चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 311–320
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 311–320
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अ० २६ ] सूत्रस्थानम २९३ ण्याक्ष कौशिक ने कहा कि-'रस' चार हैं । स्वादु ( प्रिय ) हितकारी, स्वादु अहित, अस्वादु हित और अस्वादु अहित । कुमारशिरा भरद्वाज ने कहा कि -रस पांच हैं । भौम ( पृथ्वी का ), उदक ( पानी का ), आज्ञेय (तेज का ), वायवीय ( वायु का ) और आन्तरिक्ष ( आकाश का ) ये पांच रस हैं । राजर्षि वार्योविद बोले — 'रस' छः हैं । गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष । वंदेह निमि ने कहा- रस सात हैं । मधुर, अम्ल, लवण, तिक, कटु, कषाय और क्षार । धामार्गव बडिश बोले-रस आठ हैं । यथा- मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय, क्षार और अव्यक्त । बाह्लीकभित्र कांकायन ने कहा कि-' गुण ( गुरु लघु आदि ), कर्म ( धातु वर्धन क्षयण आदि ), संस्वाद ( रसों के नाना अवान्तर भेद ) भेदों से रस अगणित बन जाते हैं ॥ ८ ॥
षडेव रसा इत्युवाच भगवानात्रेयः पुनर्वसुर्मधुराम्ल लवण-कटु-तित- कषायाः । तेषां षण्णां रसानां योनिरुदकं, छेदनोपशमने द्वे कर्मणी, तयो- मिश्रीभावात्साधारणत्वं, स्वाद्वस्वादुता भक्तिः, हिताहितौ द्वौ प्रभावौ । पचमहाभूतविकारास्त्वाश्रयाः प्रकृति-विकृति-विचार- देश-कालवशाः, तेष्वाश्रयेषु द्रव्यसंज्ञकेषु गुणा गुरु-लघु -शीतोष्ण-स्निग्ध-रूशाद्याः । क्षरणात्हारो नासौ रसः, द्रव्यं तदनेकरससमुत्पन्नमनेकरसं कटुक -ल-वण- भूयिष्ठमने केन्द्रियार्थसमन्वितं करणाभिनिर्वृत्तम् । अव्यक्तीभावस्तु खलु रसानां प्रकृतो भवत्यनुरसेऽनुरससमन्विते वा द्रव्ये । अपरिसंख्ये- यत्वं पुनस्तेषामाश्रयादीनां भावानां विशेषापरिसंख्येयत्वान्न युक्तं, एकैकोऽपि हि पुनरेषामाश्रयादीनां भावानां विशेषानाश्रयते विशेषाप- रिसंख्येयत्वात् । न च तस्मादन्यत्वमुपपद्यते । परस्पर संसृष्ट- भूयिष्ठ- त्वान्न चैषामभिनिर्वृत्तेर्गुणप्रकृतीनामपरिसंख्येयत्वं भवति, तस्मान्न संसृष्टानां रसानां कर्मोपदिशन्ति बुद्धिमन्तः । तचैव कारणमपेक्षमाणाः षण्णां रसानां परस्परेणासंसृष्टानां लक्षणपृथक्त्वमुपदेक्ष्यामः ॥ ६ ॥
पुनर्वसु भगवान् आत्रेय ने कहा कि-रस छः ही हैं । यथा- मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय । इन छः रसों की उत्पत्ति का स्थान पानी ही है । छेदन और उपशमन ये दोनों कर्म हैं, इन दोनों कर्मों के मिल जाने से साधारण हो जाता है । स्वादु और अस्वादु यह रुचि हैं, हित और अहित प्रभाव हैं । पंच महाभूत बिकार हैं । वे रस के आश्रय स्थान हैं, वे रस नहीं 1 गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष ये द्रव्यों में आभित गुण हैं, जो कि प्रकृति ( यथा- मूंग, कषाय और मधुर स्वभाव से ही हैं इसलिये लघु हैं ),
