चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 761–770

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 761–770

पृष्ठ 761

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६७२ चरकसंहिता रसों के भेद — रस तो ६ होते हैं । १. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. कटु, ५. तिक्त और ६. कषाय । यदि इन रसों का प्रयोग उचित मात्रा में किया जाता है तो शरीर भली भाँति चलना रहता है । यदि इन रसों का प्रयोग विपरीत ढंग से किया जाना है तो ये दोषों को कुपित करने गले सिद्ध होते है ॥ ४ ॥

दोषाः पुनस्त्रयो वातपित्तश्लेष्माणः । ते प्रकृतिभूताः शरीरोपकारका भवन्ति, विकृति-मापन्नास्तु खलु नानाविधैर्विकारैः शरीरमुपतापयन्ति ॥ ५ ॥

दोपों के द — - दोष फिर तीन होते हैं - वात, पित्त और कफ ये अपनी स्वाभाविक अवस्था में रहने हुए शरीर के लिए लाभकारी होते हैं । विकृति को प्राप्त होते हुए अनेक प्रकार के विकारों से शरीर में ताप ( दुःख ) को उत्पन्न करने वाले होते हैं ॥ ५ ॥

विमर्श - इसी बात को पहले भी कहा जा चुका है । ' रोगस्तु दोषवैपम्यं दोषसाम्यनरोग अर्थात् दोष के समान मात्रा में होने पर मनुष्य स्वस्थ्य रहता है । जब इन दोषों में कुछ भी परिवर्तन आ जाता है तो रोग हो जाता है । अनेक प्रकार के मिथ्या आहार विहारों के सेवन करने पर भी यदि मनुष्य की क्षमता ( Immunity ) के आधार कारण दोष का कोप न हो अदा अल्प मात्रा में दोप कुपित हो तब रोग की सम्भावना नहीं होती । इसी बात को वाग्भट ने स्पष्ट कह दिया है— सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः । तत् प्रकोपस्य तु प्रोकं विवि-धाहिएसेवनन्! तत्र दोषमेकैकं यो रसा जनयन्ति, वयन्त्रयोपशमयन्ति । तद्यथा - कटु-किकवाया वातं जनयन्ति, मधुराम्ललवणास्त्वेनं शमयन्तिः कदवम्ललवणाः पित्तं जन-यन्ति, मधुर तिक्तकषायास्त्वेनच्छमयन्तिः मधुराम्ललवणाः मागं जनयन्ति, कटुतिक्त-कपायास्वेनं शमयन्ति ॥ ६ ॥

रसोंके गुण - • इनमें तीन तीन रस एक - एक दोष को उत्पन्न ( प्रकुपित ) करते है और तीन-तीन ही रस एक - एक दोप को शान्त करने है । जैसे बात को कटु, तिक्त और कषाय उत्पन्न ( प्रकुपित ) करते है और मधुर, अम्ल और लवण रस उसे शान्त करते हैं । पित्तको कटु अम्ल और लवण उत्पन्न ( प्रकुपित ) करते हैं, और कपाय स्वादु और तिक्त रस उसे शान्त करते हैं । कफ को मधुर, अम्ल और लवग रस उत्पन्न ( प्रकुपित ) करते हैं और कटुतिक्त और कषाय उसे शान्त करते हैं ॥ ६ ॥

* रसदोषसन्निपाते तु ये रसा यैर्दोषैः समानगुणाः समानगुणभूयिष्ठा वा भवन्ति ते तानभिवर्धयन्ति, विपरीतगुणा विपरीतगुणभूयिष्ठा वा शमयन्त्यभ्यस्यमाना इति । एत-व्यवस्थाहेतोः पट्त्वमुपदिश्यते रसानां परस्परेणासंसृष्टानां त्रित्वं च दोषाणाम् ॥ ७ ॥

दोषों की वृद्धि एवं शमन, में रसों की कारणता - जब रसों का सेवन किया जाता है तो वे रस शरीर में जाकर दोषों से अपना सम्पर्क स्थापित करते हैं । ऐसी अवस्था में जो रस जिस दोष के समान गुण वाला होता है अर्थात् उसके अनुकूल होता है अथवा उसमें गुणों की समानता अधिक रूप में पायी जाती है तो वह रस उन दोषों को बढ़ाने वाला होता है, और जो रम जिन दोषों के विपरीत गुण वाला अथवा अधिक रूप में उनमें गुणों की विपरीतता पायी जाती है तो वे उन दोषों को शान्त करने वाले होते है । परन्तु यदि इन रसों का सतत् अभ्यास किया जाय तो । इन्हीं व्यवस्थाओं के कारण परस्पर नहीं मिले हुए पृथक - पृथक रसों की संख्या ६ और इमी प्रकार परस्पर नहीं मिले हुए अलग - अलग दोषोंकी संख्या तीन मानी गयी है ॥ ७ ॥

१. ' शरीरयोगक्षेमकराः ' यो ।

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रसविमानाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ६७३ * संसर्गविकल्पविस्तरो ह्यपामपरिसंख्येयो भवति, विकल्पभेदापरिसंख्येयत्वात् ॥ ८ ॥

इन रम और दोषों का विकल्प विस्तार अर्थात् परस्पर मिलित होने पर तरतम के योग से इनकी संख्या अगणित हो जाती है क्योंकि विकल्प के भेद अपरिसंख्येय होते हैं ॥ ८ ॥

