चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 911–920
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 911–920
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८२२ चरकसंहिता
पुनस्तच्छिरसः शूलं ज्वरः स पुनरागतः । पुनः स कासो बलवांश्छदिः सा पुनरागता ॥
एभिः प्रसिद्ध वचनैरतीतागमनं मतम् । कालश्चायमतीतानामर्तीनां पुनरागतः ॥ ८८ ॥
तमर्तिकामुद्दिश्य भेषजं यत् प्रयुज्यते । अतीतानां प्रशमनं वेदनानां तदुच्यते ॥ ८ ९ ॥ अतीत काल की वेदनाओं की चिकित्सा करने में युक्ति लोक में ऐसा कहा जाता है । कि वह शिर का शूल पुनः आ गया, वह ज्वर फिर आ गया, वह बलवान् कास पुनः आ गया, वह छदिं ( वमन ) फिर आ गयी; इन प्रसिद्ध वचनों से अतीत का आगमन होता है । बीती हुई वेदनाओं का समय फिर आ गया है, अतएव उस बीती हुई वेदना के समय को ध्यान में रख कर जो औषध प्रयोग किया जाता है, वह बीती हुई वेदना की चिकित्सा कही जाती है ॥ ८७-८९ ॥ विमर्श - तात्पर्य यह है कि किसी व्यक्ति को सूर्यावर्त रोग हुआ हो, प्रथम दिन चिकित्सा की गयी हो यदि दूसरे दिन पुनः सिर में वेदना प्रारम्भ हो तो वैद्य के पास जाकर रोगी कहता है कि मुझे फिर वही रोग हो गया जो कल हुआ था, तब वैद्य दूसरे दिन के लक्षणों को ध्यान में रख चिकित्सा करता है । इस प्रकार अतीत रोग की चिकित्सा की जाती है । * आपस्ताः पुनरागुर्मा याभिः शस्यं पुरा हतम् । यथा प्रक्रियते सेतुः प्रतिकर्म तथाऽऽश्रये ॥ पूर्वरूपं विकाराणां दृष्ट्वा प्रादुर्भविष्यताम् । या क्रिया क्रियते साच वेदनां हन्त्यनागताम् ॥ भविष्यद् रोग की चिकित्सा में युक्ति उदाहरण - वह जल फिर न आये जिससे पहले खेती नष्ट हो गई थी । उस जल को रोकने के लिए जैसे बाँध बाँधा जाता है वैसे शरीर में वेदना काल को ध्यान में रख कर चिकित्सा की जाती है । होने वाले रोगों के पूर्वरूप को देखकर जो चिकित्सा की जाती है वह भविष्य रोगों को नष्ट करती है ॥ ९ ० - ९ १ ॥ विमर्श - जैसे- ' ज्वरस्य पूर्वरूपे लब्वशनमपतर्पणं वेति ' ज्वर की पूर्वरूपावस्था में लघु भोजन या उपवास करना आनेवाले भविष्य रोग का नाशक है । & पारम्पर्यानुबन्धस्तु दुःखानां विनिवर्तते । सुखहेतूपचारेण सुखं चापि प्रवर्तते ॥ ९ २ ॥
नसमा यान्ति वैषम्यं विषमाः समतां न च । हेतुभिः सदृशा नित्यं जायन्ते देहधातवः ॥
युक्तिमेतां पुरस्कृत्य त्रिकालां वेदनां भिषक् ।
हन्तीत्युक्तं चिकित्सा तु नैष्ठिकी या विनोपधाम् ॥ ९ ४ ॥
वर्तमान काल के रोगों की चिकित्सा में युक्ति सुख के कारणों का सेवन करने से दुःख का क्रमिक अनुबन्ध ( सम्बन्ध ) नष्ट हो जाता है और सुख की प्रवृत्ति हो जाती है । सम धातुयें विषम नहीं होतीं और विषम धातुयें सम नहीं होतीं । देह की धातुयें हमेशा कारण के अनुरूप ही उत्पन्न होती हैं । इस युक्ति को लेकर ही वैद्य त्रिकाल में होने वाले रोगों को चिकित्सा द्वारा नष्ट करता है - ऐसा कहा है । उपधा ( तृष्णा ) को छोड़ कर जो चिकित्सा होती है वह नैष्ठिकी ( मोक्षदायिनी ) कही जाती है ॥ ९ २ - ९ ४ ॥ विमर्श - सुखहेतूपचार का तात्पर्य यह है कि जब दोषों के सम रखने वाले हेनु का सेवन किया जाता है तब दुःखों की परम्परा नष्ट हो जाती है क्योंकि समहेतु मुख ( आरोग्य ) का कारण होता है । जब एक बार समहेतु के कारण दुःख ( रोग ) नष्ट हो जाता है और आरोग्य की परम्परा चल पड़ती है तो समहेतु का जब तक त्याग नहीं किया जाता तब तक दुःख की परम्परा पुनः नहीं आती । सुख की परम्परा का चलते रहना ही वर्तमान रोग की चिकित्सा है । क्षणिकवादी के सिद्धान्त में द्वितीय क्षण में अपने सदृश वस्तु को उत्पन्न कर वह वस्तु स्वयं नष्ट हो जाती है । नवीन उत्पन्न वस्तु सदृश होने से और वही है, यहइस परम्परा से पूर्व की वस्तु को सत्तावान माना जाता है । उसी प्रकार विषम हेतु के अभाव में समहेतु सेवन से उत्पन्न सुख परम्प-
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कतिधापुरुषीयशारीराध्यायः १ ] शारीरस्थानम् ८२३ या सत्तावान रहता है, यथा- ' जायन्ते हेतुवैषम्याद् विषमा देहधातवः । हेतुसाम्यात् समास्तेषां स्वभावोपरमस्सदा ॥ ' अर्थात् देह धातु हेतु के सदृश होती हैं । विषम हेतु से धातुयें विषम होकर रोग उत्पन्न करती हैं । समहेतु से धातुयें सम रहकर आरोग्य ( ' सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ' ) उत्पन्न करती हैं । इस प्रकार दोषों की समता, अतीत काल की दुःख परम्परा को नष्ट कर भूतकाल की चिकित्सा, समता होने से आगे रोग नहीं होता अतः भविष्य काल की चिकित्सा तथा सुख की परम्परा बनी रहने से वर्तमान काल की चिकित्सा का सम्पादन करती है । इस प्रकार ये त्रैकालिक चिकित्सा उपधा ( तृष्णा ) रहित चिकित्सा नैष्ठिकी ( मोक्षदा ) चिकित्सा कही जाती है । उपधा का लक्षण कणाद ने ' भावदोष उपधा, अदोपोऽनुपधा ' अर्थात् जिन दोषों के कारण सृष्टि ( भाव ) का प्रारम्भ होता है या जिन दोषों के कारण संसार स्थिर रहता है उस दोष को उपधा कहा जाता है । ये दोष हैं रज और तम । इन दोनों दोषों से ही संसार चलता है आत्मा का बन्धन होता हैं जैसा कि - ' रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत् परिवर्तते । ' राग - द्वेष से रहित शरीर में की गयी समहेतु के द्वारा त्रैकालिक चिकित्सा दुःख का नाश अवश्य कर देती है । फलस्वरूप का मोक्ष होने के बाद उसके दुःख का अत्यन्ताभाव हो जाता है । अर्थात् भूत - भविष्य वर्तमान काल में की गई चिकित्सा सभी प्रकार के दुःखों को दूर करती है और रज, तम से हीन हो जाने से नोक्षप्रद होती है । * उपधा हि परो हेतुर्दुःखदुःखाश्रयप्रदः । त्यागः सर्वोपधानां च सर्वदुःखव्यपोहकः ॥९ ५ ॥ कोषकारो यथा ह्यंशूनुपादत्ते वधप्रदान् । उपादत्ते तथाऽर्थेभ्यस्तृष्णामज्ञः सदाऽऽतुरः॥९ ६ ॥ यस्त्वग्निकल्पानर्थाञ् ज्ञो ज्ञात्वा तेभ्यो निवर्तते । अनारम्भादसंयोगात्तं दुःखं नोपतिष्ठते ॥ उपधा ही दुःख में कारण - उपधा ही दुःख ( रोग ) और दुःख का आश्रयभूत शरीर की उत्पत्ति में मूल कारण है, सभी प्रकार के उपधाओं का त्याग करना सम्पूर्ण दुःखों का नाशक मान जाता है । जिस प्रकार कोषकार ( रेशम पैदा करने वाला कीट ) वधप्रद अंशुओं ( रेशों ) को स्वयं उत्पन्न करता है । उसी प्रकार मूर्ख पुरुष अर्थों के द्वारा स्वयं तृष्णा को प्राप्त करता है और सदा रोगी ( दुःखभागी ) बना रहता है । जो ज्ञानी पुरुष हैं वे उन विषयों को अग्निसदृश दुःखदायी जान कर उससे निवृत्त हो जाते हैं और पुनः रज तम के अभाव होने के कारण किसी कार्य का आरम्भ नहीं करते । कार्यों के आरम्भ के अभाव से और इसके कारण ही शरीर का संयोग न होने से आत्मा दुःख को नहीं प्राप्त होती ॥ ९ ५ - ९ ७ ॥ विमर्श - रज और तम गुण का मन एवं आत्मा से सम्बन्ध रखना ही उपधा कहा जाता है । इन रज ( राग ) और तम ( द्वेष ) के कारण हो दुःख और शरीर धारण अर्थात् पुनर्जन्म होता है फलतः पुनर्जन्म की परम्परा होने से राग - द्वेष बना रहता है जिससे रोग ( दुःख ) की उत्पत्ति होती रहती हैं । यदि रज, तम का मन से सम्बन्ध छूट जाता है तो सभी दुःख दूर होकर आत्य तिक सुख - मोक्ष प्राप्त होता है, जैसा कि बताया है - ' मोक्षो रजस्तमोऽभावाद्विलवत्कर्म संशयात् । " ( च. शा. अ. १, १४२ ) * धीष्टतिस्मृतिविभ्रंशः संप्राप्तिः कालकर्मणाम् । असात्म्यार्थागमश्चेति ज्ञातव्या दुःखहेतवः ॥ ( २० ) प्रश्न: वेदनाओं के कारण क्या हैं? ( कारणं वेदनानां किम्? ), इसका उत्तर-बुद्धि, धृति ( धारणा शक्ति ) तथा स्मृति ( स्मरण शक्ति ) का अंश हो जाना, ( उचित रूप
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८२४ चरकसंहिता से कार्य न करना ), काल और कर्म की सम्प्राप्ति, असात्म्य अर्थों का आगम ( संयोग होना ) दुःख का कारण होता है ॥ ९ ८ ॥ विमर्श - धी, घृति और स्मृति से प्रज्ञापराव लिया जाता है क्योंकि ये तीनों प्रज्ञा के ही भेद है । काल की सम्प्राप्ति से ऋतु विपरीत का होना, जैसे काल शीन, वर्षा गर्मी, इन तीनों का अतियोग, अयोग और मिथ्या योग की प्राप्ति होना अथवा रोग के समय की प्राप्ति होना, जैसे अन्येद्युष्क का सनय होता है । कर्म की सम्प्राप्ति - किए हुए जन्मान्तरीय पाप की पाकावस्था आने पर होता है । यह केवल कर्मज रोगों के लिए बताया गया हैं असात्म्य अर्थ के साथ बुद्धीन्द्रियों का संयोग होना ( इन्द्रियों से विषयों का अतियोग, मिथ्यायोग, हीनयोग ) दुःख ( रोग ) का कारण होता है । * विषमाभिनिवेशो यो नित्यानित्ये हिताहिते । ज्ञेयः स बुद्धिविभ्रंशः समं बुद्धिर्हि पश्यति ॥ बुद्धिविभ्रंश का लक्षण - नित्य और अनित्य, एवं हितकारी और अहितकारी कर्म, काल और अर्थ बुद्धि का विषम ( विपरीत ) अभिनिवेश करना है उसे बुद्धिविभ्रश कहते हैं, क्योंकि बुद्धि सम अर्थात् जो जैसा है उसे वैसा ही देखती है ॥ ९९ ॥
विमर्श -- बुद्धि के भ्रंश होने से ही मनुष्य नित्य वस्तु को अनित्य, अनित्य को नित्य सम-झता है । हितकारी काल, कर्म, अर्थ को अहितकारी, अहितकारी को हिनकारी समझता है बुद्धि-विभ्रंश से जन्य रोग को अतत्त्वाभिनिवेश कहते हैं । * विषयप्रवणं सत्वं धृतिभ्रंशान्न शक्यते । नियन्तुमहितादर्थाद्धृतिर्हि नियमात्मिका ॥१०० ॥
