चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 941–950

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 941–950

पृष्ठ 941

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८५२ चरकसंहिता रहित है, ऐसे स्त्री और पुरुष का ऋतुकाल में ( प्रारम्भ के तीन दिन छोड़कर ) जब संसर्ग होता है और शुद्ध शुक्र वाले पुरुष और शुद्ध योनि, गर्भाशय और शुद्ध आर्तव वाली स्त्री का उचित रूप से संसर्ग होने पर गर्भाशय में जब शुक्र और आर्तव का संयोग होता है तब क्रियाशील मन के साथ होने से जीवात्मा गर्भ में प्रवेश करता है । वह गर्भ माता के सात्म्य ( प्रकृति के अनुकूल ) रसों के प्रयोग से और गर्भिणीचर्या में बताए हुए नियमों का ठीक रूप में पालन करने से रोगरहित होकर गर्भाशय में वृद्ध होता है । इसके बाद समय से ( नवें, दशवें मास में ) सम्पूर्ण इन्द्रियों से युक्त, पूर्ण शरीर से युक्त, बल, वर्ण, मन और शरीर संगठन, से उचित रूप में युक्त होकर, माता, पिता, आत्मा, सात्म्य, रस, मन इन भावों के समुदाय से सुखपूर्वक उत्पन्न होता है | अतः यह गर्भ मातृज, पितृज, आत्मज, सात्म्यज, रसज और मन के नित्य सम्बन्ध से उत्पन्न होता है ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा है ॥ ३ ॥

विमर्श - गर्भाशय में शुक्र, आर्तव के प्रविष्ट होने पर ही उत्तम गर्भ होता है, इसका तात्पर्य यह है कि शुक्राणु और स्त्री बीज का सम्बन्ध बीजवाहिनी ( Fallopian Ttube ) 1 में होकर वह धीरे - धीरे गर्भाशय में आता है और पुष्ट होता है । पर कभी - कभी संयोगवश बीजवाहिनी के मुख में इनका संयोग नहीं भी होता है । इसका कारण यह हैं कि स्त्रीबीज स्वयं गतिहीन होता है, किन्तु कोष से उदर गुहा में आने पर बीजवाहिनी के द्वार में उत्पन्न लहरों में फँस कर बीजवाहिनी में प्रवेश कर जाता है और धीरे - धीरे गर्भाशय में चला जाता है, यदि शुक्राणु से स्त्रीबीज का सम्बन्ध हो गया तो गर्भ रहा अन्यथा वह स्त्रीबीज गर्भाशय में जाकर मासिक स्राव के साथ बाहर चला आता है । शुक्राणु गतिशील होते हैं, गर्भाशय- मुख से बीजवाहिनी तक पहुँचने में कुछ समय लग जाता है, स्त्रीबीज पहले ही पहुँचा रहता है, यदि शुक्राणु के वहाँ पहुँचने पर स्त्रीबीज न मिला तो शुक्राणु उदर गुहा में चला जाता है और यदि उदर में स्त्रीबीज से संयोग हो जाय तो वही गर्भ रह जाता है, जिसे औदर्य गर्भावस्था ( Abdominal Pregnancy ) कही जाती है, कभी शुक्राणु बीजकोष में चला जाता है, उसे वीजकोष गर्भावस्था ( Ovarian Pregnancy ) कही जाती है । कभी कभी गर्भ बीजवाहिनी में चपक कर वहीं वर्धित होते हैं, इसे नलिकागर्भावस्था ( Tubal Pregnancy ) कही जाती है । इस प्रकार गर्भाशय के बाहरी भाग में गर्भधारणा हो सकती है, पर वह विकृत होती है । अतः चरक गर्भाशय के अन्तः प्रविष्ट शुक्र, आर्तव का संयोग उत्तम गर्भ का उत्पादक होता है ऐसा बताया है, इसी बात को चक्रपाणि ने भी ' अन्तरित्यनेन गर्भाशयबाह्यगतं संसर्गमकारणं गर्भस्य निषेधयति । ' से गर्भाशय के बाहरी भाग में होने वाले गर्भ को अन्तः शब्द से ग्रहण नहीं किया है । सत्त्वसम्प्रयोगात् - से मन आत्मा का सम्बन्ध सूचित किया गया है, क्योंकि आत्मा निष्क्रिय है बिना मन के संयोग से उसमें क्रिया होती ही नहीं हैं, यथा - ' युक्तस्य मनसा तस्य निर्देश्यन्ते विभोः क्रियाः । ' ( शा. अ. १ ) नेति भरद्वाजः, किं कारणं - न हि माता न पिता नात्मा न सात्म्यं न पानाशनभ-च्य लेह्योपयोगा गर्भं जनयन्ति, न च परलोकादेत्य गर्भ सत्त्वमवक्रामति ॥ ( १ ) ॥ ( २ ) गर्भ के ६ भावविषयक भरद्वाज की शङ्का माता - पिता आदि सन्तानोत्पत्ति में कारण नहीं हैं । • भरद्वाज ने कहा कि यह ठोक नही हैं, क्योंकि न माता, न पिता, न आत्मा और न सात्म्य पान, अशन, भक्ष्य, लेह्य ये चारों प्रकार के आहार गर्भ को उत्पन्न करते है । परलोक से आकर मन गर्भ में प्रवेश, भी नहीं करता । ( अतः माता - पिता आदि गर्भ के कारण नहीं है ) । ( १ ) ।

