चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 931–940
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 931–940
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८४२ चरकसंहिता
बीजात् समांशादुपतप्तबीजात् स्त्रीपुंसलिङ्गी भवति द्विरेताः ।
शुक्राशयं गर्भगतस्य हत्वा करोति वायुः पवनेन्द्रियत्वम् ॥ १८ ॥
( १ ) प्रश्न: - द्विरेता क्यों होता है ( कस्माद् द्विरेताः ) इसका उत्तर - आर्तव और शुक्र के समान भाग होने से, और आर्तव और शुक्र के वातादि दोषों से दुष्ट होने से, स्त्री और पुरुष दोनों के केवल लक्षण युक्त द्विरेता ( नपुंसक ) की उत्पत्ति होती है । ( २ ) पवनेन्द्रिय क्यों होता है ( कस्मात् पवनेन्द्रियो वा ) इसका उत्तर - गर्भाशय में गया हुआ गर्भ ( पुत्र ) के शुक्राशय को गर्भाशयगत विकृत वायु नष्ट कर देती है तब बालक पवनेन्द्रिय उत्पन्न होता है ॥ १८ ॥
विमर्श - स्त्री पुंसलिङ्गी का तात्पर्य यह है कि उत्पन्न बालक में स्त्री - पुरुष के साधारण चिह्न नासिका, कान, नेत्र आदि पाये जाते हैं, पर स्त्री - पुरुष के विशेष लक्षण योनि, स्तन मेड, दाढ़ी, मूळ, आदि लक्षण उत्पन्न नहीं होते हैं । पवनेन्द्रिय का तात्पर्य यह है कि ऐसे नपुंसक के मेढ़ में बल होता है, मैथुन करने में उत्साह भी होता है । परन्तु शुक्राशय नहीं होता अतः शुक्र न निकल केवल वायु निकलती है । यथा - ' यदा स्त्री प्रथमं कृतार्था भवति ततः पुरुषेण पश्चाच्छुक्र-मुत्सृष्टं हर्षानवस्थितचेतसः स्त्रिया वातो - विगुणीकरोति, पुंस्त्ववाहीनि चास्य स्रोतांसि चोपहन्ति, तदा वातेन्द्रियं भवति तन्मैथुने वातमेवोत्सृजति । ' ( अष्टाङ्गसंग्रह शा. ३ ) अर्थात् मैथुन में पहले स्त्री श्रान्त हो जाय, बाद में शुक्र का उत्सर्ग हो तो स्त्री का हर्ष ( आनन्द ) समाप्त हो गया रहता है, अतः वात कुपित होकर शुक्रवाही स्रोत को नष्ट कर देता है । अतः वातेन्द्रिय वालक होता है | उसके वयस्थ होने पर मैथुन में केवल वात का ही क्षरण होता है । उपर्युक्त वर्णन जन्म जात विकृतियों का द्योतक है ।
शुक्राशयद्वारविघट्टनेन संस्कारवाहं कुरुतेऽनिलश्च ।
मन्दाल्पबीजावबलावहप कीबौ च हेतुविकृतिद्वयस्य ॥ १ ९ ॥
( ३, ४, ५ ) संस्कारवाही, नर और नारिषण्ड क्यों होते हैं ( संस्कारवाही नरनारिषण्डौ ) इसका उत्तर - गर्भाशय में दुष्ट वात ( कुपित वायु ) गर्भस्थ वालक के शरीर में ही शुक्राशय के द्वार को विघटित ( विकृत रूप से दूषित ) कर देता है इससे संस्कारवाह वालक की उत्पत्ति होती है । मन्द शक्ति और अल्प शुक्र आर्तव वाले पुरुष स्त्रो जो दुर्बल हों और उनमें हर्ष न हो अर्थात्. लिङ्ग में उत्थान न हो ऐसे स्त्री - पुरुष मैथुन में प्रवृत्त होते हैं तो स्त्री - पुरुष दोनों की विकृति होने. से नरषण्ड और नारिषण्ड उत्पन्न होते हैं ॥ १ ९ ॥ विमर्श - संस्कारवाह का तात्पर्य यह है कि ' संस्कारो गुणान्तराधानम् ' दूसरे के गुणों को अपने में रखने को संस्कार कहा जाता है । जिस पुरुष में वाजीकरण औषधि के सेवन से, या अन्य किसी प्रकार की चिकित्सा से मैथुन में शक्ति उत्पन्न हो जाय तो उसे संस्कारवाह कहा जाता है । संस्कारवाह का सुश्रुत शरीर अ. २ में आसेक्य, सौगन्धिक और कुम्भीक यह तीन भेद माना गया है, यहाँ चरक में केवल संस्कार द्वारा मैथुन में प्रवृत्त होने वाले नपुंसक का वर्णन एक ही प्रकार का है, क्योंकि वह संस्कार चाहे कितने प्रकार का हो पर संस्कारत्वेन संस्कार एक ही माना जा सका है । नरनारि षण्ड - संभोग के समय स्त्री - पुरुष में शक्ति मन्द हो, आर्तव शुक्र अल्प मात्रा में निकले हों, और दुर्बल माता - पिता हों, और लिङ्ग में उत्थान और भगांकुर में उत्तेजना न हो तो ऐसी अवस्था में मैथुन करने से यदि आर्तवाधिक्य रहा तो नारिषण्ड, यदि शुक्रानिक्य रहा तो नरषण्ड १. ' गत्वा ' इति पा ० । २. ‘ संस्कारवाहं हि करोति वायुः ' इति पा ० ।
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अतुल्यगोत्रीयशारीराध्यायः २ ] शारीरस्थानम् ८४३ की उत्पत्ति होती है । सुश्रुत ने नर - नारिषण्ड के विषय में इस प्रकार बताया है, यथा- ' यो भार्याया-मृत मोहादङ्गनेव प्रवर्तते । ततः स्त्रीचेष्टिताकारो जायते षण्ढसंज्ञितः ॥ ऋतौ पुरुषवद्वापि प्रवर्तेताङ्ग-ना यदि । तत्र कन्या यदि भवेत् सा भवेन्नर चेष्टिता ॥ ' ( सु. शा. अ. २ ) । इन दोनों लोकों की टीका करते हुए डल्हण ने लिखा है - ' स पुमान् स्त्र्याकृतिः स्त्रीचेष्टितश्च स्त्रीवदधोभूतः स्वमेद्स्योर्ध्वप्रदेशे-ऽपरपुरुषात् बीर्यच्युतिं कारयति, स्त्रीरूपापि पुंवत् स्त्रियमारुह्य तद्योनौ स्वयोनिघर्षणं करोति । ' इस तरह स्त्री और पुरुष नपुंसकों का वर्णन किया है ।
