देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 101–110

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ मूर्धा गतः क्वाम्ब हरेर्न विद्मो नान्योऽस्त्युपायः खलु जीवनेऽद्य । यथा सुधा जीवनकर्मदक्षा तथा जगज्जीवितदासि देवि ॥ सूत उवाच

एवं स्तुता तदा देवी गुणातीता महेश्वरी ।

प्रसन्ना परमा माया वेदैः साङ्गैश्च सामगैः ॥

तानुवाच तदा वाणी चाकाशस्थाशरीरिणी ।

देवान्प्रति सुखैः शब्दैर्जनानन्दकरी शुभा ॥

मा कुरुध्वं सुराश्चिन्तां स्वस्थास्तिष्ठन्तु चामराः ।

स्तुताहं निगमैः कामं सन्तुष्टास्मि न संशयः ॥

यः पुमान्मानुषे लोके स्तौत्येतां मामकीं स्तुतिम् ।

पठिष्यति सदा भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥

शृणोति वा स्तोत्रमिदं मदीयं भक्तया त्रिकालं सततं नरो यः । विमुक्तदुःखः स भवेत्सुखी च वेदोक्तमेतन्ननु वेदतुल्यम् ॥

शृण्वन्तु कारणं चाद्य यद्गतं वदनं हरेः ।

अकारणं कथं कार्यं संसारेऽत्र भविष्यति ॥

उदधेस्तनयां विष्णुः संस्थितामन्तिके प्रियाम् ।

जहास वदनं वीक्ष्य तस्यास्तत्र मनोरमम् ॥

तया ज्ञातं हरिर्नूनं कथं मां हसति प्रभुः ।

विरूपं हरिणा दृष्टं मुखं मे केन हेतुना ॥

विनापि कारणेनाद्य कथं हास्यस्य सम्भवः ।

सपत्नीव कृता तेन मन्येऽन्या वरवर्णिनी ॥

हे अम्ब! भगवान् विष्णुका सिर छिन्न होकर कहाँ चला गया - यह हम नहीं जानते हैं और इस समय इन्हें जीवित करनेके लिये अन्य कोई युक्ति भी नहीं सूझ रही है । हे देवि! मृत प्राणीको जीवित ६८ करनेमें जिस प्रकार अमृत समर्थ है, उसी प्रकार समग्र संसारकी आप जीवनदात्री हैं ॥ ६८ ॥

सूतजी बोले – हे मुनियो! इस प्रकार सामगान-निपुण सांगवेदोंद्वारा स्तुति किये जानेसे गुणातीता, ६ ९ महेश्वरी, परात्परा महामाया भगवती प्रसन्न हो गयीं ॥६ ९ ॥ उसी समय देवताओंको सुख प्रदान करनेवाले ७० शब्दोंसे युक्त और भक्तजनोंको आनन्दित करनेवाली आकाशस्थित अशरीरिणी शुभ वाणीने उनसे कहा ॥ ७० ॥

हे देवताओ! आप लोग किसी प्रकारकी चिन्ता न करें और स्वस्थचित्त रहें । हे अमरगण! इन वेदोंके ७१ भावपूर्ण स्तवनसे मैं परम प्रसन्न हो गयी हूँ, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है ॥ ७१ ॥

मनुष्यलोकमें जो प्राणी इस स्तुति से मेरी आराधना ७२ करेगा अथवा भक्तिपूर्वक इसका पाठ करेगा, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी ॥ ७२ ॥

जो मनुष्य त्रिकाल ( प्रात:, मध्याह्न, सायं ) मेरी स्तुतिको नित्य भक्तिपूर्वक सुनेगा, वह सभी दुःखोंसे विमुक्त होकर परम सुखी हो जायगा । वेदोंद्वारा ७३ उच्चारित किये जानेके कारण यह स्तुति वेदोंके समान ही है ॥ ७३ ॥

हे देवो! अब आप विष्णुके शिरोच्छेदका ७४ कारण सुनिये; क्योंकि इस लोकमें बिना कारण कोई कार्य कैसे हो सकता है? ॥ ७४ ॥

एक बार अपने समीप बैठी हुई अपनी प्रियतमा सागरपुत्री लक्ष्मीका चित्ताकर्षक मुख देखकर भगवान् ७५ विष्णु हँस पड़े ॥ ७५ ॥

उन्होंने सोचा कि भगवान् विष्णु मुझे देखकर क्यों हँस पड़े? मेरे मुखमें विष्णुजीद्वारा दोष देखे जानेका ७६ आखिर क्या कारण हो सकता है? और फिर बिना किसी कारण उनका हँसना सम्भव नहीं हो सकता । मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने किसी अन्य ७७ । सुन्दर स्त्रीको मेरी सौत बना लिया है ॥ ७६-७७ ॥

