चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 731–740

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 731–740

पृष्ठ 731

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६४२ जा रहा है-कुष्ठ १. अविसर्पणशील २. रक्तप्रधान दोष नहीं ३. वेदना अल्प या नहीं ४. सप्त द्रव्यों की दुष्टि आवश्यक ५. चिरकारी चरकसंहिता विसर्प १. विसर्पणशील २. रक्तप्रधान दोष ३. प्रबल वेदना ( शोणित दुष्टि ) के कारण ४. सप्त द्रव्यों की दुष्टि आवश्यक नहीं ५. अचिरकारी कुष्ठ की जब उत्पत्ति होती है तो तीन दोष और चार दृष्य दुष्ट रहते हैं पर जीर्ण होने पर अस्थि, मज्जा, शुक्र, सिरा, धमनी, आदि को भी दूषित कर देते हैं । इसी विषय को सुश्रुत ने कहा है यथा-' एवं कृष्ठं समुत्पन्नं त्वचि कालप्रकर्षतः । क्रमेण धातून् व्याप्नोति ॥ ' ( सु. नि. अ. ५ ) । इससे यह स्पष्ट है सर्वप्रथम त्वचा, फिर लसीका, रक्त, मांस आदि क्रम से दूषित होते हैं । त्वचा के दाद, खुजली से लेकर गलित कुष्ठ तक सभी को आयुर्वेद में कुष्ठ ही माना है । दोपों की न्यूनता और अधि-कना के ऊपर सान महाकुष्ठ और ग्यारह क्षुद्र कुष्ठ माने गये हैं । कुछ के आयुर्वेदीय वर्णन को देखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि यह वर्णन केवल Leprosy और Leucoderma का नहीं है अपितु ' कट ' शब्द पूरे Skin disease का द्योतक प्रतीत होता है । इसको Dermatosis भी कह सकते हैं । न च किञ्चिदस्ति कुष्ठमेकदोषप्रकोपनिमित्तम् अस्ति तु खलु समान प्रकृतीनामपि कुष्टानां दोषांशांशविकल्पानुबन्धस्थानविभागेन वेदनावर्णसंस्थानप्रभावनामचिकित्सित-विशेषः । सभी कुष्ठ त्रिदोषज - एक ही दोष के प्रकुपित होने से कोई भी कुछ उत्पन्न नहीं होता है । समान दोष, दृष्य प्रकृति वाले कुष्ठ में भी दोषों के अंशांश, विकल्प, अनुबन्ध और स्थान के अनुसार वेदना, वर्ण, संस्थान, प्रभाव, नाम, चिकित्सा विशेष से भेद हो जाता है । विमर्श - यद्यपि तीन दोष, चार दूष्य सभी कुष्ठ की प्रकृति ( कारण ) है फिर भी वातिक, पैत्तिक, इलैष्मिक, द्वन्द्वज, सान्निपातिक यह अलग नेद माना जाता है । क्योंकि दोष अपने अंश के अनुसार कुपित होते हैं, जैसे वायु कहीं रूक्ष अंश से कहीं शैत्य से और कहीं चल अंश से कुपित होती है, कहीं विकल्प, जैसे दोष, साम, निराम होकर अनुबन्ध ( द्वन्द्वज ) के रूप में स्थान ( आमाशय, पक्वाशय आदि ) भेद से, शरीर में वेदना विशेष से जैसे कपाल कुष्ठ में वेदना अधिक रहती है । वर्ण विशेष से जैसे काकन्तिका ( बुधुची के बीज ) के वर्ग की तरह रक्त वर्ग का काकण कुछ होता है । संस्थान विशेष से, जैसे ' ऋष्यजित्रा- संस्थानम् ' ( भालू की जिह्वा की तरह जो कुष्ठ होता है उसे ऋष्यजिह्व कहते हैं ) । प्रभाव विशेष से, जैसे कुछ रोग अपने प्रभाव के कारण साध्य और कुछ रोग असाध्य होते है । नाम विशेष से जैसे कापाल, उदुम्बर आदि भेद्र, चिकित्सा में विशेष ज्ञान के लिये यह अलग - अलग नामकरण किया गया है । सप्तविधोऽष्टादशविधोऽपरिसंख्येयविधो वा भवति । दोषा हि विकल्पनैविकल्प्य -माना विकल्पयन्ति विकारान्, अन्यत्रासाध्यभावात् । तेषां विकल्पविकार संख्यानेऽति-प्रसङ्गमभिसमीक्ष्य सप्तविधमेव कुष्टविशेषमुपदेच्यामः ॥ ४ ॥

कुष्ठ के भेद - वह कुष्ठ सात प्रकार का, अठारह प्रकार का या असंख्य प्रकार का होता है । क्योंकि भेदों से विभक्त किए गए दोष से, असाध्य भाव के अतिरिक्त रोगों के भेद हो जाते हैं! चक्रपाणि और विजयरक्षित के आधार पर कुष्ठ और विसर्प में भेद प्रस्तुत किया

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कुष्ठ निदानाध्याय: ५ ] निदानस्थानम् ६४३ उनके भेदों के अनुसार रोगों की गणना में अधिक विस्तार देख कर सात प्रकार के कुष्ठ के भेदों का उपदेश करेंगे ॥ ४ ॥

विमर्श - क्योंकि चरक ने सात ही भेदों का केवल ( वात, पित्त, कफ, इन्दरी, त्रिदोषज ) वर्णन किया है, इन दोषों के अतिरिक्त क्षुद्र कुष्ठ में दूसरे दोष नहीं होते हैं अतएव क्षुद्रकुष्ठों का भी अन्तर्भाव सप्तविध कुष्ठ में हो जाता है । चरक ने सात महाकुष्ठ का वर्णन नहीं किया है, यह भेद तो का है । चरक ने प्रधान रूप से दोषों के वर्ग और चिकित्सा भेद से कुष्ठ को सात, अट्ठारह और असंख्येय माना है । * इह वातादिषु त्रिषु प्रकुपितेषु त्वगादींश्चतुरः प्रदूषयत्सु वातेऽधिकतरे कपालकुष्ठ-मभिनिर्वर्तते. पित्ते त्वौदुम्बरं, श्लेमणि मण्डलकुष्ठं, वातपित्तयोर्ऋव्यजिह्वं, पित्तश्लेष्मणोः पुण्डरीकं, लेप्ममारुतयोः सिध्मकुष्ठं, सर्वदोषाभिवृद्धौ काकणकमभिनिर्वर्तते; एवमेव सप्तविधः कुष्ठविशेषो भवति । से चैष भूयस्तेरतमतः प्रकृतो विकल्प्यमानायां भूयसीं विकारविकल्पसंख्यामापद्यते ॥ ५ ॥

