चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 751–760
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 751–760
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६६२ चरकसंहिता विमर्श - देवादि ग्रह जो पापादि कर्म करता है उसे ही उन्मत्त करते हैं । विना कारण ये ग्रह आविष्ट नहीं होते हैं, यदि बिना पापादि रूपी अशुभ कारणों से ही ग्रह पकड़ते है ऐसा कहा जाय तो सभी प्राणी ग्रह के आवेश करने से उन्मत्त हो जायेंगे पर ऐसा देखा नहीं जाता । अतः मनुष्य स्वयं कारण होता है, मनुष्य पापादि कर्मों के करने में स्वतन्त्र है । यदि दुःख न भोगने की इच्छा हो तो पापादि कार्य नहीं कर सकता है और दुःख भोगने की इच्छा हो तो पापादि कार्य कर सकता है । पर दुष्कर्म करने के बाद फल न भोगे इसमें वह स्वतन्त्र नहीं है, जैसे आग में हाथ न लगाये इसमें मानवमात्र स्वतन्त्र है, पर जलते हुए आग में हाथ लगाव और हाथ न जले ऐसा कभी नहीं हो सकता इसी बात को लेकर बताया है यथा- ' नाभुक्तं क्षीयते कर्न कल्पकोटिशतैरपि । ' अतः दुःख का कारण स्वयं मनुष्य है देवादि ग्रह नहीं, क्योंकि देवादि ग्रह कर्म के अधीन है और जो किसी के आधीन होता है उसे कर्ता नहीं माना जाता है ।
प्रज्ञापराधात् संभूते व्याधौ कर्मज आत्मनः ।
नाभिशंसेद् बुधो देवान पितॄन्नापि राक्षसान् ॥ २१ ॥
और भी --- प्रज्ञापराध ( बुद्धि विभ्रम ) से यदि अपने बुरे कर्मों के फलस्वरूप व्याधि उत्पन्न हो जाय तो विद्वान् न देवता को, न पितरों को, न राक्षसों को उपालम्भ दें अर्थात् दोषी न बतावें ॥
* आत्मानमेव मन्येत कर्तारं सुखदुःखयोः ।
तस्माच्छ्रेयस्करं मार्ग प्रतिपद्येत नो वसेत् ॥ २२ ॥
और भी सुख और दुःख का कर्ता अपने को ही मानना चाहिए इसलिए कल्याणकारी मार्ग का ही अवलम्बन करे ॥ २२ ॥
देवादीनामपचितिर्हितानां चोपसेवनम् ।
तेच तेभ्यो विरोधश्च सर्वमायत्तमात्मनि ॥ २३ ॥
और भी - • देवता आदि की पूजा और हितकारी कार्यों का सेवन ये दोनों और देवादि ग्रहों से विरोध जो अशुभ कार्य है, ये सब अपनी आत्मा के अधीन है ॥ २३ ॥
तत्र श्लोकः-संख्या निमित्तं प्रोग्रपं लक्षणं साध्यता न च ।
उन्मादानां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम् ॥ २४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने उन्मादनिदानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अध्याय की सूची - - उन्माद की संख्या, कारण SE, पूर्वरूप, लक्षण, साध्यता, ताभ्यता और संक्षेप में चिकित्सा सूत्र इस उन्माद के निदान स्थान में कहा गया है ॥ २४ ॥
इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के निदान -स्थान में उन्माद - निदान नामक सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ || ७ || १. ' ते च तेभ्योऽविरोधश्च ', इति ' न च तेभ्यो विरोधश्च ' इति च पाठान्तरद्वयमत्रोपलभ्यते । २. ' द्विविधं ' पा ० ।
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अपस्मारनिदानाध्यायः ८ ] निदानस्थानम् ६६३ अथाष्टमोऽध्यायः अथातोऽपस्मारनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब उन्माद के बाद अपस्मार निदान की व्याख्या की जायगी, जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - ' अपगता स्मृतिरिति अपस्मार: ' इस विग्रह से स्मरण पर अपस्मार रोग जाता हैं । उन्माद के बाद अपस्मार की ही उत्पत्ति के बाद अपस्मार कहा गया है । शक्ति की विकृति हो जाने पहले हुई थी अतः उन्माद 8 इह खलु चत्वारोऽपस्मारा भवन्ति वातपित्तकफसन्निपातनिमित्ताः ॥ ३ ॥
( १ ) अपस्मार - प्रकरण अपस्मार के भेद इस शास्त्र में वातज, पित्तज, कफज और सन्निपातज भेद से अपस्मार चार प्रकार के होते है ॥ ३ ॥
