चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 721–730

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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६३२ चरकसंहिता दोषों से दूषित होते हैं जैसे— उष्ण गुणयुक्त द्रव्यरूपी निदान से सामान्यगुण वाला पित्त दोष एवं उष्णगुण युक्त दूष्य रक्त दूषित होकर रोगों का कारण होता है । इन तीन निदान, दोष, दूष्य को रोग का कारण माना गया है । तत्रे यो निदानादिविशेषाः श्लेष्मनिमित्तानां प्रमेहागामाश्वभिनिर्वृत्तिकरा भवन्ति; तद्यथा— हायनकयवकचीनकोद्दालक नैषधेत्कट मुकुन्दकमहाव्रीहिप्रमोदकसुगन्धकानां नवा-नामतिवेलमतिप्रमाणेन चोपयोगः, तथा सर्पिष्मतां नवहरेणुमाषसूप्यानां, ग्राम्यानूपौद-कानां च मांसानां, शाकतिलपललपिष्टान्नपायसकृशराविलेपीक्षुविकाराणां क्षीरनवमद्य-मन्दकदधिद्रवमधुरतरुणप्रायाणां चोपयोगः, मृजाव्यायामवर्जनं, स्वमशयनासनप्रसङ्गः, यश्च कश्चिद्विविरन्योऽपि श्लेष्म मेदोमूत्रसंजननः, स सर्वो निदानविशेषः ॥ ५ ॥

( २ ) प्रमेह प्रकरण प्रमेह के निदान -- ये तीनों निदान दोष और दूष्य अपनी विशेषता से कफजन्य प्रमेहों की शीघ्र उत्पत्ति करने वाले होते हैं । जैसे नूतन हायनक ( धान का भेद ), यत्रक ( जई - ' हस्वो यवो यवक ' ), चीनक ( चीना ), उद्दालक ( वन कोदों ), नैषध, इत्कट, मुकुन्दक, महाव्रीहि, प्रमोदक और सुगन्धक ( बासमती चावल ) आदि का बार - बार अति मात्रा में सेवन करना, अधिक घी के साथ नूतन मटर और उड़द की दाल या और ढाल के योग्य, अन्न, अरहर, चना आदि का सेवन, ग्राम्य आनूप और औदक मांसों का अधिक सेवन, शाक, तिल, पलल ( तिल की खली ), पिष्टान्न, पायस ( खीर ), कृशरा ( खिचड़ी ), विलेपी और ईख ( गन्ना ) का विकार गुड़, चीनी, मिश्री, राब आदि का अधिक सेवन, क्षीर ( दूध ) नूतन मद्य, मन्दक, दही, कोई भी द्रव पदार्थ, मधुर पदार्थ और नये पदार्थों का अधिक सेवन शरीर की शुद्धि और व्यायाम का त्याग, अधिक निद्रा, लेटना, बैठना और भी जो कोई ऐसा कार्य जिससे कफ, मैद और मूत्र की उत्पत्ति अधिक होती हो वे सभी प्रमेह के निदान विशेष हैं ॥ ५ ॥

विमर्श - इन प्रमेहों में सामान्य गुण दोष कफ और सामान्य गुण दृष्य मेदादि ( मैदोस्र-शुक्राम्बुवसालसीका - मज्जा रसौज: पिशितं च दृष्याः ) कुपित एवं दुष्ट होते हैं अतः प्रमेहों में प्रधानता कफ की ही होती है इसलिए सर्वप्रथम कफ प्रमेहों का ही वर्णन प्रारम्भ करते है । * बहुदेवः श्लेप्मा दोपविशेषः ॥ ६ ॥

प्रमेह में कफ का स्वरूप – प्रमेह में अत्यन्त द्रव कफ दोष विशेष है ॥ ६ ॥

@ वह्नर्वद्धं मेदो मांसं शरीरजक्लेदः शुकं शोणितं वसा मज्जा लसीका रसश्वाजः संख्यात इति हृप्यविशेषाः ॥ ७ ॥

प्रमेहों में दृष्यों का वर्गीकरण - बहुत ढीला, मैद, मांस, शरीरजन्य क्लेड, शुक्र, रक्त, वसा, नज्जा, लसीका और ओज नामक रम ये दृष्य विशेष है ॥ ७ ॥

१. ' बहुद्रवः श्लेष्मा ढोपविशेष इनि बहुद्रव एव कफो मेहजनकः, नालद्रवः ' इति चक्रः । २. ' अबद्धमिति असंत व्याख्येयम् । अत्र तु बहुत्वमघनत्वं च यथायोग्यतया बोद्धव्यं तेन मेदसि नांसे वसामज्योश्च द्वितीयमपि शेषेषु बहुत्वम् ' इति चक्रः । ' बहुबद्धंग | ' बहुवमित्यस्य मेदोमांसाभ्यामन्वयः । शरीरजक्लेदो मुद्रादिद्रवः, वसा मांसस्य स्नेहः, लसीका स्वयं वक्ष्यते ' यत्तु मांसत्वगन्तरे उदकं तलसी + शब्दं लभते, ' रस आयो धातुः, ओज इत्यर्धाञ्जलिपरिमितं इलेष्म-विशेषो न तु रस एवौजः, तस्य पाठवैयर्थ्यात् गङ्गाधरः । ' बहुवद्धं चितम् ' इति योगीन्द्रनाथसेनः । ३. ' रसचौजः संख्यः ' इति पा ० ।

पृष्ठ 722

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प्रमेहनिदानाव्यायः ४ ] निदानस्थानम् ६३३ त्रयाणामेषां निदानादिविशेषाणां सन्निपाते क्षिप्रं श्लेप्मा प्रकोपमापद्यते, प्रागतिभूय-स्वात्; स प्रकुपितः क्षिप्रमेव शरीरे विसृतिं लभते, शरीरशैथिल्यात् स विसर्पन् शरीरे मेदसैवादितो मिश्रीभावं गच्छति, मेदसश्चैव ब्रह्मवद्धत्वान्मेदसश्च गुणैः समानगुणभूयिष्ठ-त्वात् स मेदसा मिश्रीभवन् दूषयत्येनत्, विकृतत्वात्; स विकृतो दुष्टेन मेदसोपहितः शरीरक्केदमांसाभ्यां संसर्गं गच्छति, क्केदमांसयोरतिप्रमाणाभिवृद्धत्वात्; स मांसे मांसप्र-दोषात् पूर्ति मांसपिडकाः शराविकाकच्छपिकाद्याः संजनयति, अप्रकृतिभूतत्वात्; शरीर-क्लेदं पुनर्दूषयन् मूत्रत्वेन परिणमयति, मूत्रवहानां च स्रोतसां वर्णवस्तिप्रभवाणां मेदः-दोपहितानि गुरूणि मुखान्यासाद्य प्रतिरुध्यते; ततः प्रमेहांस्तेषां स्थैर्यमसाध्यतां वा जनयति, प्रकृतिविकृतिभूतत्वात् ॥ ८ ॥

