चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 631–639
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 631–639
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अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१३ लवणस्कन्ध -सैम्बव, सौवर्चल, फालविड्, पाक्य (पाक द्वारा तैयार किया ) कूप्य ( कुप्पी के आकार में बना ), बालुकैल ( रेत में से बना ), मौलक ( मूखों से बना ), सामुद्रिक, रोमक ( साम्भर प्रदेश में उत्पन्न नमक ), औपर ( ऊपर भूमि में उत्पन्न), पांशुज ( धूली से उत्पन्न ) पाठेयक ( लवण भेद ) इस प्रकार के तथा अन्य लवण वर्ग में गिने हुए अम्लवर्ग से मिश्रित अथवा गरम पानी से मिश्रित वृत तैल आदि स्नेहों से बनी सुखोष्ण बस्ति को वात- रोगी के लिये विधिपूर्वक देना चाहिये । यह लवणस्कन्ध है || १३८|| पिप्पलीपिप्पलीमूल- हस्तिपिप्पली-चव्य- चित्रक-शृङ्गवेर-मरिचाज- मोदा विडङ्गकुस्तुम्बुरु-पील- ते जोवत्ये छा-कुष्ठ- भल्लातकास्थि -हिंगु कि लिम-मूलक -सर्षप लशुन करञ्ज-शिक- खर पुष्प भूस्तृण सुमुख-सुरस कुठे कार्जक गण्डीर -कालमालक-पर्णास-क्षत्रक फणिज्जक क्षार मूत्र पित्ताना- मेवंविधानां चान्येषां कटुक- वर्ग- परिसंख्यातानामौषधद्रव्यस्यां लेद्यानि खण्डशरले विस्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा गोमूत्रेण सह साधयि- स्वोपसंस्कृत्य यथावन्मधु-तैल-लवणोपहितं सुखोष्णं बस्ति श्लेष्मविका रिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति कटुकस्कन्धः ॥ १३६ ॥
कटुक स्कन्ध -पिपली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, चविका, चीता, सोंठ, मरिच, अजवायन, आर्द्रक ( अदरख), वायविंग, हरा धनिया, पीलु, तेजवळा, इलायची, कूठ, मिलावा, हींग, देवदारु, मूली, सरसों, लहसुन, करंज, शोभाञ्जन, मीठा सहजन, खुरासानी, अजवायन, ( खरपुष्पा, वन तुलसी ), कचण, सुमुख, सुरस, अर्जक, काण्डीर, कालमालक, पर्णास, क्षवक, फणिज्जक, ( ये सब तुलसी के मेद हैं, ) क्षार, मूत्र और पित्त । ये तथा अन्य कटुवर्ग में गिने हुए द्रव्यों को कूट पास कर गोमूत्र के साथ पका कर, मधु, तेल और लवण से मिश्रित करके सुखोष्ण वस्ति को श्लेष्म रोगी के लिये विधिपूर्वक देना चाहिये । यह कटुकस्कन्ध है । चन्दन-नलद · कृतमाल- नक्तमाल- निम्ब -तुम्बुरुं कुटज हरिद्रादारुह रिद्रा मुस्त- मूर्वाकिरात- तिक्तक-कटुरोहिणीत्रायमाणा-कारवेल्लिका-करीर-करवीर- केबुक - कठिल्लक वृष- मण्डूकपर्णी- कर्कोटक वार्ताकु कर्कश काक गाची- काकोदुम्बरिका- सुषव्यतिविष- पटोल-कुलक-पाठा-गुडूची नेत्राग्र- वेतस - विकङ्कत- बकुल- सोमवल्क-सप्तपर्ण- सुमनाक वल्गुज - वचा-तगरागु- -बालकोशीराणामेवं विधानां चान्येषां तिक्तवर्गपरिसंख्यातानामौषघद्र-व्याणां केद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेनाभ्यासिकय साधयिवोपसंस्कृत्य याक मधुतेललवणोपनि