पृष्ठ 102

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अ ० ५ ] प्रथम स्कन्ध ९ ३

ततः कोपयुता जाता महालक्ष्मी तमोगुणा ।

तामसी तु तदा शक्तिस्तस्या देहे समाविशत् ॥

केनचित्कालयोगेन देवकार्यार्थसिद्धये ।

प्रविष्टा तामसी शक्तिस्तस्या देहेऽतिदारुणा ॥

तामस्याविष्टदेहा सा चुकोपातिशयं तदा ।

शनकैः समुवाचेदमिदं पततु ते शिरः ॥

स्त्रीस्वभावाच्च भावित्वात्कालयोगाद्विनिर्गतः ।

अविचार्य तदा दत्तः शापः स्वसुखनाशनः ॥

सपत्नीसम्भवं दुःखं वैधव्यादधिकं त्विति ।

विचिन्त्य मनसेत्युक्तं तामसीशक्तियोगतः ॥

अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता ।

अशौचं निर्दयत्वं च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥

सशीर्षं वासुदेवं तं करोम्यद्य यथा पुरा ।

शिरोऽस्य शापयोगेन निमग्नं लवणाम्बुधौ ॥

अन्यच्च कारणं किञ्चिद्वर्तते सुरसत्तमाः ।

भवतां च महत्कार्यं भविष्यति न संशयः ॥

पुरा दैत्यो महाबाहुर्हयग्रीवोऽतिविश्रुतः ।

तपश्चक्रे सरस्वत्यास्तीरे परमदारुणम् ॥

जपन्नेकाक्षरं मन्त्रं मायाबीजात्मकं मम ।

निराहारो जितात्मा च सर्वभोगविवर्जितः ॥

ध्यायन्मां तामसीं शक्तिं सर्वभूषणभूषिताम् ।

एवं वर्षसहस्त्रं च तपश्चक्रेऽतिदारुणम् ॥

इसी विचार - मन्थनके परिणामस्वरूप लक्ष्मीजी ७८ कोपाविष्ट हो गयीं और तब उनके शरीरमें तमोगुणसम्पन्न तामसी शक्ति व्याप्त हो गयी ॥ ७८ ॥

तदनन्तर किसी दैवयोगके प्रभावसे देवताओंके कार्य - साधनके उद्देश्यसे ही उनके शरीरमें अत्यन्त ७ ९ उग्र तामसी शक्ति प्रविष्ट हुई ॥ ७ ९ ॥ तब लक्ष्मीजीके शरीरमें तामसी शक्तिका समावेश हो जानेके कारण वे अत्यन्त क्रोधित हो उठीं और ८० उन्होंने मन्द स्वरमें यह कहा - ' तुम्हारा यह सिर कटकर गिर जाय ' ॥ ८० ॥

स्त्रीस्वभावके कारण, भावीवश तथा संयोगसे बिना सोचे - समझे ही लक्ष्मीजीने अपने ही सुखको ८१ विनष्ट करनेवाला शाप दे दिया । सौतके व्यवहारादिसे उत्पन्न होनेवाला दुःख वैधव्यसे भी बढ़कर होता है । मनमें ऐसा सोचकर तथा शरीरपर तामसी ८२ शक्तिका प्रभाव रहनेके कारण उन्होंने ऐसा कह दिया था ॥ ८१-८२ ॥ मिथ्याचरण, साहस, माया, मूर्खता, अतिलोभ, ८३ अपवित्रता तथा दयाहीनता - ये स्त्रियोंके स्वाभाविक दोष हैं ॥ ८३ ॥

अब मैं उन वासुदेवको पूर्वकी भाँति सिरयुक्त कर देती हूँ । इनका सिर पूर्वशापके कारण लवणसागरमें ८४ डूब गया है ॥८४ ॥

हे श्रेष्ठ देवताओ! इस घटनाके होनेमें एक अन्य भी कारण है । आपलोगोंका महान् कार्य अवश्य ८५ सिद्ध होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ८५ ॥

प्राचीन कालमें महाबाहु एवं अति प्रसिद्ध हयग्रीव नामवाला एक दानव था, जो सरस्वतीनदीके ८६ तटपर बहुत कठोर तपस्या करने लगा ॥ ८६ ॥

वह दैत्य आहारका त्यागकर समस्त इन्द्रियोंको वशमें करके तथा सभी प्रकारके भोगैश्वर्यसे दूर रहते हुए मेरे मायाबीजात्मक एकाक्षर मन्त्र ( ह्रीं ) -८७ का जप करता रहा ॥ ८७ ॥

इस प्रकार समस्त आभूषणोंसे विभूषित मेरी तामसी शक्तिका सतत ध्यान करता हुआ वह एक ८८ । हजार वर्षोंतक कठोर तप करता रहा ॥ ८८ ॥

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९ ४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५

तदाहं तामसं रूपं कृत्वा तत्र समागता ।

दर्शने पुरतस्तस्य ध्यातं तत्तेन यादृशम् ॥

सिंहोपरि स्थिता तत्र तमवोचं दयान्विता ।

वरं ब्रूहि महाभाग ददामि तव सुव्रत ॥

इति श्रुत्वा वचो देव्या दानवः प्रेमपूरितः ।

प्रदक्षिणां प्रणामं च चकार त्वरितस्तदा ॥

दृष्ट्वा रूपं मदीयं स प्रेमोत्फुल्लविलोचनः ।

हर्षाश्रुपूर्णनयनस्तुष्टाव स च मां तदा ॥

हयग्रीव उवाच

नमो देव्यै महामाये सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि ।

भक्तानुग्रहचतुरे कामदे मोक्षदे शिवे ॥

धराम्बुतेजःपवनखपञ्चानां च कारणम् ।

त्वं गन्धरसरूपाणां कारणं स्पर्शशब्दयोः ॥

घ्राणं च रसना चक्षुस्त्वक्श्रोत्रमिन्द्रियाणि च ।

कर्मेन्द्रियाणि चान्यानि त्वत्तः सर्वं महेश्वरि ॥

देव्युवाच

किं तेऽभीष्टं वरं ब्रूहि वाञ्छितं यद्ददामि तत् ।

परितुष्टास्मि भक्त्या ते तपसा चाद्भुतेन च ॥

हयग्रीव उवाच यथा मे मरणं मातर्न भवेत्तत्तथा कुरु भवेयममरो योगी तथाजेयः सुरासुरैः ॥ देव्युवाच

जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।

मर्यादा चेदृशी लोके भवेच्च कथमन्यथा ॥

एवं त्वं निश्चयं कृत्वा मरणे राक्षसोत्तम ।

वरं वरय चेष्टं ते विचार्य मनसा किल ॥

उस समय उस दैत्यने जिस रूपमें मेरा ध्यान ८ ९ किया था, उसी तामसरूपमें उसे दर्शन देनेहेतु उसके समक्ष मैं प्रकट हुई ॥ ८ ९ ॥ उस समय सिंहपर आरूढ़ हुई मैंने दयापूर्वक ९ ० उससे कहा – हे महाभाग! तुम वरदान माँगो; हे सुव्रत! मैं तुम्हें यथेच्छ वरदान दूँगी ॥ ९ ० ॥ वह दानव देवीका यह वचन सुनकर प्रेमविह्वल ९ १ हो उठा और उसने तत्काल प्रणाम और प्रदक्षिणा की । मेरा रूप देखते ही प्रेमभावनाके कारण प्रफुल्लित नेत्रोंवाला तथा हर्षातिरेकके कारण अश्रुपूरित नयनोंवाला ९ २ वह दानव मेरी स्तुति करने लगा ॥ ९ १ - ९ २ ॥ हयग्रीव बोला— हे महामाये! हे जगत्का सृजन- - पालन - संहार करनेवाली! हे भक्तोंपर कृपा करनेमें निपुण! हे सकल कामनाप्रदायिनि! हे ९ ३ मोक्षदायिनि! हे शिवे! आप देवीको नमस्कार है ॥ ९ ३ ॥ पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश - इन पाँच महाभूतोंका कारण आप ही हैं तथा गन्ध, रस, रूप, ९ ४ स्पर्श एवं शब्द - इन तत्त्वोंका कारण भी आप ही हैं ॥ ९ ४ ॥ हे महेश्वरि! नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान — ये ज्ञानेन्द्रियाँ तथा हाथ, पैर, वाक्, लिंग, ९ ५ गुदा - ये कर्मेन्द्रियाँ आपसे ही उत्पन्न हैं ॥ ९ ५ ॥ देवी बोलीं- तुम्हारा क्या अभीष्ट है? जो कुछ भी तुम्हारा अभिलषित वर हो, माँग लो । मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगी; क्योंकि मैं तुम्हारी अनन्य भक्ति ९ ६ तथा अद्भुत तपस्यासे अतिशय प्रसन्न हूँ ॥ ९ ६ ॥ हयग्रीव बोला - हे माता! आप मुझे वैसा वरदान दें, जिससे मेरी मृत्यु कभी न हो और देव-दानवोंद्वारा अपराजेय रहता हुआ मैं सदाके लिये ९ ७ अमर योगी हो जाऊँ ॥९ ७ ॥ देवी बोलीं- जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है और मरनेवालेका जन्म भी निश्चित है । लोकमें स्थापित इस प्रकारकी मर्यादाका उल्लंघन कैसे ९ ८ सम्भव है? ॥ ९ ८ ॥ अतएव हे दानवश्रेष्ठ! मृत्युको अवश्यम्भावी जानकर अपने मनमें सम्यक् विचार करके तुम अन्य ९९ यथेच्छ वर माँग लो ॥ ९९ ॥

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अ ० ५ ५ ] प्रथम स्कन्ध ९ ५ हयग्रीव उवाच हयग्रीवाच्च मे मृत्युर्नान्यस्माज्जगदम्बिके इति मे वाञ्छितं कामं पूरयस्व मनोगतम् देव्युवाच गृहं गच्छ महाभाग कुरु राज्यं यथासुखम् हयग्रीवादृते मृत्युर्न ते नूनं भविष्यति ॥ इति दत्त्वा वरं तस्मा अन्तर्धानं गता तथा मुदं परमिकां प्राप्य सोऽपि स्वभवनं गतः स पीडयति दुष्टात्मा मुनीन् वेदांश्च सर्वशः न कोऽपि विद्यते तस्य हन्ताद्य भुवनत्रये तस्माच्छीर्षं हयस्यास्य समुद्धृत्य मनोहरम् देहेऽत्र विशिरोविष्णोस्त्वष्टा संयोजयिष्यति हयग्रीवोऽथ भगवान्हनिष्यति तमासुरम् पापिष्ठं दानवं क्रूरं देवानां हितकाम्यया सूत उवाच एवं सुरांस्तदाभाष्य शर्वाणी विरराम ह देवास्तदातिसन्तुष्टास्तमूचुर्देवशिल्पिनम् देवा ऊचुः कुरु कार्यं सुराणां वै विष्णोः शीर्षाभियोजनम् दानवप्रवरं दैत्यं हयग्रीवो हनिष्यति सूत उवाच इति श्रुत्वा वचस्तेषां त्वष्टा चातित्वरान्वितः वाजिशीर्षं चकर्ताशु खड्गेन सुरसन्निधौ विष्णोः शरीरे तेनाशु योजितं वाजिमस्तकम् हयग्रीवो हरिर्जातो महामायाप्रसादतः कियता तेन कालेन दानवो मददर्पितः निहतस्तरसा संख्ये देवानां रिपुरोजसा य इदं शुभमाख्यानं शृण्वन्ति भुवि मानवाः सर्वदुःखविनिर्मुक्तास्ते भवन्ति न संशयः हयग्रीव बोला - हे जगदम्बे! मेरी मृत्यु हयग्रीवसे । ही हो, किसी अन्यसे नहीं । मेरी इसी मनोवांछित ॥ १०० कामनाको आप पूर्ण करें ॥ १०० ॥

देवी बोलीं- हे महाभाग! अपने घर जाकर अब तुम सुखपूर्वक राज्य करो । हयग्रीवके अतिरिक्त अन्य । किसीसे भी तुम्हारी कदापि मृत्यु नहीं होगी ॥ १०१ ॥

१०१ उस दैत्यको यह वरदान देकर मैं अन्तर्धान हो गयी और वह भी परम प्रसन्न होकर अपने घर लौट

गया ॥ १०२ ॥

॥ १०२ वह दुष्टात्मा इस समय मुनिजनों तथा वेदोंको । हर प्रकारसे पीड़ित कर रहा है और तीनों लोकोंमें ॥ १०३ कोई भी ऐसा नहीं है, जो उसका संहार कर सके ॥ १०३ ॥

। अतः त्वष्टा इस अश्वका मनोहर सिर अलग ॥ १०४ करके उसे इन सिरविहीन विष्णुके धड़पर संयोजित कर देंगे ॥ १०४ ॥