दोषत्रय में कफ की प्रधानता - इन तीनों निदान, दोष और दूष्यों के भेदों का एकत्र सम्मेलन होने पर पहले बहुत अधिक होने से कफ शीघ्र ही कुपित हो जाता है प्रकुपित हुआ वह कफ शरीर की शिथिलता के कारण शीघ्र ही शरीर में फैल जाता है और मेद के बहुत और शिथिल होने से और मेद के अधिक समान गुण होने के कारण शरीर में फैल कर वह मैदा के साथ ही पहले मिलकर विकृत होने के कारण उस मेद को दूषित करता है । विकृत हुआ कफ, मेद और मांस के अधिक बढ़ जाने से दूषित मेद के साथ मिलकर शरीर -क्लेद और मांस के साथ सम्बद्ध होता है । विकृत होने से वह कफ मांस के दूषित होने से मांस में शराविका, कच्छपिका आदि सड़े हुए मांस वाली पिड़का उत्पन्न करता है । फिर शरीर के कुंद को दूषित कर मूत्र रूप में बदल देता है । वह्मण प्रदेश और वस्ति प्रदेश से उत्पन्न होने वाले मूत्रवह स्रोतों के मेद और क्लेद से भरे हुए भारी मुख को प्राप्त कर वह रुक जाता है । इसके बाद प्रकृति विकृति स्वरूप होने से प्रमेहों को और उनकी स्थिरता या असाध्यता को उत्पन्न करता है! ८ ॥ शरीरक्लेदस्तु श्लेष्ममेदोमिश्रः प्रविशन् मूत्राशयं मूत्रत्वमापद्यमानः श्लैष्मिकैरेभिर्द-शभिर्गुणैरुपसृज्यते वैषम्ययुक्तः; तद्यथा - श्वेतशीतमूर्तपिच्छिलाच्छस्निग्धगुरुमधुरसान्द्रप्र-सादमन्दैः, तत्र येन गुणेनैकेनानेकेन वा भूस्तरमुपसृज्यते तत्समाख्यं गौणं नामविशेषं प्राप्नोति ॥ ९ ॥

कफ के दश प्रनेह - कफ और मेद से मिली हुई शरीर की क्लेदना मूत्राशय में जाकर मूत्र स्वरूप को प्राप्त हो कर विपनता प्राप्त कफ के इन दश गुणों से युक्त होती है । कफ के दश गुण हैं । जैसे - १. श्वेत, २. शांत, ३. मूर्त ( टोस ), ४. पिच्छिल ( चिपचिपा ), १. ' वहुवद्धत्वात् ' यो । २. ' मिश्रीभावं गच्छन् इति पा ० । ३. ' एनन् स्वेन मिश्रीयमाणं मेदः संदूषयति ' गङ्गाधरः । ४. ' नेदसोपहतः ' ग. । ५. ' वृक्कवस्तिप्रभवाणान् ' इति पाठ चेत् साधुः । ६. ' प्रकृतिविकृतिभूतत्वादिति प्रकृतिभूतैः सर्वैरेव विकृतत्वात् सर्व एव यस्माच्छ्लेष्मणो गुणा त्रिकृतास्तस्मात् प्रकोपप्रकर्षात् स्थिरो भवति, अतिप्रकर्षात्त्वसाध्य इत्यर्थः ' चकः । गङ्गाधरस्तु ' स्वैर्यं साध्यतां वा ' इति पठित्वा एवं व्याचष्टे - ' प्रकृतिविकृतिभृतत्वादिनि प्रकृत्या हेतुना प्रकृत्य-नुरूपेग विकृतिभूतत्वात् विकृत्या विकृतिभूतत्वाभावान् दृष्यहरक्रियासाध्यत्वेन समक्रियत्वाच्च ' इति । ७. वैषम्यमिह वृद्धिकृतमेव वेदितव्यं क्षयरूपवै पन्यस्यैव रूपव्याध्यजनकत्वात्; वैषम्य एव वृद्धवृद्धतरत्वादिना हानिवृद्धी बोद्धव्ये ' चक्रः । ८. ' भूयसा समुपगृह्यते ' ग. ।

पृष्ठ 723

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६३४ चरकसंहिता ५. अच्छ, ६. स्निग्ध, ७. भारी, ८. मधुर, ९ सान्द्र, १०. प्रसाद, ११. मन्द । इनमें जो जो एक अथवा अनेक गुणों से युक्त होता है वह उसी गुण के समान नाम को या गुण सम्बन्धी नाम विशेष को प्राप्त करता है ॥। ९ ॥ विमर्श - वैषम्य गुणों के कारण ही प्रनेह उत्पन्न होता है वह वैषम्य भी केवल वृद्धि से ही समझा जाता है, क्योंकि क्षय स्वरूप वैषम्य से व्याधि उत्पन्न नहीं होती है, इस प्रकार की व्याख्या यहाँ आचार्यों को इष्ट है, क्योंकि विषमता तो क्षय एवं वृद्धि दोनों अवस्था में होती है । अतः श्वेत, शीनादि गुणों के बढ़ जाने पर जो कफज दश प्रमेह बताये गये हैं उनके श्वेत - शीतादि गुणों के अतिरिक्त अन्य गुण भी एक - एक में क्षय वृद्धि स्वरूप में विषम रहते ही हैं । पर दोष के अनुसार किसी में एक या दो या तीन या चार गुणों की विषमता पायी जाती है । ' येन गुणेनैकेनानेकेन वा ' इस वाक्य से यह स्पष्ट बनाया गया है कि श्वेतादि दश गुणों से क्रमशः दश प्रमेह नहीं होने पर व्यस्त ( अलग - अलग ) और समस्त ( मिलकर ) गुणों से दश प्रमेह होते हैं । इस लिए ही अलग - अलग गुणों के अनुसार, १. शीनमेह, २. शुक्रमेह, ३. सान्द्रमेह ये मुख्य नाम और १. उदकमेह, २. इक्षुवालिकारसमेह, ३. सान्द्रप्रसादमेह, ४. शुक्रमेह, ५. सिकतामेह ६. शनैर्मेह, ७. आलाल मेह ये कफ के अनेक गुणों से होते हैं अतः गौण नाम वाले होते हैं । ते तु खल्विमे दश प्रमेहा नामविशेषेण भवन्ति तद्यथा - उदकमेहश्च, इक्षुबालिकार -समेहश्व, सान्द्रमेहश्व, सान्द्रप्रसाद मेहश्र, शुक्रमेहश्व, शुक्रमेहश्च, शीतमेहश्च, सिकतामेहश्च, शनैर्मेहश्च, आलालमेहश्वेति ॥ १० ॥

