देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 91–100
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100
पृष्ठ 91
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४
सर्वज्ञोऽसि महर्षे त्वं कथयाशु कृपानिधे ।
कं देवं शरणं यामि यो मे पुत्रं प्रदास्यति ॥
सूत उवाच
इति व्यासेन पृष्टस्तु नारदो वेदविन्मुनिः ।
उवाच परया प्रीत्या कृष्णं प्रति महामनाः ॥
नारद उवाच
पाराशर्य महाभाग यत्त्वं पृच्छसि मामिह ।
तमेवार्थं पुरा पृष्टः पित्रा मे मधुसूदनः ॥
ध्यानस्थं च हरिं दृष्ट्वा पिता मे विस्मयं गतः ।
पर्यपृच्छत देवेशं श्रीनाथं जगतः पतिम् ॥
कौस्तुभोद्भासितं दिव्यं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
पीताम्बरं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम् ॥
कारणं सर्वलोकानां देवदेवं जगद्गुरुम् ।
वासुदेवं जगन्नाथं तप्यमानं महत्तपः ॥
ब्रह्मोवाच
देवदेव जगन्नाथ भूतभव्यभवत्प्रभो ।
तपश्चरसि कस्मात्त्वं किं ध्यायसि जनार्दन ॥
विस्मयोऽयं ममात्यर्थं त्वं सर्वजगतां प्रभुः ।
ध्यानयुक्तोऽसि देवेश किं च चित्रमतः परम् ॥
त्वन्नाभिकमलाज्जातः कर्ताहमखिलस्य ह ।
त्वत्तः कोऽप्यधिकोऽस्त्यत्र तं देवं ब्रूहि मापते ॥
जानाम्यहं जगन्नाथ त्वमादिः सर्वकारणम् ।
कर्ता पालयिता हर्ता समर्थः सर्वकार्यकृत् ॥
इच्छया ते महाराज सृजाम्यहमिदं जगत् ।
हरः संहरते काले सोऽपि ते वचने सदा ॥
हे महर्षे! आप सब कुछ जाननेवाले हैं । हे ३० कृपासिन्धु! आप मुझे शीघ्र ही बतायें कि मैं किस देवताकी शरणमें जाऊँ, जो प्रसन्न होकर मुझे पुत्र प्रदान कर दे ॥ ३० ॥
सूतजी बोले - व्यासजीके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदवेत्ता तथा महामना महर्षि नारद अत्यन्त ३१ प्रेमपूर्वक कृष्णद्वैपायनसे कहने लगे ॥ ३१ ॥
नारदजी बोले - हे पराशरतनय! हे महाभाग! आपके द्वारा जो प्रश्न यहाँ मुझसे पूछा गया है, वैसा ही प्रश्न पूर्वकालमें मेरे पिता ब्रह्माजीने मधुसूदन ३२ भगवान् विष्णुसे किया था ॥ ३२ ॥
मेरे पिता ब्रह्माजी कौस्तुभमणिकी प्रभासे दीप्तिमान्, शंख - चक्र - गदा और पद्म धारण करनेवाले, ३३ पीत वस्त्र धारण करनेवाले, चार भुजाओंवाले, श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित वक्षःस्थलवाले, सभी लोकोंके कारणस्वरूप, देवाधिदेव, जगद्गुरु, जगदीश्वर, वासुदेव, ३४ देवेश, जगत्पति, श्रीनाथ विष्णुको ध्यानमें अवस्थित होकर कठोर तप करते हुए देखकर अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने पूछा ॥३३-३५ ॥ ३५ ब्रह्माजी बोले- हे देवाधिदेव! हे जगन्नाथ! हे भूत - भविष्य - वर्तमानके स्वामी! आप किसलिये यह कठोर तपस्या कर रहे हैं? हे जनार्दन! आप किसके ध्यानमें लीन हैं? ॥ ३६ ॥
हे देवेश! [ यह देखकर ] मैं परम विस्मयमें पड़ ३६ गया हूँ कि समस्त विश्वका स्वामी होते हुए भी आप ऐसा ध्यान कर रहे हैं; भला इससे बढ़कर अन्य कौन - सी विचित्र बात होगी! ॥ ३७ ॥
३७ आपके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत होकर मैं सम्पूर्ण लोकोंके कर्ताके रूपमें अधिष्ठित हूँ । हे लक्ष्मीपते! आपसे भी श्रेष्ठतर कौन देवता है? उस देवताको मुझे ३८ बताइये ॥ ३८ ॥
हे जगन्नाथ! मैं तो यही जानता हूँ कि आप ही आदिस्वरूप, सबके कारण, निर्माता, पालनकर्ता, संहारक ३ ९ तथा सभी कार्योंको सम्पादित करनेवाले हैं ॥ ३ ९ ॥ हे महाराज! आपकी इच्छासे ही मैं इस जगत्के | रचनाकार्यमें प्रवृत्त होता हूँ और सदा आपके ही आदेशसे ४० । शंकरजी प्रलयावस्थामें जगत्का संहार करते हैं ॥ ४० ॥
पृष्ठ 92
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ४ ] सूर्यो भ्रमति चाकाशे वायुर्वाति शुभाशुभः अग्निस्तपति पर्जन्यो वर्षतीश त्वदाज्ञया त्वं तु ध्यायसि कं देवं संशयोऽयं महान्मम त्वत्तः परं न पश्यामि देवं वै भुवनत्रये कृपां कृत्वा वदस्वाद्य भक्तोऽस्मि तव सुव्रत महतां नैव गोप्यं हि प्रायः किञ्चिदिति स्मृतिः तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हरिराह प्रजापतिम् शृणुष्वैकमना ब्रह्मंस्त्वां ब्रवीमि मनोगतम् यद्यपि त्वां शिवं मां च स्थितिसृष्ट्यन्तकारणम् ते जानन्ति जनाः सर्वे सदेवासुरमानुषाः स्रष्टा त्वं पालकश्चाहं हरः संहारकारकः कृताः शक्त्येति संतर्कः क्रियते वेदपारगैः जगत्संजनने शक्तिस्त्वयि तिष्ठति राजसी सात्त्विकी मयि रुद्रे च तामसी परिकीर्तिता ॥