सप्तकुष्ठों में दोष सम्बन्ध - प्रकुपित हुए, वात, पित्त, कफ त्वक्, लसीका, रक्त, मांस इन चारों को दूषित करते हुए वायु की प्रधानता होने से कपालकुष्ठ उत्पन्न होता है । पित्त की प्रधानता से औदुम्बर, कफ की प्रधानता से मण्डल, वात - पित्त की प्रधानता से ऋष्यजिह्व, पित्त - कफ की प्रधानता से पुण्डरीक श्लेष्म - वान की प्रधानना से सिध्म और एक ही साथ तीनों दोषों की प्रधानता से काट की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार यह सात प्रकार के कुष्ठ का नेट होता है । और वह फिर अंशांश द्वारा प्रकृति के विकस करने पर अधिक विकार के भेदों की संख्या को प्राप्त करता है ॥ ५ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने इनको ही महाकुष्ठ माना है पर मण्डल को न मान कर अरुण माना है और सिम को न मान कर दद्रु को माना है । सम्भवतः गम्भीर होने पर सिध्म और दद्रु यह दोनों महाकुष्ठ हो सकते हैं और जब ये उत्तान होने हैं तो क्षुद्रकुष्ठ में आते हैं । सम्भवतः सुश्रुत ने गम्भीर दद्रु को महाकुछ और अगम्भीर सिम्म को क्षुद्रकुष्ठ माना है । चरक नें तो महाकुष्ठ की चर्चा नहीं है वहाँ केवल दोपों के अनुसार सान भेद बताये हैं । तत्रेदं सर्वकुष्ठनिदानं समासेनोपदेच्यामः - शीतोष्णव्यत्यासमनानुपूर्व्योपसेव मानस्य तथा संतर्पणापतर्पणाभ्यवहार्यव्यत्यासं, मधुफाणितमत्स्यलकुचमूलककाकमाचीः सतत-मतिमात्र प्रजीर्णे च समश्नतः, चिलिचिमं च पयसा, हायनकयवकचीनकोद्दालककोर-दूषप्रायाणि चान्नानि तीरदधितक्र कोलकुलत्थमापातसी कुसुम्भस्नेहवन्ति, एतैरेवातिमात्रं सुहितस्य च व्यवायव्यायामसंतापानस्युपसेवमानस्य भयश्रम संतापोपहतस्य च सहसा शीतोदकमवतरतः, विदग्धं चाहारजातमनुल्लिख्य विदाहीन्यभ्यवहरतः, छर्दिच प्रतिघ्नतः, स्नेहांश्चातिचरतः त्रयो दोषा युगपत् प्रकोपमापद्यन्ते; त्वगादयश्चत्वारः शैथिल्यमापद्यन्ते; तेषु शिथिलेषु दोषाः प्रकुपिताः स्थानमधिगम्य संतिष्ठमानास्तानेव स्वगादीन् दूषयन्तः कुष्ठान्यभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ६ ॥

सभी कुष्ठों के संक्षेप में निदान - यहाँ यह सभी कुष्ठों का निदान संक्षेप में कहेंगे - शीत और गर्मी के परिवर्तन को और सन्तर्पण ( ग ), अपतर्पण, ( लंघन ) अथवा भोज्य पदार्थ के परिवर्तन को, क्रम के विना सेवन करने वाले मधु, राव, मछली, बड़हर, मूली, मकोय को सदा अधिक मात्रा में और अजीर्ण की अवस्था में खाने वाले के, दूध के साथ चिलिचिम खाने १. ' स एव ' ग. । २. ' भूयोऽतः प्रकृतिविकल्पनया ' ह. ।

पृष्ठ 733

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६४४ चरकसंहिता वाले के, हायनक, यवक ( जई ), चीना, वनकोदो और कोदो अन्न को प्रायः दूध, दही, मट्ठा, खट्टी बेर, कुल्वी, उड़द, तीसी, कुसुम्भ ( बर्रे ) और स्नेह के साथ सेवन करने वाले के, इन्हीं अन्नों को अधिक रूप में सेवन कर मैथुन, व्यायाम, तीव्र धूप का अधिक सेवन करने वाले के नय, परिश्रम, अधिक धूप से सन्नप्त हो कर सहना शीतल जल में गोता लगाने वाले के, विदग्व आहार समूह का वमन किये विना विदाही अन्न को भोजन करने वाले के दमन के वेग को रोकने वाले के, स्नेह को अधिक मात्रा में सेवन करने वाले के तीनों दोष एक साथ कुपित हो जाते हैं । त्वचा आदि चारों ( त्वक् लसीका, रक्त और मांस ) शिथिलता को प्राप्त हो जाते हैं । इन चारों के शिथिल होने पर प्रकुपित हुए दोष स्थान प्राप्त कर रहते हुए, उन्हीं त्वचा आदि को दूषित करते हुए कुछ को उत्पन्न करते हैं ॥ ६ ॥

विमर्श - - चरक ने तीन दोष, चार दृष्य एक साथ दुष्ट होकर कुष्ठ को उत्पन्न करते हैं ऐसा बताया है । सुश्रुत ने त्रिदोष पहले त्वचा को दूषित कर क्रमशः अन्न धातुओं को दूषित करते हैं, ऐसा बताया है । सुश्रुत ने इसी लिये सात धातुगत कुष्ठों का अलग - अलग वर्तन किया है । आधुनिक विचार से कुछ वेसिलस लेप्रो ( Bacillus lepra ) के आक्रमण से होता है । पर उसका सम्प्राप्ति-काल दो से आठ वर्ष तक होता है । आयुर्वेद भी त्वचा आदि में दोष का स्थायी निवास होने के बाद ही कुष्ठ की उत्पत्ति मानना है । इस सम्प्राप्ति काल के विषय में आयुर्वेद का ही समर्थक आधुनिक विज्ञान है । रह गई कारण के विषय की बात तो, वह दोनों के सिद्धान्त भिन्न भिन्न होने से है क्योंकि ~ आधुनिकविज्ञान जीवाणु और आयुर्वेद विद्रो मानता है । तेषामिमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति तद्यथा - अस्वेदनमतिस्वेदनं पारुष्यमतिश्लक्ष्णता वैवर्ण्यं कण्डूनिस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो लोमहर्षः खरत्वमू - मायणं गौरवं श्वयथुर्वी-सर्पागमनमभीक्ष्णं च काये कायच्छिद्वेषूपदेहः पक्कदग्धदष्टभग्नत्तोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति ॥ ७ ॥

