देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 111–120

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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१०२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ व्यसुर्यथा न जानाति गुणाञ्छब्दादिकानिह तथा हरिर्न जानाति निद्रामीलितलोचनः न जहाति यतो निद्रां बहुधा संस्तुतोऽप्यसौ मन्ये नास्य वशे निद्रा निद्रयायं वशीकृतः यो यस्य वशमापन्नः स तस्य किङ्करः किल तस्माच्च योगनिद्रेयं स्वामिनी मापतेर्हरेः सिन्धुजाया अपि वशे यया स्वामी वशीकृतः नूनं जगदिदं सर्वं भगवत्या वशीकृतम् अहं विष्णुस्तथा शम्भुः सावित्री च रमाप्युमा सर्वे वयं वशे यस्या नात्र किञ्चिद्विचारणा हरिरण्यवशः शेते यथान्यः प्राकृतो जनः ययाभिभूतः का वार्ता किलान्येषां महात्मनाम् स्तौम्यद्य योगनिद्रां वै यया मुक्तो जनार्दनः घटयिष्यति युद्धे च वासुदेवः सनातनः इति कृत्वा मतिं ब्रह्मा पद्मनालस्थितस्तदा तुष्टाव योगनिद्रां तां विष्णोरङ्गेषु संस्थिताम् ॥ ब्रह्मोवाच देवि त्वमस्य जगतः किल कारणं हि ज्ञातं मया सकलवेदवचोभिरम्ब यद्विष्णुरप्यखिललोकविवेककर्ता निद्रावशं च गमितः पुरुषोत्तमोऽद्य । इस लोकमें जैसे मृत प्राणीको शब्द आदि ॥ १ ९ गुणोंका आभास नहीं हो पाता, उसी प्रकार निद्राके कारण अपने नेत्र मूँदै हुए भगवान् विष्णु कुछ भी जान सकनेमें असमर्थ हैं ॥ १ ९ ॥ । मेरे द्वारा नानाविध स्तुति किये जानेपर ॥ २० भी भगवान् विष्णु निद्राका त्याग नहीं कर रहे हैं । अतएव मैं मानता हूँ कि निद्रा इनके अधीन । नहीं है, अपितु निद्राके द्वारा ही ये वशीभूत कर लिये गये हैं ॥ २० ॥

॥ २१ जो प्राणी जिस किसीके वशमें हो जाता है, वह निश्चय ही उसीका दास बन जाता है । अतः ये । योगनिद्रा ही लक्ष्मीपति विष्णुकी स्वामिनी हो गयी ॥ २२ हैं ॥ २१ ॥

जिस शक्तिके द्वारा सिन्धुपुत्री लक्ष्मीके वशमें रहनेवाले भगवान् विष्णु भी वशीभूत कर लिये गये । हैं, उन्हीं भगवतीने निश्चितरूपसे इस जगत्‌को अपने ॥ २३ अधीन कर रखा है ॥२२ ॥

मैं ( ब्रह्मा ), विष्णु, शंकर, सावित्री, लक्ष्मी एवं । पार्वती - हम सभी उन्हींके अधीन हैं; इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥ २३ ॥

॥ २४ भगवान् विष्णु भी जिस शक्तिके वशीभूत होकर विवश हुए - से उसी प्रकार सो रहे हैं जिस । प्रकार एक सामान्य प्राणी सोता है, तब अन्य ॥ २५ महापुरुषोंके विषयमें क्या कहा जाय? ॥२४ ॥

अतः अब मैं योगनिद्राका ही स्तवन करूँगा जिनकी कृपासे निद्रामुक्त होकर जनार्दन, सनातन

भगवान् वासुदेव युद्धके लिये उद्योग करेंगे ॥ २५ ॥

२६ तदनन्तर ऐसा निश्चयकर कमलनालपर विराजमान ब्रह्माजी भगवान् विष्णुके अंगोंमें व्याप्त उन योगनिद्राकी स्तुति करने लगे ॥ २६ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे देवि! इस जगत्का कारण आप ही हैं; वेदवाक्योंसे मुझे ऐसा ज्ञात हुआ है ॥ अम्ब! आपकी ही शक्तिसे सम्पूर्ण विश्वको ज्ञान देनेवाले पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु भी इस समय ॥ २७ । योगनिद्राके वशमें हो गये हैं ॥ २७ ॥

