देवासुराख्याति — पृष्ठ 31–40

देवासुर ख्याति · पृष्ठ 31–40

पृष्ठ 31

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I उसी प्रकार जातिचातुर्वर्ण्य के बिना संस्काराधानरूप कर्मचातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती । और संस्काराधानरूप कर्मचातुर्वर्ण्य के बिना अन्तिम संस्कारव्रतरूप चातुर्वर्ण्य नहीं बन सकता । अतः क्षेत्ररूप जातिचातुर्वर्ण्य सब का मूल होने से सब से अधिक महत्त्वशाली है । इस तरह जातिचातुर्वर्ण्य श्रनादिसिद्ध ही है व आवश्यक है जैसे शिर, वक्ष: स्थल, मध्यभाग व चरण आदि से शरीर व भूतात्मा सङ्गठित होता है उसी तरह विज्ञान प्रधान, वीर्यप्रधान, अन्नप्रधान व परिचर्याप्रधान चारों वणों से समाज व विश्वात्मा सङ्गठित सिद्ध होता है । जैसे शरीर के एक अङ्ग के विच्छिन्न व कमजोर हो जाने पर शरीर व भूतात्मा विच्छिन्न हो जाता है उसी तरह मानवसमाज में चातुर्वर्ण्य के किसी एक भी भाग के उच्छिन्न होने से समाज व विश्वात्मा की स्थिति उच्छिन्न हो जाती है । अत: समाज की स्थिति के लिये. चातुर्वर्ण्यव्यवस्था अत्या-वश्यक है । जातिशब्द प्रयोग विचार-जैसे पशु व पक्षी आदि में परस्पर भेदव्यवहार के लिये जातिशब्द का प्रयोग किया जाता है उसी तरह: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र वर्णों का भी परस्पर भेद करने के लिये उनमें भी जातिशब्द का प्रयोग किया गया है । किन्तु विचारणीय बात. यह है कि ब्राह्मणादिः वर्णों में जाति शब्द का प्रयोग सत्य है । या नहीं?:

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३० भगवान् उपवर्ष, व्याडि, पतञ्जलि व मीमांसक आकृति को नाति बतलाते हैं और आकृति वस्तुनिष्ठ सामान्यधर्म है, अतः तन्मतानुसार वस्तुनिष्ठ सामान्यधर्म ही जाति ठहरता है । ब्राह्मणादि । वर्णों में मनुष्यत्वरूप सामान्यधर्म है: जो कि चारों वर्णों में समान है अतः उसमें जातिशब्द · र हो सकता है किन्तु केवल ब्राह्मणों में, केवल तन्त्रियों व बैया में ऐसा कोई सामान्य आकार नहीं है जिससे उनमें जातिशब्द का प्रयोग किया जा सके अतः ब्राह्मणत्वादि में जातिशब्द का प्रयोग उचित नहीं है । - नैयायिकमतानुसार सामान्य धर्म जाति है । किन्तु वह सामान्यधर्मे श्रवयवसन्निवेशविशेष आकार से भिन्न वस्तु है । इसी लिये अभियुक्तों ने " आकृतिग्रहणा जातिः ” अर्थात् जाति कां ग्रहण आकृति से होता है ऐसा कहा है न कि आकृति को ही जाति बतलाया है । इनके मत में सामान्य धर्म स्वण्डोपाधि है और वह अखएडोपाधिरूप सामान्य धर्म ब्राह्मणादि वणों में रह सकता है अतः वहां जाति शब्द का प्रयोग उचित है । जो धर्म भिन्न वस्तुओं में समान व्यबहार व ज्ञान करा सके उसे जाति कहते हैं । जैसे भिन्न - भिन्न गोव्यक्तियों में जिस धर्म को लेकर यह भी गौ है यह भी गौ है ऐसा समान व्यवहार होता है यह गोत्वादि धर्म जाति कहलाता है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि में । यह " भी मनुष्य है इत्याकारक समान व्यवहार मनुष्या को लेकर होता है अतः मनुष्यत्व धर्म जाति कहला सकता है किन्तु सभी ब्राह्मण व्यक्तियों में ऐसा कोई अनुस्यूत.

