चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 881–890
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 881–890
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७६२ चरकसंहिता ५. तिक्तस्कन्ध तिक्तस्कन्ध - चन्दन, नलद ( लामज्जक ), कृतमाल ( अमलतास ), नक्तमाल ( लता-करअ ), नीम, तेजबल, इन्द्रजौ, हरदी, दारुहरदी, नागरमोथा, मरोरा, चिरायता, कटुकी, त्रायमाण, कारवेल्लिका ( छोटी करैली ), करवीर ( कनेर या कनइल ), केबुक ( शाक विशेष ), कठिल्लक वृप ( अडूसा ), मण्डूकपर्णी, कर्कोटक ( बांझ ककोड़ा ), वार्ताकु ( बैंगन ), कर्कश ( तिक्तपरोरा ), काकमाची ( मकोय या भटको आँ ), काकोदुम्बरिका ( कठगूलर ), सुषवी ( करैला ), अतीस, परोरा, कुलक ( लम्बा परोरा ), पाढ़, गिलोय, वेत का अग्रभाग, बेंत, त्रिकंकत चकुल ( मौलेसरी ), सोमवल्क ( श्वेतखदिर ), छतिवन, सुमना ( चमेली ), मन्दार, अवल्गुज ( वाकुची ), वचा, तगर, अगर, बालक ( सुगन्धवाला ), खश इन और इसी प्रकार के अन्य और द्रव्य जो तिक्तवर्ग में पठित हैं उन औषध द्रव्यों में जो छेदन करने योग्य है उन्हें खण्ड - खण्ड टुकड़े कर और जो भेदन करने योग्य है उन्हें सूक्ष्म भेदन कर जल में धो डालें । बाद में जल डालकर पकायें, जब पक जाय तो छान कर मात्रापूर्वक मधु, तैल, नमक मिलाकर विधि को जानने वाला वैद्य विधिपूर्वक कफ से पीड़ित रोगियों को उष्ण उष्ण वस्ति दें । यदि पित्त से पीडित रोगियों को वस्ति देनी हो तो क्वाथ को शीतल कर मधु, घृत मात्रा में मिलाकर विधिज्ञ वैद्य विधिपूर्वक वस्ति यह तिक्तस्कन्ध समाप्त हुआ ॥ १४३ ॥
प्रियङग्वनन्ताम्रास्थ्यस्वष्ठकी कट्वङ्गलोभ्रमोचरससमङ्गाधातकीपुष्पपद्मापद्मकेशरज-म्ब्वाम्रप्लक्षवटकपीतनोदुम्बराश्वत्थभल्लातकास्थ्यश्मन्तकशिरीष शिंशपासोमवल्कतिन्दुक-प्रियालबदरखदिरसप्तपर्णाश्वकर्णस्यन्दनार्जुनारिमेदैलवालुकपरिपेलव कदम्बशल्लकीजिङ्गिनी-काशकशेरुकराजकशेरुकट्फलवंशपद्मकाशोकशालधवसर्ज भूर्जशणखर पुष्पापुर शमीमाची-कवरकतुङ्गाजकर्णस्फूर्जक बिभीतक कुम्भीपुष्कर बीजबिसमृणालतालखर्जूर तरुणानीति, एषा-मेवंविधानां चान्येषां कषायवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशरदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेनाभ्यासिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावन्मधु-तैललवणोपहितं सुखोष्णं वस्ति श्लेष्मविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात्, शीतं तु मधु-सर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य पित्तविकारिणे दद्यात् । इति कषायस्कन्धः ॥ १४४ ॥
६. कषायस्कन्ध कषाय स्कन्ध - • प्रियङ्गु, अनन्तमूल, आम की गुठली, अम्बष्ठकी ( पाठा ), कट्बङ्ग ( सोना-पाठा ), लोध, मोचरस, समङ्गा ( मजीठ ), धाय का फूल, पद्मा ( भारङ्गी ), कमल का केशर, जामुन, आम, पाकड़, वट का वृक्ष, कपीतन, गूलर, पीपल का वृक्ष, भिलावा, अश्मन्तक शिरीष, शीशों का पेड़, सोमवल्क ( श्वेत खदिर ), तेंदु का वृक्ष, चिरोंजी, बेर, खदिर, छतिवन, अश्वकर्ण ( साभेद ), स्यन्दन ( तिनिश ), अर्जुन, विजयसार, विट्खदिर, एलुआ, परिपेलव ( केवटी मोथा ), कदम्ब, सलई, जिङ्गिनी ( जपापुष्प - अड़हुल का फूल ), काश, कसेरू, बड़ा कसेरू, कायफल, बाँस, पद्मकाष्ठ, अशोक, शाल, धव, सर्ज ( राल का वृक्ष ), भोजपत्र, शगपुष्पी ( वन सनई ), खरपुष्पा, पुर ( गुग्गुल ), शमी का वृक्ष, माचीक ( देवदारु ), वरक ( टाँगुन अन्न ), तुङ्ग ( नागकेशर ), अजकर्ण ( साखू का भेद ), स्फूर्जक ( हरशृङ्गार का फूल ), बहेरा, कुम्भीक ( पाटला ), पुष्करवीज ( कमलगट्टा ), विस ( कमल का मूल ), मृणाल ( कमल की डन्टी या खश ), ताल और खजूर का अङ्कर, इनको या और इसी प्रकार के कषाय स्कन्ध में पढ़े १. ' खर्जूरतरुण्यः ' इति पा ० ।