नाम भेद से दश प्रमेह - नाम भेद से ये दश प्रदेह होते हैं । जैसे -- १. उदक मेह, २. इक्षु-बालिका रस मेह, ३. सान्द्रमेह, ४. सान्द्रप्रसाद मेह, ५. शुक्लमेह, ६. शुक्रमेह, ७. शीतमेह, ८ मिकता ., ९. शह और १०. आटालमेह || १० | विमर्श - ये दश कफ प्रमेह बताये गये है । पर सुश्रुत संहिता में सुरामेह, लवणमेह, पिष्टमेह और फनमेह अधिक पढ़े गये है और सान्द्रप्रसाद मेह, शुक्रमेह, शीतमेह और आलालमेह नहीं कह गये है । इस प्रकार दोनों दश प्रमेह को ही मानते हैं । पर उनके नामों में वैषम्य देखा जाता है । इसलिए लक्षण के आधार पर सुश्रुत के सुरामेह को सान्द्रप्रसाद में, लवणमेह का नमक का गुण शीतल होने से शीत मेह में, पिष्टमेह को श्वेत होने के कारण शुक्लमेह में समावेश किया जाता है, चरक का लालाह और शीतमेह, सुश्रुत का लगनेह और फेनमेह का गुण वैपरीत्य होने से समन्वय सम्भव नहीं है अतः उभय मत एकत्र करने पर १२ कफज प्रमेह होते हैं । ॐ ते दश प्रमेहाः साध्याः; समानगुणमेदःस्थानकत्वात्, कफस्य प्राधान्यात्, समक्रि-यत्वाच्च ॥ ११ ॥

कफज प्रमेह की साध्यता - १. समान गुणवाले मेद के आश्रय होने से, २. कफ की प्रधानता से, ३. दोष और दृष्यों की समान चिकित्सावाला होने से ये दश प्रमेह साध्य होते हैं ॥ विमर्श - कफ दोष और दृष्य मैद है । जो गुण कफ में होते है वे सभी गुण मेद में भी पाए जाते हैं, दूषित भेद ही प्रमेह का आश्रय है । समान गुण होने से कफ दोष की जो चिकित्सा की जायगी वही चिकित्सा दृष्य मेद की भी हो जायगी और जो दूषित मेद की चिकित्सा होगी वह कफ की भी स्वतः चिकित्सा हो जायगी । दोष एवं दृष्य की एक ही चिकित्सा होने से इसको समक्रिय कहा जाता है और इसी से कफजमेह साध्य, है । यद्यपि इस प्रकार की व्यवस्था से ' न च तुल्यगुणो दृष्यो न दोषः प्रकृतिर्भवेत् ' इस साध्य - सिद्धान्त का विरोध होता है तथापि प्रमेह के लिए विशेष वचन ' ज्वरे तुल्यर्तुदोषत्वं प्रमेहे तुल्यदृष्यता ' से व्याधि का प्रभाव होने से विरोध नहीं माना जाता है ।

पृष्ठ 724

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प्रमेहनिदानाव्यायः ४ ] निदानस्थानम् तत्र श्लोकाः श्लेष्मप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति - ॥ १२ ॥

यहाँ कफज प्रमेहों के भेद जानने के लिए ये इलोक होते है ॥ १२ ॥

६३५ अच्छं बहु सितं शीतं निर्गन्धमुदकोपमम् । श्लेष्मकोपान्नरो मूत्रमुदमेही मेहति ॥ १३ ॥

( १ ) उदक मेह [ Diabetes Insipidus ] - कफ के प्रकोप के कारण उदकमेही मनुष्य स्वच्छ, अधिक श्वेत, शीतल, गन्धरहित, जल की तरह, मूत्र त्याग करण है ॥ १३ ॥

अत्यर्थमधुरं शीतमी पत्पिच्छिलमाविलम् । काण्डेतुरससङ्काशं श्लेष्मकोपात् प्रमेहति ॥१४ ॥

( २ ) इक्षुबालिकारसमेह [ Alimentary Glycosuria ] 1- कफ के कोप के कारण अधिक मधुर, शीत कुछ चिपचिपा, गन्दा और गन्ना के रस की तरह मूत्र त्याग करता है ॥ १४ ॥

यस्य पर्युषितं मूत्रं सान्द्रीभवति भाजने । पुरुषं कफकोपेन तमाहुः सान्द्रमेहिनम् || १५ || ( ३ ) सान्द्रमेह [ Phosphaturia ] - कफ के कोप के कारण पात्र में रखा हुआ जिसका वामी मूत्र गाढ़ा हो जाता है उस पुरुष को सान्द्रमेही कहते है ॥ १५ ॥

यस्य संहन्यते मूत्रं किंचित् किंचित् प्रसीदति । सान्द्रप्रसादमेहीति तमाहुः श्लेष्मकोषतः ॥ ( ४ ) सान्द्रप्रसाद मेह - जिसका मूत्र कफ के कोप के कारण पात्र में रखने के बाद कुछ

गाढ़ा और कुछ स्वच्छ निर्मल हो जाता है । उसे सान्द्रप्रसाद मेही कहते हैं ॥ १६ ॥

शुक्लं पिष्टनिभं मूत्रमभीक्ष्णं यः प्रमेहति । पुरुषं कफकोपेन तमाहुः शुक्कुमेहिनम् ॥ १७ ॥

