फिरते हैं या देश को खा जाते हैं ॥ ८ ॥

तेषामिदं विशेषविज्ञानं भवति - अत्यर्थं वैद्यवेशेन श्लाघमाना विशिखान्तरमनुचरन्ति कर्मलोभात्, श्रुत्वा च कस्यचिदातुर्यमभितः परिपतन्ति, संश्रवणे चास्यात्मनो वैद्यगुणा-नुच्चैवंदन्ति, यश्चास्य वैद्यः प्रतिकर्म करोति तस्य च दोषान्मुहुर्मुहुरुदाहरन्ति, आतुर-मित्राणि च प्रहर्षणोपजापोपसेवादिभिरिच्छन्त्यात्मीकर्तुं, स्वल्पेच्छुतां चात्मनः ख्यापयन्ति, कर्म चासाद्य मुहुर्मुहुरवलोकयन्ति दाचयेणाज्ञानमात्मनः प्रच्छादयितुकामाः, व्याधिं चापा-वर्तयितुमशक्नुवन्तो व्याधितमेवानुपकरणमपरिचारकमनात्मवन्तमुपदिशन्ति, अन्तगतं चैनमभिसमीक्ष्यान्यमाश्रयन्ति देशमपदेशमात्मनः कृत्वा, प्राकृतजनसन्निपाते चात्मनः कौशलमकुशलवद्वर्णयन्ति, अधीरर्वेच्च धैर्यमपवदन्ति धीराणां विद्वज्जनसन्निपातं ( चाभि-समीच्य ) प्रतिभयमिव कान्तारमध्वगाः परिहरन्ति दूरात्, यश्चैषां कश्चित् सूत्रावयवो भवत्युपयुक्तस्तमप्रकृते प्रकृतान्तरे वा सततमुदाहरन्ति न चानुयोगमिच्छन्त्यनुयोक्तुं वा, मृत्योरिव चानुयोगादुद्विजन्ते, न चैषामाचार्यः शिष्यः सब्रह्मचारी वैवादिको वा कश्चित् प्रज्ञायत इति ॥ ९ ॥

रोगाभिसर के लक्षण -- इन रोगाभिसर वैद्यों को पहचानने के लिए ये विशेष लक्षण होते हैं 1 उत्तम वैद्यों का वेश धारण कर विशेष रूप से अपनी प्रशंसा स्वयं करते हुए कर्म के लोभ से ग्राम की गलियों में या चिकित्सा कर्म में प्रवेश कर भ्रमण करते रहते हैं । यदि यह सुन लें कि कोई कहीं पर रोगी ' गया है तो चारों ओर से उस पर टूट पड़ते हैं ( अर्थात् स्वयं बार - बार उसके घर जायेंगे, रोगी के भाई, बन्धु, मित्रों से मिलकर अपनी प्रशंसा कर बिना बुलाये ही विना द्रव्य के ही १. ' विपर्ययेण ' म. । २. ' अपचारिकम् ' इति पा. । ३. ' आत्मनोऽपदेशं नाम देशाद्यपह्नवरूपं कपटं कृत्वा ' शिवदाससेनः । ४. ' अधीरवदिति उच्चाटरवाः सन्तः चक्रः । ५. ‘ अनुयोगं पृच्छाम् ’ चक्रः ।

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५५० चरकसंहिता बार - बार जाने की इच्छा व्यक्त करेंगे और जायेंगे ) रोगी को या रोगी के हितैषियों को सुनाई । पड़ सके ऐसे स्थान पर जाकर अपने में रहने वाले उत्तम वैद्यों के गुणों को उच्च स्वर से ऐसा कहते है जिसे वह सुन सके । जो चिकित्सक उस रोगी की चिकित्सा करता है, उसके दोषों को बार - बार उदाहरण देकर कहते हैं । जो व्यक्ति रोगी के मित्र हों, उनसे प्रसन्न करने योग्य वार्ते करके, चुगुली करके, उनकी सेवा करके इत्यादि कारणों से उन्हें अपने वश में करना चाहते है, अपने आप को निर्लोभी प्रसिद्ध करते हैं । यदि कोई रोगी चिकित्सा करने के लिए मिल जाता हैं तो अपनी अज्ञानता को छिपाने के लिए रोगी को बार - बार चतुरतापूर्वक देखते है । यदि रोग को दूर करने में समर्थ नहीं होते हैं तो रोगी को ही ' सामग्रीहीन, सेवकहीन तथा यह रोगी जितेन्द्रिय नहीं है ' ऐसा कहते है । जब उस रोगी को मरा हुआ देखते हैं तब बहाना बनाकर दूसरे स्थान को चले जाते हैं । सामान्य जनता के सामने अपनी कुशलता मूर्खों के समान परस्पर विरुद्ध वचनों से वर्णन करते हैं । धीर पुरुषों की धीरता की अधीर पुरुषों की तरह निन्दा करते रहते हैं; जिस प्रकार राहगीर भयभीत होकर भयंकर जङ्गल को दूर से ही छोड़ देते हैं, उसी प्रकार विद्वानों के समूह को देखकर दूर से ही भाग जाते हैं । जो कोई शास्त्र के सूत्र का भाग उपयोगी होता है उसका बिना प्रसंग के या दूसरे प्रसङ्ग में सदा उदाहरण देते रहते है । वे चाहते है कि उनसे कोई प्रश्न न करे और न वे किसी से प्रश्न करते हैं । प्रश्नोत्तर काल आ जाने पर मृत्यु के समान भय करते हैं, इन रोगाभिसर वैद्यों का कोई भी आचार्य ( गुरु ) या शिष्य या सहपाठी या जिससे शास्त्रार्थ हुआ हो, ऐसा जाना नहीं जाता है ॥ ९ ॥