विमर्श -- यह बात सूत्र स्थान के प्रथम अध्याय में ' सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धि -कारणम् ' से स्पष्ट कर दी गई है कि जो अपने गुण के समान होता है वह वृद्धि का कारण होता है और जो अपने से विपरीत होता है वह हास करने वाला होता है । इसका विशद विवेचन वहीं देखना चाहिए । यहाँ निरन्तर अभ्यास से समान वस्तु वृद्धि का कारण और विपरीत वस्तु हास का कारण होती है । जैसे शरीर में बात दोष वृद्धितर हो तो उसको सम मात्रा में लाने के लिए यदि मधुर, अम्ल, लवण आदि की एक दिन पूर्ण मात्रा भी दे दी जाय तो वे उसे शान्त नहीं कर सकते, पर निरन्तर यदि सेवन किया जाता है तो शनैः शनः इन रसों का प्रभाव शरीर में अधिक हो जाता हैं । तब वायु की फलतः शान्त हो जाती है । रसों की संख्या के विषय में आत्रेयभद्रकाप्यीय अध्याय ( सू. अ. २६ ) में १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८ संख्या तथा अनेक रस बताये गये हैं । पर सिद्धान्ततः अलग - अलग ६ रस ही माने गये है । परिगणित करने योग्य रसों का संसर्ग ६३ और दोषों के ६३ ( वाग्भट ) बतलाये गये हैं । पर यदि तारतम्य में न्यूनता या अधिकता करके इनका संयोग किया जाय तो संख्या अगणित हो जाती है यथा- ' रसास्तरननाभ्यां तां संख्यानतिपतन्ति हि । ' तथा ' आश्रयगुणकर्मसंस्वादविशे-षाणामपरिमेयत्वाद् अपरिसंख्येया रसा इति । ( सू. अ. २६ ) ' गुणागुणाश्रया नोक्ताः ' ( मु. अ. २६ ) के अनुसार रस गुग है उसमें अन्य गुण रह ही नहीं सकता तो समान गुण वाला रास यह कैसे कहा गया है? वस्तुतः यह वाक्य रस के आश्रयभूत द्रव्य में रहने वाले का रस में उपचार के उद्देश्य से किया गया है । ॐ तत्र खल्वनेकरसेषु द्रव्ये वनेकदोषात्मकेषु च विकारेषु रसदोषप्रभावमेकैकश्येना-भिसमीक्ष्य ततो द्रव्यविकारयोः प्रभावतत्त्वं व्यवस्येत् ॥ ९ ॥

प्रकृतिसमसमवेतसिद्धान्त - अनेक रस वाले द्रव्यों में, और अनेक दोषों से उत्पन्न होने वाले रोगों में, रस के और दोष के प्रभाव को अलग - अलग विचार कर द्रव्य और रोग के प्रभाव के तत्त्व का निश्चय करें ॥ ९ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि यदि मधुर, अम्ल और लवण रसों के प्रभाव ( गुणों ) का ज्ञान अलग २ है, तो उससे बननेवाले समुदाय का ज्ञान स्वतः हो जायेगा । जब ज्वर को दूर करने वाली अलग - अलग चार औषधियों का परिज्ञान है तो उन चारों को मिलाकर ज्वर में प्रयुक्त करें तो वह समुदाय भी ज्वर नाशक होगा । ये बातें सभी विषयों में लागू होती है । इस सिद्धान्त को ' प्रकृतिबेन ' कहते हैं । * न त्वेवं खलु सर्वत्र । न हि विकृतिविषमसमवेतानां नानात्मकानां परस्परेण चोपह-तानामन्यैश्च विकल्पनैर्विकल्पितानामवयवप्रभावानुमानेनैव समुदायप्रभावत्तत्त्वमध्यवसातुं शक्यम् ॥ १० ॥

विकृतिविषमसमवायसिद्धान्त --- किन्तु सभी जगह ऐसा नहीं होता । क्योंकि विकृति रूप में मिले हुए एवं विपम रूप से मिले हुए अनेक प्रकार के आपस में उपघात को प्राप्त हुए और दूसरे १. ' चोपन प्रकृतिकानाम् ' इति पा ० । ४३ च ० सं ०

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६७४ चरकसंहिता भेद करनेवाले उपायों से भिन्न हुए, रतों के अवयव के प्रभाव के अनुमान से ही समुदाय के प्रभाव के तत्व का निश्चय शक्य नहीं है ॥ १० ॥

विमर्श - विभिन्न द्रव्यों का संयोग सभी जगह दो रूपों में होता है जो अग्राङ्कित है । ( १ ) प्रकृतिसमसमवेत - इसमें अलग - अलग द्रव्यों में जो - जो रस वर्तमान रहते है वही गुण अपने प्रकृति रूप में रहते हुये समुदाय में भी रहते है । यथा - ' रसाना दोपागा महत्वो यो मिलितानां प्राकृतगुणानुपमर्देन नेलको भवति । स प्रकृतिसमवेतशब्देनोच्यते । ( चक्रपाणि ) उदाहरणार्थ-दूध, जल, चीनी का संयोग, यदि इन तीनों के संयोग से बनाये गये शर्बत का प्रयोग किया जाय तो अपने - अपने स्वाभाविक मधुर रसों के द्वारा शरीर में मधुर रन के गुणों को उत्पन्न करते हैं और एक मधुर रस दूसरे मधुर रस को नष्ट करने में समर्थ नहीं होता । ( २ ) विकृतिविषमसमवेत - विकृति में विषम रूप से सम्मिलित होने को कहा जाता है । यथा - ' विकृत्या हेतुभृतया विषमः प्रकृत्यननुगुणः समवेतो विकृतिविषमसमवेतः । ' ( चक्रपाणि ) | इसनें जब दो या दो से अधिक द्रव्यों का एक में संयोग होता है तब वे विकृत होने में कारणभूत होकर अपने - अपने स्वाभाविक गुणों का परित्याग कर देते हैं । जैसे मछली - दूध का संयोग या समान मात्रा में मधु और घृत का संयोग ये द्रव्य जो अलग - अलग गुग रखते हैं वे गुण संयोग होने पर उनमें नहीं पाये जाते हैं । कुछ लोग ' विकृतिसमवेतानां विषमसनवेतानां चेति विकृति-विषमसमवेनानामिति । इस प्रकार अर्थ कर विकृति और विषम ये दो अंश मानकर निम्नलिखित प्रकार से व्याख्या करते हैं । १. रन की विकृति - जैसे तण्डुलीयक ( चौराई ) रस में मधुर होता है, उसे रस के अनुसार स्नेहन और वृष्य ( शुक्रवर्धन ) का कार्य करना चाहिये । पर वह विकृति - समवेत होने से स्नेहन और वृष्य कार्य नहीं करता । २. विषम समवेत - जैसे तिल में कपाय, कटु, नित्त, मधुर आदि ये रस जब सम मात्रा में रहने तो तिल भा पित्त, कफ या त्रिदोषशामक होता है । पर यदि ये रस तिल में विषम मात्रा में रहें तो वह पित्त - कफ या सन्निपात को उत्पन्न करने वाला होता है । रस वे ही है पर उनका संयोग विभिन्न रूप से होता है तो वे ही रन कहीं दोपों के शामक और कहीं प्रकुपित करने वाले वन जाते हैं । इस प्रकार की विषमता दिखाई देती है | अतः इसे विषमसमवेत कहा जाता है । पर इस विकृति और विषम समवेत को पृथक् - पृथक् दो माननेवाली व्याख्या में एक दोष उपस्थित हो जाता है कि जहाँ रम या दोष की अधिकता और न्यूनता जन्य विषमता होती हैं, वहाँ पर उत्कृष्टापकृष्ट जन्य विषम समवेत की कल्पना अलग करनी पड़ेगी । क्योंकि ऐसे स्थल में उत्कृष्ट रस - दोष का उत्कृष्ट और अपकृष्ट रस दोष का अपकृष्ट गुण होगा । पर यह शङ्का निराधार है क्योंकि इस प्रकार के विकृति और विषम समवेत में गुगों की न्यूनता वा अधिकता अवयव के प्रभाव द्वारा अनुमान कर समुदाय का अनुमान कर लिया जाता है । जैसे मधुर, अम्ल, एवं लवण रमों के संयोग में यदि मधुर एवं अम्ल का न्यूनमात्रा और लवग की अधिक मात्रा हो तो इन तीनों के समुदाय में यह अनुमान करना सम्भव है कि इसमें मधुर एवं अम्ल की न्यूनता है । पर मूल में विकृतिविषम - मवेत समुदाय में अवयव के प्रभावों को देखकर उनका अनुमान शक्य नहीं है, यह स्पष्ट बनाया है । अत: दूसरी व्याख्या रुचिकर नहीं है । चहाँ विकृति - विषम - समवेन होने में ३ कारण कहे गये हैं । ( १ ) ' नानात्मकानाम् ' – इसका नात्पर्य यह है कि रस या दोषादि के नानारूप हेतु से उत्पन्न होते हैं और उनमें भिन्न - भिन्न रूप और कारण के भेद होने से रस और डोप का विकृतिविषमसमवेत होता है । अथवा नाना प्रमाण

