चरक संहिता हिन्दी भाष्य — पृष्ठ 971–980
चरक संहिता हिन्दी भाष्य · Chaukhamba · पृष्ठ 971–980
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८८२ चरकसंहिता इस प्रकार चरक ने शुद्ध सत्व के सात भेद बताए हैं जिनमें ब्राह्मसत्त्व को शुद्धतम माना है । सुश्रुत ने -'सप्तैते सात्त्विकाः कायाः ' से शुद्ध सत्त्व के सात ही भेद माने हैं पर काश्यप संहिता में शुद्ध सत्त्व के आठ भेद बताये गये हैं, जैसे- ' एतत् कल्याणभूयिष्ठं शुद्धं सत्त्वमिहाष्टधा । ' उसमें आठवाँ प्राजापत्य सत्व एक अलग माना है, जैसे- ' प्रजावन्तं क्रियावन्तं धर्मशीलं जगत्प्रियम् । अनी मशठं प्राज्ञः प्राजापत्यं वदेच्छुभम् ॥ ' अर्थात् सन्तान युक्त, यज्ञ आदि उत्तन क्रियाओं को करने वाला, धार्मिक, जिसके लिए जगत् प्रिय है या जो जगत् का प्रिय है, ईर्ष्या रहित, दुष्टता रहित, और जो पवित्र हो उसे प्राजापत्य सत्त्व कहते हैं । ( का. सू. अ. २८ ) । चरक ने वारुण सत्व में ही प्राजापत्य सत्त्व का समावेश कर सिद्धान्ततः सात ही शुद्ध सत्त्व की प्रकृतियां मानी हैं । शूरं चण्डमसूयकमैश्वर्यवन्तमौपेधिकं रौद्रमननुक्रोशमात्मपूजकमासुरं विद्यात् ॥ ( १ ) ॥ _ राजस सत्त्व के ६ भेद - ( १ ) आसुर सत्व - शूर, अधिक क्रोधी, दूसरे के गुणों में दोष देखने वाला, सम्पत्तिशाली, कपटी, उग्र स्वभाव वाला, दयाशून्य, अपनी पूजा करने वाला अर्थात् स्वार्थी, ऐसे पुरुष को आसुर सत्त्व वाला जानना चाहिए ॥ ( १ ) ॥ विमर्श - सुश्रुत में - ' ऐश्वर्यवन्तं रौद्रं च शूरं चण्डभसूयकम् । एकाशिनं चौदरिकमासुरं सत्त्वमीदृशम् ॥ ' तथा काश्यप में – ' ईश्वरोऽसूयकश्चण्ड आत्मपूजोपधिप्रियः । सानुक्रोशभयो रौद्रो हन्ता शूरस्तथासुरः ॥ ' इस प्रकार आसुर सत्व का लक्षण बताया है । अमर्षिणमनुबन्धको छिद्रहारिणं क्रूरमाहारातिमात्ररुचिमामिषप्रियतमं स्वमाया-सबहुलमी राक्षसं विद्यात् ॥ ( २ ) ॥ ( २ ) राक्षस सत्र - किसी प्रतिकूल वस्तु को किसी भी दशा में सहन न करने वाला, बहुत दिनों तक क्रोध करने वाला, अर्थात् क्रोध की परम्परा को बनाए रखने वाला, छिद्र पाकर धोखा से मारने वाला, क्रूर, भोजन में अधिक प्रेम रखने वाला, मांस भोजन में सबसे अधिक प्रेम रखने वाला, शयन और परिश्रम अधिक करने वाला, ईर्ष्या करने वाला, ऐसे पुरुष को राक्षस सत्त्व वाला जानना चाहिए || ( २ ) । विमर्श - सुश्रुत में – ' एकान्तग्राहिता रौद्रमसूया धर्मबाह्यता | भृशमात्मस्तवश्चापि राक्षसं कायलक्षणम् ॥ ' तथा काश्यप में - ' क्रूरश्छिद्रप्रहारी च रोपेर्ष्यामर्षसन्ततः । वैरमांसाशनायासः कलहार्थी च राक्षसः ॥ ' इस प्रकार राक्षस सत्त्व का लक्षण बताया है । महोशनं स्त्रैणं स्त्रीरहस्काममशुचिं शुचिद्वेषिणं भीरुं भीषयितारं विकृतविहाराहारशीलं पैशाचं विद्यात् ॥ ( ३ ) ॥ ( ३ ) पैशाच सत्त्व - अधिक आलसी, स्त्री के वश में रहने वाला, स्त्रियों के साथ एकान्त में रहने की इच्छा करने वाला, अपवित्र, पवित्रता से दूर रहने वाला, डरपोक, दूसरों को भयभीत करने वाला तथा विकृत आहार और विहार करने वाला, ऐसे पुरुष को पैशाच सत्त्व वाला जानना चाहिये ॥ ( ३ ) । विमर्श - सुश्रुत में - ' उच्छिष्टाहारता तैक्ष्ण्यं साहसप्रियता तथा । स्त्रीलोलुपत्वं नैर्लज्ज्यं पैशाचं कायलक्षणम् ॥ ' तथा काश्यप में ' शुचिद्विशुचिः क्रूरोऽभीरुर्भीषयिताऽऽविल: । मद्यमांसप्रियः शङ्की पैशाचो बहुभोजनः ॥। ' यह पैशाचसत्त्व का लक्षण बताया है । क्रुद्धशूरमक्रुद्धभीरुं तीक्ष्णमायासबहुलं संत्र स्तगोचरमाहारविहारपरं सार्धं विद्यात् ( ४ ) २. ' महालसम् ' इति पा ० । १. ' औदरिकम् ' इति पा ० । ३. ' मन्त्रसुगोचरम् इति पा ० ।
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महतोगर्भावक्रान्ति ० ४ ] शारीरस्थानम् ८८३ - क्रोध करने पर शूर, ( ४ ) सर्पसत्त्व क्रोध उत्पन्न न होने पर डरपोंक, तेज, अधिक परिश्रम करने वाले, भययुक्त होकर प्रत्येक कार्य को करने वाले, सदा आहार और विहार में लगे रहने वाले पुरुष को सर्पसत्त्व वाला जानना चाहिये ॥ ( ४ ) ॥ विमर्श -- सुश्रुत में - तीक्ष्णमायासिनं भीरुं चण्डं मायान्वितं तथा । विहाराचारचपलं सार्पसत्त्वं विदुर्नरम् ॥ ' तथा काश्यप में - ' तीक्ष्णमायासबहुलं निद्रालुं बहुवैरिणम् । अक्रुद्धभोरुं स्त्रैणं च सार्पै नित्यौष्ठलेहिनम् ॥ ' यह सार्पसत्त्व का लक्षण बताया हैं । आहारकाममतिदुःखशीलाचारोपचार मसूयकमसंविभागिनमतिलोलुपमकर्मशीलं प्रैतं विद्यात् ॥ ( ५ ) ॥ ( ५ ) प्रतसत्त्व - आहार ( भोजन ) की सदा इच्छा रखने वाला, अत्यन्त दुःखदायी स्वभाव ( आचार और उपचार ) वाला, जो दूसरे के गुणों में दोषों को आरोपित करता हो, जो कर्तव्य और अकर्तव्य ज्ञान से शून्य हो, अत्यन्त लोभी हो और अकर्मशील ( आलसी ) हो, ऐसे पुरुष को प्रेतसत्त्व वाला जानना चाहिए ॥ ( ५ ) ॥ विमर्श - सुश्रुत में - ' असंविभागमलसं दुःखशीलमसूयकम् । लोलुपं चाप्यदातारं प्रेतसत्त्वं विदुर्नरम् ॥ ' तथा काश्यप में - ' अहंकृता महाहारा वैरिणो विकृताननाः । विरूपा विकृतात्मानो भूतसत्त्वा निशाप्रियाः ॥ ' ये लक्षण प्रेत ( भूत ) सत्व के बनाए I अनुषक्तकाममजस्रमाहारविहारपरमनवस्थितममर्षणमसंचयं शाकुनं विद्यात् ॥ ( ६ ) ॥ ( ६ ) शाकुनसत्त्व - सदा मैथुन में आसक्त रहने वाला, सदा आहार और विहार में तत्पर रहने वाला, चञ्चल, असहिष्णु और धन आदि किसी भी वस्तु का संचय न करने वाला ऐसे पुरुष को शाकुन सत्त्व वाला जानना चाहिये ॥ ( ६ ) ॥ विमर्श - सुश्रुत में - ' प्रवृद्धकामसेवी चाप्यजस्राहार एव च । अमर्षणोऽनवस्थायी शाकुनं कायलक्षणम् ॥ ' तथा काश्यप में - ' अमर्षिकुत्सिताहारं वाग्धूनं ( वाग्युद्धं ) नित्यशङ्कितम् । चलं
दुर्मेधसं भीरुं शाकुनं विद्ध्यनोकसम् ॥ ' शाकुनसत्त्व के ये लक्षण बताए गए हैं ।
इत्येवं खलु राजसस्य सत्त्वस्य षड्विधं भेदांशं विद्यात्, रोषांशत्वात् ॥ ३८ ॥
इस प्रकार रोष अंश की प्रधानता होने के कारण राजस सत्त्व के ६ भेद होते हैं, यह जानना चाहिए ॥ ३८ ॥
विमर्श - इस प्रकार राजस सत्त्व के ६ भेद चरक एवं सुश्रुत ने - ( षडेते राजसाः कायाः ) स्वीकार किये हैं । पर काश्यप ने राजस सत्त्व के सात भेद माने हैं, जैसे- ' इत्येतद्राजसं सत्त्वं सप्तधा क्रोधकारितम् । ' काश्यप ने सातवां याक्षसत्त्व माना है, यथा - ' दानशय्यात्यलङ्कारपान-भोजनमैथुनैः । नित्योपेतं प्रमुदितं याक्षं विद्यात् प्रभक्षणम् ॥ ' अर्थात् सदा दान, शयन, शृङ्गार, अतिपान, भोजन और मैथुन में लगा रहने वाला, सदा खुश रहने वाला और अधिक खाने वाला पुरुष याक्षसत्त्व वाला होता है । इस प्रकार राजस सत्त्व के तरतम के भेद से सात भेद होते हैं । निराकरिष्णुममेघ जुगुप्सिताचाराहारं मैथुनपरं स्वमशीलं पाशवं विद्यात् ॥ ( १ ) ॥ पाशव ( तामस ) सत्त्व के तीन भेद - - ( १ ) पशु सत्त्व का पुरुष अपने पर आई हुई विपत्तियों को न दूर करने वाले स्मरण शक्ति से शून्य निन्दित आचार और आहार करने वाले, सदा मैथुन में प्रसक्त हने वाले और अधिक शयन करने वाले पुरुष को पशु सत्व वाला जानना चाहिए ॥ ( १ ) ॥ १. ' निरलङ्करिष्णुम् ' इति पा ० ।
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558 चरकसंहिता विमर्श - सुश्रुत में - ' दुर्मेधस्त्वं मन्दता च स्वप्ने मैथुननित्यता । निराकरिष्णुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः ॥ ' तथा काश्यप में - ' आहार मैथुनपरं स्वप्नशीलम मेधसम् । अथैवं पाशवं विद्यान्मृ-जालङ्कारवर्जितम् ॥ ' ये लक्षण पाशव सत्त्व के बताए गये हैं । भीरुमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्तकामक्रोधं सरणशीलं तोयकामं मात्स्यं विद्यात् ॥ ( २ ) ॥ ( २ ) मात्स्य सत्त्व - • डरपोक, मूर्ख, आहार के लोभी, चञ्चल, काम और क्रोध में अनुषक्त ( अनुरक्त- ), सदा चलने - फिरने वाले ( यात्रा प्रिय ) तथा जल से अधिक प्रेम करने वाले पुरुष को मात्स्य ( मछली ) सत्त्व का जानना चाहिये ॥ ( २ ) ॥ विमर्श - सुश्रुत में - ' अनवस्थितता मौर्य भीरुत्वं सलिलार्थिता । परस्पराभिमर्दश्च मात्स्य-सत्त्वस्य लक्षणम् ॥ ' तथा काश्यप में - ' भीरुमप्र माधूनं कामक्रोधवशं गतम् । हिस्रमात्मपरं विद्या-न्मात्स्यं सुप्रजसं शठम् ॥ ' ये लक्षण मात्स्य सत्व के बताए हैं । अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्धयङ्गहोनं वानस्पत्यं विद्यात् ॥ ( ३ ) ॥ ( ३ ) वानस्पत्य सत्त्व - आलसी, केवल आहार में ही लगे रहने वाले तथा सभी प्रकार के बाह्य एवं आन्तर ज्ञान से शून्य पुरुष को वानस्पत्य सत्त्व वाला जानना चाहिए । ( ३ ) ॥ विमर्श - मुश्रुत में - ' एकस्थानरतिर्नित्यमाहारे केवले रतः । वानस्पत्यो नरः सत्त्वधर्मकामार्थ-वर्जितः ॥ तथा काश्यप में - ' बधबन्धपरिक्लेशशीतवातातपैः समम् । वुद्ध्यङ्गहीनमलसं वानस्पत्यं वदेदृजुम् ॥ ' ये लक्षण वानस्पत्यसत्त्व के बताए हैं । सभी प्रकार के ज्ञान से शून्य वानस्पत्य सत्व वाला होता है अतः काश्यप के अनुसार वह वध, वन्धन आदि को सहन करने वाला होता है । इन पृथक् - पृथक् सत्त्वों का वर्णन किया गया है । ये सत्त्व, रज और तम के गुण के अनुसार ही कार्य करते हैं, इनके गुण इस प्रकार हैं- ' सत्त्वं प्रकाशकं विद्धि, रजश्चापि प्रवर्तकम् । तमो नियामकं प्रोक्तमन्योन्यमिथुनप्रियम् ॥ ' इन - इन सत्वों का जो नामकरण किया गया है के नाम की प्रकृति ( सत्त्व ) का वर्णन किया है उस अनुसार होता है । वह अन्वर्थ नाम है, जिस मत्स - या यम आदि सत्त्व से युक्त पुरुष ठीक उसी के गुण के इत्येवं तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविधं भेदांशं विद्यान्मोहांशत्वात् ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार मोह अंश की प्रधानता के अनुसार तामस सत्त्व के तीन प्रकार के भेदों को जानना चाहिए ॥ ३ ९ ॥ विमर्श - सामान्य तामस सत्त्व का लक्षण काश्यपसंहिता में निम्न रूप से अधिक बताया है । यथा- ' इत्येतत्रिविधं सत्त्वं तामसं मोहसम्भवम् । यच्चामेध्यमकल्याणं सर्व तच्चापि तामसम् ॥ ' * इत्यपरिसंख्येयभेदानां त्रयाणामपि सत्त्वानां भेदैकदेशो व्याख्यातः शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधो ब्रह्मर्षिशक्रयमवरुण कुबेरगन्धर्वसत्त्वानुकारेण, राजसस्य षड्विधो दैत्यपिशाच-राक्षससर्पप्रेतशकुनिसत्त्वानुकारेण, तामसस्य त्रिविधः पशुमत्स्यवनस्पतिसत्त्वानुकारेण, कथं च यथासत्त्वमुपचारः स्यादिति ॥ ४० ॥
संक्षेप में सत्त्वों का विवरण - इन तीनों सत्त्वों के अपरिसंख्येय भेदों में भेद के एक देश की व्याख्या कर दी गयी है । शुद्ध सत्व के १ मा २. ऋषि, ३. इन्द्र, ४. यमराज, ५. वरुण, ६. कुबेर और ७. गन्धर्व इनके मन का अनुकरण करने वाले सान भेद, राजस सत्त्व के १. असुर, २. राक्षस, ३. पिशाच, ४. सर्प, ५ प्रेत और ६. शकुने ( पक्षी ) इनके मन का अनुकरण
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पुरुषविच शारीराध्याय: ५ ] शारीरस्थानम् ८६५ करने वाले ६ भेद; तामस सत्त्व के १. पशु, २. मत्स्य, ३. वनस्पति इनके मन और गुण का अनुकरण करने वाले के तीन के भेद होते हैं । सत्व के अनुसार उपचार ( चिकित्सा ) कैसे हो, इसलिए वे सत्त्व के भेद बनाए हैं ॥ ४० ॥
केवलश्चायमुद्देशो यथोद्देशमभिनिर्दिष्टो भवति गर्भावक्रान्तिसंप्रयुक्तः; तस्य चार्थस्य विज्ञाने सामर्थ्यं गर्भकराणां च भावानामनुसमाधिः, विधातश्च विघातकराणां भावाना-मिति ॥ ४१ ॥
यह सम्पूर्ण गर्भावक्रान्ति का सहायक विषय यथोद्देश से कह दिया गया है । इन सब विषयों को जानने का प्रयोजन है गर्भकर भावों का संग्रह करना और गर्भ नाशक भावों का परित्याग करना । अर्थात् इनकी जानकारी कर संग्रह और त्याग में प्रवृत्ति होती है ॥ ४० ॥
तत्र श्लोकाः-निमित्तमात्मा प्रकृतिर्वृद्धिः कुक्षौ क्रमेण च । वृद्धिहेतुश्च गर्भस्य पञ्चार्थाः शुभसंज्ञिताः ॥४२ ॥
अजन्मनि च यो हेतुर्विनाशे विकृतावपि । इमांस्त्रीनशुभान् भावानाहुर्गर्भविघातकान् ॥४३ ॥
शुभाशुभसमाख्यातानष्टौ भावानिमान् भिषक् । सर्वथा वेद यः सर्वान् स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥ अवाप्त्युपायान् गर्भस्य स एवं ज्ञातुमर्हति । ये च गर्भविघातोक्ता भावास्तांश्चाप्युदारधीः ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने महती -गर्भाविकान्तिशारीरं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अध्याय उपसंहार - १. गर्भ का कारण, २. गर्भ की आत्मा, ३. गर्भ की प्रकृति, ४. गर्भाशय में गर्भ की क्रमशः वृद्धि, ५. गर्भ की वृद्धि का कारण, ये पाँच अर्थ शुभ माने जाते हैं । १. गर्भ के उत्पन्न न होने में कारण, २. गर्भ के विनाश में कारण, ३. गर्भ की विकृति में कारण, गर्भ विनाशक इन तीन भावों को अशुभ माना जाता है । इन शुभ और अशुभ सभी आठों भावों को जो वैद्य भली प्रकार से जानता है वह राजा की चिकित्सा कर सकता है । उदार बुद्धि वाला वह ( वैद्य ) गर्भ प्राप्ति के उपायों को और गर्भ नाशक सुभी भावों को जानने में समर्थ होता है ॥ ४१-४२ ॥ इस प्रकार चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत अग्निवेशकृत तन्त्र ( चरकसंहिता ) के शारीरस्थान में महतीगर्भावक्रान्तिशारीर नामक चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः अथातः पुरुषविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति हरुमाह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके बाद पुरुष विचय नामक शारीर की व्याख्या की जायगी । जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १२ ॥