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रोगभिषग्जितीय विमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७६३ हुए औषध द्रव्यों को लेकर जो छेदन करने योग्य हो उनको खण्ड - खण्ड टुकड़ा कर या जो भेदन करने योग्य हो उसे सूक्ष्म रूप में भेदन कर जल से धो डाले, बाद में जल डाल कर उसे पका ' जब अच्छी तरह पक जाय तो छान कर अलग रख लें और उसमें मात्रा से मधु, तेल और नमक मिलाकर सुखोष्ण विधिपूर्वक वस्ति कफ से पीड़ित रोगियों को दें । यदि पित्त से पीड़ित रोगियों में कपाय स्कन्ध की वस्ति देनी हो तो क्वाथ को शीतल कर मधु, घृत मिला कर विधिपूर्वक वस्ति दे । यह कषाय स्कन्ध समाप्त हुआ ॥ १४४ ॥
तत्र श्लोकाः-पड़वर्गाः परिसंख्याता य एते रसभेदतः । आस्थापनमभिप्रेत्य तान्विद्यात्सार्वयौगिकान् ॥ सर्वशो हि प्रणिहिताः सर्वरोगेषु जानता । सर्वान् रोगान्नियच्छन्ति येभ्य आस्थापनं हितम् ॥ उपसंहार: - आस्थापन वस्ति को ध्यान में रखकर रसभेद के अनुसार जो ये ६ वर्ग, १. मधुरस्कन्ध, २. अम्लस्बन्ध ३. लवणस्कन्ध, ४. कटुस्कन्ध, ५. निक्तस्कन्ध, ६. कषाय स्कन्ध बताए गए है उन्हें सार्वयौनिक ( आस्थापन बस्ति से साध्य सभी रोगों में दोषानुसार कल्पना कर प्रयोग करने से लाभकारी ) समझना चाहिए । जिन - जिन रोगों में आस्थापना बस्ति हितकर बताई गई है उन सभी रोगों में ज्ञानवान् वैद्य इन वर्गों को समस्त रूप में या आधे रूप में या जितना मिल सके उतने ही द्रव्यों से बस्ति की कल्पना कर प्रयोग करता है तो सभी रोगों को दूर ' करता है जिसमें आस्थापन वस्ति हितकारी है ॥ १४५ - १४६ ॥ येषां येषां प्रशान्त्यर्थं ये ये न परिकीर्तिताः । द्रव्यवर्गा विकाराणां तेषां ते परिकोपकाः ॥ इत्येते पडास्थापनस्कन्धा रसतोऽनुविभज्य व्याख्याताः ॥ १४८ ॥
पट् स्कन्ध और दोष - प्रकोप - जिन - जिन दोषों की शान्ति के लिए जो - जो रसस्कन्ध नहीं बनाए गए हैं । वे वे द्रव्य वर्ग उन उन दोषों को कुपित करने वाले होते हैं । इस प्रकार ये ६ आस्थापन - स्कन्ध हैं रस के अनुसार विभाग कर इनकी व्याख्या कर दी गई ॥ १४७-१४८ ॥ विमर्श - मधुर स्कन्ध, वात रोग एवं पित्त रोग में लाभकारी बताया गया है अतः यह वर्ग कफज रोगों को; अम्ल स्कन्ध और लवण स्कन्ध वात रोग में लाभकारी बताये गये हैं अतः ये वर्ग पित्तज एवं कफज रोगों को; कटु स्कन्ध कफज रोगों में लाभकारी बताया हैं अतः वातज एवं पित्तज रोग को; निक्त स्कन्ध और कषाय स्कन्ध कफ और पित्तज विकार को शान्त करते हैं अतः ये वर्ग वात विकार को कुपित करने वाले होते हैं । इस प्रकार उपर्युक्त श्लोक का भाव है । तेभ्यो भिषग्बुद्धिमान् परिसंख्यातमपि यद्यद्द्रव्यमयौगिकं मन्येत तत्तदपकर्षयेत्; यद्यपि यौगिकं मन्येत तत्तद्विदध्यात्; वर्गमपि वर्गेणोपसंसृजेदेकमेकेनानेकेन वायुक्तिं प्रमाणीकृत्य । प्रचरणमिव भिक्षुकस्य बीजमिव कर्षकस्य सूत्रं बुद्धिमतामल्प-मध्यनल्पज्ञानाय भवति; नस्माद्बुद्धिमनामूहापोहवितर्काः, मन्दबुद्धेस्तु यथोक्तानुगमनमेव श्रेयः । यथोक्तं हि मार्गमनुगच्छन् भिषक संसाधयति कार्यमनतिमहत्त्वाद्वा विनिपा -तयत्यनतिह्रस्वत्वादुदाहरणस्येति ॥ १४ ९ ॥ षट्स्कन्ध में यथालाभ ग्रहण करे -बुद्धिमान् वैद्य के लिए उचित है कि यहाँ मधुरादि स्कन्धों में जो द्रव्य पढ़े गए है । जिस रोग में इनका प्रयोग किया जाता है उस रोग में अयौगिक अर्थात् लाभकारी न हो, तो जो - जो द्रव्य लाभकारी न हों उन्हें निकाल दें, वर्ग में - नहीं कहे गये को यदि रोग में लाभकारी समझें तो उसको योग में मिला कर प्रयोग करें । यदि योग में न भी पढ़ा गया तो भी उसका प्रयोग वैधानिक होता है, अपनी युक्ति को ही प्रमाण समझ एक वर्ग को दूसरे एक वर्ग से या अनेक वर्गों से संयुक्त कर प्रयोग में लाना चाहिए । भिक्षुक
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७६४ चरकसंहिता ( भीख माँगने वाला ) के प्रचार ( घूमने ) और किसान के बीज की तरह बुद्धिमान पुरुषों के लिए अल्पभी शास्त्र बहुत बड़े ज्ञान के लिए होता है इसलिए बुद्धिमान् पुरुष ऊहापोह और तर्क से युक्त होते हैं । मन्द बुद्धि वाले व्यक्तियों के लिए जिस प्रकार शास्त्रों में विषय वर्णित है उसे उसी प्रकार जान कर प्रयोग करना चाहिए । शास्त्र में बताये हुये उचित मार्ग का अवलम्बन करते हुये वैद्य उदाहरणों के अत्यन्त संक्षेप में न कहे जाने के कारण कार्यों को सिद्ध कर लेते हैं, या उदाहरणों के अधिक विस्तारपूर्वक न कहे जाने के कारण रोगों का निपातन करना है अर्थात् रोगों की शान्ति कुछ न कुछ अवश्य करता है ॥ १४ ९ ॥ विमर्श - इसी तथ्य को सुश्रुत ने भी इस प्रकार कहा है- ' गणोक्तमपि यद् द्रव्यं भवेद् व्याधावयौगिकन् । तदुद्धरेद् यौगिकं तु प्रक्षिपेदप्यकीर्त्तितम् ॥ ' सामान्यतः यह नियम बताया पर विशेष स्थलों में जिस योग को जैसा पढ़ा गया है उसे विकृत करने का अधिकार शास्त्रकारों ने नहीं दिया है । इसी बात को पुष्ट करते हुए सुश्रुत ने पुनः कहा है- ' एष चागमसिद्धत्वात्तथैव फलदर्शनात् । मन्त्रवत्संप्रयोक्तव्यो न मीमांस्यः कथंचन । ' अतः परमनुवासनद्रव्याण्यनुव्याख्यास्यामः । अनुवासनं तु स्नेह एव । स्नेहस्तु द्विविधः-स्थावरात्मकः, जङ्गमात्मकश्च । तत्र स्थावरात्मकः स्नेहस्तैलमतेलं च । तद्वयं तैलमेक कृत्वोपदेच्यामः, सर्वतस्तैलप्राधान्यात् । जङ्गमात्मकस्तु वसा, मज्जा, सपिरिति । तेषां तैलवसामज्जसर्पिषां यथापूर्वं श्रेष्ठं वातश्लेष्मविकारेष्वनुवासनीयेषु, यथोत्तरं तु पित्तविका रेषु, सर्व एव वा सर्वविकारेष्वपि योगमुपयान्ति संस्कार विधिविशेषादिति ॥ १५० ॥
( ४ ) अनुवासनद्रव्य कल्प संग्रह अनुवासनार्थ द्रव्य - अब इसके बाद अनुवासन वस्ति में प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों की व्याख्या की जायगी । स्नेह को ही अनुवासन कहते हैं । स्नेह के दो भेद होते हैं, १. स्थावर, २. जङ्गम । यह स्थावर स्नेह तैल और अतैल ( तैल से भिन्न ) दो प्रकार का है, इन दोनों तैल और अतल को तेल ही कह कर यहाँ उपदेश किया जा रहा है । क्योंकि सभो तैल और अतैल में तैल ही प्रधान है । जङ्गम स्नेह वसा, मज्जा और घृत है । तैल, वसा, मज्जा और घृत इन स्नेहों में से अनुवासन योग्य वात एवं कफ के रोगियों में यथापूर्व श्रेष्ठ होता है, अर्थात् वात और कफजन्य रोग में तैल का अनुवासन देना अधिक लाभकारी है, तैल कम लाभकारी वसा, वसा से कम मज्जा और मज्जा से कम लाभकारी घृत होता है । पित्तज रोग में यथोत्तर ये स्नेह श्रेष्ठ होते हैं अर्थात् पित्तज रोगों में अनुवासन के लिए सबसे श्रेष्ठ घृत होता है उससे कम लाभकारी मज्जा, मज्जा से कम वसा और वसा से कम लाभकारी तैल होता है । अथवा चारों स्नेह रोगानुसार विशेष रूप से संस्कार होनेपर सभी रोगों में यौगिक होते हैं अर्थात् उचित लाभ करते हैं । शिरोविरेचनद्रव्याणि पुनरपामार्गपिप्पलीमरिचविडङ्गशिग्र शिरीषतुम्बुरुपिल्वजाज्यमो-दावार्ता की पृथ्वीकै लाहरेणुकाफलानि च सुमुखसुरस कुठेर कगण्डीर कालमालकपर्णासक्षव-कफणिज्झ कहरिद्राश्टङ्गवेर मूलकलशुनतकरीसर्पपपत्राणि च अर्कालर्ककुष्ठनागदन्तीवचा-पामार्गश्वेता ज्योतिष्मतीगवाक्षीगण्डीर पुण्य वाक्पुष्पीवृश्चिकालीवयस्थातिविषामूलानि च हरिद्राशृङ्गवेर मूलकलशुनकन्दाच, लोध्रमदनसप्तपर्णनिम्वार्कपुष्पाणि च देवदार्यगुरुसर-लशल्लकीजिङ्गिन्यसनहिङ्गु निर्यासाश्च तेजोवतीवराङ्गेदीशोभाञ्जनकवृहती कण्टकारिका-त्वचश्चेति । शिरोविरेचनं सप्तविधं फल - पत्र - मूल - कन्द - पुष्प - निर्यास - त्वगाश्रयभेदात् । लव-कटुतिक्तकषायाणि चेन्द्रियोपशयानि तथाऽपराण्यनुक्तान्यपि द्रव्याणि यथायोगविहि तानि शिरोविरेचनार्थमुपदिश्यन्त इति ॥ १५१ ॥
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रोमभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ( ५ ) शिरोविरेचनद्रव्यकल्प संग्रह ७६५ शिरोविरेचन द्रव्य अपामार्ग ( चिचिरी ), पिप्पली, मरिच, वायविडङ्ग सहिजन, शिरीष, धनियाँ, बेल की गुद्दी, जीरा, अजमोदा, वर्ताकी ( वनभण्टा ) पृथ्वीका ( मगरैला ) ईलायची छोटी, हरेणु ( सम्भालू के बीज ) इन द्रव्यों का फल, सुमुख, सुरस, कुठेरक ( ये तुलसी के भेद हैं ) गण्डीरक मारिसा का साग, पर्णांस ( पुदीना ) क्षवक ( नक छिकनी ) फणिज्झक ( दवना ) हल्दी, सौंठ, मूली, लहसुन, अरणी और सर्षप इनकी पत्ती, अर्थ ( रक्तमदार ) अलर्क ( श्वेत मदार ) कुष्ठ नागदन्ती ( नागदौन ) वच, अपामार्ग, श्वेता ( अपराजिता, कोयल ) ज्योतिष्नती ( मालकंगुनी ) गवाक्षी ( नारुन ) गण्डीपुष्पी ( एक प्रकार का शाक विशेष ) अवाक्पुष्पी ( अन्धाहुल ), वृश्चिकाली ( काकनासा ), वयस्था, अतीस इन द्रव्यों