देवासुराख्याति — पृष्ठ 21–30
देवासुर ख्याति · पृष्ठ 21–30
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नागवीथी से बिंषुत्रत्पर्यन्त भूलोक है । नागवीथी को ही आधुनिक ज्योतिषी कर्कवृत्त व उदगयनवृत्त कहते हैं । इस तरह सौम्य-गोलात्मक देवमण्डल ' में प्राकृतिक त्रैलोक्यविभाग है । इसी तरह दक्षिण की तरफ श्रसुरमण्डल में भी # लोक्यविभाग है । किन्तु देवयुगकालिक देवता देवत्रैलोक्य से भिन्न त्रैलोक्य को ' त्रैलोक्य-शब्द से व्यवहृत न कर प्रान्तापरपर्याय दिक शब्द से व्यवहृतं करते थे । अतः दक्षिणीय श्रासुरत्रैलोक्य दिक कहलाता है । + इस तरह प्रकृति में नाक, त्रैलोक्य, देवयान व दिक् भेद से चार प्रकार की अपौरुषेय लोकसृष्टि थी । मानुष ब्रह्मा ने इसी अपौरुषेय लोक-सृष्टि के आधार पर मानुष ऋषि, पितर, देव आदि प्रजाओं के निवास के लिये पृथिवी में लोकविभागं की व्यवस्था की । जैसे-आकाश में द्विविध ध्रुवस्थान की तरह पृथिवी में दो प्रकार का मेरुस्थान है, एक विष्णुपद और दूसरा ब्रह्मपद । पृथिवी अपनी धुरी पर रात दिन में घूमती हुई: पश्चिम से पूर्व की तरफ जाती है, इसका निरूपण ऋग्वेद में मिलता है: - " यज्ञ इन्द्रमवर्धयत् । तद् भूमिं व्यंवर्तयत् । चक्राण श्रपरां दिवि " । इस पृथ्वी पर ३७ अक्षांश व १४ कला चौड़े तथा ७४ अझांश व १८ कला लम्बे प्रदेश का एक वूझसर है इसी को वैदेशिक आज कल पामीरकुल कहते हैं । और इसी ब्रह्मसर के पास हिरण्यशृङ्ग पर्वत के नीचे के मार्ग में विष्णुसर नामक सर है जिसे पौराणिक विन्दुसर तथा आधुनिक सरीकुलहद कहते हैं । इन दोनों के बीच
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- * २०, * -के प्रदेश से सप्तगङ्गनामक सात स्रोत निकल कर चौतरफ बहते हैं । वे स्रोत जहां से निकलते हैं, वही स्थान मेरुस्थान कहलाता है । उस सुमेरुस्थान से आरम्भ कर दिव्यस्वर्गपरिमित भाग पौरुषेय लोकसृष्टि का स्वर्गलोक है । उसके बाद देवयानपरिमित प्रदेश अथवा उससे कुछ न्यून प्रदेश पौरुषेय लोकसृष्टि क अन्तरिक्ष लोक है और उसके नीचे विषुवत्वृत्त पर्यन्त प्रदेश पौरुषेय लोकसृष्टि का भूलोक है । इन तीनों लोकों से भिन्न पृथिवीस्थित प्रदेश दिक् कहलाते हैं । जैसे देवत्रैलोक्य में और दिशा प्रदेशों में दिव्य प्राणरूप ऋषि, पितर, देव, असुर आदि रहते हैं उसी प्रकार इस भौमत्रैलोक्य और भौमदिक् प्रदेशों में मानुष ऋषि, पितर देव, असुर आदि निवास करते हैं । उपयुक्क रीति से अपौरुषेय व पौरुषेय भेद से द्विविध लोकसृष्टि का निरूपण करने के बाद इस पुस्तक में प्रसङ्गवश अष्टविध त्रैलोक्य का निरूपण किया गया है. ४- धर्मसृष्टि क यह पहिले कहा जा चुका है कि मानुषत्रह्मा ने प्रकृति के. आधार पर चार प्रकार की सृष्टि की रचना मनुष्यसमाज में की थी । उसमें से तीन प्रकार की सृष्टि का निरूपण किया जा चुका है अब चौथी धर्मसृष्टि अवशिष्ट रही है । उसीका निरूपण सामान्यतया इस प्रकरण में किया जा रहा है । जैसे मानुष ब्रह्मा ने यज्ञ व विज्ञान के द्वारा विज्ञान क