विमर्श - पहले लोकसम्मित पुरुष है, कहा गया है, पर उसका विशद विवेचन नहीं किया गया । अतः उसे समझाने के लिए यह पुरुष विचय नामक अध्याय ( जिसमें लोक सामान्य से पुरुष की तुलना की गई है ) का प्रारम्भ किया गया है । १. ' गर्भावक्रान्तिसंप्रयुक्तस्यार्थस्य विज्ञाने ' इति पा ० ।
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८५६ चरकसंहिता * ' पुरुषोऽयं लोकसंमितः ' इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः । यावन्तो हि लोके ( मूर्तिमन्तो ) भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके; इत्येवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - नैतावता वाक्येनोक्तं वाक्यार्थमवगाहामहे, भगवतः बुद्ध्या भूयस्तरमतोऽनुव्याख्यायमानं शुश्रूषामह इति ॥ ३ ॥
( १ ) लोक पुरुष साम्य प्रकरण लोक पुरुष साम्य विषयक प्रश्न - यह पुरुष लोक ( जगत् ) के समान है, यह भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा । क्योंकि लोक में जितने मूर्तिमान् भावों के भेद हैं अर्थात् स्वरूप वाले भाव हैं उतने ही पुरुष ( जीवित शरीर ) में भी है । और जितने भाव विशेष पुरुष में हैं उतने ही भाव विशेष लोक में भी हैं ॥ ३ ॥
इस प्रकार ( लोक और पुरुष में समान भावों को ) बताने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा कि इतने मात्र वाक्य को भगवान् के कह देने से वाक्य के तात्पर्य को मै नहीं समझ पाता हूँ । अतः भगवान् की बुद्धि से ही पुनः विस्तार से इसकी व्याख्या सुनना चाहता हूँ || ३ || ॐ तमुवाच भगवानात्रेयः - अपरिसंख्येया लोकावयवविशेषाः, पुरुषावयवविशेषा अप्यपरिसंख्येयाः; तेषां यथास्थूलं कतिचिद्भावान् सामान्यमभिप्रेत्योदाहरिष्यामः, तानेकमना निबोध सम्यगुपवर्ण्यमानानग्निवेश! । षड्धातवः समुदिताः ' पुरुष ' इति शब्दं लभन्ते; तद्यथा - पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमिति, एत एव च षड्धातवः समुदिताः ' पुरुष ' इति शब्दं लभन्ते ॥ ४ ॥
आत्रेय का उत्तर - ' अग्निवेश से भगवान् आत्रेय ने कहा कि लोक ( संसार ) के अवयव विशेष ( जैसे वृक्ष, तृण, पशु, आदि ) अनगिनत हैं, पुरुष के भी अवयव विशेष ( जैसे- स्नायु, कण्डरा, धमनी आदि ) अनगिनत हैं । उनमें कुछ मोटे - मोटे अवयवों को सामान्य ( सादृश्य ) दिखाने के अभिप्राय से उदाहरण स्वरूप यहाँ बतायेंगे । हे अग्निवेश! एकाग्रचित्त होकर जिनका वर्णन किया जाता है उनको उचित रूप से समझो । छः धातुए मिलकर लोक संज्ञाको प्राप्त होती हैं ( अर्थात् षड्धातुसमुदाय को लोक कहते हैं ) जैसे - १. पृथिवी, २. जल, ३. अग्नि, ४. वायु और ५. आकाश एवं ६. अव्यक्त ब्रह्म । ये ही षड्धातुएँ मिलकर पुरुष संज्ञा को प्राप्त करती हैं ॥ ४ ॥
* तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्तिः, आपः क्लेदः, तेजोऽभिसन्तापः, वायुः प्राणः, वियत् सुषिराणि, ब्रह्म अन्तरात्मा । यथा खलु ब्राह्मी विभूतिलोंके तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापतिरन्तरात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्वं यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः, आदित्यस्त्वादानं, रुद्रो रोषः, सोमः प्रसादः, वसवः सुखम्, अश्विनौ कान्तिः, मरुदुत्साहः, विश्वेदेवाः सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च तमो मोहः, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं यथा कृतयुगमेवं वाल्यं, यथा त्रेता तथा यौवनं यथा द्वापरस्तथा स्थाविर्यं यथा कलिरेवमातुर्य, यथा युगान्तस्तथा मरणमिति । एवमेतेनानुमानेनानुक्तानामपि लोकपुरुषयोरवयवविशेषाणामग्नवेश! सामान्यं विद्यादिति ॥ ५ ॥
और भी - उस पुरुष की संताप ( शारीरिक उष्णता ) है, १. ' लोकसाम्येन ' इति पा ० । पृथिवी मूर्ति है, जल उसका कुंद ( गीलापन ) है, अग्नि उसका वायु प्राण है, आकाश उसके छिद्रसमूह हैं, ब्रह्म उस पुरुष की २. ' मूर्तिमन्तः ' इति गङ्गाधरसंमतः पा ० ।