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६१४ चरकसंहिता [अ० ८ सुखोष्णं वस्तिं श्लेष्मविकारिणे विधिवद्दद्यात् । शीतं तु मधुसर्पिर्थ्यामुपसं- स्कृत्य पित्तविकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति तिक्तस्कन्धः || १४०|| तिचस्कन्ध-- चन्दन, उशीर, कृतमाल, नाटा करञ्ज, निम्ब, तुम्बरु, कूड़ा, हल्दी, दारूहल्दी, मुस्ता, मूर्वा, चिरायता, कुटकीं, त्रायमाणा, करीर, करवीर, पत्तूर, कर्कटक ( करेला ), वसा, मण्डूकपर्णी, कांकरोला, बैंगन, परवल, काको दुम्बर, मकोय, करेला, सुषवी ( जंगली करेला ), अतीस, परवल, कुणक ( पर-चल का भेद ), पाठा, गिलोय, बैत का अप्रभाग, अम्लवेतस कुंच, मौलसरी, श्वेत खदिर, सप्तपर्ण, चमेली, आक, बाबची, त्रिफला, तगर, अगरु, उशीर, इन द्रव्यों को वा तिक्त वर्ग में गिने हुए अन्य औषध द्रव्यों को कूट पीस कर पानी से धो कर पानी के साथ पूर्ववत् विधि से पाक करना चाहिये । सिद्ध होने पर इसमें मधु, तेल और नमक मिलाकर हलके गरमबस्ति को विधिपूर्वक श्लेष्म रोगी के लिये देना चाहिये । शीतल होने पर मधु और घी मिला कर पित्त
रोगी को देनी चाहिये । यह विकस्कन्ध है ॥ १४० ॥
प्रियंग्बनन्ताम्रास्थ्यम्बष्ठकी -कट्वङ्ग-लोध्र- मोचरस समङ्गा- घातको पुष्प- पद्म -पद्मकेशर-जम्ब्वाम्रस्वक्मक्ष-वटक-पीतनोदुम्बराश्वत्थ-भज्ञात-कामन्तक- शिरीष पुष्प-शिंशपा- सोमवल्क-तिन्दुक पियाल-बदर- खदिर-सप्तपर्णाश्वकर्ण- स्यन्दनार्जुनासनारि मेदैलवालुक- परिपेलव -कव- श-ल्लकी-जिङ्गिनी -काश-कशेरुक - राजकशेरुक- कट्फल - वंश- पद्मकाशोक शाळ धव सर्ज- भूर्ज- शण- खरपुष्पा-पुरशमी-माची कवरक-तुङ्गाजकर्णाश्वकर्ण-स्फूर्ज़क-बिभीतक-कुम्भी- पुष्कर- बीज-बिस- मृणाल-ताल- खर्जूर- तरूणामे- विधानां चान्येषां कषाय वर्गपरिसंख्यातानामोषधद्रव्याणां धानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सह साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावन्मधुतैललवणोपहितं सुखोष्णं बस्ति श्लेष्म-विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यात् । शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य पित्त-विकारिणे विधिज्ञोविधिवद् दद्यादिति कषायस्कन्धः १४१ ॥ कषाय स्कन्ध - फूल प्रियंगु अनन्तमूळ, आम की गुठली, पाठा, श्योनाक, लोध, मोचरस, मंजीठ, धाय के फूल, पद्म, कमल को केशर,जामुन, आम, पिल-खन, बड़, कपीतन, गूलर, पीपल, भिलावा, पाषाणभेद, सिरस, शीश्चम, खैर, तिन्दुक, पियाल, बेर, खेर ( लाल ), सप्तपर्ण, अश्वकर्ण ( पलाश ), तिनिश, अर्जुन, असन, विट्, खदिर, तेजबल, कैवर्त्तमुस्ता, कदम्ब, शल्लकी, जिंगण, कास, कसेक, राजकसेरु, कायफल, यांस, पद्मात्र, अशोक, साल, धव, सर्जवृक्ष, भोजवल्कल, वृक्ष, तुलसी, शमी, देवदारु, बोरोक, पुंनाग, शाल मंद, बड़ा
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०८ ] विमानस्थानम ६१५ झाल, तिन्दुक, बहेड़ा, कायफल, कमल गट्टा, चिस, मृणाल, ताड़, खजूर, बीकार इन या कषाय वर्ग में गिने हुए अन्य द्रव्यों को कूट पीस कर पानी से धोकर पानी के साथ पूर्ववत् पकाना चाहिये । सिद्ध होने पर मधु- तेल और लवण मिलाकर विधिपूर्वक श्लेष्मा के रोगी को कवोष्ण बस्ति देनी चाहिये । शीतल होने पर घी और शहद मिला कर पित्तविकार के रोगी को देना चाहिये । यह कषाय स्कन्ध कह दिया ॥ १४१ ॥
तत्र श्लोकाः - षड्वर्गाः परिसंख्याता य एते रसभेदतः ।
आस्थापनमभिप्रेत्य तान विद्यात्सार्वयौगिकान् ॥ १४२ ॥
सर्वशो हि प्रणिहिताः सर्वरोगेषु जानता ।
सर्वान् रोगान्नियच्छन्ति वेध्य आस्थापनं हितम् ॥ १४३ ॥
येषां येषां प्रशान्त्यर्थं ये ये ते परिकीर्तिताः ।
