चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 301–310

चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २०३ विकं सर्पिरयाना, अजाक्षीरं शोषघ्न -स्तन्य-साम्य -दोकन -रक्त-खामा-हिक-रक्त- पित्त-प्रशमनानां, अविक्षीरं श्लेष्मपितोपचयकराणां, महिषी- क्षीरं स्वप्नजननानां मन्दकं दध्यभिष्यन्दकराणां, गवेधुकान्नं कर्षणीया नां, उद्दालकान्नं रूक्षणीयानां" इक्षुर्मूत्रजननानां यथाः पुरीषजननानां, जाम्बवं वातजननानां, शष्कुल्यः श्लेष्मपितजननानां, कुलत्था अम्ल-पित्तजननानां माषाः श्लेष्मपित्तजननानां मदनफलं वमनास्थापनानु-वासनोपयोगिनां, त्रिवृत्सुखविरेचनानां चतुरकुलं मृदुबिरेचनानां, स्नुकूपयस्तीक्ष्णविरेचनानां प्रत्यक्पुष्पा शिरोविरेचनानां विडङ्ग क्रिमिनाना, शिरीषो विषघ्नानां खदिरः कुष्ठन्नानां, रास्ना वातहराणां, आमलकं वयःस्थापनानां, हरीतकी पध्यानां, एरण्डमूलं वृष्यवात-हराणां, पिप्पलीमूलं दीपनीय-पाचनीयानाह-प्रशमनानां, चित्रकमूलं दीपनीय-पाचनीय -गुदशूलशोथार्शो-हराणां,पुष्करमूलं हिका-श्वास्त्र-कास- पार्श्व-शूलहराणां, मुस्तं संग्राहक-दीपनीय-पाचनीयानां उदीच्यं निर्वाप णीय दीपनीय-पाचनीय-च्छर्धतीसार-हराणां,कवङ्गं संग्राहक-दीपनीय- पाचनीयानां अनन्ता संग्राहक- दीपनीय-रक्त -प्रशमनाना, अमृता संग्रा-हक-वातहरदीपनीय इलेष्म शोणित- विबन्ध -प्रशमनानां, बिल्वं संग्राहक-दीपनीयवात -कफ-प्रशमनानां,अतिविषा दीपनीय- पाचनीय संग्राहक सर्व-दोष हराणां, उत्पल-कुमुद-पद्म-किञ्जल्कं संग्राहक रक्त- पित्त-प्रशमनानां, दुरालमा पित्त-श्लेष्म-प्रशमनानां गन्धप्रियङ्गः शोणित -पित्तावियोग- प्रशम-नाना, कुटजत्वक श्लेष्म- पित्त- रक्त -संग्राहकोपशोषणानां,काश्मर्यफलं र कसं- ग्राहक -रक्त- पित्त-प्रशमनानां, श्निपर्णी संग्राहक वातहर दीपनीय वृष्य -णां विदारिगन्धा वृष्यसर्वदोषहरणां, बला संग्राहक -बल्य- वात -हराणां, गोरको मूत्रकृच्छ्रानिलहराणां, हिकुनिर्यासदनीय दीपनीय भेदनी-यानुलोमक - वात-कफ -प्रशमनानां, अम्लवेतसो भेदनीय- दीपनीयानुलोम-क- वात- श्लेष्म-प्रशमनानां, यावशूकः संसनीय पाचनीयार्शोघ्नाना,तक्र।-यासो महणी-दोषार्शो- घृत -व्यापत्प्रशमनानां क्रव्याद मांस- रसाभ्यासो ग्रहणी- दोष-शोषार्शोघ्नानां, घृतक्षीराभ्यासो रसायनानां, समघृतशचुप्रा-शाक्यासो वृष्योदावर्तहराणी, तेलगण्डूषाध्यासो दन्त-चल-रुचिकराणां, दोडुम्बरं दाहनिर्वापणालेपनानां, रास्नागुरुणी शीखापनयन -प्रकेप-नानां, लामज्जकोशीरे दाइत्वग्दोषस्वेदापनयप्रलेपनाना, कुष्ठं बावराम्य- पनाह योगिनां मधु चक्षुष्यवृष्य-देश्य कण्ड्य- वय- विश्वनीय-

