चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 11–20
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 11–20
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( ५ ) मधुमेह के कारण । सात पिडकाएं । उनके भेदों के नाम से निर्देश । आठ विधि, पिडका । विधि का निदान प्रकार के उदर रोग । सात प्रकार के नाव के लक्षण । साध्य असाध्य विधि कुष्ठ । छः प्रकार के अतीसार । के लक्षण | भेद के दोष से उत्पन्न पित्र पांच प्रकार के गुल्म चार प्रकार का काएं -शराविका, कच्छपिका, जालिनी । अपस्मार । तीन प्रकार का शोध सपी, अलजी, विनता आदि इनके प्रकार का उपर दो प्रकार के व्रण -दो उपद्रव दोषों की तीन प्रकार की गति । आयाम -दो प्रकार की गृध्रसी-दो तीन प्रकार की और गति, संचय, प्रकोप प्रकार का कामया दो प्रकारका आन और शमन -संचय के दो भेद प्राकृत दो प्रकार का वातरक्त -एक प्रकार का और बैकृत । उपसंहार । अहम्तम्भ एक प्रकार का संन्यास- अष्टादशोऽध्यायः ( ० २२१-२३१ ) एकप्रकार का महागद । श्री प्रकार की त्रिशोथीयः-:- तीन प्रकार का किन जातियाँ-बीस प्रकार के प्रमेह-शोध ( सूजन ) -उसके पुनः दो प्रकार बीस प्रकार के योनिरोग । उपसंहार | निज और आगन्तु । आगन्तु गोथ का विशोऽध्यायः ( पृ० २६७-२४६ ) निदान चिकित्सा | निज शोध के कारण महारोगाः-: -चार प्रकार के रोग, और सामान्य लक्षण । वातजन्य शो इनकी समानता, लिंग और आयतन के लक्षण | शोध के दो, तीन, चार, औरसात प्रकार वात, पिच, क नंद से असंख्य रोग- उनका भेदक कारण | दो प्रकार विकार-मान्यऔर आदि से उत्पन्न और नानात्मज अस्सी प्रकार के बाके कष्टसाध्य शोथ । शोध के विकार । चालीस विविकार उनकेउपाय | उपजिह्निा, गलशुविका गलगण्ड, गलग्रह, विसर्प, पिटकाऔर लक्षण बीस कफजन्य रोग । उनके लक्षण । उपसंहार ।,शंक के लक्षण गुल्म उदर, आनाह, का लक्षण । रोहिणी रोग । एकविंशोऽव्यय: ( ०२४६-२५५ मृदु, दारुण भेद से साध्यअसाध्य रोग जनिन्द्वितीयः--- आठ निन्दित पुरुष विशेष रूप से निम्ति दो,जिके लक्षण पीड़ा, वर्ण, समुग्धान, कारण, स्थान, संस्थान नाम भेद आदि स्थूल और अतिकृश स्थूल पुरुष के क्षेष, के कारण रोग के असंख्य भेद दोषों के कारण और लक्षण अतिकृश के दोष, प्राकृतऔर विकृतके लक्षण उपसंहार । कारण और लक्षण आदर्श पुरुष 1 स्थूल ऊनविंशोऽध्यायः (पृ० २३१-२३७ ) की कृश बनाने के लिये उपाय हश अष्टादयः-उदर रोग आदि रोग की चिकिल्ला । निद्रा के उचित सेवन ४८ प्रकार के रोगों की गणना और से लाभ । दिन में सोने के योग्य व्यक्ति,