कुछ का पूर्वरूप - उन सभी कुछो के ये पूर्वरूप होते है । वह जैसे - पसीना का न आना, या पसीने का अधिक आना, जिस स्थान पर कुछ उत्पन्न होता है वहाँ पर कर्कशता, अत्यन्त चिकनापन, उस स्थान के वर्ण में विकृति, खुजली, सुई चुभोने सी पीड़ा, शून्यता, दाह, शरीर में झनझनाहट, रोमांच, रूखापन, गर्मी का अनुभव होना, शरीर में भारीपन, शोध, वार - वार विसर्प रोग का होना, शरीर में और शरीर के छिद्रों में मल का उपदेह, शरीर में फोड़े के पकने पर, जल जाने पर, किसी चीज के काटने पर, अंगों के टूट जाने पर, चोट लगने पर और गिर जाने पर अधिक रूप में वेदना होना, छोटे भी कोई व्रण हो जाय तो उसका दुष्ट हो जाना और जल्दी न भरना ॥ ७ ॥

नतोऽनन्तरं कुष्ठान्यभिनिर्वर्तन्ते, तेपामिदं वेदनावर्णसंस्थानप्रभावनामविशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा - रूक्षारुण परुषाणि विषमविसृतानि खरपर्यन्तानि तन्न्युद्वृत्तब सुसुप्तानि हृषितलोमाचितानि निस्तोदबहुलान्यल्पकण्डूदाहपूयलसीकान्याशुगति-समुत्थानान्याशुभेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि च कपालकुष्ठानीति विद्यात् ( १ ); कपाल कुष्ठ के लक्षण - ' उसके बाद कुछ उत्पन्न होते हैं । उनकी वेदना, वर्ण, संस्थान, प्रभाव और नाम की भिन्नता का यह विज्ञान है । जैसे रूक्ष, अरुण, पप, विषम, फैले हुए, जिनके किनारे खरदरे, पतले और ऊंचे उठे हुए बाहर के भाग वाले, शून्यता की तरह स्पर्शज्ञान रहित, १. ' उद्वृत्तत्र हिस्तनूनि उच्चलीकृतबाह्यदेहानि ' चक्रः । २. ' सुप्तमुप्तानि ' इति पा ० ।

पृष्ठ 734

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कुष्ठनिदानाध्याय: ५ ] निदानस्थानम् ६४५ रोमांच से युक्त, अधिक सुई चुभोने सी वेदना, अल्प खुजली, दाह, पूय और लसीका वाले, शीघ्र फैलने वाले तथा उत्पन्न होने वाले, शीघ्र फटने वाले, कीड़े युक्त, काले, लाल, कपाल ( खपड़े ) के वर्ण की तरह कपाल कुष्ठ होता है, ऐसा जानना चाहिए ॥ ( १ ) ॥ ताम्राणि ताम्रखररोमराजीभिरवनद्धानि बहलानि बहुबहलपूयरक्तलसीकानि कण्डूक्लेद-कोथदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि ससंतापक्रिमीगि पक्कोदुम्बरफलवर्णान्यौदुम्बर-कुष्टानीति विद्यात् ( २ ); उदुम्बर कुष्ठ के लक्षण — • ताँबे की तरह लाल वर्ण वाले, खुरदरे, रोम के समूहों से युक्त, घने, बहुत गाढ़े, पूय, रक्त, लसीका से युक्त, खुजली, गीला, सड़न युक्त, दाहयुक्त और पकने वाले शीघ्र ही फैलने और उत्पन्न होने वाले और फूट जाने वाले, गर्मी और कृमियुक्त और पके हुए गूलर फल के सामान वर्ण वाले कुष्ठ को उदुम्बर कुष्ठ जानना चाहिए ॥ ( २ ) । स्निग्धानि गुरूण्युत्सेधवन्ति च स्थिरपीत पर्यन्तानि शुकुरक्तावभासानि शुकुरोम-राजीसन्तानानि बहुबहलशुक्कुपिच्छिलस्रावीणि बहुक्केदकण्डूक्रिमीणि सक्तगतिसमुत्थान-भेदीनि परिमण्डलानि मण्डलकुष्टानि विद्यात् ( ३ ); मण्डल कुष्ठ के लक्षण -- • चिकना, गुरु, ऊँचे, ऋक्षण, स्थिर और पीले किनारों वाले सफेद और रक्तवर्ग का आभा वाले, श्वेत रोम से पूर्ण व्याप्त, अधिक एवं गाढ़े श्वेत लस्सेदार स्राव से युक्त, बहुत क्लेद ( गीलापन ), कण्डू और कृमियुक्त जो धीरे - धीरे देर से फैलने और उत्पन्न होने वाले और फूटने वाले गोलाकार कुष्ठ को मण्डल कुष्ठ जानना चाहिए ॥ ( ३ ) ॥ विमर्श - सुश्रुत ने मण्डल कुष्ठ को नहीं लिखा हैं, एक अरुण कुष्ठ का उल्लेख किया है जैसे— ' त्र वातेनारुणाभानि तनूनि विसपणि तोदभेदस्वापयुक्तान्यरुणानि । ' ( सु. नि. अ. ५ ) । जो मण्डल कुष्ठ से सर्वथा भिन्न है और वह कफप्रधान है, अरुण वातप्रधान होता है । चरक के कपालकुष्ठ से अरुणकुष्ठ का सामञ्जस्य है पर सुश्रुत में भी कपालकुष्ठ का वर्णन है और इसे कफप्रधान माना है जबकि चरक ने वान की अधिकता से उत्पत्ति मानी है, इस प्रकार अरुण कुष्ठ सर्वा भिन्न है और कपाल कुष्ठ की उत्पत्ति में भी दोनों में वैमत्य है । परुषाण्यरुणवर्णानि बहिरन्तः श्यावानि नीलपीतताम्रावभासान्याशुगतिसमुत्थाना-न्यल्पकण्डूक्लेदकिमीणि दाहभेदनिस्तोद ( पाक ) बहुलानि शूकोपहतोपमवेदनान्युत्सन्न-मध्यानि तनुपर्यन्तानि कर्कशपिडकाचितानि दीर्घपरिमण्डलान्यृष्यंजिह्वा कृतीनि ऋष्य-जिह्वानीति विद्यात् ( ४ ); ऋष्यजिव कुष्ठ के लक्षण - जो कठिन और कुछ लाल वर्ग का हो, जिसका वहिर्भाग और अन्तर्भाग कुछ कालिमा लिये हो, जिसमें नीली, पीली और तांबे की तरह लाल वर्ग की कान्ति हो, जो शीघ्र फैलने और उत्पन्न होने वाला हो, कुछ खुजली, क्लेश, कृमि युक्त हो, दाह, वेदना, सुई चुभाने सी पीड़ा, और पाक अधिक हो, शूक ( जौ के बाल के टूड़ ) चुभाने के समान जिसमें पीड़ा हो, बीच में उभार हो, सभी किनारों पर पतलापन हो, कर्कश फुंसियों से व्याप्त हो, लम्बा और गोल हो तथा ऋष्य ( भालू ) की जिह्वा की तरह आकृति वाला हो उसे ऋष्यजिह्व कुछ जानना चाहिए || ४ || १. ' ताम्रगौरराजिभिः ' ह ० । ' ताम्ररोमराजिभिः ' इति पा ० । २. ' शुक्कराजी संततानि ' इति पा ० । ३. " पिच्छास्रावीणि ' इति पा ० । ४. " निस्तोदबहुलानि ' इति पा ० । ५. ' ऋष्यो हरिणविशेषः ' चक्रः ।