तया विरहितस्त्वं न तत्कर्मकरणे प्रभुः ।
नाहं पालयितुं शक्तः संहर्तुं नापि शङ्करः ॥
तदधीना वयं सर्वे वर्तामः सततं विभो ।
प्रत्यक्षे च परोक्षे च दृष्टान्तं शृणु सुव्रत ॥
शेषे स्वपिमि पर्यङ्के परतन्त्रो न संशयः । तदधीनः सदोत्तिष्ठे काले कालवशं गतः
तपश्चरामि सततं तदधीनोऽस्म्यहं सदा ।
कदाचित्सह लक्ष्म्या च विहरामि यथासुखम् ॥
कदाचिद्दानवैः सार्धं संग्रामं प्रकरोम्यहम् ।
दारुणं देहदमनं सर्वलोकभयङ्करम् ॥
प्रथम स्कन्ध ८३ । हे ईश! आपकी आज्ञासे ही सूर्य आकाशमें ॥ ४१ [ नियमित रूपसे ] भ्रमण करता है, शुभ तथा अशुभ हवा चलती है, अग्नि ताप धारण करती है और मेघ । वृष्टि करता है ॥ ४१ ॥
आप किस देवताका ध्यान कर रहे हैं? यह मेरी ॥ ४२ । महती शंका है । मैं तो तीनों लोकोंमें आपसे बढ़कर अन्य किसी देवताको नहीं जानता हूँ ॥ ४२ ॥
। हे सुव्रत! मैं आपका भक्त हूँ, अतः कृपा करके ॥ ४३ [ अपनी तपस्याका रहस्य ] बताइये; क्योंकि यह सर्वविदित है कि महान् लोग अपने भक्तोंसे कुछ भी । गोपनीय नहीं रखते हैं ॥ ४३ ॥
॥ ४४ ब्रह्माजीका वचन सुनकर भगवान् विष्णु उनसे बोले — हे ब्रह्मन्! आपको अपने मनकी बात बताता । हूँ, आप उसे एकाग्रचित्त होकर सुनें ॥ ४४ ॥
॥ ४५ यद्यपि सभी देव, दानव और मानव यही जानते हैं कि आप जगत्की रचना, मैं जगत्के पालन और । शिवजी जगत्के संहारके परम कारण हैं तथापि वेद-॥ ४६ तत्त्वज्ञ विद्वान् यह तर्कना करते हैं कि किसी शक्तिके द्वारा ही आप सृष्टिके कर्ता हैं, मैं भर्ता हूँ और । शंकरजी हर्ता हैं ॥ ४५-४६ ॥ जगत्की रचना के लिये आपमें राजसी शक्ति ४७ विद्यमान है, मुझमें सात्त्विकी शक्ति स्थित है तथा शिवजीमें तामसी शक्ति बतायी गयी है ॥ ४७ ॥
उस शक्तिके न रहनेपर आप न तो सृष्टि रचना ४८ कर सकते हैं, न मैं पालन - कार्य करनेमें समर्थ हो सकता हूँ और न तो शंकर संहार कर सकते हैं ॥ ४८ ॥
हे विभो! हम सभी निरन्तर उसी शक्तिके ४ ९ अधीन रहते हैं । हे सुव्रत! अब प्रत्यक्ष तथा परोक्षसे सम्बन्धित दृष्टान्त भी आप सुनिये ॥ ४ ९ ॥ इसमें कोई संशय नहीं कि मैं परतन्त्र होकर ॥ ५० शेष - शय्यापर शयन करता हूँ और उसी शक्तिके अधीन होकर समयपर कालका वशवर्ती होकर मैं शयनसे उठता हूँ ॥ ५० ॥
उसी शक्तिका अवलम्बन प्राप्तकर मैं सदा तपश्चरण ५१ करता रहता हूँ । मैं कभी लक्ष्मीके साथ सुखपूर्वक विहार करता हूँ और कभी दानवोंके साथ अत्यन्त भीषण, शरीरको चूर्ण कर देनेवाला तथा लोगोंको भयभीत कर ५२ देनेवाला युद्ध भी करता हूँ ॥ ५१-५२ ॥
पृष्ठ 93
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४
प्रत्यक्षं तव धर्मज्ञ तस्मिन्नेकार्णवे पुरा ।
पञ्चवर्षसहस्त्राणि बाहुयुद्धं मया कृतम् ॥
तौ कर्णमलजौ दुष्टौ दानवौ मदगर्वितौ ।
देव देव्याः प्रसादेन निहतौ मधुकैटभौ ॥
तदा त्वया न किं ज्ञातं कारणं तु परात्परम् ।
शक्तिरूपं महाभाग किं पृच्छसि पुनः पुनः ॥
यदिच्छः पुरुषो भूत्वा विचरामि महार्णवे ।
कच्छपः कोलसिंहश्च वामनश्च युगे युगे ॥
न कस्यापि प्रियो लोके तिर्यग्योनिषु सम्भवः ।
नाभवं स्वेच्छया वामवराहादिषु योनिषु ॥
विहाय लक्ष्म्या सह संविहारं को याति मत्स्यादिषु हीनयोनिषु । शय्यां च मुक्त्वा गरुडासनस्थः करोमि युद्धं विपुलं स्वतन्त्रः ॥ पुरा पुरस्तेऽज शिरो मदीयं गतं धनुर्ज्यास्खलनात्क्व चापि । त्वया तदा वाजिशिरो गृहीत्वा संयोजितं शिल्पिवरेण भूयः ॥ हयाननोऽहं परिकीर्तितश्च प्रत्यक्षमेतत्तव लोककर्तः । विडम्बनेयं किल लोकमध्ये कथं भवेदात्मपरो यदि स्याम् ॥
तस्मान्नाहं स्वतन्त्रोऽस्मि शक्त्यधीनोऽस्मि सर्वथा ।
तामेव शक्तिं सततं ध्यायामि च निरन्तरम् ॥
नातः परतरं किञ्चिज्जानामि कमलोद्भव । नारद उवाच इत्युक्तं विष्णुना तेन पद्मयोस्तु सन्निधौ ॥ हे धर्मज्ञ! आप यह तो प्रत्यक्ष जानते हैं कि पूर्व ५३ समयमें मेरे द्वारा उस महासिन्धुमें पाँच हजार वर्षोंतक भीषण बाहुयुद्ध किया गया था ॥ ५३ ॥