का मूल; हरदी, आदी, मूली और लहसुन का कन्द; लोध, मैनफल, छितिवन, नीम और मदार का फूल; देवदारु, अगर, सरल ( चीड़ ), सलई, जिङ्गिनी, विजयसार और हिंग के वृक्ष का गोंद, तेजबल, दालचीनी, हिगोंट, सहिजन, वनभटा और भटकटैया की छाल । इस प्रकार ये १. फल, २. पत्र, ३. मूल, ४. कन्द, ५. पुष्प, ६. गोंद, ७. छाल भेद से सात प्रकार से शिरोविरेचन द्रव्य प्रयुक्त होते हैं । इसके अतिरिक्त लवण, कटु, तिक्त और कपाय द्रव्य जो इन्द्रिय के लिए सुखकारी हो या अन्य द्रव्य जो यहाँ नहीं कहे गए उनका भी योग के अनुसार कल्पना कर शिरोविरेचन के कार्य में प्रयोग करना शास्त्र सम्मत है ॥ १५१ ॥
विमर्श - चरक विमानस्थान का वाँ अध्याय इतना विस्तृत है कि कभी - कभी शीघ्रता में पढ़ने से यह भ्रम होने लगता है कि इस अध्याय को शृङ्खलायें किस प्रकार की हैं । कुछ इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर अध्यायगत विषयों को सुबोध बनाने के लिए निम्नलिखित सारणी प्रस्तुत की जा रही है । रोगभिषग्जितीयविमानाध्यायः ८ शास्त्रपरीक्षा [ ३ गद्य ] आचार्यपरीक्षा [ ४ गद्य ] ( Selection of the Branch ( Search for the शास्त्रज्ञान उपाय [ ६ गद्य ] ( Means of Learning for of the Medical Science ) Professor ) अध्ययन [ गद्य ७ ] ( Study ) ( Teaching ) अध्यापन [ ८ - १४ गद्य ] the Medical Science ) द्विद्यसंभाषा [ १५ गद्य ] ( Seminars & Symposis of Experts ) सन्धाय ( अनुलोम ) संभाषा [ १७ गद्य ] ( Friendly Discussion ) विगृह्य ( प्रतिलोम ) संभाषा [ १८ गद्य ] ( Hostile Discussion ) परिषद् ४४ वादमापद दशविधपरीच्यभाव ( Assembly ) ( +4 Terms for Debate ) ( Ten points for Investigation ) [ २० २४ गद्य ] [ २७-६७ गद्य ] [ ६८ गद्य ] ( देखें पृष्ठ ७४६ ) ( देखें पृष्ठ ७४ ९ से ७६३ ) ( देखें १ ७ ९ ६ )
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I चरकसंहिता दशविधपरीचय भाव का विशद विवेचन 1 १ कारण २ करण कार्ययोनि ४ कार्य ५ कार्यल ८ काल ६ अनुबन्ध ७ देश गद्य [ ९ २ ] ९ प्रवृति १० उपाय १ प्रकृतितः 4 Constitu. tion ) भूमिपरीक्षा [ गद्य ९ ३ ] ( Land ) २ वितितः ( Pathology ) 1 ३ सारतः ( Strength of the Systems ) ( ०२-११५ गद्य ) आतुर परीक्षा ( Examination of Patient ) ( ९ ४ १२४ गद्य ) ४ संहननतः ( Compaetness of the Body ) ५ प्रमाणतः ( Proportionate Relation of the Body ) ६ सात्म्यतः ( Homolagat jon ) ७ सत्त्वतः ( Mental State ) ८ आहारतः ( Intake and Digestive Capacity ) ९ व्यायमशक्तितः ( Body - Power ) १० वयस्तः ( Age ) १ स्वकुसार २ रक्तसार ३ मांससार ४ मैदसार 1 ५ अस्थिसार ६ मज्जसार ७ शुक्रसार ८ सत्त्वसार 1 1 १ वमनद्रव्य २ विरेचनद्रव्य ३ आस्थापनद्रव्य ( १२५ ) ( १३६ ) ( १३७-१४४ ) I १ मधुरस्कन्ध २ अम्लस्कन्ध ३ लवणस्कन्ध 1 ४ अनुवासनद्रव्य ( गद्य १५० ) 1 ५ शिरोविरेचनद्रव्य ( गद्य १५१ ) ४ कटुस्कन्ध ५ तिक्तस्कन्ध ६ कषायस्कन्ध ( गद्य १३ ९ ) ( गय १४० ) ( गद्य १४१ ) ( गद्य १४२ ) ( गद्य १४३ ) ( गद्य १४४ ) उपर्युक्त सारणी ( Table ) में चरक विमान अध्याय ८ के विषयों को एक क्रम से रक्खा गया है । इस सम्बन्ध में निम्नांकित स्पष्टीकरण किया जा रहा है । पिछले अध्याय ' व्याधितरूपीय ' ( ७ ) में गुरु और लघु व्याचित पुरुषों में भ्रान्ति होने की सम्भावना प्रगट की है । और इसका कारण चक्रपाणि ने बुद्धि दोष माना है । उसी बुद्धिदोष को दूर करने की विधि प्रस्तुत अध्याय ' रोगनिपजतीय ' में बनाई गई है । सर्वप्रथम शास्त्रपरीक्षा का प्रकरण गद्य में प्रारम्भ होता है क्योंकि उस समय बहुत से चिकित्साशास्त्र प्रचलित था-' विविधानि हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके ' ( च. वि. अ. ८ ) । अतएव शास्त्रपरीक्षा कर अध्ययन प्रारम्भ करने को बताया है । फलतः शास्त्रपरीक्षा के बाद आचार्य के गुणों को देखकर उससे अध्ययन करने को बताया है, यह वर्णन गद्य ४ में है ।
