चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 901–910

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 901–910

पृष्ठ 901

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८१२ चरकसंहिता आत्मा का कारणत्व - • जिन शास्त्र प्रमाणों से या जिन प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आप्तोपदेश, के द्वारा सभी प्रमेय ( है ) विषयों को जाना जाता है, उन सभी शास्त्र प्रमाणों से या दान के साधन स्वरूप प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से पुरुष ( आत्मा ) को कारण माना जाता है || ४५ ॥ * न ते तत्सदृशास्त्वन्ये पारम्पर्य समुत्थिताः । सारूप्याद्ये त एवेति निर्दिश्यन्ते नवा नत्राः ॥ भावास्तेषां समुदयो निरीशः सध्वसंज्ञकः । कर्ता भोक्ता न स पुमानिति केचिद्वचवस्थिताः ॥ निरात्मवादी बौद्ध मत का विवेचन - ये जो सब नाव ( पदार्थ ) है वे ही बने नहीं रहते है अपितु क्षण - क्षण में परम्परा से उत्पन्न होकर उनके समान ही दूसरे नूतन - नूतन उत्पन्न हो जाते हैं । उनका भी स्वरूप पहले वाले के सदृश होने से उनको भी वे वहीं हैं ऐसा माना जाता है । ऐसे ही परम्परा प्राप्त भावों का समुदाय बिना उनके किसी स्वामी के तत्व ( प्राणी ) कहा जाता है, वह पुरुष कर्ता भोक्ता नहीं है । ऐसा कुछ लोगों का मत है ॥ ४६-४७! । विमर्श - बौद्ध दर्शन का सिद्धान्त है कि प्रत्येक वस्तु क्षत्रय - स्थायी होती है अर्थात् प्रथम क्षण में उत्पत्ति, दूसरे में स्थिति और तीसरे क्षत्र में नष्ट हो जाती है इस निदान के अनु सार प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति स्थिति, विनाश की परम्परा बनी रहेगी, जैसे कोई भी व्यक्ति जो बाल्यावस्था में था वहीं युवावस्था होने पर उससे भिन्न होता है पर उसे भिन्न नहीं माना जाता । उदाहरण के लिए, देवदत्त नामक किसी एक व्यक्ति को लीजिए । जो देवदत्त बचपन में था युवा वही है ऐसा माना जाता है । पर यह मानना नहीं चाहिए क्योंकि वचपन का देवदत्त लम्बाई में छोटा था, चलने में घुटनों का सहारा लेता था, मूँछ, दाढ़ी से हीन था, अब इस युवावस्था-प्राप्त देवदत्त में बचान की कोई वस्तु नहीं है अतः उससे यह भिन्न है । इस प्रश्न पर बौद्ध का उत्तर है कि बचपन से युवावस्था का देवदत्त भिन्न नहीं है, क्योंकि वस्तु दूसरे क्षण में अपने समान वस्तु को उत्पन्न कर तीसरे क्षण में नष्ट हो जाती है । इस प्रकार प्रत्येक द्वितीय क्षण में अपने सारूप्य ( समान धर्म वाली वस्तु ) की उत्पत्ति होती रहती है, तब यह वही व्यक्ति है इस प्रकार ज्ञान की परम्परा से क्षणभङ्गुर वस्तु में यह वही है । ऐसा ज्ञान बना रहता है । यहां ज्ञान की परम्परा सदा बनी रहती है अतः वस्तुओं का सदा भान रहता है, पूर्व के समान उत्तर काल में उत्पत्ति होती रहती है । जैसे चेतन वस्तु से चेतना की, मनुष्य से मनुष्य की, गौ से गौ को उत्पत्ति होती है- ' सारू-प्यात् ' यह वही है यह ज्ञान की परम्परा बनी रहती है । क्षणभङ्गुर पदार्थों की परम्परा के समुदाय स्वरूप अचेतन २४ तत्त्व को जीत्रधारी पुरुष माना जाता है, चेतन आत्मा को कारण नहीं माना जाता है अतः अव्यक्त चेतन आत्मा कर्ता और भोक्ता कुछ भी नहीं होना है अपितु शरीर का कारण क्षणिक स्थायी वस्तुओं का समुदाय है पूर्व के शरीर में जो चेतना आदि धर्म था वह उत्तर के शरीर में परम्परया ही मान लिया जाना है इसलिए कोई व्यवहार नष्ट नहीं होता है । इस प्रकार बौद्ध क्षणिक विज्ञानवादी समुदाय मात्र को शरीर मानते है, आत्मा की सत्ता अलग स्वीकार नहीं करते, किन्तु क्षण - भर २४ तत्त्वात्मक शरीर के साथ ही आत्मा भी प्रत्येक क्षण में उत्पन्न और नष्ट होती रहती है । इनके मत में आत्मा भी स्थायी नहीं है । छतेषामन्यैः कृतस्यान्ये भावा भावैर्नवाः फलम् भुञ्जते सदृशाः प्राप्तं यैरात्मा नोपदिश्यते ॥ निरात्मवादी मत का खण्डन - जो लोग आत्मा को नहीं मानते हैं उनके मत में दूसरे व्यक्ति से किए हुए कर्म का फल परम्परा - ज्ञान से सदृश ( अपने समान धर्म वाले ) दूसरा व्यक्ति -भोग करने लगेगा ॥ ४८ ॥

