चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 871–880
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 871–880
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७८२ चरकसंहिता च्याः; तेषां विकृतिवयैः प्रकृत्यादिबलविशेपैरायुषो लक्षणतश्च प्रमाणमुपलभ्य वयस-स्त्रित्वं विभजेत् ॥ १२२ ॥
( १० ) वयपरीक्षा ( Investigation for the Age ) वय द्वारा परीक्षा - काल- प्रमाण के विशेष की अपेक्षा रखने वाली शरीर की अवस्था को वय कहा जाता है । वह स्थूल रूप से भेद करने पर तीन प्रकार की होती है - बाल, मध्य और जीर्ग । बालावस्था- इनमें बाल अवस्था उसे कहते हैं जिसमें शरीर की धातुएँ पूर्ण रूप से पकी न हों, शरीर में मूँछ आदि चिह्न उत्पन्न न हुए हों, शरीर कोमल हो, क्कुंश को सहने में असमर्थ हो, सभी प्रकार से शरीर में बल की वृद्धि न हुई हो, शरीर में कफ की प्रधानता हो और १६ वर्ष तक की अवस्था हो । शरीर की धातुएँ बढ़ती हुई अपने कार्य में तत्पर हों, प्राय: मन चञ्चल रहता हो और तीस वर्ष के पहले - पहल की अवस्था हो तो उसे भी बाल्यावस्था ही कहते हैं । अर्थात् वाल्यावस्था का दो भेद किया गया है । १ से १६ वर्ष तक जिसमें कफ की प्रधानता होती है । और दूसरा रस धातुओं के बढ़ने और मन के अस्थिर रहने पर तीस वर्ष तक । मध्यावस्था -- इस अवस्था में अपनी उचित मात्रा में जिसके शरीर में बल, वीर्य, पौरुष, पराक्रम, ग्रहण, धारण, स्मरण, और वचन एवं विज्ञान की शक्ति आ गई हो और सभी धातुओं के गुण से शरीर सम्पन्न हो गया हो, शरीर में बल की स्थिति अच्छे रूप में, मन की, स्थिति अच्छे रूप में हो और धातुओं के गुण जिसके शरीर से नष्ट नहीं हुए हों और पित्त धातु की प्रधानता हो ऐसे ६० वर्ष की अवस्था तक मध्यम वय माना गया है । जीर्णावस्था - इसके बाद शरीर, धातु, रस. रक्त आदि इन्द्रियों का बल, वीर्य, पुरुषार्थ, पराक्रम, ग्रहण, धारण, स्मरण, वचन एवं विज्ञान की शक्तियाँ घटने लगती हैं और धातुओं के गुण नष्ट होने लगते हैं । वायु गुण की प्रधानता हो जाती है । १०० वर्ष तक की अवस्था को जीर्ण कहते हैं । १०० वर्ष की आयु इस काल में मानी जाती है । पर कुछ मनुष्य ऐसे भी होते हैं जो इससे कम या इससे अधिक काल तक भी जीते है । उन लोगों के लिये विकृति को छोड़कर प्रकृति आदि वल के भेदों की परीक्षा से और आयु के लक्षण से आयु का प्रमाण निश्चय कर उसी के अनुसार आयु का तीन भाग करना चाहिये ॥ १२२ ॥
एवं प्रकृत्यादीनां विकृतिवर्ज्यानां भावानां प्रवरमध्यावरविभागेन बलविशेषं विभ-जेत् । विकृति बलत्रैविध्येन तु दोषबलं त्रिविधमनुमीयते । ततो भैषज्यस्य तीक्ष्णमृदुम-यविभागेन विध्यं विभज्य यथादोषं भैषज्यमवचारयेदिति ॥ १२३ ॥
प्रकृत्यादि दशविध परीक्षा का महत्त्व - इस प्रकार विकृति को छोड़कर प्रकृति इत्यादि १० परीक्ष्य भावों से रोगी के बल की विशेषता के अनुसार प्रवर, मध्य भागों में विभाग करे । विकृति के अनुसार प्रवर, मध्य, अवर भेद से दोष के तीन बल का अनुमान करे । इसके बाद औषध का तीक्ष्ण मृदु और मध्य भेद से तीन विभाग कर दोष के अनुसार अर्थात् प्रवर में तीक्ष्ण मध्य में मध्य, अवर में मृदु औषधि का प्रयोग करे ॥ १२३ ॥
आयुषः प्रमाणज्ञानहेतोः पुनरिन्द्रियेषु जातिसूत्रीये च लक्षणान्युपदेच्यन्ते ॥ १२४ ॥
वयः परीक्षा - आयु के प्रमाण को जानने के हेतु लक्षण, इन्द्रियस्थान में और शारीर स्थान के जातिसूत्रीय ८ वें अध्याय में कहेंगे ॥ १२४ ॥
विमर्श - उपर्युक्त १२४ गद्य तक चिकित्साशास्त्र में प्रयुक्त होने वाले दशविधपरीक्ष्य भावों १. ' पुनरिन्द्रियस्थाने ' यो.
