चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 1–10
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 1–10
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GLH 615.536 CHA V 1 लाल बहादुर अकादमी L.B.S. Nati istration 125794 -BSNAA MUSSOORIE पुस्तकालय LIBRARY अवाप्ति मुख्या Accession No.. 14071 वर्ग संख्या Class No. 615-536 पुस्तक संख्या Book No.. चरक भ
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**: * महर्षि अभिवेश प्रणीत चरक संहिता चरक और दडवल से प्रतिसंस्कृत ( हिन्दी अनुवाद ) सूत्र-निदान-विज्ञानात्मक प्रथम खण्ड अनुवादक- कविराज श्री अत्रिदेवजी गुप्त, विद्यालंकार, भिपन ( गुरुकुल विश्वविद्यालय ) AAAA प्रकाशक-- भार्गव पुस्तकालय, गायघाट, वनारस । FRAN ब्राञ्च-कचौड़ीगली, बनारस । द्वितीय संस्करण ] सर्वाधिकार स्वरक्षित [ मूल्य २२) AAAA
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दो शब्द श्रीचरकसंहिता आयुर्वेद में एक सर्वमान्य पुस्तक है । इसका पठन पाठन आयुर्वेद के विद्यार्थि के लिये अति आवश्यक है । वास्तव में चरकसंहिता का तथा दूसरे ग्रन्थों का स्पष्टीकरण जितना पढ़ाने में होता है, उतना पढ़ने के समय नहीं होता । यही कारण है कि आयु-वेद सम्प्रदाय के मुख्य आचार्य श्री गंगाधर जी कविराज, श्री योगीन्द्र-नाथ सेन जी श्रीचरकसंहिता पर जल्पकल्पतरु और चरकोपस्कार टीकायें लिखकर आयुर्वेद के प्रेमियों का बहुत उपकार किया । इनमें चरकोपस्कारभाष्य तो विद्यार्थियों के लिये बहुत ही उत्तम और लाभ दायक है । पढ़ते समय विद्यार्थी की मनोवृत्ति बहुत ही विचित्र रहती है; खास कर आजकल के आयुर्वेद कोलेज की जीवन में; जब कि उसको पाश्चात्य विद्या भी सत्तर प्रतिशत सीखनी होती है । ऐसी अवस्था में तो वह उत्तीर्ण होकर उपाधि ही प्राप्त करने का इच्छुक रहता है । इसमें कोई दो चार अपवाद भी होते हैं । यह वृत्ति हमारे यहां ही हो यह बात नहीं; पाश्चात्य देशों में भी इसका - मनुष्य धर्म के स्वभाव के अनुसार परिचय मिलता है । इसके लिये संक्षिम प्रकाशन, या सारांश रूप में पुस्तकें छोटी -छोटी प्रकाशित की जाती हैं । यह पुस्तकें सस्ती, छोटी तथा आवश्यक सब विषयों से पूर्ण रहती हैं । इनमें विद्यार्थी को जहाँ आर्थिक भार से बचत होती है वहां श्रेणी में सुना सब विषय समझने में सरलता रहती है । इसी कारण से या अन्य कारणों से बंगला में, मराठी में या तेलगु में जो भी अनुवाद चरकसंहिता या दूसरे आयुर्वेद ग्रन्थोंके हुए हैं, वे सन्ते, तथा मूल के साथ साथ अनुवाद रूप में ही हैं । उनको स्पष्ट करने के लिये किसी भी अवोचीन रूप की सहायता नहीं ली गई और इन ग्रन्थों के पढ़ने से सफल बैद्य बने हैं, ऐसा हमारे देखने में भी है । मेरी अपनी मान्यता यह है कि आयुर्वेद के विचारों को आयुर्वेद के ही दृष्टि कोण से देखा या समझाजा सकता है; और इन्हीं के दृष्टिकोण से देखने और समझने की कोशिश करनी चाहिये । इस अर्वाचीन चिकित्साशास्त्र से हमारे शास्त्र का समन्वय सिद्धान्तों में हो ही नहीं सकता । दोनों पद्धतियां भिन्न हैं, और भिन्न रहेंगी यह कोई आवश्यक नहीं कि दोनों को एक किया जाय । होम्योपैथ अपनी पद्धति का ऐलोपैथी के साथ गोट जोड़ा नहीं करता । 'आयुर्वेद'