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२८४ चरकसंहिता [अ० २५ रोपणीयानां वायुः प्राणसंज्ञाप्रधानहेतूनां अग्निरामस्तम्भ -शीत -शूलो- द्वेपन- प्रशमनाना, जलं स्तम्भनीयानां मृटलोष्टनिर्वापितमुदकं तृष्णा- तियोगप्रशमनानां, अतिमात्राशनमामप्रदोषहेतूनां तथाऽग्न्यभ्यवहारोऽ-ग्निसंधुक्षणानां यथासात्म्यं चेष्टाभ्यवहारावुपसेव्यानां, कालभोजन- मारोग्यकराणां वेगसंधारणमनारोग्यकराणां, तृप्तिराहारगुणानां मद्यं सौमनस्यजननानां, मद्याक्षेपो घी धृति स्मृति-हराणां, गुरुभोजनं दुर्वि- पाकाना, एककालभोजनं सुखपरिणामकराणां स्त्रीष्वतिप्रसङ्गः शोष- द्वारार्णा, शुक्रवेगनिग्रहः षाण्ठ्यकराणां पराघातनमन्नाश्रद्धाजननानां, अनशनमायुषो हासकराणां, प्रमिताशनं कर्षणीयानां अजीर्णाध्यशनं ग्रहणीदूषणानां, बिषमाशनमग्निवैषम्यकराणां, विरुद्धवीर्याशनं निन्दित- व्याधिकराणां प्रशमः पथ्यानां आयासः सर्वापध्यानां मिथ्यायोगो व्याधिमुखानां, रजस्वलाभिगमनमलक्ष्मीमुखानां ब्रह्मचर्यमायुष्याणां, सकल्पो वृष्याणां दौर्मनस्यमवृष्याणां अयथाबलमारम्भः प्राणोपरो- धिनां विषादो रोगवर्धनानां, स्नानं श्रमहराणां, हर्षः प्रीणनानां, शोकः शोषणानां निर्वृतिः पुष्टिकराणां, पुष्टिः स्वप्नकराणां, स्वप्नस्तन्द्राकराणां, सर्वरसाध्यासो बलकराणां, एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकराणां, गर्भशल्य- मनाहार्याणां, अजीर्णमुद्धार्याणां, बालो मृदु भेषजीयानां वृद्धो याप्यानां, गर्भिणी तीक्ष्णौषध-व्यायाम वर्जनीयानां सौमनस्यं गर्भधारकाणां संनिपातो दुश्चिकित्स्यानां आमो विषमचिकित्स्यानां, ज्वरो रोगाणां, कुष्ठं दीर्घरोगाणां, राजयक्ष्मा रोगसमूहानां प्रमेहोऽनुषङ्गिणां, जलौ- कसोऽनुशस्त्राणां, बस्तिस्तन्त्राणां, हिमवानौषधिभूमीनां, मरुभूरारोग्य- देशानां, अनूपोऽहितदेशानां निर्देशकारित्वमातुरगुणानां भिषक् चिकित्साङ्गानां नास्तिको वर्ज्यानां, लौल्यं क्लेशकराणां, अनिर्देशिका- रित्वमरिष्टानां अनिर्वेदो वार्तलक्षणानां वैद्यसमूहो निःसंशयकराणां, योगो वैद्यगुणानां विज्ञानमोषधीनां शास्त्रसहितस्तर्कः साधनानां, संप्रतिपत्तिः कालज्ञान प्रयोजनानां अव्यवसायः कालातिपत्तिहेतूनां दृष्टकर्मता निःसंशयकराणां, असमर्थता भयकराणां तद्विद्यसंभाषा बुद्धिवर्धनानां, आचार्यः शास्त्राधिगमहेतूनां आयुर्वेदोऽमृतानां, सद्वचनमनुष्ठेयानां, असंबद्धवचनमसंग्रहणसर्वाहितानां सर्वसंन्यासः सुखानामिति ॥ ३८ ॥