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रसविमानाष्यायः १ ॥ विमानस्थानम् ६७५ में प्रयुक्त होने से उनका विकृत रूप होता है । ( २ ) ' परसरेण चोहानाम् ' - परस्पर एक के गुण को एक नष्ट नेवा कारण से, यह कारण कहा पर अदृष्ट होते है या जो रस प्रवल होता है वह दुर्बल रस के प्रभाव को नव देता है । इसी प्रकार प्रवल दोष दुर्बल दोष के प्रभाव को नष्ट कर देना है । ( ३ ) अन्य विकरितानान् -- भिन्न - भिन्न कल्पना के भेद से गुणों में विमाका जानी है, जैसे एक ही रसककेभ्य स्वरन कल्ट, फाट कषाय आदि कल्पना से होने पर हो जाते हैं । इसी भाँति दोष निमित्र नित्रान के संयोग से गुरकर होनेो दोषः समुत्थानविशेषतः स्थानान्तरगत विकारान् कुरु । ' ( मू ० अ ० १८ ) । तथायुक्ते हि समुदये समुदायप्रभावतस्त्वमेवमेवोपलभ्य ततो द्रव्यविकारप्रभावतत्त्वं उपसंहार - इस प्रकार निश्रित समुदाय में, समुदाय के प्रभाव के तत्त्व को जानकर बाद में द्रव्य एवं रोगों के प्रभाव के तत्त्व को निश्चित करें ॥ ११ ॥

विमर्श - जैसे मधु और घी दोनों अपने रसों में मधुर होते हैं किन्तु इन दोनों का समान मात्रा में मिलाया हुआ समुदाय मारक होता है । इसी प्रकार सूर्यावर्त रोग विदोष से होता है जो सूर्य उदय काल से प्रारम्भ होकर धीरे धीरे बढ़ता हुआ मध्याह्न के पश्चात् शनैः - शनैः समाप्त हो जाता है । यह संयोग का ही प्रभाव है अर्थात् मधु और घृत में निश्चित रूप से जो गुण वर्तमान रहते हैं यदि वे ही गुण संयुक्त होने पर भी क्रम से वर्तमान रहें तो उसे मारक नहीं होना चाहिये । इसी नन्ह सूर्यावर्त रोग में वातपित्त - कफ से विदोष दिन के ३ भागों ( प्रातः, मध्याह्न, सायम् ) में शिरःशूल बढ़ने के कारण होते हैं । यदि इन दोषों में रहनेवाले प्राकृतिक गुण ही सम्मिलित होने पर उपस्थित रहे तो सूर्य की वृद्धि और हास के अनुसार दोषों का प्रकोप होकर रोग की उत्पत्ति और शान्ति नहीं होनी चाहिये । अतः इन दोनों के रस और दोष के समुदाय से उत्पन्न द्रव्य ( मधु घृत ) और रोग सूर्यावर्त में सम्मिलित द्रव्य एवं रोग के प्रभाव को देखकर ही इनके गुणों को निश्चय किया जाता है । प्रकृतिसम - समवेत के अनेक दोष के समुदाय स्वरूप सन्निपातज रोगों में वे ही रोग उदाहरण स्वरूप हैं जिनका दर्शन सन्निपातज या द्वन्द्वज रूप में स्वतन्त्र न कर अलग - अलग बनाये गये दोषों के मंयुक्त लक्षणों के अनुसार है यथा- ' पृथगुक्तलक्षणसंसर्गाद् शान्त्रिक मन्यतमं सान्निपानिकं ज्वरं विद्यात् । ' ( निदान अ ० १ ) । विकृतिविषमसमवेत दोषों के समुदाय के उदाहरण है जिनका विधान या इन्द्र के रूप में स्वतन्त्र वर्णन है जैसे ' क्षणे दाहः क्षणे शीतम ' इत्यादि ( चि, अ. ३ ) । क्योंकि सन्निपातज ज्वर में ' कोठानां श्यावरक्तानाम् ' इत्यादि किसी भी दोष का अ नहीं है पर दोषों के निलने पर जो लक्षण प्रगट होते है उनमें लक्षमने 1 इसी प्रकार वात - कफज वर में ' नित्यं पर्व मेत्री निद्रा गौरव-प्रतिकामः स्वानम् ॥ इसमें बिना कारण स्वेद आता है । स्वेद का जाना वान एवं बरु के अलग - अलग गुण नहीं है पर इनके संयुक्त होने पर ही स्वेद का निर्गत होता है । इस प्रकार समुदाय के द्वारा ही इनके गुणों का निभव किया जाता है । रम में भी जैसे आत्रात ( आमड़ा ) में मधुर रस प्रकृतिसम - समवेत रूप में रहता है अतः ' और वार्ताक होता अपने युग के अनुसार बानपिनको नट करना है और दानक ( भण्टा ) कटुतिक्त है 1 अपने गुण के अनुसार इसे पान की वृद्धि करनी चाहिये पर विनियमसमवेन होने के कारण यह बात को उत्पन्न कर उसे दूर करना है यथा-- ' बात ( सु. अ. हूँ १ ) ।