विमर्श - आधुनिक चिकित्सक इसको Epilepsy मानते हैं । स्वरूप एवं प्रभाव के अनुसार इसके दो भेद मानते हैं १. Petitmal ( क्षुद्र ) २. Grandmal ( तीव्र ) कहते है । त एवंविधानां प्राणभृतां चित्रमभिनिर्वर्तन्ते तद्यथा - रजस्तमोभ्यामुपहतचेतसा-मुद्रान्तविषमबहुदोषाणां समलविकृतोपहितान्यशुचीन्यभ्यवहारजातानि वैषम्ययुक्तेनोप-योगविधिनोपयुञ्जानानां तन्त्रप्रयोगमपि च विषममाचरतामन्याश्च शरीरचेष्टा विषमाः समाचरतामत्युपक्षयाद्वा दोषाः प्रकुपिता रजस्तमोभ्यामुपहतचेतसामन्तरात्मनः श्रष्ठतम-मायतनं हृदयमुपसृत्योपरि तिष्ठन्ते तथेन्द्रियायतनानि च । तत्र चावस्थिताः सन्तो यदा हृदयमिन्द्रियायतनानि चेरिताः कामक्रोध भयलोभ मोहहर्षशोक चिन्तोद्वेगादिभिः सहसाऽभपूरयन्ति तदा जन्तुरपस्मरति ॥ ४ ॥
अपस्मार की सम्प्राप्ति वे अपस्मार इस प्रकार के मनुष्यों को शीघ्र हो जाते हैं । वह जैसे-रज और तम से दूषित मन वाले, उन्मार्गगामी, विषम बहुत दोषवाले, मलिन और विकृत द्रव्यों से युक्त एवं अपवित्र भोज्य पदार्थों को विपरीत रीति से खाने के नियमों के साथ सेवन करते हुए, तथा तन्त्र प्रयोगों को विपरीत नियमों से करते हुए, और दूसरे विपन शरीर की चेष्टाओं को करते हुए मनुष्यों के, या अधिक क्षीण होने से प्रकुपित हुए दोष रज और तम से दूषित मन वालों की अन्तरात्मा के सर्वश्रेष्ठ स्थान स्वरूप हृदय में और इन्द्रियों के स्थानों में जाकर वे दोष उनमें वर्तमान रहते है । वहाँ रहते हुए काम, क्रोव भव. लोभ, मोह, हर्प, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि से प्रेरित होकर वे जब हृदय और इन्द्रियों के स्थानों को सहसा भर देते है, तब मनुष्यों को अपस्मार होता है ॥ ४ ॥
विमर्श- - यह उन्माद की भाँति एक नानसिक रोग है, उन्माद और अपस्मार दोनों में कुछ समता होते हुए भी विशेषतया उन्माद में बुद्धि - विभ्रन ( नाश ) और अपस्मार में आक्षेप ( Convulsion ) के साथ स्मृतिनाश होता है । अपस्मार का मनय - समय पर वेन होता है किन्तु उन्माद स्थायी होता है । पर भूतोन्माद वेग के रूप में भी होता है । १. ' हृदयमुपसंगृह्यो परितिष्ठन्ते ' इति ग. ।
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६६४ चरकसंहिता अपस्मारं पुनः स्मृतिबुद्धिसत्यसंवाद्वो भत्स चेष्टमावस्थिकं तमःप्रवेशमाचक्षते ॥ ॥ अपस्मार का स्त्ररूप – स्मरण शक्ति, बुद्धि और मन के विभ्रम से बीभत्स चेष्टायुक्त कभी अन्धकार में डूबते हुये की तरह ज्ञानशून्य होने को अपस्मार कहा जाता है ॥ ५ ॥
तस्मानि पूर्वरूपाणि भवन्ति तद्यथा - भ्रूव्युदासः सततमगांवैकृतमशब्दश्रवणं लालासिङ्घाणप्रस्रवणमनन्नाभिलप गरु रोचका विपाकौ हृदयग्रहः कुक्षेराटोपो दौर्बल्यमस्थि-दोङ्गमद मोहस्तमसो दर्शनं मूर्च्छा भ्रमश्चाभीच्णं स्वप्ने च मदनर्तनव्यधनव्यथनवेपन-पतनादीनीति ॥ ६ ॥
अपस्मार का पूर्वरूप - उस अपस्मार के ये पूर्वरूप है - जैसे निरन्तर भ्रू का विक्षेप, नेत्रों में विकृति का होना, शब्द न होने पर भी कानों में कुछ शब्दों को सुनना, लगातार कला और नासिका से कफ का निकलना, भोजन करने की इच्छा न होना, अरुचि, अन्न का टीक पाक न होना, हृदय में जकड़ाहट, पेट में गड़गड़ाहट, दुर्बलता, अस्थियों में वेदना, अङ्गमर्द, मोह ( ज्ञान शून्य होना ), आंख के सामने अन्धकार दिखाई देना, मूर्च्छा और भ्रम का बार - बार आना, स्वप्न में मद ( नशायुक्त होना ), नाचना, व्यधन ( किसी कांटे वा सुई आदि से छिद्र जाना ), व्यथन ( पीड़ा का होना ), कांपना और गिरना आदि ॥ ६ ॥
ततोऽनन्तरमपस्माराभिनिर्वृत्तिरेव ॥ ७ ॥
इसके बाद अपस्मार की उत्पत्ति होती है ॥ ७ ॥
