चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त — पृष्ठ 621–630
चरक संहिता अत्रिदेव गुप्त · पृष्ठ 621–630
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विमानस्थानम् ६०३ जाता है । इसके अनन्तर औषध का भी तीक्ष्ण, मृदु और मध्य रूप से विभाग करके दोष एवं बल के औषध का प्रवर, मध्य और अवर रूप से प्रयोग करे ॥ १२३ ॥
आयुषः प्रमाणज्ञानहेतोः पुनरिन्द्रियेषु जातिसूत्रीये च लक्षणान्यु- पदेक्ष्यन्ते ॥ १२४ ॥
आयु के प्रमाण को जानने के लिये लक्षण इन्द्रियस्थान में तथा शारीर स्थान के जातिसूत्रीय अध्याय में कहेंगे ॥ १२४ ॥
कालः पुनः संवत्सरश्चाऽऽतुरावस्था च नव संवत् द्विधाविधा तुघोढा द्वादशधातावत्योढाभूयश्चाप्यतःप्रविभज्य कार्यमुपदेश्यतेप्रविभज्यते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्यहेमन्तो ग्रीष्मो वर्षाश्चेति। तं शीतोष्णवर्षरक्षणास्त्र ऋतो भवन्ति । तेषामन्तरेनिरे साधारण- लक्षणास्त्रय ऋतवः प्रावृट्रसन्ता इति । प्रावृडिति प्रथमः प्रवृष्टेः कालः, तस्यानुबन्धो हि वर्षाः । एवमेते संशोधनमधिकृत्य षड् विभ- ज्यन्ते ऋतवः ॥ १२५ ॥
काल - संवत्सर और रोगी की अवस्था का नाम 'काल' है । इनमें संवत्सर अयन भेद से दो प्रकार का शीत, उष्ण, वर्षा भेद से तीन प्रकार का, ऋतु विभाग से छः प्रकार का, मास भेद से बारह प्रकार का, पक्ष भेद से चौबीस प्रकार का, और दिन प्रहरादि के भेद से अनेक प्रकार का है । कार्य की दृष्टि से इसका विभाग किया जाता है । यहां पर वर्ष का ऋतु विभाग से छः प्रकार का विभाग करके इसके कार्य को कहेंगे । हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा रूप से शीत, उष्ण और बरसात के लक्षणों वाली मुख्यतः तीन ऋतुओं के बीच में भी दूसरी साधारण लक्षणों वाली तीन ऋतुएं होती हैं । यथा-प्रावृट्, शरद् और बसन्त अर्थात् प्रवृष्टि इसका प्रथम प्रारम्भ काल होना 'प्रावृट्' है । इसका पिछला भाग वर्षा ऋतु । इस प्रकार से संशोधनाधिकार में हेमन्त, वसन्त, ग्रीष्म, प्रावृट् वर्षा और शरद् ये ऋतुएँ कह दी हैं ॥ १२५ ॥
तत्र साधारणलक्षणेष्वृतुषु वमनादीनां प्रवृत्तिर्विधीयते, निवृत्ति- रितरेषु । साधारणलक्षणा हि मन्दशीतोष्णवर्षत्वात् सुखतनाश्च भव- न्त्यविकल्पकाश्च शरीरौषधानां, इतरे पुनरत्यर्थ शीतोष्ण वर्षत्वाद् दुःखतमाश्च भवन्ति विकल्पकाश्च शरीरौषधानाम् ॥ १२६ ॥
इनमें साधारण लक्षणों वाले समय में जब न बहुत शोत और न बहुत गरमी हो, जैसे प्राट् शरद् और वसन्त ऋतु में बमन आदि कार्यों के करने
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६०४ चरकसंहिता [अ०८ का विधान है । अन्य तीन, अधिक शीत, अधिक उष्ण, अधिक दृष्टि, हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा इन ऋतुओं में वमनादि कार्य नहीं किये जाते । क्योंकि साचा-रण लक्षणों वाली ऋतुएं मन्द शीत, मन्द उष्ण और मन्द वर्षा वाकी होने से शरीर के लिये अति सुखकारक एवं ओषधियों का नाश न करने वाली होती हैं । इसलिये उनमें वमन आदि कार्य किये जाते हैं । अन्य तीन ( हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतुएँ अतिशीत, अति गरमी और अति वर्षा बाली होने से शरीर के लिये दुःखदायक और ओषधियों का नाश करने वाली होती हैं । इसलिये इन ऋतुओं में वमन आदि उपाय नहीं किये जाते ॥ १२६ ॥