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२६४ चरकसंहिता [अ० २६ विकृति ( चावलों से बने ताज़ा खील लघु और सत्तू बड़े भारी होते हैं), विचार ( द्रव्यान्तर संयोग यथा -मधु और घी का मेल विष बनता है ), देश ( दो प्रकार का है यथा -- भूमि और रोगी । भूमि जैसे– श्वेतकपोती वल्मीकाधिरूढा विषहरी होती है, हिमालय की ओषधियां अधिक गुण युक्त होती हैं, शरीर देश जैसे टांग के मांस से कन्धे आदि का मांस गुरु होता है ) और काल इन के भेद से बनते हैं । क्षार रस नहीं है । क्योंकि क्षरण किया जाने से, अनेक पदार्थों से उत्पन्न होने के कारण अनेक रस होने से, कटुक, लवण आदि रसों का अनुभव होने से, धार में स्पर्श और गन्ध होने से यह द्रव्य है, रस नहीं, और हेत्वन्तर अर्थात् अन्य कारण - भस्म स्राव आदि से बनने के कारण, रस नहीं है । 'अव्यक्त' भी रस नहीं । क्योंकि अव्यक्तता तो कारण में ही है । ( रसों के कारण जल में ही अव्यक्तता है ) । इस के अतिरिक्त अनुरस में अव्यक्तीभाव होता है । रस के पीछे जो रस होता है, वह अनुरस है । यथा-रूक्षः कषायानुरसो मधुरः कफपित्तहा । यथा -वित्र के विषय में ( 'उष्णमनिर्दे- श्रसम्' ) । अथवा अनुरसयुक्त द्रव्य में अव्यक्तता होती है । और जो यह कहा है कि रसों के आश्रय आदि भावों के असंख्य होने से रस भी असंख्य हैं, यह ठीक नहीं । क्योंकि एक- एक रस इन आभय रूपी भावों में से किसी एक भाव का आभय करके विशेष रूप से रहता है ( यथा --चावल, मूंग, घृत, दूध आदि वस्तुओं में मधुर रस के आभय की भिन्नता रहने पर भी मधुरत्व र समान है, जिस प्रकार की बगुला, दूध, और कपास में आश्रय मेद होने पर भी सफेद रंग समान है ) । आभय आदि असंख्य हैं । इसलिये छः से भिन्न अन्य रस का होना सम्भव नहीं । और यदि कहो कि रसों के परस्पर मिलने से रस असंख्य हो जायंगे १ यह भी ठीक नहीं, क्योंकि परस्पर मिलने पर भी इनके गुरु, लघु आदि गुण या मधुर आदि स्वभाव अथवा आयुष्यवर्द्धक आदि असंख्य भेद हो जाते हैं । यहां पर भी मधुर आदि के प्रत्येक के गुण और प्रकृतियां जो कहीं हैं वे ही परस्पर मिलती हैं । इसलिये एक रस के दूसरे रस के साथ मिलने से और दोषों के दूसरे दोषों से मिलने पर भी रस असंख्य, अगणित नहीं होते । इसीलिये मिले हुए रसों के कर्मों का बुद्धिमान् उपदेश नहीं करते । और इसी कारण से परस्पर न मिले हुए छः रसों के लक्षणों को पृथक्- पृथक् कहेंगे ॥ ९ ॥
अग्रे तु तावद् द्रव्यभेदमभिप्रेत्य किंचिदभिधास्यामः । सर्व द्रव्य पाचभौतिकमस्मिन्नेवार्थे तचेतनाबदचेतनं च तस्य गुणाः शब्दादयो
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अ० २६ ] सूत्रस्थानम ०६५ गुर्वादयश्च बान्धाः, कर्म पञ्चविधमुक्तं धमनादि । तत्र द्रव्याणि गुरु- तान्युपचय खर- कठिन--मन्दसंघात-स्थिर-गौरव-विशद-स्थैर्य-सान्द्र-कराणिस्थूल-गन्धगुण-द्रव-स्निग्धबहुलानिपार्थिवानि-शीतमन्द -मृदु -पि-, च्छिल -रस -गुण- बहुलान्याप्यानि तान्युत्क्लेद-स्नेह -बन्ध -विष्यन्द-मार्दव- प्रह्लाद-कराणि उष्ण तीक्ष्ण-सूक्ष्म लघु रूक्ष -विशद -रूपगुण- बहुलाम्याग्ने- यानि विशद सूक्ष्म-तानि -स्पर्शदाह--गुणपाकबहुलानि- प्रभा-प्रकाशवायव्यानि- वर्ण-कराणितानि । रौक्ष्यलघुग्लानि-शीत-रूक्ष-विचार--खर- वैशद्य -लाघव कराणि; मृदु -लघु -सूक्ष्म -श्लक्ष्ण-शब्द-गुण- बहुलान्याकाशा- त्मकानि तानि मार्दव- सौमिर्य-लाघव कराणि ॥ १० ॥