हे देव! कानकी मैलसे उत्पन्न अत्यन्त दुष्ट, ५४ मदोन्मत्त तथा अहंकारी मधु - कैटभ नामक दोनों दानवोंका मैंने देवीकी कृपासे ही संहार किया था । हे महाभाग! क्या आप उस समय परात्पर कारणस्वरूपा ५५ महाशक्तिको नहीं जान पाये थे? अतः बार - बार क्यों पूछ रहे हैं? ॥ ५४-५५ ॥ उसी शक्तिकी इच्छासे मैं परमपुरुषके रूपमें ५६ महासागर में विचरण करता हूँ और विभिन्न युगोंमें कच्छप, वराह, नृसिंह तथा वामनके रूपमें अवतरित होता रहता हूँ ॥५६ ॥
५७ तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होना किसीके लिये भी प्रिय नहीं होता । मैं अपनी इच्छासे वामन, वराह आदि योनियोंमें उत्पन्न नहीं होता हूँ । [ अपितु इसमें उसी शक्तिकी प्रेरणा ही परम कारण है ] ॥ ५७ ॥
भला ऐसा कौन होगा, जो लक्ष्मीके साथ सुख-५८ | दायक विहारका त्याग करके मत्स्यादि नीच योनियोंमें जन्म लेगा? यदि मैं स्वतन्त्र होता तो [ सुखदायिनी ] शय्याको छोड़कर गरुडरूपी आसनपर बैठकर महाभयंकर युद्ध क्यों करता! ॥ ५८ ॥
हे अज! प्राचीन कालमें एक बार आपके समक्ष ५ ९ ही धनुषकी प्रत्यंचा टूट जानेके कारण मेरा सिर छिन्न हो गया था । तब शिल्पकारोंमें श्रेष्ठ आपने फिरसे मेरे धड़पर घोड़ेका सिर जोड़ दिया था ॥ ५ ९ ॥ हे लोकनिर्माता! उसी समयसे मैं ' हयग्रीव ' नामसे लोकप्रसिद्ध हुआ, यह सब आपके सामने ६० घटित हुआ था । यदि मैं स्वाधीन होता तो संसारमें यह विडम्बना कैसे होती? ॥ ६० ॥
अतएव मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ, अपितु सर्वथा उसी ६१ शक्तिके अधीन हूँ | मैं निरन्तर उसी शक्तिका ध्यान करता रहता हूँ । हे कमलोद्भव! मैं इसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं जानता ॥ ६१३ ॥
नारदजी बोले – हे व्यासजी! भगवान् विष्णुने ६२ ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहा था । हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे पिता
पृष्ठ 94
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ५ ]
तेन चाप्यहमुक्तोऽस्मि तथैव मुनिपुङ्गव ।
तस्मात्त्वमपि कल्याण पुरुषार्थाप्तिहेतवे ॥
असंशयं हृदम्भोजे भज देवीपदाम्बुजम् ।
सर्वं दास्यति सा देवी यद्यदिष्टं भवेत्तव ॥
सूत उवाच
नारदेनैवमुक्तस्तु व्यासः सत्यवतीसुतः ।
देवीपादाब्जनिष्णातस्तपसे प्रययौ गिरौ ॥
प्रथम स्कन्ध ८५ ब्रह्माजीने वे सब बातें मुझसे कही थीं । अतः आप ६३ भी कल्याणकारी पुत्र - प्राप्तिके उद्देश्यसे सर्वथा संशयरहित होकर अपने हृदयकमलमें देवी भगवतीके चरणारविन्दका ध्यान कीजिये । वे देवी आपके समस्त अभिलषित ६४ । फलोंको अवश्य प्रदान करेंगी ॥ ६२-६४ ॥ सूतजी बोले – नारदजीके ऐसा कहनेपर सत्यवतीपुत्र व्यासजी देवीके चरणारविन्दमें अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए तपश्चर्याहेतु पर्वतपर चले ६५ | गये ॥ ६५ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे देवीसर्वोत्तमेतिकथनं नाम चतुर्थोऽ ऽध्यायः ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः भगवती लक्ष्मीके शापसे विष्णुका मस्तक कट जाना, वेदोंद्वारा स्तुति करनेपर देवीका प्रसन्न होना, भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी कथा ऋषय ऊचुः
सूतास्माकं मनः कामं मग्नं संशयसागरे ।
यथोक्तं महदाश्चर्यं जगद्विस्मयकारकम् ॥
यन्मूर्धा माधवस्यापि गतो देहात्पुनः परम् ।
हयग्रीवस्ततो जातः सर्वकर्ता जनार्दनः ॥
वेदोऽपि स्तौति यं देवं देवाः सर्वे यदाश्रयाः । आदिदेवो जगन्नाथः सर्वकारणकारणः
तस्यापि वदनं छिन्नं दैवयोगात्कथं तदा ।
तत्सर्वं कथयाशु त्वं विस्तरेण महामते ॥
सूत उवाच
शृण्वन्तु मुनयः सर्वे सावधानाः समन्ततः ।
चरितं देवदेवस्य विष्णोः परमतेजसः ॥
कदाचिद्दारुणं युद्धं कृत्वा देवः सनातनः ।
दशवर्षसहस्त्राणि परिश्रान्तो जनार्दनः ॥
समे देशे शुभे स्थाने कृत्वा पद्मासनं विभुः ।
अवलम्ब्य धनुः सज्यं कण्ठदेशे धरास्थितम् ॥
दत्त्वा भारं धनुष्कोट्यां निद्रामाप रमापतिः ।
श्रान्तत्वाद्दैवयोगाच्च जातस्तत्रातिनिद्रितः ॥
