चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 281–290

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६३ wwwww www

त्रिफलारग्वधं पाठ सप्तपर्ण सवत्सकम् ।

स्तं निम्बं समदनं जळेनोत्कथितं पिबेत् ॥ १० ॥

तेन मेहादयो यान्ति नाशमभ्यस्यतो ब्रुवम् ।

मात्राकालप्रयुक्तेन संतर्पणसमुत्थिताः ॥ ११ ॥

ऐसी अवस्था में वमन, विरेचन, रक्तमोक्षण, व्यायाम, उपवास, धूमपान, स्वेद क्रिया, मधु के साथ हरीतकी खाना ( या अगस्त्य हरीतको का खाना ), रूक्ष अन्नों का उपयोग, कण्डू और कोठ को नष्ट करने वाले जो चूर्ण या प्रदेह आरग्वचीय अध्याय में कहे हैं उनका सेवन, त्रिफला ( हरक, बहेड़ा, आंवळा ). अमलतास, पाढ़ल, सतवन, इन्द्रजी, नागरमोथा, नोम की छाल, मैनफळ इनका जल में काढ़ा बनाकर अभ्यास पूर्वक ( नित्यप्रति ) पीने से प्रमेह आदि रोग जो कि मात्रा और काल में सन्तर्पण किया से उत्पन्न हुए हैं, नष्ट हो जाते हैं । ८-११ ॥