( ५ ) शुक्लमेह [ ( hyluria ] - कफ के कोप के कारण जो सदा चावल के आटे के तुल्य श्वेत वर्ण का बार - बार मूत्र त्याग करता है उस पुरुष को शुक्लनेही कहते हैं ॥ १७ ॥

शुक्राभं शुक्रमिश्रं वा सुहुर्मेहनि यो नरः | शुक्रमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १८ ॥

( ६ ) शुक्रमेह [ Spermaturia ] — जो मनुष्य करु के कोन के कारण शुक्र की तरह, या शुक्र मिला हुआ, बारम्वार मूत्र त्याग करता है उसे शुक्रमेही कहते हैं ॥ १८ ॥

अत्यर्थमधुरं शीतं मूत्रं मेहति यो भृशम् । शीतमेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेष्मकोपतः ॥ १ ९ ॥ ( ७ ) शानमंह् [ Renal glycosuria ] - जो मनुष्य कफ के कोप के कारण अत्यन्त मधुर और शीतल बार - बार मूत्र त्याग करता है उसे शीतमेही कहा जाता है ॥ १ ९ ॥ मूर्तन्मूत्रगतान् दोषानणून मेहति यो नरः । सिकतामेहिनं विद्यात्तं नरं श्लेष्मकोपतः ॥२० ॥

( ८ ) सिकता मेह - जो मनुष्य कफ के कोप के कारण मूत्रगत दोषों को छोटे - छोटे मूने ( ठोस ) टुकड़े के रूप में मूत्र से निकालता है उसे सिकतामेही जानना चाहिए ॥ २० ॥

भन्दं मन्दमवेगं तु कृच्छ्रं यो मूत्रयेच्छनैः । शनैर्मेहिनमाहुस्तं पुरुषं श्लेम्मकोपतः ॥ २१ ॥

( ९ ) शनैर्मेह - • जो मनुष्य कफ के कोप से मन्द मन्द, वेगरहित, कठिनता से, धीरे धीरे मूत्र त्याग करता है उसे शनैर्मे ही कहा जाता है ॥ २१ ॥

तन्तुवद्धमिवालालं पिच्छिलं यः प्रमेहति । आलालमेहिनं विद्यात्तं नरं श्लेष्मकोपतः ॥२२ ॥

इत्येते दश प्रमेहाः श्लेम्मप्रकोप निमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ २३ ॥

( १० ) आलालमंह [ Albuminuria ] - जो मनुष्य कफ के कोप के कारण तन्तु ( डोरे ) की तरह बधे हुए तार से युक्त चिपचिपा मूत्र त्याग करता है उसे लालाही कहते हैं । इन दश कफज प्रहों की व्याख्या का गई ॥ २२-२३ ॥ उष्णाम्ललवणक्षारकटुकाजीर्णभोजनोपसेविनस्तथाऽतितीच्णातपाग्निसंतापश्रमक्रोधवि-षमाहारोपसेविनश्च तथाविधशरीरस्यैव क्षिप्रं पित्तं प्रकोपमापद्यते, १. ' मूर्तीनिति कठिनान् — चक्रः । २. तन्तुबद्धं तन्तुवद्दोर्घमित्यर्थः । लालामिवालालं, समन्तालालारूपमित्यर्थः ' चक्रः । ३. ' तथात्मकशरीरस्यैव ' इति पा ० ।

पृष्ठ 725

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६३६ चरकसंहिता पित्तज प्रमेह का निदान - • गर्म, खट्टा, नमकीन, क्षार, कटु और अजीर्ग अवस्था में ही भोजन करनेवाले और अधिक तेज धूप, अग्नि का ताप, श्रम, क्रोध का सेवन करनेवाले, विषम

भोजन करनेवाले और उसी प्रकार के शरीरवाले का पित्त शीघ्र ही कुपित हो जाता है ।

तत्तु प्रकुपितं तयैवानुपूर्व्या प्रमेहानिमान् षट् क्षिप्रतरमभिनिर्वर्तयति ॥ २४ ॥

पित्तप्रमेह की सम्प्राप्ति - वह कुपित हुआ पित्तं जिस क्रम से कुपित कक प्रमेह उत्पन्न करता है उसी क्रम से दूष्यों को दूषित कर ये ६ प्रमेह शीघ्र उत्पन्न करता है || २४ ॥ * तेषामपि तु खलु पित्तगुणविशेषेणैवं नामविशेषा भवन्ति; तद्यथा - क्षारमेहश्व, काल-मेहश्व, नीलमेहश्व, लोहितमेहश्च, माञ्जिष्टमेहश्व हारिद्रमेहश्वेति ॥ २५ ॥

पित्तज प्रमेह के ६ नाम --: इनमें भी पित्त के गुणों की भिन्नता से उनके भी नाम भिन्न भिन्न होते हैं । जैसे —१ क्षारमेह, २ कालमेह, ३ नीलमेह, ४ लोहितमेह, ५ मजिष्ठामेह, ६ हरिद्रामेह || ते षड्भिरेव क्षाराम्ललवणकटुकविस्रोणैः पित्तगुणैः पूर्ववद्युक्ता भवन्ति ॥ २६ ॥

प्रमेह पित्त के क्षार, अम्ल, लवण, कटु ( चरपरा ), विस्र ( आमगन्ध ) और उष्ण इन ६ गुणों के अनुसार, कफज प्रमेह की तरह ६ गुणवाले हो जाते हैं ॥ २६ ॥

* सर्व एव ते याप्याः, संसृष्टदोषमेदः स्थानत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्चेति ॥। २७ ॥ ये सभी पित्तज प्रमेह - याप्य होते हैं क्योंकि इनमें कफ और पित्त ससृष्ट दोषों का आश्रय मेद होता है और एक की चिकित्सा दूसरे के लिए विरुद्ध पड़ती हैं ॥ २७ ॥