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कागर्भावक्रान्ति ० ३ ] शारीरस्थानम् ८५३ यदि हि मातापितरौ गर्भं जनयेतां, भूयस्यः स्त्रियः पुमांसश्च भूयांसः पुत्रकामाः, ते सर्वे पुत्रजन्माभिसन्धाय मैथुनधर्ममापद्यमानाः पुत्रानेव जनयेयुर्दुहितृर्वा दुहितृकामाः, न तु काश्चित् स्त्रियः केचिद्वा पुरुषा निरपत्याः स्युरपत्यकामा वा परिदेवेरन् ॥ ( २ ) ॥ ( १-२ ) गर्भ में माता - पिता के कारणत्व का खण्डन - यदि माता और पिता गर्भं को उत्पन्न करते हैं ऐसा माना जाय तब तो बहुत सी स्त्रियाँ और बहुत से पुरुष पुत्र ( सन्तान ) की इच्छा वाले होते है । वे पुत्र उत्पन्न हो इस बात को मन में रख कर मैथुन में प्रवृत्त होंगे तो केवल पुत्रों को ही उत्पन्न करेंगे या पुत्री की इच्छा से मैथुन में प्रवृत्त होंगे तो केवल पुत्रियाँ ही उत्पन्न करेंगे । कोई स्त्री या कोई भी पुरुष सन्तान रहित न होगा और सन्तान के लिए कोई भी दुःखी न होगा । ( २ ) न चात्माऽऽत्मानं जनयति । यदि ह्यात्माऽऽत्मानं जनयेजातो वा जनयेदात्मानम-जातो वा तच्चोभयथाऽप्ययुक्तम् । न हि जातो जनयति सत्त्वात् न चाजातो जनयत्य-सत्त्वात्, तस्मादुभयथाऽप्यनुपपत्तिः । तिष्ठतु तावदेतत् । यद्ययमात्माऽऽत्मानं शक्तो जनयितुं स्यात् न त्वेनमिष्टास्वेव कथं योनिषु जनयेद्वशिनमप्रतिहतगतिं कामरूपिणं तेजोबलजववर्णसत्त्वसंहनन समुदितमजर मरुज ममरम् एवंविधं ह्यात्माऽऽत्मानमिच्छु-रयतो वा भूयः ॥ ( ३ ) ॥ ( ३ ) गर्भ में आत्मा के कारणत्व का खण्डन - आत्मा आत्मा को ( गर्भ ) को उत्पन्न नहीं करता । यदि आत्मा आत्मा को उत्पन्न करता है ऐसा माना जाय तब यह शंका होती है कि जात ( उत्पन्न ) आत्मा, गर्भ का कारण है या अजात ( अनुत्पन्न ) आत्मा गर्भ का कारण है । ये दोनों बातें अयुक्त ( अनुचित ) हैं क्योंकि जात आत्मा गर्भ को ( आत्मा ) उत्पन्न नहीं कर सकता क्योंकि वह वर्तमान है ( जब स्वयं वर्तमान है तो स्वयं को क्या उत्पन्न करेगा ) । अनुत्पन्न आत्मा भी गर्भ ( आत्मा ) को उत्पन्न नहीं कर सकता क्योंकि वह है ही नहीं । इसलिए दोनों प्रकार से आत्मा उत्पन्न करने में असमर्थ है । अच्छा यदि यह मान लिया जाय कि आत्मा आत्मा को उत्पन्न करने में समर्थ है तो वह इष्ट योनियों में ही क्यों नहीं जन्म ले, क्योंकि आत्मा, वशी, अप्रतिहत गति ( जिसकी गति कहीं भी न रुकती हो ), कामरूपी ( अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाला ), तेज, बल, वेग, वर्ण, सत्त्व, संगठन से युक्त, अजर, रुजारहित, अमर इन सब गुणों से युक्त आत्मा गर्भ को इन सब गुणों से युक्त ही देखना चाहता है या इससे भी उत्तम । इसलिए आत्मा गर्भ का कारण नहीं है ) । ( ३ ) विमर्श - आत्मा को गर्भ का कारण माना है आत्मा का प्रत्यक्ष मनुष्य शरीर में ही होता है । यदि यह कहा जाय कि उत्पन्न आत्मा, आत्मा को उत्पन्न करता है तो यह कहना ठीक नहीं क्योंकि जब वह उत्पन्न हो जायगा तब तो वह गर्भ स्वरूप स्वयं हो गया अब आगे क्या उत्पन्न करेगा । यदि गर्भ से अतिरिक्त आत्मा की प्रतीति होती तो तब तो वह उत्पन्न कर सकता था पर ( आत्मा और गर्भ दोनों ही प्रत्यक्ष में एक ही होते हैं क्योंकि शरीर से अतिरिक्त आत्मा का अनुभव होता ही नहीं । यदि यह कहा जाय कि जो आत्मा उत्पन्न नहीं है वह गर्भ उत्पन्न करता है तो केवल आत्मा का अनुभव नहीं होता । इसलिए वह है इसमें कोई प्रमाण नहीं । अथवा जब वह अविद्यमान है तो उत्पत्ति के पहले उसका कोई स्वरूप नहीं होता और जो कारण होता उसका स्वरूप होना और कार्य के पहले रहना आवश्यक होता है । कार्य कारण के अनुरूप होता है जैसे मिट्टी कारण से घट कार्य होता है । घट के पूर्व मिट्टी का स्वरूप और उसका वर्तमान रहना यह दोनों देखा जाता १. ‘ स्युः । न चापत्यकामाः परिदेवेरन् ' इति पा. ।

