चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 271–280

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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२५३ अ० २१ ] सूत्रस्थानम् दिन में सोने से इनके विरम धातु सम होते हैं, बल बढ़ता है, कफ अंगों को पुष्ट करता है और आयु स्थिर होती है ॥ ३५-४१ ॥

प्रोष्मे चाऽऽदानरूक्षाणां वर्धमाने च मारुते ॥ ४३ ॥

रात्रीणां चातिसङ्क्षेपादिवास्वप्नः प्रशस्यते श्रीष्मवर्ज्येषु कालेषु दिवास्वप्नात्प्रकुप्यतः । ४४ ॥ श्लेष्मपित्ते, दिवास्वप्नस्तस्मात्तेषु न शस्यते ॥ । मेदस्विनः स्नेहनित्याः श्लेष्मलाः श्लेष्मरोगिणः४५ ॥ दूषीविषार्ता दिवा न शयीरन् कदाचन ॥

हलीमकः शिरः शूलं स्तैमित्यं गुरुगात्रता ।

अङ्गमर्दोऽग्निनाशश्च प्रलेपो हृदयस्य च ॥। ४६ ॥

शोथारोचक कोठोsरुः पिडकाः-हल्लासकण्डूस्तन्द्रा-पीनसार्घावभेदकाःकासो गलामयाः॥। ४७ ॥ स्मृति -बुद्धि-प्रमोहश्च संरोधः स्रोतसां ज्वरः ४८ ॥ इन्द्रियाणामसामर्थ्यं विष-वेग प्रवर्तनम् ॥ । भवेन्नृणां दिवास्वप्नस्याहितस्य निषेवणात् ॥। ४६ ॥ तस्माद्धिताहितं स्वप्नं बुद्धवा स्वप्यात्सुखं बुधः। रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ॥ ५० ॥

अरूक्षमनभिष्यन्दिदेद्दवृत्तौ यथाऽऽद्दारस्तथात्वासीनप्रचलायितम्स्वप्नः सुखो मतः ॥ । ४१ ॥ स्वप्नाहारसमुत्थे च स्थौल्यकाइयें विशेषतः ग्रीष्म ऋतु आदान काल एवं रूक्ष है, इस समय वायु बढ़ती हैऋतु, औरकी रातें बहुत छोटी होती हैं, इसलिये दिन में खांना उत्तमहोतेहै ।हैं, ग्रीष्मइसलिये इन छोड़करसमयों मेंऔरदिनऋतुओंके समयमें खोनासोने सेठीककफनहींऔरहै ।पित्तमेदस्वोविकृत, नित्य स्नेह का सेवन करनेकर बाले, कफप्रकृति, कफरोगी, और दूषो विष से पीड़ित पुरुषअंगोंदिनमें भारीपनमें खास, अंगों कभी भी न सोयें । दिन में सोने से हलीमक, शिरोवेदना, जब मन या • नींद का स्थान कहां है? यह तो कहना कठिन है, परन्तु Fifth Ventrical ) में मन से युक्त आत्मा मस्तिष्क की पंचम जवनिका। इस (जवनिका के साथ किसी भी पहुंच जाती है तब पुरुष को नींद आती हैकहा है- "स्वप्नश्च निरिन्द्रियप्रदेश शानन्तु का सम्बन्ध नहीं है । इसी से मनोऽवस्थानम्" ||

पृष्ठ 272

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२५४ चरकसंहिता [अ० २१ को गीले वस्त्र से ढांपने की भांति प्रतीति, अंगों का टूटना, जाठराग्नि की क्षीणता, हृदय का कफ से लिप्स होना, सूजन, अरुचि, बमनेच्छा, पीनस, आषा सीसी, कोठ ( बरें के काटे के भांति ), फुन्सियां, खाज, तन्द्रा, आलस्य, कास, गले के रोग स्मृति नाश, बुबिनाश, मूर्छा, स्रोतों का अवरोध, ज्वर, इन्द्रियों में असमर्थता, विष के वेग का जोर ( फिर से चढ़ना ) वे लक्षण अहितकारी निद्रा अर्थात् दिन में सोने से उत्पन्न होते हैं । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अहि- तकारी नींद का त्याग करे, और हितकारी नींद का सेवन करे इससे सुख होगा । रात्रि में जागने से शरीर में रूक्षता और दिन में सोने से स्निग्धता बढ़ती है । और बैठे - बैठे सोना न तो रूक्षता उत्पन्न करता है, न अभिष्यन्द अर्थात् स्निग्धता उत्पन्न करता है । शरीर के धारण के लिये जिस प्रकार भोजन सुखकारक होत है, उसी प्रकार नींद भी आवश्यक है । इसलिये स्थूलता और कृशता मुख्य रूप से आहार और निद्रा पर अवलम्बित है ॥ ४३–५१ ॥