त्र हेमन्ते प्रतिमा शीतोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्यति- शीतवाताध्मातमविदारुणीभूतमाबद्धदोषं च भेषजं पुनः संशोधनार्थ-मुष्णस्वभावं शीतोपहतत्वान्मन्दवीर्यत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधनमयोगायोपपद्यते, शरीरमपि च वातोपद्रवाय । इनमें से हेमन्त ऋतु में अधिक शीत होने के कारण शरीर को सुख नहीं मिळता । अति शीत और अति वायु से शरीर विक्षुब्ध, अति कठोर और बहुत भारी दोष युक्त एवं अतिस्तन्ध दोष वाला हो जाता है । उष्ण स्वभाव वालो iutarकारी औषध भी शीत के अधिक होने से हीनवीर्य रहती है । इसलिये इस अवस्था में शरीर और औषध का संयोग अयोग अर्थात् अनुचित रहता है । शरीर में भी प्रायः वायु के उपद्रव होने लगते हैं । ग्रीष्मे पुनर्भूशोष्णोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्युष्णवातातपा ध्यातमतिशिथिलमत्यन्तप्रविलीनदोष, भेषजं पुनः संशोधनार्थमुष्णस्व- भावमुष्णानुगमनात्तीक्ष्णतरत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधन- मतियोगायोपपद्यते", शरीरमपि पिपासोपद्रवाय । ग्रीष्म ऋतु में गरमी के अधिक होने से शरीर को सुख नहीं मिलता । इसलिये उष्ण वायु और उष्ण धूप से शरीर फूड जाता अति शिथिल तथा गरमी के कारण दोष बहुत अधिक छिपे ( घुले ) रहते हैं । संशोधन के लिये जो औषध दी जाती है, उसका स्वभाव उष्ण होता है । यह उष्ण स्वभाव की औषध सूर्य की किरणों के योग से अति उष्ण होकर अति तीक्ष्ण हो जाती है । इसलिये इस अवस्था में शरीर और औषध का संयोग ' अतियोग ' हो जाता है । शरीर में भी प्यास के उपद्रव होने लगते हैं । वर्षा तु मेघजालावतते गूढार्कचन्द्रतारे धाराकुले वियति भूमौ पङ्क- जल- पटल- संवृतायामत्यर्थोपक्लिन्नशरीरेषु भूतेषु विहतस्वभावेषु च
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BTO = ] विमानस्थानम् ६०५ नादीनिौषधप्रामेषुभवन्ति, गुरुसमुत्थानानितोयतोयदानुगतमारुवसंसर्गाद्शरीराणि गुरुप्रवृत्तीनि। तस्माद्वमनादीनांबमनिवृतिर्विधीयते वर्षाभागान्तेष्वृनुषु न चेदात्ययिकं कर्म, आत्ययिके पुनः कर्मणि कायमृतुं विकल्प्य कृत्रिमगुणोपधानेन यथर्तुगुणविपरीतेन भैषज्यं संयोग-संस्कार-प्रमाण- विकल्पेनोपपद्यं प्रमाणवीर्यसमं कृत्वा ततः प्रयोजयेदुत्तमेन यत्नेनावहितः ॥ १२७ ॥
वर्षा ऋतु में आकाश बादलों से भरा रहता है, सूर्य, चन्द्रमा और तारे छिपे रहते हैं । इस समय आकाश से पानी बरसता है, भूमि कीचड़से भरी होती है । प्राणियों का शरीर अत्यन्त क्लिन्न ( आई ) होता है । इसलिये स्वाभाविक गुण घट जाता है । सम्पूर्ण ओषधियों में जल, बादल और इनसे मिली वायु का संसर्ग होने से रस, वीर्य आदि का नाश हो जाता है । इसलिये वमन आदि गुरु कार्यों को ये ओषधियाँ नहीं कर सकती । इस ऋतु में जो रोग शरीर में होते हैं, उनका निदान महान् होता है । इसलिये हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा में वमन आदि कार्यों का निषेध किया जाता है । यदि वमन आदि कार्य करना आवश्यक ( अनिवार्य ) हो हो तो हेमन्त आदि ऋतुओं में भी ऋतु के विपरीत कृत्रिम ऋतु ( हेमन्त में गर्भगृह आदि, ग्रीष्म में धारागृह आदि ) बनाकर, मेषज को संयोग संस्कार के अनुसार तीक्ष्ण या मृदु वीर्य करके पूर्ण सावधानों के साथ प्रयोग करे जिससे हेमन्त में अयोग और ग्रीष्म में अतियोग न हो ॥ १२७ ॥