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रोगभिषग्जितीयविमानाघ्याय ः ८ ] विमानस्थानम् ७८३ में देशपरीक्षा ( वीं ) का प्रकरण चल रहा था । देशपरीक्षा में भी आतुरपरीक्षा ( ख ) का वर्णन ९ ४ वें गद्य से ही प्रारम्भ है जिसकी समाप्ति १२४ वें गद्य में हुई है । इसके बाद पुनः १२५३ गद्य में eat परीक्षा ' काल ' का प्रकरण प्रारम्भ हो रहा है । कालः पुनः संवत्सरश्रातुरावस्था च । तत्र संवत्सरो द्विधा विधा पोढा द्वादशधा भूयश्वाप्यतः प्रविभज्यते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्य । अत्रे खलु तावत् षोढा प्रविभज्य कार्य-सुपदेदयते-- हेमन्तो ग्रीष्मो वर्षाश्चेति शीतोष्णवर्षलक्षणास्त्रय ऋतवो भवन्ति तेषामन्त-रेष्वितरे साधारणलक्षणास्त्रय ऋतवः प्रावृटशरवसन्ता इति । प्रावृडिति प्रथमः प्रवृष्टेः
कालः, तस्यानुबन्धो हि वर्षाः । एवमेते संशोधनमधिकृत्य षड् विभज्यन्ते ऋतवः ॥१२५ ॥
( ८ ) काल परीक्षा संवत्सर और आतुर की अवस्था को काल कहते हैं । इसमें संवत्सर को दो, तीन, छः, बारह या इससे भी अधिक भिन्न - भिन्न कार्यों के अनुसार विभाग किया जाता है । उस काल को यहाँ पर छः विभाग कर कार्यों का उपदेश कर रहे हैं । १. हेमन्त, २. ग्रीष्म, ३. वर्षा, यह तीन ऋतु क्रम से शीत, उष्ण, वर्षा लक्षण वाली होती अर्थात् इन्हें जाड़ा, गर्मी और वर्षा कहते हैं । इन ऋतुओं के बीच में इससे भिन्न प्रावृडू, शरद्, वसन्त, यह तीन ऋतु साधारण कही जाती हैं । अर्थात् इनमें क्रम से न अधिक बरसात होती, न अधिक जाड़ा पड़ता, न अधिक गर्मी पड़ती । प्रावृड् वर्षा के प्रथम काल को कहते हैं । उससे लगे हुए काल को वर्षा कहते हैं । इस प्रकार यह छ: ऋतुएँ दोपों के संशोधन के अनुसार विभाग कर बतायी गयी हैं ॥१२५ ॥
तत्र साधारणलक्षणेप्वृतुषु वमनादीनां प्रवृत्तिर्विधीयते, निवृत्तिरितरेषु । साधारणलक्षणा हि मदशीतोष्ण वर्षत्वात् सुखतमाश्च भवन्त्यविकल्पकाश्च शरीरौषधानाम्, इतरे पुनरत्य-र्थशीतोष्णवर्षत्वाद् दुःखतमाश्च भवन्ति विकल्पकाश्च शरीरौषधानाम् ॥ १२६ ॥
नित्यग काल ( ऋतु ) और संशोधन - इन ऋतुओं में जो साधारण तीन ऋतुएँ प्रावृड, शरद् एवं वसन्त बतायी गयी हैं । उनमें वमन आदि संशोधन क्रिया कराने का विधान है । इनसे भिन्न तीन वर्षा, हेमन्त, व ग्रोष्म में इनकी निवृत्ति अर्थात् वमनादि क्रिया नहीं की जाती । साधारण लक्षण वाली ऋतुओं में जाड़ा, गर्मी व बरसात मन्द रूप में होनी हैं । इसलिये वे सुखकारी होते हैं । शरीर और औषध का प्रयोग किसी भी प्रकार के उपद्रव करने वाले नहीं होते । अर्थात् साधारण काल में जल्दी वमन आदि का प्रयोग किया जाय तो वे कोई भी उपद्रव नहीं करते । इससे भिन्न तीन ऋतुएँ वर्षा, हेमन्त व ग्रीष्म अधिक वर्षा, जाड़ा और गर्मी होने के कारण दुःखकर होती हैं और शरीर और औषधियों के लिये विकल्पक ( उपद्रव ) करने वाले होते हैं ॥ १२६ ॥
तत्र हेमन्ते ह्यतिमात्रशीतोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्यतिशीतवाताध्यातमति-दारुणीभूतमवबद्धदोषं च भेषजं पुनः संशोधनार्थमुष्णस्वभावम तिशीतोपहतत्वान्मन्द-वीर्यत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधनमयोगायोपपद्यते शरीरमपि च वातोपद्र-वाय । ग्रीष्मे पुनर्भृशोष्णोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्युष्णवातातपाध्मातमतिशिथि-लमत्यर्थप्रविलीनदोष, भेषजं पुनः संशोधनार्थमुष्णस्वभावमुष्णानुगमनात्तीच्णतरत्वमा-पद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधनमतियोगायोपपद्यते शरीरमपि पिपासोपद्रवाय | वर्षासु तु मेघजलावतते गूढार्कचन्द्रतारे धाराकुले वियति भूमौ पङ्कजलपटलसंवृतायाम-पक्किन्न शरीरेषु भूतेषु विहतस्वभावेषु च केवलेप्वौपधग्रामेषु तोयतोयदानुगतमारुत-१. ' तं तु ' यो । २. ' प्रवृष्टः प ० । ३. ' अवरुद्धदोपं ' ग. । ४. ' ० मारुतसं सर्वोपहतेषु संसर्गाद् गुरुप्रवृत्तानि ' ग. ।
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७८४ चरकसंहिता संसर्गाद् गुरुप्रवृत्तीनि वमनादीनि भवन्ति, गुरुसमुत्थानानि च शरीराणि । तस्माद्वमना-दीनां निवृत्तिर्विधीयते वर्षान्तेष्वृतुषु, न चेदात्ययिकं कर्म । आत्ययिके पुनः कर्मणि काममृतं विकल्प्य कृत्रिमगुणोपधानेन यथर्तुगुणविपरीतेन भेषजं संयोगसंस्कारप्रमाण-विकल्पेनोपपाद्य प्रमाणवीर्यसमं कृत्वा ततः प्रयोजयेदुत्तमेन यत्नेनावहितः ॥ १२७ ॥