द्रव्यवर्गा विकाराणां तेषां ते परिकोपनाः ॥ १४४ ॥
इत्येतें षडास्थापनस्कन्धा रसतोऽनुविभज्य व्याख्याताः । आस्थापन बस्ति के अभिप्राय से रसों के भेद से जो ये छः वर्ग कहे हैं, इन छः स्कन्धों को आस्थापन बस्ति से अच्छे होने वाले सत्र रोगों में लागू होने बाले समझने चाहिये । क्योंकि दोष, दृष्य, देश, काल, मात्रा आदि की अपेक्षा करके औषध उपयोग को जानने वाले वैद्य द्वारा जिन रोगों के लिये आस्थापन विधि हितकारी है, उन रोगों में प्रयुक्त किये हुए यह छः वर्ग सब रोगों का शमन करते हैं । जिन जिन विकारों की शान्ति के लिये जो जो द्रव्यवर्ग नहीं क हैं, वे २ उन २ रोगों को कुपित करते हैं, शान्त नहीं करते । इस प्रकार से छः आस्थापन स्कन्धों को रखों के अनुसार विभाग करके कह दिया ॥ १४२-१४४ ॥ तेभ्यो भिषग्बुद्धिमान् परिसंख्यातमपि यद्यद् द्रव्यमयौगिकं मन्येत तत्तदपकर्षयेत्, यद्यच्चानुक्तमपि यौगिकं वा मन्येत तत्तद् विदध्यात् । वर्गमपि वर्गेणोपसंसृजेदेकमेकेनानेकेन वा युक्ति प्रमाणीकृत्य । प्रच-रणमिव भिक्षुकस्य बीज मित्र कर्षकस्य सूत्र बुद्धिमता मल्पमप्यनल्पज्ञा-नायतनं भवति । तस्माद् बुद्धिमतामूहापोहवितर्काः । मन्दबुद्धेस्तु यथोक्तानुगमनमेव श्रेयः । यथोक्तं हि मार्गमनुगच्छन् भिषक् संसाध यति वा कार्यमनतिमहत्त्वाद्वा निपातयत्यनतिहस्वत्वादुदाहरण-स्येति ॥ १४५ ॥
बुद्धिमान् वैद्य इन वर्गों में गिने हुए जिस द्रव्य को अयौगिक समझे उसको निकाल देवे और न कहे हुए जिस द्रव्य को यौगिक समझे उसको इनमें मिला लेवे । युक्ति के अनुसार दोष दूष्य की विवेचना करके एक वर्ग को एक अथवा
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६१६ चरकसंहिता [ अ० = अनेक वर्ग के साथ मिला कर प्रयोग करे । मिक्षुक के विचरने के समान और किसान के बीज की तरह यह अल्प कथन भी बुद्धिमानों के लिये बड़ा ज्ञानप्रद है, क्योंकि बुद्धिमान् व्यक्ति ऊहापोह ( यह इस प्रकार है, यह इस प्रकार नहीं है, इस प्रकार के तर्क ) और वितर्क प्रमाण युक्ति में कुछ होते हैं । मन्द-बुद्धि वाले व्यक्ति को कथनानुसार ही कार्य करना श्रेयस्कर है । क्योंकि इस प्रकार का मन्द बुद्धि वाला भित्रक्, उपदेश के न बहुत संक्षिप्त और न बहुत विस्तार होने से, विना ऊहापोह के भी यथोक्त मार्ग का अनुसरण करता हुआ कार्य में सफलता प्राप्त कर लेता है ॥१४५ ॥
अतः परमनुवासनद्रव्याण्यनुव्याख्यास्यन्ते - अनुवासनं तु स्नेह एव । स्नेहस्तु द्विविधः -स्थावरो जङ्गमात्मकश्च । तत्र स्थावरात्मकः स्नेहस्तैलमतैलं च । तद् द्वयं तैलमेव कृत्वोपदिश्यते, सर्वतस्तैलप्रा- धान्यात् । जङ्गमात्मकस्तु वसा, मज्जा, सर्पिरिति ॥ १४६ ॥
तेषां तु तैल-वसा मज्ज सर्पिषां तु यथापूर्वं श्रेष्ठं वात- श्लेष्म-विकारे- ध्वनुवासनीयेषु यथोत्तरं तु पित्तविकारेषु सर्व एव वा सर्वविकारे- वपि च योगमुपयान्ति संस्कारविशेषादिति ॥ १४७ ॥