विमर्श - पित्तजप्रमेह याप्य होता है क्योंकि १. कफ और पित्त के संयोग से यह होता है । कफ का स्थान आमाशय और कफमिश्रित पित्त का भी स्थान आमाशय और मेद का स्थान वपावह स्रोत है जो आमाशय के समीप भाग में प्रतिष्ठित है । इस प्रकार दोष एवं दूष्य एक पास ही रहने से सदा दूषित होते रहते है । २. और विरुद्धोपक्रम होने से भा याप्य हे अर्थात् पित्त दोष से मैदा का स्थान आक्रान्त हुआ रहता है, ऐसी दशा में यदि पित्त की शान्ति के लिए मधुर शीतादिरसों का प्रयोग करेंगे तो उससे मेद बढ़ जायगा । और जो कटु, उगादि मेद के लिए, पथ्य है वह वित्त के लिए अपथ्य है । अतः चिकित्सा नें दोप, दूष्य में विरुद्धता आता है, और व्यावि की महिमा भी ऐसी है कि पित्तज मेह याप्य ही होता है । यह विमश चक्रपाणि सम्मत है । तत्र श्लोकाः पित्तप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति- ॥ २८ ॥

यहाँ पित्तज प्रमेहों के भेद जानने के लिए श्लोक है ॥ २८ ॥

गन्धवर्णरसस्पर्शैर्यथा क्षारस्तथाविधम् । पित्तकोपान्नरो मूत्रं क्षारमेही प्रमेहति ॥ २ ९ ॥ ( १ ) क्षारमेह ---- पित्त के कोर के कारण क्षारनेही मनुष्य गन्ध, रंग, रूप, और स्पर्श में जैसा क्षार होता है वैसा मूत्र त्याग करता है ॥ २ ९ ॥

सवर्णजयो मूत्रमुष्णं प्रमेहति । पित्तस्य परिकोपेण तं विद्यात् कालमेहिनम् ॥ ३० ॥

( २ ) काल मेह जो पित्त के कोप के कारण निरन्तर स्याही की तरह काला और उष्ण सूत्र त्याग करता है उसे काल मेही जानना चाहिए ॥ ३० ॥

१. ' पूववद्गुणविशेषेणैव ' इति पा ० । २. ' सृष्टदोष मेदःस्थानत्वादिति संनिकृष्टं दोपस्व वित्तस्य मेदसश्च स्थानं यस्मात् पित्तस्य ह्यामाशयः स्थानं तथा मेदसोऽपि यत्स्वानं वसाबहुलं तदप्यामाशयैकदेश एव तेन दोषदृष्ययोः स्थानप्रत्यासत्या दूषणं नित्यं प्रत्यासन्नत्वाद्दुर्जयमिति भावः; किंवा संसृष्टदोषं मेदोरूपं स्थानं यस्य स तथा; एष विरुद्धोपक्रमत्वे ' इति पा ० । हेतुः ' चक्रः । ३. ' तथात्मकम्

पृष्ठ 726

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प्रमेहनिदानाध्याय: ४ ] निदानस्थानम् ६३७ विमर्श - सुश्रुत ने कालमेह का वर्णन नहीं किया है किन्तु इसके स्थान में अम्लमेह नामक दूसरा ही पित्तप्रमेह का वर्णन किया है । किन्तु दोनों में कोई साम्य नहीं हैं, अम्लमेह का लक्षण - ' अम्लरसगन्धमम्लमेही ' किया गया है, कालनेह में काला मूत्र होता है! चापपनिर्भ मूत्रमम्लं मेहति यो नरः । पित्तस्य परिकोपेण तं विद्यान्नील मेहिनम् ॥ ३१ ॥

( ३ ) नील मेह -- वित्तकोप के कारण चापपक्षी ( नीलकण्ठ ) के पंख के समान वर्णवाला ( नीलरूप का ), और अम्ल मूत्र त्याग करता है उसे नीलनेही जानना चाहिए ॥ ३१ ॥

विमर्श -- इसमें वित्त की विदग्धावस्था के कारण नीलवगे और अम्ल रस पाया जाता है । त्रिस्त्रं लवणमुपेच रक्तं मेहति यो नरः । पित्तस्य परिकोपेण तं विद्याद्रक्तमेहिनम् ॥ ३२ ॥

( ४ ) रक्तनेह [ Hematuria ] जो मनुष्य वित्त कोन के कारण चित्र ( आमगन्धी ) नमकीन, गर्म और रक्त वर्ण का मूत्र त्याग करता है उसे रक्तमेहो जानना चाहिए ॥ ३२ ॥

विमर्श - विदग्ध पित्त का गुण विस्र, नमकीन और उष्णता इसमें पायी जाती है, मूत्र लाल होने से इसका नाम रक्तनेह रखा गया है । मञ्जिष्ठोदकसंकाशं भृशं विस्रं प्रमेहति । पित्तस्य परिकोपात्तं विद्यान्माजिष्टमेहिनम् || ३३ || ( ५ ) माञ्जिउमेह [ Haemoglobinuria ] - वित्त के कोन के कारण जो मनुष्य मजीठ के क्वाथ के समान रक्तवर्ण का और अधिक आमगन्धी सूत्र का त्याग करता है उसे माञ्जिष्ठनेही जानना चाहिए ॥ ३३ ॥

हरिद्रोदकसङ्काशं कटुकं यः प्रमेहति । पित्तस्य परिकोपात्तं विद्याद्धारिद्रमेहिनम् ॥ ३४ ॥

( ६ ) हारिद्रमेह [ Biirubinuria ] — • जो मनुष्य पित्त के कुपित होने से हल्दी के जल के सदृश पीला और कटु रस युक्त मूत्र का त्याग करता है उसे हारिद्रमेही जानना चाहिए ॥ ३४ ॥

विमर्श - इसमें मूत्र में पित्तरञ्जक ( Bilirubin ) की अधिक मात्रा होती है अतः मूत्र पीला होता है । यह प्रमेह कामला ( Jaundice ) आदि पित्तजन्य रोगों में अधिक पाया जाता हैं । इत्येते पट् प्रमेहाः पित्तप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ३५ ॥

इस प्रकार पित्त के प्रकोप के कारण होनेवाले इन ६ प्रनेहों की व्याख्या को गयी है || ३५ || कषायकटुतिक्तरूतलघुशीत व्यवायव्यायामवमनविरेचनास्थापनशिरोविरेचनातियोग-संधारणा नशनाभिघातातपोद्वेगशोकशोणितातिषेकजागरणविषमशरीरन्यासानुपसेवमान-स्य तथाविर्धशरीरस्यैव क्षिप्रं वातः प्रकोपमापद्यते ॥ ३६ ॥

