चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 961–970

चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 961–970

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८७२ चरकसंहिता एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा । सन्ति खल्वस्मिन् गर्भे केचिन्नित्या भावा, सन्ति चानित्याः केचित् । तस्य य एवाङ्गावयवाः सन्तिष्ठन्ते, त एव स्त्रीलिङ्गं पुरुषलिङ्गं नपुंसक-लिङ्गं वा विभ्रति । तत्र स्त्रीपुरुषयोर्ये वैशेषिका भावाः प्रधानसंश्रया गुणसंश्रयाश्च तेषां यतो भूयस्त्वं ततोऽन्यतरभावः । तद्यथा - क्लैव्यं भीरुत्वमवैशारद्यं मोहोऽनवस्थानमधो-गुरुत्वमसहनं शैथिल्यं मार्दवं गर्भाशय बोजभागस्तथायुक्तानि चापराणि स्त्रीकराणि, अतो विपरीतानि पुरुषकराणि, उभयभागावयवो नपुंसककराणि भवन्ति ॥ १४ ॥

जन्मोत्तर काल में उत्पन्न होने वाले अङ्ग इस प्रकार भ्रूण की इन्द्रियाँ और अङ्ग एवं प्रत्यङ्ग एक साथ ही उत्पन्न होते हैं, पर उनको छोड़ कर जो भाव जन्म के बाद व्यक्त होते हैं जैसे दाँत, व्यञ्जन ( चिह्न जैसे बाल्यावस्था समाप्त होने पर दाढ़ी, मूँछ, कक्षा और गुह्य प्रदेश में लोम का होना, स्त्रियों में स्तन का उभार होना ), व्यक्ती भाव - समय से रज, शुक्र आदि अन्य इसी प्रकार के भाव जो जन्मोत्तर काल में उत्पन्न होते हैं ( जैसे तरुणास्थियों का संयुक्त होना ) ये प्रकृति हैं । पुनः विकृति इसके विपरीत को कहते हैं । इस गर्भ में कुछ नित्य भाव हैं और कुछ भाव अनित्य होते हैं । उस गर्भ में जो अङ्गावयव नित्य होते हैं वे ही अङ्गावयव स्त्रीलिङ्ग, पुंल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग को धारण करते है । गर्भ में स्त्रीलिङ्ग और पुंल्लिङ्ग भावों में जिस भाव की विशेष रूप से प्रधानता होती है, वह प्रधानता, अधिकतावश हो या गुण के अनुसार हो, उसी के अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है ( अर्थात् स्त्री भावों की प्रधानता होने पर स्त्री और पुरुष भावों की प्रधानता होने पर पुरुष की उत्पत्ति होती है ) । जैसे -- क्लैब्य ( वृष्य शक्ति का न होना ), भीरुत्व ( डरपोक होना ), अवैशारद्य, मोहमुग्धता, अनवस्थान ( मन का चञ्चल रहना ), अधोगुरुत्व, असंहनन, शैथिल्य मार्दव ( और सभी भावों का मृदु होना ), इसी प्रकार. और अन्य भावों का इन प्रधानसंश्रय और गुणसंश्रय के अनुकूल होना ( जैसे स्त्रो के समान चेष्टा करना ), स्त्रीकर भाव कहा जाता है । इसके विपरीत भावों की प्रधानता होने पर उनको पुरुषकर भाव कहा जाता है । दोनों भावों की प्रधानता होना उनको नपुंसककर भाव कहा जाता है || १४ || विमर्श - यद्यपि भिन्न - भिन्न अङ्गों की उत्पत्ति के विषय में आचार्यों का वैमत्य है पर सिद्धान्त में वंशांकुरवत् चूतफलवत् सभी अङ्गों की उत्पत्ति साथ ही होती है पर जो भाव जन्मोत्तर काल में होने वाले हैं, वे बाद में अपने - अपने समय पर होते हैं, जैसे- दाँत निकलना, मूळ का आना, स्तन का मोटा होना, आर्तव का निकलना आदि इसे आचार्य ने प्रकृति माना है, इससे भिन्न को विकृति माना है । * तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि संतिष्ठन्ते, तत्कालमेव चेतसि वेदना निर्बन्धं प्राप्नोति; तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते, प्रार्थयते च जन्मान्तरानुभूतं यत् किंचित्, तद्ब्रहृदय्य-माचक्षते वृद्धाः । मातृजं चात्य हृदयं मातृहृदयेनाभिसंबद्धं भवति रसवाहिनीभिः संवाहि-नीभिः; तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः संस्पैन्दते । तञ्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वैहृदय्यस्य विमा-नितं गर्भमिच्छन्ति कर्तुम् । विमानने ह्यस्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा । समानयोगक्षेमा हि तदा भवति गर्भेण केषुचिदर्थेषु माता । तस्मात् प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणोप-चरन्ति कुशलाः ॥ १५ ॥

दोहद की उत्पत्ति ( Cravings of Pregnancy ) - उस गर्भ के शरीर में जिस समय इन्द्रियाँ अभिव्यक्त होती हैं उसी समय उस गर्भ के मन में वेदना ( सुख - दुःख की प्राप्ति ) होती है इसलिए उसी १. ' उभय भागभावानि ' इति ' उभयभावा ' इति च पा. । २. ' रसहारिणीभिः ' इति पा. । ३. ' संपद्यते ' इति पा ० । ४. हृदय्याविमानितम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 962

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महतीगर्भावक्रान्ति ० ४ ] शारीरस्थानम् ८७३ समय से गर्भ में स्पन्दन क्रिया होती है और अनेक जन्मों में अनुमव किये हुए इन्द्रिय - विषयों की वह इच्छा करता है और वह इच्छा माता के हृदय से व्यक्त होती है । इसलिए उस काल में द्वैहृदय्य उसकी मंज्ञा होती है ऐसा वृद्ध लोग कहते हैं । गर्भ का हृदय माता के हृदय से उत्पन्न होता है और गर्भ - पोषण के लिए रसवाही धमनियों के द्वारा माता के हृदय से बालक का हृदय सम्बद्ध रहता है इसलिए उन रसवाहिनी धमनियों के द्वारा बालक अपनी इच्छा को माता के हृदय के द्वारा प्रगट करता है । इसी कारण को समझते हुए विद्वान् दौहृद का अपमान करना नहीं चाहते हैं । यदि दौर्हृद का अपमान कर दिया जाय तो गर्भ का नाश या गर्भ में विकृति उत्पन्न हो जाती है । उस समय जब कि गर्भ माता के हृदय के द्वारा अपनी इच्छा को प्रगट करता है तो गर्भिणी माता गर्भ के किसी - किसी विषयों में समान योगक्षेम वाली होती हैं अर्थात् बालक के इच्छानुसार वस्तुओं की प्राप्ति होने पर स्वस्थ और न प्राप्त होने पर अस्वस्थ होती है । इसलिए कुशल विद्वान् प्रिय और हितकारी वस्तुओं से विशेष रूप में गर्भिणी की परिचर्या करते हैं ( अर्थात् जो गर्भिणी के लिए प्रिय होता है और जो उसके लिए हितकारी होता है वही वस्तु उसके आहार-बिहार में प्रयुक्त करते हैं ) ॥ १५ ॥