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६७६ चरकसंहिता * तस्माद्रसप्रभावतश्च द्रव्यप्रभावतश्च दोषप्रभावतश्च विकारप्रभावतश्च तत्त्वमुपदेच्यामः ॥ चतुर्विध प्रभावों का उपदेश - इसलिए रसप्रभाव से, द्रव्यप्रभाव से प्रभाव से और विकारप्रभाव से तत्त्व का उपदेश करेंगे । विमर्श - औषधियाँ कहीं पर, वीर्य, गुण, विपाक और प्रभाव के द्वारा कार्यकर होती है, यथा -- ' किंचिद्रसेन कुरुते कर्म वीर्येण चापरम् । द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेग च किञ्चन ॥ ' ( मु. अ. २६ ) बताया है । यहाँ गुणवीर्यविपाक प्रभाव के द्वारा द्रव्यों का उपदेश नहीं किया गया है अतः परस्पर विरुद्ध वाक्यों का प्रयुक्त होना असंगत है ऐसी बात नहीं समझनी चाहिये । क्योंकि वीर्यप्रभाव और विपाकप्रभाव का अन्तर्भाव क्रमशः द्रत्यप्रभाव और रसप्रभाव में कर लिया जाता है । रत के अनुगुग जो वीर्यविपाकप्रभाव होता है उसका रस में और जो रसक्रम में बताये हुये वीर्यविपाक के विपरीत होता है उसका द्रव्यप्रभाव में अन्तर्भाव कर लिया जाता है । तात्पर्य यह है कि द्रव्य जिन - जिन कारणों के द्वारा अपना कार्य करता है उन उन सभी कारणों का समावेश द्रव्यप्रभाव और रसप्रभाव के अन्दर ही हो जाता है । * तत्रैष रसप्रभाव उपदिष्टो भवति । द्रव्यप्रभावं पुनरुपदेक्ष्यामः । तैलसर्पिर्मधूनि वातपित्तश्लेष्मप्रशमनार्थानि द्रव्याणि भवन्ति ॥ १३ ॥

द्रव्यप्रभाव - यहाँ यह रसप्रभाव का उपदेश कर दिया गया है । पुनः द्रव्यप्रभाव का उपदेश करेंगे । तैल, घृत और मध् ये द्रव्य वात - पित्त और कफ को शान्त करने के लिये होते हैं ॥ तत्र तैलं स्नेहौण्यगौरवोपपन्नत्वाद्वातं जयति सत्तमभ्यस्यमानं; वातो हि रौचय-त्यलाघवोपपन्नो विरुद्धगुणो भवति, विरुद्वगुणसन्निपाते हि भूयसाऽल्पमवजीयते, तस्मात्तैलं वातं जयति सततमभ्यस्यमानम्! तैलप्रभाव इन द्रव्यों में तेल में स्निग्धता, उष्णता और गुरुता होने के कारण निरन्तर अभ्यास करने से वह वायु को जीतना है । क्योंकि वायु रूक्षता, शीतता और लघुता गुण से युक्त होती हुई तैल के विरुद्ध गुण वाली होती है । विरुद्ध गुण के संयोग होने पर जो अधिक होता है वह अल्प पर विजय करता है । इसलिये निरन्तर अभ्यास करने से तेल वायु को नष्ट करती है ।् सर्पिः खल्वेवमेव पित्तं जयति, माधुर्याच्छैत्यान्मन्दत्वाच्च; पित्तं ह्यमधुरमुष्णं तीच्णं च । घृतप्रभाव - इसी प्रकार घृत, मधुर, शीतल और मन्द होने से पित्त को जीतने वाला होता है, क्योंकि पित्त, अमधुर ( कटु ), उष्ण और तीक्ष्ण होता है । 1 * मधु च श्लेष्माणं जयति, रौच्यात्तैक्ष्ण्यात् कषायत्वाच्च श्लेष्मा हि स्निग्धो मन्दो मधुरश्च । मधुप्रभाव - मधु, रूक्ष, तीक्षण और कषाय गुण होने से कफ पर विजय करता है क्योंकि. कफ, स्निग्ध, मन्द और मधुर होता है । अर्थात् कफ से विपरीत गुण वाला मधु होता है । अतः निरन्तर अभ्यास से विपरीत गुण वाले कफ को मधु जीत लेता है । * यच्चान्यदपि किञ्चिद्द्रव्यमेवं वातपित्तकफेभ्यो गुणतो विपरीतं स्यात्तच्चैताञ्जयत्यभ्य-स्यमानम् ॥ १४ ॥

उपसंहार — इसी भाँति अन्य जो कोई भी द्रव्य वात, पित्त, कफ इन दोषों के गुणों से विपरीत गुण वाले होते है उनका निरन्तर अभ्यास करने पर वे द्रव्य इन वात, पित्त और कफ को जीनने वाले होते है ॥ १४ ॥

विमर्श— द्रव्यों में रस, गुण, वीर्य, विपाक प्रभाव रहते हैं, जिनके द्वारा द्रव्य कार्यकर होते