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( ६ उनको दिन में सोने से लाभ । दिन में और लक्षण । चिकित्सा विशुद्ध रक्त सोने का उचित काल-ग्रीष्म ऋतु -अन्य का लक्षण । विशुद्ध रक्त वाले पुरुष का ऋतुओं में दिन में सोने से हानियाँ । लक्षण । मद के लक्षण । मूर्च्छा के रात्रिजागरण के दोष निद्रोत्पादक लक्षण | अपस्मार और संभ्यास के उपाय । अनुचित निद्रा को रोकने के लक्षण । इन के उपाय । उपसंहार । उपाय उपसंहार पञ्चविंशतितमोऽध्यायः पृ०२७५-२६१ द्वाविंशतितमोऽध्यायः ( १०२५६-२६१ ) यःपुरुषीयः - पुरुष और रोग की उत्पत्ति पर ऋषियों का संवाद । घनगृहणीयः का लक्षण लंबन, बृंहण, स्नेहन, स्तंभन के सम्त्र- पारीक्षि मौद्गल्य का मत पुरुष और में निवेश का प्रश्न आनंय रोगों का उपादान कारण 'आत्मा' हे 1 पुनर्वसु का प्रतिवचन | लंघन, बृंहण शरलोमा का मत पुरुष और रोगों का 'सत्व' है । वायविद का मत स्पंदन, स्तम्भन के लक्षण लंघन, उत्पादन मुँहग आदि कारक दृष्यों के कारण । प्राणियों और रोगों का उत्पत्ति मूल लंघन के योग्य व्यक्ति । वृंहण के योग्य 'रस' है । कुक्षिक हिरण्याक्ष का मत द्रव्य और व्यक्ति । विरूक्षण करने योग्य पुरुष और रोग ६ धातुओं से उत्पन्न व्यन्ति और द्रव्य । स्तम्भन द्रव्य और होते हैं । शौनक का मन रोगों और स्तंभन योग्य व्यक्ति सम्यक्लंघन पुरुष की उत्पत्ति माता पिता से हुई । और लंघन के अतियोग के लक्षण | भट्टकाव्य का मत कर्म से पुरुष और सम्यक गृहण और बृंहण के अतियोग के रोग उत्पन्न होते हैं । भरद्वा का मत लक्षण | रुक्षण के सम्यक्योग और कर्त्ता से स्वभावतः पुरुष और रोग अतियोग । स्तम्भन के सम्यकयोग उत्पन्न होतेहैं । कांकायन का मत मुख और अतियोग के लक्षण: वन आदि, छः क्रियाओं के अयोग, हीनयोग के हैंदुःख। आत्रेयचेतन भिक्षु काका मतकर्तापुरुषप्रजापतिऔर दुष्परिणाम |: रोगादि काल से उत्पन्न होते हैं पुनर्वसु त्रयोविंशतितमोऽध्यायः पृ० २६२-२६६ आत्रेय का सिद्धान्त पञ्च महाभूतों से सन्तर्पणीयः- सन्तर्पणजन्य रोग पुरुष और उनसे ही रोग उत्पन्न हुए । के कारण । रोगों के लक्षण -उनकी इस पर पुरुषों ओर रोगों की वृद्धि के चिकित्सा | अपतर्पण और तज्जन्य रोग- कारण के विषय में काशिपतिवामक उनका उपशमन । का प्रश्न । भगवान् आत्रेय का प्रति चतुर्विंशतितमोऽध्यायः पृ० २६७-२७५ वचन हिताहित सेवन । अग्निवेश विधिशोणितीय: - विशुद्ध रक्त । आत्रेय संवाद हित-अहित का लक्षण । का लाभ । रक्त दूषित होने के कारण आहार द्रव्य पर विचार । हित आहार ।