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कतिधापुरुषीय शारीराध्यायः १ ] शारीरस्थानम् ८१३ विमर्श - जब चेतन नित्य आत्मा को कारण माना जाता है तब शरीर के नष्ट होने पर भी स्थायी होने से आत्मा पूर्व शरीर से कृत कर्म का भोग स्वयं करता है । जब आत्मा - रहित क्षण-भरों का समुदाय शरीर है ऐसा माना जाता है, तब यद्यपि क्षण स्थायी शरीर सारूप्य होने से एक स्वरूप का प्रतीत होता है, फिर भी उत्पन्न वह नष्ट होने से भिन्न भिन्न है । जो शरीर कार्य करता है वह दूसरे क्षण में नष्ट हो गया तो उस शरीर से किए गए कर्म के फल को उस पूर्व शरीर के सदृश उत्पन्न दूसरा शरीर भोगेगा । पर संसार में देखा जाता है कि अपने फल भोगने की इच्छा से ही कर्म किया जाता है न कि दूसरे के भोगने के लिए । पर निरात्मवादी के मत मानने पर उपर्युक्त दोष आ जाता है । * करणान्यान्यता दृष्टा कर्तुः कर्ता स एव तु । कर्ता हि करणैर्युक्तः कारणं सर्वकर्मणाम् ॥ आत्मा के कारणत्व में आत्रेय का सतकर्ता की कार्य करने की सामग्री भिन्न भिन्न होती है पर कर्ता वही रहता है, जब आत्मा करण अर्थात् सामग्रियों से युक्त होता है तब सभी कर्मों का कारण होना रहता है ॥ ४ ९ ॥ विमर्श - यद्यपि शरीर आदि क्षणिक है पर आत्मा को स्थायी माना जाता है और वह इन्द्रियों एवं शरीर के सम्बन्ध स्थापित कर अनेकों कर्मों को करता है और स्थायी होने से अपने साधनों द्वारा किए हुए कार्यों का फल स्वयं भोगता । & निमेषकालाङ्गात्रानां कालः शीघ्रतरोऽत्यये । भग्नानां न पुनर्भावः कृतं नान्यमुपैति च ॥ मतं तत्वविदामेतद्यस्मात्तस्मात् स कारणम् । क्रियोपभोगे भूतानां नित्यः पुरुषसंज्ञकः ॥ औरभी - शरीर आदि भावों के नाश में निमेषाल से भी शीघ्र काल लगता है । जब ये शरीर आदि भाव नष्ट हो जाते हैं नव उनकी ( भाव ) उत्पत्ति फिर से नहीं हो सकती है । किए हुए यागादि कर्मों का फल दूसरा नहीं प्राप्त करता । यह तत्ववित् ( विद्वानों ) का मन है इसलिए प्राणियों के क्रिया ( कार्य करने ) में और उसके फल भोगने में नित्य पुरुष नामक चेतना धातु ( आत्मा ) कारण होता है ॥ ५०-५१ ॥ * अहङ्कारः फलं कर्म देहान्तरगतिः स्मृतिः । विद्यते सति भूतानां कारणे देहमन्तरा ॥५२ ॥

आत्मा कोकारण मानने में - आत्मा को कारण न मानने पर निम्न आपत्तियाँ हो सकती हैं । प्राणियों के देह से अतिरिक्त ( आत्मा को ) कारण स्वीकार करने पर ही अहंकार, फल, कर्म, देहान्तर गति, स्मरण शक्ति आदि सफल होंगे ( ये रह सकते या बन सकते है ) ॥ ५२ ॥

* प्रभवो न ह्यनादित्वाद्विद्यते परमात्मनः । पुरुषो राशिसंज्ञस्तु मोहेच्छाद्वेषकर्मजः ॥ ५३ ॥

( ३ ) प्रश्न: पुरुष की उत्पत्ति किससे? ( प्रभवः पुरुषस्य कः? ), इसका उत्तर--आनादि परमात्मा का प्रभव ( कारण ) कोई नहीं है, ( जब उसका कारण हो जायगा तो उसे अनादि नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसके पहले कारण वर्तमान रहेगा ) | राशि पुरुष मोह, इच्छा, द्वंप कर्म से ऊपन्न होता है ( इसलिए यह सकारण होता है ) ॥ ५३ ॥

विमर्श - पुरुष चेतन बातुज, पड्यानुज, चतुर्विंशतितत्त्वात्मक यह तीन तरह का माना है जिसमें षड्धानुज और चतुर्विंशतितत्त्वात्मक को एक ही माना जाता है जिसे राशिपुरुष कहते हैं । राशिपुरुष की उत्पत्ति राग, द्वेष के द्वारा किए हुए अनेक कर्म के फलस्वरूप होती है । इसलिए यह सकारण होता है पर चेतना धातु पुरुष जिते परमात्मा कहते हैं वह नित्य, अनादि होता है और जो अनादि है उसका कारण कोई नहीं होता ।

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८१४ चरकसंहिता * आत्मा ज्ञः करणैर्योगाज् ज्ञानं स्वस्य प्रवर्तते । करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न वर्तते ॥ पश्यतोऽपि यथा ss दर्शे संक्लिष्ट नास्ति दर्शनम् । तत्त्वं जले वा कलुषे चेतस्युपहते तथा ॥ ( ४ ) प्रश्न: आत्मा ज्ञानी है या अज्ञानी ( क्रिमज्ञो ज्ञः सः? ), इसका उत्तर-आत्मा ज्ञानी है पर जब करण ( इन्द्रियों ) से योग होता है तो उसे ज्ञान होता है । इन्द्रियाँ निर्दोष न हों या इन्द्रियों से आत्मा का संयोग न हो तो ज्ञान नहीं होता जिस प्रकार गन्दे सीसे या जल में मुख दिखाई नहीं पड़ता उसी प्रकार चित्त में विकृत होने से ज्ञान नहीं होता ॥५४-५५ ॥ * करणानि मनो बुद्धिर्बुद्धिकर्मेन्द्रियाणि च । कर्तुः संयोगजं कर्म वेदना बुद्धिरेव च ॥५६ ॥

नैकः प्रवर्तते कर्तुं भूतात्मा नाश्नुते फलम् । संयोगाद्वर्तते सर्वं तमृते नास्ति किञ्चन ॥५७ ॥

करण सहकृत आत्मा ही कार्यकारी I मन, बुद्धि, बुद्धीन्द्रिय ( श्रोत्र, घ्राण, चक्षु, रसना स्पर्शन ), कर्मेन्द्रिय ( हस्त पाद गुद्रा उपस्थ, वागिन्द्रिय ) यह कारण हैं । कर्ता का कारणों के साथ संयोग होने पर कर्म, वेदना, बुद्धि ( ज्ञान ) होती है । केवल अकेले जीवात्मा किसी कार्य को करने में प्रवृत्त नहीं होता । भूतात्मा अकेले फल को भी नहीं भोगता । संयोग होने पर सभी कार्य होते हैं यदि संयोग न हो तो कोई कार्य नहीं हो सकता ॥ ५६-५७ ॥ विमर्श - इसी भाव को सांख्यकारिका में इस प्रकार बताया है, यथा - ' पुरुषस्य दर्शनार्थ कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य | परवन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ ' प्रकृति - पुरुष इन दोनों के संयोग होने पर ही सृष्टि प्रारम्भ होती हैं इसलिए २४ तत्त्व को अचेतन माना है एक अव्यक्त परमात्मा का संयोग होने पर ही राशि पुरुष में चेतनता आती है जो प्रत्येक कार्यों को करने में समर्थ होता है । न ह्येको वर्तते भावो वर्तते नाप्यहेतुकः । शीघ्रगत्वात्स्वभावात्वभावो न व्यतिवर्तते ॥५८ ॥

