चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 671–680

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 671–680

पृष्ठ 671

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५८२ चरकसंहिता महासिराओं का पाठ मिलता है । पर हृदय में दश । रक्तवाहिनियों का ही मूल मिलता है । काश्यप संहिता में भी — ' हृदयात् सम्प्रतायन्ते सिराणां मातरो दश । ऊर्ध्वं चतस्रो द्वे तिर्यक् चतस्रोऽधोवहाः सिराः ॥ व्याप्नुवन्ति शरीरं ता भिद्यमानाः पुनः पुनः । पर्णानामिव सीवन्यः सरणाच्च सिराः स्मृताः ॥ ' तथा महाभारत में भी - ' प्रवृत्ता हृदयात् सर्वास्तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । वहन्त्यन्नरसान् नाड्यो दश प्राणप्रचोदिताः ॥ ' इसी काश्यप संहिता के आधार पर योगीन्द्रनाथसेन ने सिरासक्ता पाठ किया है । भेलसंहिता में भी - ' अर्थ इत्याह हृदयं तस्मिन् धमनयो दश । ऊर्ध्वं चतस्रो द्वे तिर्यक् चतस्रश्चाप्यधः क्रमात् ॥ ताभ्यो मूलसिराभ्यश्च भिद्यन्ते नैकधा सिराः ॥ ' ( भे. सू. अ. २० ) । हृदय में ये रक्तवाहिनियाँ आजकल भी दृष्टिगोचर होती हैं । जैसे हृदय के दक्षिण अलिन्द ( Right Auricle ) उत्तरामहासिरा ( Superior Venacava ) अधरामहासिग ( Inferior Venacava ) जिनके द्वारा सम्पूर्ण शरीर का रक्त हृदय में आता है, इन दोनों के अतिरिक्त रसकुल्या ( Thoracic Duct ) जिससे सौम्य रस रसायनियों द्वारा आकर उत्तरामहासिरा द्वारा हृदय के रक्त में मिलता है, दक्षिणनिलय ( Right Ventricle ) में दो रक्तवाहिनियाँ ( फुफ्फुसाभिगा धमनी Pulmonary Arteries ) लगी हुई हैं जिनके द्वारा दक्षिण अलिन्द से आया हुआ रक्त फुफ्फुसों में शुद्धि के लिये प्रक्षिप्त होता है और हृदय के बाम भाग वाम अलिन्द ( Left Auricle ) में फुफ्फुस से शुद्ध रक्त लाने वाली चार रक्तवाहिनियाँ ( फुफ्फुसोत्था सिरा Pulmonary Veins ) लगी हुई है और वाम निलय ( Left ventricle ) में वामालिन्द से आये हुये रक्त को सम्पूर्ण शरीर में ले जाने वाली महाधमनी ( Aorta ) का मूल भाग लगा हुआ है । इनको भेल ने धमनी और काश्यप ने सिरा से व्यवहार किया है । पर आत्रेय ने किसी भी एक नाम से इनका निर्देश नहीं किया है । मूल का तात्पर्य यहाँ जड़ नहीं है पर इन्हीं के द्वारा शरीर रूपी वृक्ष की स्थिति है इसलिये इन्हें मूल माना है यह बात ' समामक्का ' से स्पष्ट कर दी है । क्योंकि प्रत्यक्ष से इन दशों का मूल स्थान हृदय नहीं है पर दशों हृदय में लगी हुई हैं । यदि इनमें विकृति आ जाय तो अनेक रोग होने की सम्भावना बनी रहती हैं । इन्हीं सब बातों को दृष्टि में रख कर महत और अर्थ को हृदय का पर्याय बताया है । * पडङ्गमङ्गं विज्ञानमिन्द्रियाण्यर्थपञ्चकम् 1 । आत्मा च सगुणश्चेतश्चिन्त्यं च हृदि संश्रितम् ॥४ ॥

हृदय की प्रधानता - छहों अंगों से युक्त शरीर, विज्ञान ( बुद्धि ) इन्द्रियाँ इन्द्रियों के पाँचों विषय, सगुण आत्मा, मन और मन का विषय, ये सब हृदय में आश्रित रहते है ॥ ४ ॥

प्रतिष्ठार्थं हि भावानामे हृदयमिष्यते । गोपीनसीनामागारकर्णिकेवार्थचिन्तकैः ॥ ५ ॥

और भी - अर्थ ( हृदय ) का चिन्तन ( विचार ) करने या जानने वाले विद्वान् वैद्य गृह में लगे हुए आगार - स्तम्भ ( लरही ) को जिस प्रकार आगारकर्णिका ( धरन का खम्भा ) धारण करती हैं उसी प्रकार पडङ्ग शरीर आदि की प्रतिष्ठा के लिए प्रधान रूप से हृदय को श्रेष्ठ मानते हैं ॥ ५ ॥

विमर्श – यद्यपि मन का स्थान आधुनिक दृष्टि से मस्तिष्क माना जाता है और भेलसंहिता में भी इसी प्रकार का वर्णन मिलता है यथा- ' शिरस्तात्वन्तरगतं सर्वेन्द्रियपरं मनः । तत्रस्थं तत्र विषया-निन्द्रियाणां रसादिकान् ॥ समीपस्थान् विजानाति । तथा - ' प्राणाः प्राणभृतां यत्र श्रिताः सर्वे -न्द्रियाणि च । यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते ॥ ' ( च. सू. अ. १७ ) । इन विचारों से भी मन, इन्द्रियों आदि का आश्रय मस्तिष्क ही माना गया है । आधुनिक विचारक प्रत्यक्ष रूप से इस तथ्य का अवलोकन करते हैं कि मस्तिष्क के अन्दर शारीरिक सभी व्यापारों के नियोजक केन्द्र हैं पर यहाँ १. ' गोपानस्यो गृहाच्छादनाधारकाष्ठानि, आगारकर्णिका गृहाच्छादनकाष्ठनिबन्धनी ' चक्रः ।

पृष्ठ 672

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अर्थे दशमहामूलीयाध्यायः ३० ] सूत्रस्थानम् ५८३ हृदय को ही सबका आश्रय माना गया है परन्तु यहाँ षडङ्ग अङ्गों की प्रतिष्ठा हृदय के ऊपर निर्भर है, यह बताया गया है । हृदय के कार्यराहित्य होने पर उपर्युक्त सभी भाव नष्ट हो जाते हैं । जब तक हृदय अपना कार्यं वरता रहता है तब तक उक्त सभी भाव अपने - अपने कार्य को करते हुए प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं । अतः शरीर में सर्वश्रेष्ठ हृदय को माना जाता है । इसी लिए ' हृदयं चेतना स्थानमुक्तं सुश्रुत देहिनाम् । ' ( सु. शा. अ. ४ ) तथा ' तच्च हृदयं विशेषेण चेतनास्थानम् । ' आदि कहा गया है । * तस्योपघातान्मूर्च्छायं