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पुरुषविचयशारीराध्याय: ५ ] @ लोकगत भाव १. पृथिवी २. आप ३. तेज ४. वायु ५. वित् ६. ब्रह्म ७. ब्रह्म की विभूति ८. विभूति प्रजापति ९. इन्द्र १०. आदित्य ११. रुद्र १२. सोम १३. वमु १४. अश्विनी कुमार १५. मरुत २६. विश्वेदेव १७. तम १८. ज्योति शारीरस्थानम् पुरुषगत भाव मूर्ति कुंद अभिसन्ताप प्राण सुसिर अन्तरात्मा अन्तरात्मा की विभूति आत्म विभूति मन अहंकार आदान रोष प्रसाद सुख कान्ति उत्साह इन्द्रियाँ और इन्द्रवार्थ मोड ज्ञान अन्तरात्मा है, जैसे डोक ( जगत् ) मैं मझ की विभूति ( व ) दिखाई पड़ती है, उसी प्रकार पुरुष शरीर में अन्तरात्मा की विभूति ( ऐश्वर्य ) है जिस प्रकार जगत् में की विभूति प्रजापति है, उसी प्रकार अन्तरात्मा की विभूति शरीर में मन है । लोक में, जैसे इन्द्र है, उसी प्रकार पुरुष में अहंकार है । जैसे जगत् में रन आदि का आदान कर्मा आदित्य ( सूर्य ) है वैसे में आदान कर्म ( ग्रहण ) है, जो लोक में रुद्र है, वह पुरुष में रोष है, जो जगत् में सोम पुरुष ( चन्द्रमा ) है वह पुरुष में प्रसन्नता है । जो जगत् में वसु है, वह पुरुष में सुख है । जो अश्विनी कुमार है वह पुरुष में कान्ति ( शोभा ) है । जो जगत् में मरुन ( वायु ) है वह पुरुष में उत्साह हैं । जो जगत् में विश्वेदेवता है वे पुरुष में सभी इन्द्रियाँ ( दश ) और सभी इन्द्रियार्थ ( शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध ) हैं । जो जगत् में तमोगुण है वह पुरुष में मोह है । जो जगत् में ज्योति है वह पुरुष में ज्ञान है । जिस प्रकार जगत में संसार को सृष्टि है उसी प्रकार पुरुष का गर्भाधान करना है । जिस प्रकार जगत में कृतयुग है उसी प्रकार पुरुष में वाल्यावस्था है । जिस प्रकार जगत में त्रेतायुग है, उसी प्रकार पुरुष में युवा अवस्था है । जिस प्रकार जगत् में द्वापर है उसी प्रकार पुरुष में बुढ़ाया है जिस प्रकार जगत् में कलियुग है उसी प्रकार पुरुष में रोगी होना है । जिस प्रकार जगत् में युगान्त ( प्रलय ) है उसी प्रकार पुरुष में मरण हैं । हे अग्निवेश! इसी प्रकार लोक और पुरुष के अन्य अवयत्रों के भेदो में सादृश्य जो यहाँ नहीं बताये गये हैं, उनकी भी समानता का अनुमान के द्वारा ज्ञान कर लेना चाहिये ॥ ५ ॥
विमर्श -- यहाँ सोदाहरण लोक और पुरुष का सामान्य दिखाकर ' पिण्ड ब्रह्म न्याय, को समझाया गया है । मूल गद्यगत भावों में वर्णित लोकपुरुष साम्य प्रकरण का संग्रह निम्नलिखित रूप में किया जा रहा है ।
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लोकगत भाव १ ९. सृष्टि २०. कृतयुग २१. त्रेता २२. द्वापर २३. कलियुग २४. युगान्त चरकसंहिता पुरुषगत भाव गर्भाधान बाल्यावस्था युवावस्था बुढ़ापा रोगी होना भरण * एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच - एवमेतत् सर्वमनपवादं यथोक्तं भगवता
लोकपुरुषयोः सामान्यम् । किन्न्वस्य सामान्योपदेशस्य प्रयोजनमिति ॥ ६ ॥
लोक और पुरुष में समानता के प्रयोजन विषयक प्रश्न - इस प्रकार कहने वाले भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने कहा, भगवान् ने इस प्रकार लोक और पुरुष में जो समानता कही है वह अनपवाद ( यथार्थ ) है, किन्तु इस समानता के उपदेश का आयुर्वेद में प्रयोजन क्या है || ६ || 8 भगवानुवाच --शृण्वग्निवेश! सर्वलोकमात्मन्यात्मानं च सर्वलोके सममनुपश्यतः संत्या बुद्धिः समुत्पद्यते । सर्वलोकं ह्यात्मनि पश्यतो भवत्यात्मैव सुखदुःखयोः कर्ता नान्य इति । कर्मात्मिकत्वाच्च हेत्वादिभिर्युक्तः सर्वलोकोऽहमिति विदित्वा ज्ञानं पूर्वमु-त्याप्यतेऽपवर्गायेति । तत्र संयोगापेक्षी लोकशब्दः । षड्धातुसमुदायो हि सामान्यतः सर्वलोकः ॥ ७ ॥
भगवान् आत्रेय का उत्तर -- भगवान् आत्रेय ने कहा । हे अग्निवेश! सभी लोकों को अपने में और अपने को सत्र लोकों में समुचित रूप में देखने से सत्याबुद्धि किस प्रकार उत्पन्न होती है ( यह बात सुनो ) अपने में ही सभी जगत् को देखने से पुरुष को यह ज्ञान हो जाता है कि सुख और दुःख का कर्ता मै स्वयं हूं, दूसरा कोई सुख और दुःख का दाता नहीं हैं, क्योंकि सभां जगत कर्म के अधीन होता है । कारण आदि से युक्त सभी संसार स्वरूप मैं ही हूँ यह जान कर मोक्ष प्राप्ति के लिए सर्व प्रथम ज्ञान ( जिलामा ) उत्पन्न होता हैं । लोक शब्द संयोग की अपेक्षा करता है, सामान्यतः सम्पूर्ण लोक शब्द पड्धातृसमुदाय ( पञ्चमहाभूत और आत्मा या ब्रह्म ) स्वरूप ही है | तस्य हेतुः, उत्पत्तिः, वृद्धिः, उपप्लवः, वियोगच । तत्र हेतुरुत्पत्तिकारणं, उत्पत्तिर्जन्म, वृद्धिराप्यायनम, उपप्लवो दुःखागमः, पड़धातुविभागो वियोगः स जीवापगमः स प्राणनिरोधः स भङ्गः स लोकस्वभावः । तस्य मूलं सर्वोपप्लवानां च प्रवृत्तिः, निवृत्ति-रूपरमः । प्रवृत्तिर्दुःखं, निवृत्तिः सुखमिति यज्ज्ञानमुत्पद्यते तत् सत्यम् । तस्य हेतुः