मातुर्व्यवायप्रतिधेन वक्री स्याडोजदौर्बल्यतया पितुश्च ।
ईर्ष्याभिभूतावपि मन्दहर्षावीर्थ्यारतेरेव वदन्ति हेतुम् ॥ २० ॥
( ६, ७ ) प्रश्न: वक्री और ईर्ष्यारति सन्तान कैसे उत्पन्न होती है ( वक्री तथेर्ष्याभिरतिः ) का उत्तर - • मैथुन काल में माता की मैथुन में इच्छा न हो अथवा माता का शरीर सीधा न होकर मैथुन काल में टेढ़ा रहे या पिता के वीर्य में दुर्बलता हो तो बालक वक्री होता है । माता - पिता में मैथुन करने की प्रबल इच्छा न हो पर ईर्ष्या से मैथुन में प्रवृत्त हो तो उससे उत्पन्न होने वाला बालक ईर्ष्यारति नपुंसक उत्पन्न होता है ॥ २० ॥
विमर्श - सुश्रुत ने भी कहा है, यथा – ' दृष्ट्वा व्यवायमन्येषां व्यवाये यः प्रवर्तते । ईर्ष्यकः स च विज्ञेयः ॥ ' ( सु. शा. अ. २ ) ।
वाय्यग्निदोषावृषणौ तु यस्य नाशं गतौ वातिकपण्डकः सः ।
इत्येवमष्टौ विकृतिप्रकाराः कर्मात्मकानामुपलक्षणीयाः ॥ २१ ॥
( ८ ) प्रश्न: - वातिक षण्ढ क्यों होता है ( वातिकषण्ढको वा ), इसका उत्त - गर्भाशय में दुष्ट वायु और अग्नि ( पित्त ) कुपित होकर गर्भाशय गत वालक का वृषण ( अण्डकोष ) नष्ट कर देते हैं । इसे वातिक षंड कहते है । इस प्रकार कर्म के अनुसार गर्भों की आठ प्रकार की विकृतियों को समझना चाहिए ॥ २१ ॥
विमर्श - - इस प्रकार के नपुंसक में अण्डकोष का बिल्कुल अभाव होता है अथवा बहुत ही छोटा होता है । जब आठवें मास में गर्भगत बालक में अण्डकोष उदर गुहा से वंक्षण नलिका द्वारा अण्डकोष में स्वाभाविक रूप से आता है तब वायु और तेज़ के द्वारा सुखा दिया जाता है अथवा वंक्षण नलिका के संकुचित हो जाने से अण्डकोष में नहीं उतर पाता । इस प्रकार के रोग को Un or Maldescended Testes कहते हैं ।
गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य कुक्षौ स्त्रीपुंनपुंसामुदरस्थितानाम् ।
किं लक्षणं? कारणमिष्यते किं सरूपतां येन च यात्यपत्यम् ॥ २२ ॥
( १ ) प्रश्न - गर्भाशय में सद्यः प्राप्त गर्भ का क्या लक्षण होता है । ( २ ) गर्भाशय में स्थित स्त्री का क्या लक्षण है? ( ३ ) पुरुष का क्या लक्षण है? ( ४ ) नपुंसक का क्या लक्षण है? ( ५ ) और क्या कारण है कि संतानें सदृश उत्पन्न होती हैं? ॥ २२ ॥
निष्ठ । विका गौरवमङ्गसादस्तन्द्राप्रहर्षो हृदये व्यथा च ।
तृप्तिश्च बीजग्रहणं च योन्यां गर्भस्य सद्योऽनुगतस्य लिङ्गम् ॥ २३ ॥
( १ ) प्रश्न - सद्यः गृहीत गर्भिणी का क्या लक्षण है ( ' सद्योऽनुगतस्य गर्भस्य किं लक्षणम् ) " उत्तर — बार - बार थूक का आना, शरीर में भारीपन, अङ्गों में शिथिलता, तन्द्रा, ग्लानि, हृइय व्यथा, तृप्ति, योनिद्वारा बीज का अर्थात् स्त्री बीज और शुक्राणु का गर्भाशय में ग्रहण कर लेना सद्यः गृहीत गर्भा का लक्षण होता है ॥ २३ ॥
१. ' वीर्याह्वयस्यैव ' इति पा. ।
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८४४ चरकसंहिता विमर्श - कुछ लोग सद्यः से मैथुन करने के उपरान्त ही इन लक्षणों का होना मानते हैं और कुछ लोग जब तक गर्भ में व्यक्तावस्था नहीं आती तब तक यह लक्षण मानते है । प्रायः यह अवस्था आधान काल से लेकर ६ सप्ताह की होती है । इस काल तक जो लक्षण व्यक्त होते हैं उन्हें सद्योगृहीतगर्भा के लक्षण समझा जाता है । वाग्भट ने सद्योगृहीतगर्भा का लक्षण निम्न बताया है - ' लिङ्गं तु सद्योगर्भाचा योन्यां वीजस्य संग्रहः । तृप्तिर्गुरुत्वं स्फुरणं शुक्रास्राननुवन्धनम् । हृदयस्पन्दनं तन्द्रा नृड्ग्लानिर्लोमहर्षगम् ॥ ' ( वा. शा. अ. १ ) । सद्योगृहीतगर्भा के लक्षण ( Early Signs of Pregnancy ) आज कल भी एक समस्या है । प्रथम सन्तान के गर्भावान के समय स्त्री - पुरुष की उत्सुकता को निश्रयात्मक रूप देना चिकित्सक के लिये कठिन होता है । जीवों पर परीक्षण से निदान में सहायता ली जाती है परन्तु वह भी शत - प्रतिशत ठीक नहीं होती । - इस दिशा में आयुर्वेदीय साहित्य में वर्णित प्रसंगों पर अनुसन्धान आवश्यक प्रतीत होता है ।
सध्याङ्गचेष्टा पुरुषोथिंनी स्त्री स्त्रीस्वप्नपानाशनशीलचेष्टा ।
संव्यात्तगर्भा न च वृत्तगर्भा सव्यप्रदुग्धा स्त्रियमेत्र सूते ॥ २४ ॥