भेदान्मरणमृच्छति ।

द्धि तत् स्पर्शविज्ञानं धारि तत्तत्र संश्रितम् ॥ ६ ॥

और भी - उस हृदय पर आघात पहुँचने पर मूर्च्छा और उसके फट जाने पर मृत्यु हो जाती है । क्योंकि स्पर्श का ज्ञान होना, धारि ( आयु प्रमाण ) और वह शरीर, ये सभी हृदय के ही आश्रित है ॥ ६ ॥

* तत् परस्यौजसः स्थानं तत्र चैतन्यसंग्रहः । हृदयं महदर्थश्च तस्मादुक्तं चिकित्सकैः ॥७ ॥

और भी - वह हृदय पर ( उत्तम ) ओज का स्थान है, हृदय में ही चेतना के आश्रयभूत भावों का संग्रह है । इसी लिए चिकित्सकों ने हृदय को महत् और अर्थ शब्द से कहा है || ७ |!

* तेन मूलेन महता महामूला मता दश । ओजोवहाः शरीरेऽस्मिन् विधम्यन्ते समन्ततः ॥

और भी - उस हृदय ( स्वरूप ) मूल के कारण दश रक्तवाहिनियाँ महामूल वाली कही जाती है । ये ही शरीर में ओज का वहन करती है और इस शरीर में रस को चारों ओर धमन अर्थात् प्रसारित करती हैं ॥ ८ ॥

* येनौजसा वर्तयन्ति प्रीणिताः सर्वदेहिनः । यदृते सर्वभूतानां जीवितं नावतिष्ठते ॥ ९ ॥

सारमादौ गर्भस्य यत्तद्गर्भरसाइसः । संर्वर्तमानं हृदयं समाविशति यत् पुरा ॥ १० ॥

यस्य नाशात्तु नाशोऽस्ति धारि यटदयाश्रितम् । यच्छरीररसस्नेहः प्राणा यत्र प्रतिष्ठिताः । तत्फला बहुधा वा ताः फलन्तीव ( ति ) महाफलाः । ओज का वर्णन जिस पर और अपर ओज से पोषित होकर सभी प्राणी अपने जीवन का निर्वाह करते है अर्थात् जीवित रहते हैं, जिस ओज के बिना सभी प्राणियों का जीवन नहीं रहता है, जो ओज गर्भ के प्रारम्भ में शुक्र शोगिन के सार रूप में वर्तमान रहता है और जो ओज - कललावस्था में रस के सार रूप में रहता है, जब गर्भ में हृदय की उत्पत्ति होतो है तब अपने स्वरूप में रहते हुये हृदय में प्रवेश करता है, जि ओज के नाश होने पर शरीर १. ' स्पर्शो विज्ञायतेऽनेनेति स्पर्श वा विजानातीति सशेोवज्ञानं, तस्येत्र विशेषणं धारीति, धारि तु शरीरेन्द्रिय सत्त्वात्मसंयोगः तेन यः शरीरादिसंयोगः स्पर्शनेन विजानाति सर्वं ज्ञेयं, यश्चायं शरीर-धारणाद्वारीत्युच्यते स हृदि स्थितः ' चक्रः । २. ' चिकित्सित ' इति पा. । ३. ' यत्सारमादौ गर्भस्येति शुक्रशोणितसंयोगे जीवा विष्ठितमात्रे यत्सारभूतं, तत्रापि तिष्ठति; यत्तद्गर्भरसाद्रस इतेि गर्भरसाच्छुक्रशोगित संयोगपरिणामेन कललरूपात, रस इति सारभूतं; संवर्त -मानं हृदयं समाविशति यत्पुरेति यदा हृदयं निष्पद्यमानं तदेव व्यक्तलक्षणं सत् हृदयमधितिष्ठति यदित्यर्थः; एतेन गर्भावस्थात्रयेऽपि तदोजस्तिष्ठतीत्युच्यते ' चक्रः । ४. ' संवर्धमानम् ' ग. । ५. ' यत् पुनः ' इति कविराज गणनाथसेनसंमतः पाठः । ६. ' यस्यानाशान्न नाशोऽस्ति ' ग. ।

पृष्ठ 673

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५८४ चरकसंहिता का नाश हो जाता है, जो हृदय में आश्रित रह कर धारि ( आयु ) का धारण करता है । जो शरीर रस का स्नेह है, जिसमें प्राण प्रतिष्ठित रहता है, हृदय उसी ओज को ओजोवह स्रोतों द्वारा सारे शरीर में धमन करता रहता है । इन ओजो हाओं को महाफला भी कहते हैं क्योंकि ओज ही इनका फल है या ये ओजोवह दश वाहिनियों द्वारा शरीर के प्रत्येक अंग में ओज को प्रसारित कर शरीर के अंग - प्रत्यंग द्वारा अनेकों कार्य और कार्यफलों को अनेकों प्रकार से निष्पन्न करती हैं ( फल देती हैं ) इसलिये इन्हें महाफला कहते हैं । ९ -११ ॥ * ध्मानाद्धमन्यः स्रवणात् स्रोतांसि सरणात्सिराः ॥ १२ ॥

धमनी, स्रोत और सिरा की निरुक्ति - १. शरीर में जो धमन करती हैं उसे धमनी कहते हैं । २. जिनसे स्रवण होता है उन्हे स्रोत कहते हैं । ३. जिनमें सरण होना है उन्हें सिरा कहते हैं ॥ १२ ॥

विमर्श -- यद्यपि सुश्रुत ने धमनी स्रोत सिरा को अलग - अलग माना है, यथा — ' अन्या एव हि धमन्यः स्रोतांसि च सिरान्यः कस्मात्? व्यञ्जनान्यत्वात् मूलसन्नियमात्,, कर्मवैशेष्यात्, आगमाच्च; केवलं तु परस्परसन्निकर्षात् सदृयागनकर्मत्वात् सौक्ष्म्याच्च विभक्तकर्मणामप्यविभाग इव कर्मसु भवति ॥ ' ( सु. शा. अ. ९ ) आधुनिक दृष्टि से धमनी को Artery सिरा को Vein