वातप्रमेह का निदान कषैला, कटु, तिक्त, रूक्ष, हल्का, शीतल द्रव्यों का सेवन और अधिक मैथुन, व्यायाम, वमन, विरेचन, आस्थापन, शिरोविरेचन के अतियोग होने से, मलमूत्रों के वेगों को रोकने से, उपवास, चोट लगना, अधिक धूप में बैठना, अधिक उद्वेग, शोक, अधिक रक्त का स्राव, अधिक जागना और अनुचित रूप से बैठना या सोना इस प्रकार की क्रियाओं के करने से तथा अधिक मेदा और शिथिल प्रकृतिवाले मनुष्य के शरीर में शीघ्र ही वायु कुपित हो जाती है ॥ ३६ ॥

8 स प्रकुपितस्तथाविधे ' शरीरे विसर्पन् यदा वसामादाय मूत्रवहानि स्रोतांसि प्रति-पद्यते तदा वसामेहमभिनिर्वर्तयति; यदा पुनर्मज्जानं मूत्रत्रस्तावाकर्षति तदा मज्जमेहमभि-निर्वर्तयति; यदा तु लसीकां मूत्राशयेऽभिवहन्मूत्रमनुबन्धं च्योतयति लसीकातिबहु-स्वाद्विक्षेपणाच्च वायोः खल्वस्यातिमूत्रप्रवृत्तिसँङ्गं करोति, तदा स मत्त इव गजः क्षरत्यजस्रं १. ' तथात्मकशरीरस्यैव ' इति पा ० । ' इति पा ० । २. ' तथात्मके शरीरे ३. ' अनुबन्धमित्यविच्छेदेन, च्योतयति पातयति ' चक्रः । ' इच्योतयति ' यो । ४. लसीकातिवहुत्वाद्विक्षेपाच्चास्यातिमूत्रप्रवृतिसङ्गं करोति ' ह. ।

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६३८ चरकसंहिता मूत्रमवेगं तं हस्तिमेहिनमाचक्षते; ओजः पुनर्मधुरस्वभावं तद् यदा रौच्याद्वायुः कपा-यत्वेनाभिसंसृज्य मूत्राशयेऽभिवहति तदा मधुमेहं करोति ॥ ३७ ॥

बात प्रमेह की सम्प्राप्ति – वह कुपित होकर बाबु शिक्ल और अधिक नेावाले पुरुषों के शरीर में चारों तरफ भ्रमण करती हुई जब वसा को लेकर सूत्रस्रोत में प्रवेश करनी है तब बसानेह उत्पन्न करती है । जब पुनः सज्जा को मूत्रवरेन में खींच लाती है तो ज.मेह को उत्पन्न करती है । जब लसी को नूत्राशय में ले जाकर सूत्र को लगाकर निकाला है और लसीका के अधिक होने से एवं वाचु अपने विशेष युग से उसे अन्न सूत्र की प्रवृत्ति और को करती है तब वह मनवाल हाथी की तरह वेग से रहित मूत्र को बार - बार व्याग करता हैं तो उसे इत्तिनेही कहते है । गुनः ओज नधुट सभाववाला होता है, उसको जब वायु रुक्षता के कारण कपाय रस से मिलकर मूत्राशय में ले आती है नव नधुमेह को उत्पन्न करनी है । इमांश्चतुरः प्रमेहान् वावजानसाध्यानाचक्षते भिषजः, महात्ययिकत्वाद्विरुद्धोपक्रम-त्वाच्चेति ॥ ३८ ॥

वानज ४ प्रनेडों की असाध्यता में हेतु महाविनाशकारी होने से और दोप एवं दृष्य की परसर विरुद्ध चिकित्सावाले होने से इन चार वातज प्रमेहों को वैद्य लोग असाध्य कहते हैं । तेषामपि पूर्ववर्णविशेषेण नामविशेषा भवन्ति तद्यथा - वसामेहश्च मज्जमेहश्व, हस्तिमेहश्व, मधुमेहश्चेति ॥ ३ ९ ॥ वानजप्रमेह के ४ द. --- इनमें भी पहले की तरह गुर्गो की विशेषता से भिन्न - भिन्न नाम होते है वह जैसे - बसाने, मज्जमेह, हस्तिनेह और मधुमेह ॥ ३ ९ ॥ विमर्श - धातुओं के क्षीण होने पर वायु कुपित होकर इन चार प्रमेहों को उत्पन्न करती हैं । दायु स्वयं अधिक विनाशकारी है और यह धातुओं के क्षय होने पर शरीर को शीघ्र ही नष्ट कर देती है और मजा आदि गम्भीर धातुओं का नाश होने से वह अधिक उपद्रवकारी हो जाती है इसलिये ' महात्ययत्वा ' कहा गया है । और इसकी चिकित्सा भी विरुद्ध होती है जो दृष्य मेद को ठीक करनेवाली चिकित्सा है वह दोष वायु को बढ़ानेवाली है, जो चातदोषनाशक चिकित्सा है वह मेद को बढ़ानेवाली हैं । इस प्रकार दोप और दृष्य की परस्पर - विरुद्ध चिकित्सा होने से असाध्य माना गया है । वातज प्रमेह में वायु के शीघ्रकारी होने से जितनी शीघ्रता से धातुओं का नाश होता है उतना शीघ्र उसकी पूर्ति के लिये प्रभावकारी औपवियों का प्रायः अभाव ही देखा जाता है । और दूसरी बात यह है कि इसमें गम्भीर धातुओं का शीघ्रता से नाश होता है अतः शीघ्र ही भयंकर उपद्रव होने की भी सम्भावना रहती है इसलिये इसे असाध्य घोषित किया है । यद्यपि वानज प्रमेहों का भी चिकित्सा शास्त्रों में वर्गित है पर प्रारम्भिक अवस्था में हैं और अन्य कारण से कुपित वातज प्रमेह में है । पर धातुक्षयज

वातज प्रमेह असाध्य ही होते हैं ।

तत्र श्लोका वातप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति ॥ ४० ॥

वातप्रमेह के विशेष भेदों के ज्ञान के लिये यहाँ पर ये इक है ॥ ४० ॥

वसामिश्रं वसाभं वा मुहुर्मेहति यो नरः । वसामेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपतः ॥ ४१ ॥