मुस्तमारग्वधः पाठा त्रिफला देवदारु च ।

श्वदंष्ट्रा खदिरो निम्बो हरिद्रे त्वक्च वत्सकात् ॥ १२ ॥

रसमेषां यथादोषं प्रातः प्रातः पिबेन्नरः ।

संतर्पणकृतैः सर्वैर्व्याधिभिः संप्रमुच्यते ॥ १३ ॥

एभिश्वोद्वर्तनोद्धर्षस्नानयोगोपयोजितैः ।

स्वग्दोषाः प्रशमं यान्ति तथा स्नेहोपसंहितैः ॥ १४ ॥

कुष्ठं गोमेदको हिकास्थि त्र्यूषणं वचा ।

वृषकैले श्वदंष्ट्रा च खराा चाश्मभेदकः ॥ १५ ॥

तक्रेण दधिमण्डेन बदराम्लरसेन वा ।

मूत्रकृच्छ्र प्रमेहं च पीतमेतद् व्यपोहति ॥ १६ ॥

तक्राभयाप्रयोगेच त्रिफळायास्तथैव च ।

अरिष्टानां प्रयोगे यान्ति मेदादयः शमम् ॥ १७ ॥

त्र्यूषणं त्रिफला क्षौद्रं क्रिमिघ्नं साजमोदकम् ।

मन्थोऽयं सक्तवः सर्पिहितो लोहोदकाप्लुतः ॥ १८ ॥

व्योषं विडङ्गं शिमणि त्रिफला कटुरोहिणीम् ।

बृहत्ौ द्वे हरिद्रे द्वे पाठां सातिविषां स्थिराम् ॥ १६ ॥

हिकेवकमूलानि यवानीधान्यचित्रकम् ।

सौवर्चलमजाजीं च हदुषां चेति चूर्णयेत् ॥ २० ॥

पूर्ण - ल-घृत -क्षौद्रभागाः स्युर्मानतः समाः ।

सना षोडशगुणो भागः संतर्पणं पिबेत् ॥ २१ ॥

पृष्ठ 282

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२६४ चरकसंहिता [ अ० २३

प्रयोगादस्य शाम्यन्ति रोगाः संतर्पणोत्थिताः ।

प्रमेहा मूढवावाच कुष्ठान्यर्शासि कामलाः ॥ २२ ॥

महा पाण्डवामयः शोको मूत्रकृमरोचकः ।

हृद्रोगो राजयक्ष्मा च कासःश्वांसो गलग्रहः ॥ २३ ॥

क्रिमयो ग्रहणीदोषाः वैश्यं स्थौल्यमतीव च ।

नराणां दीप्यते चाग्निः स्मृतिर्बुद्धिश्च वर्धते ॥ २४ ॥

व्यायामनित्यो जीर्णाशी यव-गोधूम- भोजनः ।

तर्पणकृतैर्दोषैः स्थौल्यं मुक्त्वा विमुच्यते ॥ २५ ॥

नागरमोथा, अमलतास, पाढ़ल, त्रिफला, देवदारु, गोखरू, खैर की छाल, नीम की छाल, हल्दी, दारूहल्दी, कूड़े की छाल, इन औषधियों से क्वाथ करके दोषानुसार प्रतिदिन प्रातःकाल पीने से, सन्तर्पणजन्य सब व्याधियों से मुक्त हो जाता है । स्नेह साधन द्वारा त्वचा के रोग मिट जाते हैं । कूठ, गोमेदक मणि, ( या अंकोल ) हींग, कौंच पक्षी की अस्थि, सोंठ, मिरच, पिप्पली, बच, वासा, इलायची, गोखरू, अजवायन, पाषाणभेद इन सब को तक या दधिमण्ड के साथ अथवा खट्टे बेरों के रसों के साथ पीने से मूत्रकृच्छ्र और प्रमेह रोग मिटते हैं । छाछ और हरड़ के प्रयोग से या छाछ और त्रिफला के प्रयोग से, या तक्रा रिष्ट के प्रयोग से ( प्रमेह में कहे अरिष्टों के उपयोग से ) प्रमेह आदि रोग शान्त होते हैं । सोंठ, मिरच, पिप्पली, त्रिफला मधु, बायविडंग, अजवायन, पानी में घुला (घिसा ) अगर, घी और सत्तू इनका मन्थ बनाकर पीने से प्रमेह आदि रोग मिटते हैं । सोंठ, मिरच, पीपल, वायविडंग, शोभाञ्जन, त्रिफला, कुटकी, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, हल्दी, दारूहल्दी, पाढ़ल, अतीस, पृश्निपर्णी, हींग, केवूक- मूल, अजवायन, धनिया, चीतामूल, सुबर्चल, जीरा हाउबेर, इनका चूर्ण कर लेना चाहिये । अब चूर्ण के बराबर तेल, घी और शहद प्रत्येक समान भाग मिलाना चाहिये । इसमें जो के सत्तू का सोलहवां भाग मिला कर खाना चाहिये । इस प्रकार करने से सन्तर्पणजन्य रोग शान्त हो जाते हैं । प्रमेह, मूढबात, कुष्ठ, अर्थ, कामला, प्लीहा, पाण्डुरोग, शोक, मूत्रकृच्छ्र, अरुचि, हृदय रोग, राजयक्ष्मा, कास, श्वास, गले का अवरोध, कृमि, ग्रहणी रोग, श्वित्र रोग, अतिस्थूलता रोग नष्ट होते हैं, जाठराग्नि दीस होती है और स्मृति एवं बुद्धि बढ़ती है । नित्य व्यायाम करने वाला, पहिले भोजन के जीर्ण होने पर खाने वाला, जो और गेहूँ का भोजन करने वाला मनुष्य सन्तर्पणजन्य रोगों से मुक्त होता है, तथा स्थूकता का नाश होता है । १२-२५ ॥