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रोगभिषग्जितोयविमानाच्यायः = ] विमानस्थानम् ७६७ शास्त्रपरीक्षा और आचार्यपरीक्षा के बाद शास्त्रज्ञान के उपाय का प्रकरण ५-६ वें गद्य से प्रारम्भ होता है । शास्त्रज्ञान के तीन उपायों में अध्ययन विधि का ७ वें गद्य में, अध्यापन विधि का ८ - १४ वें गद्य में तथा तद्विसभाषा विवि का वर्णन १५ गद्य में प्रारम्भ हो जाता है । और अन्तिम विधि का वर्णन होते होते संवायसंभाषा, परिषद्, विगृह्य संभाषा के प्रकरण के बाद ४४ वादमार्ग के पदों का प्रसंग २७ से ६७ गद्य तक चला जाता है । इसकेबाद आपततः यह प्रतीत होता है कि शृङ्खला टूट रही है । परन्तु ६८ वें गद्य में ' कानिचत्. प्रकरणानि भिषजां ज्ञानार्थमुपदेक्ष्यामः ' से एक नये प्रकरण का प्रारम्भ होता है जिसे कारण-करणादि ' दशविध परीक्ष्यभाव ' कहा जाता है । परन्तु इसको भी ' अन्यपद ' ( वाइमार्ग ) के नाम से आचार्य ने अध्याय का उपसंहार करते समय बनाया है यथा - ' षद्भिरूनानि पञ्चाशद्वाद-मार्गपदानि च । पदानि दश चान्यानि कारणादीनि तत्त्वतः । ( च. वि. अ. ८, १५३ ) । पहले दशविध परीक्ष्य भावों की स्वतंत्र व्याख्या की जाती है जो एक तरह से ८३ वें गद्य में समाप्त हो जाता है पुनः दशविध परीक्ष्य भाव को भिषगादि में किस प्रकार उदाहृत किया जाय इस प्रकरण का प्रारम्भ होता है यथा- ' दशविधं तु परीक्ष्यं कारणादि यदुक्तमग्रे, तदिह भिषगादिषु संसा संदर्शयिष्यामः । ' ( च. वि. अ. ८, ८४ गद्य का प्रथमांश ) अतएव इसे भी दशविध परीक्ष्य भाव का प्रायोगिक ( Applied ) भाग ही समझना चाहिये । दशविपरीक्ष्य भाव के ६ भावों ( १. कारण, २. करण, ३. कार्ययोनि, ४. कार्य, ५. कार्यफल, ६. अनुबन्ध ) का वर्णन गद्य ८६ से प्रारम्भ होकर ९ १ वें गद्य तक जाता हैं । गद्य ९ २ से ‘ देश ' का प्रकरण प्रारम्भ होता है जो दो भागों में विभक्त हो जाता है । ' देश ' का पहला भाग ' भूमि ' गद्य ९ ३ में हो समाप्त हो जाता है । ९ ४ वें गद्य से देश का दूसरा भाग ' आतु परीक्षा ' का विस्तृत प्रकरण प्रारम्भ होता है । आतुर -परीक्षा दशविध है जिसका वर्णन गद्य ९ ४ से प्रारम्भ होकर १२३ वें गद्य में समाप्त हो जाता है । शेष काल, प्रवृत्ति, उपाय ( ८, ९, १० ) परीक्ष्य भावों का वर्णन गद्य १३३ तक जाता है । यहाँ पुनः एक बार यह प्रतीत होता है कि श्रृंखला टूट रही है । परन्तु प्रवृत्ति और उपाय में पञ्चकर्मार्थं वमनादि द्रव्यों की आवश्यकता पड़ती है । अतएव वमनादि द्रव्यसंग्रह का प्रकरण १३ ९ गद्य से प्रारम्भ होकर १५१ वें गद्य तक चलता है । इसके बाद अध्याय का उपसंहार हो जाता है । जो १५७ लोक में समाप्त हो जाता है । इस दृष्टिकोण से प्रस्तुत अध्याय की शृङ्खलायें है सारणी के रूप जो प्रस्तुत की गई है । कारणादि दशविध परीक्ष्य भावों का चिकित्सा क्षेत्र में प्रधानता होने से उसका विभाजन स्वतंत्र रूप से पृष्ठ ७ ९ ६ पर किया गया है । तत्र श्लोकाः-लेक्षणाचार्य शिष्याणां परीक्षा कारणं च यत् । अध्येयाध्यापनविधी संभाषाविधिरेव च ॥
षड्भिरूनानि पञ्चाशद्वादमार्गपदानि च । पदानि दश चान्यानि कारणादीनि तत्त्वतः ॥
संप्रश्नश्च परीक्षादेर्नवको वमनादिषु । भिषग्जितीये रोगाणां विमाने संप्रकाशितः ॥ १५४ ॥
( ज ) उपसंहार ( Conclusions ) अध्याय की सूची: - शास्त्र आचार्य और शिष्यों की परीक्षा; कारण, अध्ययन और अध्यापन विधिः सम्भाषा विधि, ४४ वाद मार्ग के पद, कारण, करण आदि १० अन्य पद, वमन आदि के १. लक्षणं शास्त्रन् ।
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७६८ चरकसंहिता परीक्षार्थ ९ परीक्षा आदि प्रश्न यह सभी बात इस विमान स्थान के रोगभिषग्जितीय अध्याय में बता दिये गये हैं ॥ १५४ ॥
बहुविधमिदमुक्तमर्थजातं बहुविधवाक्य विचित्रमर्थकान्तम् ।
बहुविधशुभशब्दसन्धियुक्तं बहुविधवाढनिसूदनं परेषाम् ॥ १५५ ॥
इमां मतिं बहुविध हेतु संश्रयां विजज्ञिवान् परमत्वादसूदनीम् ।
ने सज्जते परवचनावमर्दनैर्न शक्यते परवचनैश्च मर्दितुम् ॥ १५६ ॥