और स्रोतस् को Capillaries माना जा रहा है ।

तन्महत् ता महामूलास्तच्चोजः परिरक्षता । परिहार्या विशेषेण मनसो दुःखहेतवः ॥ ९ ३ ॥

हृद्यं यत् स्याद्यदौजस्यं स्रोतसां यत् प्रसादनम् । तत्तत् सेव्यं प्रयत्नेन प्रशमो ज्ञानमेव च ॥ हृदय की रक्षा आवश्यक है । - उस हृदय और महामूलवाली सिराओं और उस ओज को रक्षा की इच्छा रखने वाले पुरुषों को विशेष कर मन को दुखी करने वाले कारणों का परित्याग कर देना चाहिये | और जो आहार - विहार हृदय के लिये हितकर हो, जो ओज के लिये हितकारी हो, एवं जो स्रोतों को प्रसन्न करने वाले हों, उनका और शान्ति तथा ज्ञान का प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये ॥ १३-१४ ॥ अथ खल्वेकं प्रागवर्धनानामुत्कृष्टतममेकं बलवर्धनानामेकं बृंहणानामेकं नन्दनानामेकं हर्षणानामेकमयनानामिति । तत्राहिंसा प्राणिनां प्रागवधनानामुत्कृष्टतमं वीर्य बलवर्ध-नानां विद्या बृंहणानाम्, इन्द्रियजयो नन्दनानां तत्त्वावबोधो हषंगानां ब्रह्मचर्यमयना-नामिति एवमायुर्वेदविदां मन्यन्ते ॥ १५ ॥

प्रागनर्धन आदि में एक - एक की प्रधानता - प्राण को बढ़ाने वाले पदार्थों में एक पदार्थ सबसे श्रेष्ठ होता है, वर्धक पदार्थों में एक बूंद करने वाले पदार्थों में एक, मन को प्रसन्न करने वाले पदार्थों में एक, मन में हुई उत्पन्न करने वाले पदार्थों में एक और विभिन्न मार्गों में एक मार्ग सर्वश्रेष्ठ होता है । वे ये हैं - १. इनमें प्राणियों के प्राणों को बढ़ाने वाले पदार्थों में अहिंसा २. बलवर्धक पदार्थों में वार्य है, ३. वृंग करने वाले पदार्थों में विद्या, ४. मन को आनन्दित करने वाले पदार्थों में इन्द्रियों पर विजय, ५. मन को प्रसन्न करने वाले पदार्थों में तत्वज्ञान और विभिन्न मार्गों में ब्रह्मचर्य सर्वश्रेष्ठ निश्चित किया गया है ऐसा आयुर्वेद के पण्डित मानते हैं || १५ || तत्रायुर्वेदविदस्तन्त्र स्थानाध्यायप्रश्नानां पृथक्त्वेन वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयव-शव प्रवक्तारो मन्तव्याः । तत्राह — कथं तन्त्रादीनि वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्श्रो-तानि भवन्तीति ॥ १६ ॥

पृष्ठ 674

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अर्थे दशमहामूलीयाध्यायः ३० ] सूत्रस्थानम् ५८५ ( २ ) आयुर्वेद - विद् के लक्षण ( Signs of Knowers of Science of Life ) आयुर्वेद विद् के लक्षण - अलग - अलग वाक्यों द्वारा, वाक्यार्थों द्वारा और अर्थावयवों - द्वारा तन्त्र, स्थान, अध्याय और प्रश्नों को कहने वाले को आयुर्वेद शास्त्र का जानने वाला समझना चाहिए | इस विषय में यह प्रश्न उठता है कि तन्त्र ( शास्त्र ), स्थान आदि को वाक्य द्वारा, वाक्यार्थ द्वारा और अर्थावयव द्वारा कैसे कहा जा सकता है ॥ १६ ॥

* अन्रोच्यते - तन्त्रमार्षं कात्स्न्र्त्स्न्येन यथाम्नायमुच्यमानं वाक्यशो भवत्युक्तम् ॥। १७ ॥ वाक्यशः का विवरण इस विषय में कहा जाता है कि - आर्षतन्त्र ( ऋषियों से निर्मित शास्त्र ) जिस प्रकार निर्मित है उसे उसी रूप में सर्वाश का अध्ययन करके कहना वाक्यशः कहना कहा जाता है ॥ १७ ॥

बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं वाग्भिर्व्याससमासप्रतिज्ञा हेतूदाहरणोपनय निगम-नयुक्ताभिस्त्रिविधशिष्यबुद्धिगम्याभिरुच्यमानं वाक्यार्थशो भवत्युक्तम् ॥ १८ ॥

वाक्यार्थशः का विवरण - बुद्धिपूर्वक शास्त्र के अर्थों को भली प्रकार जानकर विस्तार से या मंक्षेप से प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनयन, निवमन इन वाक्यावयवों से समझा कर तथा तीनों प्रकार के शिष्य बुद्धि के लिए गम्य अर्थात् समझने योग्य वाक्यों द्वारा कहना या समझाना वाक्यार्थ द्वारा व्याख्यान करना कहा जाता है ॥ १८ ॥

ॐ तन्त्रेनियतानामर्थदुर्गाणां पुनर्विभावनैरुक्तमर्थावयवशो भवत्युक्तम् ॥ १ ९ ॥ अर्थावयवशः का विवरण - तन्त्र ( शास्त्र ) में कहे गये कठिन अर्थों को पुनः समझा कर अपने वचनों द्वारा कहना अर्थावयव द्वारा व्याख्यान करना कहा जाता है ॥ १ ९ ॥ 3 तत्र चेत् प्रष्टारः स्युः - चतुर्णामृक्सामय जुरथर्ववेदानां कं वेदमुपदिशन्त्यायुर्वेद-विदः?, किमायुः?, कस्मादायुर्वेदः?, किमर्थमायुर्वेदः?, शाश्वतोऽशाश्वतो वा?, कति का न f चास्याङ्गानि?, कैश्वायमध्येतव्यः?, किमर्थं च? इति ॥ २० ॥

यदि कोई प्रश्न कर्ता वैद्य से यह प्रश्न करे कि ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद इन चारों वेदों में आयुर्वेद शास्त्र ज्ञाता वैद्य किस वेद का उपदेश करता है? २. आयु किसे कहते है? ३. आयुर्वेद शास्त्र का यह नाम क्यों पड़ा? ४. किस लिये इस आयुर्वेद का उपदेश हुआ? ५. यह आयुर्वेद शाश्वत ( नित्य ) या अशाधत है? ६. इसके कितने और कौन - कौन से अङ्ग है? ७. इस आयुर्वेद को किले पढना चाहिए? और ८. किस लिये पढ़ना चाहिए? ॥ २० ॥

ॐ तत्र भिषजा पृष्टेनैवं चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानामात्मनोऽथर्ववेदे भक्तिरादेश्या, ast ह्याथर्वणोदानस्वस्त्ययन वलिमङ्गलहो मनियमप्रायश्चित्तोपत्रासमन्त्रादिपरिग्रहाञ्चिकि-सां ग्राह; चिकित्सा चायुषो हितायोपदिश्यते ॥ २१ ॥