और भी - • हेमन्त ऋतु में अतिमात्र शीत से पीड़ित होने के कारण शरीर सुखी नहीं होता और अत्यन्त शीतल वायु से परिपूर्ण होता है । शरीर में दोष अत्यन्त कठोर और बंधे हुये रहते हैं । ऐसे शरीर में जब उष्ण स्वभाव वाली औषध को संशोधन के लिए प्रयोग किया जाता है, तो उसका भी प्रभाव अधिक शीत से पीड़ित होने के कारण मन्दवीर्य हो जाता है । ऐसी दशा में अत्यन्त शीत से पीड़ित शरीर और अधिक शीत से मन्द प्रभाव वाली औषधि इन दोनों का संयोग होने पर संशोधन अयोग के लिये हो जाता है । अर्थात् उसले उत्तम रीति से संशोधन नहीं होता और शरीर भी बात के उपद्रवों से युक्त हो जाता है क्योंकि जब औषधे अपना सम्यक् योग नहीं कर पाती तो वह वायु को कुपित कर देती है जिससे शरीर में अनेक प्रकार के वायु जन्य रोग हो जाते हैं । ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त गर्मी से पीड़ित होने के कारण शरीर असुखी हो जाता है । अत्यन्त उष्ण वायु एवं धूप से पूर्ण हो जाने से शरीर अधिक शिथिल हो जाता है और दोष शरीर में अत्यन्त लीन हो जाते हैं उष्ण स्वभाव वाले संशोधन के लिये प्रयोग की गयी औषध उष्ण शरीर और उष्ण संशोधन के संयोग से तीक्ष्ण गुण वाली हो जाती है । इसलिये गर्म औषधि व गर्म शरीर होने पर संशोधन औषधियाँ अतियोगकारक हो जाती और शरीर भी अधिक प्रवास के उपद्रव से युक्त हो जाता है । वर्षाकाल में आकाश बादलों से घिरा होता है अतः सूर्य, चन्द्रमा और तारे छिपे रहते हैं और आकाश मंडल धाराओं से व्याप्त होता है । पृथ्वी कीचड़ और जल के समूह से व्याप्त रहती है इसलिये मनुष्य का शरीर भी अत्यन्त गीला होता है और सम्पूर्ण औषधियों का स्वभाव भी पृथ्वी आदि के गीले होने से तथा जल और मेघ से दूषित वायु के लगने से नष्ट हो जाता है । इसलिये वमन कारक औषधियाँ भारी स्वभाव वाली हो जाती है । यदि उनका प्रयोग इस ऋतु में किया जाय तो न वे स्वयं अच्छी प्रकार निकलती हैं और न दोषों को उचित रूप से निकालती हैं और शरीर भी रोगों के लिये गुरु समुत्थ हो जाता है । अर्थात् संशोधन से क्लेश पाया हुआ शरीर अधिक परिश्रम से अधिक दिनों में अपनी प्रकृति को प्राप्त होता है । इसलिये वमन आदि संशोधन विधियों की वर्षा, हेमन्त, ग्रीष्म एवं वर्षा में निवृत्ति की जाती है अर्थात् इन ऋतुओं में इनका प्रयोग नहीं किया जाता, यदि कोई हानिकारक ऐसा रोग न हो जिसमें वमन इत्यादि कराना अनिवार्य हो । अर्थात् अनिवार्य होने पर इन ऋतुओं में भी वमन आदि क्रिया कराई ही जाती है । सामान्यावस्था में इन ऋतुओं में वमन आदि का निषेध है | पर आत्ययिक अर्थात् किसी विशेष परिस्थिति में ऋतु के विपरीत गुणों को उत्पन्न कर आवश्यकता-नुसार औषधियों के संयोग - संस्कार- प्रमाण मात्रा प्रमाणों को वीर्य के अनुसार वना कर यत्नपूर्वक सावधान होकर वैद्य प्रयोग कर सकता है ॥ १२७ ॥
आतुरावस्थास्वपि तु कार्याकार्यं प्रति कालाकालसंज्ञा; तद्यथा— अस्यामवस्थायामस्य भेषजस्याकालः कालः पुनरन्यस्येति; एतदपि हि भवत्यवस्थाविशेषेण; तस्मादातुरावस्था-स्वपि हि कालाकालसंज्ञा । तस्य परीक्षा - मुहुर्मुहुरातुरस्य सर्वावस्थाविशेशवेक्षणं
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रोगभिषग्जितोयविमानाध्याय: ८ ] विमानस्थानम् ७८५ यथावद्वेषजप्रयोगार्थम् । न ह्यतिपतितकालमप्राप्तकालं वा भेषजमुपयुज्यमानं यौगिकं भवति; कालो हि भैषज्यप्रयोग पर्याप्तिमभिनिर्वर्तयति ॥ १२८ ॥
औषधि के काल तथा अकाल - कार्य और अकार्य को ध्यान में रखकर रोगी की अवस्था में भी काल और अकाल यह दो विभाग किया जाता है । जैसे इस अवस्था में इस औषधि का काल है, इस औषधि का काल नहीं है । यही अवस्था विशेष का फल है । इसलिये आतुर की अवस्था में भी काल और अकाल यह दो संज्ञाएँ रखी गयी हैं । ' आतुर की सभी विशेष अवस्था को उचित रूप में बार - बार देख कर उसकी परीक्षा करनी चाहिये । औषधि - प्रयोग समय के बीत जाने पर या समय के पहले किया जाता है तो वह उचित लाभ नहीं करता । समय पर प्रयुक्त औषधि लाभ करती है ॥ १२८ ॥
प्रवृत्तिस्तु प्रतिकर्मसमारम्भः । तस्य लक्षणं भिषगोषधातुरपरिचारकाणां क्रिया-समायोगः ॥ १२ ९ ॥ ( ९ ) प्रवृत्ति - प्रत्येक के प्रति चिकित्सा का आरंभ करना ही प्रवृत्ति कहा जाता है । उसका लक्षण यह है-- वैद्य, औषध, रोगी, सेवक इनकी उचित क्रियाओं का उचित रूप में संयोग होना अर्थात् इन चारों का अपनी क्रियाओं में लग जाना ही प्रवृत्ति है ॥ १२ ९ ॥ उपायः पुनर्भिषगादीनां सौष्ठवमभिविधानं च सम्यक् । तस्य लक्षणं- भिषगादीनां यथोक्तगुणसंपद् देशकालप्रमाणसात्म्य क्रियादिभिश्व सिद्धिकारणैः सम्यगुपपादितस्यौषध-स्यावचारणमिति ॥ १३० ॥
• वैद्य आदि चारों पादों की उत्तमता को उपाय कहते हैं । अर्थात् यह चारों ( १० ) उपाय -अपने कार्यों को क्रियाओं द्वारा मन्दर रूप से बनाकर अपने कार्य में तत्पर रहें तो उसको उपाय कहते हैं । उसका लक्षण यह है - वैद्य आदि चारों का अपने - अपने गुणों से युक्त होना तथा देश, काल, प्रमाण, सात्म्य और क्रिया आदि सिद्धि के कारणों से उचित रूप में बनाई गई औषधियों का प्रयोग करना ॥ १३० ॥