अभ्यङ्गोत्सादनं स्नानं ग्राम्यानूपौदका रसाः ।

शाल्यन्नं सदधि क्षीरं स्नेहो मद्यं मनःसुखम् ॥ ५२ ॥

मनसोऽनुगुणा गन्धाः शब्दाः संवाहनानि च ।

चक्षुषस्तर्पणं लेपः शिरसो वदनस्य च ॥ ५३ ॥

स्वास्तीर्ण शयनं वेश्म सुखं कालस्तथाचितः ।

आनयन्त्यचिरान्निद्रां प्रनष्टा या निमित्ततः ॥ ५४ ॥

तैकमर्दन, उबटन, स्नान, ग्राम्य या जलचर प्राणियों का मांसरस, चावल, दही, दूध, स्नेह ( घी-तैल ) मद्य, मन की प्रिय वस्तुएं, मनोनुकूल सुगन्धि, शब्द और संवाहन ( मसाज, मुट्ठी भरना ), आंखों का तर्पण, शिर और मुख, शरीर पर चन्दनादि का लेप, अच्छा बिछा पलंग, सुन्दर घर तथा उचित समय ये वस्तुएं कारण से नष्ट हुई नींद को शीघ्र ही उत्पन्न कर देती हैं G ॥५२-५४॥

कायस्य शिरसश्चैव विरेकश्छर्दनं भयम् ।

चिन्ता क्रोधस्तथा धूमो व्यायामो रक्तमोक्षणम् ॥ ५५ ॥

उपवासोऽखा शय्या सत्त्वौदार्यं तमोजयः ।

निद्राप्रसङ्गमहितं वारयन्ति समुत्थितम् ॥ ५६ ॥

यदि मस्तिष्क में स्थित निद्रा को नियमित करने वाला केन्द्र नष्ट कर दिया जाय या चोट आदि से नष्ट हो जाय अथवा विक्षिप्त हो जाय तो पुरुष को नींद का आना असम्भव हो जाता है । जब तक मस्तिष्क में यह केन्द्र ठीक है तभी तक यह चिकित्सा फलवती हो सकती है ।

पृष्ठ 273

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अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २५५ शरीर का विरेचन, शिरोविरेचन, बमन, भय, चिन्ता, क्रोध, कहानी सुनना, मैथुन रक्तमोक्षण ( शिरावेध ), उपवास, दुःखदायक विस्तर, सत्त्व गुण की अधिकता, तमोगुण का जय ( योगाभ्यास से होती है ), ये कारणलिये स्वस्पनींद को नहीं आने देते । इसलिए अहित, अवाञ्छनीय नींद को रोकने के पुरुष को इन्हें बर्त्तना चाहिये ॥। ५५-५६ ॥

एत एव च विज्ञेया निद्रानाशस्य हेतवः ।

कार्य कालो विकारश्च प्रकृतिर्वायुरेव च ॥ ५७ ॥

निद्रानाश के दूसरे कारण कार्य में फंसा रहना, काल ( बुढ़ापा ), विकार, शूल दर्द होना स्वभाव से ही नींद कम आना, वायु, उन्माद रोग या वातरोग आदि निद्रानाश के कारण हैं ॥ ५७ ॥