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धर्म नहीं है जो हम सब ब्राह्मण व्यवसथों में रह भी बक्षण है यह भी वाह्मण है इत्यादि सम्मान प्रत्यया करा सकें! ब्राह्मणत्वादि धर्म में जातिव्यवहार उचित नहीं है, ऐसा परमर्षि गौतम का मत है । वैयाकरणों ने जाति शब्द के प्रयोग में चार कारण माने -आकृतिनिबन्धन, २- गौत्र निबन्धन, ३ च्चरणनिबन्धन, ४- सकृदाख्यातधर्मनिबन्धन । HE I STOPDIE DIER IF 40 m Var Y १. आकृतिनिबन्ध जिनकी समान आकृति हो उनमें जाति शब्द का प्रयोग है । जैसे पशुपा SIP DE UP FX PEIF I PE ay 1947 A BIE- ZD समान जी का लिकर जो ' तिव्यवहार होता गोत्रनिबन्धन जातिव्यवहार पुलस्त्य, पुलह, किंतु, पॅशिष्ठ, V श जैसे में -भृगु, अहिरा, अत्रि, आदि में " भृगु, अङ्गिरा आदि aat sexi गौतम, भारद्वाज आदि जातिबोधक हैं इतिहास में पुराणों में जहां अत्यन्त कालव्यवधान बाद भी वशिष्ठ आदि की सत्ता बतलाई गई है वहाँ उस शब्द को जातिवाचक ही समझना चाहिये, व्यक्तिपरक नहीं BEPE । इस B लिये नहुष राजा के, रघु के तथा श्री रामचन्द्र के काल में भिन्न मिन ही वशिष्ठ व्यक्ति में किन्तु उन सब के वशिष्ठगोत्रीय "

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३२-अर्थात वशिष्ठजातीय होने से • गोत्र नाम को लेकर सब के लिये वशिष्ठ शब्द का प्रयोग किया गया है । ३. चरण निबन्धन-वेद की शाखाओं का नाम चरण है । ततदूवेदशाखाओं ' का अध्ययन करने वाले तथा उनके अध्ययन करने के लिये तदनुकूल तत्तत्शाखाविहित व्रत करनेवाले सभी व्यक्ति एक जाति वाले माने जाते हैं; और उनके लिये भी जाति शब्द का प्रयोग होता है । उनमें जाति शब्द का प्रयोग चरण निबन्धन है जैसे--कठ, चरक, वॉजसनेय आदि वैदिकशास्त्रावाचक शब्द । ४. सकृदाख्यातधर्म - निबन्धन— धर्म को लेकर भी जाति शब्द का प्रयोग होता है अर्थात् एक व्यक्ति में किसी एक धर्म का मालूम करने से उस वंश वाले अन्य व्यक्तियों में भी उस धर्म का परिज्ञान होजाय तो वहां तद्धर्मनिबन्धत जाति शब्द का व्यवहार होता है जैसे -- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र आदि में । इनमें एक व्यक्ति में ब्राह्मणत्व, आदि का परिज्ञान दो जाने के बाद तद्वंशधर अन्य व्यक्तियों में भी ब्राह्मणत्व आदि का ज्ञान हो जाता है अतः ब्राह्मण यादि भी जातियां " है और वे ब्राह्मणत्वादिधर्ममूलक हैं । इस वैयाकरण-मतानुसार ब्राह्मण आदि वर्णों में जाति शब्द का " प्रयोग समीचीन व उपयुक्त है । 7 यद्धति उपर्युक् ति से मासादि को, जाविवाचक शब्द परीख से सम्मानमा नावि: " इस

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* ३३ ** गौतमसूत्र का विरोध होता है, तथापि प्रसव 1 लौकिक वैदिक- " मैद से दो प्रकार का है । उस में लौकिक प्रसव के ब्राह्मणादि में समान न होने पर भी वैदिक प्रसव उनका समान है । वेद बतला रहा है कि ब्राह्मण की गायत्री छन्द से, क्षत्रिय की त्रिष्टुप छन्द से, वैश्य की जगतीछन्द से रचना होती है अतः ब्राह्मण में गायत्री- छन्दरूप समान प्रसव है और क्षत्रिय में व वंश्य में त्रिष्टुप् तथा जगतीछन्दरूप समान प्रसव है । अतः ' वैदिक प्रसव को लेकर “ समानप्रसवात्मिका जातिः ” इस गौतम-सूत्र का समन्वय हो जाता है । अभिदेवताक आठ अक्षर वाले गायत्रीछन्द से ब्राह्मण का निर्माण होता है अतः यस्थात्मक आग्नेय प्राण का ब्राह्मण में आसअन करने के लिये आठवें वर्ष में ब्राह्मण के उप-: नयन संस्कार का विधान है । क्षत्रिय का निर्माण इन्द्रदेवताक: ११ अक्षर वाले त्रिष्टुप छन्द से होता है । अतः एकादश-रुद्रात्मक इन्द्र प्रारण का आधान करने के लिये ११ वें वर्ष में क्षत्रिय के उपनयनादि संस्कार किये जाते हैं । वैश्य का निर्माण आदित्य देवताक द्वादशाक्षर जगतीछन्द से होता है अतः द्वादश आदित्यात्मक वैश्वदेव प्राण का आधान करने के लिये वैश्य में. उपनयनादि संस्कार १२ वें वर्ष में किये जाते हैं । देव मनुष्य, तैर्यग्योन भेद से विभित्र त्रिविध झाड सृष्टि में मनुष्य सृष्टि रजोगुणप्रधान है तथा उसका निर्माण देवी