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( 9 ) अहित आहार । हित और अहित उप- से हानियां तिक रस के गुण उसके यांगी द्रव्य । श्रेष्ठ द्रव्य । श्रेष्ठ का अति सेवन से हानियां कषाय रस के लक्षण द्रव्यों के नौ उत्पत्ति स्थान । गुण और उसके अति सेवन से हानियां । उपसंहार! रमानुसारी द्रव्यों का वीर्य । रसों में विंशोऽध्यायः ( पृ० २६१-३२२ ) तर तमयोग । विपाक पदार्थों के आत्रेयभद्रकाप्यीयः -ऋषि वीर्य ८ प्रकार के । विपाक का लक्षण, संवाद रस के विषय में भट्टकाप्य का प्रभाव । छः रमों के लक्षण विरोधी आहारों के लक्षण उनके गुण दोष मन एक है ब्राह्मण शाकुन्तेय का हितकारीअन्न | कालविरुद्ध. देशविरुद्ध मत रस दो हैं पूर्णाक्ष मौद्गल्यका मत तीन है हिरण्याक्ष कौशिक का अविरोधी परस्परविरोधी, सात्म्य- उपचार होते हैं कुमारशिरा भरद्वाय विरोधी, दोषविरोधी, संस्कारविरुद्ध, वीर्यविरोधी, कोष्ठविरोधी, अवस्थाविरुद्धका मत रस पांच है । यदि का क्रमविरुद्ध, परिहारविरोधी, पाकविरोधी, मत रस छः है वैदेह निमि का मत रस सात हैं धामार्गव बडिश का मत संयोगविरोधी, सम्पद्विरुद्ध,और शास्त्र- विरुद्ध आहारों का वर्णन । विरोधी रस आट में बाल्हीक भिपक कांकायन का मत रस अगणित हैं । पुनर्वसु अन्न सेवन से रोगों की उत्पत्ति । विरुद्ध आत्रेय का मत रस छ: है रसों की अन्न सेवन से उत्पन्न रोगों का प्रति- उत्पत्ति, कर्म, रुचि और प्रभाव रख कार । उपसंहार । विवेचन । द्रव्यों के भेद उनके कर्म । सप्तविंशोऽध्यायः ( पृ० ३२२-३७४ ) कर्म, वीर्य, काल, अधिकरण, उपाय, अन्नपानविधिः- प्राणरूप अन्न का तथा फल के लक्षण । हृव्य, देश, स्वरूप । प्राणों का मूल जाठराग्नि अन काल, प्रभाव से द्रव्यों के ६३ भेद । इन्धन अन्नपान विधि का विस्तार से रसों के भेद, दो दो रस के १५ भेद । वर्णन जल, क्षार, घृत, दूध, मय, तीन २ रसों के बीस भेद । चार चार सिरका, फाणित, पिण्याक, दालें, मधु रसों के १५ भेद पांच २ रसों के छः आदि के सामान्य गुण दोष आहार भेद । एक २ रस के छः भेद, सर्वयोग पदार्थों के १२ वर्ग शुकधान्यवर्ग । अनुरस ६३ रस । वैद्यप्रशंसा ॥ शमीधान्यवर्ग । मांसवर्ग विलेशय अतिरिक्त दश गुण । इनके लक्षण । वारिशय जलचर जंगलीमृग विकिर रसों की उत्पत्ति । रसों के अनुसार प्रतुद प्रसह और आनूप ये मांस के द्रव्यों के गुण कर्म मधुर रस । अम्ल । आठ उत्पत्ति स्थान । इन मांसों के रस । लवण रस । बहुत उपयोग से गुण । शाकवर्ग फलवर्ग । हरितवर्ग हानियां । कटु रस के गुण अति सेवन मद्यवर्ग । जलवर्ग । दुग्धवर्ग । इक्षु-
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वर्ग । कृतान्नवर्ग । आहारयोनिवर्ग । वेद । आयु के समानार्थक पर्याय । प्रशस्त धान्य । त्याज्य मांस त्याज्य आयुर्वेद का लक्षण । आयु का लक्षण । शाक । अनुपान । उनके गुण । जल आयुर्वेद की निष्यता आयुर्वेद के आठ के अनुपान के अयोग्य व्यक्ति । वाद्य अंग । आयुर्वेद के अधिकारी 1 वैद्य पदार्थों में हुए लघु विचार । उपसंहार की परीक्षा । चरक तन्त्र के आठ स्थान अष्टाविंशोऽध्यावः( ०३७४-३५) उनके अध्यायों की पृथक २ गणना विविधाशितपीतीय: - शरीर के और नाम से निर्देश । तन्त्रयुक्ति । सब धातुओं का अन्न से सम्बन्ध | ग्रन्थ संक्षेप 1 प्रतिवादी उत्पानी वैद्या- आहार ले उत्पन्न तीन पदार्थ र किट भाम को पराज्य करने का प्रकार |