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प्रचार यहां मानवसमाज में किया उसी प्रकार समाज के संगठन के लिये तथा उसमें कर्मसंस्कार को व्यवस्थित करने के लिये यहां चातुर्वर्ण्य व चातुराश्रम्य की व्यवस्था भी की । ब्रह्माने यहां मानवसमाज में जिस चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था की थी उस चातुर्वर्ण्य का मूल भी अनादि नित्यसिद्ध चातुर्वर्ण्य ही था जिसका साक्षात्कार प्रकृति में उन्होंने अपनी विज्ञानमहिमा से किया था । उसने केवल उस अनादिसिद्ध चातुर्वर्ण्य को, जो कि प्रकृति में गुण व कर्म के आधार पर व्यवस्थित था, समाज में वंशपरम्परा से सम्बद्ध कर जातिसिद्ध बना दिया । क्योंकि यहां ब्रह्मा द्वारा संस्थापित चातुर्वर्य, अपौरुषेय चातुर्वर्ण्य के आधार पर निर्मित था अतः चातुर्वर्ण्य व चातुराश्रम्य संस्थापनरूप धर्मसृष्टि भी अन्य सृष्टियों की तरह अपौरुषेय व पौरुषेय भेद से द्विधा विभक्त हो जाती है । कालविभाग से एक व्यक्ति के द्वारा अनेक कार्य सम्पादन करने के लिये चातुराश्रम्य तथा बहुत व्यक्तियों के द्वारा एक कालावच्छेदेन अनेक कर्म सम्पादन करने के लिये चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था की गई थी । वस्तुत: यह चातुर्वर्ण्य पांच प्रकार का है १- वैज्ञानिक चातुर्वर्ण्य, २ - यज्ञचातुर्वर्ण्य, २ - छन्दः धातुर्वर्ण्य, ४ - कर्म विभाग-चातुर्वर्ण्य तथा ५ - धर्म चातुर्वर्ण्य । इनमें से प्रारम्भ का तीन प्रकार का चातुर्वर्ण्य आध्यात्मिक है तथा अन्तिम दो प्रकार का सामा-जिक 1 प्रारम्भ में उद्देशक्रमानुसार आध्यात्मिक चातुर्वण्यों का ही निरूपण किया जाता है-
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१. वैज्ञानिक चातुर्वर्ण्य — * २२ प्रत्येक मनुष्य कार्यसिद्धि: के लिये सर्वप्रथम अध्यवसाय ( मानसिक निश्चय ) करता है तदनन्तर व्यवसाय ( उत्साहपूर्वक तदनु कूल कार्य ) करता है । उसके बाद ही अभीष्ट फल की प्राप्ति अर्थात् कार्यसिद्धि.. होती है । इनमें अध्यवसाय ब्रह्मवीर्य, व्यवसाय क्षत्रवीर्य एवं श्री विड्वीर्य है । यही वैज्ञानिक चातुर्वर्ण्य है जो कि प्रत्येक प्राणी में रहता है । इसका निरूपण " क्रतुदक्षौ ह वा " इस यजुर्वेदश्रुति में किया गया है । २ -- यज्ञ चातुर्व ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । इत्यादि ऋग्वेदीयश्रुति में जिस चातुर्वर्य का निरूपण है वह यज्ञचातुर्वर्ण्य है । इस श्रुति में मुखमण्डल से विज्ञान, बाहुमण्डल • तथा ऊरुमण्डल से उत्साह, उदर ऊरु तथा मध्यमण्डल से अन्नाघान एवं पाद से बाह्य शूद्रकर्तव्यों का ग्रहण है । विज्ञान, ... उत्साह, अन्नाधान तथा शूद्रोपचार ये ही चार प्रकार के बल हैं । इनमें विज्ञान ब्रह्मवीर्य, उत्साह क्षत्रवीर्य तथा श्रन्न विड्वीर्य है । यह चैवर्ण्य भी प्रत्येक मनुष्य में रहता है, क्यों कि प्रत्येक मनुष्य भन्नरूप समृद्धि की प्राप्ति चाहता है, उसकी प्राप्ति के लिये उसे - उत्साह करना पड़ता है और उत्साह के लिये उसे विज्ञान का प्राय लेना पड़ता है । इस तरह विज्ञान, उत्साह व अन्नरूप. समृद्धि की सच्चा प्रत्येक प्राणी में रहती है । यह यज्ञचातुर्वर्य भी सामाजिकचातुर्वर्ण्य के निर्माण में उदाहरण बनता है ।