अब तक सब प्रकार के हितकारी वा अहितकारी मुख्य-मुख्य द्रव्य कहे हैं ।

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अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८५ अब इसके आगे बस्ति आदि कर्मों में तथा ओषधियों में मुख्य रूप से अनुवन्ध सहित द्रव्यों की व्याख्या करेंगे - शरीर की स्थिति करने वाले सब पदार्थों में अन्न श्रेष्ठ है । धैर्म्य, उत्साह पैदा करने वाले सब पदार्थों में पानी, थकान मिटाने वाले सब पदार्थों में शराब, जीवन देने वाले पदार्थों में दूध, बृंहण करने वालों में मांस, अन्नद्रव्य भोजन में रुचि उत्पन्न करनेवालों में नमक, हृदय को पसंद आने वालों में अम्ल रस, बलकारक वस्तुओं में कुक्कुट, वृष्य ( शुक्रवर्धक ) वस्तुओं में नक ( मकर ) का वीर्य, कफ- पित्तनाशक वस्तुओं में मधु, वातपित्तनाशकों में घी, वात-कफनाशक वस्तुओं में तेल, कफनाशक वस्तुओं में विरेचन, वातनाशक वस्तुओं में बस्तिकर्म, कामलता उत्पन्न करने वालों में स्वेदन, स्थिरता करनेवालों में व्यायाम, पुरुषत्व नाश करने वालों में क्षार, अन्न के अन्दर अरुचि करने वाले पदार्थों में तिन्दुक, आवाज़ या गला बिगाड़ने वाले पदार्थों में कच्चा कैथ, हृदय के लिये ग्लानि-कारक अप्रिय वस्तुओं में भेड़ का घी; घोषनाशक, दूध के लिये हितकारी दोषनाशक, रक्त बन्द करने वालों, रक्त- पित्तनाशक वस्तुओं में बकरी का दूध; अभिष्यन्द अर्थात् कफवर्द्धक वस्तुओं में मन्दक दही, १ कृश करने वाली वस्तुओं में गवेधुक ( कसई), कफ रित्त को बढ़ाने वालों में मेद का दूध, नींद लाने वालों में भैंस का दूध, विरूक्षता पैदा करने वालों में जंगली कोदों ( वनकोद्रव ), मूत्र लाने वालों में गन्ना, मल लाने वालों में जौ, बात पैदा करने वालों में जामुन, कफ पिच पैदा करने वालों में तिल में तले हुए बड़े या कचौरी, अम्लपित्त पैदा करने वालों में कुलथी, कफ पित्त करने वालों में उड़द, वमन, आस्थापन और अनुवासन के लिये उपयोगी वस्तुओं में मैनफल, सुखपूर्वक विरेचन करने वालों में निशोथ; मृदु विरेचकों में अमलतास, तीक्ष्ण विरेचक वस्तुओं में थोर का दूध, शिरोविरेचनों में चिरचिटे के चावल, कृमि-नाथकों में वायविडंग, विषनाशकों में शिरीष ( सिरस ), कुष्ठ रोग नाशकों में खैर, वातनाशकों में रास्ना, आयु स्थिर करने वालों में आंवला, पथ्य हितकारी वस्तुओं में छोटी हरड़; वृष्य, वातनाशक वस्तुओं में एरण्ड की जड़ दीपन पाचन, अफारे को नाश करने वाली वस्तुओं में पिप्पलीमूल; दीपन, पाचन, गुदा की शोथ, बवासीर और शूलनाशक वस्तुओं में चित्रकमूल; हिका, श्वास, काल और पार्श्वशूळ नाशक द्रव्यों में पुष्कर मूल; संग्राहक, दीपन, पाचन गुण १. मन्दक -मन्द हुई दूध में पांच गुना पानी मिलाकर जो दही बनाई जाय ।

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२०६ चरकसंहिता [ अ० २५ वाकी वस्तुओं में नागरमोया; निर्वापण ( दाह को कम करनेवाली ) दीपन, पाचन, वमन, अतिसार को नष्ट करनेवाली वस्तुओं में नेत्रवान; संग्राहक, पाचन और दीपनीय वस्तुओं में टेटू ( स्वोनाक ); संग्राहक, रक्त पिचनाशक वस्तुओं में सारिवा; संग्राहक, दीपनीय, वात-कफ-रक्त और विबन्धनाशक वस्तुओं में गिलोय, संग्राहक, दीपन, बात कफनाशक वस्तुओं में बेलगिरी; दीपन, पाचन, संग्राहक सर्वदोषनाशकों में अतीस; संग्राहक, रक्त -पिशनाशक वस्तुओं में नील कमल; कमल श्वेत, पद्म का केशर ( कमल केशर ); पित्त-कफनाशक वस्तुओं में धमासा; रक्त-पित्त के अतियोग को कम करने बाली वस्तुओं में:गन्धपियंगू ( घेउला ); कफ- पित्त- रक्त संग्राहक, शुष्क करने वाली वस्तुओं में कुड़े की छाल, रक्तसंग्राहक, रक्त -पित्तनाशक वस्तुओं में गम्भारी का फल्ल; संग्राहक, वातनाशक, दीपनीय और शुक्रवर्धक वस्तुओं में पृश्निपर्णी; वृष्य और सर्वदोषनाशक वस्तुओं में विदारीकन्द, संग्राहक, बलकारक, वातनाशक वस्तुओं में बला ( खरेंटी ); मूत्रकृच्छ्र, वायुनाशक वस्तुओं में गोखरू, छेदनीय, दीपनीय, आनुलोमिक ( वायु मल- मूत्र का अनुलोमन करने वाले ), बात-कफनाशक वस्तुओं में अम्लवेतस मलनिःसारक, पाचनीय अर्शनाशक वस्तुओं में यवचार; ग्रहणी -दोष, अर्थ, घृतजन्य रोगों की शान्ति के लिये तक्र का अभ्यास अर्थात् सतत सेवन; ग्रहणी रोग, शोष, अर्श नाशक वस्तुओं में व्याघ्र आदि मांस खाने वाले पशुओं का मांस; रसायनों में दूध और घी का सततसेवन; उदावर्त्तनाशक और हृष्यकारक वस्तुओं में बराबर घो और सत्तaको खाना; दांतों को बल और रुचि, चमक, कान्ति पैदा करने की वस्तुओं में तैल के कोगले करना; दाइ जलन को शान्त करने लिये चन्दन और गूलर का लेप; शीत को दूर करने वाले लेपों में चन्दन और अगर का लेप; जलन में त्वग्-रोग, पसोने को दूर करने वाले लेपों में कत्तण और खस का लेप, वातनाशक मर्दन और लेप के प्रयोग में कूठ; आंखों के लिये हितकारी, वृष्य केश्य, कण्ठ के हितकारी वर्ण, बल और विरजनीय ( रंग पैदा करने ) और शेपण करने वाली वस्तुओं में मुलैठी; प्राण वा जीवन देने वाली वस्तुओं में वायु; आमविकार, मल मूत्रादि का अवरोध, ठण्ड, शूल, कम्पन को दूर करने के लिए आग का सेक; स्तम्भक पदार्थों में जल; प्यास की अधिकता को कम करने के लिये मिट्टी के ढेले वा पत्थर को खूब गरम करके बुझाया हुआ पानी! पिकाना; आम रोग को करने वाले कारणों में बहुत अधिक खाना; अग्निवर्धक बस्तुओं में जाठराग्नि के मकानुसार खाना; सेध्य, उपयोगी वस्तुओं में अपनी