( १ ) प्रश्न: आयुर्वेद का वेद कौन? ( कं वेदमुपदिशन्ति ), उत्तर - इस प्रकार पूछने पर वैद्य को यह उचित है कि वह ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद इन चारो वेदों में से अपनी भक्ति में बतलावे क्योंकि अथर्ववेद स्वस्त्ययन ( जिन कार्यों को करने से उपकार हो सके ), बलि ( देवता आदि को बलि चढ़ाना ), मंगल, होम, नियन, प्रायचित्त, उपवास, १. ' तन्त्रस्थितानां दुर्बोधार्थानां यत्पुनः प्रकाशनानि तैतं तन्त्रमवश उक्तं भवतीत्यर्थः ' चक्रः । ' अथर्ववेदेऽस्योक्तिः '.. । २. ‘ अथर्ववेदे भक्तिः, सेवेत्यर्थः, एतेन निषक्सेव्यत्वेनाथर्ववेदख्यायुर्वेदत्वमुक्तं भवति ' चक्रः ।

पृष्ठ 675

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५८६ चरकसंहिता मंत्र आदि का परिग्रह करने से चिकित्सा को ही कहता है । चिकित्सा आयु के हित के लिए बताई गई है || २१ ॥ वेदं चोपदिश्यायुर्वाच्यं; तत्रायुश्चेतनानुवृत्तिर्जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकोऽर्थः ॥२२ ॥

( २ ) प्रश्न: आयु क्या है? ( किमायुः ), उत्तर - इस प्रकार चिकित्सक को अपने वेद का उपदेश कर आयु किसे कहते हैं? इसे बतलाना चाहिए । आयु, चेतनानुवृत्ति ( गर्भ से मरण पर्यन्त चेतना का रहना ), जीवित, अनुबन्ध, धारि इन सबका एक अर्थ है । अर्थात् ये आयु के नामान्तर हैं ॥ २२ ॥

* तदायुर्वेदयतीत्यायुर्वेदः, कथमिति चेत्? उच्यते - स्वलक्षणतः सुखासुखतो हिता-हिततः प्रमाणाप्रमाणतश्च; यतश्चायुष्याण्यनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि वेदयत्यतोऽप्या-युर्वेदः । तत्रायुष्याण्यनायुष्याणि च द्रव्यगुणकर्माणि केवलेनो पच्यन्ते तन्त्रेण ॥ २३ ॥

( ३ ) प्रश्न: आयुर्वेद नाम क्यों? ( कस्मादायुर्वेदः ), उत्तर - - जो आयु का ज्ञान कराता है उमे आयुर्वेद कहा जाता है । यह आयुर्वेद आयु का ज्ञान किस प्रकार कराता है इस प्रश्न पर उत्तर यह है कि अपने लक्षणों द्वारा सुख, असुख ( दुःख ) हिन, अहित, प्रमाण और अप्रमाण द्वारा आयुका उपदेश करता है । क्योंकि इस आयुर्वेद शास्त्र के द्वारा ही आयुष्य ( आयु के लिए हितकारी ), अनायुष्य ( आयु के लिये हानिकर ) द्रव्य. गुण, कर्म का ज्ञान होता है । इसलिये इसे आयुर्वेद कहा जाता है । आयु के लिए हितकारी और अहितकारी द्रव्य, गुण, कर्म का उपदेश सम्पूर्ण तन्त्र में ही स्थान - स्थान पर किया जायगा ॥ २३ ॥

I * तत्रायुरुक्तं स्वलक्षणतो यथावदिहैव पूर्वाध्याये च । तंत्र शारीरमानसाभ्यां रोगाभ्या-मनभस्य विशेषेण यौवनवतः समर्थानुगतबलवीर्ययशः पौरुषपराक्रमस्य ज्ञानविज्ञा-नेन्द्रियेन्द्रियार्थबलसमुदये वर्तमानस्य परमर्द्धिरुचिर विविधोपभोगस्य समृद्धसर्वारम्भस्य यथेष्टविचारिणः सुखमायुरुच्यते; असुखमतो विपर्ययेण हितैषिणः पुनर्भूतानां परस्वा दुपरतस्य सत्यवादिनः शमपरस्य परीक्ष्यकारिणोऽप्रमत्तस्य त्रिवर्गं परस्परेणानुपहतमुपसे-दमानस्य पूजार्हसंपूजकस्य ज्ञानविज्ञानोपशमशीलस्य वृद्धोपसेविनः सुनियतरागरोपे-यमदमानवेगस्य सततं विविधप्रदानपरस्य तपोज्ञानप्रशमनित्यस्याध्यात्मविदस्तत्परस्य लोकमिमं चामुं चावेक्षमाणस्य स्मृतिमतिमतो हितमायुरुच्यते; अहितमतो विपर्ययेण ॥ मुख और असुख आयु के लक्षण -- इनमें अपने लक्षणों द्वारा आयु का लक्षण इसी अध्याय में टीक - टीक वर्णन किया जा चुका है ( जैसे- ' तत्रायुश्चेतनानुवृत्तिः ' इत्यादि ) । शारीरिक या मानसिक रोगों से जो मनुष्य आकान्त नहीं है, विशेषकर युवा है, प्रत्येक कार्य करने में समर्थ है बल, वीर्य, यश, पुरुषार्थ और पराक्रमशील है, ज्ञान, विज्ञान और इन्द्रियों के बल के समुदाय से युक्त है; अधिक सम्पत्तिशाली है और सुन्दर अनेक प्रकार के भोगों से युक्त है; जिस व्यक्ति के सभी ईप्सित कर्म पूरे हो जाते हैं; जो अपनी इच्छानुसार भ्रमण करने वाला है अर्थात् स्वतन्त्र है; ऐसे पुरुष की आयु सुख - आयु कही जाती है । इससे भिन्न मनुष्यों की आयु को असुख आयु कहते हैं ॥ २४ ॥

१. ' इवेति ' तत्रायुश्चेतनानुवृत्तिः ' इत्यादिना चक्रः । २. यच्च सुखादितस्तत्र ' ग. । ३. ' समन्वागतबल ' इति पा ० । ४. ' ज्ञानविज्ञानेन्द्रियार्थबलसमुदाये ' ग. । ५. ' सामपरस्य समीक्ष्यकारिणः ' यो । ६. ' ज्ञानविज्ञानोपशमशीलवृद्धोपसेविनः ' यो । ७. ' तत्परस्य अध्यात्मपरस्य ' चक्रः ।