और भी ---- • बहुविध अनेकों प्रकार से कहा गया यह अर्थ - जात अर्थात् शास्त्र, आचार्य और शिष्य की परीक्षा शैली, अनेको विचित्र वाक्य एवं अर्थों से सुशोभित, अनेकों प्रकार सुन्दर से सन्धित ( बनाए हुए ) वाक्यों से युक्त, अनेक प्रकार से प्रतिपक्षियों के मतों के खण्डन करने वाले सुन्दर विषय इस अध्याय में कहे गये । इस प्रकार परमतसूदनी ( अर्थात् विपक्षियों के पक्ष को नष्ट करने वाली, अनेक युक्तियों और हेतुओं से युक्त इस मति ( ज्ञान - विज्ञान सम्पन्न शास्त्र-युक्ति को ) को जो जान लेता हैं, वह शत्रु के वचनों का खण्डन करने में विलम्ब नहीं करता, अर्थात् शीघ्र ही शत्रु के पक्ष का खण्डन कर देता है और वह दूसरे शत्रु के वचनों से परास्त भी नहीं होता है ॥ १५५-१५६ ॥ दोषादीनां तु भावानां सर्वेषामेव हेतुमत् । मानात् सम्यग्विमानानि निरुक्तानि विभागशः ॥ औरभी • हेतु पूर्वक सभी दोष आदि भावों का ज्ञान कराने के लिए अलग - अलग विमान कहा गया है, अर्थात् विषय के अनुसार अध्याय अलग - अलग कहे गए हैं, इससे विमान स्थान की निरुक्ति बना दी गई है ॥ १५७ ॥
( अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते । अनेनावधिना स्थानं विमानानां समर्थितम् । ) इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने रोगभिषग्जितीयविमानं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
( अग्निवेश से रचित, चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत इस तन्त्र का यहाँ तक विमान स्थान समाप्त हुआ । ) इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के विमानस्थान में रोगभिषग्जितीय नामक आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
इस प्रकार विमानस्थान समाप्त हुआ ॥ ३ ॥
१. निलीयते शक्तो भवति । ' न सज्जते परवचनावमर्दनः ' इति पा ० ।
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शारीरस्थानम् अथ प्रथमोऽध्यायः अथातः कतिधापुरुषीयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
विषय प्रवेश -- अब इसके बाद ' कतिधा पुरुषीय ' नामक शारीर की व्याख्या की जायगी, जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - शरीर के कारण, उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि आदि को बताने के लिये शारीर स्थान प्रारम्भ किया जाता है । इसमें भी अत्यन्त दुःख के नाश - स्वरूप मोक्ष के कारण पुरुष और चिकित्सा के उपयोगी पुरुष के भेद को बताने के लिए कतिधापुरुषीय नामक अध्याय का प्रारम्भ किया जाना है । कतिधा पुरुषमधिकृत्य कृतोऽध्यायः इति कतिधापुरुषीयः । इस प्रकार कतिधा-पुरुषीय की व्युत्पत्ति की गई है । अर्थात् ' कतिधा पुरुषो धीमन् ' इस वचन द्वारा अध्याय का प्रारम्भ किया गया है इसलिये इस प्रथम अध्याय का नाम कतिधापुरुषीय है । कतिधा पुरुषो धीमन्! धातुभेदेन भिद्यते । पुरुषः कारणं कस्मात् प्रभवः पुरुषस्य कः ॥ पुरुषविषयक अग्निवेश के प्रश्न - हे धीमन ( १ ) धातुभेद से पुरुष का भेद कितने प्रकार का होता है । ( २ ) पुरुष को कारण क्यों माना जाता है । ( ३ ) पुरुष का प्रभव अर्थात् उत्पत्ति स्थान कौन है ॥ ३ ॥
विमर्श - यहाँ पुरुष शब्द से सामान्य रूप से कहे जाने वाले अर्थ का ही ग्रहण किया जाता है । क्योंकि कर्म पुरुष और मोक्ष में कारणभूत शरीर रहित आत्मा को ही पुरुष रूप से कहा गया है । पुरुष ( शरीर ) को जो धारण करे उसे धातु कहते हैं । इस व्युत्पत्ति से आत्मा को भी धातु कहा जाता है । इसलिये धातुभेद का अर्थ है - पुरुष - धारणार्थभेद से कितने प्रकार के पुरुष होते हैं ।
* किमज्ञो ज्ञः, स नित्यः किं किमनित्यो निदर्शितः ।
प्रकृतिः का, विकाराः के, किं लिङ्गं पुरुषस्य च ॥ ४ ॥
और भी - - ( ४ ) वह पुरुष अज्ञ है या ज्ञानवाला । ( ५ ) वह पुरुष नित्य है या अनित्य । ( ६ ) प्रकृति किसे कहते हैं । ( ७ ) विकार कितने हैं । ( ८ ) पुरुष का लक्षण क्या है ॥ ४ ॥
* निष्क्रियं च स्वतन्त्रं च वशिनं सर्वगं विभुम् । वदन्त्यात्मानमात्मज्ञाः क्षेत्रज्ञं साक्षिणं तथा ॥ और भी - आत्मा को जानने वाले ज्ञानी पुरुष आत्मा को ( क्रिया शून्य ) स्वतन्त्र, वशी ( जितेन्द्रिय ), सर्वत्र जाने वाला, व्यापक, क्षेत्रज्ञ ( शरीर को भलीभाँति समझने वाला ), साक्षी ( संसार में उत्पन्न होने वाली वस्तुओं को देखने वाला ) है, ऐसा कहते है । यहाँ तथा शब्द से आत्मा को निर्विकार भी माना जाता है ॥ ५ ॥