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( २ ) शब्द और 'एलीपैथी ' ये दोनों शब्द ही भिन्न हैं, और इनके अर्थों तो जमीन और आसमान का अन्तर है । इतनाही नहीं अपितु छत्तीस का सम्बन्ध है । फिर दोनों कैसे एक हो सकते हैं । इसलिये इस प्रकार को मिलाकर पुस्तकें लिखना-प्राचीन ग्रन्थों के प्रति न्याय में नहीं समझता । साथ ही आधुनिक विज्ञान प्रति दिन उन्नति पर है, आज से पचीस साल के पहले के सिद्धान्त -आज बहुत कुछ बदल गये; आज के सिद्धान्त -कल नहीं बदलेंगे यह कोई नहीं कह सकता । ऐसी अवस्था में इन पुस्तकों में केवल अग्रेजी पुस्तकों का उलथा देना युक्तिसंगत मैं नहीं समझता! इन सब बातों का विचार करके मैंने आयुर्वेद के दृष्टिकोण का विचार करते हुए विद्यार्थियों की दृष्टि से, उनकी रुचि के अनुसार यह अनुवाद किया है । यह अनुवाद आज से बीस साल पहले का हैं, इस संस्करण में भी इसकी पुनरावृत्ति नहीं कर सकता केवल कुछ थोड़े से स्थानों को छोड़कर । क्योंकि संस्करण बहुत दिनों से समाप्त था विद्यार्थियों की मांग थी । इसलिये इसकी प्रकाशित करना जल्दी थी । प्रथम प्रकाशक-श्री आर्यसाहित्य मण्डल लिमिटेड अजमेर वालों को कई बार इसके लिये कहा परन्तु लड़ाई के कारण तथा अन्य असुविधा के कारण वे इसका प्रकाशन नहीं कर सके । कानून के अनुसार पब्लिशर बनने का या पब्लिश करने का सबको अधिकार नहीं । इसके सिवाय कागज कीअसुविधा । इसलिये मुझे किसी ऐसे पब्लिशर की इच्छा थीजो इस समय इन सुविधाओं में भी इसका प्रकाशन शीघ्र कर दे । श्रीकैलाशनाथजी भाव अमर मालिक भार्गव पुस्तकालय काशी वाले से पत्र व्यवहारहुआ और अब तो उन्होंने इसकोछापना भी स्वीकार किया जिसका फल यह है कि इस समय में कागज कम्पोजिटर आदि की कठिनाई होते हुए भी यह छप सका । इसके लिये वे धन्यवाद के पात्र हैं । अग्रिम संस्करण में सम्भव हुआ तो इसकी पुनरावृत्ति हो सकेगी । आशा है कि जिस प्रकार वैद्य समाज ने विद्यार्थियों ने इसकी पहला संस्करण अपनाया था उसी प्रकार इसका यह भी दूसरा संस्करण अपनायेंगे । इतिशम् गुरुकुल कांगड़ी अत्रिदेवगुप्त १-७-४८
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चरक संहिता विषय -सूची सूत्रस्थानम् प्रथमोऽध्यायः ( पृ० १-२२ ) स्मों की उत्पत्ति रसों द्वारा दोषों को नाम्नि द्रव्य के भेद जंगम दृष्य मौन दीर्घञ्जीवितीय: भरद्वाज का इन्द्र के पास गमन रोगों का । श्रभि द्रव्य के चार भेद उनके अंग । मूलिनी वनस्पतियां उनकी प्रादुर्भावशान्ति के उपायऋषियोंपर कोविचार । इन्द्ररोगके गणना इनके