तत्रेदमपस्मार विशेषविज्ञानं भवति; तद्यथा - अभीचगमपस्मरन्तं क्षणेन संज्ञां प्रति-लभमानम्, उत्पिण्डितानम्, असाम्ना विलपन्तम्, उद्वमन्तं फेनम्, अतीवाध्मातग्रीवम्, आविद्धशिरस्कं विषमविनताङ्गुलिम्, अनवस्थितपाणिपादम्, अरुण परुषश्यावनखनयनवद-नत्वचम्, अनवस्थितचपलपरुषरूक्षरूपदर्शिनं वातलानुपशयं, विपरीतोपशयं च वातेना-पस्मरन्तं विद्यात् ॥ ( १ ) ॥ वानज अपस्मार के लक्षण इसमें अपस्मार का विशेष ज्ञान इन लक्षणों से होता है । यथा-बार - बार अपस्मार के वेगों का आना, और उसके बाद क्षग में ज्ञान का होना, नेत्रों का पिण्ड के आकार में बाहर निकला हुआ होना, उच्च स्वर से घबड़ाये हुये रोना, फेन का अधिक मात्रा में आना, ग्रीवा का अधिक फूल जाना, शिर का टेढ़ा रहना, अङ्गुलियों की विषन रूप से बक्रता, हाथ पैर की अस्थिरता ( पटकना ), नख, नेत्र, मुख और त्वचा का अरुण, परुप और श्वान रङ्ग का हो जाना, अव्यवस्थित और चञ्चल, परुष ( कठिन ) और रूक्ष रूप का दिखाई देना, वानवर्धक आहार एवं विहार हानिकारक होना और विपरीत ( वातनाशक ) आहार विहार का लानदायक होना । इन सब से वातज अपस्मार से पीड़ित जानना चाहिये ॥ ( १ ) ॥ अभी गमपस्मरन्तं, क्षणेन संज्ञां प्रतिलभमानम्, अवकूजन्तम्, आस्फालयन्तं भूमि, हरितहारिद्रताम्रनखनयनवदनत्वचं रुधिरोचितोग्रभैरवादीप्तरुषितरूपदर्शिनं, पित्तला-नुपशयं, विपरीतोपशयं च पित्तेनोपस्मरन्तं विद्यात् ॥ ( २ ) ॥ पित्तज अपस्मार के लक्षण - बार - बार अपस्मार का वेग होना, पुनः क्षण - क्षय नें ज्ञान हो जाना, गले में कूजन ( अव्यक्त शब्द निकलना ), पृथ्वी पर हाथ - पैर पटकना, नख, नेत्र, मुख और त्वचा का हरा, हल्दी के तरह और ताम्र की तरह लाल वर्ण का होना, रक्त से मिश्रित उम्र भया-नक जलते हुये, क्रोधित रूपों को देखना, पित्तकारक आहार - विहार हानि करने वाले एवं विप-१. ' वातेनापरमारितम् ' इति पा ० । २. ' पित्तेनापस्मारितम् ' इति पा ० ।
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अपस्मारनिदानाध्याय: ८ ] निदानस्थानम् ६६५ रीत ( पित्त नाशक ) आहार विहार लाभदायी हों तो उसे पित्तज अपस्मार से पीड़ित जानना चाहिए || ( २ ) ॥ विर्श- यद्यपि वातज और पित्तज अपस्मार में शीघ्र ही ज्ञान हो जाता है परन्तु पित्त से वायु अधिक शीघ्रकारी होता है अतएव पित्त की अपेक्षा वायु नें शीघ्र ही ज्ञान होता है । चिरादपस्मरन्तं, चिराच्च संज्ञां प्रतिलभमानं, पतन्तम् अनतिविकृतचेष्टं, लालामुद्व-मन्तं, शुक्कुनखनयनवदनत्वचं, शुक्लगुरुस्निग्धरूपदर्शिनं, श्लेष्मलानुपशयं, विपरीतोपशयं च श्लेष्मणाऽपस्मेरन्तं विद्यात् ॥ ( ३ ) ॥ कफज अपस्मार के लक्षण - जो देर में मूच्छित होते हों, तथा ज्ञान भी जिसे देर में हो, धरा-शायी होते हुए, अधिक रूप में चेष्टाओं में विकृति न करने वाले, लाला को वमन करते हुए सफेद नख, नेत्र, मुख और त्वचा वाले श्वेत, भारी और चिकने रूपों को देखने वाले, कफ - कारक आहार - विहार हानिकारक एवं कफनाशक आहार - विहार जिसे लाभदायक हो उस मनुष्य को कफज अपस्मार से पीड़ित जानना चाहिये ॥ ३ ॥
समवेत सर्व लिङ्गमपस्मारं सान्निपातिकं विद्यात्, तमसाध्यमाचक्षते ॥ ( ४ ) ॥ सान्निपातिक अपस्मार का लक्षण • एकत्रित हुए सत्र लक्षणों वाले अपस्मार को सान्निपातिक अपस्मार जानें और उसे असाध्य कहते हैं ॥ ४ ॥
इति चत्वारोऽपस्मारा व्याख्याताः ॥ ८ ॥
इस प्रकार चार अपस्मार कहे गये हैं ॥ ८ ॥
· तेषामागन्तुरनुबन्धो भवत्येव कदाचित् तमुत्तरकालमुपदेच्यामः । तस्य विशेष-विज्ञानं यथोक्तलिङ्गैर्लिङ्गाधिक्यमदोषलिङ्गानुरूपं च किञ्चित् ॥ ९ ॥
इनमें आगन्तु अपस्मार का सम्बन्ध कभी - कभी होता है इसके बाद उसको चिकित्सा स्थान में कहेंगे । पहले कहे हुए लक्षणों से कुछ अधिक लक्षगों का होना, और उन अधिक लक्षणों का दोपों के लक्षणों के समान न होना यह उसका विशेष विज्ञान है ॥ ९ ॥
विमर्श - यह आगन्तुक अपस्मार स्वतन्त्र नहीं होता, दोष के अधीन ही होता है । यहां पर कदाचित् और एव ये दोनों शब्द एक साथ प्रयुक्त होने से यह अर्थ निकाला जा सकता है कि उन्माद ( दोपज ) स्वतन्त्र होते हैं । वैसे ही अपस्मार ( दोषज ) स्वतन्त्र है परन्तु उसमें अनिश्चित रूप से कभी - कभी देवादिक ग्रहों का सम्बन्ध हो जाता है । * हितान्यपस्मारिभ्यस्तीचगानि संशोधनान्युपशमनानि च यथास्वं मन्त्रादीनि चागन्तु संयोगे ॥ १० ॥।