सर्वलोकसामान्यज्ञानम् । एतत्प्रयोजनं सामान्योपदेशस्येति ॥ ८ ॥
( २ ) मोक्ष प्रकरण और भी - उस पधातु संयुक्त पुरुष या लोक का हेतु, उत्पत्ति, वृद्धि, उपप्लव, वियोग होता है । इनमें – १. हेतु -- उत्पत्ति के कारण को हेतु कहा जाता है । २. उत्पत्ति - जन्म होने को उत्पत्ति कहते है । ३. वृद्धि - बढ़ने को वृद्धि कहते है । ४. उपप्लव - दुःख की प्राप्ति होने को उपप्लव कहते हैं । ५. वियोग - पधातु का विभाग ( विभागो भागशः ग्रहः ) अर्थात् पयातुओं का संयुक्त न होकर पृथक् पृथक् प्रतीत होना वियोग कहा जाता है । उसे जीवापनम ( जीव ---प्राण -- का निकल जाना ) कहते हैं । उसे ही प्राणनिरोध, भङ्ग और लोकस्वभाव कहते हैं । उस षड्धातु संयुक्त लोक या पुरुष का मूल सम्पूर्ण दुःखों की प्रवृत्ति होना है । निवृत्ति होने को १. ' तस्यात्मबुद्धि: ' इति पा ० ।
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पुरुषविधयशारीराध्याय: ५ ] शारीरस्थानम् SSE उपरम ( विश्रान, मोक्ष ) कहा जाता है । प्रवृत्ति मार्ग में दुःख और निवृत्ति मार्ग में सुख है, यह जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह सत्य है । उस सत्य ज्ञान का कारण है सम्पूर्ण लोक में सामान्य रूप का ज्ञान होना । वहीं उस सामान्य ज्ञान के उपदेश का प्रयोजन है ॥ ८ ॥
S अथाग्निवेश उवाच - किंमूला भगवन्! प्रवृत्तिः, निवृत्तौ च क उपाय इति ॥ ९ ॥
प्रवृत्ति किंमूलक - इसके बाद अग्निवेश ने कहा कि हे भगवन्, प्रवृत्ति किंमूलक होती है, अर्थात् प्रवृत्ति - मार्ग में प्रविष्ट होने का कारण क्या है, और निवृत्ति मार्ग में प्रविष्ट होने के उपाय क्या हैं || ९ || ॐ भगवानुवाच — मोहेच्छाद्वेषकर्ममूला प्रवृत्तिः । तजा ह्यहङ्कारसङ्गसंशयाभिसंप्लवा-भ्यवपातविप्रत्ययाविशेषानुपायास्तरुणमिव द्रुममतिविपुलशाखास्तरवोऽभिभूय पुरुष-तस्यैव तिष्ठन्ते यैरभिभूतो न सत्तामतिवर्तते । तत्रैवंजातिरूपवित्तवृत्तबुद्धिशील-विद्याभिजनवयोवीर्यप्रभावसंपन्नोऽहमित्यहङ्कारः, यन्मनोवाक्काय कर्म नापवर्गाय स सङ्गः, कर्मफलमोक्ष पुरुषप्रेत्यभावादयः सन्ति वा नेति संशयः, सर्वावस्थास्वनन्योऽहमहं स्रष्टा स्वभावसंसिद्धोऽहमहं शरीरेन्द्रियबुद्धिस्मृतिविशेषराशिरिति ग्रहणमभिसंप्लवः, मम मातृपितृभ्रातृदारापत्यबन्धुभित्रभृत्यगणो गणस्य चाहमित्यभ्यवपातः, कार्याकार्य-हिताहितशुभाशुभेषु विपरीताभिनिवेशो विप्रत्ययः, ज्ञाज्ञयोः प्रकृतिविकारयोः प्रवृत्तिनिवृत्योश्च सामान्यदर्शनमविशेषः, प्रोक्षणानशनाग्निहोत्रत्रिषवणाभ्युक्षणावाहन-याजनयजनयाचनसलिलहुताशनप्रवेशादयः समारम्भाः प्रोच्यन्ते ह्यनुपायाः । एवम-यमधीधृतिस्मृतिरहङ्काराभिनिविष्टः सक्तः ससंशयोऽभिसंप्लुतबुद्धिरभ्यवपतितोऽन्यथा-दृष्टिविशेषग्राही विमार्गगतिर्निवासवृक्षः सत्त्वशरीरदोषमूलानां सर्वदुःखानां भवति । एवमहङ्कारादिभिर्दोषैर्भ्राम्यमाणो नातिवर्तते प्रवृत्ति, सा च मूलमधस्य ॥ १० ॥
और भी - भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने कहा- प्रवृत्ति का कारण मोह, इच्छा और द्वेष जन्य कर्म होते है । उस प्रवृत्ति से - १. अहंकार, २. संग, ३ संशय, ४ अभिसंप्लव, ५. अभ्यवपात, ६. विप्रत्यय ७. अविशेष, ८ अनुपाय उत्पन्न होते हैं और ये पुरुष को उस प्रकार व्याप्त कर बढ़ते हैं, जिस प्रकार छोटे वृक्ष को बड़े शाखा वाले वृक्ष दबा कर ऊपर बढ़ते है और दबे हुए छोट वृक्ष की सत्ता ही समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार इन अहंकार आदि से पराभूत पुरुष प्रवृत्ति या प्रवृत्तिमूलक सत्ता का अतिक्रमण नहीं कर पाना । ( १ ) अहकार, मेरी जाति उत्तम है, मैं मुन्दर रूप वाला हू, मैं धनी हूँ, मेरा आचरण बहुत श्रेष्ठ है, मैं बुद्धिमान् हू, मेरा स्वभाव अच्छा है, मेरी विद्या उत्तम हैं, मेरा कुल उत्तन है, मैं जवान हूं अतः बलवान् हू. मै शक्तिशाली हू, मेरा