पृष्ठ 283

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० २३ ] सूत्रस्थानम् २६५

एकं संतर्पणोत्थानामतर्पणमौषधम् ।

वक्ष्यन्ते सौषधाचोर्ध्वमपतर्पणजा गदाः ॥ २६ ॥

देहाग्नि - बल- वर्णौज -शुक्र-मांस - बल- क्षयः ।

ear: कासानुबन्धच पार्श्वशूलमरोचकः ॥ २७ ॥

श्रोत्र दौर्बल्यमुन्मादः प्रलापो हृदयव्यथा ।

विण्मूत्रसंग्रहः शूलं जोरुत्रिकसंश्रयम् ॥ २८ ॥

पर्वास्थिधिभेदये चान्ये वातजा गदाः ।

ऊर्ध्वषातादयः सर्वे जायन्ते तेऽपतर्पणात् ॥ २६ ॥

तेषां संतर्पणं तज्ञः पुनराख्यातमौषधम् ।

यत्तदात्वे समर्थ स्यादभ्यासे वा तदिष्यते ॥ ३१ ॥

सद्यः क्षीणो हि सद्यो वै तर्पणेनोपचीयते ।

नर्ते सन्तर्पणाभ्यासाच्चिरक्षीणस्तु पुष्यति ॥ ३१ ॥

देहाग्नि -दोष भैषज्य-मात्रा कालानुवर्तिना ।

कार्यमत्वरमाणेन भेषजं चिरदुर्बले ॥ ३२ ॥

हिता मांसरसास्तस्मै पयांसि च घृतानि च ।

स्नानानि बस्तयोऽभ्यङ्गास्तर्पणास्तर्पणाश्च ये ॥ ३३ ॥

ज्वर -कास- प्रसक्तानां कृशानां मूत्रकृच्छ्रणाम् ।

तृष्यतामुर्ध्ववातानां हितं वक्ष्यामि तर्पणम् ॥ ३४ ॥

शर्करा-पिप्पलीमूल घृत -क्षौद्रैः समशिकैः ।

सक्तद्विगुणितो वृष्यस्तेषां मन्थः प्रशस्यते ॥ ३५ ॥

सक्तवो मदिरा क्षौद्रं शर्करा चेति तर्पणम् ।

पिवेन्मारुतविण्मूत्रकफपित्तानुलोमनम् ॥ ३६ ॥

फाणितं सक्तवः सर्पिर्दधि मण्डोऽम्ल-काञ्जिकम् । तर्पणं मूत्रकृच्छ्रघ्नमुदावर्तहरं पिबेत् ।

मन्थः खर्जूरमृद्वीका-वृक्षाग्लाम्लीक-दाडिमैः ।

परूषकैः सामल को मद्यविकारनुत् ॥ ३८ ॥

स्वादुरग्लो जलकृतः सस्नेहो रूक्ष पब वा ।

सद्यः संतर्पणो मन्थः स्थैर्यवर्णश्चलप्रदः ॥ ३६ ॥

सन्तर्पण से उत्पन्न रोगों की औषध कह दी, अब अपतर्पण को कहते हैं, तथा अपतर्पण जन्य रोग और उनकी औषध भी कहते हैं- अपतर्पण से ज्वर, कास एवं कास सम्बन्धी विकार, बल, कान्ति, ओष, शुक्र और मांस का क्षय, कर्णेन्द्रिय की निर्मकता, उन्माद, प्रकाप, हृदय-पीड़ा, मल-मूत्र का अवरोध,

पृष्ठ 284

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२६६ चरकसंहिता [ अ० २३ जंघा, ऊब और त्रिक ( कटि के नीचे ) प्रदेश में दर्द, पर्व, अस्थि और सन्धियों का टूटना, और अन्य वातजन्य रोग यथा ऊर्ध्ववात ( वायु का ऊपर चढ़ना ) आदि रोग अपतर्पण के कारण उत्पन्न होते हैं । अपतर्पण से उत्पन्न इन रोगों के लिये संतर्पण क्रिया औषध है । सन्तर्पण क्रिया दो प्रकार की है । यथा - सद्यः सन्तर्पण और अभ्यास ( क्रमशः शनैः शनैः ) सन्तर्पण । जो मनुष्य सहसा एकदम से क्षीण होता है, वह सद्यः सन्तर्पण क्रिया से पुष्ट होता है और देर से क्षीण हुआ पुरुष बिना अभ्यास जन्य सन्तर्पण के पुष्ट नहीं होता । जो पुरुष देर से निर्बल हो, उसमें शरीर जाठराग्नि, दोष, औषध बल, मात्रा और समय का विचार करके शान्ति से ( जल्दा न करके ) चिकित्सा करनी चाहिये । इस प्रकार के रोगी के लिये मांस, रस, दूध, घी, स्नान, बस्तियां, मर्दन, सन्तर्पण करने वाले मन्थ आदि प्रयोग करने चाहिये । ज्वर, कास के रोगियों के लिये, निर्बलों के लिये, मूत्रकृच्छ्र रोगियों के लिये, प्यास रोगवालों के लिये, ऊर्ध्ववास रोगियों के लिये, हितकारी तर्पण क्रिया का उपदेश करते हैं -शर्करा, पिप्पलीमूल, घी और शहद ये समान भाग लेकर इन सब से दुगुना सत्तू लेकर मन्थ बनाये । सत्तू, मदिरा, शहद और शर्करा इनसे मन्थ तयार करके वायु, मल, मूत्र के अनुलोमन ( अधोमार्ग से बाहर करने के लिये ) और कफ, पिता को अनुकूल करने के लिये प्रयोग करना चाहिये । फाणित ( राब ) सत्तू, घी, दहिमण्ड और धान्याम्छ कांजी, इनसे बना मन्थ मूत्रकृच्छ्र नाशक और उदात्त रोग को नष्ट करने वाला तर्पण है । खजूर, मुनक्का, इमली, कोकम, अनारदाना, फालसा और आंवला उनसे बना हुआ मन्थ मदिरा के विकार को नष्ट करता है । खट्टे और मीठे ( अनारदाना ) पदार्थों से पानी में बना और घी युक्त या विना घो के बना हुआ मन्थ सद्यः सन्तर्पण है और स्थिरता, वर्ण कान्ति और बल को देता है ॥ २६-३९ ॥