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अ ० ७ ] प्रथम स्कन्ध १०३ को वेद ते जननि मोहविलासलीलां मूढोऽस्म्यहं हरिरयं विवशश्च शेते । ईदृक्तया सकलभूतमनोनिवासे विद्वत्तमो विबुधकोटिषु निर्गुणायाः ॥ सांख्या वदन्ति पुरुषं प्रकृतिं च यां तां

चैतन्यभावरहितां जगतश्च कर्त्रीम् ।

किं तादृशासि कथमत्र जगन्निवास-श्चैतन्यताविरहितो विहितस्त्वयाद्य ॥

नाट्यं तनोषि सगुणा विविधप्रकारं नो वेत्ति कोऽपि तव कृत्यविधानयोगम् । ध्यायन्ति यां मुनिगणा नियतं त्रिकालं सन्ध्येति नाम परिकल्प्य गुणान् भवानि ॥ बुद्धिर्हि बोधकरणा जगतां सदा त्वं श्रीश्चासि देवि सततं सुखदा सुराणाम् । कीर्तिस्तथा मतिधृती किल कान्तिरेव श्रद्धा रतिश्च सकलेषु जनेषु मातः ॥ नातः परं किल वितर्कशतैः प्रमाणं प्राप्तं मया यदिह दुःखगतिं गतेन । त्वं चात्र सर्वजगतां जननीति सत्यं निद्रालुतां वितरता हरिणात्र दृष्टम् ॥ त्वं देवि वेदविदुषामपि दुर्विभाव्या वेदोऽपि नूनमखिलार्थतया न वेद । यस्मात्त्वदुद्भवमसौ श्रुतिरानुवाना प्रत्यक्षमेव सकलं तव कार्यमेतत् ॥ कस्ते चरित्रमखिलं भुवि वेद धीमा-नाहं हरिर्न च भवो न सुरास्तथान्ये । ज्ञातुं क्षमाश्च मुनयो न ममात्मजाश्च दुर्वाच्य एव महिमा तव सर्वलोके ॥ हे माता! समग्र लोकको मोहित कर देनेवाली आपकी लीलाको कौन जान सकता है? आपकी इस मैं तो मूढ़ हो गया हूँ और ये विष्णु परवश होकर सो रहे हैं । हे समस्त प्राणियोंके मनमें निवास करनेवाली २८ भगवति! करोड़ों देवताओंमें भी ऐसा कौन विज्ञ है, जो ऐसी आप निर्गुणाका रहस्य जान सके? ॥ २८ ॥

सांख्यशास्त्रके विद्वान् पुरुष और प्रकृतिसे जगत्की उत्पत्ति मानते हैं । इनमें वे अचेतन प्रकृतिको ही जगत्‌को उत्पन्न करनेवाली बताते हैं । तो फिर क्या आप वैसी ही २ ९ अचेतन हैं? किंतु यदि आप जड होतीं तो इन जगदाधार विष्णुको इस समय चेतनारहित कैसे कर देतीं? ॥ २ ९ ॥ हे महामाये! आप सगुण रूप धारणकर नानाविध लीलाएँ करती रहती हैं, अतः आपके रहस्यमय कार्योंका सम्यक् ज्ञान करनेमें भला कौन समर्थ है? हे भवानि! मुनिगण ' सन्ध्या ' नामसे आपके गुणों को ३० परिकल्पित करके तीनों समय ( प्रातः, मध्याह्न, सायं ) निश्चितरूपसे आपका ही ध्यान करते हैं ॥ ३० ॥

हे देवि! आप बुद्धिस्वरूपा होकर समस्त लोकको ज्ञान देती हैं और लक्ष्मीरूपसे सदैव देवताओंको सुख प्रदान करती हैं । हे माता! सम्पूर्ण ३१ प्राणियोंमें कीर्ति, मति, धृति, कान्ति, श्रद्धा एवं रतिरूपमें आप ही विद्यमान हैं ॥ ३१ ॥