कर्म । फलिनी वनस्पतियां पास जाने के लिये भरद्वाज का निश्चय इनके कर्म चार प्रकार के स्नेह इनके नरद्वाज का इन्द्र से त्रिस्कन्ध आयुर्वेद कर्म आठ प्रकार के सूत्र मन्त्रों के नागम्य गुग आठ प्रकार के दूधका ऋण से का उनके सामान्य गुण | दूर के कर्म आयुर्वेद अध्ययन | आत्रेय का दूधवाले वृक्ष उनके गुण उपनंदार शिष्यों को उपदेश प्रथम तन्त्र- प्रगेता अग्निवेश | भेडआदि अन्य औषधि ज्ञान का प्रयोजन न जानी हुई नकार । अनुर्वेद का लक्षण अनुपयोंसे हानियों वैद्य के कर्तव्य। का लक्षण आयुके पारा अध्याय संग्रह । सामान्य और विशेष | आयुर्वेद के द्वितीयोऽध्याय: ( २६-३७ ) अपामार्गतण्डुलीय: -तिरोवि - प्रकाश करने का प्रयोजन दृष्य । गुणदाव । इन्द्रियोंव्य काके अर्थलक्षणकर्मगुणोंसमका विरेचनचनोपयोगीहृष्य । व्ययमनकारकआम्थापन औरद्रव्यअनु। लक्षण । कर्म का लक्षण । नानाम्य केन्य मात्रा और काल के आदि छः कारण उनके कार्य धातुओं के विचार को आवश्यकता | रोगियों के विषम होने का कारण । सुखदुःखोंका लिये विशेष आहार द्रव्य, यवागूऔर आश्रय आत्मा का स्वरूप । रोगप्रकृति विलेपीपाक । उपसंहार । रोगों का प्रतीकार और उनके भेद । तृतीयोऽध्यायः ( पृ० ३७-४५ ) वायु का लक्षण पित्त का लक्षण कफ आरग्वधीयः --त्वक्- रोगपर ३२ का लक्षण | साध्य रोगों की शान्ति योगों का वर्णन
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( २ ) चतुर्थोऽध्यायः ( पृ० ४५-६२ ) पण आदि धारण करने से लाभ । षड्विरेचनशताश्रितीयः-बिरे- दीर्घायु के लिये आवश्यक शुचिकर्म: चन का शब्दार्थ संशमन चिकित्सा । जूता पहिनने के गुण । दण्ड धारण के विरेचन के छः सौ योग विरेचन ओष गुण संक्षेप से स्वस्थवृत्त । उपसंहार । धियों के ६ आश्रय कषाय की पांच षष्ठोऽध्यायः ( पृ० ८५-६४ ) योनियां । कषाय कल्पना की ५ विधि । तस्याशितीयः --भोजन पर कषायों के लक्षण । महाकपाय । ५०० आश्रित आदान और विसर्ग काल का कषायों की कल्पना । उत्तम वैद्य । वर्णन । दो अयन । हेमन्तकाल की पञ्चमोऽध्यायः ( ५०४-८५)! परिचय । हेमन्त ऋतु में त्याज्य । वसन्त मात्राशितीयः - आहार की मात्रा की ऋतुचयां । श्रीप्नचयां वर्षाकाल आहार के चार प्रकार । मात्रा में खाने की अनु शरदऋतु की परिचय |का फल | स्वस्थवृत्त । धूत्र प्रयोग की हंसद का लक्षण | कलात्म्य | विधि । स्नैहिक धूम वैरेचनिक धूम । उपसंहार: धूम्रपान के गुण । धूम्रपान के आठ काल । सतमोऽध्यायः ( पृ० ४ १०६ ) ठीक प्रकार से पान किये हुए धूम- न वेगान्धारणीय. मल मूत्र पान कालक्षण | अधिक धूम्रपानमंड त्य आदि के न रोकने का उपदेश उनके उपद्रव और उनकी चिकित्सा । धूम्रपान रोकने से हाजियां और चिकित्सा । मन के अयोग्य जन धूम पीने की विधि । के निन्दित कार्य । वाणी के निन्दित धूमपान के आसन । नलिका की बना- कर्म-शरीर के निन्दित् कर्म व्यायाम वट । अयोग्य रूप में पिये धूम के से लाभ अधिक व्यायाम से हानियाँ । लक्षण