तत्र श्लोक:- संतर्पणोत्था ये रोगा रोगा ये चापतर्पणात् ।

संतर्पणीये तेऽध्यायं सोषधाः परिकीर्तिताः ॥ ४० ॥

सन्तर्पण और अपतर्पण से उत्पन्न जो जो रोग हैं उनको तथा उनकी औषध को इस सन्तर्पणीय अध्याय में कह दिया ॥ ४० ॥

इत्यग्निवेशकृते तत्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के सन्तर्पणीयो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ॥ २३ ॥

पृष्ठ 285

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० २४ ] सूत्रस्थानम् २६७

चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ।

अथातो विधिशोणितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब विधिशोणितीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

विधिना शोणितं जातं शुद्धं भवति देहिनाम् ।

देश -कालोक-सात्म्यानां विधिर्यः संप्रकाशितः ॥ ३ ॥

द्विशुद्धंहि रुधिरं बल- वर्ण- सुखायुषा ।

युनक्ति प्राणिनं प्राणः शोणितं धनुवर्तते ॥ ४ ॥

देशसात्म्य, कालसात्म्य और अभ्याससात्म्य को जो विधि कहीहै उस विधि से मनुष्यों का जो रक्त उत्पन्न होता है, वह यदि विशुद्ध हो तो पुरुष को बल, वर्ण, सुख, आयु से युक्त करता है । क्योंकि प्राणियों के प्राण रक्त का अनुसरण करते रहते हैं ॥ ३-४ ॥

प्रदुष्टबहुतीक्ष्णोष्णर्मद्येरन्यैश्व तद्विधेः ।

तथाऽतिलवणक्षारैरम्लः कटुभिरेव च ॥ ५ ॥

कुलत्थ-माष -निष्पाव-तिल तेल- निषेवणैः ।

पिण्डामूलकादीनां हरितानां च सर्वशः ॥ ६ ॥

जलजानूपशैलानां प्रसहानां च सेवनात् ।

दध्यम्ळ- मस्तु -शुक्तानां सुरासौवीरकस्य च ॥ ७ ॥

विरुद्धानामुपक्लिन्नपूर्तीनां भक्षणेन च ।

भुक्त्वा दिवा प्रस्वतां द्रवस्निग्धगुरूणि च ॥ ८ ॥

अत्यादानं तथा क्रोधं भजतां चाSS तपानलौ ।

छर्दि वेगप्रतीघातात्काले चानवसेचनात् ॥ ६ ॥

श्रमाभिघातसंतापैरजीर्णाभ्यशनैस्तथा ।

शरत्कालस्वभावाच्च शोणितं संप्रदुष्यति ॥ १० ॥

ततः शोणितजा रोगाः प्रजायन्ते पृथग्विधाः । रक्त दूषित होने के कारण - अपनी प्रकृति से विपरीत, बहुत तीक्ष्ण, बहुत गरम मद्य अथवा इसी प्रकार के पानकादि ( या अन्न से ), बहुत नमक, क्षार -या खटाई से, कडुवे रस से कुलथी, उड़द, राजशिम्बी, तिल, ते के खाने से, पिण्डालू ( कद प्रम्यि, पांडरी रतालू, अरबी, घुईयां ), मूळी, और हरे शाक

