चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त
Charaka Samhita Atridevaji Gupta · 639 पृष्ठ · 64 खण्ड
विषय सूची
- GLH 615.536 CHA V 1 लाल बहादुर अकादमी L.B.S. Nati istration 125794 -BSNAA MUSSOORIE पुस्तकालय LIBRARY अवाप्ति मुख्या Accession No.. 14071 वर्ग संख्या… 1–10
- ( ५ ) मधुमेह के कारण । सात पिडकाएं । उनके भेदों के नाम से निर्देश । आठ विधि, पिडका । विधि का निदान प्रकार के उदर रोग । सात प्रकार के नाव के लक्षण… 11–20
- अ० १ ] सूत्रस्थानम् ३ विश्वामित्राश्वरथ्यौ च भार्गवश्च्यवनोऽभिजित् । गार्ग्यः शाण्डिल्य कौण्डिन्यो वार्मिर्देवलगालवों । १०… 21–30
- अ० १ ] सूत्रस्थानम् १३ इस प्रकार सामान्य आदि छः कारणों का वर्णन किया गया है । अब उनका कार्य कहा जाता है… 31–40
- अ० १ ] सूत्रस्थानम् २३ १. भेद का मूत्र थोड़ा तिक्त, स्निग्ध एवं पित्त का अविरोधी है, वह न तो पित्त को बढ़ाता है, और न पित्त को शमन करता है… 41–50
- सूत्रस्थानम् ३३ अ० २ ] ३ चूंकि आरोग्य का मूल साधन कोष्ठाग्नि है, इस लिये सत्र से मुख्य वस्तु कोष्ठाग्नि है… 51–60
- अ०३ ] सूत्रस्थानम् ४३ तेईसवां योग-- वाते सरके सघृतः प्रदेहो गोधूमचूर्णं छगलीपयश्च । गोधूम ( गेहूँ ) के चूर्ण को बकरी के दूध और घी के साथ मिलाकर लगाने से… 61–70
- अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५३ - सिन्धुवारहरिद्रा- लेष्मातकामजिष्ठा इतिसुहादशेमानिसूक्ष्मैला-विषघ्नानिपालिन्दीभवन्ति -चन्दन-कतक- । ( १६शिरीष-)… 71–80
- अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ६३ भेपज चतुष्क कहने के अनन्तर 'मात्राशितीय अध्याय की व्याख्या करेंगे । इस प्रकार भगवानात्रेय ने कहा है । १-२ । मात्राशी स्यात्… 81–90
- अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७३ nA न रक्ती न विषेणार्तो न शोचन्न च गर्भिणी । न श्रमे न मदे नामे न पित्ते न प्रजागरे । ४०… 91–100
- अ०५] सूत्रस्थानम ८३ रत्न आभूषण आदि धारण करने से लाभ- धन्यं मङ्गलमायुष्यं श्रीमद्वयसन-सूदनम् । ६५ । हर्षणं कायमोजस्य रत्नाऽऽभरण- धारणम्… 101–110
- अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६३ का मांस, क्षार, दही दिन मे साना सामने मे आती हुई वा पुरवा वायु का त्याग करना चाहिये । ४१-४५… 111–120
- अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०३ जायें । स्नेहन और स्वेदन के पीछे वमन कार्य और विरेचन कराना चाहिये । इनके पीछे बस्ति कर्म और अन्त में नस्य कर्म अर्थात् शिरोविरेचन… 121–130
- अ० ८] ८ सूत्रस्थानम् ११३ ऊंचे नीचे प्रदेशों में या चोटियों पर न घूमे फिरे, वृक्ष पर न चढ़े, पानी के तेज प्रवाह में स्नान न करे… 131–140
- अ०: १० ] सूत्रस्थानम् १२३ आदि सब गुण होते हैं, वही सच्चे अर्थों में 'वेद्य' कहला सकता है । वहीं प्राणियों के लिये सुख देने वाला होता है । २१-२३… 141–150
- अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १३३ सर्वश्वत्संचरेन्मातुः पितुर्वा मरणं भवेत् । निरन्तरं नावयवः कश्चित्सूक्ष्मस्य चाऽऽत्मनः । ११… 151–160