धृतिभ्रंश का लक्षण - विषय - वासना की ओर प्रवृत्त चित्त ( मन ) को धृतिभ्रंश के कारण अहित अर्थों से रोका नहीं जा सकता क्यों कि धृति ही मन को नियमित करने वाली है || १०० ॥ विमर्श - जब धृतिभ्रंश अर्थात् धीरता का नाश हो जाता हैं तब अतियोगादिकों से मन को रोका नहीं जा सकता तब इनके सेवन से रोगों की उत्पत्ति होती है ।
तत्त्वज्ञाने स्मृतिर्यस्य रजोमोहावृतात्मनः ।
भ्रश्यते स स्मृतिभ्रंशः स्मर्तव्यं हि स्मृतौ स्थितम् ॥ १०१ ॥
स्मृतिभ्रंश का लक्षण - रज एवं मोह ( तम ) से आवृत है चित्त जिसका ऐसे आत्मा वाले जिस पुरुष की तत्त्वज्ञान ( यथार्थज्ञान ) विषयक स्मृति ( स्मरण ज्ञान ) नष्ट हो जाती है । उसे स्मृति-भ्रंश कहा जाता है, क्योंकि यथार्थ स्मृति में स्मरण करने योग्य सभी वस्तुयें आश्रित हैं ॥ १०१ ॥
विमर्श - तात्पर्य यह कि जब स्नरण शक्ति ठीक रहती है तब पूर्वापर का विचार किया जाता है | जिस किसी अतियोगादि कारणों से पूर्वकाल में उत्पन्न दुःखों का स्मरण कर उसे पुनः नहीं किया जाता । हितकारी का स्मरण कर उसे सेवन किया जाता है जिससे दुःख ( रोग ) से छुटकारा रहता है । यदि स्मृतिभ्रंश हो गया तो सभी अतियोगादिकों का सेवन होने से दुःख का कारण होता है । B घोट तिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत् कुरुतेऽशुभम् । प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपगम् ॥ प्रज्ञापराध की परिभाषा - धी, धृ.ते और स्मृति के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तत्र सभी शारीरिक एवं मानसिक दोषों को प्रकुपित करने वाले उस कारण को प्रज्ञापराध कहा जाता है ॥ १०२ ॥
* उदीरणं गतिमतामुदीर्णानां च निग्रहः । सेवनं साहसानां च नारीणां चातिसेवनम् ॥
कर्मकालातिपातश्च मिथ्यारम्भश्च कर्मणाम् विनयाचारलोपश्च पूज्यानां चाभिघर्षणम् ॥
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कतिवापुरुषीयशारीराध्यायः १ ] शारीरस्थानम् ८२५ ज्ञातानां स्वयमर्थानामहितानां निषेवगम् । परमौन्मादिकानां च प्रत्ययानां निषेवणम् ॥ अकालादेशसंचारी मैत्री संक्लिष्टकर्मभिः । इन्द्रियोपक्रमोक्तस्य सद्वृत्तस्य च वर्जनम् ॥ ईमानभयक्रोध लोभमोहमदश्रमाः । तज्जं वा कर्म यत् क्लिष्टं क्लिष्टं यद्देहकर्म च ॥ १०७ ॥
यच्चान्यदीदृशं कर्म रजोमोहसनुत्थितम् । प्रज्ञापराधं तं शिष्टा युक्ते व्याधिकारणम् ॥१०८ ॥
प्रज्ञापराव का विस्तृत वर्णन - • गतिमान मलमूत्र के वेगों को ( जो निकलते न हों पर चलायमान हों तो ) वलाइ निकालने का प्रयत्न करना और आते हुए वेगों को रोक देना, अधिक साहस का सेवन करना, स्त्रियों का सेवन ( मैथुन ) अधिक करना, कर्म के समय की उपेक्षा कर देना, पञ्चकर्म ( वमनादि कर्मों ) का अनुचित रूप में सेवन करना, विनय और सदाचार को छोड़ देना, पूज्य पुरुषों एवं देवताओं का अपमान करना, स्वयं जानते हुए भी अहित अर्थों का सेवन करना, उन्माद उत्पन्न करने वाले कारणों का अधिक सेवन करना, विनासमय अर्थात मध्यरात्रि में, दुर्दिन आदि समयों में ) अदेश ( अर्थात् श्मशान, चैत्य, चत्वर आदि स्थानों ) में भ्रमण करना, नीच र्म करने वालों से मित्रता करना, इन्द्रियोपक्रमणीय नामक अध्याय में बताए सत्तों को न करना, ईर्ष्या, अभिमान, भय, क्रोध, लोभ, मोह, मद और भ्रम का होना और ईर्ष्या आदि मे युक्त होकर निन्दित कर्म करना, या निन्दित शारीरिक कर्म करना और इसी प्रकार के अन्य कर्म जो रज एवं तमोगुण से आविष्ट मन एवं आत्मा के द्वारा किए जाते हैं, उन सभी कर्मों को सज्जन पुरुष प्रज्ञापराध कहते हैं तथा इसे ही रोगों कारण मानते हैं ॥ १०३ - १०८ || * बुद्ध्या विषमविज्ञानं विषमं च प्रवर्तनम् । प्रज्ञापराधं जानीयान्मनसो गोचरं हि तत् ॥ प्रज्ञापराध का स्वरूप — बुद्धि से उचित रूप में ज्ञान न होना, ( कभी यथार्थ ज्ञान कभी यथार्थ ज्ञान का होना ), और विषम अर्थात् अनुचित रूप से कर्मों में प्रवृत्त होना, इसे प्रज्ञापराध जानना चाहिए । ये विषन ज्ञान और विषम प्रवृत्ति मन के विषय हैं ॥ १० ९ ॥ विमर्श - - रज और तम ये दोनों मन के दोष हैं । जब इन दोनों से मन युक्त होता है तब इन्द्रियों द्वारा जो भी कार्य होता है वह सभी प्रज्ञापराध कहा जाता है, जो दुःख एवं पुनर्जन्म का कारण होता है । इसी लिए प्रज्ञापराध को मन का विषय माना है । निर्दिष्टा काल संप्राप्तिर्व्याधीनां व्याधिसंग्रहे । चयप्रकोपप्रशमाः पित्तादीनां यथा पुरा ॥ काल- सम्प्राप्ति का वर्णन - व्याधियों के हेतुओं का संग्रह करते समय कियन्तः शिरसीय नामक १७ वें अध्याय में काल - सम्प्राप्ति का वर्णन किया गया है, जैसे पहले पित्त आदि दोषों का सं ar. प्रकोप और उपशय बताया गया हैं ॥ ११० ॥