पृष्ठ 943

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८५४ चरकसंहिता है । पर कारण आत्मा जब तक उत्पन्न नहीं होता तब तक उसका सत्ता और स्वरूप नहीं होता । क्योंकि — ‘ कर्त्ता हि करणैर्युक्तः कारणं सर्वकर्मणाम् | ' के अनुसार कर्त्ता जब करण ( इन्द्रिय ) से युक्त होता है तब सभी कर्मों को करने वाला होता है और जब तक आत्मा उत्पन्न नहीं है तब तक -इन्द्रियों से युक्त नहीं होता है । इसलिए अनुत्पन्न आत्मा, आत्मा ( गर्भ ) को उत्पन्न नहीं कर सकता इस प्रकार अनुत्पन्न और उत्पन्न दोनों प्रकार से आत्मा की कारणता सिद्ध नहीं होती । दूसरी बात यह है कि आत्मा को यदि कारण माना जाय तो स्वतंत्र आत्मा अपने को कभी भी नीच योनि जैसे कुत्ते, बिल्ली आदि के शरीर में नहीं प्रवेश करायेगा और वह सदा अपने को उच्च योनियों में ही उत्पन्न हो करायेगा । परन्तु यह बात देखने को नहीं मिलती । दुःखी और सुखी, नीच -ऊँच दोनों तरह की आत्माएँ होती हैं इसलिए आत्मा को गर्भ का कारण नहीं मानना चाहिए । असात्म्यजश्चायं गर्भः । यदि हि सात्म्यजः स्यात्, तर्हि सात्म्यसेविनामेवैकान्तेन प्रजा स्यात्, असात्म्यसेविनश्च निखिलेनानपत्याः स्युः, तञ्चोभयमुभयत्रैव दृश्यते ॥ ( ४ ) ॥ ( ४ ) गर्भ में सात्म्य के कारणत्व का खण्डन - वह गर्भ सात्म्य वस्तुओं के सेवन से उत्पन्न नहीं होता है | यदि सात्म्य वस्तुओं के सेवन से उत्पन्न होता तो केवल सात्म्य वस्तु सेवन करने वाले को ही सन्तान की उत्पत्ति होती और असात्म्य वस्तु के सेवन करने वाले जितने मनुष्य हैं उन्हें सन्तान नहीं होती, पर दोनों जगह दोनों बात देखी जाती है । ( अर्थात् जो सात्म्य आहार-विहार का सेवन करते हैं उन्हें संतान होती है और नहीं भी होती है और जो सात्म्य आहार - विहार का सेवन नहीं करते हैं उन्हें भी संतान होती है और नहीं भी होती है । इसलिए सात्म्य वस्तु का सेवन गर्भ का कारण नहीं हो सकता हैं । ) ॥ ( ४ ) ॥ अरसजश्चायं गर्भः । यदि हि रसजः स्यात्, न केचित् स्त्रीपुरुषेण्वनपत्याः स्युः, न हि कश्चिदस्त्येषां यो रसान्नोपयुङ्क्ते; श्रेष्ठरसोपयोगिनां चेद्गर्भा जायन्त इत्यभिप्रेतमिति, एवं सत्याजौरभ्रमार्गमायूरगोक्षीरदधिघृतमधुतैलसैन्धवेक्षुरसमुद्ग शालिभृतानामेवैकान्तेन प्रजा स्यात्, श्यामाकवर कोद्दालककोरदूषकन्दमूलभदाश्च निखिलेनानपत्याः स्युः, तच्चोभय-मुभयत्र दृश्यते ॥ ( ५ ) ॥ ( ५ ) गर्भ में रस के कारणत्व का खण्डन —- ' गर्भ रस से नहीं उत्पन्न होता । यदि रस से गर्भ की उत्पत्ति मानी जाय तो कोई भी मनुष्य और स्त्री संतानरहित नहीं होंगे क्योंकि ऐसे कोई भी स्त्री - पुरुष नहीं हैं जो रस का सेवन नही करते है । यदि रस से गर्भ उत्पन्न होता है इसका तात्पये श्रेष्ठ रस के प्रयोग से गर्भ की उत्पत्ति होती है, यह है तो ऐसा मानने पर बकरा, भेंड़, मृग, मोर इनके मांसरस, गो दुग्ध, दही, घी, मधु, तेल, सेवा नमक, ईख का रस, मूग, शाली चावल इनका सेवन करने वाले को ही केवल सन्तान होना चाहिए । श्यामा ( साँवाँ ), वरक, उद्दालक ( वनकोदो ) कोरदूष ( कोदो ) और कन्दमूल खानेवाले सभी स्त्री - पुरुष को संतान हीन होना चाहिए । पर यह दोनों बात दोनों जगह देखी जाती है ( अर्थात् उत्तम रस खाने वाले संतान युक्त और संतान रहित भी होते हैं । उत्तम रस का न सेवन करने वाले भी संतानहीन और संतान युक्त होते हैं । ( इसलिए रस से गर्भ की उत्पत्ति नहीं मानी जाती है । ) ॥ ( ५ ) ॥ न खल्वपि परलोकादेत्य सत्त्वं गर्भमवक्रामति; यदि ह्येनमवक्रामेत्, नास्य किञ्चित् पौर्वदेहिकं स्यादविदितमश्रुतमदृष्टं वा, स च तच्च न किञ्चिदपि स्मरति ॥ ( ६ ) ॥ ( ६ ) गर्भ में मन के कारणत्व का खण्डन - परलोक से आकर मन गर्भ में प्रविष्ट नहीं होता । यदि मन परलोक से आकर प्रवेश करता तो पूर्व देह की कोई भी ऐसी बात न होती जो अज्ञात

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खडकागर्भावक्रान्ति ० ३ ] शारीरस्थानम् ८५५ होती या अदृष्ट होती क्योंकि मन ही इन्द्रियों के साथ संयुक्त होकर विषयों का ज्ञान कराता है या विषयों को दिखाता है । अतः परलोक से आने पर मन को सभी पूर्वजन्म की वस्तुओं को जानना चाहिए और उसे देखा हुआ मानना चाहिए । पर ऐसा नहीं होता । पूर्वजन्म की किसी भी बात को स्मरण नहीं करता । ( इसलिए मन परलोक से आकर गर्भ में प्रवेश नहीं होता है | ) | | ( ६ ) || तस्मादेतद्ब्रूमहे - अमातृजश्चायं गर्भोऽपितृजश्चानात्मजश्चासात्म्यजश्चारसजश्च न चास्ति सत्त्वमौ पादुकमिति ( होवाच भरद्वाजैः ) ॥ ४ ॥

भरद्वाज के मत का उपसंहार - इसलिए हम कह रहे हैं कि गर्भ मातृज, पितृज रसज, आत्मज और साम्त्यज भी नहीं है, और न परलोक से आकर मन गर्भ में प्रवेश करता है यह बात भरद्वाज ने कही ॥ ४ ॥

नेति भगवानात्रेयः सर्वेभ्य एभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भोऽभिनिर्वर्तते ॥ ५ ॥

( ३ ) गर्भ के ६ भावविषयक शङ्का का आत्रेय द्वारा समाधान आत्रेय का सिद्धान्त - - भगवान् आत्रेय ने कहा कि नहीं ( यह तुम्हारी शंका व्यर्थ है ) इन सभी भावों के समुदाय से गर्भ की उत्पत्ति होती है ॥ ५ ॥

* मातृजश्चायं गर्भः । न हि मातुर्विना गर्भोत्पत्तिः स्यात्, न च जन्म जरायुजानाम् । यानि खल्वस्य गर्भस्य मातृजानि यानि चास्य मातृतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनु-व्याख्यास्यामः; तद्यथा - त्वक् च लोहितं च मांसं च मेदश्च नाभिश्च हृदयं च क्लोम च यकृश्ञ्च प्लीहा च वृक्कौ च वस्तिश्च पुरीषाधानं चामाशयश्च पक्वाशयश्चोत्तरगुदं चाधरगुदं चक्षुद्रान्त्रं च स्थूलान्त्रं च वपा च वपावहनं चेति ( मातृजानि ) ॥ ६ ॥

( १ ) माता की कारणता एवं मातृज भाव - यह गर्भ माता से उत्पन्न होता है । माता के बिना गर्भ की उत्पत्ति नहीं हो सकती और जितनी जरायुज सृष्टि है, उन सबका जन्म बिना माता के हो ही नहीं सकता । जो गर्भ के मातृज अवयव और जो अंग गर्भ के उत्पन्न होते समय माता से उत्पन्न होते हैं उनकी व्याख्या की जाती है, जैसे - त्वचा ( Skin Tissue ), रक्त ( Blood minus Plasma ), मांस ( Muscle Tissue ), मेद ( Fat ), नाभि ( Umbilicus ), हृदय ( Heart? ), क्लोम ( Pancrease? ), यकृत ( Liver ), प्लीहा ( Spleen ), वृक्क ( Kidneys ) वस्ति ( Bladder ), पुरीषाधान ( Sigmoid & Pelvic Colon ), आमाशय ( From cardiac end of the Stomach to the illeoceacal valve i. e., Stomach, Duodenum, Small Tutestine ) पक्काशय ( Large Intestine ), उत्तरगुद ( Rectum ), अधरगुद ( Anus ), क्षुद्रान्त्र ( Small Intestine ), स्थूलान्त्र ( Largea Intestine ), व पावहन ( Omentum? ) ये माता से उत्पन्न होने वाले अंग है ॥ ६ ॥