चिकित्सा - उप-सूत्र दोषों के अनुसार अपस्मार के रोगियों के लिए तीक्ष्ण संशोधन और शमन हितकारी होते है, और आगन्तुज अनुबन्ध होने पर मन्त्र बलि पूजा - पाठ आदि हितकारी हैं । तस्मिन् हि दक्षाध्वरध्वंसे देहिनां नानादिक्षु विद्रवतामभिद्रवणतरणधावनप्लवनलङ्घ-नाद्यैदेहविक्षोभणैः पुरा गुल्मोत्पत्तिरभूत्, हविष्प्राशात् प्रमेहकुष्टानां भयत्रास शोकैरुन्मा-दानां, विविधभूताशुचिसंस्पर्शादपस्मारागां, ज्वरस्तु खलु महेश्वरललाटप्रभवः, तत्संतापा द्रक्तपित्तम्, अतिव्यवायात् पुनर्नक्षत्रराजस्य राजयक्ष्मेति ॥ १११ निदानस्थान में आये हुए रोगों की उत्पत्ति क्रम - प्राचीन काल में प्रसिद्ध दक्ष प्रजापति के यज्ञ के नाश के समय नाना दिशाओं में भागते हुए प्राणियों के दौड़ - धूप करने, जल में तैरने, १. ‘ अपस्मारितम् ' इति पा ० । २. ' दोषलिङ्गाननुरूपं ' ग. । ३. ' अतिसरणप्लवनलङ्घनाद्यैः ' ह. ।
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६६६ चरकसंहिता कूडने, दौड़ने, लाँघने आदि शरीर को क्षुब्ध करने वाले कारणों से गुल्म रोग की उत्पत्ति हुई । अधिक रूप में घृत का पान करने से प्रमेह एवं कुष्ठ की, भय, त्रास और शोक से उन्माद की तथा अनेक प्रकार के जीवों एवं अपवित्र वस्तुओं के स्पर्श से अपस्मार की उत्पत्ति हुई । ज्वर तो शङ्कर जी के ललाट से उत्पन्न हुआ, उस ज्वर के सन्ताप से रक्तपित्त की उत्पत्ति हुई । नक्षत्र-राज चन्द्रमा के अधिक मैथुनासक्त होने से राजयक्ष्मा की उत्पत्ति हुई ॥ ११ । विमर्श - यद्यपि यज्ञ विध्वंस से प्रथम शंकर जी के क्रोध के फलस्वरूप ज्वर उत्पन्न हुआ और गुरुन आदि यज्ञ ध्वंस के बाद, फिर भी ज्वर ही सबसे प्रधान है अवएव निदान स्थान में सर्वप्रथम ज्वर का वर्णन किया गया है । भवन्ति चात्र-अपस्मारो हि वातेन पित्तेन च कफेन च । चतुर्थः सन्निपातेन प्रत्याख्येयस्तथाविधः ॥१२ ॥
साध्यांस्तु भिषजः प्राज्ञाः साधयन्ति समाहिताः । तीक्ष्णैः संशोधनैश्चैव यथास्वं शमनैरपि ॥
यदा दोषनिमित्तस्य भवत्यागन्तुरन्वयः । तदा साधारणं कर्म प्रवदन्ति भिषग्विदः ॥१४ ॥
अपस्मार का उपसंहार - अपस्मार वात से, पित्त से, कफ से, और चौथा सन्निपात से होता है । सन्निपातज असाध्य होता है । विद्वान् वैद्य सावधान होकर साध्य अपस्मार की दोष के अनुसार तीक्ष्ण संशोधन और संशमन के द्वारा चिकित्सा करते है । जब दोषजन्य अपस्मार से आगन्तुज ( भूतादिकों का ) सम्बन्ध हो जाता है तो उत्तम वैद्य समय के अनुसार साधारण ( देवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय एवं सत्त्वावजय ) चिकित्सा करने को कहते हैं ॥ १२-१४ ॥
* सर्वरोगविशेषज्ञः सर्वौपधविशारदः । भिषक् सर्वामयान् हन्ति न च मोहं निगच्छति ॥
इत्येतदखिलेनोक्तं निदानस्थानमुत्तमम् । रोगज्ञान का फल – सभी रोगों के भेदों, एवं उपभेदों को जानने वाला और सभी प्रकार की औषधियों को जानने में कुशल वैद्य सभी रोगों को नष्ट करता है और मोह को प्राप्त नहीं होता है । इस प्रकार यह उत्तम निदान स्थान सम्पूर्ण रूप में कह दिया गया है ॥ १५ ॥
* निदानार्थकरो रोगो रोगस्याप्युपलभ्यते ॥ १६ ॥
तद्यथा ज्वरसंतापाद्रक्तपित्तमुदीर्यते । रक्तपित्ताज्ज्वरस्ताभ्यां शोषश्राप्युपजायते ॥ १७ ॥
प्लीहाभिवृद्धया जठरं जठराच्छोथ एव च । अर्शोभ्यो जठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युपजायते ॥१८ ॥
प्रतिश्यायाद्भवेत् कासः कासात् संजायते क्षयः । क्षयो रोगस्य हेतुत्वे शोपस्याप्युपलभ्यते ॥ ( २ ) निदान - विषयक सामान्य सिद्धान्त ( Some General Principles Regarding Diagnosis ) निदानार्थकर रोग - एक रोग भी अन्य रोग की उत्पत्ति का कारण होता है । जैसे ज्वर के मन्नाप से रक्तपित्त उत्पन्न होता है । रक्तपित्त से ज्वर की उत्पत्ति होती है । रक्तपित्त एवं ज्वर दोने से यक्ष्मा की उत्पत्ति हो जाती है । प्लीहा के बढ़ जाने से उदररोग और उदररोग से शोथ उत्पन्न होता है । अर्श से उदररोग और गुल्म की उत्पत्ति होती है । प्रतिश्याय से कास नया कास से ( धातुओं का ) क्षय हो जाता है और क्षय यक्ष्मा के कारण रूप से प्राप्त होता है || ते पूर्व केवला रोगाः पश्चात्वर्थकारिणः । उभयार्थकरा दृष्टास्तथैवैकार्थकारिणः ॥ २० ॥