। तत्पश्चात् देवताओंके कल्याणार्थ भगवान् हयग्रीव ॥ १०५ उस पापात्मा, अत्यन्त क्रूर तथा दानवी स्वभाववाले महा असुर हयग्रीवका संहार करेंगे ॥ १०५ ॥

। सूतजी बोले- देवताओंसे इस प्रकार कहकर ॥ १०६ भगवती शान्त हो गयीं और इसके बाद देवगण परम सन्तुष्ट होकर देवशिल्पी विश्वकर्मासे बोले ॥ १०६ ॥

देवताओंने कहा- - - आप विष्णुके धड़पर घोड़ेका । सिर जोड़कर देवताओंका कार्य कीजिये । वे भगवान् ॥ १०७ हयग्रीव ही दानवश्रेष्ठ दैत्यका वध करेंगे ॥१०७ ॥

सूतजी बोले- देवताओंका यह वचन सुनकर विश्वकर्माने अतिशीघ्रतापूर्वक अपने खड्गसे देवताओंके । सामने ही घोड़ेका सिर काटा । तत्पश्चात् उन्होंने घोड़ेका ॥ १०८ वह सिर अविलम्ब विष्णुभगवान्‌के शरीरमें संयोजित कर दिया और इस प्रकार महामाया भगवतीकी कृपासे

वे भगवान् विष्णु हयग्रीव हो गये । १०८ - १० ९ ॥

॥ १० ९ कुछ समय बाद उन भगवान् हयग्रीवने अहंकारके । मदमें चूर उस देवशत्रु दानवका युद्धभूमिमें अपने ॥ ११० | तेजसे वध कर दिया ॥ ११० ॥

इस संसारमें जो प्राणी इस पवित्र कथाका श्रवण । करते हैं, वे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; इसमें ॥ १११ । लेशमात्र भी सन्देह नहीं है ॥ १११ ॥

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९ ६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ महामायाचरित्रञ्च पवित्रं पापनाशनम् । महामाया भगवतीका चरित्र अति पावन है तथा पापों का नाश कर देता है । इस चरित्रका पाठ तथा श्रवण करनेवाले प्राणियोंको सभी प्रकारकी सम्पदाएँ पठतां शृण्वतां चैव सर्वसम्पत्तिकारकम् ॥ ११२ | अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं ॥११२ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे हयग्रीवावतारकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

अथ षष्ठोऽध्यायः शेषशायी भगवान् विष्णुके कर्णमलसे मधु - कैटभकी उत्पत्ति तथा उन दोनोंका ब्रह्माजीसे युद्धके लिये तत्पर होना ऋषय ऊचुः सौम्य यच्च त्वया प्रोक्तं शौरेर्युद्धं महार्णवे मधुकैटभयोः सार्धं पञ्चवर्षसहस्त्रकम् कस्मात्तौ दानवौ जातौ तस्मिन्नेकार्णवे जले महावीर्यौ दुराधर्षौ देवैरपि सुदुर्जयौ कथं तावसुरौ जातौ कथं च हरिणा हतौ तदाचक्ष्व महाप्राज्ञ चरितं परमाद्भुतम् श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वं वक्ता च बहुश्रुतः दैवाच्चात्रैव संजातः संयोगश्च तथावयोः मूर्खेण सह संयोगो विषादपि सुदुर्जरः विज्ञेन सह संयोगः सुधारससमः स्मृतः जीवन्ति पशवः सर्वे खादन्ति मेहयन्ति च जानन्ति विषयाकारं व्यवायसुखमद्भुतम् न तेषां सदसज्ज्ञानं विवेको न च मोक्षदः पशुभिस्ते समा ज्ञेया येषां न श्रवणादरः ऋषिगण बोले- हे सौम्य! आपने मधु और । कैटभके साथ भगवान् विष्णुद्वारा महासिन्धुमें पाँच ॥ १ हजार वर्षोंतक युद्ध किये जानेकी पहले चर्चा की थी ॥ १ ॥

महावीर्यसम्पन्न, किसीसे भी पराभूत न होनेवाले | तथा देवताओंसे भी अपराजेय वे दोनों दानव उस ॥ २ एकार्णवके जलमें किससे प्रादुर्भूत हुए? ॥२ ॥

वे असुर क्यों उत्पन्न हुए तथा भगवान्‌के द्वारा । उनका वध क्यों किया गया? हे महामते! आप यह ॥ ३ परम अद्भुत आख्यान हमको सुनाइये ॥ ३ ॥

हमलोग यह कथा सुननेको इच्छुक हैं और आप अति प्रसिद्ध वक्ता हैं । हमारा और आपका यह । सम्पर्क दैवयोगसे ही हुआ है ॥ ४ ॥

॥ ४ मूर्खके साथ स्थापित किया गया सम्पर्क विषसे भी अधिक अनिष्टकर होता है और इसके विपरीत विद्वानोंका सम्पर्क पीयूषरसके तुल्य माना

गया है ॥५ ॥

॥ ५ पशु भी जीवनयापन करते हैं, वे भी आहार ग्रहण करते हैं, मल - मूत्रादिका विसर्जन करते हैं और । विषयासक्त होकर इन्द्रियजन्य सुखकी अनुभूति करते ॥ ६ हैं; किंतु उनमें अच्छे - बुरेका लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता तथा वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले विवेकसे भी रहित होते हैं । अतएव उत्तम बातोंको सुननेमें जो लोग । श्रद्धा - भाव नहीं रखते, उन्हें पशु - तुल्य ही समझना ॥ ७ | चाहिये ॥ ६-७ ॥