कोई भाव अहेतुक नहीं - भाव ( कारण ) पदार्थ अकेला ( जब अपने सहकारी कारण रूप सामग्री से शून्य होता है तब ) कार्य करने में प्रवृत्त नहीं होता । भाव पदार्थ बिना हेतु का नहीं होता । अभाव शीघ्रग स्वभाव होने से अपने शीघ्रग स्वभाव को नहीं छोड़ता ॥ ५८ ॥

विमर्श - पदार्थ भाव और अभाव दो प्रकार के माने गये है । भाव उसे कहते हैं जो उत्पत्ति-शील हो, जो भी उत्पत्तिशील पदार्थ होता हैं वे सभी सकारण होते हैं । पुरुष की उत्पत्ति होती है, उसका कारण मोह, इच्छा, द्वेष है, इस उत्पत्तिधर्मा पुरुष को सामग्री साकल्य होने पर ही ज्ञान की उत्पत्ति होती है । वह सामग्री है, इन्द्रियाँ, विषयों का संयोग, मन का संयोग । सभी का कोई भी कार्य नहीं होता । पदार्थ ( कार्य ) कारण युक्त होते हैं और बिना कारण ( हेतु ) नैयायिकों के यहाँ अभाव भी पदार्थ माना गया हैं अतएव वह भी सकारण ही होगा । इस सन्देह पर उसका निराकरण किया गया है कि अभाव बहुत ही शीघ्र बीतता है अतः परिलक्षित नहीं होता जो परिलक्षित नहीं होता उसका कारण भी नहीं बन सकता । अतः अभाव शीघ्रग स्वभाव होने से अहेतुक माना जाता है । अभाव का विचार करते समय सूत्रस्थान अ ० १६ में ' उत्पत्तिहेतुर्भावां न निरोधेऽस्ति कारणम् ' से उत्पत्ति में कारण माना है पर अभाव में कारण नहीं मान कर उसे स्वभावतः होना ही माना है । * अनादिः पुरुषो नित्यो विपरीतस्तु हेतुजः । सदकारणवन्नित्यं दृष्टं हेतुजमन्यथा ॥ ५ ९ ॥

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कतिधापुरुषीयशारीराध्यायः १ ] शारीरस्थानम् ८१५ ( ५ ) प्रश्न: पुरुष नित्य है या अनित्य ( स नित्यः किं किमनित्यो निद-शित:? ), इसका उत्तर-अनादि ( अव्यक्त, आत्मा, परमात्मा ) पुरुष नित्य है । हेतुज अर्थात् मोह, इच्छा, द्वेष, धर्म, अधर्म से उत्पन्न होने वाला राशि पुरुष विपरीत अर्थात् अनित्य माना जाता है, जो सत् हो अर्थात् सत्ता वाला हो पर कारण वाला न हो अर्थात् उसका कारण कोई न हो उसे ' नय कहते हैं । हेतु ( कारणों ) से उत्पन्न पुरुष सत्ता वाला होते हुए सकारण है अतः अनित्य है ॥ ५ ९ ॥ विमर्श - ग्रन्थकार अनादि पुरुष को ही नित्य मानते हैं और उसे ही पुष्ट करने के लिये शास्त्रान्तर वैशेषिक आदि के मतों का भी उल्लेख किये हैं । ' सदकारणवन्नित्यम् । ' यह वैशेषिक का सूत्र हैं ठीक उसे ही श्लोक का तीसरा पाद बना कर अनादि पुरुष के नित्यत्व में प्रमाण रखा हैं । ' असा इदमग्र आसीत्, ततो वै सदजायत । तदात्मानं स्वयमकुरुत तस्मात् तत् सुकृत-मुच्यते ॥ इमसे परम सूक्ष्म चेतना धातु जो प्रथम उत्पन्न हुई उसे अनादि और नित्य माना है और वही जगत् का कारण है, नित्य है । सुश्रुत शारीर अ. १ • भी ' सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणम् ' से अव्यक्त को सबका कारण और उसका कोई कारण नहीं है, ऐसा माना है । सुश्रुत ने अव्यक्त शब्द से प्रकृति और पुरुष दोनों का ग्रहण किया है । * तदेव भावादग्राह्यं नित्यत्वं न कुतश्चन । भावाज्ज्ञेयं तदव्यक्तमचिन्त्यं व्यक्तमन्यथा ॥ ६० ॥

आत्मा में नित्यत्व की कल्पना - वह जो सत् और अकारण है नित्य होने के कारण भाव से ( जो उत्पत्ति धर्मा है उनसे ) अग्राह्य है । उसका नित्यत्व किसी भी उत्पत्ति धर्मवाले भाव से नहीं होता । ( उस नित्य पुरुष को अव्यक्त, अचिन्त्य कहते हैं । इस अव्यक्त से जो भिन्न है उसे व्यक्त कहते हैं ) ॥ ६० ॥