हे देवि! प्रगाढ निद्राके वशीभूत विष्णुको देखकर विषम दु: खकी स्थितिको प्राप्त हुए मुझको यह प्रमाण मिल गया कि आप ही निस्सन्देह सम्पूर्ण जगत्की जननी हैं । इस विषयमें अब सैकड़ों तर्क-३२ वितर्ककी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ३२ ॥

हे देवि! आप वेदशास्त्रोंके पारदर्शी विद्वानोंकी समझसे भी परे हैं और वेद भी आपको पूर्णरूपसे नहीं जानते; क्योंकि उन वेदोंकी उत्पत्तिका भी कारण आप ही हैं । आपका यह सम्पूर्ण रहस्यमय क्रिया - कलाप सबको प्रत्यक्ष दिखायी देता है ॥ ३३ ॥

३३ इस संसारमें कौन ऐसा बुद्धिमान् प्राणी है, जो आपके सम्पूर्ण चरित्रको जाननेमें समर्थ है? स्वयं मैं ( ब्रह्मा ), विष्णु, शंकर, देवगण, अन्य मुनिवृन्द तथा मेरे तत्त्वज्ञ पुत्र - लोग भी उसे नहीं जान सके हैं । सम्पूर्ण लोकमें आपकी महिमाका वर्णन कोई नहीं ३४ | कर सकता है ॥ ३४ ॥

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१०४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ यज्ञेषु देवि यदि नाम न ते वदन्ति स्वाहेति वेदविदुषो हवने कृतेऽपि । न प्राप्नुवन्ति सततं मखभागधेयं देवास्त्वमेव विबुधेष्वपि वृत्तिदासि ॥ त्राता वयं भगवति प्रथमं त्वया वै देवारिसम्भवभयादधुना तथैव । भीतोऽस्मि देवि वरदे शरणं गतोऽस्मि घोरं निरीक्ष्य मधुना सह कैटभं च ॥ नो वेत्ति विष्णुरधुना मम दुःखमेत-जाने त्वयात्मविवशीकृतदेहयष्टिः । मुञ्चादिदेवमथवा जहि दानवेन्द्रौ यद्रोचते तव कुरुष्व महानुभावे ॥ जानन्ति ये न तव देवि परं प्रभावं ध्यायन्ति ते हरिहरावपि मन्दचित्ताः । ज्ञातं मयाद्य जननि प्रकटं प्रमाणं यद्विष्णुरप्यतितरां विवशोऽथ शेते ॥ सिन्धुद्धवापि न हरिं प्रतिबोधितुं वै शक्ता पतिं तव वशानुगमद्य शक्त्या । मन्ये त्वया भगवति प्रसभं रमापि प्रस्वापिता न बुबुधे विवशीकृतेव ॥ धन्यास्त एव भुवि भक्तिपरास्तवांघ्रौ त्यक्त्वान्यदेवभजनं त्वयि लीनभावाः । कुर्वन्ति देवि भजनं सकलं निकामं ज्ञात्वा समस्तजननीं किल कामधेनुम् ॥ धीकान्तिकीर्तिशुभ वृत्तिगुणादयस्ते विष्णोर्गुणास्तु परिहृत्य गताः क्व चाद्य । बन्दीकृतो हरिरसौ ननु निद्रयात्र शक्त्या तवैव भगवत्यतिमानवत्याः ॥ हे देवि! यदि यज्ञोंमें वैदिक विद्वान् हवनकार्यके समय आपके ' स्वाहा ' नामका उच्चारण न करें तो देवगण अपना यज्ञभाग नहीं प्राप्त कर सकते । अतएव आप ही देवताओंका भी भरण - पोषण करती हैं ॥ ३५ ॥

३५ हे भगवति! आपने पहले भी समय - समयपर दैत्योंद्वारा उत्पन्न किये गये भयोंसे हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार इस समय भी हमारी रक्षा करें, मैं आपकी शरणमें हूँ । हे देवि! हे वरदे! मधुके साथ भयानक इस कैटभको देखकर मैं अत्यन्त भयाक्रान्त हूँ ॥ ३६ ॥