एवमेते दश परीक्ष्यविशेषाः पृथक् पृथक् परीक्षितव्या भवन्ति ॥ १३१ ॥
दशविध परीक्षा का उपसंहार - इस प्रकार इन दस परीक्षा करने योग्य वस्तुओं की अलग - अलग परीक्षा करना आवश्यक होता है ॥ १३१ ॥
परीक्षायास्तु खलु प्रयोजनं प्रतिपत्तिज्ञानम् । प्रतिपत्तिर्नाम यो विकारो यथा प्रतिपत्त-व्यस्तस्य तथाऽनुष्ठानज्ञानम् ॥ १३२ ॥
परीक्षा का प्रयोजन - परीक्षा का प्रयोजन प्रतिपत्ति ज्ञान है । जिस रोग का जिस प्रकार आयुर्वेद शास्त्र में उत्पत्ति, लक्षण आदि बताया है उसे उसी प्रकार जान कर जिस प्रकार शास्त्रों में रोग की अवस्था के अनुसार चिकित्सा बतायी है उसे उसी प्रकार करने को प्रतिपत्ति कहते हैं ॥ १३२ ॥
विमर्श I इस प्रकार दशविधपरीक्ष्य भावों का प्रकरण जो ६८ वे गद्य...... से प्रारम्भ हुआ था उसकी समाप्ति यहाँ हुई है । इस सम्बन्ध में पृ. ७ ९ ६ की सारणी द्रष्टव्य है । यत्र तु खलु वमनादीनां प्रवृत्तिः यत्र च निवृत्तिः, तद्व्यासतः सिद्धिपूत्तरमुप-देक्ष्यामः ' ' १३३ ॥ '. ' अभिसंधानम् ' इति पा ० । ५० च ० सं ०
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७८६ चरकसंहिता ( छ ) पञ्चकर्मार्थ द्रव्यसंग्रह ( Drugs for Panch Karma Therapy ) वमनादि प्रकरण - जहाँ वमन आदि क्रियाओं की प्रवृत्ति और निवृत्ति की जाती है । अर्थात् जहाँ - जहाँ जिन - जिन अवस्थाओं में वमन आदि का विधान और वमनादि क्रियाओं का निषेध है यह दोनों बातें आगे सिद्धि स्थान में विस्तार से कही जायँगी ॥ १३३ ॥
प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणसंयोगे तु गुरुलाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदन्यतरनिष्ठायाम् । सन्ति हि व्याधयः शास्त्रेषूत्सर्गापवादैरुपक्रमं प्रति निर्दिष्टाः । तस्माद्गुरुलाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदित्युक्तम् ॥ १३४ ॥
प्रवृति तथा निवृत्ति के संयोग में कर्त्तव्य प्रवृत्ति और निवृत्ति अर्थात् वमन कराने और न कराने योग्य एक ही रोग उत्पन्न हो जाय तो उसमें रोग और दोष इन दोनों की गुरुता और लघुता का ठीक विचार कर कोई एक, वमन की प्रवृत्ति या निवृत्ति, करानी चाहिये । शास्त्रों में उत्सर्ग ( विधि ) और अपवाद ( निषेध ) रूप से चिकित्सा का व्याथियों में निर्देश किया गया है इसलिये गौरव - लाघव का ठीक - ठीक विचार कर चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १३४ ॥
यानि तु खलु वमनादिषु भेषजद्रव्याण्युपयोगं गच्छन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः । तद्यथा - फलजीमूतकेच्वा कुधामार्गव कुटज कृतवेधनफलानि, फलजीमूतकेच चाकुधामार्गव-पत्रपुष्पाणि आरग्वधवृक्षकमद्नस्वादुकण्टकपाठापाटला शार्ङ्गष्टा मूर्वा सप्तपर्णनक्तमालपिचु-मर्दपटोलसुषवीगुडूचीचित्रकसोमवल्कशतावरीडी पीशिग्रुमूलकषायैः, मधुकमधूक कोविदा-रकर्बुदारनीपविर्दुलबिम्बीराणपुष्पीसदा पुष्पा प्रत्यक पुष्पाकषायैश्च, एलाहरेणुप्रियङ्गुपृथ्वीका -कुस्तुम्बुरुतगर नलदहीवेरतालीशोशीर कषायैश्च, इत्तुकाण्डे च्वित्तु वालिकादर्भपोटगलकालङ्कृ ( क ) तकषायैश्व, सुमनासौमनस्यायनीहरिद्रादारुहरिद्रावृश्वीरपुनर्नवाम हा सहानुद्रसहाक-षायैश्व, शाल्मलिशाल्मलिकभद्रपलापर्ण्यपोदिकोद्दालकधन्वनराजादनोपचित्रागोपी-शृङ्गाटिकाकषायैश्च पिप्पलीपिप्पलीमूलचन्य चित्रकशृङ्गवेर सर्षपफाणित क्षीरचारलवणोद-कैश्च यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्तिक्रिया चूर्णावलेहस्नेहकषायमांसरसयवागू यूष-काम्बलिकक्षीरोपधेयान्मोदकानन्यांश्च भैच्यप्रकारान् विविधाननुविधाय यथार्हं वमनाय द्विधिवद्वनम् । इति कल्पसंग्रहो वमनद्रव्याणाम् । कल्पमेषां विस्तरेणोत्तर काल-.मुपदेच्यामः ॥ १३५ ॥
( १ ) वमनद्रव्यकल्प संग्रह वमनार्थ द्रव्य -- जो औषध द्रव्यं वमन आदि क्रियाओं में प्रयोग किए जाते हैं उनकी व्याख्या की जाती है । जैसे, फल ( मदनफल ), जीमूतक ( बन्दाल ), इक्ष्वाकु ( तितलौकी ), धामार्गव ( पीतघोषा ), कुटज ( इन्द्रजौ ), कृतवेधन ( कडुई तरोई ), इनके फल और मैनफल, जीमूतक, और धामार्गव के पत्र एवं पुष्प, अमलतास, कुरैया, मैनफल, स्वादुकण्टक ( विकङ्कत या छोटा गोखरू ), पाठा ( पाठ ), पाटला ( पाढल ), शार्ङ्गष्टा ( गुञ्जा - धुंधुची ), मूर्वा ( मरोरा ), छतिवन, करञ्ज, पिचुमर्द ( नीम ), पटोल, सुषवी ( करैला ), गिलोय, सोमवल्क ( श्वेत खदिर ), शतावर, द्वीपी ( कण्टकारी रेंगनी ) और सहिजन का मूल इनका कषाय, मुलेठी, महुआ का फूल, १. ' ० द्वीपि शत्रु ० ' इति । पा ० । २. ' ० निचुल ' यो ३. ० तालीशगोपीकपायैश्च ' यो । ४. ' योगान् ' इति पा ० ।