और भी वे ज्वर आदि रोग पहले केवल ( स्वतंत्र ) रोग रहते हैं, बाद में वे दूसरे रोग के १. ' सर्वोषध विशेषवित् ' ग. ।
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अपस्मारनिदानाध्याय: ८ ] निदानस्थानम् ६६७ कारण बन जाते हैं । इस प्रकार ज्वरादि रोग एक अर्थ करनेवाले ( अर्थात् रोग रूप में स्वतन्त्र रहनेवाले ) और दोनों अर्थ करनेवाले ( अर्थात् स्वतंत्र रूप से रोग रूप में रहनेवाले एवं दूसरे रोग को उत्पन्न करनेवाले ) देखे जाते है । २० ॥
* कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति ।
प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेत्वर्थ कुरुतेऽपि च ॥ २१ ॥
और भी - कोई रोग अन्य रोग का कारण होकर स्वयं शान्त हो जाता है । तथा कोई रोग अन्य रोग का कारण बनकर भी स्वयं शान्त नहीं होता ॥ २१ ।
* एवं कृच्छ्रतमा नृणां दृश्यन्ते व्याधिसङ्करा ।
प्रयोगापरिशुद्धत्वात्तथा चान्योन्यसंभवात् ॥ २२ ॥
व्याधि संकर - इस प्रकार मनुष्यों में ( शरीर में ) रोगों के मिश्रण, चिकित्सा के शुद्ध न होने के कारण और एक रोग दूसरे रोग के उत्पादक होने के कारण अधिक कष्टकारी देखे जाते हैं | * प्रयोगः शमयेव्याधिं योऽन्यमन्यमुदीरयेत् । नासौ विशुद्धः, शुद्धस्तु शमयेद्यो न कोपयेत् ॥ आदर्श चिकित्सा जो चिकित्सा का प्रयोग एक रोग को शान्त करे, किन्तु दूसरे दूसरे रोगों को उत्पन्न करे, वह शुद्ध नहीं है । शुद्ध चिकित्सा तो वह है जो एक रोग को शान्त करें और दूसरे रोग ( दोष ) को कपिन न करे ॥ २३ ॥
* एको हेतुरनेकस्य तथैकस्यैक एव हि । व्यारेकस्य चानेको बहूनां वहवोऽपि च ॥ २४ ॥
ज्वरभ्रमप्रलापाद्या दृश्यन्ते रूत्तहेतुजाः । रूक्षेणैकेन चाप्येको ज्वर एवोपजायते ॥ २५ ॥
हेतुभिर्बहुभिश्चैको ज्वरो रूक्षादिभिर्भवेत् । रुतादिभिर्ज्वराचाश्च व्याधयः संभवन्ति हि ॥ हेतु तथा व्याधि में संम्बन्ध - एक अनेक रोगों का कारण होता है और एक रोग का एक ही कारण होता है । एक व्याधि के अनेक कारण और बहुत - सी व्याधियों के बहुत से कारण होते हँ । जैसे एक रूक्ष वस्तु के कारण से ज्वर, भ्रम, प्रलाप, आदि अनेक रोग उत्पन्न होते हैं और एक रूक्ष हेतु से एक ही ज्वर उत्पन्न होता है । रूक्ष आदि अनेक हेतुओं से ज्वर, भ्रम आदि अनेक व्याधियाँ होती हैं ॥ २४-३६ ॥ लिङ्गं चैकमनेकस्य तथैवैकस्य लच्यते । बहून्येकस्य च व्याधेर्बहूनां स्युर्बहूनि च ॥२७ ॥
विषमारम्भमूलानां लिङ्गमेकं ज्वरो मतः । ज्वरस्यैकस्य चाप्येकः संतापो लिङ्गमुच्यते ॥ विषमारम्भमूलैश्च ज्वर एको निरुच्यते 1 । लिङ्गैरेतैर्ज्वरश्वासहिक्काद्याः सन्ति चामयाः ॥२ ९ ॥ और भी — अनेक और एक रोग का लक्षण एक ही देखा जाता है, एक रोग के बहुत लक्षण होते हैं और बहुत रोगों के बहुत लक्षण होते हैं । विपम आरम्भ है कारण जिनके, ऐसे रोगों का ज्वर एक लक्षण माना जाता है । एक ज्वर का एक संताप लक्षण कहा जाता है । विषम आरम्भ कारणों से एक स्वर कहा जाता है और ज्वर, श्वास, हिका आदि रोग इन लक्षणों से युक्त होते है ॥ २७-२९ ॥
& एका शान्तिरनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते । व्याधेरेकस्य चानेका बहूनां वह्वय एव च ॥
शान्तिरामाशयोत्थानां व्याधीनां लङ्घनक्रिया । ज्वरस्यैकस्य चाप्येका शान्तिर्लङ्कनमुच्यते ॥ तथा लध्वशनाद्याश्च ज्वरस्यैकस्य शान्तयः । एताश्व ज्वरश्वासहिक्कादीनां प्रशान्तयः ॥ व्याधि और चिकित्सा का सम्बन्ध - वैसे ही अनेक व्याधियों की एक शान्ति अर्थात् चिकित्सा और एक व्यावि की एक ही चिकित्सा एवं एक व्याधि की अनेक चिकित्साएँ और अनेक व्याधियों की अनेक चिकित्साएं भी देखी जाती है । ( उदाहरण स्वरूप ) आमाशय से उत्पन्न १. ' हेतुत्वं ' ग. । २. ' तथैकस्यैकमुच्यते ' ग.; तथैकस्यैकमेव च ' ह. । १. ' तथैकैकस्य ' ग. 1