विमर्श - जो नित्य होना है उसकी उत्पत्ति नहीं होती अतः वह उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थों से पहले रहता है । इसीलिए उत्पन्न होनेवाले पदार्थों से और मन से भी वह नहीं जाना जाता है । जो उत्पत्तिधर्मा पदार्थों से और मन से जाना जाता है । उसे व्यक्त कहते हैं । * अव्यक्तमात्मा क्षेज्ञत्रः शाश्वतो विभुरव्ययः । तस्माद्यदन्यत्तद्व्यक्तं वच्यते चापरं द्वयम् ॥ व्यक्तमैन्द्रियकं चैव गृह्यते तद्यदिन्द्रियैः । अतोऽन्यत् पुनरव्यक्तं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ और भी - वह आत्मा, अव्यक्त, क्षेत्रज्ञ, शाश्वत, विभु, अव्यय कहा जाता है । इससे भिन्न जो होता है । उसे व्यक्त कहते हैं । ( अर्थात् जो भावों से जाना न जा सके और जो क्षेत्र ( शरीर ) को जानता है, जो शाश्वत ( नित्य ), व्यापक, जिसका कभी नाश नहीं होता, उसे ही अव्यक्त माना जाता है । ) दूसरे प्रकार से अव्यक्त व व्यक्त का भेद कह रहे हैं । जिसका इन्द्रियों से ग्रहण किया जाता है उसे व्यक्त और ऐन्द्रियक कहा जाता है । इससे भिन्न जो होता उसे अव्यक्त कहा जाता है । अव्यक्त अतीन्द्रिय होता है । केवल लिंग के द्वारा उसका ज्ञान होता है ॥ ६१-६२ ॥ विमर्श - अव्यक्त आत्मा को या प्रकृतिपुरुष को कहा जाता है । सांख्य प्रकृति को ही सृष्टि का कारण मानता है । पुरुष सहायक होता है । वेदान्त वाले पुरुष ब्रह्म को ही सृष्टि का कारण मानते हैं । परन्तु यहाँ अव्यक्त पद से प्रकृति का और सहायक आत्मा इन दोनों को लिया जाता है । पुरुष नित्य है या अनित्य? इस प्रश्न के उत्तर में अव्यक्त शब्द से आत्मा ही लिया जाता है और व्यक्त पद से राशि पुरुष लिया जाता है । अव्यक्त पुरुष को नित्य और व्यक्त पुरुष को अनित्य माना है । राशि पुरुष का ग्रहग इन्द्रिय द्वारा होता

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८१६ चरकसंहिता है । और अव्यक्त पुरुष का केवल लिंग अर्थात् अनुमान द्वारा ज्ञान किया जाता है । जैसे संसार में जितने कार्य होते हैं उसका कारण अवश्य होता है । उसी प्रकार इतने बड़े जगत् काकर्ता कोई अवश्य होगा है । यह कल्पना कर अव्यक्त आत्मा सिद्ध की जाती हैं । सांख्य-कारिका में - ' हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकाश्रितं लिंगम् । सावयवं परतन्त्रं व्यक्तं विपरीत-मव्यक्तम् ॥ ' खादीनि बुद्धिव्यक्तमहङ्कारस्तथाऽष्टमः । भूतप्रकृतिरुद्दिष्टा विकाराचैव षोडश ॥ ६३ ॥

बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च । समनस्काश्च पञ्चार्था विकारा इति संशिताः । प्रश्न: ( ६ ) प्रकृति और ( ७ ) विकृति किसे कहते हैं? ( प्रकृतिः का विकाराः के? ), इसका उत्तर-खादि ( आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी आदि पञ्चमहाभूत के सूक्ष्म ( तन्मात्रायें ) अंश ), बुद्धि ( महान ), अव्यक्त ( मूलप्रकृति ), अहंकार यह आठ भूत प्रकृति कहे जाते हैं । विकार १६ होते हैं । ५ बुद्धीन्द्रिय अर्थात् ज्ञानेन्द्रिय ( श्रोत्र, स्पर्शन, चक्षु, रसन और प्राण ), पाँच कर्मेन्द्रिय ( हस्त, पाद, गुदा, मेड़, वाक् ) मन के साथ पाँच अर्थ ( शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध या पञ्चमहा-( भूत ), इन्हें विकार कहा जाता है ॥ ६३-६४ ॥ विमर्श - आयुर्वेद पञ्चमहाभूत से ही इन्द्रियों, तन्मात्राओं की उत्पत्ति मानता है और दर्शन अहंकार से इन्द्रियाँ और पंचतन्मात्रायें और तन्मात्राओं से पंचमहाभूत की उत्पत्ति मानता है । अतः खादि से सूक्ष्म पंचमहाभूत का ही ग्रहण किया जाता है । प्रकृति दो प्रकार की मानी गई है, एक मूलप्रकृति दूसरी भूतप्रकृति । मूलप्रकृति को अव्यक्त माना जाता है । इसे ही मुश्रुत ने - ' सर्व-भूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूपस्य अखिलस्य जगतः संभवहेतुरव्यक्तं नाम " अव्यक्त बताया है । दूसरी प्रकृति, स्थावर और जंगमभूत मात्र को उत्पन्न करने वाली अव्यक्त, महान्, अहंकार, सूक्ष्म पंचमहाभूत इन आठों को भूतप्रकृति कहते है, अव्यक्त को छोड़ कर सात को प्रकृति - विकृति कहा जाता है । इस तथ्य को सांख्यकारिका में स्पष्ट रूप से बताया है । यथा -- ' मूलप्रकृतिर विकृतिर्महादाद्याः प्रकृतित्रिकृतयः सप्त । ' * इति क्षेत्रं समुद्दिष्टं सर्वमव्यक्तवर्जितम् । अव्यक्तमस्य क्षेत्रस्य क्षेत्रज्ञमृपयो विदुः || ६५ || क्षेत्रज्ञ का स्वरूप -- अव्यक्त ( पुरुष ) से रहित सभी भूतप्रकृति और विकार को क्षेत्र कहा जाता है । ऋषि लोग इस क्षेत्र को जानने वाले क्षेत्रज्ञ आत्मा को अव्यक्त जानते हैं या इस प्रकार क्षेत्र के जानने वाले अव्यक्त आत्मा को केवल ऋषि लोग अपने त्रिकाल में अव्याहत योग ज्ञान से जानते हैं ॥ ६५ ॥

* जायते बुद्धिरव्यक्ताद् बुद्ध्याऽहमिति मन्यते । परं खादीन्यहङ्कारादुत्पद्यन्ते यथाक्रमम् ॥ ततः संपूर्ण सर्वाङ्गो जातोऽभ्युदित उच्यते । सृष्टि का स - अव्यक्त से वुद्धितत्त्व की उत्पत्ति होती है ( जिसे सुश्रुत ने महान् की संज्ञा ढी है ), बुद्धित्तत्त्व से अहंकार उत्पन्न होता है । अहंकार से सूक्ष्म पंचमहाभूत क्रम से उत्पन्न होते है । तव सम्पूर्ण अंग की उत्पत्ति होने पर ' जातः ' अर्थात् उत्पन्न हो गया ऐसा कहा जाता है || ६३ ॥ विमर्श - यह उत्पत्ति क्रम महाप्रलय के बाद जब सृष्टि की प्रथम रचना होती है तो इसी क्रम से होती है । सांख्य में इसी क्रम का - ' प्रकृतेर्म हाँस्ततोऽहंकारस्तस्माद् गणय पोडशक: ' से निर्देश किया है । यहाँ पर यथाक्रम का तात्पर्य यह है कि अव्यक्त से बुद्धि, बुद्धि से अहंकार, १. ' खादीन्यहङ्कार उपादत्ते ' इति पा ।