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४ --व.. आसुरी उमयविष ' ' मिश्रित सम्पत्ति से हुआ है । उसमें: दैववशात् वा कर्मवशात् किसी में दैवी सम्पत्ति का तथा किसी में आसुरी सम्पत्ति का प्रधानतया विकास होता • है । इस लिये कहीं - कहीं ब्राह्मणो में भी श्रासुरी सम्पत्ति का तथा कहीं - कहीं शूद्रों में भी देवी सम्पत्ति का विकास हो जाता है । इसी लिये. कहीं - कहीं ब्राह्मणों में पूर्वजन्मकृतकर्मवशात् निकृष्ट प्रारण के सम्बन्ध से विज्ञान की न्यूनता तथा शिल्पादि का एवं आसुरी भ्भावों का विकास देखा जाता है । इसी तरह कहीं कहीं शूद्रों में भी उत्कृष्ट प्राणविशेष के सम्बन्ध से: विज्ञान का तथा देवी सम्पत्ति का विकास देखा जाता है । इस तरह का आकस्मिक, प्रयननिरपेक्ष अर्थात् जातिसिद्ध व संस्कारादिनिरपेक्ष उत्पत्तिशिष्ट चातुर्वर्ण्य देखा जाता हैं पर इस तरह का अकृत्रिम चातुर्वर्ण्य समाजव्यवस्था का ' अनुप्राहक नहीं है; और इस प्रकार के अकृत्रिम आकस्मिक चातुर्वर्ण्य को किसी - किसी व्यक्ति में देख कर सामाजिक संस्क | रसिद्ध कृत्रिम चातुर्वर्ण्यव्यवस्था को निरर्थक नहीं समझना चाहिये । लोक में यह देखा जाता है कि कोई - कोई व्यक्ति धन-लाभादि के उचित प्रयत्नों का अवलम्बन करने पर भी दैवप्राति-कूल्य से उस में सफल नहीं होता, पर इतने से ही उसके लिये किये जाने वाले उपायों को कोई निय्यक मान कर छोड़ता नहीं हैं अपितु पुनः पुन समाज उसमें प्रवृत होता ही है । उसी तरह

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कहीं - कहीं संस्कारादि के करने पर भी यदि प्रतिकूलदैववशा अथवा प्रबल निकृष्टप्राणविशेष: के सम्बन्ध * से उसमें सात्विक गुणों का व विज्ञान का विकास न भी हो तो भी उसे व्यर्थ नहीं माना जा सकता । जन्म से असुरप्रधान सम्पद् वाले.. ब्राह्मण भी अपने आप में सात्विक व दैवी सम्पद् के विकास के लिये ब्राह्मण्याधायक - संस्कारों का व तदनुकूल कर्मों का आचरण करमा ही चाहिये । जिससे बे जन्मजाते श्रासुरी सम्पत्ति को हटा कर अपने श्राप में दैवी सम्पत्ति का विकास कर सकेँ । उपर्युक्त रीति से विज्ञामदृष्ट, सित्य, जन्मसिद्ध यह चातुर्वर्ण्यव्यवस्था श्रादित्रेतायुग में समाजहित के लिये वंश-परम्परा से सम्बद्ध कर लोक में; प्रचारित की गई और समाज के बहुत से व्यक्ति इस व्यवस्था को लोकहितकारिणी समझ कर इस व्यवस्था में सम्मिलित हो गये । किंन्तु कितने ही व्यक्तियों ' नें इस व्यवस्था को अपनी स्वतन्त्रता में विघातक समझ कर इसे स्वीकार नहीं किया और इस व्यवस्था में प्रविष्ट नहीं हुए । इस तरह तात्कालिक समाज दो विभागों में विभक्त हो गया । एक इस चातुर्वएर्यव्यवस्था को मानने वाले थे । ये ' मरिणज ' संज्ञा से व्यवहृत होते थे । ये ग्राम, नगर व्यादि का यथावत् निर्माण कर नियमानुसार कार्य करते हुए जीवनयापन । करते थे । दूसरे इस व्यवस्था को न मानने वाले थे वे असभ्य थे तथा अरण्य गिरि द्रोणी एवं सोमादि प्रान्तों में रहते थे । इन्हें ' वर्वर ' संज्ञ C. से व्यवह