विमर्श - सभी अङ्ग - प्रत्यङ्गों के साथ - साथ सूक्ष्म रूप से इन्द्रियाधिष्ठानों की भी उत्पत्ति होती है । जब इनमें हृदय सामान्य रूप से विकसित हो जाता है और मन का कार्यालय मस्तिष्क भी विकसित हो जाता है तब तीसरे मास में सभी इन्द्रियाँ अपने - अपने कार्य का ज्ञान करने में प्रवृत्त हो जाती हैं । इसीलिए सुख - दुःख आदि सभी विषयों का ज्ञान गर्भ में हो जाता है इसी बात को काश्यप संहिता में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है - ' सर्वेन्द्रियाणि गर्भस्य सर्वाङ्गावयवास्तथा । तृतीये मासि युगपन्निर्वर्तन्ते यथाक्रमम् ॥ प्रत्पन्दने चेतयति वेदनाचावबुद्धयते । ' जब सुख - दुःख का ज्ञान होता है तो जिस प्रकृति का बालक होता है और वह जो विषय पूर्व जन्म में अनुभव किया रहता है उसी के अनुसार अपनी इच्छाओं को व्यक्त करता है जिससे बालक के भावी प्रकृति का ज्ञान होता है, जैसा कि सुश्रुत में स्पष्ट बताया है - " राजसंदर्शने यस्या दोहदं जायते स्त्रियाः । अर्थवन्तं महाभागं कुमारं सा प्रसूयते । दुकूलपट्टकौपेयभूषणादिषु दोहदात् । अलङ्कारैषिणं पुत्रं ललितं सा प्रसूयते ॥ आश्रमे संयतात्मानं धर्मशीलं प्रसूयते । देवताप्रतिमायान्तु प्रसूते पार्षदोपमम् ॥ गोवामांसाशने पुत्रं सुपुप्सुं धारणात्मकम् । गवां मांसे च बलिनं सर्वक्लेशसहं तथा ॥ ' माहिषे दौर्हृदाच्छूरं रक्ताक्षं लोमसंयुतम् । वाराहमांसात् स्वप्नालुं शूरं सञ्जनयेत् मुनम् ॥ मार्गाद्विक्रान्तजङ्घालं सदावनचरं सुतम् । सुमराद्विग्नमनसं नित्यभीतं च तैत्तिरात् ॥ अतोऽनुक्तेषु या नारी समभिध्याति दौर्हृदम् । शरीराचारशीलैः सा समानं जनयिष्यति ॥ कर्मणा चोदितं जन्तोर्भ-वितव्यं पुनर्भवेत् । यथा तथा दैवयोगाद्दौर्हृदं जनयेद्धृदि ॥ ' यदि माता की इच्छा का विघात कर दिया जाय तो अनेक उपद्रव होते हैं जैसा कि - ' दौर्हृद विमाननात् कुब्जं कुणिं, खजं, जडं, वामनं, विकृताक्षमनक्षं वा नारी सुतं जनयति । सा प्राप्तदोहदा पुत्रं जनयेद्धि गुणान्वितम् | अलब्धदोहदा गर्भे लभेतात्मनि वा भयम् ॥ ' ( सुश्रुत. शा. अ. ४ ) । चरक ने तीसरे मास में ही दोहद और स्पन्दन का वर्णन किया है पर सुश्रुत ने चौथे मास से इनका प्रारंभ बताया है । अष्टाङ्गसंग्रह में - ' अन्ये तु पक्षत्रयात् प्रभृत्यापञ्चमासात् दौहृदकालमाहुः | ' से तीन पक्ष के बाद और पाँच मास के पहले तक दौहृद काल माना है । * तस्या गर्भापत्तेद्वैहृदय्यस्य च विज्ञानार्थं लिङ्गानि समासेनोपदेच्यामः । उपचार-साधनं ह्यस्य ज्ञाने, ज्ञानं च लिङ्गतः, तस्मादिष्टो लिङ्गोपदेशः । तद्यथा - आर्तवादर्शनमा-१. ' उपचार संबोधनम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 963

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८७४ चरकसंहिता स्यसंस्रवणमनन्नाभिलाषश्छर्दिर रोच कोऽम्लकामता च विशेषेण श्रद्धाप्रणयनमुच्चावचेषु भावेषु गुरुगात्रत्वं चक्षुषोर्लानिः स्तनयोः स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च कार्यमत्यर्थं श्वयथुः पादयोरीषलोमराज्युद्गमो योन्याश्चाटालत्वमिति गर्भे पर्यागते रूपाणि भवन्ति ॥१६ ॥

गर्भिणी के लक्षण [ Signs of Pregnancy ] - उस गर्भिणी के गर्भ की प्राप्ति और हृदय्य के विशेष ज्ञान के लिए लक्षणों का संक्षेप में उपदेश कर रहे हैं क्योंकि इसका ज्ञान हो जाने पर उपचार के सावन में सुविधा होती है और इसका ज्ञान लक्षणों से ही होता है अतः लक्षणों का उपदेश करना यहाँ आवश्यक है । वे ये हैं - १. आर्तवादर्शन ( आर्तव का बन्द हो जाना ), २. आस्यसंस्रवण ( मुख से बार - बार पानी का आना ), ३. अनन्नाभिलाप ( अन्न खाने की इच्छा का न होना ), ४. वमन, ५. भोजन में अरुचि, ६. खट्टी या चरपरी वस्तु खाने की इच्छा की प्रबलता, ७. आहार एवं विहार आदि भावों में ऊँच और नीच की बार - बार इच्छा का होना अर्थात् कभी उच्च ( उत्तम ) आहार - विहार में मन लग जाय और कभी नीच ( हीन गुण वाले ) आहार - विहार में, ८. शरीर में भारीपन का अनुभव का होना, ९ आँखों में ग्लानि का होना, १०. स्तनों में दूध का आ जाना, ११. दोनों ओठ एवं दोनों स्तनमण्डल का अधिक काला हो जाना है । १२. पैरों में कुछ - कुछ शोध का हो जाना, १३. रोमराजी का उद्गम. १४. योनि का अत्यर्थ विस्तृत हो जाना । ये सभी लक्षण गर्भ प्राप्ति के होते हैं ॥ १६ ॥