पुत्रं त्वतो लिङ्गविपर्ययेण व्यामिश्रलिङ्गा प्रकृतिं तृतीयाम् । ( २, ३, ४ ) प्रश्न: स्त्री कुक्षि में स्त्री, पुरुष और नपुंसक के क्या लक्षण हैं ( स्त्रीपुंनपुंसा--मुरस्थितानां किं लक्षणम् ) का उत्तर - जो स्त्री सभी चेष्टायें वाम भाग से करती है, जो पुरुष की इच्छा मैथुन के लिये करती है, जो स्वप्न में स्त्री या स्त्री लिङ्ग पदार्थों को प्राप्त करती हैं, जो स्त्री - लिङ्ग खाद्य और पेय पदार्थों में अपनी अधिक इच्छा प्रगट करती हैं, जो स्त्रियों की तरह स्वभाव, और अन्य चेष्टायें या हाव - भाव करती है, जिस स्त्री के वाम भाग में गर्भ के रहने से वाम कुक्षि में उभार प्रतीत होता है, गर्भ का आकार गोलाकार न हो अर्थात् उदर गोलाई लिए न बढ़ा हो, वाम स्तन में दुग्ध प्रथम उत्पन्न हो तो वह स्त्री निश्चित रूप से कन्या का ही प्रसव करती है । इससे भिन्न लक्षण प्रतीत हो तो पुत्र का प्रसव करती है । जैसे- दक्षिण भाग से चेष्टायें करती हैं, मैथुन की इच्छा नहीं करती है, स्वप्न में पुरुष या पुंलिङ्ग वाचक खाद्य पेय पदार्थों में अधिक इच्छा व्यक्त करती है, पुरुष की तरह स्वभाव वाली और पुरुष की तरह चेष्टायें करती है, दक्षिण भाग में गर्भ की स्थिति रहनी है, उदर गोलाकार प्रतीत होता है, दक्षिण स्तन में प्रथम दुग्ध उत्पन्न होता है तो पुत्र का प्रसव करती है । इन दोनों लक्षणों से मिश्रित लक्षण होने पर नपुंसक का प्रसव करती है । विमर्श -- इसको वाग्भट ने इस प्रकार बताया है, यथा- ' प्राग्दक्षिणस्तनस्तन्या पूर्वं तत्पार्श्व-चेष्टिनी | पुन्नामदौर्हृदप्रश्नरता पुंस्वप्रदर्शिनी || उन्नते दक्षिणे कुक्षौ गर्भे च परिमण्डले । पुत्रं सूतेऽन्यथा कन्यां या चेच्छति नृमङ्गतिम् ॥ नृत्यवादित्रगान्धर्वगन्धमाल्यप्रिया च या । क्लीवं तत्सङ्करे तत्र मध्यं कुक्षेः समुन्ननम् ॥ यमौ पार्श्वद्वयोन्नायात् कुक्षौ द्रोण्यामिव स्थिते ॥ ' ( वा. शा. १ ) | आधु-निक विचार से ये उपर्युक्त लक्षण सभी स्त्रियों में नहीं पाए जाते, और जो लक्षण पाये भी जाते हैं वे सभी स्त्रियों में एक से नहीं होते अतः निश्चयात्मक लक्षण नहीं माने जाते । आजकल भी लिङ्ग निर्णय के लिए निश्चयात्मक कोई चिह्न निर्धारित नहीं किया गया है । इस दिशा में अनुसंधान
आवश्यक है ।
गर्भोपपत्तौ तु मनः स्त्रिया यं जन्तुं व्रजेत्तत्सदृशं प्रसूते ॥ २५ ॥
( ५ ) प्रश्न: सन्तान के सदृश होने में क्या कारण है ( येन अपत्यं सरूपतां याति किं कारणमिष्यते ) का उत्तर - गर्भ की उत्पत्ति के समय स्त्री का मन जिस किसी प्राणी की ओर आकृष्ट होता है, उसी प्राणी के सदृश सन्तान को स्त्री उत्पन्न करती है ॥ २५ ॥
१. ' सुसुखार्थिनी या ' इति पा ० । २. ' सव्याङ्गगर्भा ' इति पा ० ।
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अतुल्य गोत्रीय शारीराध्यायः २ ] शारीरस्थानम् ८४५ विमर्श - स्ने- ' पूर्व पश्येदृतुलाता यादृशं नरमङ्गना । तादृशं जानयेत्पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः ॥ ' ( सु.शा. अ. २ ) । ऋतु स्नान के बाद जिस प्रकार के पुरुष को स्त्री देखती है वैसी ही सन्तति उत्पन्न होती है । यदि वह पति के सदृश सन्तान चाहती है तो पति को ही देखे । पति केही समान सन्तान होना लोक में उत्तम माना जाता है अतः पति को ही देखने का निर्देश किया है । पर कहीं पति लँगड़ा, काना और काला या मूर्ख होगा तो कौन स्त्री पति के समान कुरूप सन्तान उत्पन्न करना चाहेगी? अर्थात् कोई नहीं । अतः वाग्भट ने इसका निर्देश किया है, यथा--' इच्छन्ती भर्तृसदृशं पुत्रं पश्येत्पुरः पतिम् ', यदि पति कुरूप है और स्त्री सुरूप सन्तानें उत्पन्न करना चाहती है तो उनके लिए - ' इच्छेयाशं पुत्रं तद्रूपचरितांश्व तौ । चिन्तयेतां जनपदांस्त-दाचारपरिच्छदौ । ' ( वा. शा. १ ) । चरक ने भी शा. अ. ८ के १४ गद्य में ' या या च यदाविवम् ' से इसी बात को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है ।
गर्भस्य चत्वारि चतुविधानि भूतानि मातापितृसंभवानि ।
आहारजान्यात्मकृतानि चैव सर्वस्य सर्वाणि भवन्नि देहे ॥ २६ ॥
तेषां विशेषावन्ति यानि भवन्ति मातापितृकर्मजानि ।
तानि व्यवस्येत् सदृशत्वहेतुं सत्त्वं यथानूकमपि व्यवस्येत् ॥ २७ ॥।