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६४६ चरकसंहिता शुक्कुरक्तावभासानि रक्तपर्यन्तानि रक्तराजीसिरासन्ततान्युत्सेधवन्ति बहुबहलरक्त-पूयलसीकानि कण्डूक्रिमिदाहपाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभेदीनि पुण्डरीकपलाशसंकाशानि पुण्डरीकाणीति विद्यात् ( ५ ); पुण्डरीक कुछ के लक्षण जो घेत और रक्त वर्ग की कान्ति वाला हो, जिनके किनारे लाल हों और रक्त वर्गों की रेखाओं और सिराओं से व्याप्त हो, उभार हो, जिनमें अधिक गाढ़ा रक्तदूय और लसीका बहुत हो, खुजली और कृमि हो, जिसमें दशह और पाक हो, जो शीघ्र ही फैलना हो, और शीघ्र ही उत्पन्न हो, जिसका व्रण जल्दी फूटता हो, जो रक्त कमल की पंखुड़ी के समान हो, उसे पुण्डरीक कुष्ठ जानना चाहिए ॥ ५ ॥

परुपारुणानि विशीर्णबहिस्तनृन्यन्तः स्निग्धानि शुकुरक्तावभासानि बहून्यल्पवेदना-न्यल्पकण्डूदाहपूयलसीकानि लघुसमुत्थानान्यल्पभेदक्रिमीण्य लावुपुष्पसङ्काशानि सिध्म-कुष्टानीति विद्यात् ( ६ ); सिध्म कुष्ठ के लक्षण -- जिसके बाहरी किनारे कठिन लाल वर्ण के टूटे - फूटे पतले और भीतर से स्निग्ध हों, श्वेत और रक्त कान्ति वाले हैं, बहुत अल्प वेदना वाले हों, अल्प, खुजली, दाह, पूय और लसीका युक्त हो, छोटे कारणों से उत्पन्न होने वाले हों, बहुत ही कम फूटने वाले, कृमि ते युक्त, लौकी के फूल की तरह वर्ण वाले कुष्ठ को सिध्म कुष्ठ जानना चाहिए ॥ ६ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने भी सिम कुष्ठ को माना है पर वह क्षुद्र कुष्ठ में इसकी गणना करते है । पर चरक के सिध्म से सुश्रुत का सिम भिन्न है । सुश्रुत का सिध्म शरीर के ऊर्ध्व भाग में ही होता है उसमें किसी भी प्रकार की वेदना नहीं होती और न उसमें पूयलसीका आदि का स्राव ही होता है, साधारण सी खुजली होती है, और बहुत पतले इसके धब्बे पड़ते हैं । इन लक्षणों के आधार पर ही उसे क्षुद्र कुष्ठ में रक्खा है । पर चरक का सिध्म गम्भीर धातु स्थायी होने से और वात - कफ की अधिकता होने से उसमें वेदना और स्राव आदि होते है इसलिये इसे इन्होंने महाकुष्ठ में रक्खा है । काकणन्तिकावर्णान्यादौ पश्चात्तु सर्वकुष्ठलिङ्गसमन्वितानि पापीयसा सर्वकुष्टलिङ्ग-संभवेनानेकवर्णानि काकणानीति विद्यात् । तान्यसाध्यानि, साध्यानि पुनरितराणि ॥ ८ ॥

काकणक कुष्ठ के लक्षण - प्रारम्भ में ( रत्ती, बुंधुंची ) के वर्ण के समान, बाद में सभी कुछ के लक्षणों से युक्त और दुष्ट, सभी कुछों के लक्षणों के होने से अनेक वर्ण वाले कुछ को काकगक कुष्ठ जानना चाहिए । वे असाध्य और शेष साध्य होते हैं ॥ ८ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने बीच में काला, चारों तरफ लाल इसका वर्ग माना है जैसे कि लाल बुनची का स्वरूप होता है । ऊपर सात महा कुष्ठों का वर्णन किया गया है और ये ही प्रधान कुष्ठ हैं शेष ग्यारह कुछ चिकित्साभेद के लिये माने गये है जिनका वर्णन चिकित्सा स्थान में किया जायगा । * तत्र यदसाध्यं तदसाध्यतां नातिवर्तते, साध्यं पुनः किंचित् साध्यतामतिवर्त कदाचिदपचारात् । साध्यानि हि पट् काकणकवर्ज्यान्यचिकित्स्यमानान्यपचारतो वा दो पैरभिष्यन्दमानान्यसाध्यतामुपयान्ति ॥ ९ ॥