इसके आगे अनुवासन द्रव्यों की व्याख्या करेंगे । अनुवासन का अर्थ स्नेह है । स्नेह दो प्रकार का है स्थावर और जंगम । इनमें स्थावर स्नेह दो प्रकार का है । जैसे - तैल ( तिलों से उत्पन्न हुआ ) और अतैल ( तिढों से न उत्पन्न हुआ ), इन दोनों को तैल शब्द से ही कह देते हैं, क्योंकि सब तेलों में तिल के तैल की ही प्रधान है । जांगम स्नेह वसा, मज्जा और सर्पि ( घी ) हैं । तैल, वसा, मज्जा और घी इन में पूर्व की वस्तु उत्तर वस्तु से श्रेष्ठ है अर्थात् घी से मज्जा, मज्जा से वसा और वसा से तै श्रेष्ठ है । यह नियम वात और कफ के विकारों के लिये है । पित्तजन्य विकारों में उत्तरोतर वस्तु ( तैल से बसा वसा से मज्जा और मजा से घी) श्रेष्ठ है । अथवा सब ही स्नेह सब रोगों में विशेष संस्कार से ( उस उस दोषहर द्रव्य के सहयोग से ) उपयुक्त बन जाते हैं ॥ १४६-१४७ ॥ शिरोविरेचनद्रव्याणि पुनरपामार्ग- पिप्पली- मरिच विडङ्ग-शिशि- रीष कुस्तुम्बुरु - पिल्व जाज्य जमोद - वार्ता की पृथ्वीकैला-दरेणुका फला- नि च । सुमुख -सुरस -कुठेरक- गण्डीरक-कालमालक-वर्णासक्षवक फणि- ज्जक- हरिद्राशृङ्गवेर -मूलक-लथुन -तर्कारी- सर्षप -पत्राणि च अर्कालर्क- कुष्ठ -नागदन्ती-वचा-मार्गी-श्वेता ज्योतिष्मती -गवाक्षी गण्डीर-पुष्पी- वृश्चिकाली वयस्थातिविषा मूलानि च हरिद्रा- शृङ्गवेर- मूलक-लशुन-
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अ० ८ ] विमानस्थानम् ६१७ कन्दाश्च, लोध्र-मदन-सप्तपर्ण-निम्बार्क पुराणि च देवदार्वगुरु- सरल-शल्लकी जिङ्गिन्यसन-हिंगु -निर्यासाश्च तेजोवती वराङ्गदी-शोभाञ्जन- वृहती कण्टकारिका-त्वचः । शिरोविरेचन द्रव्य - अपामार्ग, पिप्पली मरिच, बायबिडंग, शोभांजन, सिरस, हरा धनिया,बेलगिरी, अजवायन, काला जीरा, वार्ताको, बड़ी इलायची, छोटी इलायची रेणुका इनके फल, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, काळमालक, पर्णा, क्षत्रक, फणिजक ( तुलसी के भेद ), हल्दी, सोंठ, मूली, लहसुन, जय- न्ती और सरसों इनके पत्ते आक, लाल फूल का आक, कूठ, नागवला, बच, अपामार्ग, मालकंगनी, इन्द्रायण, रामट, मधुरिका ( सौंफ ), वृश्चकाली, ब्राह्मी, और अतीस इनके मूल । हल्दी, आर्द्रक, मूली और लद्दमुन इनके कन्द । लोध, मैनफल, सप्तपर्ण नीम और आक इनके फूल | देवदास, अगर, शल्लकी, सरल- वृक्ष, जिंगण, असन और हींग इनका गोंद, तेजबल, दालचीनी, इंगुदी, शोभां-जन, बड़ी कटेरी और छोटी कटेरी इनकीछाल । इति शिरोविरेचनं सप्तविधं फल पत्र मूल कन्द-पुष्प-निर्यास -स्वगा- श्रयभेदात् । लवण कटुतिक्तकषायाणि चेन्द्रियोपशयानि तथाऽपरा-ण्यनुक्तान्यपि द्रव्याणि यथायोगविहितानि शिरोविरेचनार्थमुपदिश्य-न्त इति ॥ १४ = ॥ शिरोविरेचन सात प्रकार का है --फल, पत्ते, मूल, कन्द, पुष्प, निर्यात ( गोंद ) और त्वचा भेद से । लवण, कटु और तिक्त एवं कषाय ये रस इन्द्रिय चक्षु आदि को शान्त करने वाले हैं; उपघातक नहीं है ।इस प्रकार के अन्य यहां पर न गिने हुए, द्रव्यों का दोष दूष्य की अपेक्षा से योग के लिये अनुकूल जानकर शिरोविरेचन कार्य में उपयोग कर लेना चाहिये ॥ १४८॥
तत्र श्लोकाः -लक्षणाचार्यशिष्याणां परीक्षाकारणं च यत् ।
अध्येयाध्यापनविधिः संभाषाविधिरेव च ॥ १४६ ॥
भिनानि पञ्चाशद्वादमार्गपदानि च ।
पदानि दशचान्यानि कारणादीनि तत्त्वतः । १५० ॥
संप्रश्नश्च परीक्षादेर्नवको वमनादिषु! भिषग्जितीये रोगाणां विमाने संप्रदर्शितः ॥ १५१ ॥
बहुविधमिदमुक्तमर्थजातं बहुविधवाक्यविचित्रमर्थ कान्तम् । ॐ सुश्रुत में आठ प्रकार के शिरोविरेचन द्रव्य माने हैं । इनमें आठवां 'सार' गिना है ।