विमर्श - उपर्युक्त गद्य में रक्त शब्द से Whole blood न लेकर Plasma रहित Blood लिया गया | क्योंकि Blood रस ( Plasma ) एवं रक्त ( Cells — R. B. C. W. B. C. etc ) से बना है । उपर्युक्त गद्य में आमाशय, पक्वाशय का नामकरण क्रिया के अनुसार है, जब कि क्षुद्रान्त्र तथा स्थूलान्त्र का नामकरण रचना के अनुसार है परन्तु दोनों में अवयव एक ही है । शेष या तो स्पष्ट है या प्रश्नात्मक स्थिति में है । पितृजनायं गर्भः । नहि पितुर्ऋते गर्भोत्पत्तिः स्यात्, न च जन्म जरायुजानाम् । यानि खल्वस्य गर्भस्य पितृजानि यानि चास्य पितृतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनुव्या-१. योगीन्द्रनाथसेनस्यासंमतोऽयं पाठः । एवमग्रेऽप्यस्मिन्नध्याये कोष्ठस्थः पाठो ज्ञेयः ।

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८५६ चरकसंहिता ख्यास्यामः; तद्यथा— केशश्मश्रुनखलोमदन्ता स्थिसिरास्त्रायुधमन्यः शुक्रं चेति ( पितृ-जानि ) ॥ ७ ॥

( २ ) पितृज भाव - यह गर्भ पिता से भी उत्पन्न होता है । पिता के बिना गर्भ की उत्पत्ति नहीं हो सकती है । और गर्भाशय से उत्पन्न होने वाले जरायुज प्राणियों की भी उत्पत्ति नहीं होगी । जो गर्भ में पिता से उत्पन्न होने वाले अंग हैं और जो गर्भ के उत्पन्न होते समय पिता के शुक्र भाग से अंग उत्पन्न होते हैं, उनकी व्याख्या की जाती है, जैसे - केश, श्मश्रु ( दाढ़ी ), नख, रोम, दाँत ( Teeth ), हड्डी ( Bone Tissue ), शिरा ( Veins ), स्नायु ( Ligaments ) धमनी ( Arteries ), वीर्य ( Sperms ) ये अङ्ग पिता से उत्पन्न होते हैं || ७ || * आत्मजश्चायं गर्भः । गर्भात्मा ह्यन्तरात्मा यः, तं ' जीव ' इत्याचक्षते शाश्वतमरुजमज-रममरमक्षयमभेद्यमच्छेद्यमलोडयं विश्वरूपं विश्वकर्माणमव्यक्तमनादिमनिधनमक्षरमपि । स गर्भाशयमनुप्रविश्य शुक्रशोणिताभ्यां संयोगमेत्य गर्भत्वेन जन्यत्यात्मनाऽऽत्मानम्, आत्मसंज्ञा हि गर्भे । तस्य पुनरात्मनो जन्मानादित्वान्नोपपद्यते, तस्मान्न जात एवायम-जातं गर्भं जनयति, अजातो ह्ययमजातं गर्भं जनयतिः स चैव गर्भः कालान्तरेण वायु-वस्थविरभावान् प्राप्नोति, स यस्यां यस्यामवस्थायां वर्तते तस्यां तस्यां जातो भवति, या त्वस्य पुरस्कृता तस्यां जनिष्यमाणश्च तस्मात् स एव जातश्वाजातश्च युगपद्भवति; यस्मिंश्चैतदुभयं संभवति जातत्वं जनिष्यमाणत्वं च स जातो जन्यते स चैवानागतेष्व-वस्थान्तरेष्वजातो जनयत्यात्मनाऽऽत्मानम् । सतो ह्यवस्थान्तरगमनमात्रमेव हि जन्म चोच्यते तत्र तत्र वयसि तस्यां तस्यामवस्थायां यथा - सतामेव शुक्रशोणितजीवानां प्राक् संयोगाद्गर्भत्वं न भवति, तच्च संयोगाद्भवति; यथा - सतस्तस्यैव पुरुषस्य प्रागत्यात् पितृत्वं न भवति, तच्चापत्याद्भवति तथा सतस्तस्यैव गर्भस्य तस्यां तस्यामवस्थायां जातत्वमजातत्वं चोच्यते ॥ ८ ॥

( ३ ) आत्मा का जातत्व और अजातत्व - यह गर्भ आत्मा से भी उत्पन्न होता है, जो अन्त-रात्मा है वह ही गर्भ की आत्मा है और जो शाश्वत ( नित्य ), अरुज ( रोग, वेदनारहित ), अजर ( जीर्ण न होने वाला ' ), अमर ( मृत्युशून्य ), अक्षय ( क्षयरहित ), अभेद्य ( जिसका भेदन न हो सके ), अछेद्य ( जिसका छेइन न हो सके ), अलोड्य ( जो क्षोभयुक्त न हो ), विश्व - संसार में जिसका रूप -( स्वरूप ) व्याप्त है, विश्वकर्मा ( संसार का रचयिता ), अव्यक्त ( जिसका ज्ञान चर्मचक्षु से न हो सके ), अनादि ( जिसका प्रारम्भ नहीं हैं ), अनिधन ( नाशरहित ), अक्षर ( जो क्षीण न हो सके ) है । ऐसे आत्मा को जीव कहते हैं । वह नित्य, अजर, अमर, जीव गर्भाशय में प्रविष्ट होकर शुक्र और आर्तव से संयोग करके वह आत्मा अपने को गर्भ रूप में उत्पन्न करता है । गर्भ में आत्मा का आत्मा ही नाम पड़ता है । अनादि होने से उस शुद्ध, बुद्ध, नित्य आत्मा का जन्म नहीं होता है । इसलिए यह अजान आत्मा गर्भ को उत्पन्न करता है । निश्चित रूप से अजात ( अनुत्पन्न ) आत्मा अजात षड्धातुसमुदाय गर्भ को उत्पन्न करता है । वहीं गर्भ समय से बालक, तरुण ( जवान ), स्थविर ( वृद्धावस्था ) को प्राप्त करता है । वह गर्भ जिस - जिस अवस्था में वर्तमान होता है उस उस अवस्था में जान ( उत्पन्न ) होता है या उत्पन्न कहा जाता है । जो अवस्था आगे जाने वाली होती है उस अवस्था में उत्पन्न होने वाला होता है । इसलिए वही आत्मा जात और अजान एक ही काल में होता है । इस आत्मा में जातत्व और जनिष्यमाणत्व यह दोनों बात सम्भव है | वह आत्मा जात ( उत्पन्न ) होकर उत्पन्न करता है । वही आत्मा आने वाली अवस्थाओं १. ' तस्मादजात एवायमजातं गर्भं जनयति, जातोऽप्यजातं च गर्भं जनयति ' इति पा ० ।