विमर्श - गर्भिणी के लक्षणों का उपर्युक्त वर्णन आधुनिक वर्णन से साम्य रखता है । संक्षेप में आधुनिक दृष्टि से प्रथम मास में प्रातः काल जी मचलाना, वमन होना, कोष्ठबद्धता, दुर्बलता, स्तनों की वृद्धि इन लक्षणों के साथ - साथ आर्तव का दिखाई न देना इत्यादि गर्भ के निश्चायक लक्षण माने जाते हैं । दूसरे मास में पूर्व के लक्षणों के साथ - साथ स्तनों में वृद्धि अधिक पाई जाती है, स्तनमण्डल काले हो जाते हैं, टटोलने से उसमें ग्रंथि प्रतीत होती है स्तन चूचुक गहरा काला हो जाता है, Hegar's sign ( हेगार का चिह्न ) प्रकट हो जाता है । इसमें गर्भाशय-गात्र का निचला भाग ऊपर के भाग तथा ग्रीवा की अपेक्षा अधिक कोमल होता है इसे ज्ञात करने के लिए एक हाथ की अंगुली योनि के अग्र कोण में रखी जाती है दूसरे हाथ की अंगुली कोष्ठ की ओर से गर्भाशय के पीछे ले जाकर अन्दर की अंगुली से मिलाने की चेष्टा की जाती है तो परस्पर

दोनों हाथ की अगुलियाँ मिल जाती है और बीच में कुछ प्रतीत नहीं होता ।

सा यद्यदिच्छेत्तत्तदस्यै दद्यादन्यत्र गर्भोपघातकरेभ्यो भावेभ्यः ॥ १७ ॥

गर्भिणी की इच्छा पूर्ति आवश्यक - द्विहृदया गर्भिणी जिन - जिन इच्छाओं को व्यक्त करती हैं उन सभी इच्छाओं की यथासम्भव पूर्ति अवश्य करनी चाहिए पर गर्भ को नष्ट करने वाले भावों को छोड़ कर अर्थात् जिससे गर्भ नष्ट होने का भय हो उस आहार एवं बिहार से गर्भिणी को दूर रखे ॥ १७ ॥

* गर्भोपघातकरास्त्विमे भावा भवन्तिः तद्यथा - सर्वमतिगुरुष्णतीक्ष्णं दारुणाश्च चेष्टाः इमांश्चान्यानुपदिशन्ति वृद्धाः -- देवतारक्षोऽनुचरपरिरक्षणार्थं न रक्तानि वासांसि farera मदकराणि मद्यान्यभ्यवहरेन्न यानमधिरोहेन मांसमश्नीयात् सर्वेन्द्रियप्रति-कूलांश्च भावान् दूरतः परिवर्जयेत्, यच्चान्यदपि किञ्चित् स्त्रियो विद्युः ॥ १८ ॥

गर्भोपघातकर भाव - ये आगे बताये गए भाव गर्भ को नष्ट करने वाले होते हैं जैसे- सभी प्रकार से अति गुरु, अति उष्ण, अतितीक्ष्ण आहारों का सेवन, दारुण ( कठिन ); चेष्टायें, वृद्ध लोग गर्भको नष्ट करने वाले इन अन्य भावों का उपदेश करते हैं जैसे- देवता और राक्षसों के अनुचरों से

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महतीगर्भावक्रान्ति ० ४ ] शारीरस्थानम् I ७५ रक्षा करने के लिए रक्त वस्त्रों को धारण न करे, मदकारक अन्न - पान का सेवन न करे, सवारी पर न चढ़े मांस न खाय, सभी इन्द्रियों के लिये जो वस्तु हानिकारक हों उससे दूर रहे और भी इसके अतिरिक्त जिस किसी वस्तु को त्यागने के लिए वृद्ध एवं अनुभवी वृद्धा स्त्रियाँ कहें उसको भी

गर्भोपघातकर भाव कहते हैं । उसका भी त्याग कर देना चाहिए । १८ ॥

तीव्रायां तु खलु प्रार्थनायां काममहितमप्यस्यै हितेनोपहितं दद्यात् प्रार्थनाविनय-नार्थम् । प्रार्थनासंधारणाद्धि वायुः प्रकुपितोऽन्तः शरीरमनुचरन् गर्भस्यापद्यमानस्य विनाशं वैरूप्यं वा कुर्यात् ॥ १ ९ ॥ इच्छाभिघात से हानि - यदि गर्भिणी स्त्री किसी गर्भोपघातकर भाव की अर्थात् जिससे गर्भ हानि की संभावना है उसे ही प्रबल इच्छाओं के द्वारा मांग करती है तो उसकी इच्छा के अनुसार अहित वस्तु को हित वस्तुओं के साथ या कल्पनाओं के द्वारा उसको हित बनाकर देना चाहिए जिससे उसकी प्रबल इच्छा शान्त हो । यदि उसकी इच्छाओं के अनुकूल वस्तुओं की प्राप्ति उसे नहीं होती है तो इच्छाओं को रोकने से कुपित हुई वायु अन्तः शरीर में चलते हुए गर्भाशय में प्राप्त गर्भ का विनाश अथवा गर्भ को कुरूप कर देती है । ( इसलिए गर्भिणी की इच्छाओं का प्रतिघात नहीं करना चाहिए ) ॥ १ ९ ॥ * चतुर्थे मासि स्थिरत्वमापद्यते गर्भः, तस्मात्तदा गर्भिणी गुरुगात्रत्वमधिकमापद्यते विशेषेण ॥ २० ॥

( घ ) चतुर्थ मास में गर्भस्वरूप I चौथे मास में गर्भ में स्थिरता उत्पन्न हो जाती है, अर्थात् पहले की अपेक्षा बड़ा बन जाता है इसलिए चौथे मास में गर्भिणी का शरीर अधिक भारी प्रतीत होता है । विमर्श - - सुश्रुत ने चौथे मास में अङ्ग - प्रत्यङ्ग का विभाग एवं चेतना की अभिव्यक्ति मानी है । और चौथे मास से ही दौर्हृद के लक्षणों का प्रादुर्भाव भी माना है यथा - ' चतुर्थे सर्वाङ्गप्रत्यङ्गविभागः प्रव्यक्ततरो भवति । ' ( सु. शा. अ. ३ ) । इस वैमत्य का कारण यह है कि तीसरे मास में ये लक्षण स्पष्ट प्रतीत नहीं होते क्योंकि वे अतिसूक्ष्म होते हैं और वे चौथे मास में व्यक्ततर हो जाते हैं । अतः सुश्रुत ने चौथा मास में ही दौर्हृद और चेतना - प्रादुर्भाव का समय माना है । पञ्चमे मासि गर्भस्य मांसशोणितोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी कामापद्यते विशेषेण ॥ २१ ॥