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कतिधापुरुषीयशारीराध्याय: १ ] शारीरस्थानम् ८१७ अहंकार से सूक्ष्म पंचमहाभूत, उससे पंचतन्मात्रायें और ११ इन्द्रियां उपन्न होती हैं । सांख्य में अहंकार का वैकृतभूनादिसात्त्विक तीन भेद माना है यथा- ' वैकृतात् सात्त्विकादहंकारात्तैजस-सहायादेकादशेन्द्रियाणि भवन्ति भूतादेस्त्वहंकारात्तैजससाहाय्यात् पञ्चतन्मात्राणि ' तथा ' सात्त्विक एकादशत्रः प्रवर्तने वैकृतादहंकारात् । भूतादेस्तन्मात्राः सतामसत्तैजसादभवन् ॥ ' ( सां. का. २५ ) अहंकार के कार्य के बाद तन्मात्रा से स्थूल महाभूत की उत्पत्ति मानी है । इनके मत से इन्द्रियाँ

आहंकारिक मानी जाती हैं । पर आयुर्वेद की दृष्टि से वे भौतिक मानी जाती हैं ।

* पुरुषः प्रलये चेष्टैः पुनर्भावैवियुज्यते ॥ ६७ ॥

अव्यक्ताव्यक्ततां याति व्यक्तादव्यक्ततां पुनः । रजस्तमोभ्यामाविष्टश्वक्रवत् परिवर्तते ॥ येषां द्वन्द्वे परा सक्तिरहङ्कारपराश्च ये । उदयप्रलयौ तेषां न तेषां ये त्वतोऽन्यथा ॥ ६ ९ ॥ प्रलय का निरूपण - वह पुरुष प्रलय काल में पुनः अपने इष्ट भाव ( आठ भूत प्रकृति ( और सोलह विकार ) से रहित हो जाता है । इस प्रकार अव्यक्त से उत्पत्ति काल में व्यक्त होता है । प्रलय काल में व्यक्त से अव्यक्त हो जाता है । इस प्रकार पुरुष का व्यक्त से अव्यक्त और अव्यक्त से व्यक्त की परम्परा रज और तम से युक्त होने के कारण चक्र की तरह चलती रहती है । जिन मनुष्यों की रज और तम इन दोनों में अत्यन्त आसक्ति है या जो लोग अहंकार में पड़े हुये हैं । उन्हीं लोगों के लिये उदय और प्रलय है । जो लोग रज व तम से विमुक्त हैं, अहंकार से भी रहित हैं उन लोगों का उदय ( जन्म ) व प्रलय ( मृत्यु ) नहीं होता || ६७- ६ ९ ॥ विमर्श - यहाँ उदय से जन्म, प्रलय से मृत्यु लिया गया है । जन्म मृत्यु का कारण — रज और तम दोनों जब तक मन से सम्बन्धित रहते हैं और उसके अनुसार बन्धन में पड़ने वाला कार्य मन करता है और उसी के अनुसार आत्मा का बंधन होता है । इसीलिये जबतक रज, तम से युक्त मन रहता है तो चक्र की तरह यह पुरुष भ्रमण करता रहता है । अर्थात् जब तक कि महाप्रलय नहीं हो जाता । कभी मृत्यु कभी जन्म प्राप्त करता रहता है ।यहाँ प्रकृति से सृष्टि का निर्देश किया गया है । महाप्रलय होने पर प्रकृति में हो सभी वस्तुओं का लय होता है । पुरुष प्रलय काल में अर्थात् मृत्यु काल में बुद्धि इत्यादि तत्त्वों से अलग हो जाता है और पुनः जन्म होने पर उनसे संयोग कर लेता है । कुछ लोग इस बात को नहीं मानते हैं । महाप्रलय काल में जब संसार में कुछ नहीं रह जाता तब या मोक्ष की अवस्था में बुद्धि आदि से रहिन पुरुष होता है । क्योंकि - ' अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैरात्मा कदाचिन्न विमुक्तपूर्वः । नैवेन्द्रियैनैव-मनोमतिभ्यां न चाप्यहंकारविकारदोषैः । सांख्य कारिका में भी ' पूर्वोत्पन्नमशक्तं नियतं महदादि-सूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् । ' ( सा. का. ४० ) । इमसे यह सिद्ध हो । है कि महाप्रलय होने पर प्रकृति में लय होता है । और प्रथम सृष्टि होने पर प्रकृति से हो महदादि की सृष्टि होती है । उत्पत्ति के समय प्रकृति से महान् ( बुद्धितत्व ), महान् से अहंकार, अहंकार से सूक्ष्म पंचमहाभूत और सूक्ष्म पंचमहाभूत से पाँच तन्मात्रायें व ग्यारह इन्द्रियाँ उत्पन्न होती है । सांख्य मत से अहंकार के तीन भेद वैकृत सात्त्विक से ११ इन्द्रियाँ, भूनादि और वैकृत रज तम की सहायता से पंचतन्मात्रायें और उनसे ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ) उनसे स्थूल पंचमहाभूत की उत्पत्ति होती है । प्रलय होने पर पंचमहाभूत पंचतन्मात्रा में, तन्मात्रा व इन्द्रियाँ अहंकार में, अहंकार बुद्धि में, बुद्धि प्रकृति में लीन हो जाती है, आयुर्वेद दृष्टि से इन्द्रियाँ और पंचतन्मात्रायें अर्थ ( पंचमहाभूत ) में, पंचमहाभूत अहंकार में अहंकार बुद्धि में, बुद्धि प्रकृति में मिल जाती है । मोक्ष के समय में भी सृष्टि के लय का क्रम यही रहता है । पर मोक्ष हुई आत्मा का प्रकृति पुनः सृष्टि के आदि में सृष्टि नहीं करती, इतना भेद होता है । ५२ च ० सं ०

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८१८ चरकसंहिता * प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः । इन्द्रियान्तरसंचारः प्रेरणं धारणं च यत् ॥ देशान्तर गतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा । दृष्टस्य दक्षिणेनाच्णा सव्येनावगमस्तथा ॥ ७१ ॥