ऋषिगण बोले- हे सूतजी! हमारा चित्त सन्देहरूपी सागरमें पूर्णतः डूबता जा रहा है; क्योंकि आपने १ महान् आश्चर्यजनक तथा संसारको विस्मित कर देनेवाली यह बात कह दी कि विष्णुके शरीरसे उनका सिर अलग हो गया था और वे सर्वपालक जनार्दन २ पुनः हयग्रीव हो गये थे ॥१-२ ॥ वेद भी जिन भगवान् विष्णुका स्तवन करते हैं, ॥ ३ समस्त देवता जिनका आश्रय ग्रहण करते हैं, जो आदिदेव हैं, जगत्के स्वामी हैं और सभी कारणों के भी कारण हैं; दैवयोगसे उनका भी मस्तक कैसे कट ४ गया? हे महामते! वह सब आप हमसे विस्तारपूर्वक शीघ्र कहिये ॥ ३४ ॥
सूतजी बोले – हे मुनियो! आप सभी लोग ५ एकाग्रचित्त होकर परम तेजस्वी देवाधिदेव भगवान् विष्णुका चरित्र सुनिये ॥ ५ ॥
किसी समय वे सनातन देव विष्णु दस हजार ६ वर्षोंतक भीषण युद्ध करके अत्यन्त थक गये थे ॥ ६ ॥
तदनन्तर एक समतल तथा शुभ स्थानपर पद्मासन लगाकर पृथ्वीपर स्थित प्रत्यंचा चढ़े हुए धनुषपर ७ कण्ठप्रदेश ( गर्दन ) टिकाये हुए उस धनुषकी नोंकपर भार देकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु सो गये और थकावटके ८ कारण दैवयोगसे उन्हें गहरी नींद आ गयी ॥ ७-८ ॥
पृष्ठ 95
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५
तदा कालेन कियता देवाः सर्वे सवासवाः ।
ब्रह्मेशसहिताः सर्वे यज्ञं कर्तुं समुद्यताः ॥
गताः सर्वेऽथ वैकुण्ठं द्रष्टुं देवं जनार्दनम् ।
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं मखानामधिपं प्रभुम् ॥
अदृष्ट्वा तं तदा तत्र ज्ञानदृष्ट्या विलोक्य ते ।
यत्रास्ते भगवान् विष्णुर्जग्मुस्तत्र तदा सुराः ॥
ददृशुस्ते तदेशानं योगनिद्रावशं गतम् ।
विचेतनं विभुं विष्णुं तत्रासांचक्रिरे सुराः ॥
स्थितेषु सर्वदेवेषु निद्रासुप्ते जगत्पतौ ।
चिन्तामापुः सुराः सर्वे ब्रह्मरुद्रपुरोगमाः ॥
तानुवाच ततः शक्रः किं कर्तव्यं सुरोत्तमाः ।
निद्राभङ्गः कथं कार्यश्चिन्तयन्तु सुरोत्तमाः ॥
तमुवाच तदा शम्भुर्निद्राभङ्गेऽस्ति दूषणम् ।
कार्यं चैव प्रकर्तव्यं यज्ञस्य सुरसत्तमाः ॥
उत्पादिता तदा वम्री ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।
तया भक्षयितुं तत्र धनुषोऽग्रं धरास्थितम् ॥
भक्षितेऽग्रे तदा निम्नं गमिष्यति शरासनम् ।
तदा निद्राविमुक्तोऽसौ देवदेवो भविष्यति ॥
देवकार्यं तदा सर्वं भविष्यति न संशयः ।
स वम्रीं संदिदेशाथ देवदेवः सनातनः ॥
तमुवाच तदा वम्री देवदेवस्य मापतेः ।
निद्राभङ्गः कथं कार्यो देवस्य जगतां गुरोः ॥
निद्राभङ्गः कथाच्छेदो दम्पत्योः प्रीतिभेदनम् ।
शिशुमातृविभेदश्च ब्रह्महत्यासमं स्मृतम् ॥
कुछ समय बीतने के बाद ब्रह्मा, शिव तथा ९ इन्द्रसहित सभी देवता यज्ञ करनेको उद्यत हुए । वे सब देवकार्यकी सिद्धिहेतु यज्ञोंके अधिपति जनार्दन भगवान् विष्णुके दर्शनार्थ वैकुण्ठलोक १० गये ॥ ९ -१० ॥ उस समय उन्हें वहाँ न देखकर वे देवतागण ज्ञान- दृष्टिसे देख करके वहाँ पहुँचे, जहाँ भगवान् ११ विष्णु विराजमान थे ॥ ११ ॥
वहाँ उन्होंने सर्वव्यापी भगवान् विष्णुको योग-निद्राके वशीभूत होकर अचेत पड़ा हुआ देखा । तब १२ वे देवगण वहीं रुक गये ॥१२ ॥
सभी देवताओंके वहाँ रुक जानेके बाद जगत्पति विष्णुको निद्रामग्न देखकर ब्रह्मा रुद्र आदि १३ प्रमुख देवता अत्यन्त चिन्तित हुए ॥१३ ॥
तदनन्तर इन्द्रने देवताओंसे कहा- हे श्रेष्ठ देवगण! अब क्या किया जाय? हे श्रेष्ठ देवताओ! १४ अब आप सभी यह विचार करें कि इनकी निद्रा किस प्रकार भंग की जाय? ॥ १४ ॥
तब शिवजीने इन्द्रसे कहा कि इनकी निद्राका १५ भंग करनेसे महान् दोष लगेगा, किंतु हे श्रेष्ठ देवगण! यज्ञकार्य भी अवश्यकरणीय है ॥ १५ ॥
इसके बाद परमेष्ठी ब्रह्माजीने पृथ्वीपर स्थित १६ धनुषके अग्रभागको खा जानेके लिये दीमकका सृजन किया ॥ १६ ॥
[ उन्होंने यह सोचा कि ] दीमकके द्वारा धनुषका १७ अग्रभाग खा लिये जानेपर धनुष नीचा हो जायगा । तब वे देवाधिदेव विष्णु निद्रामुक्त हो जायँगे । ऐसा होनेपर निस्सन्देह देवताओंका सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो १८ जायगा । अतः सनातन ब्रह्माजीने दीमकको इस कार्यके लिये आदेश दिया ॥ १७-१८ ॥ तब दीमकने ब्रह्माजीसे कहा कि देवाधिदेव १ ९ जगद्गुरु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुका निद्रा भंग मैं कैसे करूँ? क्योंकि नींदमें बाधा डालना, कथामें विघ्न पैदा करना, पति - पत्नीके बीच भेद उत्पन्न करना एवं २० | माँ - पुत्रके बीच वैरभाव पैदा करनेके लिये षड्यन्त्र