- अ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४६ और हेमन्त आदि काल में अपने लक्षणों से कम शीत आदि का होना 'अयोग है । हेमन्त आदि काल में अपने लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना… 161–170
- अ०१२ । सूत्रस्थानम १५३ Raid An.... करना, चारों युगोंका संहार करनेवाले बादल, सूर्य,अग्नि एवं वायु की सृष्टि करना इत्यादि होते हैं… 171–180
- अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६३ करने का अभ्यास है वे शीतकाल ( हेमन्त शिशिर ) में दिन के समय तैल का पान करें ||४४-४६ । वातातपसा ये च रूक्षा भाराध्वकर्शिताः… 181–190
- अ० १४] सूत्रस्थानम् १७३ द्रव्यवान् कल्पितो देशे स्वेदः कार्यकरो मतः । ६ । ब्याधि, काल, रोगी पुरुष, इच्छा इनके अनुसार न बहुत गरम, न बहुत कोमल, उस- उस रोग… 191–200
- ero १४ ] सूत्रस्थानम १८३ पर स्नेह लगाकर स्वेद लेना चाहिये । इस प्रकार सुखपूर्वक स्वेदन हो जाता है || ५२-५४ || य एवाश्मघनस्वेद -विधिर्भूमौ स एव तु… 201–210
- अ० १५ ] १३ सूत्रस्थानम १६३ विरुद्ध भोजन अजीर्ण, असात्म्यप्रकृति के प्रतिकूल, अकाल, कुसमय, मात्रा से कम, गुरु- भारी और विषम भोजन उपस्थित गेगों को रोकना,… 211–220
- अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०३ गुर्वम्ल-हरितद्दानादतिशोताम्बु- सेवनात् । शिरोभितापाद् दुष्टामाद्रोदनाद् वाष्पनिग्रहात् । १०… 221–230
- अ० १७ ] सूत्रस्थानम २१३ क्षय होने पर - मूत्र कठिनाई से थोड़ा-थोड़ा आता है, मूत्र का रंग बदल जाता है । प्यास बहुत लगती है, गला और मुख सूखता है… 231–240
- ज०१८ ] सूत्रस्थानम २२३ सूचीभिरिव तुद्यते पिपीलिकाभिरिव संसृप्यते सर्वप-कल्कावलिप्त इव चिमिचिमायते संकुच्यते आयम्यत इति वातशोथः । ५… 241–250
- अ० १६ ] सूत्रस्थानम् २३३ वडतीसारा इति वात-पित्त-कफ-सन्निपात-भय- शोकजाः, षडदावर्ता इति बात - मूत्रपुरीष शुक्र- च्छर्दि क्षवथुजाः । ( ३ )… 251–260
- अ० २० ] सूत्रस्थानम् २४३ की अधिकता, पसीने का अधिक आना, अंगों ( बगल आदि ) में पसीना आना, अंगों से दुर्गन्ध आना, अंगों का फटना, रक्त में क्लिन्नता ( बदबू )… 261–270
- २५३ अ० २१ ] सूत्रस्थानम् दिन में सोने से इनके विरम धातु सम होते हैं, बल बढ़ता है, कफ अंगों को पुष्ट करता है और आयु स्थिर होती है । ३५-४१… 271–280
- अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६३ wwwww www त्रिफलारग्वधं पाठ सप्तपर्ण सवत्सकम् । स्तं निम्बं समदनं जळेनोत्कथितं पिबेत् । १०… 281–290
- म० २४ ] १८ सूत्रस्थानम् २७३ सूचीभिस्तोदनं शस्त्रैर्दाहः पीडा नखान्तरे । ४६ । लुखनं केशलोम्नां च दन्तेर्दशनमेव च । आत्मगुप्ता वर्षश्च हितास्तस्यावबोधने… 291–300
- अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २०३ विकं सर्पिरयाना, अजाक्षीरं शोषघ्न -स्तन्य-साम्य -दोकन -रक्त-खामा-हिक-रक्त- पित्त-प्रशमनानां, अविक्षीरं श्लेष्मपितोपचयकराणां,… 301–310
- अ० २६ ] सूत्रस्थानम २९३ ण्याक्ष कौशिक ने कहा कि-'रस' चार हैं । स्वादु ( प्रिय ) हितकारी, स्वादु अहित, अस्वादु हित और अस्वादु अहित… 311–320