तमोभवा श्लेष्मसमुद्भवा च मनः शरीरश्रम-संभवा च ।

आगन्तुकी व्याभ्यनुवर्तिनी च रात्रिस्वभाव-प्रभवा च निद्रा ॥१८॥

रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां भूतधात्रीं प्रवदन्ति निद्राम् । तमोभवामाहुरघस्य मूलं शेषं पुनर्व्याधिषु निर्दिशन्ति ||मन२६||और नींद छः प्रकार की हैं यथा — तमोजन्या, निद्रा कफ से उत्पन्न शरीर के थकने से ' आगन्तुकी रोग ( सन्निपात ज्वर आदि ) उत्पन्न होनेकी वालीनिद्रा रात्रि के स्वभाव के कारण उत्पन्न होने वाली निद्रा । इन छः प्रकार अर्थात् में जो निद्रा रात्रि स्वभाव के कारण उत्पन्न होती है उसको भूतधात्रीतमोगुण से उत्पन्न धाय के समान प्राणियों को पोषण करने वाली कहते हैं, और में की जाती है । निद्रा पाप अधर्म का मूल है, शेष निद्राओं की गिनती रोगों निन्दितो । तत्र श्लोकाः -निन्दिताः पुरुषास्तेषां यौ विशेषेण निन्दिते कारण दोषास्तयोर्निन्दितभेषजम् ॥ ६० ॥

येभ्यो यदा हिता निद्रा येभ्यश्चाप्यहिता यदा ।

अतिनिद्रानिद्रयोश्च भेषजं यद्भवा च सा ॥ ६१॥।

या या यथाप्रभावा च निद्रा तत्सर्वमत्रिजः अष्टौनिन्दितसंख्याते व्याजहार पुनर्वसुः ॥ ६२॥

निन्दित पुरुष, इनमें जो दो ( स्थूल और कृश ) अधिकनिद्रानिन्दितहितकारीनिन्दितहै, होने का का कारण, दोनों के दोष, औषध, जिनके न लियेआने की औषध और जिनके लिये अहितकारी, अति नींद और नींद के होती है, इन सब जिसबातों कारणको आत्रेयसे नींदऋषिआतीने ' अष्टौहै, जिसजिसनिन्दित' नामकप्रकारअध्यायमेंसे उत्पन्नकह दिया ॥६०-६२/ इत्यन्निवेशकृते तन्त्र चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के अनिन्दितीयो नाम एकविंशतितमोध्यायः ॥२१॥

पृष्ठ 274

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२५६ चरकसंहिता [ ० २२ द्वाविंशतितमोऽध्यायः अथातो लक्ष्घनबृंहणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥२॥

अब लंघनबृंहणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥

तपःस्वाध्यायनिरतानात्रेयः शिष्यसत्तमान् ।

षडग्निवेशप्रमुखानुक्तवान् परिचोदयन् ॥ ३ ॥

लङ्घनं बृंहणं काळे रूक्षणं स्नेहनं तथा ।

स्वेदनं स्तम्भनं चैव जानीते यः स वै भिषक् ॥ ४ ॥

आत्रेय महर्षि तपश्चर्या और स्वाध्याय में मग्न हुए, अग्निवेश आदि प्रमुख एवं उत्तम छः शिष्यों के ज्ञान के लिये कहने लगे -जो लंघन, बृंहण, रूक्षण, स्नेहन, स्वेदन एवं स्तम्भन क्रियाओं के समय तथा विधि को जानता है, वही बैद्य है ॥ ३-४ ॥

तमुक्तवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच ह ।

भल्लङ्घनं किंल्लिङ्घनीयाश्च कीदृशाः ॥ ५ ॥

बृंहणं वृंहणीयाश्च रूक्षणीयाश्च रूक्षणम् ।

स्नेहनं स्नेहनीयाश्च स्वेदाः स्वेद्याश्च के मताः ॥ ६ ॥

स्तम्भनं स्तम्भनीयाश्च वक्तमईसि तद् गुरो ।

लषनप्रभृतीनां च षण्णामेषां समासतः ॥ ७ ॥

कृताकृतातिरिक्तानां लक्षणं वकुमर्हसि । इस प्रकार कहते हुए आत्रेय ऋषि से अग्निवेश ने कहा कि भगवन् लंघन किस प्रकार का होता है और कौन पुरुष लंघन के योग्य हैं? वृंहण क्या है और बृंहणीय चिकित्सा के योग्य कौन हैं? रूक्षण क्या है और रूक्षणीय कौन हैं? स्नेहन क्या है और स्नेहनीय कौन हैं? स्वेदन क्या है और स्वेदनीय कौन हैं? स्तम्भन क्या है और स्तम्भनीय पुरुष कौन हैं? हे गुरो! यह सब आप कहिये । इन छः लंघन आदि के लक्षण संक्षेप में कहिये । सम्यक् प्रकार से किये, न किये और अति किये हुए के लक्षण भी आप कहें ॥ ५-६ ॥ वचस्तदग्निवेशस्य निशम्य गुरुरब्रवीत् ॥ ८ ॥