३६ आपकी योगमायाने भगवान् विष्णुके शरीरके सभी अवयवोंको अपने वशमें कर रखा है, अतः वे मेरी इस विषम विपत्तिको नहीं जान रहे हैं । हे महानुभावे! या तो इस समय आप आदिदेवको मुक्त कर दें अथवा इन दोनों महादैत्योंका वध कर दें; इनमेंसे आपको जो उचित जान पड़े, वह कीजिये ॥ ३७ ॥

३७ हे देवि! जो मन्दबुद्धि प्राणी आपकी विशिष्ट महिमाको नहीं जानते, वे ही विष्णु तथा शंकर आदिकी आराधना करते हैं । हे जननि! आज प्रत्यक्ष प्रमाण रूपमें मैं आपकी महिमा देख रहा हूँ कि भगवान् विष्णु भी प्रगाढ निद्रा वशीभूत होकर सो रहे हैं ॥ ३८ ॥

३८ आपकी शक्तिके वशमें पड़े अपने पति भगवान् विष्णुको इस समय सिन्धुसुता लक्ष्मी भी नहीं जगा सकतीं; क्योंकि हे भगवति! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आपने ही बलपूर्वक लक्ष्मीको भी शयन करनेके लिये विवश कर दिया है, जिससे वे भी नहीं ३ ९ जग रही हैं ॥ ३ ९ ॥ हे देवि! इस संसार में वे ही प्राणी धन्य हैं जो आपके चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, अन्य देवताओंकी उपासना त्यागकर आपके ध्यानमें लीन रहते हैं और आपको ही सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेवाली कामधेनु तथा समस्त लोककी जननी मानकर आपका ४० भजन करते हैं ॥ ४० ॥

बुद्धि, कान्ति, यश, शुभ वृत्ति आदि गुण इस समय भगवान् विष्णुका परित्यागकर कहाँ चले गये? हे भगवति! अतिशय मानवाली आपकी ही शक्तिसे ये भगवान् विष्णु इस समय निद्राके वशवर्ती ४१ | हो गये हैं ॥ ४१ ॥

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अ ० ७ ] त्वं शक्तिरेव जगतामखिलप्रभावा त्वन्निर्मितं च सकलं खलु भावमात्रम् । त्वं क्रीडसे निजविनिर्मितमोहजाले नाट्ये यथा विहरते स्वकृते नटो वै ॥ विष्णुस्त्वया प्रकटितः प्रथमं युगादौ दत्ता च शक्तिरमला खलु पालनाय । त्रातं च सर्वमखिलं विवशीकृतोऽद्य यद्रोचते तव तथाम्ब करोषि नूनम् ॥ सृष्ट्वात्र मां भगवति प्रविनाशितुं चे-नेच्छास्ति ते कुरु दयां परिहृत्य मौनम् । कस्मादौ प्रकटितौ किल कालरूपौ यद्वा भवानि हसितुं नु किमिच्छसे माम् ॥ ज्ञातं मया तव विचेष्टितमद्भुतं वै कृत्वाखिलं जगदिदं रमसे स्वतन्त्रा । लीनं करोषि सकलं किल मां तथैव हन्तुं त्वमिच्छसि भवानि किमत्र चित्रम् ॥ कामं कुरुष्व वधमद्य ममैव मात-दुःखं न मे मरणजं जगदम्बिकेऽत्र । कर्ता त्वयैव विहितः प्रथमं स चायं दैत्याहतोऽथ मृत इत्ययशो गरिष्ठम् उत्तिष्ठ देवि कुरु रूपमिहाद्भुतं त्वं मां वा त्वमौ जहि यथेच्छसि बाललीले नो चेत्प्रबोधय हरिं निहनेदिमौ य-स्त्वत्साध्यमेतदखिलं किल कार्यजातम् प्रथम स्कन्ध १०५ अखिल प्रभाववाली आप ही जगत्की एकमात्र शक्ति हैं और आपके द्वारा रचा गया सब कुछ आपकी लीला ही है । जैसे कोई नट अपने ही द्वारा निर्मित नाट्यमें अभिनय करता है, उसी प्रकार आप ४२ भी अपने ही द्वारा निर्मित मोहजालमें नानाविध लीलाएँ करती रहती हैं ॥ ४२ ॥