* निष्क्रियस्य क्रिया तस्य भगवन्! विद्यते कथम् । स्वतन्त्रश्चेदनिष्टासु कथं योनिषु जायते ॥ और भी - - ( ९ ) हे भगवन्! क्रियाशून्य आत्मा की क्रिया किस प्रकार होती है । ( १० ) आत्मा स्वतन्त्र है तव अनिष्ट ( नीच ) योनियों में कैसे उत्पन्न होता है ॥ ६ ॥
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500 चरकसंहिता विमर्श - तात्पर्य यह है कि जो निष्क्रिय होता है उसमें क्रिया कुछ नहीं होती है । पर आत्मा में सुख - दुख आदि क्रिया दिखाई पड़ती है और जब उसे स्वतन्त्र मान लिया जाय तो स्वतन्त्र व्यक्ति बुरी योनियों ( जैसे सूअर, कुत्ता, पशु, पक्षी आदि ) में नहीं जाना चाहेगा । पर यही आत्मा प्रत्येक योनि में जाता है । यथा - " स चायमात्मा देवमनुष्यतिर्यग्योनिषु संचरति धर्माधर्मनिमित्तम् ” अर्थात् धर्म - अधर्म क्रिया आत्मा के साथ लगी ही रहती है । * वशी यद्यसुखैः करमाद्भावैराक्रम्यते बलात् । सर्वाः सर्वगतत्वाच्च वेदनाः किं न वेत्ति सः ॥ ( ११ ) और भी - आत्मा को यदि वशी माना जाता है, तो असुख अर्थात् दुःख उत्पन्न करने वाले भाव से बलात् क्यों युक्त हो जाता है ( क्योंकि जो वशी होते हैं, वे ऐसा कोई भी कार्य नहीं करते जिसका फल अशुभ हो ) | ( १२ ) जत्र आत्मा को सर्वगत माना जाता है । तो वह सभी स्थानों में होने वाली सभी प्रकार की वेदनाओं को क्यों नहीं जानता ॥ ७ ॥
* न पश्यति विभुः कस्माच्चैलकुड्यतिरस्कृतम् । क्षेत्रज्ञः क्षेत्रमथवा किं पूर्वमिति संशयः ॥ औरभी - ( १३ ) आत्मा को यदि विभु अर्थात् व्यापक माना जाता है तो पर्वत या दीवाल से छिपी हुई वस्तु को वह क्यों नहीं देख पाता ( अर्थात् जब व्यापक है तो उसके लिये किमी भी प्रकार का व्यवधान बाधक नहीं हो सकता है क्योंकि वह सभी जगह रहता है, अतः पर्वत या दीवाल के दूसरी तरफ रहने वाली वस्तु भी आत्मा को दिखाई पड़नी चाहिये ) । ( १४ ) पहले
क्षेत्रज्ञ है अथवा क्षेत्र है । यह सन्देह है ॥ ८ ॥
& ज्ञेयं क्षेत्रं विना पूर्वं क्षेत्रज्ञो हि न युज्यते । क्षेत्रं च यदि पूर्वं स्यात् क्षेत्रज्ञः स्यादशाश्वनः ॥ औरभी - यदि क्षेत्र आत्मा को पहले माना जाय तो यह उचित नहीं मालम होता क्योंकि जब तक जानने योग्य क्षेत्र का ज्ञान न हो जाय तब तक क्षेत्रज्ञ यह कहना उचित नहीं है— ' क्षेत्रं जानाति इति क्षेत्रज्ञ: - जो क्षेत्र ( शरीर ) को जानता है उसे क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) कहते हैं । इसलिये पहले क्षेत्र को ही होना चाहिये । यदि क्षेत्र को पहले मान लिया जाय तो क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) अनित्य हो जायेगा ( क्योंकि आत्मा की उत्पत्ति बाद में सिद्ध हो गई ) ॥ ९ ॥
साक्षिभूतश्च कस्यायं कर्ता ह्यन्यो न विद्यते । स्यात् कथं चाविकारस्य विशेषो वेदनाकृतः ॥ और भी - - ( १५ ) जब आत्मा के अतिरिक्त कोई अन्य कर्ता नहीं माना जाता, तो यह आत्मा साक्षी ( गवाह ) किसका होगा ( क्योंकि साक्षी वही होता है जो दूसरे के कार्य करते समय वर्तमान रहे । कार्य करने वाला व्यक्ति पहले से ही वर्तमान रहता है । पर आत्मा के अतिरिक्त पहले किसी की स्थिति मानी नहीं जाती, तो यह साक्षी कैसे हुआ ) । ( १६ ) आत्मा को जब विकार रहित माना गया है तो अविकार युक्त आत्मा में वेदनाजन्य विशेषता कैसे होती है । विकार परिवर्तनशील होता है, पर आत्मा परिवर्तनशील नहीं माना जाता । तब आत्मा दुःखी कैसे माना जाता है ॥ १० ॥
* अथ चार्तस्य भगवंस्तिसृणां कां चिकित्सति । अतीतां वेदनां वैद्यो वर्तमानां भविष्यतीम् ॥ भविष्यन्त्या असंप्राप्तिरतीताया अनागमः । सांप्रतिक्या अपिस्थानं नास्त्यतैः संशयो ह्यतः ॥ ( १७ ) हे भगवन्! रोगी के शरीर में होने वाली भूत, भविष्य, वर्तमान इन तीन प्रकार की वेदनाओं में किस वेदना की चिकित्सा वैद्य करता है, क्योंकि भविष्यकाल की पहले प्राप्ति नहीं होती । ( १८ ) अतीत अर्थात् भूतकाल की वेदना वर्तमान चिकित्सा के समय आ ही नहीं सकती । ( १ ९ ) वर्तमान वेदना की स्थिरता नहीं है इसलिए संशय है कि किस वेदना की चिकित्सा होती है ॥ ११-१२ ॥ * कारणं वेदनानां किं किमधिष्ठानमुच्यते । क्व चैता वेदनाः सर्वा निवृत्तिं यान्त्यशेषतः ॥