विमर्श - १७ वें अध्याय के त्रिमश में उस विषय का वर्णन विस्तृत रूप में हैं । इसे वहीं देखना चाहिए | मिथ्यातिहीनलिङ्गाश्च वर्षान्ता रोगहेतवः । जीर्णभुक्तप्रजीर्णान्न कालाकालस्थितिच या ॥ * पूर्वमध्यापराह्नाश्च रात्र्या यामास्त्रयश्च ये । एष कालेषु नियता ये रोगास्ते च कालजाः ॥ और भी - शरद् ऋतु से लेकर वर्षा तक इन छः ऋतुओं का मिथ्यायोग, अतियोग, हीनयोग, जीर्ण ( भोजन की पाकावस्था ), भुक्त ( भोजन करते ही ), प्रजीर्ण ( भोजन के पूर्णं पच जाने पर ) इन तीन अन्नकालों के अनुसार पित्त, कफ, वात रोगों के कारण होते हैं और अकालस्थिति - भोजन का अकाल में जीर्ण होना, अकाल में भोजन करना, अकाल में प्रजीर्ण होना क्रमशः पित्त, कफ, वात के कोपक होते हैं दिन के पूर्वाह्न, मध्याह्न, अपराह्न में और रात्रि १. ' व्याधिकारिणम् ' इति पा. । २. ‘ भुक्तजीर्णंप्रजीर्णान्नकाला ' इति पा. 1
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८२६ चरकसंहिता के तीन भागों में पहले में कफ दूसरे में पित्त और तीसरे में वायु का कोप होता है स्वभाव से इन दोषों के कुपित होने के समय में जो रोग होते हैं वे कालज कहे जाते हैं ॥ १११-११२ ॥ * अन्येद्युष्को व्यहग्राही तृतीयकचतुर्थकौ । स्वे स्वे काले प्रवर्तन्ते काले ह्येषां बलागमः ॥११३ ॥
और -भी • विषमज्वर काल विशेष से हा होता है अतः इसे भी कालज रोग कहा जाता है । अन्येद्युष्क ( जो दिन रात में एक बार आने वाला हैं ), द्वयहग्राही ( चौथिया ज्वर के विपरीत अर्थात् दो दिन आवे एक दिन न आवे ), तृतीयक और चतुर्थक अपने - अपने काल पर होते हैं
और अपने काल पर बलवान होते हैं । अतः इन्हें कालज कहा जाता है ॥ ११३ ॥
विमर्श - हग्राही से चौथिया से विपरीत ज्वर का ग्रहण किया जाता है जैसा कि - ' विषम-ज्वर एवान्यश्चातुर्थिकविपर्ययः । मध्येऽह्नि ज्वग्यत्यादावन्ते च परिमुनति ॥ '
* एते चान्ये च ये केचित् कालजा विविधा गदाः ।
अनागते चिकित्स्यास्ते बलकालौ विजानता ॥ ११४ ॥
और भी I • रोग और रोगी के बल एवं काल को जानने वाले वैद्य के लिए यह उचित है कि ये और अन्य जो कोई भी कालज रोग हो उनकी वेग आने के पूर्व ही चिकित्सा करें अथवा रोग बलवान न होने पाए और रोग के वेग का समय न आने पाए उससे पूर्व ही रोगों की चिकित्सा करें ॥ ११४ ॥
कालस्य परिणामेन जरामृत्युनिमित्तजाः । रोगाः स्वाभाविका दृष्टाः स्वभावो निष्प्रतिक्रियः ॥ और भी - जो रोग जरा ( बुढ़ापा ) और मृत्यु को उत्पन्न करने वाले ( या वृद्धावस्था के कारण एवं मृत्यु काल उपस्थित हो गया है अतः जो रोग होते हैं ) स्वाभाविक रोग है वे सभी काल के परिणाम अर्थात् परिवर्तन से होते हैं, अतः ये भी कालज रोग है, इनकी चिकित्सा क्या होगी? इस शंका पर उत्तर दिया है ' स्वभावो निष्प्रतिक्रियः अर्थात् अपरिवर्तनीय होता है, स्वाभाविक जरा, मृत्यु आदि की चिकित्सा नहीं होती ॥ ११५ ॥
विमर्श - जरा और मृत्यु की चिकित्सा नहीं होती पर जरा अकाल में हो तो रसायन द्वारा उसकी चिकित्सा की जाती है, जैसा कि रसायन परिभाषा में कहा गया है - ' यज्जराव्याधि - विध्वंसि भेषजं तद् रसायनम् । ' इसी लिए - ' अस्य प्रयोगाच्च्यवनः सुवृद्धोऽभूत् पुनर्युवा । ( त्रि. अ. १ ) बताया है । इसी प्रकार अकाल मृत्यु की चिकित्सा होती है जैसा कि - ' मरणं प्राणिनां दृष्टमायुः पुण्योभयक्षयात् । तयोरप्यचयाद्दृष्टं विषमापरिहारिणाम् ॥ ' ( वा. शा. अ. ५ ) । आयु और पुण्य के क्षय से होने वाली स्वाभाविक मृत्यु की चिकित्सा नहीं है पर विषम आहार एवं विहार के कारण होने वाली मृत्यु की चिकित्सा की जाती है । जैसा कि सुश्रुत ने कहा है- ' त्रन्तु मरणं रिष्टं ब्राह्मणैस्तत् किलामलैः । रसायनतपोजप्यतत्परैर्वा निवार्यते ॥ ' ( सु. सू. अ. २८ ) । इस प्रकार अकाल में होने वाली जरा और मृत्यु की चिकित्सा होती है, फिर भी स्वाभाविक जरा और मृत्यु रसायन सेवन करने पर भी आ ही जाती है अतः इस स्वाभाविक कालज की चिकित्सा निष्प्रति-किय मानी गई हैं । निर्दिष्टं देवशब्देन कर्म यत् पौर्वदेहिक्रम् । हेतुस्तदपि कालेन रोगाणामुपलभ्यते ॥ ११६ ॥
और भी-• पूर्व देह से ( जन्मान्तर में ) किया गया कर्म दैव शब्द से कहा जाता है वह भी काल से ही रोगों का कारण होता है ॥ ११६ ॥
विमर्श - जन्मान्तरीय पापों से भी रोग होते है जैसा कि — ब्रह्मस्त्रीसज्जनवध परस्वहरणा-दिभिः । कर्मभिः पापरोगस्य प्राहुः कुष्ठस्य सम्भवम् ॥ ' ( सु. नि. अ. ५ ) । तो ये पाप जन्म लेते १. अन्ये च ये केचिदिति अर्धावभेदकापस्मारादयः ।