आतुरावस्थास्वपि तु कार्याकार्य प्रति कालाकाल संज्ञा । तद्यथा- अस्यामवस्थायामस्य भेषजस्याकालः कालः पुनरन्यस्येति एतदपि हि भवत्यवस्थाविशेषेण, तस्मादातुरावस्थास्वपि हि कालाकालसंज्ञा । तस्य परीक्षा मुहुर्मुहुरातुरस्य सर्वावस्थाविशेषावेक्षणं यथावद्वेषजप्रयोगार्थं,
नातिपतित कालमप्राप्तकालं वा भेषजमुपयुज्यमानं यौगिकं भवति ।
कालो हि भैषज्यप्रयागपर्याप्तमभिनिवर्तयति ॥ १२८ ॥
रोगी की अवस्था में भी कार्य एवं अकार्य को देखकर काल और अकाल कहा जाता है । जैसे- इस अवस्था में इस औषध का काल नहीं है ओर इस अन्य औषध का समय है । ( यथा -श्वर के छः दिन बीतने पर औषध देनी चाहिये यह औषध का काल है ) । यह औषध देने का समय नहीं है ( जैसे नव ज्वर में कषाय का देना अकाल है । ) यह भी अवस्था मेद से ऐसा होता है । इसलिये रोगी की अवस्था में भी 'काल अकाल' होता है । इसकी परीक्षा
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६०६ चरकसंहिता [ अ०८ रोगी की सब अवस्थाओं को बार-बार देखकर उचित रीति से औषध देने के लिये करनी चाहिये । क्योंकि समय के बीतने पर अथवा समय से पूर्व दी हुई औषघ फलदायक नहीं होती । उचित काळ ही औषध प्रयोग को सफल करता है ॥ १२८ ॥
प्रवृत्तिस्तु प्रतिकर्मसमारम्भः । तस्य लक्षणं-भिषगातुरौषधपरिचा-राणा क्रियासमायोगः ॥ १२६ ॥
प्रवृत्ति - चिकित्सा कर्म का प्रारम्भ 'प्रवृत्ति' है । भिषग्, औषध रोगी और परिचारक इन चारों का मिलकर क्रिया आरम्भ करना इसका लक्षण है ॥ १२ ९॥ उपाय: पुनभिषगादीनां सौष्ठवमभिविधानं च सम्यक् । तस्य लक्षणं– भिषगादीनां यथोक्तगुण- संपदेश-काल प्रमाण-सात्म्य- क्रियादि- सिद्धिकारणैः सम्यगुपपादितस्यौषधस्याव चारणमिति ॥ १३० ॥
एवमेते दश परीक्ष्यविशेषाः पृथक्पृथक् परीक्षितच्या भवन्ति ॥ उपाय - भिषग्, औषध, रोगी और परिचारक इन चारों का यथोक उत्तम गुण वाला होना एवं देश काल की अपेक्षा से इनका एकत्र होना है । खुड्डाक- चतुष्पाद अध्याय में कहे अपने- अपने गुणों से युक्त होकर, देश, काल, प्रमाण, सात्म्य और क्रिया आदि सफलता देने वाले कारणों से विचार कर भी प्रकार दी हुई औषध का प्रयोग ही उपाय का लक्षण है । इस विधि से कारण आदि दस परीक्ष्य विषयों की पृथक् पृथक् परीक्षा करनी चाहिये ॥ १३० ॥
परीक्षायास्तु खलु प्रयोजनं प्रतिपत्तिज्ञानं । प्रतिपत्तिर्नाम-यो विकारो यथा प्रतिपत्तव्यस्तस्य तथाऽनुष्ठानज्ञानम् ॥ १३१ ॥
परीक्षा का प्रयोजन -परीक्षा का प्रयोजन 'प्रतिपत्ति' है अर्थात् जो विकार जिस प्रकार से जानना चाहिये और जिस उपाय से चिकित्सा करना चाहिये, उस रोग को वैसी चिकित्सा का ज्ञान करना 'प्रतिपत्ति' है ॥ १३१ ॥