और भी माता - पिता के सदृश होने का द्वितीय कारण सभी गर्भो के शरीर की उत्पत्ति में सभी मातृज, पितृज, आहारज और आत्मकृत कर्म ये चार और चार महाभूत ( वायु, अग्नि जल और पृथिवी ) कारण हैं । इन कारणों में जिस माता, पिता और कर्मज कारण की जब विशेष रूप से प्रधानता होती है, तब उस प्रधान रूप महाभृत के सदृश और मन में भी जिस सत्त्व,. रज और तम गुण की प्रधानता होती है उसी के समान सन्ताने उत्पन्न होती हैं ॥ २६-२७ ॥ विमर्श --माता, पिता, आहार, आत्मा ये चारों, सूक्ष्म चार महाभूतों के सम्बन्ध होने पर अपने सदृश ( अर्थात् चार कारणों में जिस कारण में जिस महाभूत की प्रधानता होती है उसी के अनुसार ) जीव को उत्पन्न करते हैं । १. मातृज अङ्ग आर्तव के द्वारा, २. पितृज अङ्ग शुक्र के द्वारा, ३. आहारज अङ्ग शुक्रशोणित के द्वारा गर्भाशय में शुक्र शोणित का सम्बन्ध होने के बाद खाये हुये माता के आहार का रस गर्भ को नमिले तो किसी भी अङ्ग की उत्पत्ति या वृद्धि नहीं हो सकती अतः सभी अङ्ग आहाररसज होते हैं ), ४. आत्मकृत अङ्गद्वारा, जब आत्मा अपने जन्मान्तरीय शुभ कर्मों से युक्त होता है तब मात - पिता के सदृश बालक उत्पन्न होता है । अशुभ कर्मों से कुरूप सन्तान उत्पन्न होती है । माता आदि कारणों से ४ महाभूतों का संयोग होने पर उनकी संख्या १६ हो जाती है, जैसे- १. मातृज वायु, २ पितृज वायु, ३. आहाररसज वायु, ४. आत्मकर्मज वायु, ५. मातृज अग्नि, ६. पितृज अनि, ७. आहाररसन अनि, ८. आत्मकर्मज अग्नि, ९, मातृज जल, १०. पिनुज जल, ११. आहाररसज जल, १२. आत्मकर्मज जल, १३. मातृज पृथिवी, १४. पितुज पृथिवी, १५. आहाररसज पृथिवी, १६. आत्मकर्मज पृथ्वी इनमें पिता - माता, आहाररस और आत्मा ये क्रमशः-पूर्वपूर्व प्रधान कारण हैं । माता - पिता के समान न होने पर आहार रस उसके अभाव में आत्मकृत कर्म सुरूपता में कारण होता है । भाता पिता का मन जैसा होता है उसका भी प्रभाव बालक के मन पर पड़ता है । इसलिए माता - पिता के मन के समान बालक का मन होता है और विशेष कर मन पर प्रभाव वातावरण का पड़ता है, इसीलिये वाग्भट ने भी - ' इच्छेतां यादृशं पुत्रं तद्रूप-चरिनांश्च तौ ' कहा है । वातावरण से मन प्रभावित होता रहता है, चाहे गर्भाशय में हो या जन्म
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८४६ चरकसंहिता हो गया हो । जन्मोत्तर काल में भी वातावरण के दूषित होने से बालकों की प्रकृति प्रायः दूषित हो जाती है । चक्रपाणि ने, जन्मान्तर में जो शरीर प्राप्त था उसी के अनुसार प्रकृति बनती है, ऐसा बताया है ।
कस्मात् प्रजां स्त्री विकृतां प्रसूते हीनाधिकाङ्क्षीं विकलेन्द्रियां वा ।
देहात् कथं देहमुपैति चान्यमात्मा सदा कैरनुबध्यते च ॥ २८ ॥
प्रश्न - १. किस कारण से स्त्री हीन या अधिक, या विकलेन्द्रिय ( इन्द्रियशून्य ) सन्तान को उत्पन्न करती है । २. एक शरीर से दूसरे शरीर में आत्मा कैसे चली जाती है । ३. कौन कौन से भाव हैं जो आत्मा के साथ सर्वदा लगे रहते हैं ॥ २८ ॥
बीजात्मकर्माशयकालदोषैर्मातुस्तथाऽऽहारविहारदोषैः! कुर्वन्ति दोषा विविधानि दुष्टाः संस्थानवर्णेन्द्रियवैकृतानि ॥ २ ९ ॥
वर्षासु काष्ठाश्मघनाम्बुवेगास्तरोः सरित्स्रोतसि संस्थितस्य ।
यथैव कुर्युर्विकृतिं तथैव गर्भस्य कुक्षौ नियतस्य दोषाः ॥ ३० ॥
( १ ) प्रश्न: विकृत, हीन, अधिक और विकल इन्द्रिय वाली सन्तानें स्त्री कैसे उत्पन्न करती है ( कस्मात्प्रजां स्त्री विकृतामित्यादि ) का उत्तर - शुक्रशोणित स्वरूप बीज, आत्मीय पूर्व देह का अशुभ कर्म, गर्भाशय और काल की विकृति से, माता के आहार - विहार के दोष से अर्थात् गर्भ अवस्था में पालनीय आहार - विहार का त्याग करने आदि विविध कारणों से विकृत वातादि दोष, गर्भ के संस्थान ( आकृति ), वर्ण ( रूप ) और इन्द्रियों को विकृत कर देते हैं । वर्षाकाल में संयोगवश यदि कोई वृक्ष नदी के स्रोत में पड़ जाय तो काष्ठ, पत्थर से संयुक्त नदी का भयंकर वेग उसे जिस प्रकार अनिश्चित रूप से विकृत कर देता है उसी प्रकार गर्भाशय में विकृत वानादि दोप गर्भको अनिश्चित रूप से विकृत कर देते हैं ॥ २ ९ -३० ॥
भूतैश्चतुर्भिः सहितः सुसूक्ष्मैर्मनोजवो देहमुपैति देहान् ।
कर्मात्मकत्वान्न तु तस्य दृश्यं दिव्यं विना दर्शनमस्ति रूपम् ॥ ३१ ॥