पृष्ठ 676

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अर्थॆदशमहामूलीयाध्याय: ३० ] सूत्रस्थानम् ५८० हित और अहित आयु के लक्षण - प्राणियों की भलाई चाहने वाले, दूसरे के धन की इच्छा न रखने वाले, सत्य बोलने वाले, शान्तिप्रेमी, विचारपूर्वक कार्य करने वाले, असावधान न रहने वाले, धर्म, अर्थ, काम इन तीन वर्गों को इस प्रकार समय पर करने वाले जिसमें एक से एक की बाधा न हो सके; पूजा करने योग्य मनुष्यों की पूजा करने वाले, ज्ञानशील; विज्ञान-शील, शान्तिशील वृद्धों की सेवा करने वाले; राग, ईर्ष्या, मद, मान इनके वेगों को अच्छी प्रकार से रोकने वाले; लगातार अनेकों प्रकार के दान देने वाले; सदैव तपस्या, ज्ञान और शांति कार्यों में लगे रहने वाले; अध्यात्म - विद्या को जानने वाले और उसी के अनुसार आचरण करने वाले, इस लोक को और परलोक को ध्यान में रखते हुए स्मरणशक्ति और बुद्धि से युक्त पुरुषों की आयु हिन आयु कही जाती है । इससे विपरीत पुरुषों की आयु अहित आयु कही जाती है || २४ || प्रमाणमायुषस्त्वर्थेन्द्रियमनोबुद्धिचेष्टादीनां विकृति लक्षणैरुपलभ्यतेऽनिमित्तैः, अयम-स्मात् क्षणान्मुहूर्ताद्दिवसात्रिपञ्चसप्तदशद्वादशाहात् पक्षान्मासात् षण्मासात् संवत्सराद्वा स्वभावमापत्स्यत इति; तत्र स्वभावः प्रवृत्तेरुपरमो मरणमनित्यता निरोध इत्येकोऽर्थः; इत्यायुषः प्रमाणम; अतो विपरीतमप्रमाणमरिष्टाधिकारे; देहप्रकृतिलक्षणमधिकृत्य चोपदि-| ष्टमायुषः प्रमाणमायुर्वेदे ॥ २५ ॥

आयु का मान - अर्थ ( इन्द्रियों का विषय ), इन्द्रिय, मन, बुद्धि और चेष्टा आदि में बिना कारण त्रिकृत चिह्नों के उपस्थित होने पर जाना जाता है कि यह प्राणी इस क्षण, मुहूर्त, दिन, ३, ५, ७, १०, दिन, एक पक्ष, एक मास, छ मास, एक वर्ष के बाद स्वभाव को प्राप्त होगा अर्थात् मर जायगा | स्वभाव, प्रवृत्ति का उपरम ( अर्थात् नाश ), मरण, अनित्यता और निरोप यह सभी एक अर्थ को कहने वाले हैं ( अर्थात् यह मरण का नामान्तर है ) । इस प्रकार आयु का प्रमाण बनाया गया है । इससे विपरीत आयु के लिए अप्रमाण कहा जाना हैं । इन्द्रिय स्थान के अरिष्टाधिकारों में देह और प्रकृति के लक्षण को लेकर आयु का प्रमाण आयुर्वेद में बताया गया है ॥ २५ ॥

* प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं च ॥ २६ ॥

( ४ ) प्रश्न: आयुर्वेद का प्रयोजन क्या? ( किमर्थमायुर्वेदः ), उत्तर – इस आयुर्वेद का प्रयोजन स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ की रक्षा करना और रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना है || २६ || * सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात्, स्वभावसंसिद्धलक्षणत्वात्, भाव-स्वभावत्वाच्च । ने हि नाभूत् कदाचिदायुषः सन्तानो बुद्धिसन्तानो वा, शाश्वत-श्वायुषो वेदिता, अनादि च सुखदुःखं सद्रव्य हेतुलक्षणमपरापरयोगात् । एष चार्थसंग्रह विभाव्यते आयुर्वेदलक्षणमिति । गुरुलघुशीतोष्णस्त्रिग्धरूक्षादीनां द्रव्याणां सामान्यवि-१. अनादित्वादिति प्रथमं हेतुं विवृणोति नहीत्यादि । २. ‘ आरोग्यं सुखं, व्याधिर्दुःखं, सद्रत्र्यहेतुलक्षणमिति सद्रव्यचिरित्सित लिङ्गं; हेतुशब्दस्य हि द्रव्यशब्देनैव व्याधिकारणत्वेनोक्तत्वात् प्रशमहेतुत्वमाहुः । अपरापरयोगादिति संतानादित्यर्थः ' चक्रः । ३. ' स्वभावसंसिद्धलक्षणत्वं द्वितीयं हेतुमाह - एष चेत्यादि । एष इति सुखदुःखादिः, अर्थसंग्र-होऽभिधेयसंग्रहः; एतेन आयुरादिरायुर्वेदप्रतिपाद्य इति दर्शयति, अयं चायुरादिरत्रायुर्वेदलक्षणमिति विभाव्यते ज्ञायते, आयुरादिनाऽभिधेयेनायुर्वेदो लक्ष्यते ' चक्रः । ४. ' भावस्वभावनित्यत्वादिति तृतीयं हेतुं व्याकरोति गुर्वित्यादि । ' चक्रः । ५. ' द्वन्द्वानाम् ' इति पा. ।

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५८५ चरकसंहिता * शेषाभ्यां वृद्विह्रासौ, यथोक्तं- गुरुभिरभ्यस्यमानैर्गुरूणामुपचयो भवत्यपचयो लघुनाम्, एवमेवेतरेषामिति, एष भावस्वभावो नित्यः स्वलक्षणं च द्रव्याणां पृथिव्यादीनां; सन्ति तु द्रव्याणि गुणाश्च नित्यानित्याः । न ह्यायुर्वेदस्याभूत्वोत्पत्तिरुपलभ्यते, अन्यत्रावबोधोप-देशाभ्यामः एतद्वै द्वयमधिकृत्योत्पत्तिमुपदिशन्त्येके । स्वाभाविकं चास्य लक्षणमकृतकं, यदुक्तमिहाद्येऽध्याये च यथा - अग्नेरौष्ण्यम्, अप द्रवत्वम् । भावस्वभाव नित्यत्वमपि श्चास्य, यथोक्तं - गुरुभिरभ्यस्यमानैर्गुरुणामुपचयो भवत्यपचयो लघूनामिति ॥ २७ ॥