पृष्ठ 286

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wwwwwAAN२६८ चरकसंहिता J [ अ० २४ सब्जियों के खाने से, पानी में रहने वाले तथा जलीय प्रदेश में रहने वाले, तथा पर्वत पर रहने वाले और मांस खाने वाले पक्षियों ( वाज़, चील ) का मांस खाने से, खट्टी दही, मस्तु, शुक्त ( कांजीमेद ), सुरा, सौवीरक ( कांजी भेद ) के खाने से, विरुद्ध, सबे, गले, दुर्गन्ध युक्त भोजनों के खाने से, भोजन करके दिन में सोने से, तरल, स्निग्ध और भारी पदार्थों के सेवन से, बहुत अधिक खाने से, क्रोध. धूप, और अग्नि के अधिक सेवन से, वमन के वेग को रोकने से रक्त के दूषित होने के समय ( शरतकाल ) में रक्त का मोक्षण न करने से, परिश्रम से, चोट से, सन्ताप से, अजीर्ण ( बिना भोजन के पचे पुनः खाने ) से, अध्यशन अर्थात् भोजन के जीर्ण हुए विना फिर भोजन करने से तथा शरत्काल में स्वभाव से ही रक्त दूषित हो जाता है । रक्त के दूषित होने से नाना प्रकार के रक्तजन्य रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ५-१० ॥ मुखपाको क्षिरागश्च पूतिघ्राणास्यगन्धता ॥ ११ ॥।

गुल्मोप कुश -वीसर्प-रक्तपित्त-प्रमीलकाः ।

विद्रधी रक्तमेव प्रदरो वातशोणितम् ॥ १२ ॥

वैवर्ण्यमग्निनाशश्च पिपासा गुरुगात्रता ।

सन्तापश्चातिदौर्बल्यमरुचिः शिरसश्च रुक् ॥ १३ ॥

विदाहश्चान्नपानस्य तिक्ताम्लाद्गिरणं क्लमः ।

क्रोधप्रचुरता बुद्धेः संमोहो लवणास्यता ॥ १४ ॥

स्वेदः शरीरदौर्गन्ध्यं मदः कम्पः स्वरक्षयः ।

तन्त्रा निद्रातियोगश्च तमसश्चातिदर्शनम् ॥ १५ ॥

कण्डूरुको पिडकाः कुष्ठचर्मदलादयः ।

विकाराः सर्व एवैते विज्ञेयाः शोणिताश्रयाः ॥ १६ ॥

शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैरुपक्रान्ताश्च ये गदाः ।

सम्यक् साध्या न सिध्यन्ति रक्तजांस्तान्विभावयेत् ॥ १७ ॥

यथा मुखपाक, आंख की सूजन ( आंख की लालिमा ), नाक से बदबू, मुख का दुर्गन्ध, गुल्म, उपकुश, वीसर्प, रक्त पित्त, प्रमीलक, विद्रधि, रक्त प्रमेह, प्रदर, वातरक्त, विवर्णता, जाठराग्नि का नष्ट होना, प्यास, शरीर का भारीपन, सन्ताप, अतिनिर्बलता, अरुचि, शिर की दर्द, खान-पान का विदाह ( अपचन ), कडुवी या खट्टी डकार आना, निष्क्रियता, क्रोध की अधिकता, बुद्धिभ्रंश, मुख का नमकीनपन, पसीना आना, शरीर की दुर्गन्धता, मद, कम्पन, स्वरनाथ, तन्द्रा, निद्रा का अधिक आना और आंखों के सामने

पृष्ठ 287

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अ० २४ | सूत्रस्थानम् २६६ अन्धकार का अधिक आना, खाज, कोठ, फुन्सियां, कुष्ठ, चर्मदल ( चर्म फटने का विशेष रोग ), ये सब रोग रक्त के आश्रित होते हैं । जो रोग शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष आदि उपक्रमों ( चिकित्सा) द्वारा भली प्रकार साध्य होने पर भी सिद्ध न हों तो इन रोगों को रक्तजन्य समझना चाहिये ॥ ११-१७ ॥