और म हिन ित आहार और रोग तन्त्र और वैद्योंके स्वरूप ।
एवं आरोग्यविषयक अग्निवेश का उपहार इति सूत्रस्थानम् ॥
प्रश्न आत्रेय पुनर्वसु का समाधान | निदानस्थानम धातुरात रोग-रसजन्य रोग रक्तजन्य प्रथमोऽध्यायः ४००-४२१ ) मांसजन्य, मेदजन्य, मज्जाजन्य और ज्वरनिदानस - निदानके य शुक्रजन्य रोग अपन्याहार से रोग के तीन प्रकार--- नंग, सीम्य का प्रकोप धातुजन्य विकी और दास्य कि अर्थात चिकित्साकी का निर्देश 1 उपसंहार रोग के पर्याय1 लिंग उपय इन्यरूपानन्दमुदकन्ट् ॥ एकोनविंशोऽध्यायः केलक्षण । दश प्राणायतनीयः निदान के लक्षण । के I- दूस्थान प्राणामिव । उदर समाप्ति और समय tet के लक्ष सोनियाजिन्तुबर वैधका वर्णन 1 उपसंहार । सम्पति-लक्षण परपर के भेद त्रिशतीऽध्यायः ( ० ३६१-४. ' काज्वरपरिणामके पूर्वरूपपत्तिरउपर के अर्थ दशमहामृतीया - हृदय में जीर्ण ज्वर में पान संस्कारसिद्ध काश्रित इस धमनियां । हृदयके पर्याय 1 घृत घृत की श्रेष्ठता उपसंहार । हृदय का महत्त्व | दस महामूळ धम- द्वितीयाऽध्यायः नियों का प्रवान धनी के पर्याय | ( पृ० ४२२-४२०) सेवन योग्य पदार्थ । आयुर्वेद के ज्ञाता रक्तपित्तनिदानम्- रविका के लक्षण । वाक्यार्थ 'अर्थावयवशः लक्षण । पित्त प्रकोप से रक्त का दोष । निरूपण' । आयुर्वेद का मूल बंद अथर्व लोहित पित्त वा रक्तपित्त नाम पड़ने
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( 2 ) का हेतु । रक्तपित्त के पूर्वरूप रक्तपित्त शुक्रमेह, शीतमेह, सिकतामेह, शह के उपद्रव रक्तपित्त के दो मार्ग साध्य आलालमेह 1। पित्तप्रमेह के कारण असाध्य के विचार । रक्तपित्त का इति और सम्प्राप्ति पित्तजन्य छः प्रह हास । उर्ध्वगामी रक्तपित्त साध्य । आरमेह, कालमेह, नीलनेह, लोहितनेह अधोगामी रक्तपित्त याप्य । उभयमार्ग नजिष्ठामेह और हारिनेह पिए नामी रक्तपित असाध्य दिशेन वा का विशेष विज्ञान | मेह त्रिदोषज रक्तपित की चिकित्सा | केकारण उनके प्रकार प्रमेह साध्य रोग के असाध्य ही जाने के नजनेह, हस्तिमेह मधुमेह सब बा कारण असाध्य रक्कपिन के लक्षण । नह असाध्य बात मेहों का विशेष उपसंहार 4 तृतीयोऽध्यायः विज्ञान के रूप । प्रमेह के उपय चिकित्सा प्रमेह किन को ( ०४२८-३६ ) होताहै । उपसंहार गुल्मनिदान -गुरु के पांच पञ्चमोऽध्यायः भेद वातगुल्म, पित्तगुल्म कर ०४४०-४२४ नित्र्यगुल्ल रक्कम इनकेसम्ब कुष्ठनिदानम् - कुछ संग क में अग्निवेश का प्रश्न गुल्म उत्पत्ति कुछ के सात भेदतन्तम