यत्र तु खलु वमनादीनां प्रवृत्तिर्यत्र च निवृत्तिस्तद् व्यासतः सिद्धि- षूत्तरकालमुपदेक्ष्यते सर्वम् । प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षण संयोगे तु खलु गुरु- लाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदन्यतरनिष्ठायाम् । सन्ति हि व्याधयः शास्त्रेषत्सर्गापवादैरुपक्रमं प्रति निर्दिष्टाः । तस्माद् गुरुलाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदित्युक्तम् ॥। १३२ ॥ जिन रोगियों को वमन देना चाहिये और जिनको वमन आदि नहीं देना चाहिये, इन सबको पृथक् पृथक् आगे सिद्धिस्थान में कहेंगे ।
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STO = ] विमानस्थानम् ६०७ यदि एक ही पुरुष में वमन आदि कार्यों की प्रवृत्ति ( देने ) और निवृत्ति ( न देने ) दोनों कार्यों के लक्षण हों तब रोगों में गुरुता और लघुता भली प्रकार देख कर एक कार्य का निश्चय करना चाहिये, प्रवृत्ति और निवृत्ति के लक्षणों में से जिसके लक्षण गुरु हों वह कार्य करना चाहिये । दूसरे लघु- लक्षणों वाले कार्य को छोड़ देना चाहिये । क्योंकि शास्त्रों में ऐसे भी रोग हैं, जिनकी चिकित्सा विधि और निषेध रूप से कही है । शास्त्र में उपक्रम की प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही कही है । इनमें से एक कार्य का निश्चय गुरु, लघु देखकर करना चाहिये || १३२|| यानि तु खलु वमनादिषु भेषज-द्रव्याण्युपयोगं गच्छन्ति तान्यनु-व्याख्यास्यन्ते । तद्यथा- फल-जीमून केश्वाॐ - धामार्गव कुटज- कृतवेधन-फलानि, फल-जीमूतकेक्ष्वाकु धामार्गव पत्र पुष्पाणि आरग्बधवृक्षक-मदन- स्वादु-कण्टक-पाठा-पाटला-शाङ्खष्टमूर्वा-सप्तपर्ण-नक्त-माल-पिचु- मर्द- पटोल- सुषवी - गुडूची- चित्रक -सोमवल्क द्वीपि शिय-मूल-कषार्यश्च, मधुक- मधूक कोविदार -कर्बुदार -नीप-निचुल-विम्वी शणपुष्वीसदापुष्पी- प्रत्यक्पुष्पी-कषायंश्च, एला- हरेणु-प्रियंगु पृथ्वीका कुरुतगर-नलद- ह्रीवेर तालीश गोपी -कषायेश्व, इक्षुकाण्डविक्षुवालिका- भ-पोट-गलका- लंकृत-कषायैश्च, सुमना- सौमनस्यायनी-हरिद्रा-दारुहरिद्रा- वृश्चीर- पुनर्नवा- महासहा क्षुद्रसहा- कषायैश्व, शाल्मलि शाल्मलिक- भद्रपदापर्ण्यपादि-कोद्दालक- धन्वन- राजादनोपचित्रा-गोपी शृङ्गाटिका- कपायैश्च पिप्पली-पिप्पलीमूल -चव्य- चित्रक- शृङ्गवेर- सर्पप-फाणित- श्रीर- क्षार लवणोदकेश्व यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्तिक्रिया चूर्णावलेह स्नेह कषाय- मांस-रस - यबागू- यूष- काम्बल्टिक-क्षीरोपधेयान्मोदकानन्यांश्च योगान् far-धाननुविधाय यथाह वमनाय दद्याद्विधिवद्वमनमिति कल्पसंग्रहो बमनद्रव्याणाम् । कल्परत्वेषां विस्तरेणोत्तरकालमुपदेक्ष्यते ॥ १३३ ॥
मनोपयोगी द्रव्य: यमन आदि कार्यों में जो औषध द्रव्य काम में आते हैं उनका वर्णन करते हैं । जैसे-वमन द्रव्य फल (मदन फल ) जीमूत (तुरई) इक्ष्वाकु ( कड़वी तुरई ), धामार्गव ( कोपातकी ), कुटज ( कुड़ा ), कृतवेधन ( तुरई ) इनके फल लेने चाहियें । फल, जीमूत, ईक्ष्वाकु, धामार्गव इनके पत्ते और फूल | अमलतास, कुड़ा मैनफल, विकङ्कत, पाठा, पाटला, गुञ्जा, मूबो, सतवन, नाटाकरञ्ज, नीम, परवल, करेला, गिलोय, चीता, खैर, शतावरी, कंटेरी ( छोटी ), शोभाञ्जन इनकी जड़ों का कषाय बना कर देवे । महुवा,