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रसविमानाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ६७७ हैं । यहाँ सभी जगह केवल प्रभाव का ही उल्लेख किया गया है, इसका तात्पर्य यह है कि द्रव्य में जिन - जिन कारणों से कार्य करने की क्षमता होती है । उन्हें प्रभाव माना गया है । एक दूसरा प्रभाव अचिन्त्य शक्ति का प्रतिपादक होता है, यथा - ' सहदेवीजटा बद्धा हन्ति ज्वरतृतीयकम् ' पर यहाँ उस शक्ति का ग्रह है जिसका हम विचार कर सकते हैं । जैसे घृत अपने मधुर गुण से अमधुरदित्त को, अपने शीत गुण से नष्ट करने वाला होता है । से कार्य होता है, वहाँ उस उष्ण पित्त को और अपने मन्द गुग से नीक्ष्ण पित्त को इन्हें द्रव्यभाव भी कहा जाता है और जहाँ पर रस के द्वारा द्रव्य प्रभाव से कार्य हुआ माना जाता है । कुछ विद्वानों का मत है कि बात को दूर करता है, न कि वाद तैल के प्रभाव को दूर करता है, यहाँ जो तेल में वातनाशक शक्ति है वह अचिन्त्य प्रभाव के हो कारण है । इसी प्रकार मधु और घृत जो कफ - पित्त को नष्ट करते है, न कि वित्त, कफ, वृत और नधु के प्रभाव को नष्ट करते है । इसे भी अचिन्त्य प्रभाव ही कहा जाता है । क्योंकि जब विरुद्ध गुण - संयोग दोषों को दूर करने वाला होता है तो दोष भी विपरीत गुण वाले रसों को नष्ट करने वाला होना चाहिये, पर इसका उल्लेख नहीं मिलना, केवल यही द्रव्य अपने विरुद्ध गुण वाले दोषों को नष्ट करते हैं । * अथ खलु त्रीणि द्रव्याणि नात्युपयुञ्जीताधिकमन्येभ्यो द्रव्येभ्यः; तद्यथा - पिप्पली, क्षारः, लवणमिति ॥ १५ ॥

अत्यधिक सेवन में वर्जित द्रव्य - अन्य द्रव्यों की अपेक्षा तीन द्रव्यों का अधिक मात्रा में

प्रयोग न करना चाहिये । जैसे— पिप्पली, क्षार और लवण रस ॥ १५ ॥

विमर्श - पहले स्वास्थ्य के लिये जो द्रव्य उपयोगी हैं, उनका अभ्यास करने का उपदेश किया गया है । अब जिन द्रव्यों का अधिक अभ्यास शरीर एवं स्वास्थ्य के लिये हानिकर होता है, उनका उपदेश किया जा रहा है । यहाँ ये तीन द्रव्य उपलक्षग मात्र हैं । इसी प्रकार चित्रक, भिलावा आदि द्रव्यों का भी अधिक मात्रा में प्रयोग नहीं करना चाहिये । * पिप्पल्यो हि कटुकाः सत्यो मधुरविपाका गुर्यो नात्यर्थं स्निग्धोष्णाः प्रक्लेदिन्यो भेष-जाभिमताश्च ताः सद्यः; शुभाशुभकारिण्यो भवन्ति; आपातभद्राः, प्रयोर्गसमसाद्गुण्यात्; दोषसञ्चयानुबन्धाः; - सततमुपयुज्यमाना हि गुरुप्रक्लेदित्वाच्छ्लेप्माणमुत्क्लेशयन्ति, अध्ण्यात् पित्तं न च वातप्रशमनायोपकल्पन्तेऽल्पस्नेहोष्णभावात्; योगवाहिन्यस्तु खलु भवन्ति; तस्मात् पिप्पलीर्नात्युपयुञ्जीत ॥ १६ ॥

( १ ) पिप्पली - पिप्पली रस में कटु होती हुई विपाक में मधुर एवं गुरु होती है । यह अधिक fars और उष्ण नहीं होती । क्लेद उत्पन्न करती है । वैद्य लोग चिकित्सा के लिए इसका प्रयोग करते हैं । प्रयोग करने पर यह शीघ्र ही शुभ ( शुभकर ), अशुभ ( दुःखकर ) कार्यों को करने वाली होतो है । अर्थात् मात्रा में प्रयोग करने पर सुखकारक और अधिक अभ्यास करने पर दुःखकारी होती है । वह प्रयोग में समसाद्गुण्य होने से अर्थात् सम मात्रा में या अल्प नात्रा में थोड़े काल तक इसका प्रयोग किया जाता है तो आपातभद्र अर्थात् कुछ देर के लिये शुभ-कारक होती है । यदि इसका सेवन अधिक मात्रा में निरन्तर किया जाय तो दोषों का संचय करती है । यह निरन्तर सेवन से पचने में भारी और क्लेदकारी होती है, अतः कफ का और उष्ण होने से पित्त का उत्क्लेश करती है । अल्प मात्रा में स्निग्ध और उष्ण होने से वायु को शान्त समेऽल्पकालेऽननात्रे च १. प्रयोगसमसाद्गुण्यादिति समस्य प्रयोगस्य सद्गुणत्वात्, पिप्पल्याः प्रयोगे सद्गुणा भवन्तीत्यर्थः ' चक्रः ।

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६७८ चरकसंहिता करने में समर्थ नहीं होती । पिप्पली योगवाही होती है अतः केवल अकेले पिप्पली का अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥