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६६८ चरकसंहिता होने वाली अनेक व्याधियों को केवल एक लंघन करना ही चिकित्सा कही जाती है । उअर की चिकित्सः, केवल लंघन करना एक ही कही जाती है । और ज्वर की अनेक चिकित्सा के रूप में हल्का भोजन आदि है और यही चिकित्सा ज्वर, श्वास, हिक्का आदि अनेक रोगों की होती है ॥
सुखसाध्यः सुखोपायः कालेनाल्पेन साध्यते ।
माध्यते कृच्छ्रसाध्यस्तु यवेन महता चिरात् ॥ ३३ ॥
यातिनाशेपनां व्याधिर साध्योयाप्यसंज्ञितः ।
परोऽसाध्यः क्रियाः सर्वाः प्रत्याख्येयोऽतिवर्तते ॥ ३४ ॥
नासाध्यः साध्यतां याति साध्यो याति त्वसाध्यताम् ।
पादापचारावाद्वा यान्ति भावान्तरं गदाः ॥ ३५ ॥
साध्यासाध्यता - सुखसाध्य सुलभ उपाय वाला होकर अल समय में ही साध्य होता है । कृच्छ्रसाध्य तो अधिक परिश्रम करने पर अधिक दिनों में साध्य होता है । याध्य नाम का असाध्य रोग चिकित्सा करने पर भी सम्पूर्ण रूप से अच्छा नहीं होता । और साध्य रोग अचिकित्स्य है । इसमें सभी चिकित्साएं विकल हो जाती है । असाध्य रोग साध्यता को नहीं प्राप्त होता पर साध्यरोग असाध्यता को प्राप्त हो जाता है । साध्यरोग चिकित्सा के चार पाद-( १. चिकित्सक, २. औषधि, ३. सेवक और ४. रोगी ) के अपचार से अथवा देव ( जन्मान्तरीय पापों ) के कारण विभिन्न अवस्था को प्राप्त होते हैं अर्थात् कृच्छ्रसाध्य रोग, याप्य या असाध्य हो जाते हैं ॥ ३३-३५ ॥ विमर्श - साध और असाध्य भेद से रोग दो प्रकार के होते हैं, साध्य के भेद – १. मुग्व-साध्य और २. कृच्छ्रसाध्य ये दो होते हैं । असाध्य न्याधि भी दो प्रकार की होती है - १. याप्य २. प्रत्याख्येय । असाध्य व्याधि किसी भी प्रकार से अच्छी नहीं होती पर माध्य रोग होने पर उसकी उपेक्षा की जाय को क्रमशः अवस्थाओं का परिवर्तन करते हुए वह अमाध्य हो जाती है इसमें हेतु चिकित्सा के चारों पाद की कमी या उनके उचित गुर्गो का न होना या भाग्य का दोष माना जाता है । इस प्रकार के भाग्य की पिता से होने वाले कर्मज रोग चागे पाठ के गुणवान होते हुए भी अच्छे नहीं होते, उनकी शान्ति तभी होती है जब जप - तप, दान होम, बलि और पाठ के द्वारा कर्म का नाश होता है इमोलिये ' यान्ति भावन्तरं गदाः " यह बात बतायी गई है ।
वृद्धिस्थानज्ञयावस्थां रोगाणामुपलक्षयेत् ।
सुसूक्ष्मामपि च प्राज्ञो देहाग्निबलचेतसाम् ॥ ३६ ॥
व्याध्यवस्था विशेषान् हि शाखा शाखा विचक्षणः ।
तस्यां तस्यामवस्थायां चतुःश्रेयः प्रपद्यते ॥ ३७ ॥
दोषावस्था का महत्त्व - बुद्धिमान वैद्य को रोगों की और देह, अग्नि, बल एवं मन की सूक्ष्म से सुन भी वृद्धि, स्थान और क्षयजन्य अवस्था जाननी चाहिये । व्यावियों की अवस्थाओं के भेदों को जानकर वैद्य उन - उन विभिन्न अवस्था में चारों प्रकार के श्रेय को प्राप्त करना है ॥ ३६-३७ ॥ विमर्श - यद्यपि धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति के लिए ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को आयुर्वेद अध्ययन करना चाहिये, यह दान सू. ३० वें अ. में ' स चाध्येतव्यो ब्राह्मणराजन्यत्रैव्यैः ' से बनायो गयी है किन्तु यहाँ मोक्ष की प्राप्ति भी बनाई गई है । इस प्रकार परस्पर विरुद्ध वचन मिलने हैं, ऐसा नहीं समझना चाहिये । क्योंकि वहाँ पर प्रवृत्तिमार्ग का उपदेश है । यदि आयुर्वेद का १. ' दोषाणामुपलक्षयेत् ' इति पा ० । २. ' तत्तच्छ्रेय: ' इति पा ०; ' चतुःश्रेय इति चतुःश्रेयः कारकं चिकित्सतं प्रपद्यते बुध्यते ' चक्रः ।
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अपस्मारनिदानाध्यायः ८ ] निदानस्थानम् ६६ अध्ययन करने वाला विद्वान् धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति के बाद निवृत्ति मार्ग की ओर बढ़ता है तो अपने व्यवसाय को करते हुये मोक्ष को भी प्राप्त कर सकता है । इसका संकेत इन बचन द्वारा किया गया है । इसलिए शारीर प्रथम अध्याय में ' क चैता वेदनाः सर्वा निवृत्ति यान्त्यशेषतः ' इस प्रश्न के उत्तर में ' योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवनम् ' बनाया है । अतः दोनों वाक्यों में विरोध नहीं समझना चाहिए ।