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= चरकसंहिता [ अ० = मुलहठी, सफेद कचनार, लाल कचनार नीम, अम्लवेतस कन्दूरी, शनिवा ora आक, अपामार्ग इनका कषाय प्रयोग करना चाहिये । बड़ी इलायची, रेणुका (मेथी के बीज), फूल प्रियंगू, छोटी इलायचो, धनिया, तगर, जटामांसी, खस, तालीशपत्र, उशीर, नेत्रवाला इनके कषाय का प्रयोग करना चाहिये । गना, काण्डे, कुश, होगल, कसौंदी, तगर इनके कषाय को देवे । चमेली, चमेली की कली, हल्दी, दारूहल्दी, श्वेत पुनर्नवा, काल पुनर्नवा, माषपर्णी, मूंगपर्णी इनका कषाय देवे । सिम्बल, रोहेड़ा, भादाली, रास्ना, कलम्बी, बहुवार, धामन, क्षीरणी वृक्ष, पृश्नपर्णी, सारिवा, सिंघाड़ा इनका कषाय देवे । पिको, पिप्पलीमूल, चविका, चीता, सोंठ, सरसों, फाणित ( राब ), दूध, खार और नमक इनका कषाय देना चाहिये । अथवा इच्छा के अनुसार, दोष दूष्य की अपेक्षा से प्रयोजनानुसार वर्ति, चूर्ण, अवलेह, घी, तेल आदि, कषाय, मांसरस, यवागू ( लप्सी ), यूष, काम्बलिक, दूध, इनको मिलाकर बनाये लड्डू तथा अन्य खाद्य पदार्थ तैयार करके वमन के योग्य व्यक्ति को वमनविधि से खाने के लिये देना चाहिये । यह वमन द्रव्यों का कल्प संक्षेप में कह दिया है । वमन द्रव्यों के कल्प को पोछे कल्पस्थान में विस्तार से कहेंगे ॥ १३३ ॥
विरेचनद्रव्याणि तु श्यामा-त्रिवृच्चतुरंगुल-तिल्वक महावृक्ष -सप्तला- शङ्खिनी- दन्ती-द्रवन्तीनां क्षीर-मूळस्वक्पत्र-पुष्प फलानि यथायोगं तैस्तैः क्षीर- मूलस्वक्पत्र-- फलैर्विक्लिप्ताविक्लिप्तैरजगन्धाश्वगन्धाजशृङ्गी- श्रीरि- - नलिनी -क्लीतक कषायैश्च प्रकीर्योदकीर्या मसूर-विदुला-कम्पिल्लक- विडंग-गवाक्षी- कषायैश्य, पीलु-प्रियाल- मृद्वीका-काश्मर्य-परूषक-बदर-दाडिमामलक- हरीतकी -विभीतक वृश्चीर- पुनर्नवा विदारिगन्धादि कषा-, शीधु- सुरा -सौवीरक -तुषोदक- मैरेय- मेदक- मदिरा-मधु- मधूलक-धा- न्याम्ल- कुबल-बदर - खर्जूर- कर्कन्धुभिश्च दधि- दधिमण्डोदश्विद्भिश्व, गोमहिष्यजावीनां च क्षीर-मत्रैर्यथालाभं यथेष्टं वाऽप्युपसंस्कृत्य वर्ति- क्रिया- चूर्णासव -लेह -स्नेह- कषाय - मांसरस यूष काम्बलिक यवागू- क्षीरोप- घेयान्मोदकानन्यचि भक्ष्यप्रकारान् विविधांश्च योगाननुविधाय यथा । विरेचनाय दद्याद्विरेचनमिति कल्पसंग्रहो विरेचनद्रव्याणाम् । कल्प- स्त्वेषां विस्तरेण यथावदुत्तरकालमुपदेक्ष्यते ॥ १३४ ॥
* काम्बळिक यूष का लक्षण- 'पिशितेन रसस्तत्र यूषो धान्यैः खडः फलैः ।
मूलैम तिलकल्का प्रायः काम्बलिकः स्मृतः ॥ अष्टांगसंग्रह - सूत्रस्थान ॥
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अ० ] ३६ विमानस्थानम् ६०६ विरेचन द्रव्य -काली निशोथ, सफेद निशोथ, अमलतास, लोभ, स्नुहो, शिकाकाई, शंखपुष्पी, दन्ती, द्रवन्ती ( मोगलाई एरण्ड ) इनके दूध, मूल, त्वचा, पत्ते, पुष्प और फूल ये छः विरेचनाश्रय द्रव्यों को मिला कर अथवा पृथक पृथक रूप से प्रयोग करना चाहिये । अजवायन, असगन्ध हो, दूर्वा, नीलनी, मुलहठी, इन के कपराय कर देवे प्रकीर्य और उदकार्यं ( दो प्रकार का करंज ), श्यामलता, कमीला, वायविडंग, इंद्रायण इनके कपाय का उपयोग करे । पीलु, पियाल, मुनक्का, गम्भारी, फालसा, बेर, अनारदाना, अवका, हरद, बहेड़ा, श्वेत और लाल पुनर्नवा, विदारीगन्धा, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती और छोटो कटेरी ( ह्रस्वपंचमूल ) इनके काय का प्रयोग करना चाहिये । सीधु, मुरा, काजी, तुत्रोदक ( धान्याम्ल ), मैरेय ( सुरा और आसन को मिलाकर तैयार की सुरा ) भेदक, मदिरा, मधु ( द्राक्षा-सुरा ), मधूलिका, धान्याम्, कुवल, बदर और कर्कन्धु ( बेरों के भेद हैं ) और खजूर, दही, दही का मण्ड मस्तु, उदश्वित् ( दही में आधा पानी मिलाकर तैयार की छाछ ), गाय, भैंस, बकरी और भेद इनमें से जिसका मूत्र या दूध मिले उनसे वर्ति, चूर्ण, अवलेह, स्नेह, कपाय, मांस रस, यूप, कालिक,यवागू, वीर तथा लड्डू और अन्य खाद्य पदार्थों को तैयार करके विरेचन के योग्य व्यक्ति को विरेचन विधि से खाने के लिये देना चाहिये । यह विरेचन द्रव्यों का संग्रह
संक्षेप में कह दिया है । विस्तार से कल्पस्थान में कहेंगे ॥ १३४ ॥
आस्थापनेषु तु भूयिष्ठकल्पानि द्रव्याणि यानि योगमुपयान्ति तेषु तेष्ववस्थान्तरेष्वातुराणां तानि द्रव्याणि नामतो विस्तरेणोपदिश्यमाना- न्यपरिसंख्येयानि स्युरतित्रहुत्वात् इश्श्चानति संक्षेपविस्तरोपदेशस्तन्त्रे, इटुं च केवलं ज्ञानं, तस्माद्रसत एव तान्यनुव्याख्यास्यन्ते ॥ १३८ ॥
आस्थापन द्रव्यों में जो द्रव्य प्रायः रोगियों की अवस्था भेद से अनेक प्रकार से प्रयोग में आते हैं, वे औषध द्रव्य अधिक होने से एक एक का नाम कहने पर असंख्य हो जाते हैं । शास्त्र में न तो अधिक संक्षेप ओर न अधिक विस्तार होना चाहिये । इसलिये शास्त्र में सम्पूर्ण, सब बातों का ज्ञान ही अपेक्षित होता है । इसलिये आस्थापन द्रव्यों को यहाँ पर रस के द्वारा ( छः प्रकार से ) कहेंगे ॥ १३५ ॥
रस - संसर्ग- विकल्प- बिस्तरो ह्येषाम परिसङ्घ येयः, समवेतानां रसाना- शशिवलविकल्पाविबहुत्वात् । तस्माद् द्रव्याणां चैकदेशमुदाहरणार्थं रसेविभज्य सैकैकश्येन रसकैवल्येन च नामलक्षणार्थं पडास्थाप-नस्कन्धाः समूहरसतोऽनुविभज्य व्याख्यास्यन्ते । यत्त षड्विधमास्था-
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६१० चरकसंहिता [ अ० = पनमेकरसमित्याचक्षते भिषजस्तद् दुर्लभतमं, संसृष्टरसभूयिष्ठत्वाद् द्रव्याणाम् । तस्मान्मधुराणि च मधुरप्रायाणि च मधुरविपाकानि च मधुरप्रभावाणि च मधुरस्कन्धे मधुराण्येव कृत्वोपदेश्यन्ते तथेतराणि द्रव्याण्यपि । तद्यथा - जीवकर्षभको जीवन्सी- वीराधामलकी-काकोली-क्षीरकाकोली- भीरु मुद्गपर्णी-माषपर्णी-शालपर्णी-पृत्रिपर्ण्यसनपर्णी-मेदा-महामेदा- दारु- कर्कट-शृङ्गी-शृङ्गाटिका- छिन्नरुहा छत्रातिच्छत्रा श्रावणी-महाश्रावण्यलम्बुषा - सहदेवा. विश्वदेषा शुक्राक्षीर शुक्ला बलातिबला-विदारी- क्षीर- विदारी- क्षुद्रसह महासहायगन्धाश्वगन्ध- पयस्या- वृश्चीर-पुनर्नवा-बृहती-कण्टकारिकैरण्ड -मोरट- श्वदंष्ट्रा- संहर्षा शतावरी शतपुष्पा-मधूकपुष्पी- यष्टिमधु मधूलिका मृद्वीका-खर्जूर परूपकात्मगुप्रा पुष्करबीज-कशेरुका- राजादन- कतक-काश्मर्य शीतपाक्योदन-पाकीताल- खर्जूर-मस्त विक्षुबालिका-दर्भ -कुश-कास- शालि. गुन्द्रेत्कटक- शरमूल- राजक्षयक- प्रोक्ता · द्वारदा-भारद्वाजी-वनत्रपुष्य भीरुपत्री हंसपादी- काकनासा-कुलिङ्गा-क्षीरवल्ली-कपोतवल्ली -गोपवल्लो- मधुवल्लया सोमवल्ली चेति । छः रस होने पर भी इनके परस्पर मिलने से बहुत विस्तार हो जाता है, जिससे कि ये असंख्य बन जाते हैं । एक दूसरे में मिले रसों के अंशांध बल की विकल्पना से असंख्य भेद हो जाते हैं । इसलिये