प्रभाव अच्छा है, मैं सर्वगुण सम्पन्न हू, इस प्रकार का ज्ञान करना अहकार कहा जाना है । ( २ ) सङ्ग -- मनुष्य का मन, वचन और शरीरजन्य जो कर्म भोक्ष का साधक नहीं है, उस को संग कहा जाता है । ( ३ ) संशय - कर्म का फल, मोक्ष और मरने के बाद पुरुष का पुनर्जन्म होता है या नहीं ऐसे ज्ञान को संशय कहते हैं । ( ४ ) अभिसम्प्लव - सभी अवस्थाओं में ने एक स्वरूप हू । मैं सृष्टि करने वाला हू । मै स्वभावसिद्ध हूँ, में शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि और स्मृति का एक विशेष समुदाय स्वरूप हूँ । इस प्रकार का ( परस्पर विरुद्ध ) ज्ञान करना अभिसम्प्लव कहा जाता है । ( ५ ) अभ्यवपात - मेरे माता, पिता, भाई, स्त्री, बच्चे ( पुत्र आदि ), बन्धु ( संग सम्बन्धी ), मित्र, नौकर है, और मै इन माता आदि गण का हू, इस प्रकार मिथ्या ज्ञान को अभ्यवपात कहा जाता है । ( ६ ) विप्रत्यय - क्या काय है, क्या अकार्य है, कौन वस्तु हितकारी और कौन अहितकारी है, कौन कार्य शुभ
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८६० चरकसंहिता ( अच्छा ) है और कौन कार्य अशुभ ( बुग ) है, इन विषयों में विपरीत ज्ञान रखने को विप्रत्यव कहते है । ( ७ ) अविशेष - ज्ञ ( ज्ञानी ) और अज्ञ ( अज्ञानी ) में, प्रकृति और विकार में, प्रवृत्ति और निवृत्ति में समानता देखना अविशेष कहा जाता है । ( ८ ) अनुपाय - प्रोक्षण ( यज्ञ में मन्त्र द्वारा जल छिड़कने रूपक्रिया या मार्जन ), अनशन ( उपवास ), अग्निहोत्र ( प्रातः - सायं हवन करना ), त्रिषवण ( त्रैकालिक स्नान करना ), अभ्युक्षण ( अभिमन्त्रित जल से सेचन क्रिया ). आवाहन ( देवता आदि का मन्त्रों के द्वारा आवाहन अर्थात् बुलाना ), यजन ( यज्ञ करना ), याजन ( यज्ञ कराना ), याचन ( प्रार्थना ), जल और अग्नि में प्रवेश ' करना आदि जो समारम्भ ( कर्म ) हैं, उन्हें अनुपाय कहते हैं । इस प्रकार यह बुद्धि, धैर्य, स्मरणशक्ति से शून्य होकर अहंकार में लिप्त, संग और संशय से युक्त, अभिसंप्लुत ( मिथ्या अमिथ्या ज्ञान से युक्त ), ममता युक्त, विपरीत बुद्धि से युक्त, ज्ञानी और अज्ञानी में भिन्नता न समझने वाला, और विमार्ग में ( उलटे मार्ग में ) गमन करने वाला पुरुष सत्त्व ( मन ) और शरीर के दोषों ( क्रमशः रज और तम, वात, पित्त, कफ ) के कारणों का निवास वृक्ष बन कर् सभी दुःखों का मूल कारण बनता है । इस प्रकार अहंकार आदि दोषों से युक्त होकर संसार में जन्म - मरण के चक्कर में पड़ कर प्रवृत्ति - मार्ग का अतिक्रमण नहीं कर पाता, अतः बार - बार जन्म और मृत्यु स्वरूप बन्धन से युक्त होकर संसार में विचरा करता है । इस प्रकार प्रवृत्ति सभी पापों ( दु: खों ) का मूल होती है ॥ १० ॥
* निवृत्तिरपवर्गः; तत् परं प्रशान्तं तत्तदक्षरं तद्ब्रह्म स मोक्षः ॥ ११ ॥
निवृत्ति का लक्षण - निवृत्ति - मार्ग को अपवर्ग कहते हैं, वह अपवर्ग सर्वश्रेष्ठ और अत्यन्त शान्त, अविनाशी एवं ब्रह्म स्वरूप है, उसे मोक्ष कहते है ॥ ११ ॥
तत्र मुमुक्षूणामुदयनानि व्याख्यास्यामः! तत्र लोकदोषदर्शिनो मुमुक्षोरादित एवा-चार्याभिगमनं, तस्योपदेशानुष्ठानम्, अग्नेरेवोपचर्या, धर्मशास्त्रानुगमनं, तदर्थावबोधः, तेनावष्टम्भः, तत्र यथोक्ताः क्रियाः, सतामुपासनम, असतां परिवर्जनम्, असङ्गतिर्दुर्ज-सत्यं सर्वभूतहितमपरुपमनतिकाले परीक्ष्य वचनं, सर्वप्राणिषु चात्मनीवावेक्षा, सर्वासामस्मरणमसङ्कल्पनमप्रार्थनमनभिभाषणं च स्त्रीणां सर्वपरिग्रहत्यागः, कौपीनं प्रच्छादनार्थं, धातुरागनिवसनं, कन्थासीवनहेतोः सूचीपिप्पलकं, शौचाधानहेतोर्जलकु-कुण्डिका, दण्डधारणं, भैक्षचर्यार्थं पात्रं, प्राणधारणार्थमेककालमग्राम्यो यथोपपन्नोऽभ्य-वहारः, श्रमापनयनार्थं शीर्णशुष्क पर्णतृणास्तरणोपधानं, ध्यानहेतोः कायनिबन्धनं, वने-ध्वनिकेतवासः, तन्द्रानिद्रालस्यादिकमवर्जनं, इन्द्रियार्थज्वनुरागोपतापनिग्रहः, सुप्तस्थि-तगत प्रेक्षिताहारविहारप्रत्यङ्गचेष्टादिकेष्वारम्भेषु स्मृतिपूर्विका प्रवृत्तिः, सत्कारस्तुति गर्हाव-मानक्षमत्वं, चुत्पिपासायासश्रमशीतोष्णवातवर्षा सुखदुःखसंस्पर्शसहत्वं, शोकदन्यमानो-द्वेगमदलोभरागेर्ष्याभयक्रोधादिभिरसंचलनम्, अहङ्कारादिषूपसर्गसंज्ञा, लोकपुरुषयोः सर्गादिसामान्यवेक्षणं, कार्यकालात्ययभयं, योगारम्भे सततमनिर्वेदः, सत्त्वोत्साहः, अप-वर्गाय धीटतिस्मृतिबलाधानं; नियमनमिन्द्रियाणां चेतसि चेतस आत्मनि, आत्मनश्च; धातुभेदेन शरीरावयवसंख्यानमभीच्णं, सर्व कारणवद्दुःखम स्वमनित्यमित्यभ्युपगमः, सर्व-प्रवृत्तिप्वघसंज्ञा, सर्वसंन्यासे सुखमित्यभिनिवेशः; एपमार्गोऽपवर्गाय, अतोऽन्यथा बध्यते; इत्युदयनानि व्याख्यातानि ॥ १२ ॥