पृष्ठ 946

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खुड्डिकागर्भात्रक्रान्ति ० ३ ] शारीरस्थानम् ८५७ में अजात रहता है और अजात शुद्ध, नित्य, आत्मा षड्धात्वात्मक आत्मा को उत्पन्न करता है । सत्तावान् द्रव्यमात्र का भिन्न - भिन्न अवस्था में जानेमात्र को ही उस उस वय ( उम्र ) में, उस - उस वाल्य, युवा, वृद्धावस्था में सत्तावान् का जन्म कहा जाता है, जैसे- सत्ता वाले शुक्र, शोणित और जीव के होते हुए भी जब तक इनका संयोग नहीं होता तब तक गर्भ नहीं कहा जाता, जब शुक्र आर्तव जीव का संयोग हो जाता है तब उसे गर्भ कहा जाता है । जैसे पुरुष वर्तमान अर्थात् जात है, पर उसे सन्तान नहीं है अतः सन्तान होने के पूर्व उसे पिता नहीं कहा जाता, तो जात पुरुष भी अवस्था में अजात है जब पुत्र उत्पन्न हो गया तब पितृत्व अवस्था में जात हो गया । एक ही पुरुष जात और अजात पुरुष कहा जाता हैं; वैसे ही सत्तात्मक गर्भ की आत्मा जिस अवस्था में वर्तमान रहती है उसमें जात और आने वाली अवस्था में अजात होती है ॥ ८ ॥

विमर्श - ऋषियों ने गर्भ की आत्मा को अन्तरात्मा या जीवात्मा कहा है । यह जीव अजर, अमर आदि विशेषणों से जाना जाता है । यही जीव पूर्व जन्म के कर्मानुसार गर्भाशय में शुकशोति और सूक्ष्म ४ महाभूतों के साथ जाकर और मिल कर स्वयं षड्धात्वात्मक गर्भ आत्मा को उत्पन्न करता है । गर्भात्मा जो इच्छा - द्वेष से उत्पन्न होता है उसे भी आत्मा कहते हैं और जो नित्य, शुद्ध, मुक्त, आत्मा है वह तो आत्मा है ही । इसी गर्भात्मा की गर्भ में संज्ञा ( नामकरण ) आत्मा होती है । आत्मा को एक साथ ही जात और अजात मान लिया जाता है इसका उदाहरण अवस्थाओं को देकर समझा दिया है । केवल माता के शरीर से उत्पन्न होने को ही जन्म नहीं कहा जाता किन्तु अवस्था परिवर्तन भी जन्म कहा जाता है । वस्तुतः अनित्य वस्तु का जन्म माता की कुक्षि से होता है; नित्य वस्तु का तो अवस्था परिवर्तन ही जन्म होता है; अन्यथा नित्य में नित्यत्व का व्याघात हो जायगा । इसी अवस्था परिवर्तन को ध्यान में रख कर गीता में कहा है- ' न जायते म्रियते वा कदा-चिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ ' ( अ. ३ ) । अर्थात् नित्य आत्मा न उत्पन्न होता है न मरता है । शरीर के नष्ट होने पर भी वह नहीं मरता । पर जैसे लोक में मनुष्य पुराने कपड़े को छोड़ कर नूतन वस्त्र धारण करते हैं उसी प्रकार यह नित्य आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नूतन शरीर धारण कर लेता है । इससे आत्मा का जन्म नहीं होता केवल अवस्था परिवर्तन होता है । यही बात चरक ने भी मानी है । इस प्रकार आत्मा को जात और अजात सिद्ध कर भरद्वाज के ' आत्मज गर्भ नहीं है ' इस पूर्व पक्ष का खण्डन कर दिया गया । न खलु गर्भस्य न च मातुर्न पितुर्न चात्मनः सर्वभावेषु यथेष्टकारित्वमस्ति; ते किञ्चित् स्ववशात् कुर्वन्ति, किञ्चित् कर्मवशात्, कचिच्चैषां करणशक्तिर्भवति, कचिन्न भवति । यत्र सच्चादिकरणसंपत्तत्र यथाबलमेव यथेष्टकारित्वम्, अतोऽन्यथा विपर्ययः । न च करणदोषादकरणमात्मा संभवति गर्भजनने, दृष्टं चेष्टा योनिरैश्वर्यं मोक्षश्वात्मविद्भि-रात्मायत्तम् । नह्यन्यः सुखदुःखयोः कर्ता । न चान्यतो गर्भो जायते जायमानः, नाङ्कुरो-त्पत्तिरवीजात् ॥ ९ ॥

माता - पिता और आत्मा में यथेच्छकारिता का अभाव -- माता - पिता और आत्मा गर्भ को उत्पन्न करते हैं, पर गर्भ को उत्पन्न करने में ये भाव ( माता, पिता, आत्मा ) स्वतन्त्र नहीं होते,