( ५ ) प्रश्न: शाश्वत या अशाश्वत है? ( शाश्वतोऽशाश्वतो वा ), उत्तर - यह आयुर्वेद १. अनादि होने से, २. अपने लक्षणों के स्वभावतः सिद्ध होने से, ३. भावों के स्वभाव के नित्य होने से शाश्वत ( नित्य ) है । कभी भी ऐसा नहीं हुआ है कि आयु का सन्तान ( प्रवाह ) या बुद्धि का सन्तान न हो इसलिये आयु को जानने वाला भी शाश्वत है । इसी प्रकार द्रव्य ( औषधि ), हेतु ( निदान ), लक्षण इनके पर और अपर के संयोग होने से मुख ( आरोग्य ) दुःख ( रोग ) ये भी नित्य अर्थका हैं ( अर्थात् सदैव द्रव्य, कारण और लक्षणों का प्रवाह बना रहता है इसलिये यह नित्य है ) यहीं संग्रह आयुर्वेद लक्षण को विशेष कर स्पष्ट करता है । गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष होता गुण वाले द्रव्यों का सामान्य द्रव्यों के प्रयोग से वृद्धि और विशेष द्रव्यों के प्रयोग ले हाम के लगातार अभ्यास करने से गुरु द्रव्यों की ( अङ्गों की ) वृद्धि है । जैसा कि गुरु गुण युक्त द्रव्यों होती है, लघु द्रव्यों ( अङ्गों ) का अपचय अर्थात् हानि होती है । इसी प्रकार अन्य शारीरिक धातुओं और अङ्ग - प्रत्यङ्गों को सामान्य से वृद्धि और विशेष से हानि होती है । इस प्रकार यह जो भाव ( उत्पन्न होने वाले द्रव्यों का ) नित्य स्वभाव है । इसी प्रकार पृथ्वी आदि द्रव्यों का भाव - स्वभाव होने से नित्य है । पर द्रव्य और गुण नित्य अपना - अपना लक्षण होता है वह भी और अनित्य भी हुआ करते हैं । बात नहीं आयुर्वेद शास्त्र की सृष्टि से पहले उत्पत्ति नहीं है और वाद में इसकी उत्पत्ति है ऐसी । अर्थात् ज्ञान है । इस आयुर्वेद का ज्ञान या उपदेश शास्त्रों में इन्हीं दो की गाथा सुनी है । जाती इन ज्ञान है और उपदेश और उपदेश को छोड़कर कहीं भी उत्पत्ति का वर्णन नहीं मिलता ऐसा कहा है । आयुर्वेद के दोनों को लेकर कुछ आचार्य आयुर्वेद की उत्पत्ति स्वीकार करते हैं, नहीं है ( किन्तु स्वत: जो भी स्वाभाविक लक्षण बतलाये गये हैं वे लक्षण किसी के बनाये , जल हुए में द्रवता स्वभाव से होन उत्पन्न होते है ) । जैसा कि पहले अध्याय में अक्षि में उष्णता का भाव - स्वभाव है । वैसे ही ये आयुर्वेद के लक्षण स्वभावसिद्ध है अतः नित्य करने हैं । से आयुर्वेद गुरु द्रव्यों की वृद्धि और होने से भी नित्यना स्पष्ट ही है जैसा कि गुरु द्रों के अभ्यास लघु द्रव्यों का हास होता है ॥ २७ ॥

( Eternal ) है अथवा विमर्श - ५ वें प्रश्न में यह स्पष्ट पूछा गया है कि आयुर्वेद करने के नित्य लिए तीन हेतुओं का निर्देश अनित्य ( Non - Eternal ) आयुर्वेद की नित्य प्रामाणित किया गया है, जिनमें -उसे कहते है जिसका प्रारम्भ काल ज्ञान ( १ ) पहला हेतु ' अनादित्वात् ' बनाया है । अनादि संयोग स्वरूप आयु का प्रारम्भ का हुआ न हो, इस जगत् में शरीर, इन्द्रिय, सत्व, आत्मा है और के इस प्रकार चारों के संयोग से चलने वाला यह बात कोई भी व्यक्ति बताने में समर्थ नहीं इसके प्रारम्भ काल बताना भी सम्भव नहीं । जब आयु का चक्र कब जाकर समाप्त होगा यह नित्य मानना आवश्यक प्रतीत होता है । इसी में और अन्नकाल का ज्ञान ही नहीं है तो १. ' स्वलक्षणं पृथिव्यादीनां खरद्रवत्वादि ' चक्रः ।

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अर्थदशमहामूलीयाध्यायः ३० । सूत्रस्थानम् ५८६ बुद्धि का सन्तान अर्थात् इस प्रकार का विचार कि आयु का प्रारम्भ कब से हुआ और कब तक रहेगा यह बताना कठिन है इस भाँति इस आयु के बारे में अपनी - अपनी बुद्धि का प्रवाह लगातार बना रहता है, अतः नित्य है । आयु का वेदिता ( ज्ञाता ) आत्मा भी नित्य है क्योंकि यदी चेतना का मूल और कारण है । कब से इस शरीर में चेतना आई यह भी कहना असम्भव है अत: आत्मा को भी नित्व माना जाता है । सुख - दुःख अर्थात् आरोग्य और रोग इन दोनों को भी द्रव्य, हेतु और लक्षणों के प्रवाह के नित्य रहने से नित्य ही माना गया } अर्थात् जगत में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो द्रव्यों का सेवन न करता हो । द्रव्य सुखकारी और दुःखकारी दोनों प्रकार के होते हैं । सुखकारी वे द्रव्य हैं जिनके सेवन से वातादि दोषों को विषमता नहीं होने पाती और मनुष्य दुःख का भागी नहीं होता । दुःखकारी वे द्रव्य हैं जिनके सेवन से शरीर वातादि दोषों से विषम हो जाता है, फलस्वरूप दुःख होता है इस प्रकार इन दोन द्रव्यों में से किसी न किसी द्रव्य का यावत् आयु रहती है तब तक मनुष्य सेवन करता रहता है । इस तरह द्रव्य हेतु और लक्षण इनके पर ( श्रेष्ठ ), अपर ( हीन ) द्रव्यों के संयोग से अर्थात् अपने समान द्रव्यों के प्रयोग से या अपने से विशेष द्रव्यों के प्रयोग से सुख - दुःख का संयोग चलता रहता है । इस प्रकार आयुर्वेद के लक्षण में बनाये गये हिताहित, सुख - दुःख आयु और आत्मा इन सबके नित्य होने से आयुर्वेद भी नित्य ही है । ( २ ) दूसरा कारण स्वभावसंसिद्धलक्षणत्वात् ' ' से आयुर्वेद को नित्य माना है । यह द्रव्यों का स्वभाव होता है कि अपने से समान द्रव्यों के प्रयोग से उनकी वृद्धि एवं अपने से विशेष द्रव्यों के प्रयोग से उनका हास होता है । इसी प्रकार द्रव्यों के जो अपने लक्षण होते हैं, जैसे -- ' खर-द्रवोगत्वं भूजलानिलतेजसाम् । आकाशस्याप्रतीघातो दृष्टं लिंगं यथाक्रमम् ॥ ' यह लक्षण स्वभाव से होता है । उसी प्रकार जो भी आयुर्वेद का लक्षण बनाया गया है वह लक्षण स्वभावसिद्ध है । अतः आयुर्वेद शास्त्र नित्य है । ( ३ ) तीसरा कारण - ' भाव - स्वभावनित्यत्वात् ' जो उत्पत्तिशील पदार्थ होते है उनका जो अपना स्वभाव होता है वह नित्य होता है जैसे अग्नि में उष्णता, जल में द्रवता, उसी प्रकार आयुर्वेद में गुरु द्रव्यों के अभ्यास से गुरु की वृद्धि और लघु का हास होता है यह बात स्त्रभावतः सिद्ध ही है । B तस्यायुर्वेदस्याङ्गान्यष्टौ; तद्यथा - कायचिकित्सा, शालाक्यं, शल्यापहर्तृकं, विषगर-वैरोधिकप्रशमनं, भूतविद्या, कौमारभृत्यकं, रसायनं, वाजीकरणमिति ॥ २८ ॥।