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३ - - छन्दश्चातुर्वर्ण्य --२३ “ गायत्रो वै ब्राह्मणः 1 । तेजो वै ब्रह्मवर्चसं गायत्री । त्रैष्टुभो राजन्य: । ओजो वा इन्द्रियं वीर्यं त्रिष्टुप् । जागतो वैश्यः । जागताः पशवः । " यह ऐतरेयश्रुति छन्दश्रातुर्वर्ण्य का प्रतिपादन कर रही है । उपर्युक्त श्रुति में ब्राह्मण को गायत्रीच्छन्द से युक्त, क्षत्रिय को त्रिष्टुप छन्द से युक्त और वैश्य को जगतीछन्द से युक्त बतलाया है । गायत्री छन्द से ब्रह्मतेज, त्रिष्टुप् छन्द से श्रज तथा जगती छन्द से पशु अर्थात् अन्नधन आदि भोग्यजात का ग्रहण है यह बात भी श्रुति में बतलाई गई है । ज्ञान के प्राधिक्य से जो शरीर में प्रभावविशेष पैदा होता है वह ब्रह्मवर्चस कहलाता है । हृदय के उत्साह से पैदा होने वाला प्रभावविशेष श्रोज थ वीर्य कहलाता है । इसी तरह अन्न धन आदि की उत्पत्ति के लिये उसके साधनों में लग जाने का व्यापार पशुवीर्य कहलाता है । उपर्युक्त तीनों तत्वों की सत्ता भी प्रत्येक व्यक्ति में होती है । शरीरान्तर्वर्ती विभिन्न प्रभावविशेषों से निर्मित छन्दश्चातुर्वर्ण्य भी प्रत्येक आत्मा में रहता है, और यह कार्य भी सामाजिक चातुर्वर्ण्य की स्थापना में मुत्त पड़ता है । . ~ कर्मविभागातु untergerunt भ. my any उपर्युक्त वैज्ञानिक व अपौरुषेय त्रैवर्ण्य व चातुर्वर्ण्य के आधार पर मानुषब्रह्मा ने इस लोक में सामाजिक चातुर्वर्ण्य की स्थापना की ।; यह चातुर्वर्ण्य यद्यपि सामाजिक हैं और समाज व्यवस्था यद्यपि अनित्य व परिवर्तनशील है तो भी इस सामाजिक चातुर्वर्ण्य सङ्गठन को समाज की उन्नति व सुचारु व्यवस्था के लिये
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२४ -अपरिवर्तनशील व आवश्यक माना गया है । सामाजिक कर्तव्यों को प्रधानतया विज्ञान, दण्डधारण, वाणिज्य व शिल्प इन चार • विभागों में विभक्त कर उन कर्तव्यों के अनुसार सामाजिक चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था लोक में की गई । किन्तु इन कामों में -प्रवीणता व सुचारुता इन कर्मों के वंशक्रमानुगत होने से ही हो 1 सकती है । इसी रहस्य को ध्यान में रख कर प्रारम्भ में कर्मप्रधान चातुर्वर्ण्य अन्ततोगत्वा जातिचातुर्वर्ण्य में परिणत -कर दिया गया । कितने ही इस चातुर्वर्ण्य को कर्मकृत, अनित्य मानते हैं न कि जन्मसिद्ध, और इस विषय की पुष्टि के लिये वे निम्नलिखित प्रमाण देते हैं-“ ब्रह्म वा इदमय आसीदेकमेव । तदेकं सन्न व्यभवत् । बच्छू यो रूपमत्यसृजत क्षत्रम् ॥ स शौद्रं वर्णमसृजत । " यह शतपथश्रुति ब्रह्म के द्वारा चातुर्वयै की उत्पत्ति बतलाती हुई उसकी व्यवस्था को अनित्य सिद्ध कर रही है । इसी तरह " चातुर्वर्ण्य मया सृष्ट गुणकर्मविभागश: ' p ” इस गीतास्मृति में भी चातुर्वर्ण्य की गुण व कर्म द्वारा ही उत्पत्ति
बतलाई गई है-न. विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत् ।
बूह्मणा पूर्वसृष्ट ं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् ॥
यह महाभारत का पद्य भी सभी वर्णों की सामान्यतया ब्रह्म से उत्पत्ति तथा कर्मों द्वारा ही चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था को सिद्ध कर