कुर्याच्छोणितरोगेषु रक्तपित्तहरीं क्रियाम् ।

विरेकमुपवामं वा त्रावणं शाणितस्य वा ॥ १८ ॥

बलदोषप्रमाणाद्वा विशुद्धया रुधिरस्य वा ।

रुधिरं स्रावयेज्जन्तोराशयं प्रसमीक्ष्य वा ॥ १६ ॥

चिकित्सा - रक्तजन्य रोगों में रक्त-पित्तनाशक क्रिया करनी चाहिये अर्थात् विरेचन, उपवास, अथवा रक्त का मोक्षण करना चाहिये । बल की मात्रा और रक्तजन्य व्याधि के स्वरूप की मात्रा, जितने रक्त के निकालने से रक्त शुद्ध हो जाय इतने दूषित रक्त के स्थान को देखकर मनुष्य का रक्त ( थोड़ा या बहुत ) निकालना चाहिये ॥ १८-१६ ॥

अरुणाभं भवेद्वाताद्विशदं फेनिलं तनु ।

पित्तापीतासितं रक्तंस्त्यायत्यौष्ण्याचिरेण च ॥ २० ॥

ईषत्पाण्डु कफाद् दुष्टं पिच्छिलं तन्तुमद्धनम् ।

द्विदोपलिङ्गं संसर्गात् त्रिलिङ्गं सान्निपातिकम् ॥ २१ ॥

वायु से दूषित रक्त लाल रंग का, विशद स्वच्छ, झागदार पतला होता है । पित्त से दूषित रक्त पीला, काला, घन ( सान्द्र ), बहुत गरम और जड़ होता है । कफ से दूषित रक्त थोड़ा पीला, पिच्छिल, तन्तु ( तागे जैसा ) और घन टोस होता है । दो दोषों के संसर्ग होने से दो दोषों के लक्षण होते हैं और तीन दोषों के मिलने से तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २०-२१ ॥

तपनीयेन्द्रगोपाभं पद्मालक्तकसंनिभम् ।

गुञ्जाफलसवर्णं च विशुद्धं विद्धि शाणितम् ॥ २२ ॥

नात्युष्णशीतं लघु दीपनीयं रक्तेऽपनीते हितमन्नपानम् ।

तदा शरीरं ह्यवनस्थितासृगग्निर्विशेषेण च रक्षितव्यः ॥ २३ ॥

प्रसन्नवर्णेन्द्रियमिन्द्रियार्थानिच्छन्त मन्याहतपक्वेगम् ।

सुखान्वितं पुष्टिवलोपपन्नं विशुद्धरतं पुरुषं वदन्ति ॥ २४ ॥

तदा तु रक्तवाहीनि रसस ज्ञाबहानि च ।

पृथक् पृथक् समस्ता वा स्रोतांसि कुपिता मलाः ॥ २५ ॥

विशुद्ध रक्त का लक्षण -– तपे हुए स्वर्ण ( कुन्दन ) के समान, बीर-

पृष्ठ 288

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२७० चरकसंहिता [ अ० २४ बहूटी के रंग का, छाल कमल या माहवर ( जिसे औरतें पैर के तलुवों पर लगाती हैं ) के समान रंग, लाल रत्ती के रंग के समान विशुद्ध रक्त का रंग होता है । रक्तमोक्षण करने के उपरान्त न तो बहुत गरम और न बहुत ठण्डा, • एवं दीपक ( अग्नि को बढ़ाने वाला ), खान -पान सेवन करना चाहिये । रक्त मोक्षण होने से शरीर का रक्त अनवस्थित अस्थिर होता है ( रक्त का वेग बहुत चंचल होता है ), इसलिये अग्नि की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये, इसको मन्द नहीं होने देना चाहिये । विशुद्ध रक्तवाले पुरुष का लक्षण - जिस पुरुषका वर्ण कान्ति और इन्द्रियां निर्मल हों, इन्द्रियां अपने विषयों की इच्छा करें, जाठराग्नि का बल तथा मल- मूत्र आदि की प्रवृत्ति बिना रुकावट के हों, मनुष्य का मन आनन्द अनुभव करे, प्रसन्नता और बल दीखता हो, उस पुरुष का रक्त शुद्ध जानना चाहिये ॥ २५ ॥