पृष्ठ 96
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ५ ] तत्कथं देवदेवस्य करोमि सुखनाशनम् किं फलं भक्षणाद्देव येन पापं करोम्यहम् सर्वः स्वार्थवशो लोकः कुरुते पातकं किल तस्मादहं करिष्यामि स्वार्थमेव प्रभक्षणम् ॥ ब्रह्मोवाच तव भागं करिष्यामो मखमध्ये यथा शृणु तेन त्वं कुरु कार्यं नो विष्णुं बोधय माचिरम् होमकर्मणि पार्श्वे च हविर्दानात्पतिष्यति तत्ते भागं विजानीहि कुरु कार्यं त्वरान्विता सूत उवाच इत्युक्ता ब्रह्मणा वम्री धनुषोऽग्रं त्वरान्विता । चखाद संस्थितं भूमौ विमुक्ता ज्या तदाभवत् प्रत्यञ्चायां विमुक्तायां मुक्ता कोटिस्तथोत्तरा शब्दः समभवद् घोरस्तेन त्रस्ताः सुरास्तदा ब्रह्माण्डं क्षुभितं सर्वं वसुधा कम्पिता तदा । समुद्राश्च समुद्विग्नास्त्रेसुश्च जलजन्तवः ववुर्वातास्तथा चोग्राः पर्वताश्च चकम्पिरे । उल्कापाता महोत्पाता बभूवुर्दुः खशंसिनः दिशो घोरतराश्चासन्सूर्योऽप्यस्तंगतोऽभवत् । चिन्तामापुः सुराः सर्वे किं भविष्यति दुर्दिने एवं चिन्तयतां तेषां मूर्धा विष्णोः सकुण्डलः । गतः समुकुटः क्वापि देवदेवस्य तापसाः
अन्धकारे तदा घोरे शान्ते ब्रह्महरौ तदा ।
शिरोहीनं शरीरं तु ददृशाते विलक्षणम् ॥
प्रथम स्कन्ध ८७ । करना ब्रह्महत्याके समान कहा गया है । अतः मैं ॥ २१ देवाधिदेव भगवान् विष्णुका सुख क्यों नष्ट करूँ? हे देव! उस धनुषका अग्रभाग खानेसे मेरा क्या लाभ है, । जिसके लिये मैं ऐसा पाप करूँ? ॥ १ ९ –२१ ॥ २२ स्वार्थके वशीभूत होकर ही समस्त लोक पापकार्यमें प्रवृत्त होता है । इसलिये मैं भी इसमें कोई स्वार्थसिद्धि होनेपर ही इसका भक्षण करूँगा ॥ २२ ॥
। ब्रह्माजी बोले- सुनो, हमलोग यज्ञमें तुम्हारे भागकी व्यवस्था कर देंगे । इसलिये तुम अविलम्ब ॥ २३ भगवान् विष्णुको जगाकर हमलोगोंका कार्य सम्पन्न । कर दो ॥ २३ ॥
होमकार्यमें आहुति प्रदान करते समय जो हव्य ॥ २४ आस - पास गिरेगा, उसीको अपना भाग समझना; और अब तुम शीघ्रतापूर्वक हमारा कार्य करो ॥ २४ ॥
सूतजी बोले- हे ऋषियो! ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेके अनन्तर दीमकने धरातलपर स्थित ॥ २५ धनुषाग्रको शीघ्र ही खा लिया, जिससे धनुषकी डोरी मुक्त हो गयी ॥ २५ ॥
। प्रत्यंचाके खुल जानेपर धनुषका वह ऊपरी कोना ॥ २६ मुक्त हो गया । इस प्रकार एक भीषण ध्वनि पैदा हुई जिससे वहाँ सभी देवगण भयभीत हो गये, ब्रह्माण्ड क्षुब्ध हो उठा, पृथ्वीमें कम्पन होने लगा, सभी समुद्र ॥ २७ उद्विग्न हो गये, जलचर जन्तु व्याकुल हो उठे । प्रचण्ड हवाएँ प्रवाहित होने लगीं, पर्वत प्रकम्पित हो उठे, किसी दारुण आपदाके सूचक उल्कापात आदि महान् ॥ २८ उपद्रव होने लगे, सूर्य तिरोहित हो गये तथा सभी दिशाएँ अत्यन्त भयावह हो गयीं । यह सब देखकर देवतालोग चिन्तित होकर सोचने लगे कि इस दुर्दिनमें ॥ २ ९ अब क्या होगा? ॥ २६–२९ ॥ हे तपस्वियो! वे देवतागण ऐसा सोच ही रहे थे कि किरीट - कुण्डलसहित देवाधिदेव भगवान् विष्णुका ॥ ३० सिर [ कटकर ] कहीं चला गया ॥३० ॥
कुछ समय पश्चात् उस घोर अन्धकारके शान्त हो जानेपर ब्रह्मा और शंकरने भगवान् विष्णुका ३१ । मस्तकविहीन विलक्षण शरीर देखा ॥ ३१ ॥
पृष्ठ 97
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५
दृष्ट्वा कबन्धं विष्णोस्ते विस्मिताः सुरसत्तमाः ।
चिन्तासागरमग्नाश्च रुरुदुः शोककर्शिताः ॥
हा नाथ किं प्रभो जातमत्यद्भुतममानुषम् ।
वैशसं सर्वदेवानां देवदेव सनातन ॥
मायेयं कस्य देवस्य यया तेऽद्य शिरो हृतम् ।
अच्छेद्यस्त्वमभेद्योऽसि अप्रदाह्योऽसि सर्वदा ॥
एवं गते त्वयि विभो मरिष्यन्ति च देवताः ।
कीदृशस्त्वयि नः स्नेहः स्वार्थेनैव रुदामहे ॥
नायं विघ्नः कृतो दैत्यैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः ।
देवैरेव कृतः कस्य दूषणं च रमापते ॥
पराधीनाः सुराः सर्वे किं कुर्मः क्व व्रजाम च ।
शरणं नैव देवेश सुराणां मूढचेतसाम् ॥
न चैषा सात्त्विकी माया राजसी न च तामसी ।
यया छिन्नं शिरस्तेऽद्य मायेशस्य जगद्गुरोः ॥