आस्थापन द्रव्यों के उदाहरण मात्र के लिये मधुर आदि छः प्रकार के रसों में एक एक का विभाग करके नाम मात्र से कहेंगे । बुद्धिमान् मनुष्य न कहे हुए द्रव्यों को भी समझ सकेंगे 1 अतः रस के अनुसार छः प्रकार विभाग करके नाम और लक्षण दर्शाने के लिये छ आस्थापन स्कन्धों को समूह रसों के अनुसार विभाग करके कहेंगे । वैद्य लोग छः प्रकार के आस्थापन स्कन्ध को शुद्ध एक रस वाला कहते हैं । यह बात अतिदुर्लभ है । क्योंकि द्रव्यों में एक अनेक रसों का परस्पर संसर्ग रहता है । इसलिये जो द्रव्य मधुर रस ( प्रायः करके ) बहुल मधुर विपाक और मधुर प्रभाव वाले ( अचिन्त्य शक्ति वाले ) हैं, उनके रसान्तर होने पर भी मधुर रस की प्रधानता होने से मधुर समझकर इस मधुर स्कन्ध में ही उपदेश करेंगे । इसी प्रकार अम्ड आदि द्रव्यों की भी व्याख्या करेंगे । यथा-जीवक, ऋषभक, जीवन्ती, वीरा ( शतावरी ), तामलकी ( भूम्या- मलकी ), काकोली, क्षीरकाकोली, भीरू ( सहस्रवीर्या, शतावरी का मेद ), मूँगपर्णी, माषपर्णी, शालपर्णी, पृभिपर्णी, शणपर्णी मेदा, महामेदा, देवदारु, areer, fourer, छिन्नसहा, ( गिलोय ) छत्रा, तालमखाना, अहिच्छत्रा
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अ० ८ ] विमानस्थानम ६११ ( सौंफ का भेद ), लाल कोकिलाक्ष, श्रवणी ( रक्तमुण्डेरी ), महाश्रावणी ( श्वेतमुण्डेरी ), अलंबुषा, सहदेवी, पीतपुष्पा ( बला ), विश्वदेवा लालफूल- वाली, दण्डोपला, शुक्ला, निशोथ, बला, अतिबला, विदारी, क्षीरविदारी, क्षुद्रसहा ( ऐन्द्री ), लालकुरवक, श्वेत कुरवक, भरासहा, कुजकतरणी, श्वेत कुरवक, ऋष्यगन्धा, असगन्ध, संदर्षा ( जन्तुकारी ), गोखरू, बन्दाक, शतावरी, सौंफ, महुए का भेद, मुलहठी, मधूलिका, किसमिस, खजूर, फालसा, कौंच, कमल के बीज, कसेरू, राजकसेरू, पियाल, कतक, गम्भारी, शीतला, नील झिण्टी, ताल और खजूर, मुस्तका, गबा, ईक्षुबालिका, दर्भ, कुश, काश, लाल चावल, गुन्द्रा ( शरभेद ), इत्कट, शरमूल, राज सरसों ( पीली सरसों ) ऋष्यप्रोक्ता वा शतावरी भेद कपिकच्छू ( कोचू ), द्वारदा, ( साल ) भारद्वाजी ( जंगली कपास ), जंगली खीरा, शतावरी भेद, ( हंसपादिका ) हंस के पवि के समान आकार की लता, काकनासा, पेटिका, क्षीरलता, छोटी इलायची, अनन्त मूल यष्टिमधु का भेद कपोतवल्ली ( ब्राह्मी भेद ) और सोमलता, गोपवली और मधुवल्ली । एषामेवंविधानामन्येषां च मधुरवर्ग- परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां लेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रश्नाय पानी- येनसाधयेसुप्रक्षालितायांसततमुपघट्टयनस्थाल्यां, तदुपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसिसमावाप्य पयसादिकेनाभ्यासिच्यगतरसेष्वप धेषु पयसि चानुपदग्धे स्थालीमपहृत्य सुपरिपूतं पयः सुखोष्णं घृत -तैल- वसा-मज्ज लवण-फाणितोपहिनं बस्ति वातविकारिणे विधिज्ञो विधि-वद्दद्यात्", शीतं तु मधुसर्पिमुपसंसृज्य वित्तविकारिणे विधिवद द्यादिति मधुरस्कन्धः ॥ १३६ ॥