( १ ) वसानेह जो मनुष्य वात के कुपित होने से बसा निला हुआ या बसा की तरह बार बार मूत्र त्याग करता है तो उस बसानेही को असाध्य कहते है ॥ ४१ ॥

१. ' महात्यविकत्वादिति मज्जप्रभृतिसारभूतधातुक्षयकरत्वात् विरुद्धोषकत्वं तु यद्वाः स्निग्वादि पथ्यं तन्नेोपथ्यमित्यादि वन् ' चक्रः । २. ' वातगुणविशेषेण ' इति पा ० ।

पृष्ठ 728

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प्रमेहनिदानाध्याय: ४ ] निदानस्थानम् ६३६

मज्ञानं सह मूत्रेण मुहुर्महति यो नरः । मजमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपतः ॥ ४२ ॥

( २ ) मज्जनेह - दात के कुपित होने से जो मनुष्य मूत्र के साथ मज्जा का बार बार पेशाब करता है उस मज्जनेही को असाध्य कहते हैं ॥ ४२ ॥

विमर्श - ने इसे न मानकर, तहि माना है । हस्ती मत्त इवाजत्रं मूत्रं क्षरति यो भृशम् । हस्तिमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपतः ॥४३ ॥

( ३ ) हस्तिमेह --- बात के कोप के कारण जो मनुष्य लगातार मतवाले हाथी की तरह अधिक मूत्र का वार बाग करता है उसने ते है ॥ ४३ ।

कषायमधुरं पाण्डु रूक्षं मेहति यो नरः । वात कोपादसाध्यं तं प्रतीयान्मधुमेहिनम् ॥

( ४ ) नथुमेह ·: - दात के कोप के कारण जो मनुष्य कपाय, मधुर, पाण्डु और रुक्ष मूत्र त्याग करता है उस मधुनेही को असाध्य जानना चाहिये ॥ ४४ ॥

इत्येते चत्वारः प्रमेहा वातप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ४५ ॥

इस प्रकार वायु के कोप के कारण होने वाले इन चार प्रमेहों की व्याख्या की गयी है ॥ ४५ ॥

एवं त्रिदोषप्रकोपनिमित्ता विंशतिः प्रमेहा व्याख्याता भवन्ति ॥ ४६ ॥

इस प्रकार त्रिदोष के प्रकोप के कारण होने वाले वीस प्रमेहों की व्याख्या की गई है ॥ ४६ ॥

विमर्श - प्रमेह के भेदों में संहिता तथा संग्रह ग्रन्थों में मनभेद पाया जाता है । उनका संग्रह निम्नलिखित रूप में किया जा रहा है । रिक्त स्थान तुलना के अभाव का द्योतक हैं । कफज प्रमेह चरक सुश्रुत वाग्भट माधवनिदान १ उदकमेह उदकमेह उदकमेह उदकमेह २ इक्षुत्रालिकारसमेह इक्षुवालिकामेह इक्षुमेह ३ ] सान्द्रमेह सान्द्रमेह सान्द्रमेह सान्द्रमेह ४ सान्द्रप्रसाद मेह सुरामेह सुरानेह सुराह ५ शुक्रमेह पिष्टमेह पिष्टमेह ६ शुक्रमेह शुक्रमेह शुक्रमेह शुक्रमेह ७ शीत मेह शीत मेह शीनमेह ८ सिकता नेह सिकतामेह सिकता मेह सिकतामेह ९ शनैर्मेह शनैर्मेह शनैर्मेह १० आलालमेह लालामेह लालानेह ११ – लवणमेह १२-फेन मेह पित्तज प्रमेह १ क्षारमेह क्षार मेह क्षारनेह क्षार मेह २ बालमेह कालमेह कालमेह ३ नीलनेह नील मेह नीरमेह नीलनेह ४ लोहिनमेह शोगिनमेह रक्तनेह रक्तमेह ५ महि माजिउनेह माहि

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६४० चरकसंहिता ६ हारिद्रमेह हारिद्रभेद हरिद्रमेह हारिद्रमेह 67 -अम्ल मेह वातज प्रमेह १ वसामेह वसामेह वसामेह वसाह २ मजा मेह सपिर्मेइ जानेह मज्जा मेह ३ हस्तिनेह हस्त मेह हस्ति मेह हस्तिमेह ४ मधुमेह मेह मधुमेह मधुमेह त्रयस्तु खलु दोषाः प्रकुपिताः प्रमेहानभिनिर्वर्तयिष्यन्त इमानि पूर्वरूपाणि दर्शयन्ति नद्यथा - जटिलीभावं केशेपु, माधुर्यमास्यस्य, करपादयोः सुप्ततादाहो, मुखतालुकण्ठशोपं, पिपासाम्, आलस्य, मलं काये, कायच्छिद्वेषूपदेहं परिदाहं सुप्ततां चाङ्गेषु, पट्पदपिपी-लिकाभिश्च शरीरमूत्राभिसरणं, मूत्रे च मूत्रदोषान्, विस्रं शरीरगन्धं, निद्रां तन्द्रां च सर्वकालमिति ॥ ४७ ॥

प्रमेह के पूर्वरूप - तीनों दोष प्रकुपित होकर प्रमेहों को उत्पन्न करते हुए इन पूर्वरूपों को दिखाने है । जैसे केशों में जटा का बन जाना, मुख में मधुरता, हाथ पैर में शून्यता और दाह, मुम्ब, तालु और कण्ठ का सूखना, प्यास, आलस्य, शरीर में मलों की अधिकता, शरीर के छिद्रों में मलों का अधिक लिप्त होना, सारे अंगों में दाह और शून्यता, शरीर पर और मूत्र में मक्खियों और चींटियों का बैठना, मूत्रों में मूत्र के अन्य दोषों का आ जाना, शरीर में कच्ची मछलियों की तरह गन्ध का होना और सदा निद्रा और तन्द्रा का आना पूर्वरूप होता है ॥ ४७ । * उपद्रवास्तु खलु प्रमेहिणां तृष्णातीसारज्वरदाहदौर्बल्यारोचकाविपाकाः पूतिमांस-पिडकालजीविदध्यादयश्च तत्प्रसङ्गाद्भवन्ति ॥ ४८ ॥