- अ० २६ ] सूत्रस्थानम ३०३ वायु और पृथिवी गुण की अधिकता से कषाय रस उत्पन्न होता है । इस प्रकार से पञ्च महभूतों के कम अधिक होने से छः रस उत्पन्न होते हैं… 321–330
- ३१३ अ० २६ ] सूत्रस्थानम होने से होता है । रस प्रत्यक्ष है, विपाक सदा परोक्ष और वीर्य मांसअनुमानउष्णद्वाराहै । ज्ञात होता है… 331–340
- अ० २७ ] सूत्रस्थानम ३२३ इस के आगे अन्नपानविधि नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भग-वान् आत्रेय ने कहा था । १-२… 341–350
- सूत्रस्थानम् ३३३ अ० २७ J मत्स्याःस्निग्धाच वृष्याश्च बहुदोषाः प्रकीर्तिताः । शैवलाहारभोजित्वात्स्वप्नस्य च विवर्जनात् । ७°… 351–360
- अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४३ ... पिया मेषां सदृशं विद्यादौयं बिना गुणैः । श्लेष्मलं मधुरं शीतं श्लेष्मातकफलं गुरु । १५७ । म गुरु विष्टम्भ चाङ्कोटफलमग्निजित्… 361–370
- सूत्रस्थानम् ३५३ ०२७ ] २३ कूंबा, वहाग, चश्मा, सरोवर, सरना आदि का पानी आनूप, पर्वत, और धन्वन अर्थात् जांग देश के गुण-दोषों के अनुसार समझना चाहिये '… 371–380
- STO RU ] सूत्रस्थानम ३६२ हॉ वे वस्तु गुरु समझना, जिसमें कबु पक्ष में हो वह बस्तु हल्की समझनी चाहिये… 381–390
- ०२७ ] सूत्रस्थानम् गुरु होजाती हैं । गुरु पदार्थों को थोड़ा और बघु पदार्थों को अधिक सेवन करने से वे गुरु हो जाते हैं… 391–400
- नम् ०२८ ] जातानामनुत्पतौ जाताना विनिवृत्तये । रोगाणां यो free: सुखार्थी तं समाचरेत् । २३ । सुखार्थाः सर्वभूतानां महाः सर्वाः प्रवृत्तयः… 401–410
- अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३९३ तन्महत्ता महामूलास्तचौजः परिरक्षता । परिहार्या विशेषेण मनसो दुःखहेतवः । १३ । हथं यत्स्याद्यदौजस्य स्रोतसां यत्प्रसादनम्… 411–420
- ०३० ] सूत्रस्थानम् ४०३ द्विषणीयं त्रिममयमूरुस्तभिकमेव च । वातरोगे बातरके योनिव्यापदि चैव यत् । ६० । त्रिंशचिकित्सितान्युक्त्वाऽन्यतः कल्पान् परं शृणु… 421–430
- अ० १ ] निदानस्थानम् ४१३ सम्प्राप्ति -उपरोक्त कारणों से कुपित हुवा वायु उष्णिमा के स्थान आमा-शय में पहुंच जाता है । वहां उष्णिमा के साथ मिलता है… 431–440
- २ ] निवास्थानम् अतिमात्रा में अथवा शरीर की गरम स्थिति में खाने से मनुष्य का मा पित होजाता है और रक्त अपनी मात्रा से अधिक बढ़ जाता है… 441–450
- STO 2 ] २८ निदानस्थानम ४३३ तथा कास-श्वास -प्रतिश्यायान् राजयक्ष्माणं चाविप्रवृद्धः श्वेत्यं च स्वर् नख -नयन- वदन-मूत्र- पुरीषेषूपजनयति… 451–460
- ०४ ] निम् ४४३ हरिद्रोहकसंकाशं कटुकं यः प्रमेहति । पित्तस्य परिकोपात विद्याद्धारिद्रमेहिनम् । ३१ । इत्येते षट्प्रमेहाः पिचप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति… 461–470
- अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५३ साध्यानामपि अपेक्ष्यमाणानामेषां स्व -मांस -शाणित-लसीका -को- थ- द - स्वेदजाः कृमयोऽभिमूर्च्छन्ति… 471–480