पृष्ठ 106

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अ ० ६ ] प्रथम स्कन्ध ९ ७

मृगाद्याः पशवः केचिज्जानन्ति श्रावणं सुखम् ।

अश्रोत्राः फणिनश्चैव मुमुहुर्नादपानतः ॥ ॥

पञ्चानामिन्द्रियाणां वै शुभे श्रवणदर्शने ।

श्रवणाद्वस्तुविज्ञानं दर्शनाच्चित्तरञ्जनम् ॥

श्रवणं त्रिविधं प्रोक्तं सात्त्विकं राजसं तथा ।

तामसं च महाभाग सुज्ञोक्तं निश्चयान्वितम् ॥

सात्त्विकं वेदशास्त्रादि साहित्यं चैव राजसम् ।

तामसं युद्धवार्ता च परदोषप्रकाशनम् ॥

सात्त्विकं त्रिविधं प्रोक्तं प्रज्ञावद्भिश्च पण्डितैः ।

उत्तमं मध्यमं चैव तथैवाधममित्युत ॥

उत्तमं मोक्षफलदं स्वर्गदं मध्यमं तथा ।

अधमं भोगदं प्रोक्तं निर्णीय विदितं बुधैः ॥

साहित्यं चैव त्रिविधं स्वीयायां चोत्तमं स्मृतम् ।

मध्यमं वारयोषायां परोढायां तथाधमम् ॥

तामसं त्रिविधं ज्ञेयं विद्वद्भिः शास्त्रदर्शिभिः ।

आततायिनियुद्धं यत्तदुत्तममुदाहृतम् ॥

मध्यमं चापि विद्वेषात्पाण्डवानां तथारिभिः ।

अधमं निर्निमित्तं तु विवादे कलहे तथा ॥

तदत्र श्रवणं मुख्यं पुराणस्य महामते ।

बुद्धिप्रवर्धनं पुण्यं ततः पापप्रणाशनम् ॥

तदाख्याहि महाबुद्धे कथां पौराणिकीं शुभाम् ।

श्रुतां द्वैपायनात्पूर्वं सर्वार्थस्य प्रसाधिनीम् ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —4 A मृग आदि बहुत - से पशु श्रवण - सुखका अनुभव करते हैं और कानविहीन सर्प भी ध्वनि सुनकर मुग्ध ८ हो जाते हैं ॥८ ॥

पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंमें श्रवणेन्द्रिय तथा दर्शनेन्द्रिय— दोनों ही शुभ होती हैं; क्योंकि सुननेसे वस्तुओंका ज्ञान ९ प्राप्त होता है और देखनेसे मनोरंजन होता है ॥ ९ ॥

हे महाभाग! विद्वानोंने निर्धारित करके कहा है कि सात्त्विक, राजस तथा तामस भेदानुसार श्रवण तीन १० प्रकारका होता है ॥ १० ॥

वेद - शास्त्रादिका श्रवण सात्त्विक, साहित्यका श्रवण राजस तथा युद्धसम्बन्धी बातों एवं दूसरोंकी निन्दाका श्रवण तामस कहा गया है ॥ ११ ॥

११ प्रज्ञावान् पण्डितोंद्वारा सात्त्विक श्रवणके भी उत्तम, मध्यम तथा अधम- ये तीन प्रकार बताये गये हैं ॥१२ ॥

१२ उत्तम श्रवण मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला, मध्यम श्रवण स्वर्ग देनेवाला तथा अधम श्रवण भोगोंकी उपलब्धि करानेवाला कहा गया है । विद्वानोंने अच्छी तरह सोच - समझकर ऐसा निर्धारण किया है ॥ १३ ॥

१३ साहित्य भी तीन प्रकारका होता है । जिस साहित्यमें स्वकीया नायिकाका वर्णन हो वह उत्तम, जिस साहित्यमें वेश्याओंका वर्णन हो वह मध्यम तथा १४ जिस साहित्यमें परस्त्रीवर्णन हो, वह अधम साहित्य कहा गया है ॥१४ ॥

शास्त्रोंके परम निष्णात विद्वानोंने तामस श्रवणके तीन भेद बतलाये हैं । किसी पापाचारीके संहारसे १५ सम्बन्धित युद्धवर्णनका श्रवण उत्तम, कौरव - पाण्डवों की तरह द्वेषके कारण शत्रुतामें युद्धवर्णनका श्रवण मध्यम तथा अकारण विवाद एवं कलहसे हुए युद्धके १६ वर्णनका श्रवण अधम कहा गया है ॥ १५ - १६ ॥ हे महामते! इनमें पुराणोंके श्रवणकी ही प्रधानता मानी गयी है; क्योंकि इनके श्रवणसे बुद्धिका विकास होता है, पुण्य प्राप्त होता है और समस्त पाप नष्ट १७ हो जाते हैं ॥१७ ॥

अतएव हे महामते! पूर्वकालमें द्वैपायन महर्षि व्याससे सुनी हुई समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाली १८ । परम पवित्र पौराणिक कथा कहिये ॥१८ ॥