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रोगभिषग्जितीयविमानाव्याय: ८ ] विमानस्थानम् ७८७ कोविदार ( कचनार सफेद ), कर्बुदार ( कचनार लाल ), नीप ( कदम ), विदुल ( बेंत ), बिम्बी ( कुन्दरु ), शणपुष्पी ( वनसनई ), सदापुष्पी ( रक्त मदार ), प्रत्यक् पुष्पी ( अपामार्ग, चिचिरी ), इनका कषाय, एला ( इलायची छोटी ), हरेणु ( सम्भालू बीज ), प्रियङ्गु, पृथ्वीका ( मगरैला ), कुस्तुम्बुरु तगर नलद ( गुग्गुलु या जटामांसी ), हीवेर तालीशपत्र, खश इनका कषाय, ईख, काण्डे ( ईख भेद ), इक्षुवालिका दर्भ ( कुश भेद ) पोटगल कालंकृत ( कसौजी ) इनका कषाय, सुमना ( चमेली ), सौमनस्यायना ( चमेली की कली या जाबित्री ), हल्दी, दारूहल्दी, वृश्चीर ( श्वेत पुनर्नवा ), रक्त पुनर्नवा, महासहा ( माषपर्णी ), क्षुद्रसहा ( मुद्रपर्णी ), इनका काथ, शाल्मलि ( सेमल ), शाल्मलिक ( छोटा सेमल ), भद्रपर्णी एलापण उपोदिका ( पोई का साग ), उद्दालक ( लसोड़ा ), धन्वन ( धामन वृक्ष की छाल ), राजादन ( खिरनी ), उपचित्रा ( एरण्ड ), गोपी ( सरिवन ), शृंगारिका इनका कषाय, पीपर, पीपरामूल, चव्य, चित्रक, सोंठ, सरसों, राव, दूध, क्षार, नमक इनके जलों से यथालाभ व जितना अपना इच्छित द्रव्य हो उन्हें लेकर संस्कार द्वारा वत्ति, चूर्ण, अवलेह, स्नेह, कषाय, मांसरस, यवागू, यूष, काम्बलिक दूध, इनमें उपर्युक्त बताये हुये औषधों का प्रयोग करना चाहिये । या मोदक या अन्न के अनेक प्रकार के योगों को बनाकर, जो रोगी की प्रकृति के अनुकूल हो, वमन करने योग्य पुरुष को विधिपूर्वक चमनार्थं दे । कल्प स्थान में वमन द्रव्यों की कल्पना विस्तार से आगे कहेंगे ॥ विरेचनद्रव्याणि तु श्यामात्रिवृच्चतुरङ्गुलतिल्वक महावृक्ष सप्तलाशङ्खिनीदन्तीद्रवन्तीनां क्षीरमूलत्वक्पत्रपुष्पफलानि यथायोगं तैस्तैः चीरमूलत्व पत्रपुष्पफलैर्विक्किप्ताविक्कितैः, अजगन्धाश्वगन्धाजशृङ्गीक्षीरिणीनीलिनीक्लीत ककषायैश्च प्रकीर्योदकीर्यामसूरविदलाकम्पि-लकविडङ्गगवाक्षीकषायैश्च, पीलुप्रियालमृडीका काश्मर्य परूषक बदर दाडिमामलकहरीतकी-बिभीतकवृश्वीरपुनर्नवाविदारिगन्धादिकषायैश्च, सीधुसुरासौवीरकतुषोदकमैरेयमेदकमदि-रामधुमधूलकधान्याम्लकुवलबदर खर्जूरकर्कन्धुभिश्व, दधिदधिमण्डोदश्विद्भिश्व, गोमहि-यजावीनां च क्षीरमूत्रैर्यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्तिक्रियाचूर्णासवलेह स्नेहकषाय-मांसरसयूषकाम्बलिकयवागूतीरोपधेयान् मोदकानन्यांश्च भक्ष्यप्र ( वि ) कारान् विविधांश्च योगाननुविधाय यथार्ह विरेचनार्हाय दद्याद्विरेचनम् । इति कल्पसंग्रहो विरेचनद्रव्या-णाम् । कैल्पमेषां विस्तरेण यथावदुत्तरकालमुपदेच्यामः ॥ १३६ ॥
( २ ) विरेचनद्रव्यकल्प संग्रह विरेचनार्थ द्रव्य - विरेचन द्रव्य - श्यामा ( काली निशोथ ), त्रिवृत् ( सफेद निशोथ ), चतुरंगुल ( अमलतास ), तिल्वक ( रोध सुश्रुत के सूत्र स्थान ३८ वें अध्याय श्यामादिगण की टीका करते हुये डल्हण ने ' तिनको रोधाकारो बृहत्पत्रो रक्तत्वको वैरेचनिकः ' से रोध की तरह दूसरे वृक्ष को माना है जो विरेचन करने वाला होता है । रोध का प्रयोग मल बाँधने या रोकने के लिये किया जाता हैं । ), महावृक्ष ( सेहुँड़ का दूध ), सप्तला ( सतधरिया सेहुँड़ ), शंखिनी ( यवतिक्ता ), दन्ती, द्रवन्ती ( बड़ी दंती ), इन औषधियों का दूध, मूल, छिल्का पत्ती, फूल, फल योग के अनुसार अर्थात् जिसका जहा उचित प्रयोग हो वहाँ करे इन औषधियों में एक या दो या समस्त को लेकर इनका दूध, जड़, त्वचा, पत्ती, फूल, फल आदि का आगे बताये हुये द्रव्यों के काथ आदि के द्वारा विधि पूर्वक से बनाकर विरेचन के लिये प्रयोग करे । जितना मिल जाय उनने द्रव्य को ले अथवा जिनने द्रव्यों का प्रयोग करना उचित समझे १. ' संयुक्तासंयुक्तैरित्यनेः ' चक्रः । २. ' कल्पमेषां विस्तरेणोपदेश्याम उत्तरकालम् ' यो. ।
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७५८ चरकसंहिता उन्हीं को लेकर प्रयोग करे । द्रव्य - अजवायन अश्वगंध, काकड़ासिंघी, दुधिया, नीलिनी ( नील मूल या बीज ), क्लीतक ( मुलेठी, जेठी मधु ), इनके क्वाथ से प्रकीर्या ( लता करंज ), उदकीर्या ( पूर्ति करंज ), मसूर - विदला, कम्पिल्लक ( कबीला ) वायविडंग, गवाक्षी ( नारुन या इन्द्रायण ) इनके क्वाथ से, पीलु, प्रियाल ( चिरौजी ), मुनक्का, गंभारी, फालसा, खट्टी बेर, खट्टा अनार, आंवला, हर्रे, बहेरा, सफेद पुनर्नवा, रक्त पुनर्नवा, विदारी गंधादि गण के कषाय से और सांधु, सुरा, सौवीर, तुषोदक, मैरेय, मेदक, मदिरा, मधु, मधूलक, धान्याम्ल ( कांजी ), बड़ी बेर, खट्टी बेर, खजूर, बनबेर से बनाये हुए सीधु आदि के साथ दही का पानी, मट्ठा इनके साथ, गाय, भैंस, बकरी और भेड़ी इनके दूध और मूत्र के साथ जितने द्रव्य मिल सके या अवस्थानुसार जितना द्रव्य लेना हो उन द्रव्यों को लेकर उनका संस्कार कर वर्ती, चूर्ण, आसव, अवलेह, घृत, क्वाथ, मांसरस, यूष, काम्बलिक, यवागू, क्षीर में संस्कार कर, मोदक या अन्य भक्ष्य विशेष, अनेक प्रकार के योगों को बनाकर यथा योग्य विरेचन करने योग्य पुरुष को विरेचनार्थं दे, यह विरेचन द्रव्यों का कल्प अर्थात् प्रयोग - संग्रह किया गया है । विशेष रूप से विस्तार से इन विरेचन द्रज्यों का प्रयोग आगे कल्प स्थान में विधिपूर्वक कहेंगे ॥ १३६ ॥
आस्थापनेषु तु भूयिष्टकल्पानि द्रव्याणि यानि योगमुपयान्ति तेषु तेष्ववस्थान्तरेष्वा-तुराणां तानि द्रव्याणि नामतो विस्तरेणोपदिश्यमानान्यपरिसंख्येयानि स्युरतिबहुत्वात्; इष्टश्वानतिसंक्षेपविस्तरोपदेशस्तन्त्रे, इष्टं च केवलं ज्ञानं, तस्माद्रसत एव तान्यत्र व्याख्या-स्यामः । रसंसंसर्गविकल्पविस्तरो ह्येषामपरिसङ्घयेयः, समवेतानां रसानामंशांशबल-विकल्पातिरहुत्वात् । तस्माद्द्रव्याणां चैकदेशमुदाहरणार्थं रसेष्वनुविभज्य रसैकैकश्येन च नामलक्षणार्थं पडास्थापनस्कन्धा रसतोऽनुविभज्य व्याख्यास्यन्ते ॥ १३७ ॥
( ३ ) आस्थापनद्रव्यकल्प संग्रह आस्थापनार्थ द्रव्य -- आस्थापन वस्ति में जो अधिक कल्पना वाले द्रव्य रोगियों की उन - उन अवस्थाओं में यौगिक होते हैं अर्थात् भिन्न - भिन्न अवस्थाओं में विशिष्ट रूप से प्रयुक्त होते हैं, उन द्रव्यों को विस्तार से नाम लेकर यदि उपदेश किया जाय, तो उनकी संख्या अपरिगणित हो जायगी । क्योकि वे द्रव्य बहुत ही अधिक हैं और शास्त्र में न विस्तार से न संक्षेप से द्रव्यों का उपदेश इष्ट होता है । केवल ज्ञानमात्र शास्त्र में बताना अभिलषित होता है । इसलिये यहाँ पर उन द्रव्यों का संसर्ग विकल्प का विस्तार भी अपरिसंख्येय अर्थात् गिने जाने योग्य नहीं होता । क्योंकि समवेत अर्थात् एकत्रीभूत रसों में अंशांश - वल कल्पना बहुत होती है । इसलिये द्रव्यों के उदाहरण के लिए एक देश को लेकर रसों में विभाग कर अलग - अलग नाम - लक्षण के अनुसार छः आस्थापना स्कन्ध - रसों के विभाग के अनुसार व्याख्या की जायगी ॥ १३७ ॥
* यत्तु षड्विधमास्थापनमेकरसमित्याचक्षते भिषजः, तद्दुर्लभतमं संसृष्टरसभूयिष्ठ-स्वाद् द्रव्याणाम् । तस्मान्मधुराणि मधुरप्रायाणि मधुरविपाकानि मधुरप्रभावाणि च मधुरस्कन्धे मधुराण्येव कृत्वोपदेदयन्ते, तथेतराणि द्रव्याण्यपि ॥ १३८ ॥
मधुरादि छः स्कन्ध – जो छः प्रकार के आस्थापन - स्कन्ध एक - एक रस के अनुसार कहने की प्रतिज्ञा वैद्य समुदाय करता है उसका भी मिलना बहुत ही दुर्लभ हैं क्योंकि द्रव्य अनेक रसों के संयोग से बना हुआ पाया जाता है । इसलिये जो द्रव्य मधुर हैं या जो मधुर १. ' रससमवायविकल्पविस्तरः ' यो । २. ' रसैकैकत्वेन ' ग.; ' रसकैवल्येन ' च. ।
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रोगभिषग्जितीय विमानाध्यायः ८ ] विमानस्थानम् ७८६ प्राय हैं, जो मधुर विपाक होते हैं, मधुर प्रभाव वाले होते हैं । उन्हें मधुर मानकर मधुर स्कन्ध में उपदेश किया जायगा । इसी प्रकार और द्रों ( स्कन्धों ) को भी समझना चाहिये ॥ १३८ ॥
विमर्श - यहाँ तात्पर्य यह है, द्रव्य पंचमहाभूत से बनते हैं । रस भी पञ्चमहाभूत से बनते हैं । कोई द्रव्य एक महाभूत से नहीं बनता । अतः किसी भी द्रव्य में एक रस मिलना असम्भव है । यथा - ' तस्मान्नैकरसं द्रव्यं भूतसंघातसम्भवात् ' । तद्यथा - जीवकर्षभकौ जीवन्ती वीरा तामलकी काकोली क्षीरकाकोली मुद्गपर्णी माषपर्णी शालपणीं पृश्निपर्ण्यसनपर्णी मधुपर्णी मेदा महामेदा कर्कटशृङ्गी शृङ्गाटिका चिच्छन्न-रुहो च्छत्राऽतिच्छत्रा श्रावणी महाश्रवणी सहदेवा विश्वदेवा शुक्ला तीरशुक्ला बलाऽतिबला विदारी क्षीरविदारी क्षुद्रसहा महासहा ऋष्यगन्धाऽश्वगन्धा वृश्वीरः पुनर्नवा बृहती कण्टका-ratoast मोरटः श्वदंष्ट्रा संहर्षा शतावरी शतपुष्पा मधूकपुष्पी यष्टीमधु मधूलिका मृद्दीका खर्जूरं परूषकमात्मगुप्ता पुष्कर बीजं कशेरुकं राजकशेरुकं राजादनं कतकं काश्मर्यं शीत-पाक्योदनपाकी तालखर्जूर मस्तकमिक्षुरिक्षुवालिका दर्भः कुशः काशः शालिर्गुन्द्रेस्कटकः शरमूलं राजक्षवकः ऋष्यप्रोक्ता द्वारदा भारद्वाजी वनत्रपुष्यभीरुपत्री हंसपदी काकना-सिका कुलिङ्गाक्षी क्षीरवल्ली कपोलवल्ली कपोतवल्ली सोमवल्ली गोपवल्ली मधुवल्ली चेति; एषामेवंविधानामन्येषां च मधुरवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशरछेद-यित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सुप्रक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य पयसाऽर्वोदकेनाभ्यासिच्य साधयेद्दर्व्या सतत् मवघट्टयन्; तदुपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतरसे-cal षधेषु पयसि चानुपदग्धे स्थालीमुपहत्य सुपरिपूतं पयः सुखोष्णं घृततैलवसामज्जलवण-फाणितोपहितं बस्ति वातविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात्; शीतं तु मधुसर्पिभ्र्भ्यामुपसंसृज्य