१. ' दुःखसंज्ञा ' इति पा ० ।
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पुरुष विचयशारीराध्याय: ५ ] शारीरस्थानम् ८६१ मोक्ष का उपाय - निवृत्ति मार्ग में मुमुक्षु पुरुषों के लिए मोक्ष प्राप्ति के उपायों की व्याख्या की जाती है । यह ससार दुःखमय है, ऐसे लोक में रहने को दोष स्वरूप देखने वाला और मोक्ष की इच्छा रखने वाला पुरुष, सर्वप्रथम आचार्य ( गुरु ) के पास जाय और जिस प्रकार गुरु उपदेश करें, उसे उसी रूप में पालन करे, अग्नि की सेवा करे अर्थात् सायं प्रातः अग्निहोत्र करे । धर्मशास्त्र में बताए हुए कर्म एवं मार्गों का अनुगमन करें । धर्मशास्त्र के अर्थों का ज्ञान करे, धर्मशास्त्र के अर्थों को गुरु के मुख से श्रवण कर उसके अनुसार अपने चित्त को स्थिर करे, धर्म-शास्त्र के अर्थों को जान कर उनमें बनाई गई क्रियाओं का पालन करे, सत्पुरुषों की सेवा करे और उनके पास बैठे, असज्जन पुरुषों को छोड़ दे, दुर्जन पुरुषों का साथ न करे, प्राणिमात्र के लिए हितकर, कोमल, यथासमय परीक्षा कर ( विचार कर ) सत्य बोले, प्राणिमात्र को अपने समान देखे, सभी स्त्रियों का स्मरण, संकल्प ( विचार ), प्रार्थना ( इच्छा ) और उनके साथ वार्तालाप का त्याग करे, सभी परिग्रह ( बन्धन लाने वाली वस्तुओं ) का त्याग, शरीर ढकने मात्र के लिए कौपीन ( लंगोटी ) धारण करना, गेरू से रंगे वस्त्रों का धारण करना, कन्या ( कथरी ) सीने के लिए सुई और पिप्पलक ( सुई धारण करने के लिए पात्र विशेष ) रखना, शौच ( शरीरशुद्धि ) के लिए जलकुण्डिका ( कमण्डलु ) और आधान ( चलते समय यदि लड़खड़ा कर गिरने लगे तो उससे बचाव ) के लिए दण्ड धारण करना, भिक्षा माँगने के लिए पात्र धारण करना, प्राण की रक्षा हो सके अतः एक समय अग्राम्य ( कन्द, मूल, फल आदि जो मिल सके ) उसका भोजन करना, थकावट दूर करने के लिए गिरे हुए सूखे पत्त और तृण के बिछौने एवं तकिया का सहारा लेना, ध्यान के लिए योगासन लगाना, जङ्गलों में बिना घर के निवास करना, तन्द्रा, निद्रा और आलस्य उत्पादक कर्मों का त्याग करना, सभी इन्द्रियों के प्रिय विषयों में अनुराग ( सुख ) और अप्रिय विषयों में उपताप ( दुःख ) इन दोनों का निग्रह करना अर्थात् सुख एवं दुःख उत्पादक विषयों में समान रूप से उदासीन रहना, सोने, बैठने, चलने, देखने, भोजन करने और प्रत्यङ्ग की चेष्टा के प्रारम्भ में हित - अहित का स्मरण कर प्रवृत्त होना, सत्कार, प्रशंसा, निन्दा और अपमान को सहना अर्थात् इन क्रियाओं से न प्रसन्न होना न दुःखी होना किन्तु समान भाव में रहना, भूख - प्यास, परिश्रम, थकावट, शीत, उष्ण, हवा ( आंधी ), वर्षा और मुखकर एवं दुःखकर स्पर्श को सहना, शोक, दीनता, मान, उद्वेग, मद, लोभ, राग ( प्रेम ), ईर्ष्या, भय, क्रोध आदि से विचलित न होना, अहङ्कार, सङ्ग, संशय आदि को उपद्रव समझना ( इनमें प्रवृत्त न होना ), संसार और पुरुष के सृष्टि आदि कयौं में समान बुद्धि रखना, कार्य के उचित समय के बीतने में भयभीत होना, योगाभ्यास के आरम्भ करते समय सदा शारीरिक एवं मानसिक चिन्ताओं से रहित होना, मन में उत्साह रखना, मोक्ष प्राप्ति के लिए बुद्धि, धैर्य और स्मरण शक्ति के बल को अपने शरीर में संचित करना, चित्त ( मन ) में इन्द्रियों का तथा आत्मा में मन का नियमन ( नियन्त्रण ) करना, धातुभेद से ( जैसे पड्धातुज, एक-धानुज ) आत्मा के शारीरावयवों का ज्ञान रखना, सभी कारण से उत्पन्न होनेवाले उत्पत्तिधर्मा पदार्थ दुःखदायी, तत्त्वहीन एवं अनित्य है यह बार - बार स्वीकार करना ( मानना ), सभी प्रकार के प्रवृत्ति - मार्ग का नाम दुःख है तथा सर्वसंन्यास ( सभी पदार्थों के त्याग ) में ही यथार्थ सुख है, ऐसे उपर्युक्त विभिन्न तथ्यों का ज्ञान रखना, यही मोक्ष का मार्ग है, इन बनाए हुए नियमों के • विपरीत चलने पर मनुष्य वन्धन को प्राप्त होता है अर्थात् जन्म - मृत्यु लगी रहती हैं । इस प्रकार ये मुक्ति के उपायों की व्याख्या कर दी गई ॥ १२ ॥
भवन्ति चात्र -* एतैरविमलं सत्त्वं शुद्ध्युपायैर्विशुध्यति । मृज्यमान इवादर्शस्तैलचेलकचादिभिः ॥ १३ ॥