पृष्ठ 107

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९ ८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ सूत उवाच यूयं धन्या महाभागा धन्योऽहं पृथिवीतले येषां श्रवणबुद्धिश्च ममापि कथने किल पुरा चैकार्णवे जाते विलीने भुवनत्रये शेषपर्यङ्कते च देवदेवे जनार्दने विष्णुकर्णमलोद्भूतौ दानवौ मधुकैटभौ महाबलौ च तौ दैत्यौ विवृद्धौ सागरे जले क्रीडमानौ स्थितौ तत्र विचरन्तावितस्ततः तावेकदा महाकायौ क्रीडासक्तौ महार्णवे चिन्तामवापतुश्चित्ते भ्रातराविव संस्थितौ नाकारणं भवेत्कार्यं सर्वत्रैषा परम्परा ॥ आधेयं तु विनाधारं न तिष्ठति कथञ्चन आधाराधेयभावस्तु भाति नो चित्तगोचरः क्व तिष्ठति जलं चेदं सुखरूपं सुविस्तरम् केन सृष्टं कथं जातं मग्नावावाञ्जले स्थितौ आवां वा कथमुत्पन्नौ केन वोत्पादितावुभौ पितरौ क्वेति विज्ञानं नास्ति कामं तथावयोः सूत उवाच एवं कामयमानौ तौ जग्मतुर्न विनिश्चयम् । उवाच कैटभस्तत्र मधुं पार्श्वे स्थितं जले कैटभ उवाच मधो वामत्र सलिले स्थातुं शक्तिर्महाबला वर्तते भ्रातरचला कारणं सा हि मे मता तया ततमिदं तोयं तदाधारं च तिष्ठति सा एव परमा देवी कारणञ्च तथावयोः सूतजी बोले – हे महाभाग! इस पृथ्वीलोकमें । आप - लोग धन्य हैं और मैं भी धन्य हूँ; क्योंकि ॥ १ ९ आपलोगोंमें कथा - श्रवणके प्रति और मुझमें कथा– वाचनके प्रति विवेक जाग्रत् हुआ है ॥ १ ९ ॥ । पूर्वकालमें प्रलयावस्थामें जब तीनों लोक ॥ २० महाजलराशिमें विलीन हो गये और देवाधिदेव भगवान् विष्णु शेष - शय्यापर सो गये तब विष्णुके कानोंकी । मैलसे मधु - कैटभ नामक दो दानव उत्पन्न हुए ॥ २१ और वे महाबली दैत्य उस महासागरमें बढ़ने लगे ॥ २०-२१ ॥ । वे दोनों दैत्य क्रीडा करते हुए उसी सागरमें ॥ २२ इधर - उधर भ्रमण करते रहे । एक बार क्रीडापरायण विशाल शरीरवाले उन दोनों भाइयोंने विचार किया । कि बिना किसी कारणके कोई भी कार्य नहीं होता; २३ । यह एक सार्वत्रिक परम्परा है॥२२-२३ ॥ बिना किसी आधारके आधेयकी सत्ता कदापि । सम्भव नहीं है; अतः आधार - आधेयका भाव हमारे ॥ २४ मनमें बार - बार आता रहता है ॥ २४ ॥

अति विस्तारवाला तथा सुखद यह जल किस । आधारपर स्थित है? किसने इसका सृजन किया? । यह किस प्रकार उत्पन्न हुआ और इस जलमें निमग्न ॥ २५ हमलोग कैसे स्थित हैं? ॥ २५ ॥

। हम दोनों कैसे पैदा हुए और किसने हम दोनोंको उत्पन्न किया? हमारे माता - पिता कौन ॥ २६ हैं? - इस बातका भी कोई ज्ञान हम दोनोंको नहीं है ॥ २६ ॥

सूतजी बोले- इस प्रकार चिन्तन करते हुए वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँचे, तब कैटभने जलके ॥ २७ भीतर अपने पास स्थित मधुसे कहा ॥२७ ॥

कैटभ बोला - हे भाई मधु! हम दोनोंके इस जलमें स्थित रहनेका कारण कोई अचल महाबली । शक्ति है, ऐसा ही मैं मानता हूँ ॥२८ ॥

॥ २८ उसीसे समुद्रका सम्पूर्ण जल व्याप्त है और उसी शक्तिके आधारपर यह जल टिका हुआ है तथा । वे ही परात्परा देवी हम दोनोंकी भी स्थितिका ॥ २ ९ | कारण हैं ॥ २ ९ ॥ 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] –4 B

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अ ० ६ ] प्रथम स्कन्ध ९९

एवं विबुध्यमानौ तौ चिन्ताविष्टौ यदासुरौ ।

तदाकाशे श्रुतं ताभ्यां वाग्बीजं सुमनोहरम् ॥

गृहीतं च ततस्ताभ्यां तस्याभ्यासो दृढः कृतः ।

तदा सौदामनी दृष्टा ताभ्यां खे चोत्थिता शुभा ॥

ताभ्यां विचारितं तत्र मन्त्रोऽयं नात्र संशयः ।

तथा ध्यानमिदं दृष्टं गगने सगुणं किल ॥

निराहारौ जितात्मानौ तन्मनस्कौ समाहितौ ।

बभूवतुर्विचिन्त्यैवं जपध्यानपरायणौ ॥

एवं वर्षसहस्त्रं तु ताभ्यां तप्तं महत्तपः ।

प्रसन्ना परमा शक्तिर्जाता सा परमा तयोः ॥

खिन्नौ तौ दानवौ दृष्ट्वा तपसे कृतनिश्चयौ ।

तयोरनुग्रहार्थाय वागुवाचाशरीरिणी ॥

वरं वां वाञ्छितं दैत्यौ ब्रूतं परमसम्मतम् ।

ददामि परितुष्टास्मि युवयोस्तपसा किल ॥

सूत उवाच

इति श्रुत्वा तु तां वाणीं दानवावूचतुस्तदा ।

स्वेच्छया मरणं देवि वरं नौ देहि सुव्रते ॥

वागुवाच

वाञ्छितं मरणं दैत्यौ भवेद्वां मत्प्रसादतः ।

अजेयौ देवदैत्यैश्च भ्रातरौ नात्र संशयः ॥

सूत उवाच

इति दत्तवरौ देव्या दानवौ मददर्पितौ ।

चक्रतुः सागरे क्रीडां यादोगणसमन्वितौ ॥

कालेन कियता विप्रा दानवाभ्यां यदृच्छया ।

दृष्टः प्रजापतिर्ब्रह्मा पद्मासनगतः प्रभुः ॥

इस प्रकार विविध चिन्तन करते हुए वे दोनों ३० दानव जब सचेत हुए तब उन्हें आकाशमें अत्यन्त मनोहारी वाग्बीजस्वरूप ( ऐं ) वाणी सुनायी पड़ी ॥ ३० ॥

उसे सुनकर उन दोनोंने सम्यक् रूपसे हृदयंगम ३१ कर लिया और वे उसका दृढ़ अभ्यास करने लगे । तदनन्तर उन्हें आकाशमें कौंधती हुई सुन्दर विद्युत् दिखलायी पड़ी ॥ ३१ ॥

तब उन्होंने सोचा कि निःसन्देह यह मन्त्र ही ३२ है और यह सगुण ध्यान ही आकाशमें प्रत्यक्ष दृष्टिगत हुआ है ॥ ३२ ॥