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कतिधापुरुषीयशारीराध्याय: १ ] शारीरस्थानम् ८२७ समय ही रोगोत्पादक नहीं होते, पर समय से जब ये पाप पकते हैं तब समय से ही कुष्ठ उत्पन्न करते हैं । अतः यह कालज रोग है । यद्यपि यह पाप कर्म प्रज्ञापराध से होता है, पर प्रज्ञापराध-जन्य रोग वे ही माने जाते हैं जो कर्म जिस पाञ्चभौतिक शरीर से किया जाय उसका फल वही पाञ्चभौतिक शरीर भोगता रहे । जन्मान्तर का प्रज्ञापराध जन्मान्तर में काल से फल देने वाला होता है अतः वह भी कालज रोग ही है ।
न हि कर्म महत् किञ्चित् फलं यस्य न भुज्यते ।
क्रियान्नाः कर्मजा रोगाः प्रशमं यान्ति तत्क्षयात् ॥ ११७ ॥
भोग से ही कर्म का क्षय - • वह कोई भी बड़ा कर्म ऐसा नहीं है जिसका फल न भोगना पड़े । कर्मज रोग चिकित्सा के फल को नष्ट कर देते हैं जब अन्यान्य कर्मों से उस जन्मान्तरीय कर्म का नाश होता है तब कर्मज रोग शान्त होते हैं ॥ ११७ ॥
विमर्श - बड़े कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है छोटे - छोटे कर्म प्रायश्चित्त के द्वारा नष्ट हो जाते हैं यह बात ' महत् ' शब्द से सूचित होती है । ' नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । " यहां भी बड़े - बड़े कर्म का ही ग्रहण किया जाता है छोटे - छोटे कर्म तो प्रायश्चित्त से ही दूर हो जाते हैं । अत्युग्रशब्दश्रवणाच्छ्रवणात् सर्वशो न च । शब्दानां चातिहीनानां भवन्ति श्रवणाज्जडाः ॥ असात्म्येन्द्रियार्थं संयोग का वर्णन - उसमें सर्व प्रथम शब्द के अतियोग और अयोग का वर्णन -- अत्यधिक ऊंचे शब्दों को सुनने से, सर्वथा शब्दों को न सुनने से और अत्यन्त हीन शब्दों को सुनने से श्रवण इन्द्रिय जड़ हो जाती है अर्थात् सुनने की शक्ति नष्ट हो जाती है ॥ ११८ ॥
* परुषोद्भीषणाशस्ताप्रियव्यसन सूचकैः । शब्दैः श्रवणसंयोगो मिध्यासंयोग उच्यते ॥ ११ ९ ॥ शब्द के मिथ्यायोग - परुष ( कठोर ), भीषण ( भय उत्पन्न करने वाले, अशस्त ( हानि-कारक ), अप्रिय ( जिसको मन न सुनना चाहे व्यसनसूचक ( विपत्ति को सूचना देने वाला जैसे तुम्हारा पुत्र मर गया आदि ) शब्दों के साथ कर्णं इन्द्रिय का संयोग होना मिथ्यायोग कहा जाता है ॥ ११ ९ ॥ असंस्पर्शोऽतिसंस्पर्शो हीनसंस्पर्श एव च । स्पृश्यानां संग्रहेणोक्तः स्यर्शनेन्द्रियबाधकः ॥ स्पर्श के अयोग और अतियोग - स्पर्श से जानने योग्य वस्तुओं से स्पर्शन इन्द्रिय ( त्वचा ) से बिलकूल स्पर्श न होना, हीन स्पर्श होना यह अयोग है, अधिक स्पर्श का होना - अर्थात् बार-बार उसी एक ही विषय का स्पर्श होना या अधिक उष्ण या अधिक शीत का स्पर्श होना अतियोग कहा जाता है, संक्षेप में ये स्पर्शन इन्द्रिय में बाधा उत्पन्न करने वाले होते हैं ॥ १२० ॥
यो भूतविषवातानामकालेनागतश्च यः । स्नेहशीतोष्णसंस्पर्शो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥
स्पर्श के मिथ्यायोग - • भूत और विष से मिश्रित वायु का स्पर्श और अकाल में स्नेह, शीत और उष्ण द्रव्यों का स्पर्श होना मिथ्यायोग कहा जाता है ॥ १२१ ॥
विमर्श - भूत शब्द से चक्रपाणि ने सविपक्रिमि और पिशाचों का ग्रहण किया है । रोगो-त्पादक जीवाणु इतने सूक्ष्म होते हैं कि उनका भी गमनागमन वायु के द्वारा ही होता है और पिशाचादि भी वायु की तरह सूक्ष्म और अदृश्य होते हैं । जैसा कि – ' विशन्ति च न दृश्यन्ते ग्रहास्तद्वच्छरीरिणः । ' ( सु. उ. अ. ६० ) । अतः वायु के ही माध्यम से पिशाचादि भी आक्रमण करते हैं । रूपाणां भास्वतां दृष्टिर्विनश्यत्यतिदर्शनात् । दर्शनाच्चातिसूक्ष्माणां सर्वशश्चाप्यदर्शनात् ॥
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८२८ चरकसंहिता रूप के अतियोग और अयोग - अत्यन्त भास्वर रूपों को अधिक देखने को अतियोग तथा अत्यन्त सूक्ष्मवस्तु को देखना और सर्वथा रूप का न देवना अयोग कहा जाता है । इससे दृष्टि ( नेत्र ) नष्ट हो जाती है ॥ १२२ ॥
द्विष्टभैरवबीभत्सदूरातिश्लिष्टदर्शनात् । तामसानां च रूपाणां मिथ्यासंयोग उच्यते ॥१२३ ॥
रूप के मिथ्यायोग - जिस रूप से द्वेष हो, भयङ्कर रूप और घृणित रूप को देखना, अत्यन्त दूर से देखना, अत्यन्त समीन से देखना और तामस रूपों का देखना रूप का मिथ्यायोग होता है ॥ १२३ ॥
अत्यादानसनादानमोकसात्म्यादिभिश्च यत् । रसानां विषमादानमपादानं च दूषणम् ॥
रस के अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग किसी एक रस का अधिक लेना अतियोग होता है । किसी एक या दो रसों को बिलकुल न लेना, या अल्पमात्रा में लेना अयोग होता है । ओक ( शरीर ) सात्म्य के विपरीत रसों का लेना या विषमरूप से लेना अर्थात् कभी किसी एक को अधिक खाना, कभी किसी अन्य एक रस को अधिक खाना आदि मिथ्यायोग है यह तीनों शरीर को दूषित करते हैं ॥ १२४ ॥