साध्यासाध्यता का विचार - इनमें जो असाध्य हैं वे कभी भी अपनी असाध्यता को नहीं छोड़ने । कोई साध्य रोग कभी कभी अपचार से साध्यता का अतिक्रमण कर जाते है । काक-क को छोड़कर छः कुष्ठ साध्य है । ये चिकित्सा न करने से या अपचार से दोषों से पूर्ण होने के कारण असाध्य हो जाते हैं ॥ ९ ॥

१. ' रक्तसिराराजिसंततानि ' ग. । ३. ' पापीयसाम् ' इति पा ० । २. ' पुण्डरीकपलाशशब्देन पद्मपुष्पदलमिह ' चक्रः ।

पृष्ठ 736

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कुठनिदानाध्याय: ५ ] निदानस्थानम् ६४७ साध्यानामपि पेच्यमाणानां त्वङ्मांसशोणितलसीका कोथक्केदसंस्वेदजाः क्रिमयो s-भिमूर्च्छन्ति; ते भक्षयन्तस्त्वगादीन् दोषाः पुनर्दूषयन्त इमानुपद्रवान् पृथक् पृथगुत्पाद-यन्ति – तत्र वातः श्यावारुणवर्णपरुषतामपिच रौच्य शूलशोपतोदवेपथुहर्षसङ्कोचायासस्त-म्भसुप्तिभेदभङ्गान्. पित्तं दाहस्वेदक्लेदको स्राव पाकरागान्, श्लेष्मा त्वस्य वैत्यशैत्यक-धैर्यगौरवत्सेधोपस्नेहोपलेपान्, क्रिमयस्तु स्वगादींश्चतुरः सिराः स्नायूचास्थीन्यपि च तरुणान्याददते ॥ १० ॥

कुष्ठ में दोषों के आधार पर लक्षण - साध्य कुष्ठों की भी उपेक्षा करने से, त्वग्, मांस, रक्त, लसीका के सड़कर गल जाने से या अधिक पसीने आदि के होने से, स्वेदज कृमियों के पड़ जाने से वे कृमि त्वचा आदि को भक्षण करते हुए और दोष उन त्वचा आदि को फिर से अधिक रूप में दूषित करते हुए अलग - अलग इन उपद्रवों को उत्पन्न करते हैं । इनमें वायु कुष्ठ से आक्रान्त स्थान में इयात्र और अरुण वर्ग, कठोरता, रूक्षता, शूल, मुख का सुखना, सूई चुभोने सी पीड़ा, कम्प, रोमांच, अंगों में संकोच, बिना परिश्रम की थकावट, शरीर में जकड़ाहट, शून्यता, विदीर्ण करने की तरह पीड़ा, अंग - भंग आदि । पित्त से दाह, पसीना का अधिक आना, कुष्ठ के स्थान में क्लेद, सड़न, मवाद का बहना, पकना और लालिमा को तथा कफ से कुष्ठ के स्थान में सफेरी, शीतलता, खुजली, स्थिरता, भारीपन, उभार, चिकनापन और लेप लगाये हुए की तरह कुष्ठ के स्थानों में अनुभव होना, उत्पन्न होते है और कृमियों त्वचा आदि चारों धातुओं को खाने के बाद धीरे - धीरे सिरा. स्नायु और तरुणास्थियों को भक्षण कर जाती हैं ॥ १० ॥

ॐ अस्यां चैवावस्थायामुपद्रवाः कुष्टिनं स्पृशन्ति; तद्यथा - प्रस्त्रवणमङ्गभेदः पतनान्य-ङ्गाबयवानां तृष्णाज्वरातीसारदाहदौर्बल्यारो चकाविपाकाश्च तथाविधमसाध्यं विद्यादिति ॥ कृष्ठ के उपद्रव -- इसी अवस्था में कुष्ठ रोगी को ये उपद्रव उत्पन्न होते हैं जैसे पूय का बहना, अंगों का टूटना, अंगों के अवयवों का कट कर गिरना, प्यास, ज्वर, अतिसार, दाह, दुर्बलता, अरोचक और अपचन होते हैं । इस प्रकार के कुष्ठ को असाध्य जानन्ा चाहिए ॥। ११ ॥ भवन्ति चात्र-* साध्योऽयमिति यः पूर्वं नरो रोगमुपेक्षते । स किंचित्कालमासाद्य मृत एवावबुध्यते ॥१२ ॥

यस्तु प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु वा । भेषजं कुरुते सम्यक स चिरं सुखमश्नुते ॥ १३ ॥

यथा ह्यल्पेन यत्नेन च्छिद्यते तरुगस्तरुः । स एवातिप्रवृद्धस्तु च्छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥ १४ ॥

एवमेव विकारोऽपि तरुगः साध्यते सुखम् 1 । विवृद्धः साध्यते कृच्छ्रादसाध्यो वाऽपि जायते ॥ सामान्यतः सभी रोगों में शोघ्र ही चिकित्सा का उपदेश - जो मनुष्य यह रोग साध्य हैं, ऐसा समझ कर पहले रोग की उपेक्षा करता है तो वह कुछ काल के बाद मरा हुआ ही जाना जाता है । जो मनुष्य रोग उत्पन्न होने के पहले रोग की तरुणावस्था में, औषधियों के द्वारा उचित चिकित्सा करता है तो वह बहुत दिनों तक सुख भोगता है । जैसे तरुग वृक्ष थोड़े ही परिश्रम के द्वारा काटा जाता है और वही बड़ा हो जाय तो बहुत परिश्रम करने पर काटा जाता है, इसी प्रकार तरुण रोग सुखपूर्वक ठीक हो जाते है । यदि दोष बढ़ जाय तो रोग कठिनता से अच्छे होते हैं, अथवा असाध्य ही हो जाते हैं ॥ १२-१५ ॥ १. ' दोषान् ' इति पा ० । ३. ' यलात् कृच्छ्रेण छिद्यते ' ग. । २. ' खादन्ति ' इति पा ० ।

पृष्ठ 737

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६४८ तत्र श्लोकः-चरकसंहिता संख्या द्रव्याणि दोषाश्च हेतवः पूर्वलक्षणम् । रूपाण्युपद्रवाश्वोक्ताः कुष्ठानां कौष्टिके पृथक् ॥ इत्यनिवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने कुष्ठनिदानं अध्याय की सूची -नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