तदनन्तर वे दोनों दैत्य आहारका परित्यागकर ३३ | इन्द्रियोंको आत्मनियन्त्रित करके उसी विद्युज्ज्योतिमें मन केन्द्रित किये हुए समाधिस्थ भावसे जप- ध्यान करनेमें लीन हो गये ॥ ३३ ॥

३४ इस प्रकार उन दोनोंने एक हजार वर्षोंतक कठोर तपस्या की, जिससे वे परात्परा शक्ति उन दोनोंपर अतिशय प्रसन्न हो गयीं ॥ ३४ ॥

३५ घोर तपस्याके लिये अपने निश्चयपर दृढ़ रहनेवाले उन दोनों दानवोंको अत्यन्त परिश्रान्त देखकर उनपर कृपाके निमित्त यह आकाशवाणी हुई ॥ ३५ ॥

३६ हे दैत्यो! तुम दोनोंकी कठोर तपश्चर्यासे मैं परम प्रसन्न हूँ । अतएव तुम दोनों अपना मनोवांछित वरदान माँगो; मैं अवश्य दूँगी ॥ ३६ ॥

सूतजी बोले- तदनन्तर उस आकाशवाणीको ३७ सुनकर उन दानवोंने कहा - हे देवि! हमारी मृत्यु हमारे इच्छानुसार हो; हे सुव्रते! हमें आप यही वरदान दीजिये ॥ ३७ ॥

वाणीने कहा – हे दैत्यो! मेरी कृपासे अब तुम दोनों अपनी इच्छासे ही मृत्युको प्राप्त होओगे । दानव ३८ और देवता कोई भी तुम दोनों भाइयोंको पराजित नहीं कर सकेंगे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३८ ॥

सूतजी बोले- भगवतीसे ऐसा वरदान प्राप्तकर वे दोनों दैत्य मदोन्मत्त होकर उस महासागरमें जलचर ३ ९ जीवोंके साथ क्रीड़ातत्पर हो गये ॥३ ९ ॥ हे विप्रो! कुछ समय व्यतीत होनेपर उन दानवोंने संयोगवश जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीको कमलके ४० आसनपर बैठे हुए देखा ॥ ४० ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -4 C

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१०० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७

दृष्ट्वा तु मुदितावास्तां युद्धकामौ महाबलौ ।

तमूचतुस्तदा तत्र युद्धं नौ देहि सुव्रत ॥

नोचेत्पद्मं परित्यज्य यथेष्टं गच्छ माचिरम् ।

यदि त्वं निर्बलश्चासि क्व योग्यं शुभमासनम् ॥

वीरभोग्यमिदं स्थानं कातरोऽसि त्यजाशु वै ।

तयोरिति वचः श्रुत्वा चिन्तामाप प्रजापतिः ॥

दृष्ट्वा च बलिनौ वीरौ किं करोमीति तापसः ।

चिन्ताविष्टस्तदा तस्थौ चिन्तयन्मनसा तदा ॥

उन्हें देखकर युद्धकी लालसासे वे दोनों महाबली ४१ दैत्य प्रसन्न हो उठे और ब्रह्माजीसे बोले - हे सुव्रत! आप हमलोगोंके साथ युद्ध कीजिये; अन्यथा यह पद्मासन छोड़कर आप अविलम्ब जहाँ जाना चाहें, वहाँ चले जाइये । यदि आप दुर्बल हैं तो इस शुभ ४२ आसनपर बैठनेका आपका अधिकार कहाँ! कोई वीर ही इस आसनका उपभोग कर सकता है । आप कायर हैं, अतः अतिशीघ्र इस आसनको छोड़ दीजिये । उन ४३ दोनों दैत्योंकी यह बात सुनकर प्रजापति ब्रह्मा चिन्तामें पड़ गये । तब उन दोनों बलशाली वीरोंको देखकर ब्रह्माजी चिन्ताकुल हो उठे और मन - ही - मन सोचने लगे कि मुझ जैसा तपस्वी इनका क्या कर सकता ४४ | है? ॥४१–४४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां प्रथमस्कन्धे मधुकैटभयोर्युद्धोद्योगवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः ब्रह्माजीका भगवान् विष्णु तथा सूत उवाच

तौ वीक्ष्य बलिनौ ब्रह्मा तदोपायानचिन्तयत् ।

सामदानभिदादींश्च युद्धान्तान्सर्वतन्त्रवित् ॥ १

न जानेऽहं बलं नूनमेतयोर्वा यथातथम् ।

अज्ञाते तु बले कामं नैव युद्धं प्रशस्यते ॥ २

स्तुतिं करोमि चेदद्य दुष्टयोर्मदमत्तयोः ।

प्रकाशितं भवेन्नूनं निर्बलत्वं मया स्वयम् ॥ ३

वधिष्यति तदैकोऽपि निर्बलत्वे प्रकाशिते ।

दानं नैवाद्य योग्यं वा भेदः कार्यो मया कथम् ॥ ४

विष्णुं प्रबोधयाम्यद्य शेषे सुप्तं जनार्दनम् ।

चतुर्भुजं महावीर्यं दुःखहा स भविष्यति ॥ ५

इति सञ्चिन्त्य मनसा पद्मनालगतोऽब्जजः ।

जगाम शरणं विष्णुं मनसा दुःखनाशकम् ॥ ६

भगवती योगनिद्राकी स्तुति करना सूतजी बोले- तदनन्तर उन दोनों वीरोंको देखकर सर्वशास्त्रवेत्ता ब्रह्माजी साम, दान, भेद आदि नीतियोंके माध्यमसे युद्धकी समाप्तिके उपायोंको सोचने लगे ॥१ ॥

इनके वास्तविक बलका मुझे कोई ज्ञान नहीं है । नीति अनुसार जिसके बलकी जानकारी न हो, उसके साथ युद्ध करना कदापि उचित नहीं होता ॥ २ ॥