अतिमृद्वतितीच्णानां गन्धानामुपसेवनम् । असेवनं सर्वशश्च घ्राणेन्द्रियविनाशनम् ॥१२५ ॥
गन्ध के अयोग और अतियोग - --- अत्यन्त मृदु ( न्यून ) गन्धों का सूंघना, सर्वथा गन्धों को न सूंघना ये गन्ध का अयोग है । अत्यन्त तेज गन्धों को सूचना अतियोग है । ये दोनों घ्राग ( नाक ) इन्द्रिय को नष्ट करने वाले हैं ॥ १२५ ॥
पूतिभूतविषद्विष्टा गन्धा ये चाप्यनार्तवाः । तैर्गन्धैर्माण संयोगो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥ गन्ध के मिथ्यायोग पूर्ति ( सड़ने की तरह दुर्गन्धयुक्त ), भूत ( जीवाणु सम्पृक्त ) गन्ध, विषों का गन्ध, अप्रियगन्ध और अकाल में उत्पन्न गन्धों का सूंघना जैसे अकाल में जल बरस कर देश में सड़न पैदा कर अनेक प्रकार के गन्धों को उत्पन्न करता हैं उन गन्धों का सूंघना, ( नाक से संयोग होना ) मिथ्या योग कहा जाता है ॥ १२६ ॥
इत्यसात्स्यार्थसंयोगस्त्रिविधो दोषकोपनः । इस प्रकार यह असात्म्य इन्द्रियों का तीन प्रकार का अतियोग, अयोग और मिथ्या योग का
संयोग दोषों को कुपित करने वाला है ।
असात्म्यमिति तद्विद्याद्यन्न याति सहात्मताम् ॥ १२७ ॥
असात्म्य का स्वरूप कहते हैं ॥ १२७ ॥
-जो रूप रसादि आत्मा के साथ एक में न मिल जाय उसे असात्म्य विमर्श -- अर्थात् आत्मा के अनुकूल न हो उसे असात्म्य कहा जाता है । कहा भी है--' सात्म्यं नाम तद्यदात्मन्युपशेते । ' सात्म्य उसे कहते हैं जो आत्मा के लिए हितकारी हो । जो हितकारी न हो उसे असात्म्य कहते हैं । मिथ्यातिहीनयोगेभ्यो यो व्याधिरुपजायते । शब्दादीनां स विज्ञेयो व्याधिरैन्द्रियको बुधैः ॥ असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग से होने वाले रोग - शब्द, स्पर्श आदि के मिथ्यायोग, अतियोग और हीनयोग से जो व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं, उन व्याधियों को विद्वान् लोग ऐन्द्रियक कहते हैं । विमर्श - अर्थात् शारीरिक कहते हैं । क्योंकि शब्द, स्पर्श आदि पाँच पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं । इन विषयों में विकृति आने से विषयी इन्द्रियाँ रोगाकान्त हो जाती हैं और इन्द्रिया-टी शरीर है अतः ये रोग शारीरिक ही माने जाते हैं ॥ १२८ ॥
१. ' तिकिष्टदर्शनात् ' इति पा ० ।
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कतिधापुरुषीयशारीराध्याय: १ ] शारीरस्थानम् ८२६ * वेदनानामशान्तानामित्येते हेतवः स्मृताः । सुखहेतुः समस्त्वेकः समयोगः सुदुर्लभः ॥ दुःखरूप वेदना के हेतु -- बुद्धि, धृति, स्मृति का विभ्रंश, काल और कर्म की संप्राप्ति और असात्म्येन्द्रियार्थं संयोग ये तीन दुःखरूपी वेदना ( रोग ) के कारण है । एक समयोग ही सुख का कारण है वह अत्यन्त दुर्लभ होता है ॥ १२ ९ ॥ विमर्श - यहाँ अत्यन्त दुर्लभ काल, बुद्धि और इन्द्रियार्थों का समयोग होना बताया है । इसका कारण यह कि प्रायः पुरुष का रागादि अवस्था में सदा अनुबन्ध लगा रहता है । अतः काल, अर्थ आदि का अनियोग, अयोग, मिथ्यायोग भी होता ही रहता है तब किसी न किसी रोग से मनुष्य पीडित ही रहता है । नेन्द्रियाणि न चैवार्थाः सुखदुःखस्य हेतवः । हेतुस्तु सुखदुःखस्य योगो दृष्टश्चतुर्विधः ॥
सन्तीन्द्रियाणि सन्त्यर्था योगो ने च न चास्ति रुक् ।
न सुखं कारणं तस्माद्योग एव चतुर्विधः ॥ १३१ ॥
समयोगादिसुख - दुःख का कारण सुख और दुःख का कारण न इन्द्रियाँ हैं, न उन इन्द्रियों के अर्थ हैं । सुख और दुःख का हेतु नो क्रमशः समयोग और अतियोग, अयोग मिथ्यायोग ये चार प्रकार के योग हैं । इन्द्रियाँ हैं अर्थ भी है पर उन दोनों का संयोग न हो तव न दुःख होगा न सुख, इसी लिए सुख और दुखों कारण समयोग आदि ४ चार योग ही है । एक समयोग सुख का और तीन अतियोग दुःख के कारण हैं ॥ १३०-१३१ ॥ नोमेन्द्रियं मनो बुद्धिं गोचरं कर्म वा विना । सुखदुःखं, यथा यच्च बोद्धव्यं तत्तथोच्यते ॥ सुख और दुःख का कारण - आत्मा, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और कर्म के बिना न सुख होता है न दुःख | जो सुख और दुःख जिस प्रकार जाना जाता है वह उसी प्रकार से कहा जाता है || १३२ || विमर्श - सुख - दुःख, आत्मा, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और कर्म के विना नहीं होते । क्योंकि सुख - दुःख का ज्ञान करने वाला आत्मा है जैसा कि न्याय में बताया है कि -‘ज्ञानाधिकरणमात्मा ” ज्ञान का स्थान आत्मा है । इन्द्रियाँ और मन आदि ज्ञान के साधन है - जैसा कि - ' सुखाद्युप-लब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः ' सुख और दुःख की प्राप्ति का साधन इन्द्रिय मन होता है । * स्पर्शनेन्द्रियसंस्पर्शः स्पर्शो मानस एव च । द्विविधः सुखदुःखानां वेदनानां प्रवर्तकः ॥ और भी - • सम्पूर्ण रोगों के कारणों में ४ चार प्रकार के योग ही ऐन्द्रियक होने से मुख्य हैं, यह और मानसस्पर्श भी रोगकारक होता है यह बताने के लिए सुख और दुःख स्वरूप वेदनाओं का प्रवर्तक ( त्वचा ) स्पर्शन इन्द्रिय का समयोगादिस्पर्श ( संयोग ) और मानस स्पर्श इन दोनों का समयोग सुख के कारण और अनियोगादि दुःख के कारण होते हैं ॥ १३३ ॥