विमर्श - तात्पर्य यह है कि पिप्पली का प्रयोग अल मात्रा में अल्पकाल तक किया जाय तो समसाद्गुण्य होने से लाभकारी होती है । यदि इसका सेवन लगातार किया जाय तो यह हानिकारक होती है । यहाँ पिप्पली का अत्यधिक प्रयोग करना वर्जित किया गया है, पर पिप्पली-रसायन, वर्धमान - पिप्पली आदि योगों में पिप्पली का अधिक प्रयोग किया गया है । पर वे योग हानिकारक न होते हुए लाभदायी सिद्ध होते है, अतः प्रकृत प्रकरण से विरोध होता है । अत: यह कल्पना कर लेना उचित होगा कि, जिन जिन रोगों में पिप्पली का अधिक प्रयोग बताया है, उन रोग विशेषों को छोड़कर अधिक पिप्पली का प्रयोग हानिकारक होता है । अपने ज्ञानचक्षु से रोग और पिप्पली इन दोनों के प्रभाव को देखकर जहाँ - जहाँ इन दोनों में अनुकूलता प्राप्त हो वहाँ - वहाँ पिप्पली का अधिक प्रयोग करने का निर्देश ऋषियों ने किया है, शेष स्थलों में अधिक मात्रा में लगातार इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये । अथवा अन्न - संस्कार प्रकरण में पिप्पली का अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए । स्वतन्त्र रूप में पिप्पली का अधिक प्रयोग किया जा सकता है । उपर्युक्त विमर्श चक्रपाणि सम्मत है 1 * क्षारः पुनरौष्ण्यतैच्ण्यलाघवोपपन्नः क्लेदयत्यादौ पचाद्विशोपयति, स पचनदहनभेद-नार्थमुपयुज्यते; सोऽतिप्रयुज्यमानः केशाति हृदयपुंस्त्वोपघातकरः संपद्यते । ये ह्येनं ग्राम-नगरनिर्गमजनपदाः सततमुपयुञ्जते त आन्ध्यपाण्ड्यखालित्यपालित्यभाजो हृदयापकर्ति-नश्च भवन्ति, तद्यथा - प्राच्याश्चीनाश्च; तस्मात् क्षारं नात्युपयुञ्जीत || १७ || ( २ ) क्षार - फिर क्षार, उष्ण, ताक्ष्ण और लघु गुण विशिष्ट होने के कारण सेवन करने पर सर्वप्रथम कुंद उत्पन्न करता है और बाद में शोषण करता है । यह क्षार पाचन, दाह और भेदन कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है । यदि क्षार का अधिक प्रयोग किया जाय तो वह केश, दृष्टि, हृदय और पुंस्त्व शक्ति को नष्ट करता है । जो ग्रामवासी, नगरवासी, निगम एवं जनपदवासी प्राणी इस क्षार का अधिक मात्रा में निरन्तर प्रयोग करते है वे प्राणी अन्थापन, नपुंसकता, खालित्य और पालित्य ( असमय में बालों का पक जाना ) रोग से युक्त हो जाते हैं और उनके हृदय प्रदेश में कैंची से काटने के समान वेदना होती है, जैसे— प्राच्य देश वासी - ( आसामी बङ्गाली ) चीन

देश वासी मनुष्य होते है । इसलिए क्षार का अत्यधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ १७ ॥

लवणं पुनरौण्यतैक्ष्ण्योपपन्नम् अनतिगुरु, अनतिस्निग्धम्, उपक्लेदि, विस्त्रंसन-समर्थम्, अन्नद्रव्यरुचिकरम, आपातभद्रं प्रयोगसमसाद्गुण्यात्, दोषसंच्यानुवन्धं, तो-चनपाचनोपक्लेदनविस्रंसनार्थमुपयुज्यते । तदत्यर्थमुयुज्यमानं ग्लानिशैथिल्यदौर्बल्याभि-निर्वृत्तिकरं शरीरस्य भवति । ये होनद्ग्रामनगरनिगमजनपदाः सततमुपयुञ्जते ते भूयिष्ठं ग्लास्नवः शिथिलमांसशोणिता अपरिक्लेशसहाश्च भवन्ति । तद्यथा - बाह्लीकसौराष्ट्रिक -सैन्धवसौवीरकाः; ते हि पयसाऽपि सह लवणमश्नन्ति । येऽपीह भूमेरत्यूपरा देशास्तेष्वो-पधिविरुद्वनस्पतिवानस्पत्या न जायन्तेऽल्पतेजसो वा भवन्ति, लवणोपहतत्वात् । तस्माल्लवणं नात्युपयुञ्जीत । ये ह्यतिलवणसात्म्याः पुरुषास्तेषामपि खालित्य पालित्यानि वलयश्चाकाले भवन्ति ॥ १८ ॥

( ३ ) लवण - फिर लवण ( नमक ) उष्ण और तीक्ष्ण गुणयुक्त होता है । यह अति गुरु नहीं होता और न अधिक स्निग्ध होता है । क्कुद कारक और संस्रन ( दोषों को निकालने ) १. ' निगमो नगरपुरोवर्तिग्रामः ' गङ्गाधरः ।

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रसविमानाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ६७६ में समर्थ होता है । अन्न द्रव्य में रुचि उत्पन्न करता है । अल्प काल के एवं अल्पमात्रा के प्रयोग से उत्तम लाभ करने के कारण तत्काल ही कल्याण कारक और अधिक समय तक और अधिक मात्रा में सेवन करने से दोषों का संचय करने वाला होता है । यह रोचन, पाचन, उप-कुंदन और विस्रंसन कार्य के लिए प्रयोग में लाया जाना है । यदि इसका अत्यधिक प्रयोग किया जाय तो शरीर में मानि शिविकता और दुर्बलता उत्पन्न करना है जो ग्राम, नगर, निगम या जनपद निवासी मनुष्य इसका निरन्तर सेवन करते हैं वे अधिक रूप में ग्लानि युक्त होते हैं । उनके शरीर में माँस और रक्त शिविल पड़ जाते हैं, और वे कुंश को सहने में सर्वथा असमर्थ होते है । जैसे — बाहाक देश वासी, सौराष्ट्र ( गुजरात ) सिन्ध और सौवीर देश की रहने वाली जनता । ये दूध के साथ भी नमक खाते है । इस जगत में जो भूमि के अधिक ऊपर देश है ऐसे स्थान में नमक से उपहत होने से औषाने वीर, वनस्पति और वानस्पत्य उत्पन्न नहीं होते । अथवा उत्पन्न होते है तो अल्प तेज वाले होते हैं । इसलिए लवण का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए । जो मनुष्य लवण का अधिक मात्रा में सेवन कर प्रकृति के अनुकूल बना लिए हैं उन्हें भी अकाल में ही खालित्य, ( गजापन ), इन्द्रलुप्त और पालित्य ( बाल का पकना ) हो जाता है ॥ १८ ॥