क्रन्दमानांस्तदा दृष्ट्वा देवाञ्छिवपुरोगमान् ।
बृहस्पतिस्तदोवाच शमयन्वेदवित्तमः ॥
रुदितेन महाभागाः क्रन्दितेन तथापि किम् ।
उपायश्चात्र कर्तव्यः सर्वथा बुद्धिगोचरः ॥
दैवं पुरुषकारश्च देवेश सदृशावुभौ ।
उपायश्च विधातव्यो दैवात्फलति सर्वथा ॥
इन्द्र उवाच
दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम् ।
विष्णोरपि शिरश्छिन्नं सुराणां चैव पश्यताम् ॥
ब्रह्मोवाच
अवश्यमेव भोक्तव्यं कालेनापादितं च यत् ।
शुभं वाप्यशुभं वापि दैवं कोऽतिक्रमेत्पुनः ॥
भगवान् विष्णुका सिरविहीन धड़ देखकर वे ३२ श्रेष्ठ देवता अत्यन्त विस्मित हुए और चिन्तासागरमें निमग्न होकर शोकाकुल हो [ इस प्रकार ] विलाप करने लगे- ॥ ३२ ॥
हे नाथ! हे प्रभो! यह कैसी विचित्र अलौकिक ३३ घटना हो गयी? हे देवाधिदेव! हे सनातन! हम सभी देवताओंके लिये तो यह बात विनाशकारी है ॥ ३३ ॥
यह किस देवताकी माया है, जिसके द्वारा ३४ आपके सिरका हरण कर लिया गया । आप तो सर्वदा अच्छेद्य, अभेद्य और अदा हैं ॥ ३४ ॥
हे विभो! इस प्रकार आपके चले जानेपर हम ३५ देवता तो मृत्युको प्राप्त हो जायँगे । हमलोगोंके प्रति आपका कैसा स्नेह था । हमलोग स्वार्थ के कारण ही रुदन कर रहे हैं ॥ ३५ ॥
३६ संकटकी यह स्थिति न तो दैत्योंने, न यक्षोंने और न राक्षसोंने ही पैदा की है, अपितु हम देवताओंने ही यह विघ्न उत्पन्न किया है; तथापि हे रमापते! ३७ इसमें किसका दोष समझा जाय? ॥ ३६ ॥
हम सभी देवता पराश्रित हैं । हम इस समय क्या करें और कहाँ जायँ? हे देवेश! हम मूढ़ बुद्धिवाले ३८ देवताओंके लिये अब कहीं भी कोई शरण नहीं है ॥ ३७ ॥
यह कोई सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी माया भी नहीं है, जिसके द्वारा आप मायापति ३ ९ जगद्गुरुका सिर काटा गया है ॥ ३८ ॥
तब शिवसहित समस्त देवताओंको करुण क्रन्दन करते हुए देखकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ देवगुरु बृहस्पतिने ४० उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा - हे महाभागो! अब इस प्रकार क्रन्दनसे क्या लाभ है? इस समय तो विवेकका आश्रय लेकर कोई उपाय करना चाहिये । ४१ हे देवेन्द्र! भाग्य एवं पुरुषार्थ – दोनों ही समान श्रेणीके हैं फिर भी उपाय करना ही चाहिये और वह दैवयोगसे ही सफल होता है ॥ ३ ९ - ४१ ॥ इन्द्र बोले - अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार ४२ है, मैं तो दैवको श्रेष्ठतर मानता हूँ; क्योंकि हम देवताओंके देखते - देखते विष्णुका सिर कट गया ॥ ४२ ॥
ब्रह्माजी बोले- कालद्वारा जो भी शुभाशुभ कर्मोंका फल निर्धारित है, उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है; ४३ भाग्यका अतिक्रमण कौन कर सकता है? ॥ ४३ ॥
पृष्ठ 98
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ५ ]
देहवान्सुखदुःखानां भोक्ता नैवात्र संशयः ।
यथा कालवशात्कृत्तं शिरो मे शम्भुना पुरा ॥
तथैव लिङ्गपातश्च महादेवस्य शापतः ।
तथैवाद्य हरेर्मूर्धा पतितो लवणाम्भसि ॥
सहस्त्रभगसंप्राप्तिर्दुःखं चैव शचीपतेः ।
स्वर्गाद् भ्रंशस्तथा वासः कमले मानसे सरे ॥
एते दुःखस्य भोक्तारः केन दुःखं न भुज्यते । संसारेऽस्मिन्महाभागास्तस्माच्छोकं त्यजन्तु वै
चिन्तयन्तु महामायां विद्यादेवीं सनातनीम् ।
सा विधास्यति नः कार्यं निर्गुणा प्रकृतिः परा ॥
ब्रह्मविद्यां जगद्धात्रीं सर्वेषां जननीं तथा ।
यया सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥
सूत उवाच
इत्युक्त्वा वै सुरान्वेधा निगमानादिदेश ह ।
देहयुक्तान्स्थितानग्रे सुरकार्यार्थसिद्धये ॥
ब्रह्मोवाच
स्तुवन्तु परमां देवीं ब्रह्मविद्यां सनातनीम् ।
गूढाङ्गीं च महामायां सर्वकार्यार्थसाधनीम् ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य वेदाः सर्वाङ्गसुन्दराः ।
तुष्टुवुर्ज्ञानगम्यां तां महामायां जगत्स्थिताम् ॥
वेदा ऊचुः
नमो देवि महामाये विश्वोत्पत्तिकरे शिवे ।
निर्गुणे सर्वभूतेशि मातः शङ्करकामदे ॥