इस के आगे आयुर्वेद के उपयोगी द्रव्यों के भेद को लेकर कुछ कहेंगे -यहां पर जो भी द्रव्य कहेंगे वे सब पांचभौतिक अर्थात् पांच महाभूतों से बने हैं । ये दो प्रकार के हैं, चेतना से युक्त और अचेतन । इस द्रव्य के जहां शब्दादि गुण हैं, वहां गुरु आदि ( बोस ) गुण हैं । द्रव्य का कर्म पांच प्रकार का है । यथा वमन, विरेचन, शिरोविरेचन, आस्थापन, अनुवासन । इन द्रव्यों में जो द्रव्य पार्थिव ( पृथ्वीजभ्य ) है वे गुरु, कर्कश, कठोर, धीमे, स्थिर, विशद, ( पृथक् पृथक्), सान्द्र, स्थूल और गन्ध युक्त इन गुणों वाले प्रायः करके होते हैं । ये पार्थिव पदार्थ उपचय संघात, गौरव ( भारीपन ) और स्थिरता करते हैं । जलीय पदार्थ तरल, स्निग्ध शीत, मन्द, पिच्छिल और जलीयगुण युक्त प्रायः करके होते हैं । ये द्रव्य उक्लद नमी, स्नेह, बन्धन परस्पर मिलाने वाले, कोमलता, प्रह्लाद शरीर इन्द्रियों का तर्पण करनेवाले हैं । अग्नि -गुणयुक्त अर्थात् आग्नेय द्रव्य गरम, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, लघु, रूक्ष, विशद एवं रूप गुण में ( अग्निवत् ) होते हैं । ये द्रव्य जलन, पकाना, कान्ति, प्रकाश और वर्ण ( रंग ) को उत्पन्न करते हैं । वायवीय पदार्थ लघु, शीत, रूक्ष, खर, विशद, सूक्ष्म, स्पर्श गुण ( वायवीय गुण ) वाले होते हैं । ये शरीर में रूक्षता, ग्लानि, विचारों की निर्मलता और लघुता उत्पन्न करते हैं । आकाश गुण वाले द्रव्य मृदु, लघु, सूक्ष्म, त्रांतों में पहुंचाने वाला, चिकना एवं शब्द गुप्प आकाश गुण युक्त होते हैं । ये द्रव्य शरीर में मृदुता, सौर्य ( छिद्राधिक्य ) और लघुता उत्पन्न करते हैं ॥१० ॥
अनोपदेशेन नानौषधिभूतं जगति किंचिद् द्रव्यमुपलभ्यते तां तां सुकिमर्थं च तं तमभिप्रेत्थ । न तु केवलं गुणप्रभावादेव कार्मुकाणि भवन्ति । द्रव्याणि हि द्रव्यप्रभावाद् गुणप्रभावाद् द्रव्यगुणप्रभावाच वस्मि 'स्तस्मिन काळेत तदधिष्ठानमासाद्य तो तोच युक्तिमयं च तं समभिप्रेत्य यष्क-
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२९६ चरकसंहिता [अ० २६ न्ति तत्कर्म येन कुर्वन्ति तद्वीर्य, यत्र कुर्वन्ति तदधिकरणं, यदा कुर्वन्ति स कालः, यथा कुर्वन्ति स उपायः, यत्साधयन्ति तत्फलम् ।११। इस उपरोक्त उपदेश द्वारा जगत् में जो भी द्रव्य मिलते हैं, वे सब उपाय, प्रयोजन के उद्देश्य से औषध समझने चाहियें अर्थात् वे सब द्रव्य दोष-नाशक हैं, निरुपयोगी नहीं हैं । पार्थिवादि द्रव्य केवल गुरु खर आदि गुणों से औषध या दोष नष्ट करने वाले नहीं बन जाते, परन्तु द्रव्य द्रव्य के प्रभाव से, गुण के प्रभाव से, द्रव्य एवं गुण दोनों के प्रभाव से, उस उस समय में, उस अधिष्ठान का आश्रय लेकर, और उस योजना तथा प्रयोजन को लक्ष्य में करके जो करते हैं, उसका नाम 'कर्म' है, यथा - द्रव्य के प्रभाव से दन्ती ( जमालगोटा ) विरेचक है, मणि आदि का धारण बिष को दूर करता है । गुण के प्रभाव से–ज्वर में तिक्त रस, शीत में अभि । द्रव्य एवं गुण के प्रभाव से जैसे - कृष्णाजिन ( काली मृगछाला ) । यहां पर मृगछाला द्रष्य और कृष्ण गुण है । उसपर वे जो कार्य करते हैं । यथा—शिरोविरेचन द्रव्य शिर का विरेचन करते हैं, यह कर्म है । जिस के द्वारा ( उष्ण गुण के द्वारा शिरोविरेचन ) करते हैं वह 'वीर्य ' अर्थात् ' शक्ति' है । जहां कर्म करते हैं, वह 'अधिकरण ' है जैसे शिर जिस समय करते हैं वह 'काल' है । जिस प्रकार करते है वह उपाय है । इस प्रकार से जो सिद्ध करते हैं वह फल है । ११ ॥ भेदचैषां त्रिषष्टिविधविकल्पो द्रव्यदेशकालप्रभावाद् भवति, तमु पदेक्ष्यामः ॥ १२ ॥
रसों के भेद इन छः रसों के द्रव्य प्रभाव से, देश प्रभाव से ( यथा---हिमालय की द्राक्षा और दाडिम मीठे होते हैं दूसरे स्थानों के खट्टे ), काल प्रभाव से ( यथा— कचा आम और कसैला, कुछ बड़ा होने पर भी कच्चा आम खट्टा और पकने पर मीठा, इसी प्रकार हेमन्त में ओषधियां मीठी और वर्षा में खट्टी ), ( ६३ ) मेद बन जाते हैं ॥१२॥ यथा—
स्वादुरम्लादिभिर्योगे शेषैरम्लादयः पृथक् ।
मान्ति पञ्चदशैतानि द्रव्याणि द्विरसानि तु ॥ १३ ॥
दो रस वाले पन्द्रह भेद हैं यथा -स्वादु ( मधुर ) और अम्ल के योग से पांच अम्ल और लवण के योग से चार, लक्षण और कटु के योग से तीन, कटु, तिक और कषाय के योग से दो, तथा तिक्त और कषाय के योग से एक । जैसे--(१) मधुराम्छ ( २ ) मधुरलवण ( ३ ) मधुरकटु ( ४ ) मधुरतिक्त (५) मधुरकषाय ( ६) अमायण (७ ) अम्मकटु ( ८ ) अतित ( १ ) अम्बकषाय ( १०)
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अ० २६ ] सूत्रस्थानम् २६७ लवणकटु ( ११ ) लवणतिक्त ( १२ ) लवणकषाय ( १३ ) कटुतिक्त ( १४ ) कटुकषाय ( १५ ) तिक्तकषाय ॥ १३॥
पृथगम्लादियुक्तस्य योगः शेषैः पृथग्भवेत् ।
मधुरस्य तथाऽम्लम्य लवणस्य कटोस्तथा ॥ १४ ॥
त्रिरसानि यथासंख्यं द्रव्याण्युक्तानि विंशतिः । तीन तीन रसों के २० भेद हैं, जैसे-( १ ) मधुर, अम्ल के साथ लवण आदि चारों का पृथक् २ योग होने से चार मेद । ( २ ) मधुर, लवण के साथ कटु आदि तीन का पृथक् २ योग होने से तीन भेद । ( ३ ) मधुर कटु का कटु, कषाय से पृथक् २ योग होने से दो भेद । ( ४ ) मधुर तिक्त का कषाय से योग होने से एक भेद । ( ४ ) अम्ल लवण का कटु आदि तीन के साथ योग होने से तीन भेद । ( ५ ) अम्ल कटु का तिक्त कषाय दो के साथ पृथक् पृथक् योग होने से दो भेद । ( ६ ) अम्ल तिक्त का कषायसे योग होने से एक भेद । ( ७ ) लवण कटु का तिक्त और कषाय दो से योग होने से दो भेद । ( ८ ) लवण तिक्त का कषाय से योग होने से एक मेद । ( ६ ) कटु तिक्त का कषाय से योग होने से १ भेद । जैसे – ( १) मधुर अम्ल लवण, ( २ ) मधुर अम्ल कटु, ( ३ ) मधुर अम्ल तिक्त ( ४ ) मधुर अम्ल कषाय । ( ५ ) मधुर वणकटु, ( ६ ) मधुर लवण तिक्त, ( ७ ) मधुर लवण कषाय । ( ८ ) मधुर कटुतिक्त, ( ९ ) मधुर कटु कत्राय । ( १० ) मधुर तिक्तकषाय । ( ११) अम्ल कटुतिक्त, ( १२ ) अम्ल कटु कषाय । ( १३ ) अम्ल तिक्त कषाय । ( १४ ) लवण कटुतिक्त, ( १५ ) लवण कटु कषाय । ( १६ ) अम्ल लवण कटु ( १७ ) अम्ल लवण तिक्त ( १८ ) अम्ल लवण कषाय । ( १६ ) कटु तिक्तकषाय, ( २० ) लवण तिक्त कषाय ॥ १४॥
वक्ष्यन्ते तु चतुष्केण द्रव्याणि दश पञ्च च ॥ १५ ॥
स्वाद्वम्लौ सहितौ योगं लवणाद्यैः पृथग्गतौ ।