पित्तविकारिणे विधिवद्दद्यात् । इति मधुरस्कन्धः ॥ १३ ९ ॥
१. मधुरस्कन्ध मधुरस्कन्ध - जीवक, ऋषभक, जीवन्ती, वीरा, तामलकी ( भुइँ आँवला ), काकोली, क्षीर काकोली, वनमूंग, वनउड़द, सरिवन, पिठवन, असनपर्णी, अपराजिता, मधुपर्णी, विकंकत, मैदा, महामेदा, काकड़ासिंधी, सिंघाड़ा, गिलोय, छत्रा ( तालमखाने या सौंफ ), अतिच्छत्रा ( रक्त ताल-मखाना या कासनी ), श्रावणी ( गोरखमुण्डी ), महाश्रावणी ( बड़ी गोरखमुण्डी ), सहदेई, विश्वेदेवा ( लाल फल वाली सहदेई ), शुक्ला, क्षीरशुक्ला ( बृहद् शृङ्गारिका या सफेद निशोथ ), बला ( बरियारा ), अतिवला ( ककही ), विदारीकंद, क्षीरविदारी, क्षुद्रसहा, महासहा, ऋष्यगन्धा ( विधारा ), असुगन्ध, वृश्वीर ( श्वेत पुनर्नवा ), रक्तपुनर्नवा, वनभंटा, कंटकारी, उरुबूक ( एरण्ड ), मूर्वा, गोखरू, संहर्षा ( बन्दाल ), शतावर, सौंफ, मधूकपुष्पी ( महुआ ), मुलेठी, मधूलिका ( अपामार्ग ), मुनक्का, खजूर, फालसा, केवाच का बीज, कमलगट्टा, कशेरू, बड़ा कशेरू, खिरनी, निर्मली, गंभार, शीतपाकी ( गुंजा ), ओइनपाकी ( नीली झिण्टी ), ताल एवं खजूर की ताड़ी, ईख, इक्षुवालिका, दर्भ, कुश, कास, धान का मूल, गोनरखा, इत्कट ( नरई ), सरपत का मूल, नकछिकनी, ऋष्य-प्रोक्ता ( पीले पुष्प की बला ), द्वारा ( सागौन ), भरद्वाजी ( वनकपास ), वनत्रपुसी ( फूट ), अभीरुपत्री ( शतावरी का भेद ), हंसपदी, काकनासा, कुलिंगाक्षी ( सफेद गुंजा ), क्षीरवल्ली ( विदारी कन्द का भेद ), कपोलवल्ली, कपोतवल्ली ( छोटी इलायची ), सोमवल्ली ( सोमलता ), गोपवल्ली ( अनन्तमूल ), मधुवल्ली ( मुलेठी का भेद ) इनका और इसी के समान और भी जो द्रव्य मधुर १. ' परिस्रुतं पूतं ' यो ।
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७६० चरकसंहिता वर्ग में गिने गये हैं, वे द्रव्य यदि काटने के योग्य हों तो उनको खण्ड - खण्ड काटकर और यदि भेदन करने योग्य तो छोटे - छोटे भेदन कर पानी से धोकर धोई हुई स्वच्छ थाली में रखकर दूध और आधा पानी मिलाकर कलछुल से चलाते हुये पकावे जब जल का बहुत सा भाग सूख जाय, औषधियों का रस जल में निकल आवे, दूध जले नहीं तब थाली को उतारकर गर्म छान ले । फिर उसमें घी, तेल, बसा, मज्जा नमक, राब मिलाकर विधिपूर्वक मथकर विधि को जानने वाला वैद्य वात - विकार से पीडित रोगी को वस्ति दे । यदि पित्त - विकार से पीडित रोगी है तो मधु व घी मिलाकर शीतल होने पर विधिपूर्वक औषध की वस्ति दे । यह मधुर स्कन्ध समाप्त हुआ || १३ ९ ॥ आम्राम्रातकलकुच्चकरमर्दवृक्षाग्लाम्लवेतस कुवलबदर दाडिममातुलुङ्ग गण्डीरामलकनन्दी-as शीतकति न्तिण्डीकदन्तशठैरावतककोशाम्रधन्वनानां फलानि पत्राणि चाम्रातका-श्मन्तकचाङ्गेरीणां चतुर्विधानां चाम्लिकानां द्वयोश्व कोलयोश्चामशुष्कयोर्द्वयोश्चैव शुष्का-ग्लिकयोर्ग्राम्यारण्ययोः, आसवद्रव्याणि च सुरासौवीरकतुपोदकमैरेय मेदकमदिरामधुशु-तशीधुदधिदधिमण्डोदश्विद्वान्याम्लादीनि च एषामेवंविधानामन्येषां चाम्लवर्गपरिसंख्या-तानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा द्रवैः स्थाल्या-मभ्यासिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावत्तैलवसामजलवण फाणितोपहितं सुखोष्णं बस्ति
वातविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात् । इत्यम्लस्कन्धः ॥ १४० ॥
२. अम्लस्कन्ध अम्ल स्कन्ध - आम, आम्रातक, लकुच ( बड़हर ), करमर्द ( करौंदा ), वृक्षाम्ल, अम्लेवतस, कुवल ( बड़ा बेर ), बदर ( बेर ), दाडिम ( अनार ), मातुलुंग ( बिजौरा ), गंडीर ( शाकभेद वा स्नुहीभेद ), आँवला, नन्दीतक, शीतक, तिन्तिडक, दंतशठ ( जम्बीर वा गलगल ), ऐरावतक ( नारंगी ), कोशाम्र ( क्षुद्राम्र ), धन्वन ( धामन के फल ), आम्रातक, अश्मन्तक, चांगेरी इनके पत्ते, चारों प्रकार की इमली के पत्ते, कच्चे व सूखे दोनों प्रकार के बेर के पत्ते, ग्राम्य तथा आरण्य दोनों प्रकार की सूखी अम्लिका की पत्ती, आसव द्रव्य तथा सुरा, सौवीर, तुपोदक, मैरेय, मेदक मदिरा, मधु ( मद्यभेद ) । सीधु, शुक्त ( सिरका ), दही, दही का पानी, छांछ, धान्याम्ल आदि ये और इसी प्रकार के अन्य द्रव्य जिन्हें अम्ल वर्ग में पढ़ा गया है उनमें से छेदन योग्य का छेदन करके, भेदन योग्य का भेदन करके द्रव्यों को सुरा, सौवीर आदि द्रव्यों से सींचकर पूर्ववत् सिद्ध करें । पश्चात् छानकर यथावत् तेल, वसा, मधु मज्जा, लवण और फाति मिश्रित करके वातरोगी को विधिज्ञ वैद्य विधिपूर्वक सुखोष्ण वस्ति दे । यह अम्ल स्कन्ध समाप्त हुआ || सैन्धवसौवर्चलकालविडपाक्यानूपकूप्यवालुकै लमौलकसामुद्ररोमकौद्भिदौपर पाटेयक-पांशुजान्येवंप्रकाराणि चान्यानि लवणवर्गपरिसंख्यातानि, एतान्यग्लोपहितान्युष्णोदको-पहितानि वा स्नेहवन्ति सुखोष्णं बस्ति वातविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात् । इति लवणस्कन्धः ॥ १४१ ॥