* प्रायस्तिर्यग्गता दोषाः क्लेशयन्त्यातुरांश्विरम् ।
तेन त्वरया कुर्याद्देहानिबलवित् क्रियाम् ॥ ३८ ॥
प्रयोगः क्षपयेद्वा तान् सुखं वा कोष्ठमानयेत् ।
ज्ञात्रा कोष्टप्रपन्नांस्तान् यथासन्नं हरेद्बुधः ॥ ६ ९ ॥
और भी — प्रायः उन्मार्ग में गये हुए दोप अधिक दिनों तक व्याक्ति पुरुषों को कष्ट देते हैं । शरीर, जगति और रोगी के वल को सम्यक प्रकार से जानने वाला वैद्य इन व्याधियों में शीघ्र निकित्मा न करें, इनको चिकित्मा द्वारा क्षीण करें, अथवा सुखपूर्वक कोष्ठ में लावें, विद्वान वैद्य उन दो को कोष्ठ में आए जानकर समीर के से बाहर निकालेँ ॥ ३८-३९ ॥ विमर्श - वित्त और वायु का निर्हरण गुडा द्वारा और फेंक का निर्हण मुख द्वारा होता है । यदि आमाशय में दोष आ जाय से सुख से और पकाशय में आ जाय तो विरंचन एवं वस्ति के द्वारा निकाला जाता है । यदि होश में हो तो वैरेचनिक नस्य द्वारा बाहर निकाले जाते है । * ज्ञानार्थ यानि चोक्तानि व्याविलिङ्गानि संग्रह । व्याधयस्ते तदाखे तु लिङ्गानीष्टानि नामयः ॥ लक्षण और व्याधि के सम्बन्ध - इस व्याविमंत्र अर्थात् निदानस्थान में रोगों का ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करने के लिये जो अरुचि आदि व्यापियों के लक्षण बनाये गये हैं, यदि वे भोग स्वतंत्र रूप से होने है तो उन्हें व्यायेि कहना चहिए । पर जब ज्जर आदि रोगों के अधीन होकर उत्पन्न होते है तब उन्हें लक्षण ही मानना चाहिए, रोग नहीं ॥ ४० ॥
विमर्श - कुपित दोष रोग को उत्पन्न करने के बाद उन रोगों में जिन - जिन लक्षणों को व्यक्त करते हैं उन लक्षणों का ही यहाँ पर विशद विवेचन किया गया है । स्वतंत्र रोग का लक्षण होने पर उसे रोग कहा जाता है और वे ही लक्षण व्याधि माने जाते हैं । पर इस संग्रह में दोषों को विशेष चर्चा नहीं की गयी है पर सभी लक्षण दोषों के ऊपर ही आधारित हैं अतः चिकित्सा में मुख्यतया दोष के लक्षण का ही ध्यान दिया जाता है । विकारः प्रकृतिश्चैव द्वयं सर्वं समासतः । तद्धेतुवशगं हेतोरभावान्नानुवर्तते ॥ ४१ ॥
विकार और प्रकृति का महत्त्व - सभी संक्षेप में विकार, और प्रकृति ( स्वस्थ ), ये दो ही हैं । ये दोनों हेतु के अधीन रहते हैं । इन दोनों विकार और प्रकृति के हेतुओं का जब अभाव होता है तब ये नहीं होते हैं ॥ ४१ ॥
१. ' नेषु तु त्वरया कुर्याद् देहाग्निबलवत्क्रियाम् ' यो । २. ' यथास्वं तं ' ग. ' तमातुरं हरेर तान् कोष्ठप्रपन्नान् दोषान् हारयेत् इति अन्तर्भावितो गिजर्थः ' गङ्गाधरः । ३. ‘ संग्रह इति व्याधिनिदानादिसंग्रह; ये ज्ञानार्थ प्रधानभूतज्वरादिज्ञानार्थं व्याधयः सन्ति ते: विपाकारुच्यादयः स्वतन्त्र्येणोद्यमाना व्यावय एव व्याधित्वेनैव व्यपदेष्टव्या इत्यर्थः; तदात्वे तु लिङ्गानीनि या ज्वरादिपरतन्त्रा जायन्तेऽरुच्यादयः, तदा पारतन्त्र्यालिङ्गान्येव ते नामयाः ' चक्रः । ४. ' तोरभावान्न प्रवर्तते इति पा ० ।
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६७० तत्र श्लोकाः-चरकसंहिता हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा । संप्रातिः पूर्वमुत्पत्तिः सूत्रमात्रं चिकित्सितात् ॥ ज्वरादीनां विकाराणामष्टानां साध्यता न च । पृथगेकैकशश्श्रोता हेतुलिङ्गोपशान्तयः ॥४३ ॥
हेतुपर्याय नामानि व्याधीनां लक्षणस्य च । निदानस्थानमेतावत् संग्रहेणोपदिश्यते ॥४४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने अपस्मारनिदानं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