8 इच्छाद्वेषात्मिका तृष्णा सुखदुःखात् प्रवर्तते । तृष्णा च सुखदुःखानां कारणं पुनरुच्यते ॥ तृष्णा ही सुख और दुःख का हेतु - सुखों और दुःखों से क्रमशः इच्छा और द्वेष स्वरूप तृष्णा की प्रवृत्ति होती है । फिर वही तृष्णा सुख और दुःखों का कारण बन जाती है ॥ १३४ ॥
* उपादत्ते हि सा भावान् वेदनाश्रयसंज्ञकान् । स्पृश्यते नानुपादाने नास्पृष्टो वेत्ति वेदनाः ॥ और भी - वही या वेदना के आश्रयभूत शरीर और मन को दृढतापूर्वक पकड़ती है । स्पर्श के कारणभूत तृष्णा के अभाव में शरीर एवं मन और इन्द्रियों का संयोग न होगा तत्र इनके संयोग के अभाव में अर्थों का भी संयोग न होगा, अतः वेदना का भी ज्ञान न होगा ॥ १३५ ॥
१. ' असात्म्यानाम् इति पा. । २. ' नास्ति ' इति पा. । ३. ' नात्मेन्द्रियमनोबुद्धिगोचरम् ' इति पा.।
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८३० चरकसंहिता विमर्श - तृ - तृष्णा, रज और तम स्वरूप होती है इसी के कारण मनुष्य अनेकों प्रकार के अच्छे या बुरे कार्य करता है जिसका फल आत्मा भोगता है फलतः अपने कर्म के फलों को भोगने के लिए बार - बार जन्म - मरण लगा रहता है जिससे दुःख की परम्परा नष्ट नहीं होती, जब तृष्णा, आत्मा एवं मन से अलग हो जाती है तब आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता है । * वेदानानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः । केशलोमनखाग्रान्नमलद्रवगुणैर्विना ॥ १३६ ॥
( २१ ) प्रश्न: वेदनाओं अधिष्ठान क्या हैं? ( वेदनानां किमधिष्ठान-मुच्यते? ) उत्तर-केश, लोम, नख का अग्र भाग अन्न का मल ( विट् ), द्रवों ( मूत्र ) के गुणों को छोड़ कर मन और इन्द्रिय के साथ देह वेदना का अधिष्ठान है ॥ १३६ ॥
विमर्श - इन्द्रियों के साथ शरीर वेदना का आश्रय होता है । परन्तु नख काटने पर उसमें वेदना का अनुभव नहीं होता इस आधार पर उसमें दार्शनिकों ने जीव की स्थिति नहीं माना है यथा - न्यायदर्शन में भी - ' चैतन्यस्य शरीरव्यापित्वात् तस्य केशनखादिष्वनुपलब्धे त्वक् पर्यन्ताच्छरीरस्य केशलोमादिष्वप्रसंगः ' चक्रपाणि ने गुण से शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध का ग्रहण किया है पर गंगाधर ने अन्न का मल ( पुरीष ), द्रव ( मूत्र ) के गुणों का ग्रहण किया है । योगे मोक्षे च सर्वासां वेदनानामवर्तनम् । मोक्षे निवृत्तिनिःशेषा योगो मोक्षप्रवर्तकः ॥१३७ ॥
( २२ ) प्रश्न: सर्ववेदना की निवृत्ति ( समाप्ति ) कहां? ( क्व चैता वेदनाः सर्वा निवृत्तिं यान्त्यशेषतः ), उत्तर-योग और मोक्ष में सभी वेदनाओं का नाश हो जाता है । मोक्ष में आत्यन्तिक वेदनाओं का नाश होता है । योग मोक्ष को दिलाने वाला होता है ॥ १३७ ॥
* आत्मेन्द्रियमनोऽर्थानां सन्निकर्षात् प्रवर्तते । सुखदुःखमनारम्भादात्मस्थे मनसि स्थिरे ॥
निवर्तते तदुभयं वशित्वं चोपजायते । सशरीरस्य योगज्ञास्तं योगमृषयो विदुः ॥ १३ ९ ॥
योग का लक्षण - आत्मा, इन्द्रिय, मन और अर्थों के सन्निकर्ष से सुख और दुःख दोनों होते हैं । जब आत्मा में मन स्थिर होता है तो किसी कार्य के न होने से सुख और दुःख ये दोनों निवृत्त हो जाते हैं तब शरीर के साथ आत्मा वशी हो जाती है । इसे योग को जानने वाले ऋषी लोग योग कहते हैं ॥ १३८-१३९ ॥ विमर्श -- योगसूत्र में पतञ्जलि ने ' योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ' चित्त की वृत्ति को रोकने को योग कहा जाता है चित्त की वृत्ति के विषय में भगवान् पतंजलि ने ही ' वृत्तयः पञ्चतथ्यः क्लिष्टाः से प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, परस्मृति ये पाँच माने हैं । प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम प्रमाण होते हैं, मिथ्याज्ञान विपर्यय होता है, केवल वस्तुशून्य शब्दज्ञान विकल्प होता है, अभाव को समझने वाला वृत्ति निद्रा होती है, अनुभूत विषयों का त्याग न करना स्मृति है, इस चित्त की वृत्ति को अभ्यास और वैराग्य के द्वारा रोकने से उसकी रुकावट हो जाती है तब चित्त वृत्ति के रुक जाने से सुख एवं दुखजनक किसी भी कार्य का आरम्भ नहीं होता और धीरे - धीरे संचित कर्मों का नाश होकर मोक्ष हो जाता है । शरीर के साथ आत्मा का वशी होने का तात्पर्य यह है कि योगसिद्ध होने पर स्थूल पांच-भौतिक शरीर के रहते हुए आत्मा वशी अर्थात् अपने को अपने ही अधीन कर लेता है और जो-जो कार्य करना चाहता है उसे स्वयं कर लेता है । यदि वेदनाओं को भोगने की इच्छा उसे नहीं होती हैं तो नहीं भोगना । शरीर के रहते हुए माया से शून्य हो जाता है, यही बात जनक विदेह के विषय में कही जाती है कि वह योगी होने के कारण देह के रहने हुए विदेह थे ।