उपद्रव - प्रमेह रोग से युक्त रोगियों में प्यास की अधिकता, अतिसार, ज्वर, दाह, दुर्बलता, अरोचक, अपचन, दुर्गन्धि, मांस वाली पिडिकार्ये - अलजी विद्रवी आदि होती है प्रायः प्रमेह रोग जब बहुत दिनों तक रह जाता है तब ये उपद्रव दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ४८ ॥

तत्र साध्यान् प्रमेहान् संशोधनोपशमनैर्यथार्हमुपपादयं चिकित्सेदिति ॥ ४ ९ ॥ संक्षेप में चिकित्सा सूत्र - इनमें साध्य प्रमेहों की संशोधन और उपशमनों के द्वारा यथा-योग्य उपचार करके चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४ ९ ॥ भवन्ति चात्र-* गृध्नुमभ्यवहार्येषु स्नानचङ्क्रमणद्विषम् । प्रमेहः चिप्रमभ्येति नीडद्रुमिवाण्डजः ॥५० ॥

प्रमेह रोग में उपमा इस विषय में श्लोक है । जिस प्रकार पक्षी अपने घोसले वाले वृक्ष पर आता है, उसी प्रकार प्रमेह रोग भोजन में लोभ करने वाले, स्नान और भ्रमण नहीं करने वाले, पुरुष को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है ॥ ५० ॥

* मन्दोत्साहमतिस्थूलमतिस्निग्धं महाशनम् । मृत्युः प्रमेहरूपेण क्षिप्रमादाय गच्छति ॥५१ ॥

मन्द उत्साहवाले, अधिक मोटे, अधिक चिकने शरार वाले और अधिक भोजन करने वाले को मृ यु प्रमेह रूप में शीघ्र ही लेकर चली जाती है ॥ ५१ ॥

छ यस्त्वाहारं शरीरस्य धातुसाम्यकरं नरः । सेवते विविधाश्वान्याश्चेष्टाः स सुखमश्नुते ॥ किन को प्रमेह नहीं होता है - • जो मनुष्य शारीरिक धातुओ को साम्य करने वाले आहार और नाना प्रकार की अन्य चेष्टाओं का सेवन करता है वह आरोग्य को भोगता है ॥ ५२ ॥

१. ' नोडद्रुमः पक्षिणां वासवृक्षः ' चक्रः ।

पृष्ठ 730

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कुष्ठ निदानाध्याय: ५ ] तत्र श्लोकाः-निदानस्थानम् ६४१

तुर्व्याधिविशेषाणां प्रमेहाणां च कारणम् । दोषधातुसमायोगो रूपं विविधमेव च ॥५३ ॥

दश श्लेष्मकृता यस्मात् प्रमेहाः षट् च पित्तजाः । यथा च वायुश्चतुरः प्रमेहान् कुरुते बली ॥ साध्यासाध्य विशेषाश्च पूर्वरूपाण्युपद्रवाः । प्रमेहाणां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम् ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने प्रमेहनिदानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

अध्याय में आये हुए विषयों की सूची - भिन्न भिन्न व्याधियों के हेतु ( कारण ), प्रमेहों का कारण, दोष धातुओं का संयोग, अनेक प्रकार के रूप ( लक्षण ), जिस कारण कफ के दश, पित्त के ६ प्रमेह होने हैं और बलवान वायु चार प्रकार के प्रमेहों को जिस प्रकार करता है । साध्य असाध्य का निरूपण, पूर्वरूप उपद्रव और संक्षेप में प्रमेह की चिकित्सा सूत्रों का वर्णन, निदान स्थान के इस चौथे अध्याय में कहा गया है ॥ ५३-५५ ॥ इस प्रकार चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के निदानस्थान में प्रमेह निदान नामक चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४ ॥

SIC -अथ पञ्चमोऽध्यायः अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब कुष्ठ रोग निदान की व्याख्या की जायगी जैसा कि भगवान आत्रेय ने कहा था ॥ १२ ॥

ॐ सतं द्रव्याणि कुष्टानां प्रकृतिर्विकृतिमापन्नानि भवन्ति । तद्यथा - त्रयो दोषा वात-पित्तश्ले - नाणः प्रकोपणविकृताः, दूष्याश्च शरीरधातवस्त्वयांसशोणितलसी काश्चतुर्धा दोषो-पघात विकृता इति । एतत् सप्तानां सप्तधातुकमेवङ्गतमाजननं कुष्ठानाम्, अतः प्रभवाण्य-भिनिर्वर्तमानानि केवलं शरीरमुपतपन्ति ॥ ३ ॥

कुष्ठों के सात द्रव्य प्रकृति कारण - • विकृति को प्राप्त हुए सात द्रव्य कुष्ठ के कारण होते हैं, जैसे प्रकोपक कारणों से विकृत तीन दोष वात, पित्त और कफ दोषों के आक्रमण से विकृत हुए दृष्य स्वरूप शरीर - धातु त्वचा, मांस, रक्त, लसीका ये चार, इस प्रकार विकृत होता हुआ इन सातों धातुओं का समूह सात कुष्ठों का उत्पादक होता है, इन कारणों से उत्पन्न हुए और फैलते हुए कुष्ठ सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करते हैं ॥ ३ ॥

विमर्श - जब कुष्ठ के कारणभूत विरोधी अन्नपान, पापकर्म आदि से ही तीन वातादि दोष और ४ दूष्य दुष्ट होते हैं तब कुष्ठकारक होते हैं वे अन्य कारणों से दूषित वातादि दोष, त्वचादि ४ दृष्य विसर्प रोग को उत्पन्न करने वाले होते हैं, कुष्ठ, एवं विसर्प दोनों ही रोगों में यही सात मुख्य कारण होते हैं, पर कुष्ठोत्पादक कारणों से कुपित वातादि दोष और दृष्य कुष्ठ को, अन्य कारणों से सात द्रव्य कुपित होते हैं तो विसर्प रोग को उत्पन्न करते हैं । १. ' यथा करोति वायुश्च प्रमेहांश्चतुरो बली इति पा ० । २. प्रकृतिविकृतिमापन्नानि ' ग. । ' प्रकृतिभावं भजन्ति विकृतिमापन्नानि ' ह. । ३. ' लसीकाचतुर्थाः ' ह. । ४ ९ च ० सं ० ४. प्रभवाण्यभिनिर्वर्तमानानि ' इति पा ० ।