त्वं भूमिः सर्वभूतानां प्राणाः प्राणवतां तथा धीः श्रीः कान्तिः क्षमा शान्तिः श्रद्धा मेधा धृतिः स्मृतिः प्रथम स्कन्ध ८ ९ प्रत्येक प्राणी काल - क्रमके अनुसार सुख - दुःख ४४ भोगता ही है; इसमें कोई सन्देह नहीं है । जिस प्रकार पूर्वकालमें कालकी प्रेरणासे शंकरजीने मेरा मस्तक काट दिया था, उसी प्रकार शापके कारण शिवजीका लिंग कटकर गिर गया था और उसी प्रकार आज ४५ विष्णुका सिर [ कटकर ] लवणसागरमें जा गिरा है ॥ ४४-४५ ॥ [ दैवयोगसे ही ] इन्द्रको भी सहस्र भगोंकी ४६ प्राप्ति हुई । उन्हें दुःख भोगना पड़ा । वे स्वर्गसे च्युत हो गये और मानसरोवरके कमलमें रहने लगे ॥ ४६ ॥
इस संसारमें जब इन महाभाग देवताओंको ॥ ४७ भी दुःखका भोग करनेके लिये विवश होना पड़ा तो फिर दुःख भोगनेसे भला कौन वंचित रह सकता है? अतएव आपलोग शोकका परित्याग कर दें ४८ और उन महामाया, विद्यारूपा, सनातनी, ब्रह्मविद्या तथा जगत्को धारण करनेवाली देवीका ध्यान कीजिये, जिनके द्वारा यह चराचर सम्पूर्ण त्रिलोक ४ ९ व्याप्त है । वे निर्गुणा परा प्रकृति हमलोगोंका समस्त कार्य सिद्ध कर देंगी ॥ ४७-४९ ॥ सूतजी बोले – हे मुनियो! देवताओंसे इस प्रकार कहकर ब्रह्माजीने कार्यकी सिद्धिकी कामना से ५० अपने सम्मुख सशरीर विद्यमान वेदोंको आदेश दिया ॥ ५० ॥
ब्रह्माजी बोले- आपलोग समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाली, पराम्बा, ब्रह्मविद्या, सनातनी तथा ५१ निगूढ़ अंगोंवाली महामायाका स्तवन कीजिये ॥ ५१ ॥
उनका यह वचन सुनकर समस्त सुन्दर अंगोंवाले वेद जगत्की आधारस्वरूपा तथा ज्ञानगम्या उन महामायाकी स्तुति करने लगे ॥५२ ॥
५२ वेदोंने कहा – हे देवि! हे महामाये! हे विश्वोत्पत्तिकारिणि! हे शिवे! हे निर्गुणे! हे सर्वभूतेशि! हे शिवकामार्थ - प्रदायिनि माता! आपको नमस्कार है ॥ ५३ ॥
५३ आप सभी प्राणियोंको आश्रय देनेके लिये पृथ्वीस्वरूपा हैं तथा प्राणधारियों । बुद्धि, श्री, कान्ति, क्षमा, शान्ति, ॥ ५४ । एवं स्मृति सब कुछ आप ही हैं ।
पृष्ठ 99
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ ० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५
त्वमुद्गीथेऽर्धमात्रासि गायत्री व्याहृतिस्तथा ।
जया च विजया धात्री लज्जा कीर्तिः स्पृहा दया ॥ ५५
त्वां संस्तुमोऽम्ब भुवनत्रयसंविधान-दक्षां दयारसयुतां जननीं जनानाम् । विद्यां शिवां सकललोकहितां वरेण्यां वाग्बीजवासनिपुणां भवनाशकर्त्रीम् ॥ ५६ ब्रह्मा हरः शौरिसहस्रनेत्र-वाग्वह्निसूर्या भुवनाधिनाथाः । ते त्वत्कृताः सन्ति ततो न मुख्या माता यतस्त्वं स्थिरजङ्गमानाम् ॥५७ सकलभुवनमेतत्कर्तुकामा यदा त्वं सृजसि जननि देवान्विष्णुरुद्राजमुख्यान् । स्थितिलयजननं तैः कारयस्येकरूपा न खलु तव कथंचिद्देवि संसारलेशः ॥ ५८ न ते रूपं वेत्तुं सकलभुवने कोऽपि निपुणो न नाम्नां संख्यां ते कथितुमिह योग्योऽस्ति पुरुषः । यदल्पं कीलालं कलयितुमशक्तः स तु नरः कथं पारावाराकलनचतुरः स्यादृतमतिः ॥ ५ ९ न देवानां मध्ये भगवति तवानन्तविभवं विजानात्येकोऽपि त्वमिह भुवनैकासि जननी । कथं मिथ्या विश्वं सकलमपि चैका रचयसि प्रमाणं त्वेतस्मिन्निगमवचनं देवि विहितम् ॥ ६० निरीहैवासि त्वं निखिलजगतां कारणमहो
चरित्रं ते चित्रं भगवति मनो नो व्यथयति ।
कथंकारं वाच्यः सकलनिगमागोचरगुण-प्रभावः स्वं यस्मात्स्वयमपि न जानासि परमम् ॥ ६१ ।
ॐकारमें अर्धमात्राके रूपमें आप ही विराजमान हैं । आप गायत्री, भूः भुवः स्वः आदि व्याहृति, जया, विजया, धात्री, लज्जा, कीर्ति, स्पृहा एवं दया सभी कुछ हैं ॥५५ ॥
हे अम्ब! आप तीनों लोकोंके रचना - तन्त्रमें दक्ष, करुणरससे युक्त, सभी प्राणियोंकी माँ, विद्या, कल्याणी, सभी प्राणियोंकी हितसाधिका, सर्वश्रेष्ठ, वाग्बीजमन्त्रमें वास करनेमें निपुण तथा संसारका क्लेश दूर करनेवाली हैं; आपकी हम स्तुति करते हैं ॥ ५६ ॥
ब्रह्मा, शंकर, विष्णु, इन्द्र, सरस्वती, अग्नि, सूर्य तथा सभी भुवनोंके स्वामी आपके द्वारा ही निर्मित किये गये हैं । अतः उनकी अपनी कोई विशेषता नहीं है; आप ही सभी चराचर जगत्की माता हैं ॥ ५७ ॥
हे जननि! जब आप जगत्की रचनाकी कामना करती हैं, तब आप सर्वप्रथम ब्रह्मा, विष्णु, महेश-इन प्रमुख देवोंका सृजन करती हैं । उन्हींके माध्यम से एकमात्र आप ही जगत्का सृजन, पालन एवं संहारकार्य पूर्ण कराती हैं । हे देवि! आपमें संसारका लेशमात्र भी नहीं रहता ॥ ५८ ॥