सम्प्राप्ति और लक्षण साथ भद्रसे अभेद । कुष्ट पिश प्रकोप के कारण पित्तगुल्म की रोग के कारण कुछरोग के पूर्व सम्प्राप्ति बात के साथ कफप्रकोप कापाल कुष्ठ। उडुम्बर कुष्ठ । मण्डल1 के कारण । कफगुल्म की स कुछ ऋम्पनि कुण्डरीककुष्ट। मासिपातिक गुमर सिम काकगक कुछ साध्य सा गुल्म कीसम्प्राप्ति । गुल्मका प ध्य भेद उप 2 उपसंहार उपसंहार पंच्ठोऽध्यायः ( ० ४५४-४३३ ) ( ६०४३६-४५७ ) निदानम् -शीप के चार प्रहनिदानम्- नहीं की कारण पी का कारण साहस संख्या । रोगों के निव लोष रोग का कारण वेग संधारण, । कफनमेह के कारण । कफ के क्षय का विवरण शुक्रक्षय शोप का दृष्य । कफप्रमेह की सम्प्राप्ति विकृत कारण विपमाशन । राजयक्ष्मा शब्द की कफ के दश गुण । कफजभ्य दक्ष निरुक्ति । शोष के पूर्वरूप 1 राजयक्ष्मा प्रमेह । जैसे उदकमेह, इक्षुवालिकामेह के ११ रूप । राजयक्ष्मा के साध्य और सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह, शुक्रमेह, असाध्य रूप । उपसंहार ।
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( १० ) सप्तमोऽध्यायः प्रभाव । द्रव्य के प्रभाव । सात्म्य ( पृ० ४६३-४०२ ) सात्म्य के भेद । प्रवर मध्यमऔर अवर । उन्मादनिदानम्- पांच प्रकार आहार विधि उसके आठ अंग । के उन्माद । उन्माद का लक्षण । करण । संयोग 1 राशि देश काल । उन्माद के पूर्वरूप वातोन्माद के लक्षण | उपयोग संस्था | उपयोन्हा आहार पित्तजन्य उन्माद के लक्षण । सान्नि विधि । आहार के सद्गुणों का उपदेश । पातिक उन्माद । उन्माद की चिकित्सा । उपसंहार । आगन्तुज उन्माद उन्माद का प्रारम्भ । द्वितीयोऽध्यायः आगन्तुज के लक्षण । आघात काल । ( पृ० ४६४ -२०११- उन्माद उत्पन्न करने का प्रयोजन । त्रिविधकुक्षीयं विमानम्- पेट उन्माद के भेद । उपसंहार । में तीन भाग । आहार की अमात्रा. अष्टमोऽध्यायः हीन मात्रा. अधिक मात्रा उनके दोप पृ० ४७२- ४८० ) आहार की अति मात्रा से हानियां । अपस्मारनिदानम् चार प्रकार कामप्रदोष के दो प्रकार-विपूचिका और का अपस्मार निदान और सम्प्राप्ति । अलयक! अलमक का स्वरूप असाध्य अपस्मार का लक्षण । अपस्मार के पूर्व अलकाविपूचिका का उपाय । कीआमचिकिप्रदीप मेंरूप वातजन्य अपस्मार के लक्षण | प्रयोग पित्तजन्य अपस्मार कफजन्य अपस्मार । औषधका! तर्पणका सान्निपातिक अपस्मार चिकित्सा सूत्र | अन पाचन के सम्बन्ध में अग्निदेश का भिन्न २ रोगों की उत्पत्तिसाध्य और उपसंहारप्रश्नऔर | इनका उत्तरअसाध्य रोग ज्ञान का फल | एक रोग के कारण दूसरा रोग । शुद्ध प्रयोग तृतीयोऽध्यायः का लक्षण । कारण भेद । लक्षण भेद । ( ६०४-१-५१६ ) चिकित्सा विधान | सुखमाध्य और जनपदोमनीयं विमानम्- जनपदनाशक रोग के प्रतीकार का उप- कृच्छ्रसाध्य साध्य और असाध्य | उपसंहार । इति निदानस्थानम् ॥ देश जनपदनाशक रोग के फैलने के कारण प्रश्न और उत्तर आरोग्यनाशक विमानस्थानम् वायु के लक्षण रोगकारी जल के. प्रथमोऽध्यायः लक्षण । नाशकारी रोगों के पूर्व, देश में ( पृ० ४०१-४६४ ) उपस्थित लक्षण । विपरीत ऋतु के रसविमानम् - विमानस्थान का लक्षणों वाला काल आयु रक्षक उपाय । प्रयोजन । छः रस तीन दोष । रसों के वायु आदि में विगुणता उत्पन्न होने का
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( ११ ) कारण, अधर्मं । अधर्म की युगों के के प्रकोप के कारण । त्रतों के दोष का अनुसार उत्पत्ति और उसके दुष्परि- लक्षण । स्रोतों के प्रकृतिसिद्ध रूप । णाम । आयु के समय और परिणाम उपसंहार । विषयक अग्निवेश का प्रश्न तथा आनेय षष्टोऽध्यायः ( पृ० ५३० -५४५ ) ऋषि का प्रतिवचन | देव और पुरुषकार रोगानीकं विमानम्-प्रभाव का लक्षण तीन प्रकार की आयु आयु भेद से रोगों के प्रकार भेद । दल काकाल । अकाल-मरण पर विचार । प्रकार के रोग दो मानम दोष रजस् काल मृत्यु और अकाल मृत्यु पर विचार । और मस् । इनके कुपित होने के तीन उचर में उरण जल देने विषयक प्रश्न | कारण अनुवन्ध्य अनुबन्ध भेद से रोगों आत्रेच का उत्तर ज्वर में उष्ण जल में भेद । वल के भेदोंसे शरीरस्थ अभि केगुण । निदान से विपरीत चिकित्सा । के चार प्रकार । अनि नंद से मनुष्यों अपनण तीन प्रकार के उनके उपयोग के चार प्रकार वात, पिल, कफ प्रकृति केअवसर । म्याज्य रोगी । उपसंहार । के पुरुषों का विवेचन । आरोग्य प्रकृति । चतुर्थोऽध्यायः सम प्रकृति । बातल, पित्तल और ( पृ० ५१६-५२४ ) ओपल तीन प्रकार के रोगी बात, त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीयम् पिन और लेप्म प्रकृति के पुरुषों के तीन प्रकार के रोग विशेषों का विज्ञान लक्षण इनके अनुकूल आहार विहार । आहोपदेश अनुमान और प्रत्यक्ष । उपसंहार । आतोपदेश का निरूपण । प्रत्यक्ष और सममोऽध्यायः अनुमान के लक्षण आप्तोपदेश से ( पृ० ५४१-१५ ) क्या जानें । प्रत्यक्ष से क्या जानें । व्याधितरूपायं विमानम्— अनुमान से क्या जानें उपसंहार । व्याधि के ज्ञान में भ्रम चार प्रकार पञ्चमोऽध्यायः के कृमि दो प्रकार का मल उन में ( पृ० ५०४- ६२१ ) उत्पन्न कृमि । उनका प्रभाव और स्रोतविमानम् - शरीर गत चिकित्सा । रक्तजन्य कृमि । पुरीषजन्य अनेक धानुवादी स्रोतों का वर्णन । कृमि । उनका उपाय अपकर्ष विधि. प्राणवहस्रोतों के दुष्ट होने पर लक्षण. प्रकृति विघात । कृमि- कोष्ठ के रोगी का जलवह स्रोत अन्नवह स्रोत । रसवह उपचार । आस्थापनबस्तिक्रिया की विधि । स्रोत । रक्तवह स्रोत । मांसवहस्रोत । विरंचन । अनुवासन । शिरो विरेचन । मूत्रवह स्रोत । पुरीषवह स्त्रोत । स्वेद कृमियों के प्रकृतिविधात की रीति । वह स्रोत । स्रोतों के पर्याय । स्रोतो शिरोरोग पर चिकित्सा । उपसंहार ।