मलिनाहारशीलस्य रजोमोहावृतात्मनः ।

प्रतिहत्यावतिष्ठन्ते जायन्ते व्याधयस्तदा ॥ २६ ॥

मद- मूर्च्छाय -संन्यासास्तेषां विद्याद्विचक्षणः ।

तथोत्तरं बलाधिक्यं हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ॥ २७ ॥

दुर्बलं चेतसः स्थानं यदा वायुः प्रपद्यते ।

मनो विक्षोभयन् जन्तोः संज्ञां संमोहयेत्तदा ॥ २८ ॥

पित्तमेवं कफवं मनो विक्षोभयन्नृणाम् ।

सज्ञां नयत्याकुलतां विशेपश्चात्र वक्ष्यते ॥ २६ ॥

सक्तानल्पद्रुताभाषं चलस्खलितचेष्टितम् ।

विद्याद्वातमदाविष्टं रूक्षश्यावारुणाकृतिम् ॥ ३० ॥

सक्रोधपरुषाभाषं संप्रहारकलिप्रियम् ।

विद्याद् पित्तमदाविष्टं रक्तपीतासिताकृतिम् ॥ ३१ ॥

स्वल्पसंबन्धवचनं तन्द्रालस्यसमन्वितम् ।

विद्यत् फमदाविष्टं पाण्डु प्रध्यानतत्परम् ॥ ३२ ॥

सर्वाण्येतानि रूपाणि सन्निपातकृते मदे ।

जायते शाम्यति त्वाशु मदो मद्यमदाकृतिः ॥ ३३ ॥

यश्च मद्यमदः प्रोक्तो विषजो रौधिरश्व यः ।

सर्व एते मदा नर्वे वातपित्तकफत्रयात् ॥ ३४ ॥

मलिन आहार खाने वाले एवं रक्त और तम से आवृत मन वाले के कुपित बात, पित्त, कफ दोष पृथक् पृथक् या मिळकर रसवाही, रक्तवाही या संज्ञावाही

पृष्ठ 289

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अ० २४ ] सूत्रस्थानम २७१ स्रोतों को रोक लेते हैं, तब निम्न लिखित रोग उत्पन्न होते हैं । यथा --मद, मूर्छा और संन्यास ये रोग होते हैं । इन तीनों दोषों के हेतु, लिङ्ग ( लक्षण ) और शान्ति, उपचार में उत्तरोत्तर बल की अधिकता रहती है । अर्थात् मद से अधिक मूर्छा में और मूर्ख से अधिक संन्यास में बल की अधिकता रहती है । जिस समय चेतना का स्थान हृदय निर्बल हो जाता है और यहां पर वायु का प्रकोप हो, तब वह मन को क्षोभित करके मनुष्य की संज्ञा ( चेतना ) को ढांप लेता है, पित्त और कफ ही मन का विक्षोभ उत्पन्न करके संज्ञा का नाश करते हैं । विशेष रूप से पृथक् पृथक् कहते हैं रुक-रुक कर ( तुतलाकर ) बोलना, बहुत बोलना, जल्दी-जल्दी बोलना, चलते हुये लड़खड़ा करके गिरते पड़ते चलना, चेहरे का रंग रूखा, काला, लाल सा होना, वातजन्य मद के लक्षण हैं । क्रोधयुक्त कठोर ' गाली ) वाणी बोलना, चंट या आघात करना, झगड़ा करना, चेहरे का रंग लाल, पीला या काला होना, पित्तजन्य मद के लक्षण हैं । थोड़ा परन्तु सम्बन्ध ( पूर्वापर सम्बन्ध ) युक्त बोलना, तन्द्रा और आलस्य का होना, चेहरे का रंग धूसरवर्ण, एक ध्यान में मग्न होना ये कफजन्य मद के लक्षण | सन्निपातजन्य मद में सब दोषों के लक्षण मिलते हैं । मद्यजन्य मद में आकृति शराबी पुरुष के समान होती है और यह मद जल्दी चढ़ता है और जल्दी उतर जाता है । मद्यजन्य, विषजन्य, रक्तजन्य और दोषजन्य ये चारों प्रकार के मद, वात, पित्त, कफ को छोड़कर नहीं होते हैंहैं ॥ २६-३४ ॥