हे देवि! सम्पूर्ण संसारमें ऐसा कोई भी निपुण प्राणी नहीं है, जो आपके रूपको जान सके और न तो ऐसा कोई योग्य मनुष्य है, जो आपके नामोंकी संख्याकी गणना करनेमें समर्थ हो । जो थोड़ेसे जलका सन्तरण करनेमें असमर्थ हो, वह बुद्धिसम्पन्न मनुष्य भला महासागरको पार करनेमें कुशल कैसे होगा? ॥ ५ ९ ॥ हे भगवति! आपके अन्तहीन वैभवको जान सकनेमें देवताओंमें कोई भी समर्थ नहीं है । एकमात्र आप समस्त विश्वकी माता हैं । आप अकेले ही इस सम्पूर्ण मिथ्या जगत्की रचना कैसे करती हैं? हे देवि! एकमात्र वेदवाक्य ही आपके इस सृष्टि-कार्यकी प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं ॥ ६० ॥
हे भगवति! समग्र जगत् की परम कारणस्वरूपा होती हुई भी आप इच्छारहित हैं । अहो! आपका अद्भुत चरित्र हमारे मनको विस्मित कर देता है । समस्त वेदोंसे भी अज्ञेय आपके गुणों एवं प्रभावोंका वर्णन हमलोग भला किस प्रकार कर सकते हैं; क्योंकि स्वयं आप भी अपने परमतत्त्वको नहीं जानतीं ॥ ६१ ॥
पृष्ठ 100
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ५ ] न किं जानासि त्वं जननि मधुजिन्मौलिपतनं शिवे किं वा ज्ञात्वा विविदिषसि शक्तिं मधुजितः । हरेः किं वा मातर्दुरितततिरेषा बलवती भवत्याः पादाब्जे भजननिपुणे क्वास्ति दुरितम् ॥ उपेक्षा किं चेयं तव सुरसमूहे ऽतिविषमा हरेर्मूनों नाशो मतमिह महाश्चर्यजनकम् । महद्दुःखं मातस्त्वमसि जननच्छेदकुशला न जानीमो मौलेर्विघटनविलम्बः कथमभूत् ॥ ज्ञात्वा दोषं सकलसुरतापादितं देवि चित्ते किं वा विष्णावमरजनितं दुष्कृतं पातितं ते । विष्णोर्वा किं समरजनितः कोऽपि गर्वोऽतिवेगा-च्छेत्तुं मातस्तव विलसितं नैव विद्योऽत्र भावम् ॥ किं वा दैत्यैः समरविजितैस्तीर्थदेशे सुरम्ये घोरं तप्त्वा भगवति वरं लब्धवद्भिर्भवत्याः । अन्तर्धानं गमितमधुना विष्णुशीर्षं भवानि द्रष्टुं किं वा विगतशिरसं वासुदेवं विनोदः ॥ सिन्धोः पुत्र्यां रोषिता किं त्वमाद्ये कस्मादेनां प्रेक्षसे नाथहीनाम् । क्षन्तव्यस्ते स्वांशजातापराधो व्युत्थाप्यैनं मोदितां मां कुरुष्व एते सुरास्त्वां सततं नमन्ति कार्येषु मुख्याः प्रथितप्रभावाः शोकार्णवात्तारय देवि देवा-नुत्थाप्य देवं सकलाधिनाथम् ॥ प्रथम स्कन्ध ९ १ हे जननि! क्या आप भगवान् विष्णुके शिरोच्छेदनकी घटना नहीं जानती हैं? हे शिवे! अथवा क्या यह जानकर भी आप मधुजित् विष्णुकी शक्तिकी परीक्षा करना चाहती हैं? हे माता! अथवा ६२ क्या यह विष्णुके महान् पापसमूहका फल है? किंतु आपके चरणकमलोंका भजन करनेमें निपुण प्राणीसे तो पाप हो ही नहीं सकता ॥ ६२ ॥
हे माता! आप इस देवसमूहकी भारी उपेक्षा क्यों कर रही हैं? भगवान् विष्णुके मस्तक कटने की घटना हमारे लिये अत्यन्त आश्चर्यजनक तथा महान् ६३ कष्टदायक बात है । हे माता! आप जननरूपी दुःखका नाश करनेमें कुशल हैं, अब हम यह नहीं जान पा रहे हैं कि विष्णुके सिर- संयोजनमें विलम्ब क्यों हो रहा है? ॥ ६३ ॥
हे देवि! सभी देवताओंके देवत्वाभिमानरूपी दोषको अपने मनमें समझकर आपने ही ऐसा किया है, अथवा देवजन्य दुष्कृतको विष्णुमें स्थापित किया ६४ है, अथवा विष्णुको संग्राम - विजय करनेका अहंकार हो गया था, जिसे अतिशीघ्र दूर करनेके लिये आपने यह लीला रची है । हे माता! हम आपके मनोभावों को समझनेमें पूर्णतया असमर्थ हैं ॥ ६४ ॥
हे भगवति! अथवा युद्धमें पराभूत किये गये दैत्योंने किसी मनोहर तीर्थमें घोर तपस्या करके ६५ आपसे वरदान प्राप्त कर लिया है, जो विष्णुके सिर कटनेका कारण बना । हे भवानि! अथवा विष्णुको सिरविहीनरूपमें देखनेके लिये आप इस समय कोई विनोद कर रही हैं ॥ ६५ ॥
आ! आप सिंधुसुता लक्ष्मीपर किसी कारणसे आक्रोशित तो नहीं हैं । आप उन्हें स्वामीविहीन किसलिये देखना चाह रही हैं? आप अपने ही अंशसे ॥ ६६ प्रादुर्भूत लक्ष्मीका अपराध क्षमा करें और भगवान् विष्णुको जीवनदान देकर रमाको प्रसन्न कर दें ॥ ६६ ॥
जगत्के समस्त कार्योंको सम्पादित करनेमें प्रमुख भूमिकावाले अतिशय प्रभावशाली ये देवता आपको । निरन्तर नमस्कार करते हैं । हे देवि! सर्वलोकाधिपति विष्णुको जीवित करके आप देवताओंको शोकसागरसे ६७ | पार कीजिये ॥ ६७ ॥