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( १२ ) अष्टमोऽध्यायः अभ्यनुज्ञा हेत्वन्तर अर्थान्तर । निग्रह- स्थान । कारण करण कार्ययोनि-कार्य- ( पृ० ५५५- ६१८ ) रोगभिषग्जितीयम् -शास्त्रप- कार्यफल | अनुबन्ध, देश, काल, उपाय रीक्षा । शास्त्र के गुण । आचार्य का प्रवृत्ति आदि के सम्बन्ध में विशेष लक्षण । शास्त्र को हट्ट करने के उपाय विज्ञान । इनकी परीक्षा । दश विध शास्त्र के अध्ययन की विधि! अध्या परीक्षा । कारण परीक्षा । करण-परीक्षा पन-विधि। गुरु शिष्य के परस्पर कार्ययोनि -परीक्षा कार्य कार्य -परीक्षा । कर्तव्य । दीक्षा । आचार्य का शिष्य अनुबन्ध-देश कार्य देश आदिकी दश-को उपदेश । संभाषा-विधि । तद्विय- ख्या । आतुर परीक्षा | प्रकृति जादि | पित्तप्रकृतिसंभाषा ( संधाय ) अनुलोम संभाषण भाव । श्लेष्मप्रकृति । विगृह्य संभाषा । प्रतिवादी के तीन यातप्रकृति । समधातुप्रकृति । विकृतियों से परीक्षा सारसे परीक्षा शरीररचना प्रकार तीन प्रकार की परिपत् प्रतिवादी को बिह करने के उपाय: से परीक्षा प्रमाण से परीक्षा । तीन प्रतिलोम संभाषण का प्रकार बाद प्रकार के प्रकरण साम्य ले परीक्षा की मर्यादा ४४ आवश्यकीय ज्ञा दलसे परीक्षा से का लक्षण । जल्पवितण्डा | शक्तिसे परीक्षा परीक्षा प्रतिज्ञास्थापना, प्रतिष्ठापना हेतु. काल का विवेचन संउत्तरान् सिद्धान्त ४ प्रकार के । हता के कार्य एकाकी अपेक्षा से प्रत्यक्ष अनुमान ऐविल कालका उपान् । परीक्षासंशय प्रयोजन व्यभिचार । विधाना का जोगी व्य व्यवसाय । अर्थप्राति, अनुअनुयोग्य अनुयोग प्रत्यकान्विरेचन को से। दीपम्यून अधिक अनर्थक अार्थक 1 अधकटुक- विरुद्ध वाक्यप्रशंसा छ सामान्य विक कपाव छक वाक्छल अहेतु तीन प्रकार के ६ हीं वर्गों के उपयोग में क्षेत्रका प्रकरणसम संशयसन वसम अतीत कर्तव्य अनुवासना द्रव्य शिरोविरेचन-काल उपालम्भ परिहार | प्रतिज्ञाहानि द्रव्य उपसंहार । इति विमानस्थानम्॥
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ओश्म चरकसंहिता सूत्रस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
अब यहां से 'दीर्घ जीवतीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रयः ॥ २ ॥
ऐसा हो नगवान् आत्रेय ने कहा था " ॥ २ ॥
ऋषि भरद्वाज का इन्द्र के पास गमन
दीर्घ जीवितमन्विच्छन् भरद्वाज़ उपागमत् ।
इन्द्रमुग्रतपा बुद्ध्वा शरण्यममरेश्वरम् ॥३॥
दीर्घ काल तक जीवन की इच्छा से उग्रतपस्वी भरद्वाज मुनि देवों के राजा इन्द्र को शरण योग्य जानकर उनके पास गये ॥ ३ ॥