- to ] -नियानस्थानम ४६३ अन्दर क्षति उत्पन्न हो सकते हैं और बिना कारण हो अणि दीखने लगते हैं । १५ । तत्र लोक:-समुत्थानं कलिङ्ग च यः शोषत्वादयुष्यते… 481–490
- निम् वाडे, शरीर की अन्य चेहाओं को विषम रूप से करने वाले अन्य क्षीण शरीर बाडे तथा रज और तमोगुण से व्यास चिन्तवाले ऐसे पुरुषों में अन्त रात्मा के प्रधान… 491–500
- अ० १ ] विमानस्थानम् www. ४८३ भूविष्ठा वा शमयत्वभ्यश्यमानाः - इत्येतद् व्यवस्थाहेतोः पदत्वमुपदि- श्यते रसानां परस्परेणासंसृष्टानां त्रित्वं च दोषाणाम्… 501–510
- अ० १ ] विमानस्थानम् ४६३ वाले पदार्थ के सेवन करने से, विरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों के सेवन से उत्पन्न होने वाले ( कुष्ठ, वीसर्प आदि ) रोगों से मनुष्य बचा… 511–520
- अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०३ www. एवं वादिनं भगवन्तमात्रेय मग्निवेश उवाच उद्धृतानि खलु भगवन्! षण्यानि विहितानि च सम्यक् सम्यग्विचारचारितानि च… 521–530
- विमानस्थानम ५१३अ०३ ] ३३ न चानभ्यस्ताकाल - मरण-भय-निवारकाणामकाळमरणभय मागच्छे-त्प्राणिनां व्यर्थाश्च ISSरम्भकथाप्रयोगबुद्धयः स्युर्महर्षीणां रसायनाधिकारे,… 531–540
- अ० ४ ] विमानस्थानम ५२३ अनुकूलता से सात्म्य को, वेदना-विशेष से व्याधि के समुत्थान को, उपशय ( शान्ति ) और अनुपशय ( निदान ) द्वारा गूढलिंग वाले रोग को, जिस… 541–550
- ero ६ ] विमानस्थानम् ५३३ AA V रोगों की गणना की है । असंख्य जैसे महारोगाध्याय में रुकू, वर्ण समुत्थान आदि के कारण असंख्य हो जाते हैं । ३… 551–560
- ०७ ] विमानस्थानम् ५४३ समुत्थान- स्थान-संस्थान वर्ण- नाम प्रभाव- चिकित्सित- विशेषान पप्रच्छो- पसंगृह्य पादौ । ८… 561–570
- विमानस्थानम ५५३ मवलोकयन्नजस्रं मृद्वग्निना साधयेद्दर्व्या सततमवघट्टयन् । स यदा जानीयाद्विरमति शब्दः प्रशाम्यति च फेनः, प्रसादमापद्यते स्नेहो यथास्वं… 571–580
- BTO = ] विमानस्थानम् ५६३ ठीक २ जान कर बुद्धिमान् मनुष्य को शत्रु के भी धन्य, यशकारी, आयुष्य, पौष्टिक और लौकिक वचन को सुनना चाहिये और तदनुसार करना चाहिये… 581–590
- अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७३ का कारण वात आदि दोष तथा पंच महाभूत वा सूक्ष्म कीट प्राणियों को भी माना है… 591–600
- अ०८ ] विमानस्थानम् ५८३ वादस्तु खलु भिषजां वर्तमानो वर्तेतायुर्वेद एव नान्यत्र । ६७ । वैद्यजनों के बाद का विषय केवल आयुर्वेद ही है, अन्यत्र नहीं । ६७… 601–610
- विमानस्थानम ५६३STO = ] ३८ होता है । पित्त के उष्ण होने से पित्त प्रकृति के मनुष्य उष्णिमा को न सहने वाले, शुष्क, कठोर, पीले शरीर वाले, बहुत पिल्लु (… 611–620
- विमानस्थानम् ६०३ जाता है । इसके अनन्तर औषध का भी तीक्ष्ण, मृदु और मध्य रूप से विभाग करके दोष एवं बल के औषध का प्रवर, मध्य और अवर रूप से प्रयोग करे । १२३… 621–630
- अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१३ लवणस्कन्ध -सैम्बव, सौवर्चल, फालविड्, पाक्य (पाक द्वारा तैयार किया ) कूप्य ( कुप्पी के आकार में बना ), बालुकैल ( रेत में से बना ),… 631–639