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७० २५ सूत्रस्थानम् २८७ प्रकृति के अनुसार आहार विहार करना; आरोग्यकारक वस्तुओं में, समय पर भोकम करना; अनारोम्पोत्पादक वस्तुओं में, वेगों का रोकना मन की प्रसन्नता करने वालों में मद्य; बुद्धि, धैर्य्य और स्मृतिनाशक वस्तुओं में, मय का अधिक उपयोग; पचने में कठिन वस्तुओं में, गुरु, गरिष्ठ भोजन; सुगमता से पचाने बाकी वस्तुओं में, एक समय भोजन करना; शोष और क्षय करने वाली वस्तुओं में, स्त्री संग की अधिकता; नपुंसक करनेवाले कारणोंमें शुक्र के उपस्थित वेग को रोकना अन्न में अश्रद्धा पैदा करने वालों में वधस्थान; आयु का ह्रास करने वाले कारणों में न खाना; क्षीण, निर्बल करने वालों में थोड़ा खाना; ग्रहणी राग को करने वाले कारणों में अजीर्णावस्था में अध्यशन अर्थात्खाने के ऊपर ; ( खाना अनि को कारणों ठीक न विषमनिन्दितकरने रोगों वालेको पैदा करनेमें विषममें विरुद्ध वीर्यसमय ( जैसेपर खानाऔर); ( आदि);; खानामछली आदिकुष्ठ वस्तुओं का खाना सब पथ्यों में शान्ति सब अपथ्यों में दूधपरिश्रम थकान ( शक्ति से बाहर परिश्रम करना ); व्याधियों में मुख्य वमन, विरेचन, आहार-विहार का मिथ्यायोग; दारिद्र या अमंगलता के कारणों में रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग; आयुवर्धक वस्तुओं में ब्रह्मचर्य; हृष्य-वस्तुओं में संकल्प; अवृष्य वस्तुओं में मन की अप्रसन्नता; प्राणहारक वस्तुओं में बल से बाहर काम करना; रोग के बढ़ाने में शोक; श्रमनाशक वस्तुओं में स्नान; प्रीणन, पुष्टिकारक वस्तुओं में प्रसन्नता; सुखाने वाली वस्तुओं में शोष; पुष्ट करने वाली वस्तुओं में बेफिकरी ( सन्तोष ); नींद लाने वाली वस्तुओं में पुष्टि; आलस्य करने वाली वस्तुओं में नींद; बलकारक वस्तुओं में सब रसों का अभ्यास, निर्बल करने वालों में एक ही रस का निरन्तर सेवन; आनाहा अर्थात् खींच कर निकालने में अयोग्य वस्तुओं में गर्भ रूपी शल्य; बाहर निकालने वाली वस्तुओं में अजीर्ण, कोमल औषधियों के उपचार में बालक; याप्य रोगों में वृद्ध; तीक्ष्ण वेग की औषध और व्यायाम त्याग करनेवालों में गर्भिणी; गर्भ स्थिर कराने वालों में मन की प्रसन्नता; दुश्चिकित्स्य रोगों में सन्निपात जन्य रोग; विषम चिकित्सा ( कठिन ) व ले रोगों में आमजन्य रोग; सब रोगों में ज्वर; दीर्घ रोगों में कुष्ठ; रोग समूहों में राजयक्ष्मा; आनुषविक रोगों में प्रमेह; अनुशस्त्रों में, जोंक, तंत्रों में बस्ति; औषध भूमियों में हिमालय, आरोग्य देशों में मरुभूमि; अहितकारी देशों में जल-माय प्रदेश ( जैसे बंगाल ), रोगी के चारों गुणों में वैद्य के आदेशानुसार काम करना; चिकित्सा के चारों अंगों में बैद्य; त्याज्य वस्तुओं में नास्तिक; दुःखदायक कारणों में कोम; अरिष्ट अर्थात् मृत्यु- कारणों में कई के अनुसार न चलना; रोग