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६५ * -रहा है । भविष्यपुराण में षष्ठीकल्म में भी यही बात बतलाई: सई है । ऐतिहासिक उदाहरण भी इसी बात की पुष्टि कर रहे हैं । जैसे विदथी भारद्वाज जन्म से ब्राह्मण होने पर भी शकुन्तला के पुत्र भरत का, जो कि क्षत्रिय था, पुत्र बना और क्षत्रिय बन गया । क्षत्रिय इक्ष्वाकु का सोदर भाई दृष्ट बाद में ब्राह्मण बन गया । अम्बरीष राजा का पौत्रभूषित शूद्र बन गया था । ऐलूष कवड शुद्र जाति का होने पर भी बाद में ब्राह्मण बन गया था । इस तरह और भी बहुत से उदाहरण इतिहास में ऐसे मिलते हैं जिन में जन्म के बाद वर्णों का विपर्यास बतलाया गया है । धर्मसूत्रकारों ने भी – “ जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते । ” इत्यादि उक्तियों द्वारा संस्काररूप कर्म से द्विजत्व बतला कर चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को कर्म द्वारा ही सिद्ध किया है, श्रतः चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को जन्मसिद्ध न मान कर कर्मसिद्ध ही मानना चाहिये । उत्तरपक्ष - उपर्युक्त श्रुतियां व स्मृतियां यद्यपि चातुर्वर्य व्यवस्था को कर्मसिद्ध बतला रही है पर ऐसी श्रुति वः स्मृतियां भी विद्यमान हैं जी चातुर्वर्ण्य को अनादि व नित्यसिद्ध अर्थात्
· जन्मजात बतला रही है जैसे: -ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् वांहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥
यह मन्त्रश्रुति यज्ञपुरुष के नित्यसिद्ध मुख बाहु उरु व
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२६ पाद रूप अंगों से ब्राह्मणादित्रिवर्णों की उत्पत्ति बतला कर चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की अनादिता व नित्यसिद्धता ( जन्मसिद्धता ) ही सिद्ध कर रही है । इसी तरह से प्रजापतिर कामयत, ' प्रजायेय इति । स मुस्तस्त्रिवृतं निरमिमीत । तमग्निर्देवता अन्य सृजत । गायत्रीच्छन्दो रथन्तरं साम । ब्राह्मणो मनुष्याण । मजः पशूनाम् ” तस्मात्ते मुख्याः .... इत्यादि वाजसनेयश्रुति भी प्रकृतिसिद्ध स्तोम, छन्द, पशु, साम की तरह मनुष्यों में भी नित्यरूप से वर्तमान भिन्न - भिन्न देवतांशों का सम्बन्ध बोधन कर उन वर्णों में मिन्नजातीयता ही सिद्ध कर रही है । भेद इतना है कि त्रिवृदादि स्तोम, गायत्री आदि छन्द, रथन्तर आदि सोम तथा अज आदि पशुओं में भिन्न - भिन्न देवतांश का सम्बन्ध केवल प्रकृतिसिद्ध है और मनुष्य में प्रकृतिसिद्ध तो है ही किन्तु साथ ही संस्काररूप कर्मसिद्ध भी है, क्योंकि मनुष्यों की मानसशक्ति की विशेषता से कमों में स्वतन्त्र प्रवृत्ति होती है और वह पतनीय कर्मों में भी प्रवृत्त होजाता है । जिससे उस देवताशक्ति की न्यूनता एवं श्रस्तव्य तता हो जाती है । यतः उसका परिहार करने के लिये एवं उस देवतांश की दृढ़ता के लिये " उसे संस्कारविशेषों की आवश्यकता होती है । एतदर्थ ब्राह्मणादिकों के लिये उपनयन आदि ब्राह्म व दैवसंस्कारों का विधान है । इसी लिये वशिष्ठस्मृति में स्पष्ट तौर से यह लिखा है कि – “ प्रकृतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्य, संस्कारविशेषाच ” चातुर्वर्य प्रकृतिसिद्ध व नित्य है, किन्तु उसकी