इन अथवा अन्य इस प्रकार के मधुवर्ग में पठित औपव द्रव्यों में जो द्रव्य छेदन के योग्य हों, उनके टुकड़े २ करके और जो फोड़ने के योग्य हों, उनको फोड़कर छोटे २ टुकड़े बनाकर पानी से भली प्रकार धोकर थाली में रखना चाहिये । डेग ताम्बा, लोहा या मिट्टी को लेनी चाहिये । डेग को नीचे से लेप देना चाहिये । इस डेग में दूध में आधा पानी मिलाकर डाल देना चाहिये । इस डेग को अनि पर रख कर कोमल आंच से धीरे धीरे पकाना चाहिये । पकाते समय कड़छी से निरन्तर चलाते जाना चाहिये । जिस समय पानी लगभग सुख जाये, औषधियों में से रस निकल आये, दूध का जलना आरम्भ न हो, तब डेग को उतार कर वस्त्र से छान लेना चाहिये । फिर इस दूध को कुछ गरम रखकर ची, तेल आदि चर्चा, मजा का मेल आदि मिला कर
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६१२ चरकसंहिता wwwwwww | I = वातरोगी को विधिपूर्वक आस्थापन नामक बस्ति दे । दूध के ठण्डा होने पर घी या मधु far कर पित्त विकार के रोगी को विधिपूर्वक बस्ति दे । यह मधुर- स्कन्ध हुआ ॥ १३६ ॥
आम्राम्रातक- लकुच - करमर्द- वृक्षाग्लाम्लवेतस कुवल बदर- दाडिम- मातुलुङ्ग गण्डीरामलक - नन्दीतक-शीतक-तिम्तिडीक - दन्तशठेरावतक- कोषाधन्वनानां फलानि पत्राणि चाम्रातकाश्मन्तक- चारीणां चतु- विधान चालकानां द्वयोः कोलयोश्चाम-शुष्कयोर्द्वयोश्चैव शुष्काग्लिक- योर्माम्यारण्ययोः, वासव-द्रव्याणि च सुरा-सौवीर- तुषोदक- मैरेय- मेदक- मदिरा मधु सीधु-शुक्त-दधि-दधिमण्डोदश्विद्धान्याम्लादीनि च अम्लद्रव्यस्कन्ध-- आम, आमड़ा, बड़हल ( डहु ), करौंदा, इमली, अग्ल वेतस, कुवल और बदर ( बेर के मेद ), अनार, बिजौर, गण्डीर ( समष्टि, काका ) आंवला नन्दीतक ( तून ), जळलोटक ( कालमेघ ), निम्बु, ऐरावतक (नारंगी ), तिन्तिडीक ( अमली ), कच्चा आम और धन्वन (धामन), दन्तशट (कैथ) के फल, आम्रातक, अश्मन्तक ( कचनार का भेद) और चांगेरी ( शाक) इनके पत्ते, चारों प्रकार का इमली, शुष्क आम दोनों प्रकार के बेर, चार प्रकार की इमली, ( प्राम्य और जंगली शुष्क और आर्द्र भेद से चार प्रकार की) इनके पत्ते, आसव द्रव्य, सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मेदक, मदिरा, मधु, सीधु, शुक्त, दही, मस्तु, उदश्वित्, धान्याल आदि । एषामेवंविधानां चान्येषां चाम्ल वर्ग-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां लेद्यानि खण्डशइछेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा द्रवेः स्थिराण्य-वसिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावत्तैल- वसा मधु -मज्ज-लवण-फाणि-तोपहितं सुखोष्णं बस्ति वात- विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादित्य-म्लस्कन्धः ॥ १३७ ॥
अम्लस्कन्ध में गिने इन और इन के समान अन्य औषध द्रव्यों के टुकड़े करके, छोटा छोटा चूर्ण बना कर सुरा -सौवीर आदि द्रवों से सिंचन करके डेग में रख कर पूर्व की भांति सिद्ध करना चाहिये । सिद्ध होने पर इसमें तेल, बसा, मजा, नमक, राम मिळाकर थोड़ी गरम अवस्था में वातरोगी को विधिपूर्वक
आस्थापन बस्ति देनी चाहिये । यह अम्लस्कन्ध हे ॥ १३७॥
सैन्धव- सौवर्चल-कालविज्ञ-पाक्यानूप-कूप्य बालुकैल- मौलक-सामुद्र-रोमकौद्भिदौषर- पाटेयक पशुजानीत्येवंप्रकाराणि चान्यानि लवण-वर्ग-परिसंख्यातानि एतान्यम्लोपहितान्युष्णोदकोपहितानि वा स्नेहवन्ति सुखोष्णं वस्ति वातविकारिणं विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति लवणस्कन्धः ॥