( ङ ) पञ्चम मास में गर्भ का स्वरूप - पाँचवे मास में अन्य मासों की अपेक्षा गर्भस्थ बालक में मांस और रक्त की अधिक वृद्धि होती है । अतः गर्भिणी इस मास में विशेष कृश हो जाती है || २१ || विमर्श - सुश्रुत में - ' पञ्चमे मनः प्रतिबुद्धतरं भवति ' अष्टाङ्गसंग्रह में - ' पञ्चमे मनः प्रतिबुद्धत रं भवति मांसशोणितोपचश्च ' तथा गर्भोपनिषद् में ' पञ्चमे पृष्ठवंशो भवति ', काश्यपसंहिता में - ' मांस-शोणितवृद्धिस्तु पञ्चमे मासि जीवक । गर्भिणी पञ्चमे मासि तस्मात्कार्थेन युज्यते ॥ ' आदि मतान्तर देखने को मिलते है पर सिद्धान्ततः सबका मत एक ही है । षष्ठे मासि गर्भस्य बलवर्णोपचयो भवत्यधिकमन्येभ्यो मासेभ्यः, तस्मात्तदा गर्भिणी बलवर्णहानिमापद्यते विशेषेण ॥ २२ ॥

( च ) छठे मास में गर्भ का स्वरूप - छठे मास में गर्भ का अन्य मासों की अपेक्षा वल, वर्ण का उपचय अधिक होता है । इसलिए छठे मास में गर्भिणी के बल और वर्ण की विशेष कर हानि हो जाती है ॥ २२ ॥

विमर्श - यह बात अष्टांगसंग्रह में और गर्भोपनिषद् में इस प्रकार बताया है यथा- ' षष्ठे

पृष्ठ 965

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८७६ चरकसंहिता केशरोमनखास्थिस्नाय्यादीन्यभिव्यक्तानि बलवर्णोपचयश्च ' तथा ' षष्ठे मासे मुखनासिकाक्षिश्रोत्राणि भवन्ति । ' सुश्रुत ने इसके अतिरिक्त छठे मास में बुद्धि की विशेषता बतायी है । * सप्तमे मासि गर्भः सर्वैर्भावैराप्याय्यते, तस्मात्तदा गर्भिणी सर्वाकारैः कान्ततमा भवति ॥ २३ ॥

( छ ) सातवें मास में गर्भ का स्वरूप - सातवें मास में गर्भ सभी प्रकार से पुष्ट होता है । इसलिए गर्भिणी और मास की अपेक्षा इस मास में अधिक दुर्बल एवं उदास प्रतीत होती है ॥२३ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने भी सातवें मास में सभी प्रकार से गर्भ की पुष्टि मानी है । * अष्टमे मासि गर्भश्च मातृतो गर्भतश्च माता रसहारिणीभिः संवाहिनीभिर्मुहुर्मुहुरोजः परस्परत आददाते गर्भस्यासंपूर्णत्वात् । तस्मात्तदा गर्भिणी मुहुर्मुहुर्मुदा युक्ता भव मुहुर्मुहुश्च म्लाना, तथा गर्भः; तस्मात्तदा गर्भस्य जन्म व्यापत्तिमद्भवत्योजसोऽनवस्थि-तत्वात् । तं चैवार्थमभिसमीच्याष्टमं मासमगण्यमित्याचक्षते कुशलाः ॥ २४ ॥

( ज ) आठवें मास में गर्भ का स्वरूप और ओज का अस्थिरत्व -- आठवें मास में रससंवाहिनी के द्वारा ओज माता से गर्भ के हृदय में और गर्भ से माता के हृदय में परस्पर आता - जाता रहता है । क्योंकि गर्भ पूर्ण रूप से तैयार नहीं रहता । इसलिए माता आठवें मास में बार - बार प्रसन्न और बार-बार उदास हुआ करती है ( अर्थात् जब ओज गर्भ के हृदय में चला जाता है, तब माता उदास हो जाती है, जब पुनः ओज माता के हृदय में चला आता है, तब माता प्रसन्न दिखाई पड़ती है | इसी प्रकार जब गर्भ में ओज रहता है, तो गर्भ में प्रसन्नता रहती है जब ओज माता चला आता है तो उदासी छा जाती है ) । इस मास में यदि बालक का जन्म हो जाता है तो उसका जीवन संकटमय हो जाता है, क्योंकि ओज की स्थिति अस्थिर रहती है, इसीलिए कुशल चिकित्सक प्रसव होने के लिए अष्टममास को अगण्य ( अर्थात् प्रसव के योग्य नहीं ) समझते हैं ॥ २४ ॥

विमर्श - सुश्रुत ने आठवें मास में उत्पन्न बालक की जीवन - स्थिति को ओज की अनवस्थिति होने से ही नहीं मानी है, उनके अनुसार आठवें मास में उत्पन्न बालक नैर्ऋत नामक यक्ष का भाग होता है, इसलिए वह नहीं बचता है । यदि बालक उत्पन्न हो जावे तो उसे मांस और भात की बलि देनी चाहिए । इस प्रकार इन वाक्यों का आलोचन करने पर यही सिद्ध होता है कि आठवें मास के बालक की जीवन स्थिति सन्देहपूर्ण रहती है । उपर्युक्त कथन से नारी का भी जीवन संशययुक्त रहता है पर बालक की मृत्यु निश्चित बतलायी है । तात्पर्य यह कि ओज के बार - बार संचरण करने से माता बार - बार म्लान और मुदित होती है यदि माता की म्लानावस्था बालक भूमिष्ठ हो जाता है तो माता का भी जीवन संकटमय हो जाता है । आधुनिक दृष्टि से भी सातवें आठवें महीने के बालक के जीवन में संदेह रहना है । क्योंकि उसमें ओज प्राणशक्ति ( Vitality ) का अभाव रहता है । इस मास में गर्भ के मुख पर से रोम लुप्त होने लगते हैं नख अङ्गुलियों के सिरों तक पहुंच जाते हैं । अण्ड कभी - कभी एक अण्ड कोप में चले आते हैं । तस्मिन्नेकदिवस तिक्रान्तेऽपि नवमं मासमुपादाय प्रसवकालमित्याहुरादशमान्मा-सात् । एतावान् प्रसवकालः, वैकारिकमतः परं कुताववस्थानं गर्भस्य ॥ २५ ॥

( झ ) नवें मास में प्रसवकाल - आठवें मास के बाद एक दिन बीत जाने पर ही अर्थात् नवमें मास से लेकर १० वें मास तक विघ्नरहित प्रसव काल माना गया है । प्रसव का यही समय निश्चित रूप से १. ' रसवाहिनीभिः ' इति पा ० । ३. ' भवत्यधिकम् ' इति पा ० । २. ‘ गर्भस्य संपूर्णत्वात् ' इति पा. । ४. ' अत ऊर्ध्वमवस्थानम् ' इति पा ० ।