यदि मैं इस समय इन मदोन्मत्त दुष्ट दानवोंकी स्तुति करता हूँ तो इससे स्वयं मेरे द्वारा अपनी निर्बलता प्रकाशित होगी । निर्बलता प्रदर्शित करनेपर इनमेंसे कोई एक ही मेरा वध कर देगा । इनके साथ इस समय मैं न तो दाननीति और न तो भेदनीतिको ही उपयुक्त समझ रहा हूँ । अतः इस समय उचित यही है कि मैं शेषनागपर सोये हुए चतुर्भुज एवं पराक्रमी भगवान् विष्णुको जगाऊँ । वे मेरी विपत्ति अवश्य ही दूर करेंगे ॥ ३–५ ॥ मनमें ऐसा सोचकर कमलनालका आश्रय लेकर पद्मयोनि ब्रह्माजी मन- -ही- - मन दुःखनाशक विष्णुके | शरणागत हो गये ॥ ६ ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —4 D

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अ ० ७ ] प्रथम स्कन्ध १०१

तुष्टाव बोधनार्थं तं शुभैः सम्बोधनैर्हरिम् ।

नारायणं जगन्नाथं निस्पन्दं योगनिद्रया ॥

ब्रह्मोवाच

दीननाथ हरे विष्णो वामनोत्तिष्ठ माधव ।

भक्तार्तिहृद्धृषीकेश सर्वावास जगत्पते ॥

अन्तर्यामिन्नमेयात्मन्वासुदेव जगत्पते ।

दुष्टारिनाशनैकाग्रचित्त चक्रगदाधर ॥

सर्वज्ञ सर्वलोकेश सर्वशक्तिसमन्वित ।

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश दुःखनाशन पाहि माम् ॥

विश्वम्भर विशालाक्ष पुण्यश्रवणकीर्तन ।

जगद्योने निराकार सर्गस्थित्यन्तकारक ॥।

इमौ दैत्यौ महाराज हन्तुकामौ मदोद्धतौ ।

न जानास्यखिलाधार कथं मां सङ्कटे गतम् ॥

उपेक्षसेऽतिदुःखार्तं यदि मां शरणं गतम् ।

पालकत्वं महाविष्णो निराधारं भवेत्ततः ॥

एवं स्तुतोऽपि भगवान् न बुबोध यदा हरिः ।

योगनिद्रासमाक्रान्तस्तदा ब्रह्मा ह्यचिन्तयत् ॥

नूनं शक्तिसमाक्रान्तो विष्णुर्निद्रावशं गतः ।

जजागार न धर्मात्मा किं करोम्यद्य दुःखितः ॥

हन्तुकामावुभौ प्राप्तौ दानवौ मदगर्वितौ ।

किं करोमि क्व गच्छामि नास्ति मे शरणं क्वचित् ॥

इति संचिन्त्य मनसा निश्चयं प्रतिपद्य च ।

तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः ॥

विचार्य मनसाप्येवं शक्तिर्मे रक्षणे क्षमा ।

यया ह्यचेतनो विष्णुः कृतोऽस्ति स्पन्दवर्जितः ॥

वे शुभ सम्बोधनोंके द्वारा योगनिद्राके कारण ७ स्पन्दनरहित उन नारायण जगत्पति भगवान् विष्णुको जगानेके लिये उनकी स्तुति करने लगे ॥ ७ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे दीनानाथ! हे हरे! हे विष्णो! हे वामन! हे माधव! भक्तोंकी पीड़ा हरनेवाले हे ८ हृषीकेश! हे सर्वव्यापिन्! हे जगत्पते! हे अनन्तस्वरूप! हे वासुदेव! हे अन्तर्यामिन्! हे जगत्के स्वामी! हे दुष्टों तथा शत्रुओं का संहार करनेमें एकाग्र चित्तवाले! हे चक्रधर! हे गदाधर! हे सर्वज्ञ! हे सर्वलोकेश! हे ९ सर्वशक्तिसम्पन्न! हे देवेश! हे दुःखनाशन! अब आप उठिये, उठिये और मेरी रक्षा कीजिये ॥ ८–१० ॥ हे विश्वम्भर! हे विशालाक्ष! हे पुण्यश्रवण-१० कीर्तन! हे जगत्स्रष्टा! हे निराकार! हे सृष्टि - पालन-संहारके कारक! हे महाराज! ये दोनों मदोन्मत्त दानव मेरा वध करना चाहते हैं । हे सर्वाधार! ११ मैं इस समय संकटग्रस्त हूँ; क्या आप यह नहीं जानते? ॥ ११-१२ ॥ हे महाविष्णो! मैं इस समय दुःखसे अत्यधिक १२ पीड़ित हूँ और आपके शरणागत हूँ । ऐसी स्थितिमें यदि आप मेरी उपेक्षा करेंगे तो आपका जगत्पालनका नियम निरर्थक हो जायगा ॥ १३ ॥

१३ इस प्रकार स्तुति करनेपर भी जब योगनिद्रामें लीन भगवान् विष्णु नहीं जगे, तब ब्रह्माजीने विचार किया कि भगवान् विष्णु अवश्य ही शक्तिके अधीन १४ होकर योगनिद्राके वशमें हो गये हैं, जिससे ये धर्मात्मा नहीं जग रहे हैं । अब दुःखसे पीड़ित मैं इस समय क्या करूँ? अहंकारके मदमें चूर वे दोनों दानव १५ मुझे मारनेके उद्देश्यसे यहाँ आ गये हैं । अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? अब तो मुझे शरण देनेवाला कोई भी नहीं है ॥ १४–१६ ॥ १६ इस प्रकार मन - ही- - मन सोचते हुए वे एक निष्कर्षपर पहुँचकर एकाग्रचित्त हो उन भगवती योगनिद्राकी स्तुति करने लगे ॥ १७ ॥

१७ उन्होंने अपने मनमें यह दृढ विचार रख लिया कि वे ही महाशक्ति मेरी रक्षा करनेमें समर्थ हैं; जिन्होंने भगवान् विष्णुको भी चेतनाहीन तथा १८ । निःस्पन्द कर दिया है ॥ १८ ॥