३. लवणस्कन्ध लवण स्कन्ध -- • सेंधानमक, सोचर नमक, कालानमक, निइनमक, पाक्य, आनून, कृभ्य, बालुक, ऐल, मौलक, सामुद्र ( समुद्री नमक ), रोमक उद्भिर नमक, औपर पांडेयक नमक, पांशुज ( पांगा नमक ) इन सब नमकों को और इसी प्रकार के अन्य द्रव्यों को भी लक वर्ग में समावेश कर लिया जाता है । इन द्रयों को जल में मिलाकर या उष्ण जल में मिलाकर १. ' स्थिराण्य ' इति पा ० ।
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रोगभिषग्जितीयविमानाघ्याय ः ८ ] विमानस्थानम् ७६१ घी, तेल आदि स्नेह मिलाकर विधि को जानने वाला वैद्य विधिपूर्वक सुखोष्ण वस्ति वात से पीड़ित व्यक्तियों को दे यह लवणस्कन्ध समाप्त हुआ ॥ १४१ ॥
विमर्श - प्रायः इस लवण वर्ग में आए हुए नमक आज कल अप्रसिद्ध हो चुके हैं, सम्भवतः इनका नामकरण बनाने की विधि और देश के अनुसार किया गया है । जैसे- पाक्य यह पकाकर बनाया जाता होगा अतः पाक्य नाम रखा गया । जानूप- अनूप देश में उत्पन्न होने को आनूप नमक, कूप्य - खारे कूप का जल पकाकर नमक तैयार करने को कूप्य नमक, वालुक - बालू के कण के समान जो नमक होता है उसे बालक नमक, ऐल - इला कहते हैं भूमि ( मट्टी को ), मट्टी से जो तैयार किया जाय वह ऐन नमक, मौलक - जो मूली के आकार का लम्बा लम्बा दण्ड तैयार किया जाय उसे मौलक जैसे नौसादर । उद्भिद् -- जो भूमि से स्वयं निकले जैसे सांभर नमक | ग्रन्थकार के समय में ये नमक इसी नाम से प्राप्त होते होंगे अतः इनका वर्णन उन्होंने किया है । पिप्पलीपिप्पलीमूलहस्ति पिप्पलीचव्य चित्रकशृङ्गबेर मरिचाजमोदार्द्र कविडङ्गकुस्तुम्बुरु-पीलुतेजोवत्येलाकुष्ठभल्लातका स्थिहिङ्गुनिर्यासकिलिममूलक सर्षपलशुनकर अशिग्रुकमधुशि-ग्रुकखर पुष्पभूस्तृण सुमुखसुरस कुठेर कार्जक गण्डीर कालमालकपर्णा सक्षवकफणिज्झकक्षारमूत्र-पित्तानीति; एषामेवंविधानां चान्येषां कटुकवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां द्यान खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा गोमूत्रेण सह साधयित्वोपसंस्कृत्य यथा-वन्मधुतैललवणोपहितं सुखोष्णं बस्ति श्लेष्मविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात् । इति कटुकस्कन्धः ॥ १४२ ॥
४. कटुस्कन्ध कटुक स्कन्ध पीपर, पिपरामूल, गजपीपर, चव्य, चित्रक, सौंठ, मरिच, अजमोदा अदरख, विडङ्ग ( वायविडङ्ग ), धनियाँ, पीलु, तेजोवती ( तेजबल ), इलायची छोटी, कूठ, भिलावा की . गुठली, हींग, किलिन ( देवदारु ) मूली, सरिसों पीली, लहसुन, करअ, सहिजन, मीठा सहिजन, खरपुष्पा भूस्तृण ( हरद्वारी तृण या गन्धतृण ), समुख, सुरस, कुठेरक, अर्जक ( ये सब तुलसी के भेद है ), गण्डीर ( गडेर घास ), कालमालक ( कालमरिसा का शाक ), पर्णास ( पुदीना ), क्षवक ( नकछिकनी ), फणिज्झक ( दवना ), क्षार, मूत्र, पित्त और इस प्रकार के अन्य और औषध जो कटुवर्ग में गणना के योग्य है उनमें जो, औषध छेदन करने योग्य हो उसे खण्ड खण्ड छेदन कर और जो द्रव्य भेदन करने योग्य हैं उनका भेदन कर गोमूत्र में पकावें पक जाने पर छान कर मधु, तैल नमक ये सब मात्रा से मिलाकर विधिज्ञ वैद्य विधिपूर्वक कफ से पीडित रोगियों
को उष्ण- उष्ण बस्ति दें । यह कटुस्कन्ध समाप्त हुआ ॥ १४२ ॥
चन्दननलदकृतमालनक्तमालनिम्बतुम्बुरु कुटज हरिद्रादारुहरिद्रामुस्तमूर्वा किराततिक्त-ककटुकरोहिणीत्रायमाणाकारवेल्लिकाकरीर करवीर के बुकक टिल्लक वृषमण्डूकपर्णीकर्कोटकवा-र्ता कुकर्कश काकमाचीकाको दुम्बरिका सुषव्यतिविषापटोलकुल कपाठागुडूचीवेत्राग्रवेत सवि-कङ्कतवकुलसोमवल्कसप्तपर्णसुमनार्कावल्गुजवचा तगरागुरुबालकोशीराणीति, एषामेवं-विधानां चान्येषां क्तिवर्गपरिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रज्ञात्य पानीयेनाभ्यासिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावन्मधु-तैललवणोपहितं सुखोष्णं वस्ति लेप्मविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात्, शीतं तु मधुसर्पिः
मपसंसृज्य पित्तविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात् । इति तिक्तस्कन्धः ॥ १४३ ॥