यत्किंचिल्लाघवकरं देहे तल्लङ्घनं स्मृतम् ।

वृहस्वं यच्छरीरस्य जनयेत्तश्च बृंहणम् ॥ ६ ॥

रौक्ष्यं खरत्वं वैशद्यं यत्कुर्यात्तद्धिरूक्षणम् ।

पृष्ठ 275

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So DR ] १७ नम् wwww स्नेहनस्तम्भगौरव-स्नेह -विष्यन्दशीतघ्नं- मार्यमस्वेदनं-क्लेदस्वेदकारकम्-कारकम्। ॥ १० ॥

स्तम्भनं स्तम्भयति यद्गतिमन्तं च द्रवम् ॥ ११ ॥

अग्निवेश के वचन को सुनकर गुरु बोले; शरीर के अन्दर जो वस्तु कघुता हल्कापन, उत्पन्न करती है, उसको 'लंघन' कहते हैं । जो वस्तु शरीर में स्थूलता उत्पन्न करती है, उसे 'बृंहण' कहते हैं । जो वस्तु शरीर में रूक्षता, कर्कशता और विशदता, पृथक्त्व उत्पन्न करती है, वह रूक्षण है । शरीर में जो वस्तु चिकास, विष्यन्द, विलयन, कोमलता और क्लिन्नता उत्पन्न करती है, वह स्नेहन है, जो वस्तु शरीर में जड़ता उत्पन्न करे, भारीपन करे शीत का नाश करे तथा पसोना लाये वह 'स्वेदन' है । जो वस्तु गतिशील, थोड़ी सी यति को, द्रव को रोक देती है, वह स्तम्भन है ॥ ८-११ ॥

लघुष्णतीक्ष्णविशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं सरम् ।

कठिनं चैव यद् द्रव्यं प्रायस्तञ्जनं स्मृतम् ॥ १२ ॥

गुरुशीतमृदुस्निग्धं बद्दलं स्थूलपच्छिलम् ।

प्रायो मन्दं स्थिरं णं द्रव्यं बृंहणमुच्यते ॥ १३ ॥

रूक्षं लघु खरं तीक्ष्णमुष्णं स्थिरमपिच्छिलम् ।

प्रायशः कठिनं चैव यद् द्रव्यं तद्धि रूक्षणम् ॥ १४ ॥

द्रवं सूक्ष्मं सरंस्निग्धं पिच्छिलं गुरु शीतलम् ।

प्रायो मन्दं मृदु च यद् द्रव्यं तत्स्नेहनं मतम् ॥ १५ ॥

उष्णं वीक्ष्णं सरं स्निग्धं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।

द्रव्यं गुरु च यत् प्रायस्तद्धि स्वेदन मुच्यते ॥ १६ ॥

शीतं मन्दं मृदु लक्ष्णं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।

यद् द्रव्यं लघु चोद्दिष्टं प्रायस्तरस्तम्भनं स्मृतम् ॥ १७ ॥

जो वस्तु लघु, गरम, तीक्ष्ण, विशद, रूक्ष, सूक्ष्म, खर ( कर्कश ), सर ( बहने वाळा ) और कठिन हो वह वस्तु प्रायः करके 'लंघन' गुण बाकी होती है भारी, शीतवीर्य, मृदु, स्निग्ध, घन, स्थूल पिच्छिल, चिरकारी ( देर में कार्य करने वाका) स्थिर, चिकना जो पदार्थ होता है, वह प्रायः करके 'बृंहण' होता हे । रूख, लघु, खर, तीक्ष्ण, उष्ण, स्थिर, चिकास रहित और कठिन ग्रम्य है । वह प्रायः करके ' क्षण' होता है 15 जो द्रव्य पतला, सूक्ष्म, बहने वाला, G समान में मुख्य रूप से स्नेह का अभाव रहता है और कंपन में यौव काअभाव रहता है वह दोनों में मुख्म मेद है ।