कुष्ठों की संख्या, द्रव्य, दोष, दूष्य, हेतु ( निदान ), पूर्वरूप, लक्षण और उपद्रव अलग - अलग इस कुष्ठ निदान में कहे गए है ॥ १६ ॥

इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के निदानस्थान में कुष्ठनिदान नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५ ॥

अथ षष्टोऽध्यायः अथातः शोषनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब इसके बाद शोष निदान की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - -कुष्ठ और शोष दोनों ही कृतयुग में एक साथ ही उत्पन्न हुए इस लिये कुष्ठ के बाद यक्ष्मा कहा गया है । इस रोग में रसादि धातुओं का शोषण हो जाता है इसलिये इसे शोष कहते हैं इसका दूसरा नाम क्षय भी है क्योंकि अनुलोम या प्रतिलोम गति से सभी धातुओं का क्षय हो जाता है और कार्य करने की शक्ति का भी क्षय हो जाता है । इसका तीसरा नाम राजयक्ष्मा भी है क्योंकि सबसे पहले यह राजा चन्द्रमा को हुआ था और यक्ष्मा ( रोग ) रोगों में राजा है इसलिये भी राजयक्ष्मा कहा जाता है । इसी तथ्य को सुश्रुत ने भी बताया है; यथा - ' अनेक रोगानुगतो बहुरोगपुरोगमः । दुर्विज्ञेयो दुर्निवारः शोषो व्याधिर्महाबलः । संशोषणाप्रसादीनां शोष इत्यभिवीयते क्रियाक्षयकरत्वाच्च क्षय इत्युच्यते पुनः ॥ राचन्द्रमसो यस्मादभूदेष किलामयः । तस्मात्तं राजयक्ष्मेति केचिदाहुर्मनीषिणः ॥ ' ( सु ० उ ० अ ० ४१ ) इह खलु चत्वारि शोपस्यायतनानि भवन्ति; तद्यथा - साहसं संधारणं यो विषमा-शनमिति ॥ ३ ॥

शोष के कारण इस आयुर्वेद में यक्ष्मा के चार कारण है । जैसे - साहस, सन्धारण, क्षय और विषम भोजन ॥ ३ ॥

तत्र साहसं शोषस्यायतनमिति - पुरुषो दुर्बलो हि यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः । • यदा सन् बलवता सह विगृह्णाति, अतिमहता वा धनुषा व्यायच्छति, जल्पति वाऽप्यति-मात्रम्, अतिमात्रं वा भारमुद्वहति, अप्सु वा पृवते चातिदूरम्, उत्सादन पदाघातने वाऽति-प्रगाढमासेवते, अतिप्रकृष्टं वाऽध्वानं द्रुतमभिपतति, अभिहन्यते वा, अन्यद्वा किंचिदे-afai विषममतिमात्रं वा व्यायामजातमारभते, तस्यातिमात्रेण कर्मणोरः क्षण्यते । ( १ ) साहस की व्याख्या – शोष का कारण साहस है, यह जो कहा गया उसकी व्याख्या करेंगे - जब मनुष्य दुर्बल होने पर भी बलवान् से लड़ाई करता है, अथवा बहुत बड़े धनुष को १. ' उत्सादनपराघातने ' यो ।

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शोषनिदानाध्याय: ६ ] निदानस्थानम् ६४६ चलाता है या अधिक बातचीत करता है, या अधिक भार ढोता है, या पानी में अधिक दूर तक तैरता है, उबटन और पैरों से शरीर पर आघात ( पैरों द्वारा शरीर को कुचलवाना ) अधिक रूप में करता है, बहुत दूर तक रास्ते में शीघ्रता से दौड़ता है, या शरीर में अधिक चोट खा जाता है और “ अन्य कोई भी इसी प्रकार का विषम या अधिक व्यायाम आदि कार्य करता है तो उस अधिक कार्य के करने से उसकी छाती में ( अर्थात् फुफ्फुस ) में क्षत हो जाता है । तस्योरःक्षतमुपप्लवते वायुः । स तत्रावस्थितः श्लेप्माणमुरःस्थमुपसंगृह्य पित्तं च दूषयन् विहरत्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च । साहसजन्य यक्ष्मा की सम्प्राप्ति - उसके विदीर्ण वक्ष प्रदेश में वायु भर जाती है । वहाँ भरी हुई वह वायु वक्षप्रदेश में रहने वाले कफ को साथ में लेकर, पित्त को दूषित करती ऊपर, नीचे, और तिर्थक चलने लगती है । तस्य यशः शरीरसन्धीनाविशति तेनास्य जृम्भाऽङ्गमर्दो ज्वरश्वोपजायते, यस्त्वामा-शयमभ्युपैति तेन रोगा भवन्ति उरस्या अरोचकश्च यः कण्ठमभिप्रपद्यते कण्ठस्तेनोद्ध्वं-सते ' स्वरश्वावसीदति यः प्राणवहानि स्रोतांस्यन्वेति तेन श्वासः प्रतिश्यायश्च जायते, यः शिरस्यवतिष्ठते शिरस्तेनोपहन्यते; ततः क्षणनाञ्चैवोरसो विपमगतित्वाच्च वायोः कण्ठस्य चोद्ध्वंसनात् कासः सततमस्य संजायते, स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं ष्टीवति, शोणि-तगमनाञ्चास्य दौर्बल्यमुपजायते; एवमेते साहसप्रभवाः साहसिकमुपद्रवाः स्पृशन्ति । ततः स उपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुप्यति तस्मात् पुरुषो मतिमान् बलमा-त्मनः समीक्ष्य तदनुरूपाणि कर्माण्यारभेत कर्तु; बलसमाधानं हि शरीरं, शरीरमूलश्च पुरुष इति ॥ ४ ॥