( २ ) प्रश्न: एक देह से आत्मा दूसरे शरीर में कैसे जाती है ( देहात् कथं देहमुपैति ) का उत्तर - मनोजव ( मन के संयोग से ही गमन करने वाला ) आत्मा, आकाश को छोड़कर चार सूक्ष्म महाभूतों के साथ मृत देह से निकल कर पुनः नूतन शरीर को प्राप्त करता है । इस प्रकार जीर्ण देह का त्याग, नूतन देह को प्राप्त करना यह आत्मा का कार्य पूर्वकृत कर्म के अनुसार होता है । नूतन शरीर में जब आत्मा प्रवेश करती है तो उसका रूप दृश्य नहीं होता पर जिन लोगों को तपस्या या योग के द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त है वे आत्माको मृत शरीर से निकलते और नवीन शरीर में प्रवेश करते हुए देखते हैं अतः जब तक दिव्यदृष्टि नहीं प्राप्त होती तब तक आत्मा का दर्शन नहीं होता ॥ ३१ ॥
विमर्श - यद्यपि आत्मा को निष्क्रिय माना जाता है पर मन द्वारा किए गए शुभाशुभ कर्मों का भोक्ता आत्मा ही होता है, अतः शुभाशुभ कर्म के वशीभूत आत्मा १. स्पर्शतन्मात्रा, २. रूपतन्मात्रा, ३. रसतन्मात्रा और ४. गन्धतन्मात्रा इन अतीन्द्रिय सूक्ष्म चार महाभूतों और मन के साथ होकर नानायोनियों में गमन करती है । इस आत्मा को नानायोनियों में गमन कराने वाला मन ही होता है, यथा - ' नित्यानुवन्धं मनसा देहकर्मानुपातिना ' ( शा. अ. १ ) । आत्मा अव्यक्त, निर्गुण और निष्क्रिय होती हैं । उससे जब तक सूक्ष्म ४ महाभूत और मन लगे रहते हैं तब तक लिङ्ग शरीर धारण कर वह गमनागमन किया करती है । यह इतनी सूक्ष्म होती है कि इस चर्म
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अतुल्यगोत्रीयशारीराध्यायः २ ] शारीरस्थानम् ८४७ चक्षु से देखी नहीं जाती । केवल योगिजन जिन्हें दिव्यदृष्टि है वे, इस लिङ्गात्मक शरीर का प्रत्यक्ष कर लेते हैं । आकाश क्रियाशून्य है अतः गमन क्रिया में आत्मा के साथ गर्भाशय में नहीं जाता । अतः यहाँ केवल चार महाभूतों का ही साथ में गमन बताया गया है । स सर्वगः सर्वशरीरभृच्च स विश्वकर्मा स च विश्वरूपः । १ सचेतनाधातुरतीन्द्रियश्च स नित्ययुक् सानुशयः स एव ॥ ३२ ॥
और भी — लिंग शरीर से युक्त होकर सर्वत्र व्यापक, सभी शरीरों का धारण करने वाली, विश्वकर्मा, जगत् स्वरूप, चेतनाधातु, अतीन्द्रिय, वह आत्मा मन, बुद्धि और इन्द्रियों से युक्त होती हुई सदा राग - द्वेष से युक्त रहती है ॥ ३२ ॥
रसात्ममातापितृसंभवानि भूतानि विद्याद्दश षट् च देहे ।
चत्वारि तत्रात्मनि संश्रितानि स्थितस्तथाऽऽत्मा च चतुर्षु तेषु ॥ ३३ ॥
और भी - • शरीर में रसज, आत्मज, मातृज और पितृज भेद से चारों महाभूत सोलह प्रकार के होते है । ये चारों महाभूत आत्मा में आश्रित हैं और आत्मा इन चारों महाभूतों में आश्रित रहती है ॥ ३३ ॥
विमर्श - संसार चलाने के लिए इन दोनों का सम्बन्ध अन्योन्याश्रय रूप से रहता है । यदि आत्मा महाभूतों में आश्रित न हो तो संसार चल ही नहीं सकता क्योंकि केवल आत्मा अज्ञेय, और निष्क्रय होती है और महाभूत सूक्ष्म कारण रूप से आत्मा ने आश्रित रहते हैं क्योंकि वे बिना आत्मा के जगत् का कारण नहीं बन सकते ।
भूतानि मातापितृसंभवानि रजश्च शुक्रं च वदन्ति गर्भे ।
आप्याय्यते शुक्रमसृक् च भूतैर्यैस्तानि भूतानि रसोद्भवानि ॥ ३४ ॥
और भी - गर्भ में माता - पिता से उत्पन्न होने वाले महाभूत गर्भ में रज और शुक्र कहे जाते हैं । पंचमहाभूतों से शुक्र और आर्तव की वृद्धि होती है और रस से उन महाभूतों की पुष्टि होती है ॥ विमर्श - पांचभौतिक आहार द्वारा शुक्र आर्तव की पुष्टि होती है । जब शुक्र- आर्तव गर्भाश्य में स्थित रहते हैं तो माता के आहार रस से उसकी पुष्टि होती है और उसमें पुष्ट एवं वृद्ध होकर सूक्ष्म पंचमहाभूत स्थूल रूप में व्यक्त हो जाते हैं इसीलिए महाभूत को रस से उत्पन्न माना है, यथा- ' मातुस्तु खलु रसवहायां नाड्यां गर्भनाभिनाडी प्रतिबद्धा, साऽस्य मातुराहाररसवीर्य -मभिवहति । तेनोपस्नेहनेनास्याभिवृद्धिर्भवति । असंजाताङ्गप्रत्यङ्गप्रविभागमानिषेकान्तम् ॥ ’
भूतानि चत्वारि तु कर्मजानि यान्यात्मलीनानि विशन्ति गर्भम् ।
धर्मा परापराणि देहान्तराण्यात्मनि याति याति ॥ ३५ ॥
औरभी -- जो चार महाभूत आत्मा में लीन होकर अर्थात् आत्मा के साथ गर्भ में प्रविष्ट होते हैं वे कर्मज कहे जाते हैं अर्थात् शुभाशुभ कर्म के वशीभूत होकर गर्भ में प्रविष्ट होते हैं । वह बीजधर्मा सूक्ष्म कारणभूत आत्मा चेतनाधातु स्वरूप आत्मा में जाती हुई शुभाशुभ विभिन्न शरीर में चली जाती है ॥ ३५ ॥