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयतश्चेतना धृतिः । बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥ यस्मात् समुपलभ्यन्ते लिङ्गान्येतानि जीवतः । न मृतस्यात्मलिङ्गानि तस्मादाहुर्महर्षयः ॥ ( ८ ) प्रश्न: अव्यक्त पुरुष के क्या लक्षण हैं? ( किं लिङ्गं पुरुषस्य च? ), इसका उत्तर--प्राणवायु, अपानवायु का चलना, निमेष, उन्मेष, जीवन, मन की गतियाँ इन्द्रियान्तर - संचार ( जैसे मन का एक इन्द्रिय को छोड़कर दूसरे इन्द्रिय में चला जाना ), मन का इन्द्रियों को कार्य करने की प्रेरणा ( आज्ञा ) देना और इन्द्रियों को कार्य करने से धारण करना ( रोकना ), स्वप्न में देशान्तर में गमन करना, शरीर में पञ्चभूतमात्र का रह जाना ( अर्थात् मृत्यु का होना ), दक्षिण नेत्र से देखी वस्तु को वाम नेत्र से भी यह वही वस्तु है ऐसा ज्ञान करना और इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, प्रयत्न, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मरण शक्ति, अहङ्कार का होना ये पुरुष ( परमात्मा ) के लक्षण हैं । इस कारण से ये प्राणापान आदि लक्षण जीवित प्राणियों में ही प्राप्त होते हैं, मृत प्राणियों में नहीं । इसलिए महर्षिगण इन्हें आत्मा का लक्षण मानते हैं ॥ ७०-७३ ॥ विमर्श - गौतम ने तथा कणाद ने भी आत्मा ( पुरुष या परमात्मा ) के यही लक्षण बताया है, यथा-- ' इच्छाद्वेषसुखदुःखप्रय लज्ञानान्यात्मनो लिङ्गानि, ' प्राणापानौ निमेषोन्मेषजीवनमनो-गतीन्द्रियान्तरसञ्चारा बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि । ' इस प्रकार चरक, गौतम और कणाद ने परमात्मा या आत्मा का जो लक्षण बताया है, उन सबका तात्पर्य जीवित शरीर से ही है । शरीरं हि गते तस्मिञ् शून्यागार मचेतनम् । पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते ॥७४ ॥

पञ्चत्व की परिभाषा- - जब शरीर से आत्मा निकल जाती हैं तब यह शरीर शून्यागार और अचेतन हो जाता हैं, आत्मा के चले जाने पर पाँचमहाभूत शरीर में रह जाते हैं अतः इसे पञ्चत्व प्राप्त हो गया ऐसा कहा जाता हैं ॥ ७४ ॥

* अचेतनं क्रियावच्च मनश्चेतयिता परः । युक्तस्य मनसा तस्य निर्दिश्यन्ते विभोः क्रिया ॥

चेतनावान् यतश्वात्मा ततः कर्ता निरुच्यते । अचेतनत्वाच्च मनः क्रियावदपि नोच्यते ॥

( ६ ) प्रश्न: आत्मा निष्क्रिय होते हुए भी सक्रिय कैसे? ( निष्क्रियस्य क्रिया तस्य भगवन् विद्यते कथम्? ), इसका उत्तर-मन अचेतन ( ज्ञानशून्य ) है और क्रिया करने वाला है, आत्मा ( पर ) चेतना देने वाला है । उस विभु व्यापक आत्मा का जब मन से संयोग होता है तब उसकी ही क्रियायें कहलाती है ( आत्मा के संयोग से ही कार्य होता है अतः आत्मा का ही कार्यं उपचार से कहा जाता है ), आत्मा चेतन है इसलिए कर्ता कहा जाता है क्रिया करने वाला भी मन अचेतन होने से कर्ता नहीं कहा जाता है ॥ ७५-७६ ॥ विमर्श - मन अचेतन और क्रियाशील है । आत्मा क्रियाशून्य चेतनता प्रदान करने वाली होती है और चेतनता प्रदान करने के कारण आत्मा कर्ता कही जाती है । वस्तुतः आत्मा तो रहती ही है, परन्तु सभी क्रिया मन के द्वारा होती है, पर यदि आत्मा मन में चेतनता न प्रदान करे तो निष्क्रिय मन भी क्रियायुक्त न होगा, अतः मन से किए गए कर्म के फल का भोक्ता और कर्ता आत्मा ही कही जाती है ।

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कतिधापुरुषीय शारीराध्यायः १ ] शारीरस्थानम्

यथास्वेनात्मनाऽऽत्मानं सर्वः सर्वासु योनिषु ।

प्राणैस्तन्त्रयते प्राणी नान्योऽस्यस्य तन्त्रकः ॥ ७७ ॥

८१६ ( १० ) प्रश्न: स्वतन्त्र आत्मा इच्छा के विपरीत परतंत्र ( अनिष्ट ) योनि में क्यों जन्म लेती है ( स्वतन्त्रश्चेदनिष्टासु कथं योनिषु जायते? ), इसका उत्तर-सभी प्राणी अपने - अपने कर्म के अनुसार ( स्वयं ) आत्मा को सभी नीच ऊँच योनियों में प्राण से युक्त करता है, अन्य दूसरा कोई उसका तन्त्रक अर्थात् नियामक नहीं है || ७७ || विमर्श - आत्मा की स्वतन्त्रता केवल कार्य करने में है । चाहे तो वह अच्छा कार्य करें चाहे तो बुरा कार्य करे । पर कार्य करने पर अनुबन्ध होता है ही, यथा - ' यः कर्तारमवश्यमनुबध्नाति कार्यादुत्तरकालं कार्यनिमित्तः शुभो वाप्यशुभो वा अनुबन्धः । ' अर्थात् जो कार्य करने के बाद कर्ता को अवश्य ही प्राप्त होता है उसे अनुबन्ध कहते हैं । और वही उसी के अनुसार अनिष्ट योनि में जाता है । बताया भी है - ' अन्त्य पक्षिस्थावरतां मनोवाक्कायकर्मजैः । दोषैः प्रयानि जीवोऽयं भवयोनिशतेष च ॥ ' वशी तत् कुरुते कर्म यत् कृत्वा फलमश्नुते । वशी चेतः समाधत्ते वशी सर्वं निरस्यति ॥ ( ११ ) प्रश्न: वशी आत्मा दुःखकर भावों से बलात् क्यों आक्रामित होती है? ( वशी यद्यसखैः कस्माद्भावैराक्रम्यते बलात्? ), इसका उत्तर-वशी आत्मा वही कर्म करता है जिसे कर के स्वयं फल भोगता है । वशी आत्मा मन को समाधिस्थ कर लेता है. वशी आत्मा सभी वस्तुओं को त्याग देता है ॥ ७८ ॥