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२८८ चरकसंहिता [अ० २५ 1 के लक्षणों में मन की दुश्चिन्ता, शोक, सन्देह मिटानेवालों में वैद्यों का समूह अर्थात् बहुत वैद्यों का होना; वैद्य के गुणों में देश काल के अनुसार चिकित्सा करना; औषधियों में यथार्थ ज्ञान; ज्ञानसाधनों में शास्त्र सहित तर्क; काल ज्ञान समयानुसार काम करना; व्यवसाय न करना समय के नाश करने वाले कारणों में, कर्म का देखना सन्देह को मिटाने वाली वस्तुओं में भय करनेवाले काय्योंमें असामर्थ्य; बुद्धि बढ़ाने वाले कारणों में उस विद्या को जानने वालों से बात- चीत; शास्त्र के तत्त्व को जानने के लिये आचार्य; अमृतों में आयुर्वेद, कर्त्तव्य कार्यों में उत्तम सत्य वचन, सब अहितकारी वस्तुओं में ' असत्य' का सेवन; सब प्रकार के सुखों में; संन्यास ( सर्वस्व त्याग ) श्रेष्ठ अर्थात् श्रेयस्कर है ||

भवन्ति चात्र-अभ्याणां शतमुद्दिष्टं यद् द्विपञ्चाशदुत्तरम् ।

अलमेतद्विकाराणां विधातायोपदिश्यते ॥ २६ ॥

इस प्रकार से १५२ ( एक सौ बावन ) श्रेष्ठ पदार्थ कहे हैं, ये विकार अर्थात् रोगों के नाश करने के लिये पर्याप्त हैं ॥ ३६ ॥

समानकारिणो येऽर्थास्तेषां श्रेष्ठस्य लक्षणम् ।

ज्यायस्त्वं कार्यकारित्वेवरत्वं चाप्युदाहृतम् ॥ ४० ॥

वातपित्तकफेभ्यश्च यद्यत्प्रशमने हितम् ।

प्राधान्यतश्च निर्दिष्टं यद् व्याधिहरमुत्तमम् ॥ ४१ ॥

एतन्निशम्य निपुणं चिकित्सां संप्रयोजयेत् ।

एवं कुर्वन् सदा वैद्यो धर्मकामौ समश्नुते ॥ ४२ ॥

पथ्यं पथोऽनपेतं यद्यथोक्तं मनसः प्रियम् ।

यच्चाप्रियमपथ्यं च नियतं तन्न लक्षयेत् ॥ ४३ ॥

मात्रा -काल- क्रिया- भूमि- देह -दोष-गुणान्तरम् ।

प्राप्य तत्तद्धि दृश्यन्ते ते ते भात्रास्तथा तथा ॥ ४४ ॥

तस्मात्स्वभावो निर्दिष्टस्तथा मात्रादिराश्रयः ।

तदपेक्ष्योभयं कर्म प्रयोज्यं सिद्धिमिच्छता ॥ ४५ ॥

जो पदार्थ शरीर के दोषों को समान करते हैं, या समान अवस्था में रहने देते हैं वे श्रेष्ठ का लक्षण है । इन के कार्य करने की शक्ति से ही श्रेष्ठ और हीन भेद किये हैं । ( यथा -लोहितशाख्यः शूकधान्यानां श्रेष्ठतमाः, उदकमा- श्वासकराणां श्रेष्ठम् ) । इसी प्रकार वात, पित्त, कफ के नाश के लिये जो वस्तु -मुख्य रूप में श्रेष्ठ है और जो रोग को नष्ट करने के लिये उत्तम है, इन को •जानकर चिकित्सा का आरम्भ करना चाहिये । इस प्रकार करने से वैद्य को