साहसजन्य यक्ष्मा के लक्षण - उसका जो भाग शरीर की सन्धियों में प्रवेश करता है, उससे जम्भाई, अङ्गमर्द और ज्वर होता है, उसका जो भाग आमाशय में जाता है, उससे उरो -रोग और अरोचक होता है । उसका जो भाग कण्ठ प्रदेश में जाता है, उससे कण्ठ विकृत और मारभेद हो जाता है । जो भाग प्राणवह स्रोतों में जाना है उससे श्वास और प्रतिश्याय उत्पन्न होता है । जो भाग शिरःप्रदेश में जाकर रुकता है उससे शिर विकृत हो जाता है । इसके बाद वक्ष-प्रदेश फट जाने से, वायु की विषनगति होने से और कण्ठ के विकृत होने से उसे कास लगातार आने लगता है, वह लगातार कास के कारण छाती में क्षन हो जाने से रक्त को थूकना है, रक्त के आने से इसको दुर्बलता हो जाती है । इस प्रकार ये साइस से उत्पन्न उपद्रव साहस करने वाले पुरुष में हो जाते हैं । उसके बाद शरीर को सुखाने वाले इन उपद्रवों से पीडित वह पुरुष धीरे-धीरे सूखने लगता है । इसलिए बुद्धिमान् पुरुष अपने बल को देखकर उसके अनुसार कार्यों को प्रारम्भ करे । क्योंकि शरीर वल के द्वारा ही सम्यक् रूप से धारण किया जाता है और पुरुष शरीर के आधार पर ही रहता है ॥ ४ ॥

भवति चात्र-साहसं वर्जयेत् कर्म रक्षञ्जीवितमात्मनः । जीवन् हि पुरुषस्त्विष्टं कर्मणः फलमश्नुते ॥ ५ ॥

अपने जीवन की रक्षा करता हुआ पुरुष साहस सम्बन्धी सभी कार्यों को न करें, क्योंकि जीना हुआ मनुष्य तो अपने कर्म के अनुसार अभिलषित भोगता है ॥ ५ ॥

संधारणं शोषस्यायतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः - यदा पुरुषो राजसमीपे भर्तुः १. ' उपसंसृज्ये शोषयन् विहरति ' इति पा. । २. ‘ कण्ठस्तेनोद्ध्वस्य ' इति पा ० । ३. ‘ शोणितगमनाच्चास्यदौर्गन्ध्वमुपजायते ' ग. ।

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६५० चरकसंहिता समीपे वा गुरोर्वा पादमूले द्यूतसभमन्यं वा सतां समाजं स्त्रीमध्यं वा समनुप्रविश्य यानै-as युच्चावचैरभियान् भयात् प्रसङ्गाद्व्रीमत्त्वाद्दृणित्वाद्वा निरुद्ध्यागतान् वातमूत्रपुरी-वेगान् तदा तस्य संधारणाद्वायुः प्रकोपमापद्यते । ( २ ) संवारण की व्याख्या -- • मल - मूत्र के वेगों को रोकना शोष का कारण है यह जो कहा है उसकी व्याख्या करेंगे । जब मनुष्य राजा के समीप में या मालिक के समीप में या गुरु के चरणों के पास या जुआरियों के सभा में या अन्य सभ्य समाज में या स्त्रियों के बीच में जाकर, अथवा ऊंची - नीची सवारियों में चलते हुए, भय के प्रसंग से या लज्जा से या घृगा से आये हुए वात, मूत्र, मल के वेगों को रोकता है तब उन वेगों को रोकने से वायु कुपित हो जाता है । स प्रकुपितः पित्तश्लेष्माणौ समुदीर्योर्ध्वमवस्तिर्यक् च विहरति । संधारणजन्य राजयक्ष्मा की सम्प्राप्ति - वह कुपित हुआ वायु पित्त और कफ को उभाड़ कर ऊपर नीचे और तिर्यक् भागों में फैल जाती है । ततश्चांशविशेषेण पूर्ववच्छरीरावयवविशेषं प्रविश्य शूलमुपजनयति, भिनत्ति पुरीप-मुच्छोषयति वा, पार्श्वे चातिरुजति, अंसाववमृद्वाति, कण्ठमुरश्रावधमति, शिरश्चोपहन्ति, कालं श्वासं ज्वरं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजनयति; ततः स उपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात् पुरुषो मतिमानात्मनः शारीरेष्वेव योगक्षेमकरेषु प्रयतेत विशेषेण शरीरं ह्यस्य मूलं, शरीरमूलश्च पुरुषो भवति ॥ ६ ॥

संधारणजन्य राजयक्ष्मा लक्षण --- इसके बाद वही विकृत वात अंशभेद से पहले की तरह ( साहस जन्य शोष की तरह ) शरीर के भिन्न - भिन्न अवयवों में जाकर शूल उत्पन्न करता है, मल को पता कर बाहर निकालता है, अथवा सुखा डालना है, पार्श्वों में अधिक वेदना उत्पन्न करता है, कंधों में मर्दन करने की तरह पीड़ा करता है, कंठ और छाती को दबाता है, शिर को पीड़ित करता है खाँसी, ज्वर, स्वरभेद और प्रतिश्याय उत्पन्न करता है । इसके बाद वह शरीर को सुखाने वाले इन उपद्रवों से युक्त होकर धीरे - धीरे सूखने लगता है । इसलिये बुद्धिमान मनुष्य अपने शरीर के योग और क्षेम करने वाली वस्तुओं का ही सेवन करने में परिश्रम करे । पुरुष का शरीर ही मूल है और शरीर मूल वाला ही पुरुष होता है ॥ ६ ॥

विमर्श - ' अलब्धलाभो योगः, लब्धस्य परिरक्षणं क्षेमः ' - नहीं प्राप्त वस्तुओं को प्राप्त करना योग है पायी हुई वस्तु की रक्षा करना क्षेम कहा जाता है । यदि मनुष्य स्वास्थ्यहीन है तो उचित उपाय द्वारा स्वास्थ्य प्राप्त करना योग कहा जाता है । स्वास्थ्य ठीक होने पर नियमित आहार - विहार, रात्रि एवं दिनचर्या और ऋतुचर्या का पालन करते हुए स्वास्थ्य वन ये रखने को क्षेम कहा जाता है । बुद्धिमान् मनुष्यो को ये दोनों कार्य नियमित रूप से करने चाहिये । भवति चात्र-ॐ सर्वमन्यत् परित्यज्य शरीरमनुपालयेत् । तदभावे हि भावानां सर्वाभावः शरीरिणाम् ॥ अन्य सभी संसारिक कार्यों को छोड़कर शरीर का पालन करना चाहिये क्योंकि शरीर का अभाव हो जाने पर पुरुषों के लिए सभी वस्तुओं का अभाव हो जाता है ॥ ७ ॥