( ६ ) प्रश्न: कितने और कौन इसके अङ्ग हैं ( कति, कानि चास्याङ्गानि ), उत्तर — इस आयुर्वेद के ८ अङ्ग होते है, जैसे- १. कायचिकित्सा, २. शालाक्य, ३. शल्यपहर्तुक ( शल्यतंत्र ), ४. विषगर - वैरोधिकप्रशमन, ( अगदतंन्त्र ), ५. भूतविद्या, ६. कौमारभृत्य, ७. रसायन, ८. वाजीकरण ॥ २८ ॥

विमर्श - इनका लक्षण सुश्रुत के सूत्रस्थान में विशेषरूप से वर्णित है । प्रायः इनके शब्दों से ही इनके अर्थ अवगत हो जाते है । अतः यहाँ पर इनकी व्याख्या नहीं की जा रही है ॥ २८ ॥

स चाध्येतव्यो ब्राह्मणराजन्यवैश्यैः । तत्रानुग्रहार्थं प्रौणिनां ब्राह्मणैः, आरक्षार्थं राजन्यैः, वृत्यर्थं वैश्यैः; सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्रहार्थं सर्वैः । तत्र यदध्यात्मविदां धर्मपथस्थानां धर्मप्रकाशकानां वा मातृपितृभ्रातृबन्धुगुरुजनस्य वा विकारप्रशमने प्रयत्न-वान् भवति, यच्चायुर्वेदोक्तमध्यात्ममनुध्यायति वेदयत्यनुविधीयते वा, सोऽस्य परो धर्मः; १. ' प्रजानाम् ' इति पा ० । २. ' आत्मरक्षार्थम् ' इति पा ० ।

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५६० चरकसंहिता या पुनरीश्वराणां वसुमतां वा सकाशात् सुखोपहारनिमित्ता भवत्यर्थावाप्तिरारक्षणं च, याच स्वपरिगृहीतानां प्राणिनामातुर्यादारक्षा, सोऽस्यार्थः यत् पुनरस्य विद्वहणयशः

शरण्यत्वं च याच संमानशुश्रूषा यचेष्टानां विषयाणामारोग्यमाधत्त सोऽस्य कामः ।

इति यथाप्रश्नमुक्तमशेषेण ॥ २ ९ ॥

( ७-८ ) प्रश्न: किसको और क्यों इसको पढ़ना चाहिए? ( कैश्चायमध्येतव्यः, किमर्थं च ) उत्तर - इस आयुर्वेद शास्त्र का ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को ही अध्ययन करना चाहिए । १. ब्राह्मण को प्राणिमात्र पर अनुग्रह ( दयादृष्टि ) के लिए ही अध्ययन करना चाहिए । २. क्षत्रिय को प्राणियों की सभी प्रकार से रक्षा हेतु, ३. वैश्य को अपनी जीविका चलाने के लिये अध्ययन करना चाहिए । अथवा सामान्य रूप से धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति के लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को आयुर्वेद का अध्ययन करना चाहिए । १. जो अध्यात्म - विद्या अर्थात् आत्मज्ञान में दक्ष, धर्म - मार्ग पर वर्तमान, और धर्म मार्ग का प्रकाश ( उपदेश ) करने वाले हैं, उन लोगों के या माता - पिता, भाई, बन्धु और गुरुजनों के रोगों की शान्ति करने में प्रयत्न-शील होता है । जो आयुर्वेद में बतलाये गये अध्यात्म विद्या का चिन्तन करता है । दूसरों को बतलाता है और स्वयंभी उसी ज्ञानानुसार व्यवहार करता है तो वह उस पुरुष का परम ' धर्म ' होता है । ( २ ) राजाओं, धनिकों के साथ से अर्थात् उनकी चिकित्सा कर सफलता प्राप्त करने पर सुख-पूर्वक मिले हुए उपहार में जो धन की प्राप्ति होती है । या जो उसकी रक्षा होती है अथवा अपने अधीन सेवक आदि प्राणियों की रोग से रक्षा होती है तो वह उस पुरुष का अर्थ होता है । ३. जो विद्वानों से आदर प्राप्त करता है, यश को प्राप्त करता है, और जो अपने शरण में आए हुए की रक्षा करता है और उससे जो उस व्यक्ति का सम्मान और सेवा होती है, जो इन्द्रियों के ईप्सित त्रिषयों को आरोग्य होने के कारण प्राप्त करता है वह उस पुरुष का काम होता है । इस प्रकार में जैसा प्रश्न किया गया है उस प्रश्न के अनुसार क्रमशः प्रत्येक प्रश्नों का उत्तर सूत्र दे दिया गया है ॥ २ ९ ॥ विमर्श - यहाँ पर केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय औरवैश्य को ही आयुर्वेद पढ़ने का उपदेश किया गया है पर सुश्रुत ने शूद्र को भी आयुर्वेद पढ़ने का उपदेश किया है, यथा- ' शूद्रमपि कुलगुण-सम्पन्नं मन्त्रवर्द्धमनुपनीतमध्यापयेदित्ये के ' ( मू. उ. अ. २ ) काश्यप ने किसी भी जाति विशेष के छात्रों को आयुर्वेद पढ़ने का उपदेश नहीं किया है किन्तु अध्ययन के लिए सर्वगुण सम्पन्न किसी भी जाति को अध्ययन करने का अधिकार है, ऐसा बताया है । अथ भिगादित एत्र भिषजा प्रष्टव्योऽष्टविधं भवति - तन्त्रं, तन्त्रार्थान्, स्थानं, स्थानार्थान्, अध्यायम्, अध्यायार्थान् प्रश्नं, प्रश्नार्थाश्चेति; पृष्टेन चैतद्वक्तव्यमशेषेण वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्वति ॥ ३० ॥