पृष्ठ 276

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२८ चरकसंहिता [ ० २२ चिकना, स्नेह युक्त, भारी, शीतल, मन्द ( चिरकारी ) और मृदु होता है, वह प्रायः करके 'स्नेहन' होता है । उष्ण, तीक्ष्ण, बहने बाला, स्निग्ध, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव, स्थिर, और भारी जो पदार्थ होता है, वह प्रायः करके 'स्वेदन' होता है । शीत, मन्द, मृदु, श्लक्ष्ण, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव और स्थिर तथा लघु होता है । वह म्य प्रायः करके 'स्तम्भन ' होता है ॥ १२-१७ ॥

चतुष्यकारा संशुद्धिः पिपासा मारुतातपो ।

पाचनान्युपवासश्च व्यायामश्चेति लङ्घनम् ॥ १८ ॥

प्रभूत-श्लेष्म- पित्तास्र -मलाः संस्पृष्टमारुताः ।

गृहच्छरीरा बलिनो लक्ष्धनीया विशुद्धिभिः ॥ १६ ॥

येषां मध्यबळा रोगाः कफपित्तसमुत्थिताः ।

वम्यतीसार-हृद्रोग- विसूच्यलसक- ज्वराः ॥ २० ॥।

विबन्ध -गौरवोद्गार हल्लासारोचकादयः ।

पाचनैस्तान् भिषक् प्राज्ञः प्रायेणाऽऽदावुपाचरेत् ॥२१॥

एव एव यथोद्दिष्टा येषामल्पबला गदाः ।

पिपासानिप्रहस्तेषामुपवासैश्च ताञ्जयेत् ॥ २२ ॥

रोगाञ्जयेन्मध्यबलान् व्यायामातपमारुतैः ।

बलिनां किं पुनर्येषां रोगाणामवरं बलम् ॥ २३ ॥

त्वग्दोषणांप्रमूढानां स्निग्धाभिष्यन्दिबृंहिणाम् ।

शिशिरे लङ्घनं शस्तमपि वातविकारिणाम् ॥ २४ ॥

- चार प्रकार की शुद्धि अर्थात्— वमन, विरेचन, नस्य और आस्थापन बस्तिप्यास का रोकना, वायु और धूप का सहना, पाचन, उपबास और व्यायाम ये शरीर में लघुता उत्पन्न करते हैं । जिन पुरुषों में कफ, पित्त, रक्त और मल बहुत बढ़े हों, जिन को वात रोग हो, जिनका शरीर बहुत बड़ा हो, बलवान् हो, उनको वमन विरेचन आदि संशोधन द्वारा लंघन देना चाहिये और जिन मध्यम बल वाले पुरुषों में कफ, पित्त से उत्पन्न रोग हों, जिन को वमन, अती-सार, हृदय रोग, विसूचिका, अलसक, स्वर, विबन्ध, गौरव, उद्गार, बेचैनी, अरुचि आदि ( अजीर्ण ) हों, उनको वैद्य प्रथम पाचन औषधियों से लंघन देकर चिकित्सा करे । यही रोग यदि अल्पबलवाले पुरुष को हो तो पिपासा के रोकने से और उपवास द्वारा लंघन कराके शान्त कराना चाहिये । मध्यम बकवाले रोगों को व्यायाम, धूप और वायु के सेवन से लंघन कराना चाहिये । इसी प्रकार बलवान् पुरुषों में जब रोग का बळ न्यून हो, तब भी व्यायाम द्वारा लंघन कराना चाहिये | त्वचा के दोष वाले, प्रमेह रोगियों को, स्निग्ध वा अभि-

पृष्ठ 277

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अ० २२ ] सूत्रस्थानम् २५६ व्यन्द अथवा पुष्ट शरीर वाले पुरुष को, एवं बात रोगियों को शिविर काल में लंघन देना उच्चम है । (शिशिर के सामान गुण होने से हेमन्त भी उत्तम है) ।