नीलं वा यदि वा कृष्णमाकाशमथ वाऽरुणम् ।

पश्यंस्तमः प्रविशति शीघ्रं च प्रतिबुध्यते ॥ ३५ ॥

वेपथुश्चाङ्गमर्दश्च प्रपीडा हृदयस्य च ।

का श्यावाsरुणा छाया मूर्छाये वातसंभवे ॥ ३६ ॥

रक्तं हरितवर्ण वा वियत्पीतमथापि वा ।

पश्यंस्तमः प्रविशति सस्वेदश्च प्रबुध्यते ॥ ३७ ॥

सपिपासः ससन्तापो रक्तपीताकुलेक्षणः ।

संभिन्नवर्चाः पीताभो मूर्च्छाये पित्तरांभवे ॥ ३८ ॥

मेघ कामाकाशमावृतं वा तमोघनैः ।

पश्यंस्तमः प्रविशति चिराश्च्च प्रतिबुध्यते ॥ ३६ ॥

गुरुभिः प्रावृतैरङ्गैर्यथैवाऽऽद्रेण चर्मणा ।

सप्रसेकः सहृल्लासो मूर्च्छाये कफसंभवे ॥ ४० ॥

सर्वाकृतिः सन्निपातादपस्मार इवाऽऽगतः ।

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२७२ चरकसंहिता [अ० २४ सजन्तुं पातयत्याशु बिना बीभत्सचेष्टितैः ॥ ४१ ॥

दोषेषु मदमूर्छायाः कृतवेगेषु देहिनाम् ।

स्वयमेवोपशाम्यन्ति सन्यासो नौषधैर्विना ॥ ४२ ॥

वाग्देहमन चेष्टामाक्षि प्यातिबला मलाः ।

संन्यस्यन्त्यबलं जन्तुं प्राणायतनसंश्रिताः ॥ ४३ ॥

सना संन्याससंन्यस्तः काष्ठीभूतो मृतोपमः ।

प्राणेर्वियुज्यते शीघ्रं मुक्त्वा सद्यःफलां क्रियाम् ॥ ४४ ॥

मूर्छा के लक्षण - आंखों के सामने आकाश नीला या काला अथवा लाल दीखता है, आंखों के सामने अन्धेरा आ जाता हो और मनुष्य मूर्छा से जल्दी ही सचेत हो जाय, शरीर में कम्पन और अंगों में पीड़ा हो, हृदय में वेदना का अनुभव हो, कृशता और छाया, मुख का वर्ण काला या लाल हो जाय, ये वातजन्य मूर्छा के लक्षण हैं । आकाश लाल पीला या हरा दिखाई दे, अन्ध-कार आता दिखाई दे और उठते समय शरीर पर पसीना, प्यास वा जलन हो, आंखें लाल या पीली, व्याकुल दीखती हों, मल पतला ( अतीसार ), चेहरे का रंग पीला पड़ जाता है, ये पित्तजन्य मूर्च्छा के लक्षण हैं । आकाश बादलों से घिरा या अन्धकार से आवृत दिखाई दे, अन्धकार सामने आता दिखाई दे, मूर्च्छा से देर में जागृत हो, भारी तथा गीले कपड़े में शरीर दपा प्रतीत होता हो, ( शरीर जकड़ा एवं भारी ), मुख से लार बहना, बेचैनी, ये कफजन्य मूच्छा के लक्षण हैं । सन्निपात से सब दोषों के लक्षण होते हैं, अपस्मार के समान इसमें वेग आता है । इस रोग में बीभत्स चेष्टाओं ( दांतों से काटना, हाथ पांव आदि फेंकने ) के विना मनुष्य गिर पड़ता है । शरीरधारियों में जब मद- मूर्च्छा को उत्पन्न करने वाले दोषों का बल कम हो जाता है, तब ये रोग अपने आप शान्त हो जाते हैं, परन्तु 'संन्यास' रोग विना औषध के अच्छा नहीं होता । अति बलवान् मल वातादि दोष, प्राणायतन ( हृदय आदि ) अवयवों का आश्रय करके, वाणी, शरीर और मन की क्रियाओं को एकदम से बन्द कर देते हैं, तब मनुष्य निर्बल, निष्क्रिय, क्रियारहित, लकड़ी के सामान निर्जीव होकर गिर पड़ता है । इस समय यदि तात्कालिक फल देने वाली क्रियायें ( अंजन, नस्य आदि ) जल्दी न की जायें तो मनुष्य मर जाता है । ३५–४४ ॥

दुर्गेऽम्भसि यथा मज्जद्भाजनं त्वरया बुधः ।

गृह्णीयात मप्राप्तं तथा संन्यासपीडितम् ॥ ४५ ॥

अब्जनान्यव पीडा धूमः प्रथमनानि च ।