अतियोग के रूप में धूमपान हितकारी कार्यों के सवन का क्रम । के लक्षण । नस्य प्रयोग । अणु तेल की प्रकृति । तदनुसार हित सेवन का उप-विधि । दन्तधावन की विधि । दातुन देश-कारण से उत्पन्न होने वाले रोगों करने से लाभ | जीभ को साफ़ करने से बचने के उपाय आगन्तुज रोगों के की विधि । दातुन के लिये उत्तम वृक्ष प्रतिकार सेवन करने योग्य मनुष्य । स्नेहगण्डूष के गुण । शिर पर तेल उपसंहार । लगाने से लाभ | कान मे तेल डालने अट्टमोऽध्यायः ( १०७-११६ )से लाभ । शरीर पर तैल लगाने की इन्द्रियोपक्रमणीयः-इन्द्रियऔर विधि । पांव में तेल मर्दन के गुण । 1 उनके अर्थ और मन का वर्णन पांच उबटन लगाना । स्नान का फल स्वच्छ इन्द्रिय, उनके ग्राह्य पांच द्रव्य । उनके वस्त्र पहनने के गुण | गन्ध माला पांच ग्राह्य अर्थ अध्यात्म गुण । द्रव्या-आदि धारण करने के गुण रत्न, आभू- श्रित कर्म । इन्द्रिय और उनके साथ
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( ३ ) ग्राह्य विषयों के समयोग, अयोग, हीन की चार प्रकार की परीक्षा । आप्तों के योग मिथ्यायोग और अतियोग । उनके लक्षण । आप्तोपदेश- प्रत्यक्ष अनुमान- परिणाम | सद्वृत्त शिक्षा । भोजन युक्ति । इन के द्वारा पुनर्जन्म का निर्णय । विषयक सद्वृत्त । शौचसद्वृत्त । स्त्रियों आसागम वेद का निर्णय । प्रत्यक्ष अनु- के सहयोग में सद्वृत्त । गुरुजनों के प्रति मान युक्ति इन के द्वारा निर्णय f तीन सद्वृत्त । अध्ययन के सम्बन्ध में सद्- प्रकार के उपस्तम्भ । तीन प्रकार का बल. वृत्त । शिष्टाचार इति स्वस्थचतुष्कः । रोग के तीन आयतन -पांचों ज्ञानेन्द्रिय नवमोऽध्यायः ( पृ० ११९ -१२३ ) और मन के अतियोग, अयोग, मिथ्या- खुड्डाकचतुष्पादः – चिकित्सा योग साम्य असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग । के क्षुद्र चार चरण । चिकित्सा का मिश्रयायोग -प्रज्ञापराध । काल ---- काल लक्षण वैद्य के गुण । द्रव्य गुण । के अतियोग अयोग, मिथ्यायोग । काल परिचारक के गुण-रोगी के गुण । परिणाम 1 रोग के तीन प्रकार मानस चिकित्सा के मुख्य कारण बंध मूह रोगों की औषध । तीन रोगमार्ग-वैद्य उसके दोष उपसंहार । शाखा मर्मस्थ और कोष्ट । सात रोग-दशमोऽध्यायः ( पृ० १२३-१३० ) मार्ग मध्यम रोगमार्ग । आभ्यन्तर रोगमार्ग भिषक्वैद्य के तीन प्रकार । महाचतुष्पादः - चिकित्सा का छद्मचर वैद्य का लक्षण | सिद्ध साधित प्रयोजन । चिकित्सा करने और न करने पर विचार- मैत्रेय-आत्रेय संवाद | वैद्य –सद्-वैद्य के लक्षण | औषध के चिकित्सा की प्रत्यक्ष सफलता । रोगों तीन प्रकार - देवव्यपाश्रय, युक्तिव्य-के साध्यासाध्य पर विचार सुख पाश्रय और सव्वावजय | औषध के तीन साध्य कृच्छ्रसाध्य | साध्य व्याधियों प्रकार अन्तःपरिमार्जन -बहिः परिमार्जन, के तीन भेद । असाध्य आर याप्य रोग । ' शस्त्रप्रणिधान । संग्रह । सुखसाध्य व्याधि के लक्षण याप्य द्वादशोऽध्यायः ( पृ० १४८- १५५ ) व्याधि के लक्षण । असाध्य व्याधि के वातकलाकलीयः --वायु के अं लक्षण । वैद्य का कर्त्तव्य । उपसंहार । शांश विकल्पना पर विचार । सांकृत्या एकादशीऽव्ययः ( पृ० १३० १४८) यन कुश का मत । कुमारशिरा भारद्वाज त्रिषणीयः तीन एषणाओंका का मत कांकायन का मत धामागंद वर्णन । माणषणा, धनैषणा, परलोकै- बडिश का मत वायविद का मत । पण नास्तिकता पर विचार-परलोक मरीचि का मत । वार्योविदमरीचि संवाद । और आत्मा की सत्ता पर विचार मरीचि काप्य संवाद | पुनर्वसु आत्रेय नास्तिक मतों का खण्डन । सत् असत् का मत । उपसंहार ।
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( ४ ) त्रयोदशोऽध्यायः (पृ० १५५ - १७२) अग्निवेश आत्रेय संवाद । संशोधन के स्नेहाध्यायः -अग्निवेश का प्रश्न उपयोगी नाना प्रकार के उपकरणों का पुनर्वसु का प्रतिवचन । स्नेहों के दो संग्रह । स्नेहन, स्वेदन की विधि । प्रकार के उत्पत्तिस्थान -स्थावर और वमन के अयोग, सम्यक्रयोग और जंगम । सब तेलों में सर्वश्रेष्ठ तिल अतियोग के विशेष लक्षण । उत्तर तेल और स्नेहों में घृत स्नेहों के गुण उपचार- उपसंहार । स्नेहपान गुण-– उससे हानियाँ | स्नेह पोडशोऽध्यायः ( पृ० १६५०० ) की २४ प्रकार की विचारणाएं । स्नेह चिकित्साप्राभृतीयः - द्वैद्य कीतीन मात्रा प्रधान, मध्यम, हस्व । और असद देय के प्रयोगों में नंद । कोनसा स्नेह किसके लिये हितकारी । सम्यग् विरेचन के लक्षण विरेचने के स्नेह के अयोग्य व्यक्ति ।लिग्ध, अस्नि- अतियोग के लक्षण संोधन योग्य ग्ध, अति स्निग्ध के लक्षण स्नेहन व्यक्ति संबोधन कापल । अतियोग कालमें हिताहित: उपसंहार । होने पर क्या करना चाहिये । धातुओं चतुर्दशोऽध्यायः ( ०१७-१८ ) | वेदाध्यायः- वेदविधिस्ने उपहारकी समता| और विचार हन, स्वेदन के गुण-उपयोगिता- समय ( ८... २० । उसके परिणाम | स्वेदन की अवधि- यारी: -शिरोरोग, अतिवेदन के लक्षण और उपचार यदि दोषोंके संग स्पेन देने योग्य व्यक्ति 1 स्वयोग्य उत्पन्न द्वारा-और-पिका और व्यक्ति । स्वेदन हस्य | राही दोषीकी में अग्निवेश का प्रका प्रतिउपनाहविधि नाडीस्वेद | परिषेकस्वेद | संकरस्वेद| 1 वचन । निर उप होने वाले पांच जन्ताकस्वेद! अश्मघनस्त्रेदविधिकयूँ- प्रकार के शिरोरीन यातजन्य शिरी- स्वेद | कुटीरवेदविधि । स्वेदविधि | क्षण पिपजन्य कपजन्य और विशेषजन्य शिरोरोग केकुम्भीत्वंदविधि । कूपस्वेद । होलाक लक्षण,। पांच प्रकार के हृदय रोग दातजन्य स्वेद | अग्निरहित स्वेद के दो प्रकार, अग्निस्वेद, निरग्नि - इनके भेद पिचजन्य, करजन्य, और विशेषजन्य उपसंहार | हृदयशूल के लक्षण । कृमिजन्य हृद-पञ्चदशोऽव्ययः ( ० २=५-१९ ) यरोग के लक्षण । वात आदि दोषों के उपकल्पनीयः -चिकित्सा के पूर्व संसर्ग से उत्पन्न विकारों के ६२ नंद । उचित साधनों के संग्रह का प्रयोजन दोषों के उपद्रव अट्ठारह प्रकारके क्षय । आयुर्वेद के ज्ञान-अज्ञान की तुलना ' ओज का स्वरूप । क्षय के कारण ।