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अ ० २५ ] १६ सूत्रस्थानम २८६ धर्म और काम दोनों मिलते हैं । शरीर और मन के लिये जो प्रिय या हितकर हों, वे पथ्य हैं और जो शरीर और मन के लिये अप्रिय हों वे आरभ्य हैं, ऐसा लक्षण नहीं समझना चाहिये । क्योंकि मात्रा ( जैसे घृत पथ्य होते हुए भो अधिक मात्रा में अपथ्य है ), काल ( वसन्त में भी अपथ्य है ), क्रिया ( घृत विरुद्ध द्रव्य के साथ अपथ्य है ), भूमि ( जल बहुत देश में अपब्य है ) । देह ( अतिस्थूल शरीर में घी अपथ्य है ), दोष ( कफ दोष में घी अपथ्य है ) से मेद हो जाता है । इसी प्रकार विष भी पथ्य हो जाता है ( यथा-'उदरे विषं तिलं दद्यात् । उदर रोगों में तिलमात्र विष देना चाहिये ) । इस प्रकार पथ्य वस्तु अपथ्य हो जाती है और अपथ्य वस्तु पथ्य बन जाती है, इसलिये जो वैद्य यश की इच्छा करते हों, उन को वस्तु के स्वभाव, प्राकृतिक गुण और मात्रा, काल आदि का विचार करके प्रयोग करना चाहिये ॥ ४०-४५ ॥ तात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरपि भगवन्तमात्रेयमनि-वेश उवाच - यथोद्देशमभिनिर्दिष्टः केवलोऽयमर्थो भगवता श्रुतस्त्व-स्माभिः । आसवद्रव्याणामिदानीं लक्षणमनतिसंक्षेपेणोपदिश्यमानं शुश्रूषामह इति ॥ ४६ ॥

आत्रेय ऋषि के वचन को सुनकर फिर भी अनिवेश भगवान् आत्रेय मुनि से पूछने लगे । हे महाराज! आपने प्रतिज्ञानुसार पथ्यापथ्य का प्रधान विषय सम्पूर्ण रूप से प्रतिपादन कर दिया है । इस समय आसव द्रव्यों के लक्षणों को विस्तार में आपसे सुनना चाहते हैं ॥ ४६ ॥

तमुवाच भगवानात्रेयः -धान्य- फल-मूल- सार-पुष्प-काण्ड-पत्र स्वचो भवन्त्यासवयोनयोऽग्निवेश! संग्रहेणाष्टौ शर्करानवमीकाः, वास्वेव द्रव्य- संयोगकरणतोऽपरिसंख्येयासु यथापथ्यतमानामासवानां चतुरशीतिं निबोध । तद्यथा - सुरा सौवीर- तुषोदक- मैरेय मेदक-धान्याम्लाः षड् धान्यासवा भवन्ति, मृद्वीका- खर्जूर-काश्मर्थ धन्वन-राजादन-तृणशून्य- परूषकाभयामलक-मृगलिण्डिका-जाम्बव- कपित्थ- कुषल - बदर -कर्कन्धु- पील -पियालपनस-म्योधाश्वस्थ प्लक्ष-कपीतनादुम्बराजमोद -शृङ्गाटक-शनिमि: फळासवाः षड्विंशतिः । विदारिगन्धाश्वगन्धा-कृष्णनन्धा- .शतावरी. श्यामा त्रिवृद्दन्वी बिल्वोरुबुक चित्रक मूलैरेकादश मूलासवाः । शाखप्रियकार व कर्ण चन्दनस्यन्दन खदिर - कदर- सप्तप मर्जुनासनारिमेव विन्दुक-किणिही-रामी-शुक्ति-शिशपा-शिरीष वन्जुल-भिन्वन-मधूकैः सारासवा विंशतिः । पद्मोत्पख नलिन कुमुद -सौगन्धिक-

पृष्ठ 308

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चरकसंहिता [अ० २५ पुण्डरीक शतपत्र मधूक-प्रिय- धातकीपुष्पैर्दश पुष्पासवा भवन्ति । इक्षु-काण्डेक्ष्विक्षुबालिका- पुण्ड्रक- चतुर्थाः काण्डासदा भवन्ति । पटोल-ता-डपत्रासवौ द्वौ भवतः । तिल्वक लोधैलवालुक-क्रमुक - चतुर्थास्त्वगासवा भवन्ति, शर्करासब एक एवेति । एवमेषामासवानां चतुरशीतिः परस्प रेणासंसृष्टानामासवद्रव्याणामुपनिविष्टा भवति । एषामासवानामासु-तत्वादासवसंज्ञा । द्रव्य-संयोग-विभागस्त्वेषां बहुविकल्पः संस्कारश्च । यथास्वं योनिसंस्कारसंस्कृताचाऽऽसवाः स्वकर्म कुर्वन्ति । संयोग- संस्कार- देश- काल -स्थापन मात्रादयश्च भावास्तेषां तेषामासखानां ते ते समुपदिश्यन्ते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्येति ॥ ४७ ॥

अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा- हे अग्निवेश! संक्षेप से उन सब के उत्पत्ति स्थान ६ ( नौ ) हैं । यथा - धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड, पत्र, त्वचा, ( छाल ) और शर्करा । इन्हीं में द्रव्यसंयोग ( मिश्रण ), करण ( संस्कार ) द्वारा असंख्येय आसव बन जाते हैं । इनमें अधिक हितकारी (मुख्य ) आसव २४ ( चौबीस ) हैं । उनको कहते हैं- सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मैरेय और मेदक और धान्याम्ल-ये छः धान्या-म्बुक ( कांजी ) आसव होते हैं ॥ द्राक्षा, खजूर, गम्भारी, धान्वन, राजादन ( खिरनी ), तृणशून्य ( केतकी ), परूषक ( फालसा ), अभया ( हरड़ ), आमलक ( आंवला ), मृगलिण्डिका ( बहेड़ा? ), जाम्बव ( जामुन ), कपित्थ ( कैथ ), कुवल ( बड़ा बेर ), बदर ( छोटा बेर ), कर्कन्धु ( झाड़ी का बेर ), पीलु, पियालु ( प्याल ), पनस ( कटहल ), न्यग्रोध ( वद ), अश्वत्थ (पीपल ), अक्ष ( पिलखन ), कपीतन, उदुम्बर ( गूलर ), अजमोद ( अजवायन ), शृङ्गाटक ( सिंघाड़ा ), और शंखिनी, ये उम्बीस फलासव हैं । विदारीगन्धा ( शालपर्णी ), अश्वगन्धा ( असगन्ध ), कृष्णागन्धा ( शोभाञ्जन ), शतावरी, निशोथ, जमालगोटा, द्रवन्ती ( मुगलई ऐरण्ड ), बेलगिरी, एरण्डमूड, चीतामूल, ये ग्यारह मूलासव हैं । बढ़ासाल, अश्वकर्ण ( साल भाग ), चन्दन, तीनस, खैर, सफेद खैर, सलबन, अर्जुन, असन, अरिमेद ( विट् खदिर ), तिन्दुक, किणिही ( अपामार्ग ), शमी ( जंड ), शुक्ति ( बेर ), शीशम, सिरस, अशोक, । धान्वन और मुलैठी ये बीस ' सारासव ' है । पद्म ( लाल आठ पत्तों वाला ), उत्पल ( नील कमल ), कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक, ( श्वेत कमल ), तप १. सौवीरं निष्तुषयवकृतम्, मैरेयं सुरासवकृता सुरा, मेदकः श्वेतसुर जगाया, धान्याम्बु ( काजि ) ।

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अ०२५ सूत्रस्थानम कमल, मधूक ( महुवे के फूल ), प्रियंगु, घाय के पुष्प, ये दस 'पुष्पासव' हैं । गना, इक्षुवालिका ( गन्ने के ऊपर का भाग ), गन्ने की जड़, पौण्डा ये चार 'काण्डासव' हैं । परवल और ताड़ के पत्ते ये दो 'पत्रासव' होते हैं । तिल्वक ( शावर लोध ), लोध ( पठानी लोघ ), एलवालुक, क्रमुक ये चार 'त्वगासव ' हैं । शर्करासव एक दी है । इस प्रकार एक एक द्रव्य से बनने वाले ये ८४ ( चौरासी ) आसव हैं । आसुत अर्थात् सत के खिंच जाने से इन को 'आसव ' कहते हैं । द्रव्यों के संयोग और विभाग से ये बहुत प्रकार के और असंख्य बन जाते हैं । आसव अपने संयोग तथा संस्कार के अनुसार अपना कार्य करते हैं । संयोगसंस्कार से अभिप्राय देश ( भस्मराशि, धान्यराशि ), काल ( पन्द्रह दिन, एक मास ), स्थापन ( सन्धान ), मात्रा आदि ( द्रव्यस्वभाव ) से है । कार्य की अपेक्षा से ही आसवों के संयोग संस्कार रूपी कार्य किये जाते हैं ॥ ४७ ॥