विमर्श -- वशी का तात्पर्य यह है कि उत्तम फल भोगने की इच्छा होने पर उत्तम कार्य करता है । निकृष्ट फल भोगने की इच्छा से निकृष्ट कार्य करना है । कार्य करने के बाद शुभ या अशुभ फलों को स्वयं भोगता है । जब शुभ या अशुभ भात्रों को भोगने की इच्छा नहीं रहती है तब आत्मा चञ्चल मन को समाधिस्थ कर लेता है जिससे शुभ या अशुभ कार्य नहीं करता, जिससे उसका फल भोगना पडे । ऐसी दशा में वशी आत्मा सभी शुभ - अशुभ भावों को त्याग देता है, क्योंकि मनके संयोग से ही कार्य होता है । समाधिस्थ होने पर मन की वृत्तियाँ रुक जाती हैं फलतः रज और तम से मन मुक्त हो जाता है । अतः सभी वस्तु को आत्मा त्याग देती है यही आत्मा का वशित्व है और त्याग से मोक्ष को प्राप्त होता है । यदि आत्मा वशी न होता तो मन को विषयों से हटाकर समाधिस्थ नहीं कर सकता था । और न वह रज तम से पृथक होकर मोक्ष की तरफ अग्रसर हो सकता । इस प्रकार वह कर्म करने में वशी है पर फल भोगने में उसे वशी नहीं माना जाता क्योंकि ‘ प्रारब्धकर्मण उपभोगादेव क्षयः ' यह नियम है ।

देही सर्वगतोऽप्यात्मा स्वे स्वे संस्पर्शनेन्द्रिये ।

सर्वाः सर्वाश्रयस्थास्तु नात्माऽतो वेत्ति वेदनाः ॥ ७ ९ ॥

( १२ ) प्रश्न: सर्वगत आत्मा सम्पूर्ण वेदनाओं का अनुभव क्यों नहीं कर पाती है? ( सर्वाः सर्वगतत्वाच्च वेदनाः किं न वेत्ति सः? ), इसका उत्तर— आत्मा सर्व व्यापक होते हुए देही अर्थात् देह में रहते हुए अपने - अपने विषयों को ग्रहण करने वाली स्पर्शगम्य इन्द्रियों ( इन्द्रिय समूह शरीर ) से सम्बन्ध स्थापित करता है । अतः आत्मा, सर्व शरीर में होने वाली सब वेदनाओं को नहीं जानती ॥ ७ ९ ॥ १. ' देहे सर्वगतश्वात्मा ' इति पा. ।

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८२० चरकसंहिता विमर्श- - आत्मा करण ( इन्द्रियों ) से संयुक्त होने पर ही ज्ञानी होता है वह जब जिस इन्द्रिय से संयोग करता है तब तदिन्द्रियग्राह्यविषय का ही ज्ञान करता है इसलिए व्यापक होते हुए भी सभी प्राणिमात्र के शरीर में होने वाली वेदना दुःख का ज्ञान नहीं करता । इस लिए पर शरीर की इन्द्रियों से संयुक्त न होने के कारण आत्मा अपने से इतर शरीर की वेदनाओं को नहीं जानता ।

विभुत्वमत एवास्य यस्मात् सर्वगतो महान् ।

मनसश्च समाधानात् पश्यत्यात्मा तिरस्कृतम् ॥ ८० ॥

( १३ ) प्रश्न: पर्वतादि विभु आत्मा के देखने में बाधक क्यों? ( न पश्यति विभुः कस्माच्छैलकुड्यतिरस्कृतम्? ), इसका उत्तर— यतः यह आत्मा सर्वगत और महान है इसलिए आत्मा में व्यापकत्व है । यह आत्मा जब मन को समाधिस्थ कर लेना है तब पर्वत या दिवाल से छिपी वस्तु का भी ज्ञान कर लेता है | विमर्श - विकाररहित आत्मा व्यापक एवं मह न है पर वही आत्मा अपने कर्त्तव्यों के अनु-सार शरीरी बन जाती है तब व्यापक होती हुई देहगतव्याप्य होने से पर्वत, दीवाल या अन्य किसी आवरक वस्तु के होने से विषयों का ज्ञान नहीं करती । क्योंकि ज्ञान में वस्तु का सन्निकर्ष अपे-क्षित होता है, पर वही आत्मा योग मार्ग में प्रवृत्त होकर मन को समाधि की अवस्था में लाती है तो देहगतव्याप्य होने पर भी सभी समीप या दूर स्थित या ढकी हुई वस्तु को जान लेती है,

अतः योगी त्रिकालदर्शी एवं अवाधिन ज्ञान - सम्पन्न होते हैं । 1

नित्यानुबन्धं मनसा देहकर्मानुपातिना । सर्वयोनिगतं विद्यादेकयोनावपि स्थितम् ॥८१ ॥

और का नित्य भी - - विशिष्टदेह और विशेष कर्म का अनुसरण करने वाले मन से आत्मा अनुबन्ध ( सम्बन्ध ) है इस प्रकार की आत्मा को अनेक योनियों में रहने पर भी एक योनि में स्थित है, ऐसा जानना चाहिए ॥ ८१ ॥

आदिर्नास्त्यात्मनः क्षेत्रपारम्पर्यमनादिकम् । अतस्तयोरनादित्वात् किं पूर्वमिति नोच्यते ॥ ( १४ ) प्रश्न: आत्मा ( क्षेत्रज्ञ ) और शरीर ( क्षेत्र ) इसमें पहले उत्पत्ति किसकी? ( क्षेत्रज्ञः क्षेत्रमथवा किं पूर्वमिति संशयः? ), इसका उत्तर-आत्मा की आदि ( उत्पत्ति - काल ) नहीं है, और क्षेत्र ( शरीर ) की परम्परा भी अनादि है अतः पहले क्षेत्र हैं या क्षेत्रज्ञ यह नहीं कहा जा सकता ॥ ८२ ॥