तस्मात्तेषां तत्साम्यतः क्रमेणापगमनं श्रेयः । सात्म्यमपि हि क्रमेणोप निवर्त्यमानम-दोषं वा भवति ॥ १ ९ ॥ क्रमशः त्याग से लाभ - इसलिए पिप्पली, क्षार, लवण जिन व्यक्तियों के लिए सात्म्य हो गया है, उन्हें इस प्रकार के सात्म्य का क्रम से परित्याग करना कल्याणकारी होता है 1 क्योंकि साम्य हुई वस्तुओं का क्रम से हटाना अदोषकारक या अल्पदोष कारक होता है ॥ १ ९ ॥ विमर्श - सात्म्य हुई वस्तुओं का महसा परित्याग करने से अनेक प्रकार की हानियाँ होती हैं यथा- ' असात्म्यजा हि रोगाः स्युः सहसा त्यागशीलनात् ' अहितकर सात्म्य का त्याग किस प्रकार करना चाहिए । इसको सूत्रस्थान के सातवें स्थान में बताया है यथा - ' उचिताद-हितामा क्रमश विरमेशः " उसे वहीं देखना चाहिए । साभ्यं नाम तद् यदात्मन्युपशेतेः साम्बार्थी पशयार्थः । तत्रिविधं प्रवरावरमध्य-विभागेन सप्तविधं तु रसेकैकत्वेन सर्वरसोपयोगाच्च । तत्र सर्वरसं प्रवरम्, अवरमेकरसं, मध्यं तु प्रवरारमध्यस्थम् । तत्रावरमध्याभ्यां सात्म्याभ्यां क्रमेणैवं प्रवरमुपपादयेत् साम्यम् । सर्वरसमपि च साम्यमुपपन्नः प्रकृत्यायुपयोष्टमानि सर्वाण्याहारविधिविशेषा-यतनान्यभिसमीक्ष्य हितमेवानुरुध्येत ॥ २० ॥

सात्म्य के लक्षण - जो अपनी आत्मा ( शरीर ) के लिए सुखकारी हो उसे सात्म्य कहा जाता है । समय का जो अर्थ होता है वही उपशय का अर्थ है यह सात्म्य प्रवर ( उत्तम ), अवर ( हो ) मध्य विभाग से ३ प्रकार का होता है । एक एक रस के प्रयोग से और सभी रसों का प्रयोग करने से ज्ञान प्रकार का है । इनमें सभी रसों का प्रयोग करना प्रवर सात्म्य ( उत्तम सात्म्य ), एक एक रस का प्रयोग करना अवर सात्म्य और प्रवर- अवर के बीच के सात्म्य को मध्य सात्म्य कहा जाता है । इनमें अवर और मध्य सात्म्य को क्रम से उनका त्याग करते हुए कम से ही प्रवर साम्य को उत्पन्न करना चाहिए जिन पुरुषों को सभी रसों का साम्य प्राप्त है उन्हें भी प्रकृति से उपयोक्ता तक इन सभी आठ आहार विधि - विशेषायतन का विचार कर ओ हित वस्तु हो उन्हीं का सेवन करना चाहिए ॥ २० ॥

१. ' सेविताभ्यां क्रमेण ' इति पा ० ।

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६५० चरकसंहिता * तत्र खल्विमान्यष्टावाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति तद्यथा - प्रकृतिकरण-संयोगराशिदेशकालोपयोग संस्थोपयोक्त्रष्टमानि ( भवन्ति ) ॥ २१ ॥

( २ ) अष्ट आहारविधिविशेषायतनानि अष्टविध आहार - विधि - विशेष आयतन - उसमें ये आठ आहार - विधि - विशेषायतन होते है । जैसे – १. प्रकृति, २. करण, ३. संयोग, ४. राशि, ५. देश, ६. काल, ७. उपयोग संस्था, और ८. आठवां उपयोक्ता ( होते है ) ॥ २१ ॥

* तत्र प्रकृतिरुच्यते स्वभावो यः, स पुनराहारौषधद्रव्याणां स्वाभाविको गुर्वादिगुण-योगः; तद्यथा – माषमुद्द्वयोः, शूकरैणयोश्च ॥ ( १ ) ॥ ( १ ) प्रकृति [ Natural Qualities ] - इनमें जो स्वभाव होता है उसे ही प्रकृति कहते है | वह स्वभाव आहार और औषध द्रव्यों में स्वभावतः रहने वाले गुरु, लघु आदि गुणों का योग है! जैसे उड़द और मूँग तथा सूअर एवं मृग का मांस ॥ १ ॥

करणं पुनः स्वाभाविकानां द्रव्याणामभिसंस्कारः । संस्कारो हि गुणान्तराधान-मुच्यते । ते गुणास्तोयाग्निसन्निकर्षशौचमन्थन देशकालैवासनभावनादिभिः कालप्रकर्ष-भाजनादिभिश्चाधीयन्ते ॥ ( २ ) ॥ ( २ ) करण [ Preparation ] - स्वाभाविक गुणयुक्त द्रव्यों में जो संस्कार किया जाता है उसे करण कहते हैं । दूसरे गुणों को द्रव्यों में लाने का नाम संस्कार है । जल, अग्निसंयोग, शौच ( शुद्धता ), मन्थन, देश, काल, वासना और भावना आदि के द्वारा तथा कालप्रकर्ष ( बहुत दिन बीत जाने से ) एवं विभिन्न प्रकार के पात्रों में रखने से उन गुणों का आधान किया जाता 1 विमर्श - संस्कार करने को ही करण कहा जाता है - ' क्रियने यत्तत्करणम् । ' इसने विभिन्न द्रव्यों में भिन्न - भिन्न गुणों का आधान होता है । यह गुणाधान रूप संस्कार -- १. जल - संयोग जैसे - कठिन खर गुणवाले द्रव्यों का जल - संयोग से मृदु और मसृण बनाना या काथ, फाण्ट, नून, कल्क आदि कषाय - कल्पना में केवल जल - संयोग से निर्मित शीतादि गुणों में परिवर्तन करना । २. अग्नि संयोग-जैसे चात्रल गुरु होता है पर उसी धान से अग्निसंयोग द्वारा निर्मित धान का लावा हलका होना है । ३. शौच ( शोधन ) - जैसे विष स्वभाव से मारक होता है पर उसे शुद्ध कर लिया जाय तो उनमें अनेक रोगों को दूर करने की शक्ति आ जाती है । चक्रपाणि ने जल, अग्निसंयोग और शौच इन तीनों का उदाहरण एक में ही दिया है - जैसे चावल को जल से धोकर शौच ( शुद्ध ) कर लेने पर जल में मिला ( मंयोग ) कर अग्निसंयोग ( आग पर पकाना ) करने पर भात का निर्माण होता है यथा - ' मुधौनः प्रस्रुतः स्विन्नः सन्नप्तदनो लघुः । ' ( नू. अ. २७ ) । ४. मन्धन जैसे – दहां स्वभाव से शोध करने वाला होता है पर उसे घी के साथ मध दिया जाय तो वह शोध को दूर करने वाला होता है । जैसे- ' शोधकृद् दधि शोक्न सहमति मन्यनात् । ' ५. देश – जैसे मांसत्व सामान्य सभी मांस में पाया जाता है पर जांगल आनून और साधारण भेद्र से भिन्न - भिन्न गुण वाले ये सभी नांस होते है । ६. काल - स्वभावतः चावल गुरु होता है पर एक वर्ष का पुराना चावल हलका होता है या कच्चा फल समयानुसार पकने पर जो पहले फल में सट्टा रस होता है वह बाद में मधुर हो जाता है और गुण में भी भिन्न हो जाता है या वालक, युवा, वृद्ध पशु - पक्षियों के मांस में काल के अनुसार भिन्न भिन्न गुण होता है । ७. भावना - विष जो स्वभाव से मारने वाला होता है उसे गोमूत्र में ३ दिन भावना देने से उसकी मारक शक्ति १. ' गुणाधानमुच्यते ' ग. । २. ' देशकालवशेन भावनादिभिः ' ग. ।