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६१८ चरकसंहिता [ अ० = बहुविधशुभशब्दसंघियुक्त' बहुविधवादनिपूदनं परेषाम् ॥१५२॥
बहुविध संश्रयां विजज्ञिवान्परमतवादसूदनीम् ।
न सजाते परवचनावमर्दनैर्न शक्यते परवचनैश्च मर्दितुम् ॥ १५३॥
दोषादीनां तु भावानां सर्वेषामेव हेतुमत् ।
मानात्सम्यग्विमानानि निरुक्तानि विभागशः ॥ १५४ ॥
शास्त्र, आचार्य और शिष्य की परीक्षा, परीक्षा का कारण, अध्ययन और अध्यापन विधि, ( शिष्य- आचार्यं विधि ), तदुविद्य संभाषाविधि, चवालीस वाद मार्ग, कारण, करण आदि दस पद, वमन आदि परीक्षायें, परीक्षा के प्रकार, तथा नी प्रश्न इस रोग भित्रजितीय अध्याय में भगवान् आत्रेय ने पूर्णरूप से कह दिये हैं । बहुत प्रकार के वाक्यों से विचित्र, अर्थ में सुन्दर बहुत प्रकार के शुभ शब्दों की संधि योजना से बनाये, दूसरों के बहुत प्रकार के वाद को हटाने वाले नाना तत्र यहां पर भगवान् आत्रेय ने कहे हैं । नाना प्रकार की युक्ति से युक्त, दूमरों के मत को निराकरण करने वाली, यहां पर कही इस बुद्धि को जान कर वैद्य, दूसरों के वचनों का विमर्दन करने में समर्थ होता है । दूसरों के वचनों से पराजित नहीं हो सकता है । इनके ज्ञान से वैद्य सभा में वाक्चातुर्य से दूसरों को परास्त करता है, उनसे पराजित नहींहोता । विमान स्थान की निरुक्ति- दोष आदि सब भावों के युक्तिपूर्वक समस्त मान, एक एक करके कह दिये हैं । दोष आदि का विशेष रूप से मान अर्थात् ज्ञान 'विमान' है । इस विमान का यहां पर उपदेश किया है, इसलिये इसको विमान स्थान कहते हैं । इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते विमानस्थाने रोगभिषग्जितीय- विमानं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इति विमानस्थानं समाप्तम् । मु० - पं० बैकुंठनाथ भार्गव, आनन्दसागर प्रेस, गायघाट, बनारस ।
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लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, पुस्तकालय Lal Bahadur Shastri National Academy ofAdministration Library मसूरी MUSSOORIE अवाप्ति म ० Acc. No........... कृपया इस पुस्तक को निम्नलिखित दिनांक या उससे पहले वापस कर दे Please return this book on or before the date last stamped below. दिनाक उधारकर्ता दिनाक उधारकर्ता की सख्या की सख्य Date Porrower s Date Borrower's No No 125794 LBSNAA
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H 615.536 चरक 7 -+407+ खण्ड एक न - - I Clas एवं अग्निवेश Aut! TGF Tic चरक संहिता | H 14071 615.536 चरक2407-1 LALLIBRARYBAHADUR SHASTRI National Academy of Administration MUSSOORIE Accession No 125794 1 Books are issued for 15 days only but may have to be recalled earlier if urgen- tly required 2 An over due charge of 25 Paise per day per volume will be charged 3 Books may be renewed on request, at the discretion of the Librarian 4 Periodicals Rare and Reference books may not be issued and may be consulted only In the Library 5 Books lost, defaced or injured in any way shall have to be replaced or its double price shall be paid by the borrower Help to keep this book fresh, clean & moving