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कतिधापुरुषीयशारीराध्याय: १ ] शारीरस्थानम् ८३१ * आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थानां छन्दतः क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ॥ इत्यष्टविधमाख्यातं योगिनां बलमैश्वरम् । शुद्धसत्व समाधानात्तत् सर्वमुपजायते ॥ १४१ ॥
योगियों की स्वाभाविक शक्ति - जब योग की सिद्धि हो जाती है तो इन लक्षणों से उसका परिचय मिलता है | आवेश ( दूसरे के शरीर में प्रवेश कर जाना ), चेनसो ज्ञानं ( दूसरे के मन की बात को जानना ), अर्थानां छन्दतः क्रिया, ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध अर्थों का अपनी इच्छा से प्रवृत्त करना ) अर्थात् जिन अर्थों का ज्ञान करना चाहें उनका ज्ञान अपने मन के अनुकूल शीघ्र ही हो जाय । दृष्टि ( अतिन्द्रिय वस्तुओं को भी देखना ), श्रोत्र ( कर्ण - इन्द्रिय अपने इच्छित वस्तुओं की चाहे वह दूर की हों या नजदीक की हों सुनने लगे ), स्मरणशक्ति ठीक रहे अर्थात् सभी भावों के तत्त्वों को समझने लगे । शरीर में देवताओं की तरह कान्ति हो जाय जब इच्छा हो तो अपने शरीर को छिपा ले और जब चाहे जगत् के सामने प्रत्यक्ष कर दे यह आठ प्रकार का बल योगियों को योग सिद्ध करने पर ईश्वर से प्राप्त होता है इस प्रकार का योग शुद्ध, सत्त्व अर्थात् रज और तम से रहित मन का आत्मा के साथ सम्बन्ध होता है तभी यह सब होता है ॥ १४०-१४१ ॥ विमर्श - यह आठ प्रकार का बल योगियों को प्राप्त होता है इसका विशेष वर्णन एक - एक का पातञ्जल योग सूत्र में प्रधान रूप से पाया है जैसे ' बन्धकारणशैथिल्यात् प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य पर शरीरावेश: ' ( योग सु. विपाद ३. ३७ ) अर्थात् चंचल मन का धर्म - अधर्म से शरीर में बन्धन होता है और ज्ञान हेतु का संयोग स्थिर होता है, उस बन्धन रूपी कर्म की शिथिलता से अर्थात् मन का दृढ़ बन्धन न होने से और मन के प्रचार में लगने से दूसरे के शरीर में प्रवेश कर जाता है इन सभी का वर्णन योगसूत्र विभूति पाद में है उसे वही देखना चाहिए । योगियों का यहाँ केवल आठ प्रकार के सिद्धियों का वर्णन किया है पर योग में तेईस सिद्धियों का वर्णन है जैसे पाँच क्षुद्र सिद्धि - ' त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता । अग्नर्काम्बु विशादीनां स्तम्भश्चाप्यपराजयः ॥ दस गुणप्रधान सिद्धि: - ' अस्मिन् देहेऽमित्रं दूरश्रवण दर्शनम् । मनोजवित्वं कामरूपं परकायाप्रवेशः स्वेच्छामृत्युर्देव क्रीडानुदर्शनम्, यथासंकल्प-सिद्धिराज्ञासिद्धिरव्याहतगतिः । आठ ब्रह्मप्रधान सिद्धि - ' अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्तिः, प्रकाम्यम्, ईशित्वं, वशित्वं, कामावसायिता च ' । इस प्रकार योग ग्रन्थों में योग सिद्धियों का वर्णन किया गया है । आयुर्वेद में योगियों का जो साधारण कार्य होता है उसी के अनुसार यहाँ बल बताया गया है । * मोक्षो रजस्तमोऽभावात् बलवत्कर्मसंक्षयाद् । वियोगः सर्वसंयोगैरपुनर्भव उच्यते ॥१४२ ॥
मोक्ष की परिभाषा - मन से जब रज एवं तम का अभाव होता है और बलवान् कर्मों का क्षय हो जाता है तब कर्म -संयोग अर्थात् कर्मजन्य वन्धनों से वियोग हो जाता है उसे अपुनर्भव अर्थात् मोक्ष कहते हैं जिसके हो जाने पर पुनः जन्म नहीं होता ॥ १४२ ॥
विमर्श - योग मोक्ष का प्रवर्तक है यह पहले कहा जा चुका है, समाधि अवस्था में जब मन के वृत्तियों का निरोध हो जाता है तब रज एवं तम जो मन के दोष हैं उनका स्वयं मन से वियोग अर्थात् अभाव हो जाता है । ऐसी ही दशा का नाम योग होता है और पुरुष ज्ञानी हो जाता हैं, यथा - ' समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा । बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च । विविक्तसेवी लक्ष्याशी यतवाक्कायमानसः । ध्यान योगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः । अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते । ब्रह्मभूतः प्रशान्तात्मा न शोचति न काङ्क्षति ॥ ' ( गीता. १८ ) |