पृष्ठ 966

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महतीगर्भावक्रान्ति ४ ] शारीरस्थानम् होता है | दस मास व्यतीत हो जाने के बाद यदि गर्भ गर्भाशय में ही रह जाता है तो उसे विकृति माना जाता है ॥ २५ ॥

एवमनयाऽऽनुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ ॥ २६ ॥

गर्भ प्रकरण का उपसंहार - इस प्रकार इस क्रम से यह गर्भं गर्भाशय में उत्पन्न होता है | * मात्रादीनां खलु गर्भकराणां भावानां संपदस्तथा वृत्तस्य सौष्टवान्मातृतश्चैवोपस्नेहो -पस्वेदाभ्यां कालपरिणामात् स्वभावसंसिद्धेश्व कुक्षौ वृद्धिं प्राप्नोति ॥ २७ ॥

( ५ ) प्रश्न: गर्भवृद्धि के कारण ( यश्चास्य वृद्धिहेतुः ) का उत्तर - माता, पिता, आत्मा, सात्म्य, सत्त्व, रस आदि गर्भकर ६ भावों की सम्पत्ति ( अदोपता ) होने से और माता के वृत्त ( आहार - विहार और आचार ) की सुष्ठुता होने से ( अर्थात् गर्भिणी के लिए बनाए गए नियम एवं आहार का समुचित रूप से सेवन से ), माता के हृदय से आयी हुई रसवाहिनी के द्वारा प्राप्त उपस्नेह और माता के ही शरीर से प्राप्त उपस्वेद से और काल द्वारा परिपाक होने से एवं स्वभाव-सिद्ध अपने बढ़ने वाली प्रकृति से गर्भ गर्भाशय में वृद्धि को प्राप्त करता है ॥ २७ ॥

मात्रादीनामेव तु खलु गर्भकराणां भावानां व्यापत्तिनिमित्तमस्या जन्म भवति ॥ २८ ॥

( ६ ) प्रश्न: गर्भ की व्यापत्ति ( अजन्म ) में कारण ( यतश्चास्याजन्म ) का उत्तर माता और पिता आदि गर्भकर भावों में व्यापत्ति ( दुष्टि ) होने से गर्भ का जन्म नहीं होता, अर्थात् माता के आर्तव एवं गर्भाशय के विकृत होने पर और पिता के शुक्र में विकृति होने से गर्भ की उत्पत्ति ही नहीं होती, साम्य आदि भावों की विकृति होने पर गर्भ धारण होने पर भी उसकी मृत्यु हो जाती है या विकृति हो जाती है अतः उसे भी अजन्म ही माना जाता है ॥ २८ ॥

ये ह्यस्य कुक्षौ वृद्धिहेतुसमाख्याता भावास्तेषां विपर्ययादुदरे विनाशमापद्यते, अथ--वाऽप्यचिरजातः स्यात् ॥ २ ९ ॥ ( ७ ) प्रश्न: कुक्षि में गर्भ के नाश में हेतु ( यतश्च जायमानः कुक्षौ तिनाशं प्राप्नोति ) का उत्तर - • जो गर्भाशय में गर्भवृद्धि के कारण बताए गए हैं उनमें यदि विपरीतता आ जाय तो गर्भ का उदर में ही विनाश ( मृत्यु ) हो जाता है अथवा उसका स्राव या पात हो जाता है ॥ २ ९ ॥ * यतस्तु कात्स्न्र्त्स्न्येनाविनश्यन् विकृतिमापद्यते, तदनुव्याख्यास्यामः - यदा स्त्रिया दो-षप्रकोपणोक्तान्यासेवमानाया दोषाः प्रकुपिताः शरीरमुपसर्पन्तः शोणितगर्भाशयानुपप-द्यन्ते, न च कात्स्न्र्त्स्न्येन शोणितगर्भाशयौ दूषयन्ति, तदेयं गर्भं लभते स्त्री; तदा तस्य गर्भस्य मातृजानामवयवानामन्यतमोऽवयवो विकृतिमापद्यत एकोऽथवानेके, tr यस्य ह्यवयवस्य वीजे वीजभागे वा दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, तं तमवयवं विकृतिराविशति । तदा ह्यस्याः शोणिते गर्भाशयवीजभागः प्रदोषमापद्यते, तदा वन्ध्यां जनयति; यदा पुनरस्याः शोणिते गर्भाशय बीजभागावयवः प्रदोषमापद्यते, तदा पूतिप्रजां जनयति; यदा त्वस्याः शोणिते गर्भाशयवीजभागावयवः स्त्रीकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदोष-मापद्यते, तदा स्याकृतिभूयिष्ठामस्त्रियं वार्ता नाम जनयति तां स्त्रीव्यापदमाचक्षते ॥३० ॥

( 4 ) प्रश्न: जिससे गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त होता है? ( यतश्च कात्स्न्र्त्स्न्येनाविनश्यन् विकृतिमापद्यते ) का उत्तर - गर्भ में विकृत आर्तव का प्रभाव जिन कारण से गर्भ सम्पूर्ण रूप से नष्ट न होकर विकृति को प्राप्त होता है उनकी अब व्याख्या करेंगे । जब वातादि दोषों को प्रकुपित करने वाले आहार - विहार का स्त्री सेवन करती है तब वातादि दोष १. ' शोणितगर्भाशयोपघातायोपपद्यन्ते ' इति पा । २. ' तद । यम् ' इति पा. । ३. ' रान्ताम् ' इति पा. ।

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८७८ चरकसंहिता कुपित होकर शरीर में फैलते हुए रक्त और गर्भाशय को प्राप्त करते हैं, परन्तु सम्पूर्ण रक्त अथवा गर्भाशय को दूषित नहीं करते हैं ऐसी दशा में जब वह स्त्री गर्भ धारण करती है तब उस गर्भ के मातृज और पितृज अवयवों में से किसी एक अथवा अधिक अवयवों में विकृति उत्पन्न हो जाती है | जिस - जिस अवयव के बीज में अथवा बीज भाग में दोष प्रकुपित होते हैं उन उन बीज या बीजभागों से उत्पन्न होने वाले अवयवों में विकृति होती है । जब उस स्त्री के शोणित तथा गर्भाशय के बीजभाग प्रदुष्ट होते हैं तब वह स्त्री वन्ध्या संतति उत्पन्न करती है । जब उस स्त्री के शोणित गर्भाशय के बीज भाग का अवयव प्रदुष्ट होता है तब वह पूतिप्रजा संतति उत्पन्न करती है । जब उस स्त्री के शोणित में गर्भाशय के बीज भागावयव और स्त्रीकर बीज, शरीर बीज भागों के एक देश में विकृति उत्पन्न होती है तब वह स्त्री, अधिक स्त्री की आकृति वाल स्त्री - भिन्न वार्ता नामक संतति उपन करती है इसलिए इसे स्त्रीव्यापत् कहते हैं ॥ ३० ॥