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८५८ चरकसंहिता जिससे जब जो चाहे वह कार्यं कर लें, किन्तु कर्म आदि के वशीभूत होते हैं । इसी बात को स्पष्ट कर रहे हैं । गर्भ के सभी भावों में माता, पिता, आत्मा इनकी यथेच्छाचारिता ( जो चाहे सो करें ) नहीं है । ये माता, पिता और आत्मा के भाव कुछ कार्य अपने वश ( इच्छा ) से करते हैं, कुछ कर्म के वशीभूत होकर करते हैं । कहीं - कहीं मन, बुद्धि, इन्द्रिय इत्यादि करणों की शक्ति से इच्छानुसार कार्य होता है, कहीं - कहीं मन आदि इन्द्रियों की शक्ति से भी कार्य नहीं होता । जहाँ मन आदि कारण श्रेष्ठ गुणयुक्त होते हुए मन, बुद्धि, इन्द्रिय सात्त्विक होते हैं, वहाँ उस विषय में मन आदि करण के बल ( शक्ति ) के अनुसार यथेच्छकारिता होती है, इससे विपरीत होने पर यथेच्छकारिता नहीं होती । अर्थात् मन, बुद्धि, करण, इनमें चञ्चलता होती है और ये अच्छे - अच्छे गुणों से युक्त नहीं होते, जैसे तामस एवं राजस गुण । तो अपनी इच्छानुसार कार्य नहीं होता है । करण ( साधनभूत ) मन, बुद्धि आदि में दोष होने से गर्भोत्पत्ति में आत्मा कारण नहीं है ऐसा कहना अनुचित है । अर्थात् आत्मा अवश्य कारण है । यह देखा गया है कि जो लोग आत्मा को जानने वाले हैं, अपने इन्द्रिय, मन को वश में कर आत्मा का प्रत्यक्ष कर चुके हैं, उन लोगों का अपनी इच्छानुसार उत्तम योनि को प्राप्त करना, ऐश्वर्यं ( सम्पत्ति ) प्राप्त करना और मोक्ष को प्राप्त करना ये सभी बातें उनके अधीन होती हैं । आत्मा के अतिरिक्त सुख - दुःख का कर्ता दूसरा कोई भी नहीं है । उत्पन्न होता हुआ गर्भ आत्मा से अतिरिक्त किसी भी दूसरे कारणों से उत्पन्न नहीं होता है । बिना बीज के अंकुर उत्पन्न नहीं होता, अर्थात् अंकुर का मूल कारण बीज है । अत: जैसे बिना बीज के अंकुर नहीं होता है, वैसे ही गर्भ का मूल कारण आत्मा है, बिना आत्मा के गर्भ की उत्पत्ति नहीं हो सकती है, अतः गर्भ ' आत्मज ' है || ९ || तु खल्वस्य गर्भस्यात्मजानि यानि चास्यात्मतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनु-यानि व्याख्यास्यामः; तद्यथा - तासु तासु योनिषूत्पत्तिरायुरात्मज्ञानं मन इन्द्रियाणि प्राणा-पानौ प्रेरणं धारणमाकृतिस्त्रर वर्णविशेषाः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ चेतना धृतिर्बुद्धिः स्मृति-रहङ्कारः प्रयत्नश्चेति ( आत्मजानि ) ॥ १० ॥

आत्मज भाव गर्भ के जो भाव आत्मज हैं और गर्भ के उत्पन्न होते समय जो भाव ( अंग ) आत्मा से उत्पन्न होते हैं, उनकी व्याख्या की जाती है । जैसे उन उन विभिन्न योनियों ( कभी मनुष्य, पक्षी, पशु आदि ) में उत्पन्न होना, आयु- स्वल्पायु, मध्यमायु, उत्तमायु का होना, आत्मज्ञान- ( शुद्धसत्त्वसमाधान होने पर आत्मा अपने को स्वयं ज्ञान करता है, फलस्वरूप वह मुक्त हो जाता है ) मन, इन्द्रियाँ, प्राण और अपान वायु का प्रेरण ( प्रवृत्त करना ), धारण ( रोकना ) और मन एवं इन्द्रियों को प्रेरण ( अपने - अपने विषय में लगाना ), धारण ( रोकना ) या किसी भी विषय को मन में अधिक काल तक स्थायी रखना, शरीर की आकृति, स्वर और वर्ण ( गौर - श्याम ) की उत्पत्ति करना; सुख - दुःख, इच्छा, द्वेष, चेतना, धृति, बुद्धि, स्मृति, अहंकार प्रयत्न ये सभी आत्मज भाव हैं ॥ १० ॥

विमर्श - के फल का भागी आत्मा होता है । अतः -मन द्वारा किये गए शुभाशुभ कर्मों आत्मा उन्हीं शुभाशुभ कर्मों के अनुसार नानायोनि में गमन करता है । इसीलिए नानायोनि गमन आत्मज भाव कहे जाते हैं । आत्मा निर्विकार होता है, इसलिए केवल आत्माजन्य ये भाव नहीं होते हैं, किन्तु आत्मसन्निकर्षजन्य होते है । नानायनि गमन जन्म के पूर्व आत्मज भाव है, आयु, आत्मज्ञान आदि जन्मोत्तर आत्मज भाव होते हैं । ज्ञान और विज्ञान का अर्थ अमरकोप में स्पष्ट बताया है, यथा- ' मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयो: ' । सात्म्यजश्चायं गर्भः । नासात्म्यसेवित्वमन्तरेण स्त्रीपुरुषयोर्वन्ध्यत्वमस्ति, गर्भेषु

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खुड्डिकागर्भावक्रान्ति ० ३ ] शारीरस्थानम् ६५६ वाऽप्यनिष्टो भावः । यावत् खल्वसात्म्यसेविनां स्त्रीपुरुषाणां त्रयो दोषाः प्रकुपिताः शरीर-मुपसर्पन्त न शुक्रशोणितगर्भाशयोपघातायोपपद्यन्ते, तावत् समर्था गर्भजननाय भवन्ति । सात्म्यसेविनां पुनः स्त्रीपुरुषाणामनुपहतशुक्रशोणितगर्भाशयानामृतुकाले सन्निपतितानां जीवस्थानवक्रमणाद्गर्भा न प्रादुर्भवन्ति । नहि केवलं सात्म्यज एवायं गर्भः, समुदयोऽत्र कारणमुच्यते । यानि खल्वस्य गर्भस्य सात्म्यजानि यानि चास्य सात्म्यतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा - आरोग्य मनालस्यमलोलुपत्वमिन्द्रियप्रसादः स्वरवर्णबीजसंपत् प्रहर्षभूयस्त्वं चेति ( सात्म्यजानि ) ॥ ११ ॥

( ४ ) सात्म्य की कारणता एवं सात्म्यज भाव - यह गर्भ सात्म्यज भी है । विना असात्म्य वस्तु के सेवन से स्त्री और पुरुष वन्ध्य नहीं होते हैं, और गर्भ में कोई विकृति भी नहीं होती है । असात्म्य वस्तु का सेवन करने वाले स्त्री पुरुषों के जब तक कुपित हुए बात पित्त कफ ये तीनों दोष शरीर में गमनागमन करते हुए शुक्र आर्तव और गर्भाशय को दूषित नहीं करते हैं तब तक स्त्री और पुरुष गर्भोत्पन्न करने में समर्थ होते हैं । अर्थात् जब शुक्र आर्तव और गर्भाशय अदुष्ट होते हैं तभी गर्भोत्पादन में स्त्री - पुरुष समर्थ होते हैं । सात्म्य वस्तुओं का सेवन करने वाले स्त्री और पुरुष, जिनके शुक्र, आर्तव एवं गर्भाशय में कोई विकृति नहीं है, ऐसे स्त्री - पुरुष का ऋतुकाल में संसर्ग होने पर यदि जीव ( आत्मा ) गर्भाशय में अवक्रमण नहीं करता तव गर्भ की उत्पत्ति नहीं होती । यह गर्भ केवल सात्म्य वस्तुओं के सेवन मात्र से नहीं होता है पर गर्भोत्पत्ति में समुदाय कारण होता है । जो गर्भ में सात्म्यज भाव है और उत्पन्न होते हुए गर्भ में सात्म्य वस्तु सेवन से जो भाव उत्पन्न होते हैं उनका व्याख्यान किया जा रहा है । जैसे - आरोग्य रहना, आलस्यरहित रहना, लालची नहीं होना, इन्द्रियों की प्रसन्नता, स्वर, वर्णं और शुद्ध एवं गुणयुक्त शुक्र का होना, सदा प्रत्येक कार्य में आनन्द की अधिकता का होना, ये सात्म्य भाव होते है ॥ ११ ॥