योगं शेषैः पृथग्यातच तु ष्करसरसंख्यया ॥ १६ ॥
चार रसों के भेद पन्द्रह हैं । यथा--चार रसों ( स्वादु, अम्ल, लवण और कटु ), में एक एक रस का ( कटु, तिक्त, कषाय ) संयोग होने से छः रस बनते । इन में स्वादु और अम्ल रस स्थिर रहते हैं ॥ १५-१६ ॥
सहितो स्वादुलवणौ तद्वत्कट्वादिभिः पृथक् ।
मुको शेषैः पृथग्योगं यातः स्वादूषणौ तथा ॥ १७ ॥
कटवायेंरम्ललवणो संयुक्तौ सहितौ पृथक् ।
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चरकसंहिता [अ० ०६ यातः शेषैः पृथग्योगं शेषैरम्ल कटू तथा ॥ १८ ॥
युज्येते तु कषायेण सविक्तौ लवणोषणौ । स्वादु और लवण के साथ कटु, तिक्त, कषाय के योग से तीन, और लवण को छोड़कर स्वादु, कटु, तिक्त, कषाय के योग से एक, इस प्रकार से दस भेद हुए । अब स्वादु ( मधुर ) रस के छोड़ने से ( अम्ल, लवण इन का कटु, तिक्त, कषाय के साथ योग होने से ) तीन, लवण के छोड़ने से अम्ल, कटु, तिक्त और कषाय के योग से एक और मधुर, अम्ल रस को छोड़ने से लवण, कटु, तिक्त, कपाय, यह एक मेद, इस प्रकार से पन्द्रह भेद बन जाते हैं । जैसे – ( १ ) मधुराम्ललवणकटु, ( २ ) मधुराम्ललवणतिक्त, ( ३ ) मधुराम्ल-लवणकषाय, ( ४ ) मधुराम्लकटुतिक्त, ( ५ ) मधुराम्लकटुकषाय, ( ६ ) मधुराम्ल-तिक्तकषाय, ( ७ ) मधुरलवणकटुतिक्त, ( ८ ) मधुरलवण तिक्तकषाय, ( ६ ) मधुरलवणकषायकटु, ( १० ) मधुरकटुतिक्तकषाय, ( ११ ) अम्ललवणकटुतिक, ( १२ ) अम्ललवणतिक्तकषाय, ( १३ ) अम्ललवण कषायकटु, ( १४ ) अम्ल- कटुतिक्तकषाय, ( १५ ) लवणकटुतिक्तकषाय ॥ १७-१८ ॥ षट्तु पञ्चरसान्याहुरेकैकस्यापवर्जनात् ॥ १६ ॥
षट् चैवैकरसानि स्युरेकं षड्समेव तु ।
इति त्रिषष्टिर्द्रव्याणां निर्दिष्टा रससंख्यया ॥ २० ॥
त्रिषष्टिः स्यात्त्वसंख्येया रसानुरसकल्पनात् ।
रसास्तरतमाभ्यां तां संख्यामतिपतन्ति हि ॥ २१ ॥
संयोगाः सप्तपञ्चाशत्कल्पना तु त्रिषष्टिधा ।
रसानां तत्र योग्यत्वात्कल्पिता रसचिन्तकैः ॥ २२ ॥
एक एक रस के छोड़ने से छः रस बनते हैं, ( यथा - मधुर को छोड़ने से अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय; अम्ल को छोड़ने से स्वादु, लवण, कटु, तिक्त, कषाय, इसी प्रकार लवण, कटु, तिक्त, कषाय के छोड़ने से छः रस ) | ( १ ) अम्ललवणकटुतिक्तकषाय ( २ ) मधुरलवणकटुतिक्तकषाय ( ३ ) मधुराम्लकटु-तिक्तकषाय ( ४ ) मधुराम्ललवणतिक्तकषाय ( ५ ) मधुराम्ललवणकटुकषाय ( ६ ) मधुराम्ललवणकटुतिक्त । एक एक रस के छः भेद ( यथा -मधुर, अम्ल, आदि ) और सब मिलित होने से एक भेद, इस प्रकार से कुल मिलाकर तिरसठ ( ६३ ) रस जाते हैं । ये जो तिरसठ ( ६३ ) प्रकार के रखों के मेद कहे हैं, इन में एवं अनुरस की कल्पना नहीं की गई है । और यदि रस और अनुरस मिला दें,
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अ० २६ ] सूत्रस्थानम तो असंख्य हो जाते हैं । इसी प्रकार रसों के तर-तम ( यथा - मधुरतर, मधुरतम आदि ) मेद से भी रस असंख्य अगणित बन जाते हैं । इस प्रकार रसों के असंख्य होने पर भी आचार्यों ने चिकित्सा व्यवहार के लिये रसों के सत्तावन ( ५७ ) संयोग और मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कधाय इन को मिलाकर तिरसठ ( ६३ ) मेदों की कल्पना कर रक्खी है ॥ १६-२२ ॥