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कति पुरुषीय शारीराध्याय: १ ] शारीरस्थानम् ८०१ सर्वचित् सर्वसंन्यासी सर्वसंयोगनिःसृतः । एकः प्रशान्तो भूतात्मा कैर्लिङ्गैरुपलभ्यते ॥१४ ॥
( २० ) और भी - • वेदनाओं का कारण क्या है । ( २१ ) उन वेदनाओं का स्थान क्या है । ( २२ ) ये सभी प्रकार की वेदनायें सम्पूर्ण रूप में कहाँ शान्त होती हैं । ( २३ ) सभी बातों को जानने वाला, संसार की सभी वस्तुओं का त्याग करने वाला, संसार के सभी कारण एवं कार्य के संयोगों से अलग रहने वाला, एक और शान्त जीवात्मा किन लक्षणों से जाना जाता है | १३-१४ ॥ इत्यग्निवेशस्य वचः श्रुत्वा मतिमतां वरः । सर्वं यथावत् प्रोवाच प्रशान्तात्मा पुनर्वसुः ॥१५ ॥
पुनर्वसु आत्रेय के उत्तर - अग्निवेश के इन वचनों को सुन कर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ और शान्त आत्मा पुनर्वम ने सभी प्रश्नों के उत्तर ठीक - ठीक इस प्रकार दिए ॥ १५ ॥
खांदयश्चेतनाषष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः । चेतनाधातुरप्येकः स्मृतः पुरुषसंज्ञकः ॥ १६ ॥
पुनश्च धातुभेदेन चतुर्विंशतिकः स्मृतः । मनो दशेन्द्रियाण्यर्थाः प्रकृतिश्वाष्टधातुकी ॥ १७ ॥
( १ ) प्रश्न: धातु की दृष्टि से पुरुष के भेद ( कतिधा पुरुषो धीमन् धातुभेदेन भिद्यते? ), इसका उत्तर-' खादयः ' से ( खं वायुरद्भिरापः क्षितिस्तथा ) आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी ये पाँच महाभूत और छठी चेतना धातु ( यहाँ चेतना शब्द से चेतना के आधार मन के साथ आत्मा लेना चाहिए ) को पुरुष कहते है । केवल एक चेतना धातु को भी पुरुष संज्ञा वाला कहा जाता है । फिर धातु से २४ तत्वों का पुरुष माना जाता है । ये २४ तत्त्व हैं - मन, दस इन्द्रियाँ ( पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ ), अर्थ ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ) और आठ धातुयें ( १. अव्यक्त, २. महान्, ३. अहंकार, ४. आकाश, ५. वायु, ६. अग्नि, ७. जल, ८. पृथिवी तन्मात्रायें ) से युक्त प्रकृति ॥ १६-१७ ॥ विमर्श - - यहाँ पुरुष १. पड्धातुज, २. चेतनाधातुज, ३. चतुर्विंशतितत्त्वात्मक, ये तीन बताये हैं । ऐसा उत्तर धातुभेद से कितने पुरुष होते है इस प्रथम प्रश्न का दिया गया है । ( १ ) प्रथम पुरुष वैशेषिक दर्शन के अनुसार चिकित्सा शास्त्र का अधिकारी है । इसी बात को सुश्रुत ने भी “ पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः पुरुष इत्युच्यते " से स्वीकार किया है । चरक संहिता में भी यज्जःपुरुषीय सूत्र स्थान अध्याय २५ में महर्षि हिरण्याक्ष ने कहा है- ' षड्धातुजस्तु पुरुषो रोगाः षड्धातुजास्तथा । राशिः षड्धातुजो ह्येष सांख्यैराद्यैः प्रकीर्तितः ॥ ' यहाँ पर ‘ आद्यैः सांख्यैः ' से आदि काल के विद्वानों का यह मत है, यह सूचित किया है । यहाँ भी ' स्मृतः ' यह पद देकर यही सूचित किया है कि मैं ही नहीं, प्राचीन सभी विद्वान् षड्धातुज पुरुष को कर्मपुरुष, चिकित्सा पुरुष, अधिकरणपुरुष स्वीकार करते हैं । ( २ ) दूसरा चेतना धातुज पुरुष केवल आत्मा को ही कहा जाता है । इस पुरुष की व्युत्पत्ति ' पुरि ( शरीरे ) वसति इति पुरुषः ' अर्थात् शरीर में जो रहे उसे पुरुष ' आत्मा ' कहा जाता है । पर चेतना पुरुष आयुर्वेद शास्त्र के सिद्धान्त में नहीं माना जाता है इस बात को सूचित करने के लिए ही ‘ पुरुषसंज्ञकः ' बताया है । तात्पर्य यह है कि चेतनाधातु पुरुष नहीं है पर उसकी संज्ञा पुरुष की है । इसी बात को सुश्रुत ने भी कहा है- ' न चायुर्वेदशास्त्रसिद्धान्तेषूपदिश्यते सर्व-गताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च, असर्वगतेषु च क्षेत्रशेषु नित्यपुरुषख्यापकान् हेतूनुदाहरन्ति ' ( सु. शा. अ. १ ) अर्थात जो सर्वव्यापक नित्य आत्मा ( पुरुष ) है उसका आयुर्वेद शास्त्र में उपदेश नहीं है १. ' वचस्तदग्निवेशस्य ' इति पा ० । २. ‘ खादयश्चेतनाधातुपष्ठास्तु ' इति पा. । ५१ च ० सं ०