भवन्ति चात्र-भिषक्छद्म प्रविश्यैवं व्याधितांस्तर्कयन्ति ये । वीतंसमिव संश्रित्य वने शाकुन्तिका द्विजान् ॥ रोगियों को फँसाने में दृष्टान्न - जिस प्रकार बहेलिया बन में जाल फैलाकर पक्षियों को फंसा लेता है, उसी प्रकार रोगाभिसर वैद्य कपट से ऊपर बताए हुए वैद्य का वेष धारण कर रोगियों को फँसाया करते हैं ॥ १० ॥

श्रुतदृष्टक्रियाकालमात्राज्ञानवहिष्कृताः । वर्जनीया हि ते मृत्योश्चरन्त्यनुचरा भुवि ॥ ११ ॥

मृत्यु के अनुचर वैद्य - इस प्रकार के वैद्य श्रुत ( शास्त्रज्ञान ), दृष्ट ( प्रत्यक्षकर्माभ्यास ), क्रिया ( चिकित्सा ), काल ( औषध प्रयोग काल ) और औषध की मात्रा, इन सभी ज्ञान से शून्य होते हैं । इनका सर्वथा त्याग कर देना चाहिए क्योंकि ये भूमि पर मृत्यु के अनुचर ( नौकर ) बनकर भ्रमण करते हैं ॥ ११ ॥

वृत्तिहेतोभिपद्मानपूर्णान् मूर्खविशारदान् । वर्जयेदातुरो विद्वान् सर्पास्ते पीतमारुताः ॥१२ ॥

त्याज्यवैद्य - विद्वान् रोगी के लिए यह उचित है कि वृत्ति ( जाविका ) के लिए वैद्य के रूप में अभिमान से पूर्ण और मूर्ख विशारद वैद्यों का परित्याग कर दें । क्योंकि वे वायु का पान करनेवाले साँप के समान बहुत ही भयङ्कर होते है ॥ १२ ॥

ये तु शास्त्रविदो दत्ताः शुचयः कर्मकोविदाः । जितहस्ता जितात्मानस्तेभ्यो नित्यं कृतं नमः ॥ उत्तम वैद्य की प्रशंसा - जो चिकित्सक, शास्त्राध्ययन किया हो, चतुर हो, पवित्र हो, चिकित्सा कर्म को अच्छी प्रकार से जानता हो, जितहस्त ( यशस्वी ) हो और जो जितेन्द्रिय हो, उन्हें नित्य ही नमस्कार ( आदर ) करना चाहिए ॥ १३ ॥

१. ' वीनंसः पक्षिबन्धनजालम् ' शिवदाससेनः । २. ' मुखविशारदान ' ग. । ' मुखविशारदाः स्वमुखेनैव स्ववैशारथं वदन्तः ' गङ्गावरः ।

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अर्थेश महामूलीयाध्याय: ३० ] सूत्रस्थानम् तत्र श्लोकः— ५८१ दशप्राणायत निकं श्लोकस्थानार्थसंग्रहः । द्विविधा भिषजश्वोक्ताः प्राणस्यायतनानि च ॥१४ ॥

इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने दशप्राणाय-तनीय नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ G अध्याय- उपसंहार - इस दशप्राणायतनीय नामक अध्याय में सूत्र स्थान के विषयों का संग्रह, दो प्रकार के ( प्राणाभिसर और रोगाभिसर ) वैब और दश प्राणों के आयतनों का वर्णन किया गया है ॥ १४ ॥

चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के मूत्रस्थान में दशप्राणायतनीय नामक उनतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २ ९ ॥ अथ त्रिंशोऽध्यायः अथातोऽर्थदशमहा सूलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद अर्धेदशमहामूलीय अध्याय की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - पिछले अध्याय में दश प्राणायतनों का वर्णन किया गया है । उनमें हृदय का सर्वश्रेष्ठ स्थान होता है । उसे इस अध्याय में स्पष्ट किया जायगा । और सम्पूर्ण संहिता में आये हुये अध्यायों का संग्रह भी किया जायगा । * अर्धे दश महामूलाः समासक्ता महाफलाः । महच्चार्थश्च हृदयं पर्यायैरुच्यते बुधैः ॥ ३ ॥

( १ ) हृदय प्रकरण ( Topic of Hridaya ) हृदय कावर्णन अर्थ ( हृदय ) में हृदयरूप मूलवाली और हृदयरूप फल बाली दश रक्तवाहिनियाँ लगी हुई है । महत् और अर्थ को विद्वान् लोग हृदय का दूसरा नाम कहते हैं || ३ || विमर्श - यहाँ अर्थ शब्द से हृदय का ग्रहण किया गया है । शरीर में सबसे प्रधान ओज माना गया है । जो ओज को वहन करते हुए शरीर का पालन करती है वह महाफल देनेवाली कही जाती है । महानूल शब्द से महा अर्थात् हृदय वह मूल है जिनका ऐसी दश धमनियाँ हृदय में लगी हुई हैं । यद्यपि महाशब्द से या अर्थ शब्द से हृदय का ग्रहण कहीं नहीं किया गया है इसलिए स्वयं आचार्य ने अपने ही शब्दों में महत् और अर्थ को पर्याय माना है । योगीन्द्रनाथ सेन ने समासन्ता के स्थान पर सिरासक्ता पाठ माना है । प्रायः यह देखा जाता है कि धमनी और सिरा ये दोनों हृदय में लगी रहती हैं । चरक के प्रचलित चक्रपाणि के संस्करण में सिरा और धननी का नाम नहीं लिया गया है । शरीर में चौबीस महाधमनियाँ और चालीस १. ' सिराः मुक्ताः ' इति पा. ।