कचिदेको रसः कल्प्यः संयुक्ताश्च रसाः क्वचित् ।
दोषौषधादीन् संचिन्त्य भिषजा सिद्धिमिच्छता ॥ २३ ॥
द्रव्याणि द्विरसादीनि संयुक्तांश्च रसान् बुधः ।
रसानेकैकशो वाऽपि कल्पयन्ति गदान् प्रति ॥ २४ ॥
यः स्याद्रसविकल्पज्ञः स्याश्च दोषविकल्पवित् ।
न स मुह्येद्विकाराणां हेतुलिङ्गोपशान्तिषु ॥ २५ ॥
कहीं पर एक रस की, कहीं पर मिलित रसों की, दोष ओषधि आदि ( देश, काल ) का विचार करके सफलता चाहने वाले वैद्य को कल्पना करनी चाहिये । जैसे - दो रस बाले द्रव्य ( मूंग कषाय और मधुर होते हैं ), तीन रस वाले ( मधुराम्लकषायं च विष्टम्भ गुरु शीतलम्, पित्त- श्लेष्महरं भव्यम् ), चार रस वाले ( जैसे-तिल, स्निग्धोष्णमधुरस्तिक्तकषायः कटुकस्तिल: । ) पांच रस ( जैसे-हरीतकी, शिवा पंचरखा ), छः रस ( अव्यक्त हों यथा- विष । 'विषन्त्वन्यकं परससंयुक्तम्' या हरिण का मांस ) एवं दो रस वाले रसों की या मिलित द्रव्य या रसों की कल्पना, अथवा एक एक रस की कल्पना रोगों के अनुसार करते हैं । जो मनुष्य रस के भेदों को भली प्रकार जानता है ( वह रोगों के कारण द्रव्य ज्ञान को भी अनिवार्य रूप से जान ही जायेगा ), एवं दोषों ( वातादि ) के लक्षणों को भी भली प्रकार से पहिचानता है, अथवा जो मनुष्य भेषज द्रव्यों को स्वरूप से एवं इन के प्रयोग विषय को जानता है, वह रोगों के कारण लक्षण और शान्ति ( चिकित्सा ) में नहीं घबराता और भ्रम में नहीं फंसता ॥ २३-२५ ॥
व्यक्तः शुष्कस्य चाऽऽदौ च रसो द्रव्यस्य लक्ष्यते ।
विपर्ययेणानुरसो रसो नास्ति हि सप्तमः ॥ २६ ॥
अनुरस - शुष्क या गीले द्रव्य में जो रस जिला के स्पर्श से स्पष्ट होता है, व्यक्त रस है । परन्तु जो रस इस प्रकार से ज्ञात नहीं होता अर्थात् पीछे द्वारा जामा जाता है, वह ' अनुरस' है । अथवा जो रस गीछे द्रव्य मैं वह व्यक्त ( अनुरस ) और जो रस शुष्क होने पर स्पष्ट होता है वह
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३०० चरकसंहिता [ अ० २६ 'रस' है । यथा - - पिप्पली आर्द्रावस्था में मधुर, और शुष्क अवस्था में 'कटु' रस है । इसलिये कटु व्यक्त रस, और मधुर अव्यक्त अनुरस है । अथवा पीछे से जो रस अनुभव होता है, वह ' अनुरस' है । यथा-कांजी, तक आदि पदार्थों के पीने पर प्रथम जिस रस का अनुभव हो वह रस और जो पीछे स्पष्ट
हो वह ' अनुरस' है । सातवां रस कोई पृथक् नहीं हैं ॥ २६ ॥
परापरत्वे युक्तिश्च संख्या संयोग एव च ।
विभागश्च पृथक्त्वं च परिमाणमथापि च ॥ २७ ॥
संस्कारोऽभ्यास इत्येते गुणा ज्ञेयाः परादयः ।
सिद्ध पायाचिकित्साया लक्षणैस्तान् प्रचक्ष्महे ॥ २८॥
दस गुण -पर, अपर, युक्ति, संख्या, संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिणाम, संस्कार और अभ्यास ये दस गुण हैं । चिकित्सा में सफलता इन दस गुणों में आमित है । इनके लक्षण कहते हैं ॥ २७-२८ ॥
देश - काल-वयो- मान -पाक- वीर्य ( सादिषु ।
परापरत्वे, युक्तिस्तु योजना या च युज्यते ॥ २६ ॥
संख्या स्याद् गणितं योगः सहसंयोग उच्यते ।
द्रव्याणां द्वन्द्वसर्वैककर्मजोऽनित्य एव च ॥ ३० ॥