विमर्श - यहाँ बीजधर्मा से सूक्ष्म लिंग शरीर का ग्रहण किया गया है । वह बीजधर्मा कर्म के वशीभूत होकर ही चेतना धातु में जब प्रविष्ट होता है तो तत्काल दूसरे शरीर में चला जाता है । जब तक आत्मा मुक्त नहीं होती तब तक लिंग शरीर से युक्त रहती ही है । स्थूल शरीर को छोड़ने के बाद इसी लिंग शरीर से दूसरे नवीन शरीर में प्रवेश करती है । जैसे सूक्ष्म बीज १. ' एकः ' इति पा. । २. ' देहे रसजानि विद्यात् ' इति पा ० ।
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६४५ चरकसंहिता बड़े से बड़े वृक्ष को पैदा करता है वैसे ही सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर को उत्पन्न करना है । सुश्रुत ने भी - ' क्षेत्रज्ञो वेदयिता, स्पष्टा, घ्राता, द्रष्टा, श्रोता, रसयिता, पुरुष: स्रष्टा, गन्ता, साक्षी, धाता, वक्ता यः कोऽसावित्येवमादिभिः पर्यायवाचकैर्नामभिरभिधीयते दैवसंयोगादयोऽव्ययोऽचि-त्यो भूतात्मना सहान्वक्षं सत्त्वरजस्तमो भिर्देवासुरैरपरैश्च भावैर्वायुनाभिप्रर्यमाणः गर्भाशयमनुप्रवि-श्यावतिष्ठते । ' ( सु. शा. अ. ३ ) ।
रूपाद्धि रूपप्रभवः प्रसिद्धः कर्मात्मकानां मनसो मनस्तः ।
भवन्ति ये वाकृतबुद्धिभेदा रजस्तमस्तत्र च कर्म हेतुः ॥ ३६ ॥
और भी - वीजधर्मा आत्मा में मन की प्रवृत्ति के साथ अदृश्यमान चार सूक्ष्म महाभूत क्यों स्वीकार किये जायँ, दृष्ट षड्धातुज शरीर के लिए दृष्ट शुक्र और आतंत्र को ही कारण मानना चाहिए । इस प्रश्न का उत्तर- जिनके कर्म ही कारण हैं ऐसे भूतों के रूप में रूप की उत्पत्ति होती है, यह प्रसिद्ध बात है । मन से मन की उत्पत्ति होती है । जो स्वरूप और बुद्धि में भिन्नता होती है उसमें रज, तम और कर्म कारण होता है ॥ ३६ ॥
विमर्श - सूक्ष्ममहाभूतों के साथ वीजस्वरूप आत्मा, शुक्र शोणित से मिलकर गर्भ का कारण होती है । और इस प्रकार से कारण बनने में कर्म ही कारण है जिस प्रकार रूपवाले सून से रूप वाले कपड़े की उत्पत्ति होती है - और जैसा कपड़ा बनाने वाला कारीगर होता है वह अपने कर्तव्य के अनुसार अच्छा - बुरा कपड़ा तैयार करता है और कारण के अनुसार कार्य होता है इस नियम के अनुसार रूपवान् तन्तु से रूपवान् पट उत्पन्न होता है, वैसे जगत् या देह पञ्चभूतात्मक है उसका कारण आत्मा भी पञ्चभूतात्मक होना चाहिए, अतः बीजधर्मा को सुक्ष्म चार भूतों से संयुक्त माना जाता हैं । जन्मान्तरीय कर्म के अनुसार ही मन से मन की उत्पत्ति होती है ---यथा — ‘ प्रतिजन्म यदभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः । तेनैवाभ्यासयोगेन तदेवाभ्यस्यते पुनः ॥ ' जब सूक्ष्म रूप से महाभूत सभी आत्मा में रहते हैं तब सम्पूर्ण सृष्टि को एक ही रूप में होना चाहिए, इस शंका का उत्तर यह है - स्त्ररूप और बुद्धि भेद में रज और तम एवं पूर्वजन्म कृत कर्म कारण होते हैं । इसी कर्म के वशीभूत होकर आत्मा जैसी योनि में प्रवेश करनी है वैसी आकृति और बुद्धि प्राप्त करती है ।
अतीन्द्रियैस्तैरतिसूक्ष्मरूपैरात्मा कदाचिन्न वियुक्तरूपः ।
न कर्मणा नैव मनोमतिभ्यां न चाप्यहङ्कारविकारदोषैः ॥ ३७ ॥
रजस्तमोभ्यां हि मनोऽनुबद्धं ज्ञानं विना तत्र हि सर्वदोषाः ।
गतिप्रवृत्त्योस्तु निमित्तमुक्तं मनः सदोषं बलवच्च कर्म ॥ ३८ ॥
( ३ ) प्रश्न: किन भावों से आत्मा सदा बँधी रहती है ( आत्मा सदा कैरनुबध्यते ), इसका उत्तर - आत्मा कभी भी उन कारण स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म अतीन्द्रिय भूतों से पृथक नहीं होती है । न कर्म, न मन, न बुद्धि, न अहङ्कार, न विकार स्वरूप दोप से आत्मा छुटकारा पाती है । ( आत्मा को पुष्करपलाशवत् निर्लेप माना जाता है फिर यह संग या बन्धन कैसे? ) इसका उत्तर- रज और तम का मन से सदा अनुवन्ध रहता है । ज्ञान न होने से ही ये रज और तम दोष मन से लगे रहते हैं, मन का सदोष रहना और बलवान् कर्म, ये दोनों गति ( शरीरान्तर में गमन, मृत्यु ) और प्रवृत्ति ( धर्माधर्मक्रिया में प्रवृत्ति ) के कारण होते है ॥३७-३८ ॥ विमर्श - जब तक आत्मा मुक्त नहीं होती तब तक रज और तम मन से सम्बद्ध रहते हैं । मन में सत्वगुण की वृद्धि होने से रज और तम मन से निवृत्त होते हैं तव तात्त्विक ज्ञान
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अतुल्य गोत्रीयशारीराध्यायः २ ] शारीरस्थानम् ८४६ होता है और तभी बन्धन से मुक्ति मिल जाती है, तात्त्विक ज्ञान के अभाव में रज और तम मन से लगे रहते हैं अतः सत्र दोष अर्थात् जन्म - मृत्यु लगे रहते हैं ।
रोगाः कुतः संशमनं किमेषां हर्षस्य शोकस्य च किं निमित्तम् ।