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२० • उत्पत्ति संस्कारविशेष ( कर्मविशेष ) से. भी है । अर्थात् प्रकृति-सि चातुर्वर्ण्य में पतनीयकर्म द्वारा आने वाले दोषों के परिहार के लिये संस्कारविशेष की भी आवश्यकता है! उपर्युक्त सन्दर्भ से यह स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि वस्तुतः चातुर्वर्ण्य प्रकृतिसिद्ध ( जन्मजात ) ही है किन्तु उसकी पुष्टि के लिये तदनुकूल कर्मों की आवश्यकता है । 1 " " E कितने ही ऐसा मानते हैं कि चातुर्वर्ण्य तीन प्रकार का ६–१ - संस्कारोपयुक्त, २ – संस्कारसिद्ध व ३ – संस्कारव्रतरूप । इन में प्रथम प्रकार का चातुर्वण्य जन्मसिद्ध है क्योंकि बाह्मण से ब्राझणी में पैदा हुए बालक के ही धर्मशास्त्रों में ब्राह्मणोचित संस्कार बतलाये संस्कारों के लिये उपयुक्ततारूप चातुर्वर्ण्य ' जन्मसिद्ध है जब तक चालक में इस चातुर्वर्ण्य की स्थिति त होगी तब तक रूस में संस्कारों को प्रधान अशक्य होने से द्वितीय, संस्कार सिद्धरूप कर्मसिद्ध चातुर्वर्य की उत्पत्ति ही नहीं हो सकेगी । इसी अभिप्राय से वशिष्ठस्मृति में द्विजन्मा का दो बार जन्म बतलाया गया है, पहला जन्म माता पिता से तथा
दूसरा उपनयन यादि संस्कारों से । जैसे-" मातुरप्र ऽधिज्ञननं द्वितीय मौजिवन्धने ।
तत्रास्य मात्रा सावित्री प्रिवा त्यावार्य उच्यते ॥
" पर्युक रीति से प्रतिप दिन द्विविध चातुर्वर्ण्य में प्रथम जन्म सिद्ध तथा द्वितीय संस्कार सिद्ध है । प्रथम प्रकार के चातुर्वर्ण्य
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९ २८ से बालके में संस्काराधानयोग्यता सिद्ध होती है और द्वितीय से उसमें चातुर्वएर्योपयुक्तं तत्तत्संस्कारों का आप नि होता है । किन्तु इस संस्कारसिद्ध चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति हो जाने पर भी अनुचित पतनीय कर्मों के भाचरण से उस चातुर्वर्ण्य के नाश का भय है अतः तद्भार्थं तदनुकूल व्रतरूप कर्मों के ' ' आचरण की भी यावज्जीव आवश्यकता है । तदनुकूल तों का आचरण ही संस्कारव्रतरूप तृतीय प्रकार का चातुर्वर्ण्य है यही कर्मसिद्ध चातुर्वण्य है । तीनों प्रकार का चातुर्वर्ण्य समाज-व्यवस्था के लिये आवश्यक है और तीनों प्रकार का चातुर्वर्ण्य ही वस्तुतः चातुर्वर्ण्य है । इसी लिये-" त्रीणि यस्यावदातानि विद्या योनिश्च कर्म च । स ब्राह्मण इति ज्ञेयस्त्रयं ब्राह्मण्यलक्षणम् ॥ ” ऐसा अभियुक्तो ं ने कहा है । गौतम आदि धर्मसूत्रकारों ने भी द्विजाति का लक्षण बतलाते हुए तीन प्रकार के चातुर्वर S का समावेश द्विजाति के लक्षण में किया है । उपर्युक्त रीति से संस्कारोपयुक्त, संस्कारसिद्ध व संस्कार-व्रतरूप से त्रिधा विभक्त चातुर्वर्ण्य में उत्तरोत्तर के प्रति पूर्व - पूर्व को कारणता है । इनमें पहिला संस्कारोपयुक्त ( जातिचातुर्वर्ण्य ) क्षेत्ररूप है । दूसरा संस्कारसिद्ध ( संस्कार चातुर्वर्ण्य, बीजरूप है । तीसर । संस्कारव्रतरूप चातुर्वर्ण्य संस्कारचातुर्वर्ण्य का तूलरूप ( फलरूप ) है | जैसे विना क्षेत्र के वीज वपन नहीं किया जा सकता,