विमर्श - यहाँ पर तीन पद, ' बीज ', ' वीजभाग ', बीजभागावयव, क्रमशः पुंवीज, स्त्रीबीज, संयुक्त-गर्भ का प्रथम एकाणुयुक्त शरीर न्यूक्लियस और क्रोमोसोम के लिए आया हुआ प्रतीत होता है । एवमेव पुरुषस्य यदा बीजे बीजभागः प्रदोषमापद्यते, तदा वन्ध्यं जनयति; यदा पुनरस्य बीजे बीजभागावयवः प्रदोषमापद्यते तदा पूतिप्रजं जनयति; यदा त्वस्य वीजे बीजभागावयवः पुरुषकराणां च शरीरबीजभागानामेकदेशः प्रदोषमापद्यते, तदा पुरुषा-कृतिभूयिष्ठमपुरुषं तृणपुत्रिकं नाम जनयति तां पुरुषव्यापदमाचक्षते ॥ ३१ ॥

गर्भ में विकृत शुक्र का प्रभाव - • इसी प्रकार जब पुरुष के बीज में सम्पूर्ण उत्पादक भाव कुपित हो जाते हैं । तब वह पुरुष का वीज वन्ध्य पुत्र उत्पन्न करता है । और जब पुरुष के बीज में बीज भाग का एक अंश कुपित होता है तो पूतिप्रज सन्तान उत्पन्न होती है । जब पुरुष के बीज में प्रजनन भाग का एक अंश एवं पुरुषकर शरीर के उत्पादक भाग का एक अंश दुष्ट होता है तब पुरुष की आकृति से अधिक समानता रखने वाला पुरुष से भिन्न अपुरुष ' तृणपुत्रिक ' नामक

सन्तान उत्पन्न होती है । इसे पुरुषव्यापद् कहते है ॥ ३१ ॥

एतेन मातृजानां पितृजानां चावयवानां विकृतिव्याख्यानेन सात्म्यजानां रसजानां सत्वजानां चावयवानां विकृतिर्व्याख्याता भवति ॥ ३२ ॥

मातृ - पितृज अवयव - विकृति से सात्म्यज आदि विकृतियों का निरूपण - इन मातृज, पितृज अवयवों की विकृति का व्याख्यान ( वर्णन ) करने से ही सात्म्यज, रसज, एवं सत्त्वज अवयवों की विकृति का व्याख्यान हो जाता है, ऐसा समझना चाहिए ॥ ३२ ॥

विमर्श - जब गर्भवती स्त्री के खाये हुये सात्म्य आहार के रस को दोषप्रकोपक कारणों के सेवन से कुपित दोष दूषित कर देते हैं तो आरोग्य, शरीर की उत्पत्ति, अभिवृद्धि आदि में विकृति हो जाती है । जब सत्त्व में विकृति होती है अर्थात् मन को दोष दूषित करते हैं तब भक्ति, शील, शौच आदि में विकृति होती है । निर्विकारः परस्त्वामा सर्वभूतानां निर्विशेषः सत्वशरीरयोस्तु विशेषाद्विशेषोपलब्धिः ॥ आत्मा का निर्विकार स्वरूप पर - आत्मा अर्थात् श्रेष्ठ आत्मा तो विकाररहित होती ( सोलह विकार से रहित है ) और सभी प्राणिमात्र में निर्विशेष रूप ( समान ) से रहती है । मन एवं शरीर की भिन्नता से विशेष ( भिन्नता ) की उपलब्धि ( प्राप्ति ) होती है ॥ ३३ ॥

१. ' एवमेव पुरुषस्य बीजदोषे पितृजावयवविकृतिं विद्यात् । यदा ह्यस्य वीजे बीजभागावयवः ' इतिपा. । २. ' तृणपूलिकम् ' इति पा. ।

पृष्ठ 968

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महतीगर्भावक्रान्ति ० ४ ] शारीरस्थानम् ८७६ विमर्श - - मातृज एवं पितृज अवयवों की व्याख्या से सात्म्यज आदि अवयवों की व्याख्या समझ ली जाती है पर गर्भोत्पादक ६ भावों में से आत्मा में विकृति उत्पन्न नहीं होती क्योंकि वह स्वयं विकार रहित है, उसे हीश्रेष्ठ आत्मा कहा जाता है । पर जो आत्मा मन एवं शरीर से सम्बन्धित हो जाती है उसमें सुख - दुःख आदि विकार होते हैं । जैसे मैं दुःखी हूँ, मैं अन्धा हूँ, मैं काला हूं आदि व्यवहार होता है । यहाँ यद्यपि ये सभी विकार शरीर में होते है पर आत्मा में अध्याहार किया जाता है, क्योंकि आत्मा, शरीर, मन नित्य सम्बन्धित रहते हैं । यहाँ केवल शुद्ध, अव्यक्त, नित्य, श्रेष्ट आत्मा का ही ग्रहण करना चाहिए वही आत्मा गर्भोत्पत्ति में कारण है । अतः आत्मज विकृति नहीं होती । * तत्र त्रयः शरीरदोषा वातपित्तश्लेप्माणः, ते शरीरं दूषयन्तिः द्वौ पुनः सत्वदोषौ रजस्तमश्च, तौ सत्वं दूषयतः । ताभ्यां च सत्त्वशरीराभ्यां दुष्टाभ्यां विकृतिरुपजायते, नोपजायते चाप्रदुष्टाभ्याम् ॥ ३४ ॥

शारीरिक और मानसिक दोष www इनमें शरीर के तीन दोष होते है वात, पित्त, कफ, ये दोष शरीर को दूषित करते हैं । दो दोष मन के होते हैं रज और तम ये दोनों मन को दूषित करते है । इन मन और शरीर के दूषित हो जाने से शरीर में विकृति उत्पन्न हो जाती है । यदि मन और शरीर अदुष्ट ( अर्थात् दुष्ट न हो ) तो विकृति नहीं उत्पन्न होती । आत्मा में जो विकृति प्रतीत होती है वह विकृति, मन एवं शरीर के विकृत होने से ही आत्मा में आभास होता है । वस्तुतः आत्मा में विकार नहीं होता ॥ ३४ ॥

तत्र शरीरं योनिविशेषाच्चतुर्विधमुक्तमग्रे ॥ ३५ ॥

शरीर के भेद - इनमें योनिभेद से शरीर चार प्रकार का होता है यह पहले खुड्डिका गर्भावान्ति नामक तीसरे अध्याय में कह चुके है ॥ ३५ ॥