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+ रसविमानाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ६८१ अल्प हो जाती है । ८. कालापकर्ष -- आसव आदि का सन्धान करने पर समयानुसार गुण होता है । ९. भाजन - ( पात्र ), १० दिन तक कांसे के पात्र में रखा हुआ घी विष हो जाता है या त्रिफला के कल्क को लोहे के वर्तन पर लेप कर खाने से रसायन का गुण करता है । यहां पर भाजन आदि पढ़ा गया है आदि से पीसना, मंत्र द्वारा अभिमन्त्रित करना, धान्य राशि में रखना आदि लिया जाता हैं या अन्य किसी भी कारण से गुणों में परिवर्तन या परिवर्धन या न्यूनता जाय तो वे सभी संस्कार से ही होते हैं । स्वाभाविक गुणों का संस्कार से परिवर्तन किया जाता है पर ' स्वभावो निष्प्रतिक्रियः ' अर्थात् स्वाभाविक गुण का परिवर्तन नहीं किया जा सकता । यह एक सिद्धान्त है । तो यहाँ संस्कार द्वारा गुणों का परिवर्तन कैसे होता है यह एक विचारणीय विषय है । इसका तात्पर्य यह है कि जिस द्रव्य विशेष का उत्पत्ति - काल में जो स्वभाव होता है वह नहीं बदलता जैसे उड़द स्वभावतः गुरु होता है उसे किमी भी प्रकार उत्पन्न ( पैदा ) किया जाय तो उसका जो स्वाभाविक स्त्वगुण है वह बदला नहीं जा सकता । अनएव संस्कार जन्मोत्तर गुणों में ही परिवर्तन ला सकता है । कुछ ऐसे भी गुण होते हैं जिनका परिवर्तन संस्कार के द्वारा संभव नहीं होता । जैसे — अग्नि में उष्णता, वायु में चञ्चलता, तैल में स्निग्धता । ये गुण जब तक द्रव्य में रहते हैं तब तक निश्चित रूप से उनमें वर्तमान रहते हैं । क्योंकि उनका सन्बन्ध नित्य होता है । गुरु, लघु आदि गुण परिवर्तित होते रहते हैं, यथा - ' गुणो द्रव्यविनाशाद्रा विनाशमुपगच्छति । गुणान्तरोपघाताद्वा.. ” संयोगः पुनर्द्वयोर्बहूनां वा द्रव्याणां संहतीभाव; स विशेषमारभते, यं पुननैकैकशो इव्याण्यारभन्ते; तद्यथा— मधुसर्पिषोः, मधुमत्स्य पयसां च संयोगः ॥ ( ३ ) ॥ ( ३ ) संयोग [ Combination ] - दो या अधिक द्रव्यों के मिलने को संयोग कहा जाता है । यह संयोग एक विशेष कार्य को करने वाला होता है, जो संयुक्त द्रव्य में रहने वाले एक - एक से वह कार्य नहीं होता । जैसे - मधु और घृत का तथा मधु, मछली और दुग्ध का संयोग ॥ ३ ॥

विमर्श -- मधु और घृत अलग - अलग मारक नहीं होता पर यदि दोनों का समान मात्रा नें संयोग हो जाता है तो शांघ्र नारक सिद्ध होता है । इसी भाँति मधु, मछली और दुग्ध ये अलग - अलग कुष्ठ रोग को उत्पन्न नहीं करते पर यदि इनका संयोग हो जाय तो ये कुछ रोग उत्पन्न करने वाले होते हैं | यहाँ प्रधान रूप से २ अथवा ३ या इससे अधिक द्रव्यों का मिश्रण संयोग माना गया है । यही कारण है कि चूर्ण या जहाँ - जहाँ स्वरस आदि से भावना दी जानी है वहाँ भी यद्यपि संयोग ही होता है । पर भावना द्रव्य वहाँ प्रधान रूप में नहीं होते किन्तु गौण रूप में ही होते हैं । राशिस्तु सर्वग्रहपरिग्रहौ मात्रामात्र फलविनिश्चयार्थः । तत्र सर्वस्याहारस्य प्रमाण-ग्रहणमेकपिण्डेन सर्वग्रहः, परिग्रहः पुनः प्रमाणग्रहणमेकैकश्येनाहारद्रव्याणाम् । सर्वस्य हि ग्रहः सर्वग्रहः, सर्वतश्च ग्रहः परिग्रह उच्यते ॥ ( ४ ) ॥ ( ४ ) राशि [ Quantum ]. - मात्रा और अनात्रा का फल निचय करने के लिए सर्वग्रह और परिग्रह राशियाँ है । १. सर्वग्रह - सभी आहार द्रव्यों का एक रिण्ड में प्रमाणग्रहण करना सर्वग्रह कहा जाता है । २. परिग्रह - आहार द्रयों का एक - एक करके प्रमाणग्रहण को

परिग्रह कहा जाता है ।

* देशः पुनः स्थानं; स द्र्व्याणामुत्पत्तिप्रचारौ देशसात्म्यं चाचष्टे ॥ ( ५ ) ॥