अदिग्धविद्धमक्लिष्टं वयःस्थं सात्म्यचारिणाम् ।

मृगमत्स्यविहङ्गानां मांसं बृंहणमुच्यते ॥ २५ ॥

क्षीणाः क्षताः कृशा वृद्धा दुर्बला नित्यमध्वगाः ।

श्रीमद्यनित्या प्रीष्मे च बृंहणीया नराः स्मृताः ॥ २६ ॥

शोषा - प्रणदोषैर्व्याधिभिः कर्षिताश्च ये ।

तेषां क्रव्यादमांसानां बृंहणा लघवो रसाः ॥ २७ ॥

स्नानमुत्सादनं स्वप्नो मधुराः स्नेहबस्तयः ।

शर्करा क्षीरसपषि सर्वेषां विद्धि बृंहणम् ॥ २८ ॥

विषयुक्त शस्त्र से न मारे हुए, नीरोगी, जवान, सात्म्यवस्तु को खाने वाले एवंलिये सात्म्यउपयुक्तस्थानहै में। चरनेक्षीण वालेरोगी, मृग, उरःक्षत, मछलीकाया रोगीपक्षियों, कुशका, वृद्धमांस, दुर्बलबृंहण, रोज़के सफर ( परिश्रम ) करने वाले, स्त्रीसेवी, मद्यसेवी पुरुषों का ग्रीष्म काल में बृंहण करना चाहिये । शोष, अर्श, ग्रहणीरोग के कारण जो पुरुष निबंध हो गये हैं, उनको मांस खाने वाले पशु-पक्षियों के मांस से बृंहण करना चाहिये । मांस को संस्कार द्वारा लघु बमा लेना चाहिये, अथवा लघु गुण वाले पक्षी बाज़ आदि का मांस प्रयोग करना चाहिये । स्नान, उबटन, निद्रा मधुर एवं स्नेह युक्त बस्ति या, शक्कर, घी, दूध ये वस्तुएँ सब पुरुषों का बृंहण करती हैं ॥ २८॥

कटु- तित- कषायाणां सेवनं स्त्रीष्वसंयमः ।

खलि-पिण्याक-तत्राणां मध्वादीनां च रूक्षणम् ॥ २६ ॥

अभिष्यन्दा महादोषा मर्मस्था व्याधयश्च ये ।

ऊरुस्तम्भप्रभृतयो रूक्षणीया निदर्शिताः ॥ ३० ॥

कबुए, तीखे, कषाय रस का सेवन, अति स्त्रीसंग, सरसों की खल. तिळ की तक. तक्र और मधु ( शहद ) आदि विरूक्षण करने वाले हैं । कफरोगी, वातरोगी और जिन को मर्म स्थान के रोग ( ऊरुस्तम्भ आढ्यवात, प्रमेह आदि ) हों उनका विरूक्षण उपचार करना चाहिये ॥ २६-३० ॥ * घर में पाळे या रक्खे पक्षी या मछकियों का मांस लाभकर नहीं है । जो पशु-पक्षी अपने स्वाभाविक रूप में रहते हैं और अपना स्वाभाविक आहार लेते हैं; उन का मांस ही लाभदायक है ।

पृष्ठ 278

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२५० चरकसंहिता [ ० २२

स्नेहाः स्नेहविधवा स्वेदाः स्वचाल वे नराः ।

स्नेहाभ्याचे मयोक्तास्ते स्वेदास्ये च सविस्तरम् ॥ ३१ ॥

स्नेह कितने हैं और कौन स्नेह के योग्य हैं? स्वेद कितने हैं और कौन स्वेद के योग्य हैं? ये स्नेह और स्वेद अध्याय में विस्तार से कह दिये हैं ॥ ३१ ॥

द्र i at स्थिरं यावच्छतीकरणमौषधम् ।

स्वादु तिक्कं कषायं च स्तम्भनं सर्वमेव तत् ॥ ३२ ॥

पित्तक्षाराग्निदग्धा ये वम्यतीसारपीडिताः ।

विषस्वेदातियोगार्त्ताः स्तम्भनीयास्तथाविधाः ॥ ३३ ॥

जो द्रव्य पतला, द्रव, बहने वाला और शीतलता उत्पन्न करने वाला है, तथा मधुर, तिक्त या कषाय रस है, वह सब 'स्तम्भन' है । पिस रोगी, क्षार या अग्नि से जले रोगी, वमन या अतिसार से पीड़ित, विषवेग से या अतिस्वेदन क्रिया से पीड़ित पुरुष स्तम्भन क्रिया के योग्य हैं ॥ ३२-३३ ॥