* त्रिविधं खलु सत्वं शुद्धं, राजसं, तामसमिति । तत्र शुद्धमदोषमाख्यातं कल्याणांश-राजसं सदोषमाख्यातं रोषांशत्वात्, तामसमपि सदोषमाख्यातं मोहांशत्वात् । स्वात्, तेषां तु त्रयाणामपि सच्चानामेकैकस्य भेदाग्रमपरिसङ्ख्येयं तरतमयोगाच्छरीरयोनिवि-शेपेभ्यश्चान्योन्यानुविधानत्वाच्च । शरीरं ह्यपि सत्त्वमनुविधीयते, सत्त्वं च शरीरम् । तस्मात् कतिचित्सच्चभेदाननूकाभिनिर्देशेन निदर्शनार्थमनुव्याख्यास्यामः ॥ ३६ ॥

( २ ) सोलह मानस प्रकृतियाँ ( Sixteen Mental Constitution ) सत्त्वके भेद - मन तीन प्रकार का होता है, १. शुद्ध ( सात्विक ) २. राजस ३. तामस । इनमें शुद्ध ( सात्विक ) मन कल्याणकारी अंश के अधिक होने से दोषरहित होता है । राजस मन में रोष ( क्रोध ) अंश को प्रधानता होने से वह दोषयुक्त कहा जाता है और तामस मन मोह अंश की प्रधानता होती है अतः वह दोषयुक्त होता है । इस तीन प्रकार के मन में एक - एक मन के भेद तर तम के योग से अपरिसंख्येय होते हैं । शरीर की ( चार ) योनियो के भेद से और शरीर एवं मन के परस्पर अनुविधान होने से अर्थात् शरीर मन के अनुकूल और मन शरीर के अनुरूप होता है अतः इन भेदों से भी मन असंख्येय होता है । शरीर भी मन का अनुगमन करता है और मन शरीर का अनुगमन करता है । अतः कुछ मन के भेदों की समानता के अनुसार निर्देश कर उदाहरणार्थं व्याख्या करेंगे ॥ ६३ ॥

तद्यथा - शुचिं सत्याभिसन्धं जितात्मानं संविभागिनं ज्ञानविज्ञानचचनप्रतिवचनसं-पन्नं स्मृतिमन्तं कामक्रोधलोभमानमो हेयहर्षामर्षापेतं समं सर्वभूतेषु ब्राह्मं विद्यात् ॥ ( १ ) ॥

पृष्ठ 969

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चरकसंहिता ( १ ) ब्राह्म सत्त्व का स्वरूप – • जैसे - पवित्र, सत्य प्रतिज्ञा वाले, जितात्मा, सभी कार्यो का विभाग कर करना कि कौन कार्य करने योग्य हैं या अयोग्य हैं । ज्ञान, विज्ञान, वचन बोलने की शक्ति, उत्तर देने की शक्ति से सम्पन्न, स्मरणशक्तिसम्पन्न, काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, मोह, ईर्ष्या, प्रसन्नता और अमर्ष से शून्य सभी प्राणिमात्र में समदृष्टि का व्यवहार रखने वाला पुरुष ब्राह्मसत्त्व वाला जानना चाहिये । ( १ ) विमर्श - सुश्रुत में - इस प्रकार वर्णन मिलता है यथा- ' शौचमास्तिक्यमभ्यासो वेदेषु गुरु-पूजनम् । प्रियातिथित्वमिज्या च ब्रह्मकायस्य लक्षणम् । ' और काश्यपसंहिता में ' तपःसत्यदया-शौचदानशीलरतं समम् । ज्ञानविज्ञानसम्पन्नं ब्राह्यं विद्याज्जितेन्द्रियम् ॥ ' इज्याध्ययनव्रतहोमब्रह्मचर्य परमतिथिव्रतमुपशान्तमदमानरागद्वेषमोहलो भरोषं प्रति-भावचनविज्ञानोपधारणशक्तिसंपन्नमार्षं विद्यात् ॥ ( २ ) ॥ ( २ ) आर्षसत्त्व -- यज्ञ करना, अध्ययन करना, व्रत, होम, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला, अतिथियों की सेवा करने वाला, मद, अहंकार, राग, द्वेष, मोह, लोभ और क्रोध जिसका शान्त है अर्थात् इनसे शून्य व्यक्ति, प्रतिभा, वचन बोलने की शक्ति से युक्त, विज्ञान, धारणाशक्ति-सम्पन्न पुरुष आर्षसत्त्व ( ऋषिसत्त्व ) वाला जानना चाहिये ॥ ( २ ) ॥ विमर्श - सुश्रुत में - ' जपव्रतब्रह्मचर्य हो माध्ययन सेविनम् । ज्ञानविज्ञानसम्पन्नमृषिसत्त्वं नरें चार्षमा-विदुः ॥ ' तथा काश्यप में - ' शौचव्रतेज्याध्ययनब्रह्मचर्यदयापरम् । जितमानमदक्रोधं वक्तारं दिशेत् ॥ ' आर्षसत्त्व का लक्षण इस प्रकार बताया है । ऐश्वर्यवन्तमादेयवाक्यं यज्वानं शूरमोजस्विनं तेजसोपेतमक्लिष्टकर्माणं दीर्घदर्शिनं धर्मार्थकामाभिरत मैन्द्रं विद्यात् ॥ ( ३ ) ॥ ( ३ ) ऐन्द्र सत्त्व - लक्ष्मीसम्पन्न, जिसका वाक्य ग्रहण करने योग्य हो, यज्ञ करने , धर्म वाला , अर्थ हो, शूर, ओजस्वी, तेज से युक्त ( तेजस्वी ), बुरे कार्यों का करने वाला न हो, दीर्घदर्शी काम में सदा तत्पर रहने वाले पुरुष ऐन्द्रसत्त्व ( इन्द्रसत्व वाला ) जानना चाहिये ॥ ( ३ ) ॥ विमर्श - - सुश्रुत में - ' माहात्म्यं शौर्यमाज्ञा च सततं शास्त्रबुद्धिता । भृत्यानां भरणं चापि माहेन्द्रं कायलक्षणम् ॥ ' काश्यप में - ' त्रिवर्गनित्यं विद्वांसं शूरमक्लिष्टकारिणम् । प्राहुरैन्द्रं महाभागमधिष्ठातारमीश्वरम् ॥ ' उपर्युक्त वर्णन मिलता है । लेखास्थवृत्तं प्राप्तकारिणमसंग्रहार्थमुत्थानवन्तं स्मृतिमन्तमैश्वर्यलेम्भिनं व्यपगतरागे-द्वेपमोहं याम्यं विद्यात् ॥ ( ४ ) ॥ ( ४ ) याम्य सत्त्व - • कर्तव्याकर्तव्य मर्यादा के अनुसार व्यवहार करनेवाला ( ' लेखाकर्त-व्याकर्तञ्चमर्यादा तत्र स्थितम् वृत्तं यस्य सः लेखास्थवृत्तः तम् ' इति चक्रः । अत् कार्य उपस्थित होने पर शीघ्र कार्य करने वाला हो ), सभी कार्यों में उचित मार्गों का अवलम्बन करता हो, असंप्रहार्थ्य हो अर्थात् कोई भी व्यक्ति उसके ऊपर प्रहार न कर सके । सदा जागरूक ( कार्यतत्पर ) स्मरणशक्तिसम्पन्न, ऐश्वर्य को प्राप्त करने वाला और जो राग, द्वेष मोह से दूर हो ( शून्य हो ) ऐसे पुरुष को याम्य सत्त्व ( यमराज सत्त्व ) जानना चाहिये ॥ ( ४ ) ॥ विमर्श - मुश्रुत में - ' प्राप्तकारी दृढोत्थानो निर्भयः स्मृतिमाञ्छुचिः । रागमोहमद द्वेपैर्वजितो च याम्यसत्त्ववान् ॥ ' काश्यप में - त्यक्तदम्मभयक्रोधं प्राप्तकारिणमीश्वरम् । समं मित्रे च शत्रौ याम्यं विद्यात् सुनिश्चितम् ॥ ' उपर्युक्त वर्णन मिलता है । १. ' ऐश्वर्यालम्बिनम् ' इति पा. ।