शरीर सत्त्वप्रभवा विकाराः कथं न शान्ताः पुनरापतेयुः ॥ ३ ९ ॥
प्रश्न - १. रोग कैसे होते हैं । २. इन रोगों का संशमन कौन वस्तु है । ३. हर्ष का क्या कारण है । ४. शोक का क्या कारण है । ५. शरीर और मन में होने वाले विकार शान्त होने पर पुनः कैसे सदा के लिए नहीं आ सकते ॥ ३ ९ ॥
प्रज्ञापराधो विषमास्तथाऽर्था हेतुस्तृतीयः परिणामकालः ।
सर्वामयानां त्रिविधा च शान्तिर्ज्ञानार्थकालाः समयोगयुक्ताः ॥ ४० ॥
( १ ) प्रश्न: रोग कैसे होते हैं ( रोगाः कुतः ), इसका उत्तर - १. प्रज्ञापराध, २. विषम अर्थ ( असाम्येन्द्रियार्थ - अयोग, अतियोग और मिथ्यायोग ), और ३. यह तीरा काल के परिणाम हैं । ( २ ) प्रश्न: रोगों का संशमन क्या है ( संशमनं किमेषाम् ), इसका उत्तर -- सभी प्रकार के रोगों की शान्ति तीन प्रकार से होती है । जैसे - १. ज्ञान ( बुद्धि ), २. अर्थ ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ) और ३. काल का समयोग से युक्त होना ॥ ४० ॥
धर्म्याः क्रिया हर्षानिमित्तमुक्तास्ततोऽन्यथा शोकवशं नयन्ति ।
शरीरत्वप्रभवास्तु रोगास्तयोरवृत्या न भवन्ति भूयः ॥ ४१ ॥
( ३-४ ) प्रश्न: हर्ष और शोक के कारण क्या है? ( हर्षस्य शोकस्य च किं निमित्तम् ), इसका उत्तर -- धार्मिक क्रियायें हर्ष को देने वाली होती हैं । अधार्मिक क्रियायें प्राणी को शोक के वश में कर देती हैं! ( ५ ) प्रश्न: शरीर और मन से उत्पन्न शान्त हुए रोग पुनः क्यों नहीं होते ( शरीर सत्त्वप्रभवा विकाराः शान्ताः पुनः कथं न आपतेयुः ), इसका उत्तर - शरीर एवं मन के संयोग से उत्पन्न होने वाले रोग जब एक बार नष्ट हो जाते हैं तब पुनः शरीर एवं मन का सम्बन्ध न होने से नहीं होते हैं ॥ ४१ ॥
विमर्श - अधर्म दुःख का और धर्म सुख का कारण है, यथा - ' सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः । सुखं च न बिना धर्मात् तस्माद्धर्मपरो भव ॥ ' जब तक शरीर एवं मन का सम्बन्ध आत्मा से लगा रहता है तब तक ' पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ' लगा रहता है । जब शरीर और मन का सम्बन्ध छूट जाता है तो मोक्ष हो जाता है और दुःखाभाव सर्वदा के लिए हो जाता है ।
रूपस्य सत्त्वस्य च सन्ततिर्या नोक्तस्तदादिर्नहि सोऽस्ति कश्चित् ।
तयोरवृत्तिः क्रियते पराभ्यां धृतिस्मृतिभ्यां परया धिया च ॥ ४२ ॥
और भी - ' शरीर और मन के सम्बन्ध की परम्परा का आदि नहीं कहा गया है ( क्योंकि यह संसार कब प्रारम्भ हुआ यह कोई नहीं बता सकता ) । वस्तुतः इसका आदि है ही नहीं, अर्थात् अनादि है । जब से संसार है तभी से शरीर और मन का सम्बन्ध है । शरीर और मन के सम्बन्ध की अवृत्ति ( अभाव ) उत्तम धारणाशक्ति, स्मरण शक्ति, एवं उत्तम बुद्धि के द्वारा की जा सकती है । ( जब शरीर और मन का सम्बन्ध छूट जाता है तब वेदना के आश्रयभूत शरीर और मन के अभाव में रोग का अभाव ही रहता है ) ॥ ४२ ॥
सत्याश्रये वा द्विविधे यथोक्ते पूर्वं गदेभ्यः प्रतिकर्म नित्यम् ।
जितेन्द्रियं नानुपतन्ति रोगास्तत्कालयुक्तं यदि नास्ति दैवम् ॥ ४३ ॥
और भी - • शारीरिक और मानसिक इन दोनों रोगों का पूर्वोक्त आश्रय शरीर में रोग उत्पन्न ५४ च ० सं ०
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८५० चरकसंहिता होने के पूर्व ही उसका प्रतिकार करना चाहिए । जितेन्द्रिय पुरुष को रोग नहीं होता, जब तक कि रोगारम्भक काल में दैव ( उसका भाग्य ) दुष्ट नहीं होता ॥ ४३ ॥
दैवं पुरा यत् कृतमुच्यते तत् तत् पौरुषं यत्विह कर्म दृष्टम् ।
प्रवृत्तिहेतुर्विषमः स दृष्टो निवृत्तिहेतुहिं समः स एव ॥ ४४ ॥
निवृत्ति का कारण - • जो कर्म पूर्व जन्म में जाता है | इस जन्म में या तत्काल जो कर्म किया पौरुष की विषमता रोगों की प्रवृत्ति का कारण है निवृत्ति का कारण है ॥ ४४ ॥
या पूर्व काल में किया गया है उसे दैत्र कहा जाता है उसे पौरुष कहा जाता है । दैव और और देव पौरुप को समता ( समयोग ) रोग की विमर्श - देव तथा पौरुष का वर्णन चरक विमान अ. ३ में द्रष्टव्य है ।
हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् ग्रैष्मिकमभ्रकाले ।
वार्षिकमा सम्यक प्राप्नोति रोगानृतुजान्न जातु ॥ ४५ ॥
रोगोत्पत्ति के पूर्व का चिकित्सा - हेमन्त ऋतु में संचित दोष ( कफ ) को वसन्तऋतु ( चैत्र ) में, ग्रीष्म में संचित दोष ( वात ) को अभ्रकाल ( वर्षा श्रावण ) में, वर्षाऋतु में संचित दोष ( पित्त ) को शरद ( मार्गशीर्ष ) में निकालने पर पुरुष को ऋतुकालजन्य रोग समूह नहीं होते ॥ ४५ ॥