तंत्र आदि ८ प्रश्न - एक वैद्य दूसरे वैद्य के ज्ञान की परीक्षा करने के लिये सर्व प्रथम ८ प्रश्नों को पूछ सकता है । १. तंत्र ( शास्त्र ), २. तन्त्रार्थ ( शास्त्रार्थ ), ३. स्थान, ४. स्थान का अर्थ ५. अध्याय, ६. अध्याय का विषय, ७ प्रश्न, ८. प्रश्नों का विषय, यदि इस प्रकार का प्रश्न कोई वैद्य किसी वैद्य से पूछे तो सभी प्रश्नों के उत्तरों को वाक्य, वाक्यार्थ और अर्थावयव से उत्तर देना चाहिये ॥ ३० ॥

* तत्रायुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शास्त्रं लक्षणं तन्त्रमित्यनर्थान्तरम् ॥ ३१ ॥

तंत्र - • यहाँ आयुर्वेद शाखा, विद्या, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण और तंत्र ये सभी समान अर्थ को बताने वाले हैं अर्थात् एकार्थवाची पद हैं ॥ ३१ ।

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अर्थॆदशमहामूलीयाध्यायः ३० ] सूत्रस्थानम् ५६१ * तन्त्रार्थः पुनः स्वलक्षणैरुपदिष्टः । स चार्थः प्रकरणैर्विभाव्यमानो भूय एव शरीर-वृत्तिहेतुव्याधि कर्म कार्यकालकर्तृकरणविधिविनिश्चयाद्दशप्रकरणः तानि च प्रकरणानि केवलेनोपदेच्यन्ते तन्त्रेण ॥ ३२ ॥

तंत्रार्थ -- तंत्र का अर्थ अपने लक्षणों द्वारा बता दिया गया है । वह तंत्रार्थ प्रकरणों के अनुसार पुनः विचार किया जाय तो फिर । १. शरीर, २. वृत्ति, ३ हेतु ( निदान ), ४. व्याधि ( रोग ), ५. कर्म ( चिकित्सा कर्म ), ६. काल ( नित्यग और आवस्थिक ), ७. कार्य ( आरोग्य ), ८. कर्त्ता ( वैद्य ), ९. करण ( औषधि ), १०. विधि ( औषधि - कल्पना ) इनका निश्चय करने से १०. प्रकरण होते हैं उन सभी प्रकरणों का सम्पूर्ण तंत्र में उपदेश किया जायगा ॥ ३२ ॥

तन्त्रस्यास्याष्टौ स्थानानि; तद्यथा - श्लोक निदानविमानशारीरेन्द्रिय चिकित्सितकल्प-सिद्धिस्थानानि । तत्र त्रिंशदध्यायकं श्लोकस्थानम्, अष्टाष्टाध्यायकानि निदानविमानशा-रीरस्थानानि, द्वादशकमिन्द्रियाणां त्रिंशकं चिकित्सितानां द्वादशके कल्पसिद्धिस्थाने भवतः ॥ ३३ ॥

( ३ ) चरकसंहितान्तर्गत अध्याय विवरण ( Er.umeration of Chapters of Charaka Samhita ) स्थान इस तंत्र ( चरक संहिता ) में ८ स्थान हैं । जैसे - १. लोक स्थान ( सूत्र स्थान ), २. निदान स्थान, ३. विमान स्थान, ४. शारीर स्थान, ५. इन्द्रिय स्थान, ६. चिकित्सा स्थान, ७. कल्प स्थान, ८. और सिद्धि स्थान । इनमें सूत्र स्थान में ३० अध्याय, निदान, विमान, शारीर स्थान में ८-८ अध्यायः इन्द्रिय स्थान में १२; चिकित्सा स्थान में ३०; कल्प स्थान और सिद्धि स्थान में १२, १२ अध्याय कहे गये हैं ॥ ३३ ॥

भवति चात्र-त्रिंशके द्वादशकं त्र्यं च त्रीण्यष्टकान्येषु समाप्तिरुक्ता ।

श्लोकौषधारिष्टविकल्पसिद्धिनिदानमानाश्रयसंज्ञकेषु ॥ ३४ ॥

और भी - • सूत्र स्थान और चिकित्सा स्थान इन दोनों स्थानों में ३०, ३० अध्याय; अरिष्ट ( इन्द्रिय ), कल्प और सिद्धि स्थान में १२, १२ अध्यायः निदान, विमान और शारीर स्थान में ८, ८ अध्याय लिख कर इस ग्रन्थ की समाप्ति की गई है ॥ ३४ ॥

स्वे स्वे स्थाने यथास्वं च स्थानार्थ उपदेच्यते । सविंशमध्यायशतं शृणु नामक्रमागतम् ॥ स्वानार्थ - अपने - अपने स्थान के विषयों का अपने - अपने स्थान में उपदेश किया जायगा इसे ही स्थानार्थं कहते हैं । यह संहिता १२० अध्याओं में सम्पन्न है । उन अध्याओं का नाम क्रम से सुनिये ॥ ३५ ॥

दीर्घञ्जीवोऽप्यपामार्गतण्डुलारग्वधादिकौ । षड्विरेकाश्रयश्चेति चतुष्को भेषजाश्रयः ॥ ३६ ॥

मात्रातस्याशितीयौ च नवेगान्धारणं तथा । इन्द्रियोपक्रमश्चेति चत्वारः स्वास्थ्यवृत्तिकाः ॥ खुड्डाकश्च चतुष्पादो महांस्तित्रैषणस्तथा । सह वातकलाख्येन विद्यान्नैर्देशिकान् बुधः ॥३८ ॥

स्नेहनस्वेदनाध्यायावुभौ यश्चोपकल्पनः । चिकित्साप्राभृतश्चैव सर्व एव प्रकल्पनाः ॥ ३ ९ ॥ कियन्तः शिरसीयश्च त्रिशोफाष्टोदरादिकौ । रोगाध्यायो महांश्चैव रोगाध्यायचतुष्टयम् ॥४० ॥

अष्टोनिन्दितसंख्यातस्तथा लङ्घनतर्पणे । विधिशोणितिकश्चैव व्याख्यातास्तत्र योजनाः ॥ यज्ञः पुरुषसंख्यातो भद्रकाप्यान्नपानिको । विविधाशितपीतीयश्चत्वारोऽन्नविनिश्चयाः ॥४२ ॥

१. ' षड्विरेकशतश्चे ' ति पा. ।