पृष्ठ 970

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महतीगर्भावक्रान्ति ४ ] शारीरस्थानम् ८८१ शूरं घोरं शुचिमशुचि पिणं यज्वानमम्भोविहाररतिमक्लिष्टकर्माणं स्थानकोपप्रसादं वारुणं विद्यात् ॥ ( ५ ) ॥ ( ५ ) वारुण सत्त्व - शूर, धीर, पवित्र, अपवित्रता से द्वेष करने वाला ( दूर रहने वाला ), यश करने वाला, जल में तैरना या नौका विहार में प्रेम रखने वाला, बुरे कार्यों को न करने वाला, स्थान ( अवसर ) पर क्रोधित और प्रसन्न रहने वाला पुरुष वारुण सत्त्व वाला जानना चाहिये ॥ ( ५ ) || विमर्श - सुश्रुत में - ' शीतसेवा सहिष्णुवं पङ्गल्यं हरिकेशता । प्रियवादित्वमित्येतद्वारुणं काय-लक्षणम् ॥ ' काश्यप में – ' अशुचिर्विशुचिः शूरः शोत्रक्रोधप्रसादवान् । पुण्यशीलो महाभागो वारुणो वरुणप्रियः ॥ ' उपर्युक्त वर्णन मिलता है । स्थानमानोपभोगपरिवारसंपन्नं धर्मार्थकामनित्यं शुचिं सुखविहारं व्यक्तकोपप्रसादं कौबेरं विद्यात् ॥ ( ६ ) ॥ ( ६ ) कौबेरसत्व -स्थान पर मान ( अहंकार ) और स्थान पर वस्तुओं का उपयोग करने वाला अर्थात् जहाँ जब अभिमान करना आवश्यक हो नव अहंकार करने वाला और जब जिस वस्तु का उपयोग करना आवश्यक हो तब उसका उपयोग करने वाला, परिवार ( पुत्र - पौत्रादि से ) सम्पन्न, सुखपूर्वक विहार करने वाला, धर्म, अर्थ, काम में सदा तत्पर, पवित्र, क्रोध और प्रसन्नता ' साफ - साफ जिसकी प्रगट होती हो ऐसा व्यक्ति को कौवेरसत्व वाला जानना चाहिये || ( ६ ) ॥ विमर्श - धुन में - ' मध्यस्थता सहिष्णुत्वमर्थस्यागमसंचयौ । महाप्रसवशक्तित्वं कौवेरं काय-लक्षणम् ॥ ' काश्यप में— ' स्थानमानपरीचारधर्मकामार्थलोभिनम् । क्रोवप्रसादफलदं कौबेरं प्राहरू-जितम् ॥ ' उपर्युक्त वर्णन मिलता है । प्रिय नृत्यगीतवादित्रोल्लापकश्लोकाख्यायिकेतिहासपुराणेषु कुशलं गन्धमाल्यानुलेपन-वसनस्त्रीविहारकामनित्यमनसूयकं गान्धर्वं विद्यात् ॥ ( ७ ) ॥ ( ७ ) गन्धर्व सत्त्व - जिसे नाचना, गाना, बाजा बजाना, आलाप लेना प्रिय हो, जो श्लोक पाठ, आख्यायिका ( कहानी ), इतिहास और पुराण - पाठ में कुशल हो, जो गन्ध आदि का लगाना, पुष्पमाला, चन्दन, कस्तूरी आदि का अनुलेपन, सुन्दर वस्त्रधारण, स्त्रीविहार की इच्छा नित्य करता हो और दूसरे के गुणों में दोषारोपण करने वाला न हो ऐसे पुरुष को गन्धर्व सत्त्व वाला जानना चाहिए ॥ ( ७ ) ॥ विमर्श - सुश्रुत में - ' गन्धमाल्यप्रियत्वं च नृत्यवादित्र कामिता । विहारशीलता चैव गान्धर्व कायलक्षणम् ॥ ' काश्यप में - ' लोकाख्यानेतिहासज्ञं गन्धमाल्याम्बरप्रियम् । नृत्तगीतोपहासज्ञं गान्धर्व सुभगं विदुः ॥ ' ये लक्षण गान्धर्व सत्त्व के बनाए हैं । इत्येवं शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधं भेदांशं विद्यात् कल्याणांशत्वात्; तत्संयोगात्तु ब्राह्म-मत्यन्तशुद्धं व्यवस्येत् ॥ ३७ ॥

इस प्रकार कल्याणकारी अंश की अधिकता से युक्त होने के कारण शुद्ध सत्त्व के सात भेद जानने चाहिए | उस कल्याणकारी अंश का ठीक संयोग होने से ब्राह्मसत्त्व शुद्धतम ( अत्यन्त शुद्ध ) है, ऐसा जानना चाहिए ॥ ३७ ॥

विमर्श - सात्त्विक मन को शुद्ध मन माना जाता है । शुद्ध मन का लक्षण - ' आरोग्यं प्रशमो रूपं ज्ञानविज्ञानमायता । दीर्घमायुः सुवात्यक्तं ( सुखावाप्ति ) सामान्यं शुद्धलक्षणम् ॥ ' ( काश्यप ) आरोग्य, शान्ति, रूप ( सुन्दरता ), ज्ञान, विज्ञान, आता ( उत्तमगुणयुक्तता ), दीर्घायु और सुखसाधन को न छोड़ना या सुखसाधन की प्राप्ति करना वे सभी लक्षण शुद्ध सत्त्व के हैं । ५६ च ० सं ०