विमर्श - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष या प्राणैषणा, धनैषणा, परलोकैपणा यह तीन इच्छायें प्रत्येक शरीरधारी में प्रधान रूप से होती है और यह धर्मादि चार पुरुषार्थ या तीन एषणायें शरीर के रहने पर ही सम्भव है । यदि शरीर ही नहीं है तो कोई कार्य होना सम्भव नहीं है इसलिये प्रधान रूप से शरीर की रक्षा का उपदेश किया गया है ।

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शोषनिदानाध्याय: ६ ] निदानस्थानम् ६५१ क्षयः शोषस्यायतनमिति यदुक्तं तदनुष्याख्यास्यामः -- यदा पुरुषोऽतिमात्रं शोक-चिन्तापरिगतहृदयो भवति, ईव्यत्कण्ठाभयक्रोधादिभिर्वा समाविश्यते, कृशो वा सन् रूक्षान्नपानसेवी भवति, दुर्बलप्रकृतिरनाहारोऽल्पाहारो वा भवति, तदा तस्य हृदयस्थायी रसः क्षयमुपैति स तस्योपक्षयाच्छोषं प्राप्नोति, अप्रतीकाराच्चानुबध्यते यक्ष्मणा यधो-पदेच्यमाणरूपेण ( १ ); ( ३ ) धातुक्षवयना का कारण - क्षय यक्ष्मा का कारण होता है, यह जो कहा है उसकी व्याख्या करेंगे | जब पुरुष अत्यन्त शोक, चिन्ता से युक्त हृदय वाला होता है; ईर्ष्या, उत्कण्ठा, भव क्रोवादि से घिरा रहता है; अथवा दुर्बल होते हुए पुरुष रूक्ष, अन्न और पान का लगातार सेवन करता है अथवा दुर्बल प्रकृति का मनुष्य उपवास अधिक करना है या थोड़ा भोजन कर्ता है, तब उस पुरुष के हृदय में रहने वाला रस क्षीण हो जाता है । वह उस रस के क्षीण होने से शोष को प्राप्त करना है । उसकी उचित चिकित्सा न करने से उस व्यक्ति को आगे कहे जाने वाले लक्षणों वाला यक्ष्मा हो जाता है । ॐ यदा वा पुरुषोऽतिहर्षादतिप्रसक्तभावः स्त्रीध्वतिप्रसङ्गमारंभते, तस्यातिमात्रप्रसङ्गाद्वेतः क्षयमेति । क्षयमपि चोपगच्छति रेतसि यदि मनः स्त्रीभ्यो नैवास्य निवर्तते, तस्य चाति-प्रणीतसङ्कल्पस्य मैथुनमापद्यमानस्य न शुक्रं प्रवर्ततेऽतिमात्रोपक्षीणरेतस्त्वात्, तथाऽस्य वायुर्व्यायच्छमान शरीरस्यैव धमनीरनुप्रविश्य शोणितवाहिनीस्ताभ्यः शोणितं प्रच्याव-यति, तच्छुक्रक्षयादस्य पुनः शुक्रमार्गेण शोणितं प्रवर्तते वातानुसृतलिङ्गम् । अथास्य शुक्रक्षयाच्छोणितप्रवर्तनाच्च सन्धयः शिथिलीभवन्ति, रौक्ष्यमुपजायते, भूयः शरीरं दौर्ब-ल्यमाविशति, वायुः प्रकोपमापद्यते; स प्रकुपितो वैशिकं शरीरमनुसर्पनुदीर्य श्लेष्मपित्ते, परिशोषयति मांसशोणिते, प्रच्यावयति श्लेष्मपित्ते, संरुजति पार्श्वे, अवमृद्वात्यंसौ, कण्ट-मुसति, शिरः श्लेष्माणमुपक्लेश्य प्रतिपूरयति श्लेष्मणा, सन्धींश्च प्रपीडयन् करोत्यङ्गमर्द-मरोचकाविपाकौ च पित्तश्लेष्मोत्क्लेशात् प्रतिलोमगत्वाच्च वायुर्ज्वरं कासं श्वासं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजनयँति; स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितगमनाच्चास्य दौर्बल्यमुपजायते, ततः स उपशोष गैरेतैरुपद्रवैरुपद्भुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात् पुरुषो मतिमानात्मनः शरीरमनुरक्षञ्छुक्रमनुरक्षेत् । परा ह्येषा फलनिर्वृत्तिराहारस्येति ॥८ ॥

क्षयजन्य शोष की सम्प्राप्ति - जब पुरुष अत्यन्त हर्ष से, कामासक्त होकर स्त्रियों से अत्यन्त मैथुन करता है तो उस अत्यन्त मैथुन से शुक्र का क्षय हो जाता है और शुक्र के क्षय हो जाने पर भी उस पुरुष का मन स्त्री प्रसंग से नहीं रुकता अतः अत्यन्त मैथुन करने की प्रतिज्ञा करनेवाले उस पुरुष का मैथुन करते हुए अधिकमात्रा में शुक्रक्षय हो जाने के कारण शुक्र का स्राव नहीं होता तथा वात अत्यन्त मैथुन करनेवाले इस पुरुष की रक्त वाहिनी धमनियों में प्रवेश कर उनसे रक्त का स्राव कराता है । वायु के लक्षणों वाला वह रक्त अनि शुक्रक्षय हो जाने के कारण मैथुन करते समय पुनः शुक्र मार्ग से बाहर आता है । इसके बाद उस मनुष्य के शुक्रक्षय और रक्त के अधिक गिरने से सन्धियाँ शिथिल हो जाती हैं । उनमें रूक्षता बढ़ जाती है । फिर अधिक दुर्बलता बढ़ जाती है और वायु अधिक प्रकुपित होता है । कुपित हुआ वह वायु सारहीन उस शून्य शरीर में भ्रमण करते हुए कफ और पित्त को प्रकुपित १. ' अतिप्रयोगमारभते ' ग. । २. ' अतिमात्रोपक्षीणत्वात् ' इति पा ० । ३. ' रसिक ' ग. । ४. एतदनन्तरं क्वचित् ' स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितगमनाच्चास्न दौर्बल्यमुपजायते ' इत्यधिकः पाठो न लभ्यते ।