विभागस्तु विभक्तिः स्याद्वियोगो भागशो ग्रहः ।
पृथक्त्वं स्यादसंयोगो वैलक्षण्यमनेकता ॥ ३१ ॥
परिमाणं पुनर्मानं, संस्कारः करणं मतम् ।
भावाभ्यसनमभ्यासः शीतळं सततक्रिया ॥ ३२ ॥
इति स्वलक्षणैरुक्ता गुणाः सर्वे परादयः ।
चिकित्सा यैरविदितैर्न यथावत् प्रवर्तते ॥ ३३ ॥
गुणा गुणाश्रया नोकास्तस्माद्रसगुणान भिषक् ।
विद्याद् द्रव्यगुणान् कर्तुरभिप्रायाः पृथग्विधाः ॥ ३४ ॥
अतश्चतत्र कर्तुरभिप्रायानुपायांश्चार्थमादिशेत्प्रकृतं बुद्ध्वा देशकालान्तराणि च ॥। ३५ ॥ देश- मरुदेश पर और आनूप अपर । काल-बिसर्ग पर, खादान अपर । वय -तरुण पर, बाल, वृद्ध अपर मान -शरीर का कहा हुआ पर, इस के अन्य अपर । पाक, वीर्य और रस मे जिस योग के प्रति हों उसके लिये पर दूसरों के प्र अपर पर अपर यह देश, काल, वय, मान, बीर्य, रस आदि के अपेक्षा से हैं । जैसे मकदेश- गंगा की अपेक्षा पर है, और बंगाल-मरुदेशों बालों की अपेक्षा मे पर
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० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०१ । है; इसी प्रकार वयमें बाल्यावस्था से योवनावस्था पर है और बाल्यावस्था अपर है पर अपर अपेक्षा से है । अथवा सन्निकृष्ट, और विप्रकृष्ट मेद से पर अपर भाव होता है । युक्ति योजना दोषादि के अपेक्षा से औषध की भली प्रकार कल्पना करना । संख्या- गिनती, एक, दो, तीन आदि । संयोग - द्रव्यों का परस्पर संयुक्त होना संयोग है । यह संयोग तीन प्रकार का होता है । १ द्वन्द्व ( दो का जैसे-लड़ते हुए दो मेढ़ों का ), २ सबका ( जैसे-एक पात्र में रक्खे उड़दों का ), और ३. एककर्मजन्य, ( जैसे- वृक्ष पर बैठे कौवे का ) यह संयोगजन्य कर्म अनित्य है । विभाग-विभजन, बांटना, भाग करना । संयोग का त्रियोग या विभाग रूप में ग्रहण होना विभाग है । पृथक्त्व -जिसके द्वारा यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि यह वस्तु घड़े से भिन्न है वह पृथक्त्व है । यह तीन प्रकार का है । १ सर्वथा अभिन्न वस्तुओं का जैसे - मेरु और हिमालय का । २. विजातियों में जैसे- भैंस और सूअर का । ३. विलक्षणताजन्य -विशिष्ट लक्षण युक्त विजातियों से मेद, अनेकता -एक जातीय द्रव्यों के संयोग में रहने वाली भिन्नता का नाम 'अने कता' है, यथा-उब्दों में अनेकता मिलती है, सब उड़द एक समान नहीं होते । परिमाण - मान, तोल, वजन । संस्कार -किसी द्रव्य में जिस क्रिया से गुणान्तर उत्पन्न किया जाता है, उस क्रिया का नाम संस्कार है ( संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते ) । अभ्यास -किसी द्रव्य या क्रिया का निरन्तर उपयोग करना, व्यवहार करना, अभ्यास कहाता है । इस 'अभ्यास' को शील या निर- न्तर करना या आदत भी कहते हैं । इस प्रकार से पर आदि दस गुणों के लक्षण कह दिये हैं । यदि वैद्य को इनका पूरा ज्ञान न होगा तो चिकित्सा पूर्ण रूप में सफल नहीं हो सकेगी । अब तक रसों के परस्पर संयोगी गुण कहे हैं । अब त्वादि गुण कहते हैं । जो गुण कहे हैं, वे गुण रूप, रस आदि में आभित नहीं, अपितु रस के आधारभूत द्रव्य में आश्रित हैं । इसलिये रख के गुणों को भी द्रव्य का