भवति चात्र - मनःशरीराग्नि - बल-प्रदानामस्वप्न- शोकारुचि-नाशनानाम् ।

संहर्षणानां प्रवरासवानामशीतिरुक्ता चतुरुत्तरैषा ॥ ४८ ॥

तत्र श्लोक:- शरीररोगप्रकृतौ मतानि तत्वेन चाऽऽहारविनिश्चयो यः ।

उवाच यज्जःपुरुषादिकेऽस्मिन्मुनिस्तथाऽप्रयाणि वरासर्वांश्च ॥ ४६ ॥

मन, शरीर, अनि को बल देनेवाले, नींद न आना, शोक और अरुचि को मिटाने वाले, मन में प्रसन्नता करने वाले ये उत्तम ( श्रेष्ठ ) ८४ आसव कह दिये । शरीर एवं रोगों की उत्पत्ति, ऋषियों के मत, आहार की हिताहित -विधि का अन्तिम सार, पथ्यापथ्य और श्रेष्ठ आसव इस अध्याय में कह दिये हैं । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने अन्नपानचतुष्के यज्जः पुरुषीयोऽध्यायः पश्चविशतितमः समाप्तः ॥

षड्विंशोऽध्यायः ।

अथात आत्रेयभद्रकाप्यीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

अब 'भद्रकाप्यीय' अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आय ने कहा था ॥ १-२ ॥

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२६२ चरकसंहिता [ अ० २६ www

आत्रेयो भद्रकाप्यश्च शाकुन्तेयस्तथैव च ।

पूर्णाक्षश्चैव मौद्गल्यो हिरण्याक्ष कौशिकः ॥ ३ ॥

यः कुमारशिरा नाम भरद्वाजः स चानघः ।

श्रीमान् वार्थोविदचैव राजा मतिमतां वरः ॥ ४ ॥

निमिव राजा वैदेहो वडिशा महामतिः ।

काङ्कायनश्च बाह्लीको बाह्रीकभिषजां वरः ॥ ५ ॥

एते श्रुतवयोवृद्धा जितात्मानो महर्षयः 1 चैत्ररथे रम्ये समीयुविजिहीर्षवः ॥ ६ ॥

तेषां तत्रोपविष्टानामियमर्थवती कथा ।

बभूवार्थविदां सम्यप्रसाहारविनिश्चये ॥ ७ ॥

आत्रेय, भद्रकाप्यीय, शाकुन्तेय, पूर्णाक्ष, मौद्गल्य, हिरण्याक्ष, कौशिक, भरद्वाज कुमारशिर, विद्वच्छ्रेष्ठ वायविद, वैदेहमहाराज निभि, महाराज बडिश, बाह्रीक देशी भिषजों में श्रेष्ठ बाह्लीक ( बलख देशीय ), कांकायन ये ज्ञानवृद्ध वयोवृद्ध और जितेन्द्रिय महर्षि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में बिहार करते थे । वहां इन के एक साथ बैठने पर रस द्वारा आहार के निर्णय करने के लिये आपस में गोष्ठी आरम्भ हुई ॥ ३७॥

एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यो यं पञ्चानामिन्द्रियार्थानामन्य- तमं जिह्वावैषयिकं भावमाचक्षते कुशलाः, स पुनरुदकानन्य इति । द्वौ रसाविति शाकुन्तेयो ब्राह्मणश्छेदनीयश्चोपशमनीयश्चेति । त्रयो रसा इति पूर्णाक्षो मौद्गल्यश्छेदनीयोपशमनीयां साधारणश्चेति । चत्वारो रसा इति हिरण्याक्षः कौशिकः स्वादुहिंतश्च स्वादुरहितश्चास्वादुर्द्दि- तश्चेति । पञ्च रसा इति कुमारशिरा भरद्वाजा भौमोदकाग्नेयवायवी- यान्तरिक्षाः । षडूसा इति निमिर्वैदेहो मधुराम्ल लवण-कटुक- तिक्तकषाय- क्षार| | अष्टौ रसा इति बडिशो धामार्गवो मधुराम्ललवण-कटु- तिक्त-क- पाय-क्षाराव्यक्ताः । अपरिसंख्येया रसा इति काङ्कायानो बाह्लीक भिष क्, आश्रय-गुण-कर्म -संस्वाद- विशेषाणामपरिमेयत्वात् ॥ ८ ॥

भद्रकाप्य ऋषि बोले कि 'रस' एक ही है जिसको कि पांचों इन्द्रियों के विषयों में से एक जिल्हा का ही विषय कहते हैं, वह 'रस' पानी से अभिन्न है । और एक ही है । शाकुन्तेय ब्राह्मण ने कहा कि-'रस' दो हैं, एक छेदनीय और दूसरा उपशमनीय (अर्थात् अपतर्पण कारक और गृहणकारक ) । पूर्णाष्ठ मौदग्ल ऋषि बोले कि तीन रस हैं । यथा - छेदनोय, उपशमनीय और साधारण अर्थात आग्नेय और सौम्य गुणों की समानता से लंघन, बृंहण दोनों कार्य करने वाला । हिर-