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३६ * -इन किया जाता था ग्रह वणिज संज्ञा से प्रसिद्ध सभ्य समाज: भुवान्तर चार विभागों में विभक्त था--य. 13 साध्य, २- महाराजिक, ३- आभास्वर, ४- तुषित । ये मणिज़ प्रायः शस्त्रवृत्ति वाले क्षत्रिय ही होते थे । इसी लिये उस युग के क्षत्रिय राजा मणिज संज्ञा से प्रसिद्ध थे । जैसा कि निम्न-लिखित वराहुपुराण के वचन से प्रतीत होता है ---G आदित्रेतासु राजानो मणिजा ये प्रकीर्तिताः । इति । 3. इन राजाओं के उपदेष्टा प्रधानतया विद्यात्र्यसनी विद्वान् व्यक्ति साध्य नाम से प्रसिद्ध थे । ये साध्य भी आदित्रेतायुग में स्वोमभाग, मनुजातीय व मनुष्य भेद से तीन विभागों में: विभक्त थे । नाक नामक स्वर्ग में जो रहते थे और जिन्होंने यज्ञविद्या लोक में प्रचलित की थी, वे स्तोमभाग साध्य कहलाने थे । मनु जिस जाति में पैदा हुआ था तज्जातीय साध्य मनुजातीय कहलाते थे । इसी तरह मनु द्वारा उत्पादित जाति वाले मनुष्य शब्द से सहत होते थे । १- स्वायंभुव, २ -- स्वारोचिष, ३. उत्तम, ४- तामस, ५ - रैवत, ६- चाचुष भेदः से ६ भेदों में विभक्त मन्वन्तरकाल श्रादित्रेतायुग समय माना जाता है । इसके पश्चात् ७ वें मन्वन्तर से देवयुग का प्रारम्भ होता है ।

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३७ मन्वन्तर में भूमध्यसागर के जलसंप्लवन से सृष्टि-प्रलय हो गया था और उस प्रलय में केवल मनु ही बचा था । उसी मनु से बाद में सृष्टि की उत्पत्ति हुई ॥ " इस प्रकार सामान्य तौर से इस पुस्तक में निरूपित विषयों का निरूपण हिन्दी भाषा में लोकसाधारण के परिज्ञान के लिये कर दिया है । इसमें मेरे बुद्धिमान्द्य व प्रमाद से जो त्रुटियां रह गई हों उनका विज्ञजन संशोधन कर लें । यह पुस्तक भी स्वर्गीय पंडितजी महाराज की अन्य पुस्तकों की तरह अपूर्ण ही है । इसमें मानवजाति के इतिहास का निरूपण करतेहुए उसको चार युगों में विभक्त किया है । किन्तु उन चार युगों में बिाद के दो युगों का ही इतिहास लिखा गया हैं उसके बाद के दो युगों का नहीं । अपि च देवासुरख्याति नाम से प्रतीयमान देवों व असुरों के इतिहास के व स्वरूप के विषय में विस्तृतरूप से नहीं लिखा गया है | अतः यह मन्थरन अपूर्ण है ऐसा ही त होता है । जितना उपलब्ध है उसमें भी अन्तिम भाग के क्रोडपत्र न मिलने से दो चार स्थल पुनरुक्तिमय प्रतीत होते हैं, पर जैसा भी और जितना भी उपलब्ध हैं वह पाठकों के सामने उपस्थित कर दिया गया है । इसमें भी पाठकों के लिये व अध्ययनार्थ अपूर्व सामती विद्यमान है जो कि

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-- २ ३८ पढ़ने व सुनने को भी आधुनिक युग में अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं होती है । आशा है पाठकवृन्द इसका अध्ययन कर वैदिक विज्ञान के विषय में कुछ जान सकेंगे और उसमें प्रवेश पा सकेंगे । गोपाष्टमी सं ० २००६ सुरजनदास स्वामी श्री दादूमहाविद्यालय जयपुर |