विमर्श - ' इदं शरीरं कौन्तेय! क्षेत्रभित्यभिधीयते ' से शरीर को क्षेत्र कहते हैं और आत्मा इस शरीर रूपी क्षेत्र को जानता है अतः उसे क्षेत्रज्ञ कहा जाता है । तो पहले यदि क्षेत्र हो तब बाद में क्षेत्र को जानने वाली आत्मा होनी चाहिए । पर ऐसा कहने से आत्मा सादि एवं अनित्य हो जायगा और शरीर नित्य हो जायगा, दूसरी बात यह है कि यदि आत्मा पहले नहीं है तब शरीर की उत्पत्ति ही सम्भव नहीं है क्योंकि इष्टानिष्ट कर्म के अनुसार आत्मा इष्ट या अनिष्ट शरीर मनुष्य । शूकर और कुकर आदि का धारण करता है आत्मा के अभाव में शरीर की सत्ता रहनी ही नहीं है बिना शरीर के आत्मा की अनुभूति भी नहीं होती है । अतः जिस प्रकार बिना अङ्कुर के बीज नहीं होता और बिना बीज के अङ्कुर नहीं होता यह देख कर बीज अङ्कुर इस परम्परा को अनादि मान कर कौन पहले है यह विचार नहीं किया जाना उसी प्रकार सृष्टि की परम्परा में आत्मा और शरीर सम्बन्ध की परम्परा भी अनादि है अतः आत्मा पहले है या शरीर इसका विचार नहीं किया जाता है ।

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कतिधापुरुषीयशारीराध्याय: १ ] शारीरस्थानम्

ज्ञः साक्षीत्युच्यते नाज्ञः साक्षी त्वात्मा यतः स्मृतः ।

सर्वे भावा हि सर्वेषां भूतानामात्मसाक्षिकाः ॥ ८३ ॥

८२१ ( १५ ) प्रश्न: आत्मा साझी किसका? ( साक्षिभूतश्च कस्यायं कर्त्ता न्यो न विद्यते? ), इसका उत्तर ---जो ( 5 ) ज्ञानी होता है वही साक्षी होता है न कि ( अ ) अज्ञानी । आत्मा ही ज्ञ है अर्थात् ज्ञानी है अतः आत्मा को साक्षी माना जाता है । सभां भूतों के सभी भाव ( कार्य ) आत्मा की साक्षी में ही होते हैं ॥ ८३ ॥

विमर्श - साक्षी ' गवाह, को कहा जाता है जब आत्मा के पूर्व कोई वस्तु नहीं है तब वह गवाह किसका है इस प्रश्न पर उत्तर दिया गया है कि कार्य के पूर्व जो सदा वर्तमान है वह होने वाले कार्य स्वरूप पञ्चमहाभूतों का साक्षी ( गवाह ) तो होगा ही क्योंकि सभी की उत्पत्ति को देखता है । आयुर्वेद ' खादयश्चेतनाषष्ठा धातत्र पुरुषः स्मृतः ' से पञ्चमहाभूत और आत्मा के संयोग को ह्री पुरुष माना है, अतः आत्मा के साक्षित्व में भूतों का सभी कार्य होता है, ऐसा अर्थ बताया गया, दूसरे राशि पुरुष के २४ तत्त्वों में महदादि भाव आत्मा के साक्षी में होते हैं, ऐसा समझना चाहिए । मनु ने भी बताया है - ' यो s स्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते । यः करोति तु कर्माणि स भूतात्मोच्यते बुधैः ॥ ' जैकः कदाचिद्भूतात्मा लक्षणैरुपलभ्यते । विशेषोऽनुपलभ्यस्य तस्य नैकस्य विद्यते ॥८४ ॥

संयोगपुरुषस्येष्टो विशेषो वेदनाकृतः । वेदना यत्र नियता विशेषस्तत्र तत्कृतः ॥ ८५ ॥

( १६ ) प्रश्न: निर्विकार आत्मा को सुख - दुःख का अनुभव कैसे? ( स्या-कथं चाविकारस्य विशेषो वेदनाकृत:? ), इसका उत्तर— कभी भी एक भूतात्मा अर्थात् पञ्चमहाभूत से रहित केवल जीवात्मा लक्षगों से प्राप्त नहीं होती है, उस अकेली ( भूतरहित जिसका लक्षणों से ज्ञान नहीं होता ऐसी निर्विकार ) आत्मा ( परमात्मा ) में मुख - दुःखादि विशेष नहीं होते । संयोग पुरुष ( अर्थात् राशि पुरुष ) में वेदनात विशेषता होती है । जिस २४ तत्त्वात्मक शरीर में वेदना ( सुख - दु: खादि ) नियत अर्थात् व्यवस्थित हैं, उस शरीर में ही वेदनाजन्य दीनता या हर्ष नियत रूप से होता है ॥८४-८५ ॥ विमर्श - जब आत्मा २४ तत्त्वों से युक्त होती है तभी उसमें प्राणापानादि, निमेषादि लक्षण होते हैं, यदि इन तत्वों से आत्मा का संयोग न तब उसका कुछ लक्षण नहीं होता अतः न उसका ज्ञान होता है न उसको सुख या दुःख होता है । भूतरहित केवल आत्मा व्यापक और एक है इसी लिए समाधि अवस्था में सभी वेदनाओं सुख - दुःख को जानता है ऐसा कहा गया है । संयोग पुरुषों में वेदनायें भिन्न - भिन्न होती हैं अर्थात् जो वेदना एक शरीर में होती है वही दूसरे शरीर में नहीं होती क्योंकि शरीरावच्छिन्न आत्मा भिन्न - भिन्न होता है और जिस २४ तत्त्वात्मक शरीर में वेदना होती है उसका फल भी उसी शरीर में होता है न कि दूसरे शरीर में ।

चिकित्सति भिषक् सर्वास्त्रिकाला वेदना इति ।

यया युक्त्या वदन्त्येके सा युक्तिरुपधार्यताम् ॥ ८६ ॥

( १७, १८, १६ ) प्रश्न: रोगी की त्रिकाल वेदना में किसकी चिकित्सा होती है? ( अथ चार्तस्य भगवंस्तिसृणां कां चिकित्सति? ) इसका उत्तर-वैद्य त्रिकाल में होने वाली सभी वेदनाओं की चिकित्सा करता है, इस विषय में आचार्य लोग जिन युक्तियों को कहते हैं उस युक्ति को हे अनिवेश! धारण करो ॥ ८६ ॥