गुण समझना चाहिये, रस का नहीं । यथा-मधुर रस, स्निग्ध, शीत, गुरु है, इस का अर्थ यह है कि मधुर रस वाला द्रव्य स्निग्ध, शीत गुरु इन गुणों से युक्त है । गुण गुण का आश्रय करके नहीं रह सकते । इस प्रकार कहना ग्रन्थकार की शैली है । प्रत्येक ग्रन्थ को समझने के लिए ग्रन्थकार के अभि- प्राय को ( उस के अभिप्राय के पृथक् होने से ), प्रकरण, देश, और काल को भी - [[नना चाहिये । प्रकरण जैसे – “चारः चीरं फलं पुष्पम्” यहां पर वनस्पति प्रकरण होने से थोर का दूध लेना चाहिये, गाय, भैंस का नहीं । देश - विर शोधन कहने में, 'क्रिमिव्याधि' अर्थात् शिरोजन्य कृमि रोग में ऐसा समझना
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३०२ चरकसंहिता अ० २६ चाहिये । काल - मन काल में कहने पर 'प्रतिग्रहं चोपहारयेत् ' अर्थात् वमन का पात्र लाओ । इसी प्रकार भोजन के समय 'सैन्धवमानय' कहने से नमक का छाना उचित है, न कि घोड़े का । इसलिये ग्रन्थकर्त्ता के अभिप्राय से रसों में गुणों का कथन समझना चाहिये । जहां पर प्रकरणगत देश काल आदि द्वारा ग्रन्थकर्ता का अभिप्राय स्पष्ट नहीं होता, वहां उपायों द्वारा तन्त्र-युक्ति रूपी उपायों से अर्थ को समझना चाहिये । २ ९ । ३५॥
परं चातः प्रवक्ष्यन्ते रसानां षड् विभक्तयः ।
षट्पश्च भूतप्रभवाः संख्याताश्च यथारसाः ॥ ३६ ॥
सौम्याः खल्वापोऽन्तरिक्षप्रभवाः प्रकृतिशीता लव्यश्चाव्यक्त-रसाश्च; तास्त्वन्तरिक्षाद् भ्रश्यमाना भ्रष्टाश्चपञ्चमहाभूत विकार- गुण-सम न्विता जङ्गमस्थावराणां भूतानां मूर्तीरभिप्रीणयन्ति, तासु मूर्तिषु पड-भिमूर्च्छन्ति रसाः ॥ ३७ ॥
पञ्च महाभूतों से उत्पन्न छः रसों को विभाग करके कहते हैं किस प्रकार से छः रस उत्पन्न होते हैं । सब रसों का उत्पत्तिस्थान पानी है । यह पानी सौम्य ( सोमगुणी ), अन्तरिक्ष से उत्पन्न होने वाला, स्वभाव से शीतल, लघु एवं ' अव्यक्त रस ' है । यह पानी अन्तरिक्ष से नीचे गिरता हुआ अन्तरिक्ष में स्थित पृथ्वी आदि के परमाणुओं से दूषित होकर, पञ्च महाभूतों से बने स्थावर (जड़ ) और जंगम (चल ) पदार्थों को तर्पण करता है, इन पदार्थों के स्वरूप को
बनाता है, उत्पन्न करता है । इन पदार्थों से ही छः रस अभिव्यक्त होते है ॥ ३७॥
तेपां षण्णां रसानां सोमगुणातिरेकान्मधुरो रसः पृथिव्यग्नि-भूयिष्ठत्वादम्लः सलिलामिभूयिष्ठत्वाल्लवणः वाय्वग्निभूयिष्ठत्वा- कटुकः, वाय्वाकाशातिरेकात्तिक्तः, पवनपृथिव्यतिरेकात्कषाय इति । एवमेषां रसानां षट्त्वमुत्पन्नं, ऊनातिरेकविशेषान्महाभूतानां भूताना-मिव जङ्गमस्थावराणां नानावर्णाकृतिविशेषाः, षड़तुकत्वाच काल-स्योपपन्नो महाभूतानामूनातिरेकविशेषः ॥ ३८ ॥
यहां पर अन्तरिक्ष स्थित पानी को रसोत्पत्ति में मुख्य कारण माना है । इस से पृथ्वी पर स्थित पानी भी स्थावर और जंगम पदार्थों में रस उत्पन्न करने में कारण है । इन छः रसों में सोम गुण के अधिक होने से ( अर्थात् अन्य भूत भी थोड़ी २ मात्रा में हैं ) मधुर रस, पृथ्वी और अग्नि गुण की अधिकता से अम्ल, पानी और अग्नि गुण की अधिकता से लवण. वायु औ अग्नि की अधिकता से कटु, वायु और आकाश गुण की अधिकता से तिक