बात-मूत्रपुरीषाणां विसर्गे गात्रलाघवे ।

हृदयोद्गारकण्ठास्यशुद्धौ तन्द्राक्लमे गते ॥ ३४ ॥

वेदे जाते रुचौ चैव क्षुत्पिपासासहोदये ।

कृतं लङ्घनमादेश्यं निर्व्यथे चान्तरात्मनि ॥ ३५ ॥।

पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च कासः शोषो मुखस्य च ।

क्षुत्प्रणाशोऽरुचिस्तृष्णा दौर्बल्यं श्रोत्रनेत्रयोः ॥ ३६ ॥

मनसःदेहाग्निबलनाशश्चसंभ्रमोऽभीक्ष्णमूर्ध्वधनेऽतिकृतेवातस्तमोभवेत्हृदि ॥। ३७ ॥

अपान वायु, मल-मूत्र का बाहर आना, शरीर में इल्कापन, आमाशय, डकार, गला और मुख के शुद्ध होने पर, आलस्य और निष्क्रियता के नष्ट होने पर, पसीना और भोजन में रुचि उत्पन्न होने पर, भूख और प्यास का एक साथ सहन न होने पर, अर्थात् भूख और प्यास एक साथ लगने पर; मन के प्रसन्न होने पर, सम्यक् प्रकार से लंघन हुआ ऐसा जानना चाहिये । कंपन के अधिक करने से जोड़ों का टूटना, अंगों में पीड़ा, कास, मुख का सूखना, भूख का नष्ट होना, अरुचि, प्यास, कान और आंख में निर्वडता, मन की बेचैनी, चक्कर आना, शरीर के ऊपर के भाग में बारम्बार वायु का बढ़ना, चोर होना, हृदय में अन्धकार ( तमोगुण की अधिकता ), कठन और शरीर के बल का नाश होना ये लंघन के अतियोग से होते हैं ॥ २४-३० ॥

पृष्ठ 279

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०२२ ] सूत्रस्थानम २६१-

पुष्टचुपलम्भय कार्श्वदोषविवर्जनम् ।

क्षणं वृंहिते, स्थौल्यमति चात्यर्थवृंहिते ॥ ३८ ॥

बल, पुष्टि का होना, कृशता के दोषों का दूर हो जाना, ये सम्यक् प्रकार के

बृंहण होने के लक्षण हैं । बृंहण के अतियोग से स्थूलता आती है ॥ ३८ ॥

कृताकृतस्य लिङ्गं यल्लङ्घिते तद्धि रूक्षिते । लंघन के सम्यक्योग और अयोग के जो लक्षण हैं वे ही लक्षण या के

सम्यक् योग और अयोग के हैं ।

स्तम्भितः स्याद्बले लब्धे यथोक्तश्चाऽऽमयैर्जितेः ॥ ३६ ॥

श्यावता स्तब्धगात्रत्वमुद्वेगो हनुसंग्रहः ।

हृद्वचनिग्रहश्च स्यादतिस्तम्भितलक्षणम् ॥ ४० ॥

स्तम्भन क्रिया के योग्य रोगों के शान्त होने पर, बल प्राप्त होने से स्तम्भन भी प्रकार से हुआ जानना चाहिये । स्तम्भन के अतियोग से -काळा रंग, शरीर का जड़ होना, वमन की इच्छा, जबाड़ी का बन्द होना, हृदय का अब- रोध, मल का रुकना ये अतिस्तम्भन के लक्षण हैं ॥ ३६-४० ॥

लक्षणं चाकृतार्यां स्यात् षण्णामेषां समासतः ।

तदौषधानां व्याधीनामशमो वृद्धिरेव च ॥ ४१ ॥

इति षट् सर्वरोगाणां प्रोक्ताः सम्यगुपक्रमाः । साध्यानां साधने सिद्धा मात्राकाळानुरोधिनः ॥ ४२ ॥ इति ।