रसजश्चायं गर्भः । न हि रसादृते मातुः प्राणयात्राऽपि स्यात्, किं पुनर्गर्भजन्म | ने चैवासम्यगुपयुज्यमाना रस गर्भमभिनिर्वर्तयन्ति, न च केवलं सम्यगुपयोगादेव रसानां गर्भाभिनिर्वृत्तिर्भवति, समुदायोऽप्यत्र कारणमुच्यते । यानि तु खल्वस्य गर्भस्य रमजानि, यानि चास्य रसतः संभवतः संभवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा - शरीरस्याभि-निर्वृत्तिरभिवृद्धिः प्राणानुबन्धस्तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति ( रसजानि ) ॥ १२ ॥

( ५ ) रस की कारणता एवं रसज भाव - यह गर्भ रसज भी है । विना रस के माता की प्राणयात्रा ( जीवन निर्वाह ) ही नहीं हो सकती, तो गर्भ की उत्पत्तिकै से हो सकती है । अनुचित रूप से सेवन किया गया रस गर्भ को उत्पन्न करने में असमर्थ होता है । केवल विधिपूर्वक रसों का सेवन भी गर्भ को उत्पन्न नहीं करता । किन्तु गर्भोत्पत्ति में समुदाय कारण होता है । जो गर्भ में रसज भाव हैं और उत्पन्न होते हुए गर्भ में रस से जो भाव उत्पन्न होते है उनकी व्याख्या की जाती है । जैसे- शरीर को उत्पन्न करना, शरीर को बढ़ाना, शरीर से प्राण का सम्बन्ध रखना ( जीवित रखना ), अङ्ग - प्रत्यङ्गों को तृप्त करना, पुष्टि करना और उत्साह रखना ॥ १२ ॥

विमर्श - -शुक्र, आर्तव गर्भोत्पादक होते हैं । गर्भित पदार्थ कललादि के उत्पन्न होने पर भी, माता के शरीर से रस की प्राप्ति न हो तो गर्भ नष्ट हो जाता है या विकृत हो जाता है । अतः शरीर की उत्पत्ति रस से मानी गयी है । सुश्रुत ने - ' रसस्तुष्टिं प्रीणनं रक्तपुष्टिं च करोति ' से मूल धातु रस का कार्य बताया है और पुरुष को ' रसजः पुरुषः ' से रस से ही पुरुष की उत्पत्ति माना १. ' न चैवास्या असम्यपयुज्यमाना ' इति पा. । २. ' समुदायोऽत्र ' इति पा ० ।

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८६० चरकसंहिता है | शरीरोत्पत्ति के पूर्व शरीर को उत्पन्न करना, जन्मोत्तर काल के बाद अतिवृद्धि आदि करना रसज भाव है । अस्ति खलु सत्त्वमौपपादुकं; यज्जीवं स्पृक्शरीरेणाभिसंबध्नाति, यस्मिन्नपगमनपुरस्कृते शीलमस्य व्यावर्तते, भक्तिर्विपर्यस्यते, सर्वेन्द्रियाण्युपतप्यन्ते बलं हीयते, व्याधय आप्याय्यन्ते यस्माद्धीनः प्राणाञ्जहाति, यदिन्द्रियाणामभिग्राहकं च ' मन ' इत्यभिधीयते; तत्रिविधमाख्यायते - शुद्धं, राजसं, तामसमिति । येनास्य खलु मनो भूयिष्ठं, तेन द्विती-यायामाजातौ संप्रयोगो भवति; यदा तु तेनैव शुद्धेन संयुज्यते, तदा जातेरतिक्रान्ताया अपि स्मरति । स्मार्तं हि ज्ञानमात्मनस्तस्यैव मनसोऽनुबन्धादनुवर्तते, यस्यानुवृत्तिं पुर-स्कृत्य पुरुषो ‘ जातिस्मर ' इत्युच्यते । यानि खल्वस्य गर्भस्य सत्त्वजानि यान्यस्य सत्त्वतः संभवतः संभवन्ति तान्यनुव्याख्यास्यामः; तद्यथा - भक्तिः शीलं शौचं द्वेषः स्मृतिर्मोह -स्त्यागो मात्सर्य शौर्यं भयं क्रोधस्तन्द्रोत्साहस्तैच्ण्यं मार्दवं गाम्भीर्यमनवस्थितत्वमित्येव-मादयश्चान्ये, ते सत्वविकारा यानुत्तरकालं सत्त्वभेदमधिकृत्योपदेच्यामः । नानाविधानि खलु सत्त्वानि, तानि सर्वाण्येकपुरुषे भवन्ति, न च भवन्त्येककालम्, एकं तु प्रायोवृत्त्या-उह ॥ १३ ॥