निदानस्थानं समाप्तम् । DIG-आठवें अध्याय तथा निदान स्थान का उपसंहार - इस अध्याय में अपस्मार ( Epilepsy ) रोग के कारण, पूर्वरूप, रूप ( लक्षण ), अशय, सम्प्राप्ति, ज्वर आदि की प्रथम उत्पत्ति, और चिकित्सा का सूत्रमात्र बतलाया गया है । इस निदान स्थान में ज्वर आदि ८ व्याधियों की साध्यता, असाध्यता, कारण, लक्षण और चिकित्सा अलग - अलग क्रम से बनाये गये हैं । हेतु का पर्याय, व्याधि ( रोग ) का पर्याय, लक्षण ( स्वरूप ) का पर्याय नाम इतने विषयों का निदान स्थान में संक्षेपरूपने उपदेश किया गया है ॥ विमर्श - उबर इत्यादि ८ व्याधियों के साध्य और असाध्य लक्षण निद्रान स्थान में कहे गये हैं, ऐसा मूल में कह दिया गया है, पर ज्वरप्रकरण में ज्जर के असाध्य लक्षणों का उपदेश नहीं किया गया है । अतः मूलवचन भगा है ऐसा नहीं सोचना चाहिये, क्योंकि ' छत्रियो गच्छन्ति ' इन न्याय के अनुसार निदानस्थान के ज्वर को छोड़ कर सान अध्यायों में साध्य असाध्य क्षणों का उपदेश किया गया है । यदि एक अध्याय में नहीं कहा गया हो तो भी उसका न हो जायेगा | अथवा ' अष्टानां हेोपशान्तय: ' ऐसा अन्वय कर आठों रोगों के कारण, लक्षण एवं उपशय का वर्णन इस अध्याय में किया गया है; इस प्रकार अन्वय कर जिन रोगों के साध्य - असाध्य स्थानों का वर्णन है उन्हीं के विषय में साध्यता ' न च ' का अर्थ किया जा सकता है । चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरक संहिता ) के निदानस्थान में अपस्मार निदान नामक आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
इस प्रकार निदानस्थान समाप्त हुआ ॥ २ ॥
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विमानस्थानम् अथ प्रथमोऽध्यायः अथातो रसविमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब निदान स्थान के बाद रसविमान की व्याख्या की जायेगी जैसा कि भगवान आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
विमर्श - निदान स्थान में रोगों का निर्णय वतलाया गया है आगे रोगों की चिकित्सा का उपदेश करना है । चिकित्सा में जब तक दोष, औषधि आदि का विशेष ज्ञान नहीं होता तत्र तक सफलता नहीं मिलती । अतः दोष, औषधि आदि की विशेषता की जानकारी करानेवाला विमानस्थान का उपदेश किया गया है । इनमें भी दोष, औषधि की अपेक्षा रस ( द्रव्य ) की प्रधानता है । इसलिये विमानस्थान में भी रसविमान का सर्वप्रथम उपदेश किया गया है । विमानस्थान की निरुक्ति अग्रांकित है - ' विशेषेण मीयते ज्ञायते दोषभेषजाद्यनेनेति विमानम् । एवं भूतं विमानमभिधेयतया यत्र तिष्ठति तत् विमानस्थानम् ' । 8 इह खलु व्याधीनां निमित्तपूर्वरूपरूपोपशय संख्याप्राधान्यविधिविकल्पबलकाल-विशेषाननुप्रविश्यानन्तरं दोषभेषजदेशकालबलशरीरसाराहार चात्म्य सत्त्वप्रकृतिवयसां मानवहितमनसा यथावज्ज्ञेयं भवति भिषजा, दोषादिमानज्ञानायत्तत्वात् क्रियायाः । न ह्यमानज्ञो दोपादीनां भिपय् व्याविनिग्रहसमर्थो भवति । तस्माद्दोषादिमानज्ञानार्थं विमानस्थानमुपदेच्यामोऽग्निवेश! ॥ ३ ॥
( १ ) रस और दोष के पारस्परिक सम्बन्ध विमानस्थान के उपदेश का प्रयोजन --- इस चिकित्सा शास्त्र में रोगों के निमित्त ( कारण ) पूर्वरूप, रूप ( लक्षण ) उपशय, संख्या, प्राधान्य, विधि, विकल्प, बल, काल, भेद से सम्प्राप्ति के भेदों को समझ कर उसके बाद दोष, औषधि, देश काल, बल, शरीर, सार, आहार, सात्म्य, सत्व प्रकृति अवस्था ( वय ) के मान को सावधानतापूर्वक वैद्य के लिए ठीक - ठीक जानना आवश्यक हो जाता है । क्योंकि दोष आदि के मान के ज्ञान के अधीन चिकित्सा होती है । दोष इत्यादि के मान को न जाननेवाला वैद्य रोग को दूर करने में समर्थ नहीं हो पाता । अतः हे अग्निवेश दोष, आदि के मान के ज्ञान के लिये विमान स्थान का उपदेश करेंगे ॥ ३ ॥
तत्रादौ सद्रव्यदोषविकारप्रभावान् वक्ष्यामः । उसमें सर्वप्रथम रस, द्रव्य, दोष और रोगों के प्रभाव को कहेंगे । * रसास्तावत् षट् - मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायाः । ते सम्यगुपयुज्यमानाः शरीरं यापयन्ति, मिथ्योपयुज्यमानास्तु खलु दोपप्रकोपायोपकल्पन्ते ॥ ४ ॥
१. ' अभिनिविश्य ' ग. । ३. ' रसादिमानज्ञानायत्तत्वात् ' इति पा ० । ५. ' रसादिमानज्ञानार्थम् ' इति पा ० । २. ' ० रसद्रव्यदोषविकारभेषजदेश ० ' इति पा ० । ४. ' रसादीनाम् ' इति पा ० ।