भवति चात्र - दोषाणां बहुसंसर्गात् संकीर्यन्ते झुपक्रमाः ।

त्वं तु नातिवर्तन्ते त्रित्वं वातादयो यथा ॥ ४३ ॥

तत्र श्लोकः– इत्यिमल्लङ्घनाध्याये व्याख्याताः षडुपक्रमाः ।

यथाप्रश्नं भगवता चिकित्सा यैः प्रवर्तिता ॥ ४४ ॥

लंघन आदि छः क्रियाओं के अयोग से, इन क्रियाओं से शान्त होने वाले रोगों की शान्ति नहीं होती या बढ़ जाते हैं । इन छः क्रियाओं के सम्यक् योग से सब रोग धान्त हो सकते हैं । मात्रा और समय का विचार करके इन क्रियाओं का उपयोग करने से सब साध्य रोग ठीक होते हैं । वातादि दोषों के परस्पर मिलने से बहुत मेद हो जाते हैं, इसलिये चिकित्सा भी बहुत प्रकार की है । जिस प्रकार कि रोग बात आदि तीन को छोड़कर नहीं होते उसी प्रकार चिकित्सा भी इन छः में ही सीमित है । इस लंघनीय अध्याय में क्रियायें प्रश्न के अनुसार भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं ॥ ४१-४४ ॥ इत्यग्निवेशकृते सम्प्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनान्तु नवो नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः ॥ २२ ॥

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चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त, पृष्ठ 280 का मूल पृष्ठ
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२६२ चरकसंहिता [अ० २३

त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ।

अथातः सन्तर्पणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ६ स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

इसके आगे सन्तर्पणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥

संतर्पयति यः स्निग्धैर्मधुरैर्गुरुपिच्छिलः ।

नवान्नैर्नवमद्यैश्च मांसैश्चानूपवारिजैः ॥ ३ ॥

गोरसँगौडिकैश्चान्नैः पैष्टिकैश्चातिमात्रशः ।

चेष्टाद्वेषी दिवास्वप्न शय्यासन -सुखे रतः ॥ ४ ॥

रोगास्तस्योपजायन्ते संतर्पणनिमित्तजाः । जो पुरुष स्निग्ध, मधुर, गुरु और पिच्छिल पदार्थों से शरीर का सन्तर्पण करते हैं, नये अन्न, नवीन मद्य, जलीय प्रदेश में या जलचर प्राणियों के मांस का सेवन, दूध से बने या गुड़ से बने पदार्थों का या पौष्टिक भोजनों का अति उपयोग करते हैं, हाथ पांव हिलाने की क्रिया करना पसन्द नहीं करते, दिन में सोना, आरामतलबी से उठना-बैठना जिन्दगी बसर करना पसन्द करते हैं उनकी सन्तर्पणजन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ३-४ ॥ प्रमेह -कण्डू- पिडकाः कोठ-पाण्ड्वामयज्वराः ॥ ५ ॥

कुष्ठान्यामप्रदोषाश्च मूत्रकृच्छ्रमरोचकः ।

तन्द्रा लैव्यमतिस्थौल्यमालस्यं गुरुगात्रता ॥ ६ ॥

इन्द्रियस्त्रोतसां लेपो बुद्धेर्मोहः प्रमीलकः ।

शोफाचैवंविधाश्वान्ये शीघ्रमप्रतिकुर्वतः ॥ ७ ॥

सन्तर्पणजन्य रोग - प्रमेह, कण्डू, फुन्सियां, कोठ ( वरें के काटे के समान चकले ), पाण्डु रोग, ज्वर, कुष्ठ रोग, विषूचिका आदि, मूत्रकृच्छ्र, अरुचि, तन्त्रा, क्लीनता, अतिस्थूलता, आलस्य, शरीर का भारीपन, इन्द्रिय और स्रोतों का अवरोध, बुद्धिभ्रंश, निरन्तर एक ही बात की चिन्ता, सूजन एवं इसी प्रकार के अन्य रोग शीघ्र प्रतिकार न करने से उत्पन्न हो जाते हैं ।॥ ५-७ ॥

शस्तमुलेखनं तत्र बिरेको रक्तमोक्षणम् ।

व्यायामश्चोपवासच धूमाच स्वेदनानि च ॥ ८ ॥

क्षौद्रश्चाभयाप्राज्ञः प्रायो रूक्षामसेवनम् ।

चूर्णप्रदेहा ये चोकाः कण्डूकोठविनाशनाः ॥ ६ ॥