नरो हिताहारविहार सेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसकः ।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः ॥ ४६ ॥
और भी I • हितकारी आहार और विहार का सेवन करने वाला, विचारपूर्वक काम करने वाला, काम क्रोधादि विषयों में आसक्त न रहने वाला, दान देने वाला, सम अर्थात् सभी प्राणियों पर सम ( तुल्य ) दृष्टि रखने वाला, सत्य बोलने में तत्पर रहने वाला, सहनशील और आप्त पुरुषों की सेवा करने वाला मनुष्य अरोग ( रोग रहित ) रहता है ॥ ४६ ॥
मतिर्वचः कर्म सुखानुबन्धं सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः ।
ज्ञानं तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुपतन्ति रोगाः ॥ ४७ ॥
और भी - • सुख देने वाली मति, सुखकारक वचन और सुखकारक कर्म, अपने अधीन मन, शुद्ध पाप रहित बुद्धि जिनके पास है, और जो ज्ञान प्राप्त करने, तपस्या करने और योग सिद्ध करने में तत्पर रहते हैं उन्हें शारीरिक एवं मानसिक कोई भी रोग नहीं होते ॥ ४७ ॥
तत्र श्लोकः-इहाग्निवेशस्य महार्थयुक्तं षट्त्रिंशकं प्रश्नगणं महर्षिः ।
अतुल्यगोत्रे भगवान् यथावन्निर्णीतवान् ज्ञानविवर्धनार्थम् ॥ ४८ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थानेऽतुल्यगोत्रीयं शारीरं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अध्याय उपसंहार — महर्षि भगवान् आत्रेय ने इस अतुल्यगोत्रीय नामक अध्याय में ज्ञान की वृद्धि के लिए अग्निवेश के ३६ छत्तीस गूढ अर्थ से युक्त प्रश्नों का निर्णय किया है ॥ ४८ ॥
विमर्श - चक्रपाणि ने ३६ प्रश्नों की कल्पना कर उत्तर दिया है, अतः ' षट्त्रिंशकं प्रश्नगणं ' का मूल पाठ ऊपर लिया गया है, वे प्रश्न निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं । १. ' तन्मानुषम् ' इति पा ० । २. ' जन्तुः ' इति पा ० ।
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खडकागर्भावक्रान्ति ० ३ ] शारीरस्थानम्
श्लोक संख्या-तीसरे टोक में
पाँचवें लोक में ग्यारहवें श्लोक में कुल प्रश्न संख्या -१ ५ ८५१ सत्रहवें लोक में बाईस लोक में अठाइसवें लेक में उनचालिसवें श्लोक में ९ ८ ५ ५ ३६ इस अध्याय के पाचवें श्लोक की टीका में चक्रपाणि तथा गङ्गाधर ने तीन प्रश्न माने हैं । परन्तु चक्रपाणि के ६ ठे टोक की टीका के आधार पर ( पञ्चानां प्रश्नानामुत्तरम् ) यहाँ ५ ही प्रश्न माने गये है । यद्यपि ' कन्या सूतं वा ' इस ११ वें श्लोक में चक्रपाणि ने ८ प्रश्न ही माने हैं परन्तु गङ्गाधर ने वहाँ ९ प्रश्न माने है । इस प्रकार दो परिवर्तनों से ३६ प्रश्न पूरे हो जाते हैं । इस प्रकार चरक के द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृततन्त्र ( चरकसंहिता ) के शारीर स्थान में अतुल्यगोत्रीयशारीर नामक दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः अथातः खुड्डिकां गर्भावकान्ति शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद खुड्डिका गर्भावक्रान्ति शारीर की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विमर्श - शुक्र- शोणित गर्भ के कारण होते हैं यह पहले संक्षेप में कहा गया है, पर गर्भ के सम्पूर्ण कारणों का वर्णन वहाँ नहीं किया गया है अतः अब उन सभी कारणों को बनाने के लिए खुड्डा ( अर्थात् छोटा ) गर्भ के अवतरण शारीर की व्याख्या यहाँ की गई है । * पुरुषस्यानुपहतरेतसः स्त्रियाश्चाप्रदुष्टयोनिशोणितगर्भाशयाया यदा भवति संसर्गः ऋतुकाले यदा वानयोस्तथायुक्ते संसर्गे शुक्रशोणितसंसर्गमन्तर्गर्भाशयगतं जीवो s वका-मति सत्वसंप्रयोगात्तदा गर्भोऽभिनिर्वर्तते स सात्म्यर सोपयोगाद रोगोऽभिवर्धते सम्य-गुपचारैश्चोपचर्यमाणः, ततः प्राप्तकालः सर्वेन्द्रियोपपन्नः परिपूर्णशरीरो बलवर्णसत्त्वसंहन-संपदुपेतः सुखेन जायते समुदयादेषां भावानां - मातृजश्चायं गर्भः पितृजश्चात्मजश्च सात्म्यजश्च रसजश्च, अस्ति च खलु सत्त्वमौपपादुकमिति होवाच भगवानात्रेयः ॥ ३ ॥
( १ ) गर्भ - अवक्रमण प्रकरण गर्भोत्पत्ति की प्रक्रिया - जिस पुरुष का शुक्र दुष्ट नहीं है अर्थात् सर्वतोभावेन शुद्ध है, जिस स्त्री की योनि ( अपत्यपथ ), आर्नव और गर्भाशय अदुष्ट हैं अर्थात् शुद्ध, दोष १. ' तयोस्तथैव युक्त संसर्गे ' इति, ' चानयोस्तथाविधयोस्तथैव युक्ते संसर्गे ' इति च पा. । २. ' सत्त्वमुपपादुकम् ' इति पा. ।