( ६ ) मन की कारणता और मन के भाव - परलोक से आकर मन गर्भ में अवक्रमण नहीं करता है इस आक्षेप का खण्डन - निश्चित रूप से मन औपपादुक ( दूसरे शरीर से सम्बन्ध करने वात्रा ) है । क्योंकि सत्त्व ( मन ) जीव ( जीवात्मा ) का सदा स्पर्श करते हुए शरीर से सम्बन्ध स्थापित करता है । ( जब तक मन और आत्मा का नित्य सम्बन्ध है तभी तक संसार चलता है । जब मन और जीवात्मा का सम्बन्धविच्छेद हो जाता है तब आत्मा का मोक्ष हो जाता है और संसार समाप्त हो जाता है, सत्त्व का शरीरान्तर से अवश्य ही सम्बन्ध होता है ) । मन एक शरीर को छोड़ कर जब दूसरे शरीर में जाने के लिए प्रस्तुत होता है तब पूर्व त्याज्य शरीर का शील ( स्वभाव ) बदल जाता है । भक्ति ( प्रेम, इच्छा ) बदल जाती है, सभी इन्द्रियों में उपताप हो जाता है । अर्थात् उनकी क्रियाशक्ति हीन हो जाती है, बल नष्ट हो जाता है, व्याधियाँ बढ़ जाती हैं, उस मन से -हीन होने पर प्राणी प्राण को छोड़ देते हैं ( मर जाते हैं ) । सत्त्व किसे कहा जाता है इसका उत्तर देते हैं— जो इन्द्रियों का अभिग्राहक ( अपने - अपने विषयों को ग्रहण करने के लिए इन्द्रियों का प्रेरक ) है उसे मन कहा जाता है । वह मन तीन प्रकार का होता है - १. शुद्ध, २. राजस, ३ तामस । मन शरीरान्तर से सम्बन्ध स्थापित करता है तब पूर्वजन्म की घटनाओं का स्मरण क्यों नहीं करता है, इस आक्षेप का उत्तर -- जिस सत्त्व, रज और तम गुण की अधिकता के साथ प्राणी का मन सम्बन्धित होता है, उसी अधिक गुण के साथ मन दूसरे जन्म में भी सम्बन्धित रहता है अर्थात् पूर्व के अनुसार ही यह मन सात्विक है, राजस है, तामस है ऐसा प्रयोग होता है । जब शुद्ध सत्त्व गुण से मन सम्बन्धित होता है तब पूर्वजन्म की घटनाओं का स्मरण करता है ( पर जब वह गजस एवं तामस होता है तब अतिक्रान्त ( गतजन्म ) की घटनाओं का स्मरण नहीं करता ) । आत्मा का ज्ञान स्मृतिजन्य होता १. ‘ जीवस्पृक्शरीरेग ' इति पा । ' जीवं स्पृशतीति जीवस्पृक् । जीवस्पृक्शरीरं शुक्रशोणितात्मक-गर्भशरीरम् । तत्रैव जीवात्मनः प्रथमसंबन्धो भवतीति तत् ' जीवस्पृक् ' इत्युच्यते ' इति योगीन्द्र-नाथसेनः । २. ' द्वितीयायां जातौ ' इति पा. । ३. ' प्रायोऽनुवृत्त्या ' इति पा ० ।

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खुड्डिका गर्भावक्रान्ति ० ३ ] शारीरस्थानम् ८६१ है ( जैसी स्मृति होती है वैसा आत्मा को ज्ञान होता है ) और यह स्मृतिजन्य ज्ञान उसी शुद्ध मन के सम्बन्ध से त्यक्त शरीर से गृहीत शरीर में अनुवर्तन करता है । उसी ज्ञान की प्रधानता होने से पुरुष पूर्व जन्म का स्मरण करता है, अतः उस पुरुष को जातिस्मर कहा जाता है । इस प्रकार मन की व्याख्या की जा चुकी । अब गर्भ के सत्वज भावों की और उत्पन्न होते हुए गर्भ में सत्त्व से उत्पन्न होने वाले भावों की व्याख्या की जाती है । जैसे - भक्ति ( प्रेम, इच्छा ), शील ( स्वभाव ), शौच ( पवित्रता ), द्वेष करना विषयों का स्मरण करना, मोह ( ज्ञानशून्यता ), त्याग ( दान देना ), मात्सर्य ( दूसरों की वृद्धि को न देख सकना ), शौर्य ( पराक्रमशीलता ), भय ( डरना ), क्रोध करना, तन्द्रा, उत्साह करना, तीव्र स्वभाव का होना, कोमल प्रकृति का होना, गम्भीर प्रकृति का होना, चञ्चलप्रकृति का होना आदि ये भाव और इसी प्रकार जो अन्य भाव हैं वे सत्वज भाव कहे जाते हैं | आगे महती गर्भावक्रान्ति नामक चौथे अध्याय में मन के भेदों को लेकर जिनका व्याख्यान करूँगा वे सब भी सत्त्व विकार कहे जाते हैं । इस प्रकार सत्र से उत्पन्न होने वाले भाव कह दिए गए । मन अनेक प्रकार का होता है, सभी प्रकार का मन एक पुरुष में होता है, पर अनेक प्रकार का मन एक पुरुष में एक ही काल में नहीं होता है - भिन्न - भिन्न काल में होता है । जब अनेक प्रकार का एक पुरुष होता है तब कैसे यह कहा जाता है कि यह पुरुष ( मन ) राजस है, यह सात्त्विक है, इस आक्षेप का उत्तर- ' एकं तु प्रायोवृत्त्याह ' अर्थात् मन के अनेक होते हुए भी मन में जिस एक गुण की अधिकता होती है उसी एक नाम से जैसे सात्त्विक या राजस या तामस कहा जाता है । जिस एक गुण का अनुवर्तन बार - बार मन में होता है उसी नाम से मन व्यवहृत होता है ॥ १३ ॥

* एवमयं नानाविधानामेषां गर्भकराणां भावानां समुदायादभिनिर्वर्तते गर्भः; यथा-कूटागारं नानाद्रव्यसमुदायात्, यथा वा रथो नानारथाङ्गसमुदायात्; तस्मादेतदवोचाम --मातृजश्चायं गर्भः, पितृजश्व, आत्मजश्च सात्म्यजश्व, रसजश्व, अस्ति च सत्वमौपपादुक-मिति ( होवाच भगवानात्रेयः ) ॥ १४ ॥

गर्भ का समुदायजत्व - इस प्रकार यह गर्भ मातादि अनेक प्रकार के गर्भकारक भावों के समुदाय से उत्पन्न होता है । जिस प्रकार कूटागार विभिन्न द्रव्यों के समुदाय से बनाया जाता है या जिस प्रकार रथ के अनेक अङ्गों के समुदाय से रथ बनता है, उसी प्रकार यह गर्भ भी समुदाय प्रभव है । इसलिए कहते है कि यह गर्भ मातृज, पितृज, आत्मज, सात्म्यज और रसज है, गर्भ में मन दूसरे शरीर से आकर सम्बन्ध करता है ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा ॥ १४ ॥

विमर्श - -- माता आदि ६ कारणों के समुदाय से गर्भ की उत्पत्ति होती है । इसी बात को पुष्ट करने के लिए उदाहरणों का निर्देश किया गया है । गर्भ की उत्पत्ति में मुख्य ४ चार ही कारण होते हैं - मातृन, पितृज, आत्मज और सत्त्वज भाव । क्योंकि शुक्र और आर्तव के साथ नित्य सम्बन्धित मन और आत्मा का संसर्ग जब गर्भाशय में होता है तभी गर्भोत्पत्ति हो जाती है, जैसा बताया है कि ' शुक्रासमाषो यदैव खलु जायते । जीवस्तदैव विशति युक्तः शुक्रार्तवान्तरात् ॥ ' बाद में सात्म्य और रस उस गर्भ की वृद्धि में कारण होते हैं । यहाँ पर मातृज, पितृज, आत्मज और सत्व ये भाव परस्पर में सापेक्ष होते हैं । एक के भी बिना गर्भ की उत्पत्ति सम्भव नहीं है अतः गर्भ को समुदाय प्रभव कहा गया है ।