१.निष्प्रयोजन और अभिधेयरहित अर्थ में बुद्धिमानों की प्रवृत्ति नहीं होती! इसलिये सब से प्रथम शास्त्र का प्रयोजन अभिधेय और सम्बन्ध बतलाना चाहिये ।
कहाभीहै- अभिधेयफलज्ञानविरहस्तिमितोद्यमाः ।
श्रोतुमल्यमपि ग्रन्थं नाद्रियन्ते हि साधवः ॥
सिद्धार्थ सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्त्तते ।
शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥
इस शास्त्र का प्रयोजन 'धातुसाम्य ' है । कहा भी है-'धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम्'धातुसाम्य' का अर्थ विषम हुए धातुओं को समान करना और समान धातुओं का रक्षण करना है । अथवा रोगी के रोग का निवारण करना और स्वस्थ
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चरकसंहिता [अ० १
ब्रह्मणा हि यथा प्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः ।
जग्राह निखिलेनाऽऽदावश्विनौ तु पुनस्ततः ॥ ४ ॥
अश्विभ्यां भगवाञ्छक्रः प्रतिपेदे ह केवलम् ' ।
ऋषिप्रोक्तो भरद्वाजस्तस्माच्छक्रमुपागमत् ॥ ५ ॥
आरम्भ में ब्रह्माने यथावत् आयुर्वेद का उपदेश किया उसको प्रजापति [द ] ने पूर्ण रूप से ग्रहण किया । दक्ष से दोनों अश्विनीकुमारोंने, अश्विनी-कुमारों से इन्द्र ने ग्रहण किया । इसी कारण ऋषियों से प्रेरित होकर भरद्वाज मुनि इन्द्र के पास आये २ ॥ ४-५ ॥
विघ्नभूता यदा रोगाः प्रादुर्भूताः शरीरिणाम् ।
तपोपवासाध्ययनत्रह्मचर्य्यव्रतायुषाम् ॥ ६ ॥
तदा भूतेष्वनुक्रोशं पुरस्कृत्य महर्षयः ।
समेताः पुण्यकर्माणः पार्श्वे हिमवतः शुभे ॥ ७ ॥
जब तप, उपवास, ब्रह्मचर्य्य, अध्ययन, व्रत और आयु, इन में विघ्न करनेवाले रोग उत्पन्न हो गये; तत्र प्राणियों पर दया कर के पुण्यात्मा महर्षिगण पवित्र हिमालय के पार्श्व में एकत्र हुए ॥ ६-७ ॥
अङ्गिरा जमदग्निश्च वसिष्ठः कश्यपो भृगुः ।
आत्रेयो गौतमः सांख्यः पुलस्त्यो नारदोऽसितः ॥ ८ ॥
अगस्त्यो वामदेवश्च मार्कण्डेयाश्वलायनौ ।
पारीक्षिभिक्षुरात्रेयो भरद्वाजः कपिञ्जलः ॥ ६ ॥
पुरुष के स्वास्थ्य की रक्षा करना है । जैसा कि सुश्रुत ने कहा है:- "व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य परिरक्षणञ्च" । अभिधेय -सम्बन्ध - हेतु, दोष और द्रव्य ये स्कन्धत्रय और रोगों के उत्पन्न न होने की विधि का बतलाना । शास्त्र और प्रयोजन का उपेय उपाय सम्बन्ध है । भगवान् का लक्षण -- “उत्पत्ति प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् । afe विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥ ” १- अश्विनीकुमारों से इन्द्र ने पढ़ा ही था, पढ़ाया नहीं था, इन्द्र को शिष्य की चाह थी, क्योंकि बिना पढ़ाये विद्या संशय रहित नहीं बनती । २. सुश्रुत में—“ब्रह्मा प्रोवाच ततः प्रजापतिरधिजगे, तस्मादश्विनौ, अश्विभ्यामिन्द्रः । ”