युग आरम्भमें आपने सर्वप्रथम विष्णुका सृजन किया, सबके पालनके लिये उन्हें निर्मल शक्ति प्रदान की और इस प्रकार समस्त जगत्की रक्षा की । उन्हीं भगवान् विष्णुको निद्राभिभूतकर आपने इस ४३ समय सुला दिया है । हे अम्ब! आपको जो उचित जान पड़ता है, आप निश्चितरूपसे वही किया करती हैं ॥ ४३ ॥

हे भगवति! यदि आप मेरी सृष्टि करके मुझे नष्ट कर देनेकी इच्छा नहीं रखतीं तो अपना यह मौन त्यागकर मेरे ऊपर दया कीजिये । हे भवानि! आपने कालरूप इन दोनों दानवोंको किसलिये ४४ उत्पन्न किया है? कहीं आपने मेरे उपहासके लिये तो ऐसा नहीं किया है? ॥ ४४ ॥

हे भवानि! अब मुझे आपके अद्भुत चरित्रका ज्ञान हो गया । समस्त जगत्की रचना करके आप उसीमें स्वेच्छासे विहार करती हैं और पुनः उसे अपनेमें जैसे समाहित कर लेती हैं, उसी प्रकार मुझे ४५ नष्ट कर देना चाहती हैं तो इसमें कोई विचित्र बात नहीं है ॥ ४५ ॥

हे माता! यदि आप यही चाहती हैं तो मेरा वध कर दीजिये । हे जगदम्बे! मुझे मरणजनित दुःखकी लेशमात्र भी चिन्ता नहीं है । । हाँ, आपको यह महान् कलंक अवश्य लगेगा कि आपने जिसे सर्वप्रथम ॥ ४६ सृष्टिकर्ता बनाया, उसे दैत्यने मार डाला ॥४६ ॥

हे देवि! अब आप उठिये और अपना अद्भुत रूप धारण कीजिये । हे बाललीलाकारिणि! आप । अपने इच्छानुरूप चाहे मुझे मार दें अथवा इन दोनों दैत्योंको मार दें या तो भगवान् विष्णुको जगा दें, जिससे वे इन दोनोंका वध कर दें । यह सारा काम ॥ ४७ । करनेमें आप ही समर्थ हैं ॥ ४७ ॥

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१०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ सूत उवाच

एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा ।

निःसृत्य हरिदेहात्तु संस्थिता पार्श्वतस्तदा ॥ ४८

त्यक्त्वाङ्गानि च सर्वाणि विष्णोरतुलतेजसः ।

निर्गता योगनिद्रा सा नाशाय च तयोस्तदा ॥ ४ ९

विस्पन्दितशरीरोऽसौ यदा जातो जनार्दनः ।

धाता परमिकां प्राप्तो मुदं दृष्ट्वा हरिं ततः ॥ ५०

सूतजी बोले- ब्रह्माजीद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विष्णुके शरीरसे निकलकर तामसीदेवी उनके समीप खड़ी हो गयीं ॥ ४८ ॥

तदनन्तर अतुलित तेजवाले विष्णुके समस्त अंगों को छोड़कर योगनिद्रा उन दोनोंका संहार करनेके लिये बाहर निकल आयीं ॥ ४ ९ ॥ [ योगमायाके प्रभावसे मुक्त हुए ] वे जनार्दन जब चेतनायुक्त शरीरवाले हुए तब उन विष्णुको । देखकर ब्रह्माजीको परम प्रसन्नता हुई ॥ ५० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे विष्णुप्रबोधो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

अथाष्टमोऽध्यायः भगवान् विष्णु योगमायाके अधीन क्यों सूतजीद्वारा उन्हें आद्याशक्ति ऋषय ऊचुः

सन्देहोऽत्र महाभाग कथायां तु महाद्भुतः ।

वेदशास्त्रपुराणैश्च निश्चितं तु सदा बुधैः ॥ १

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवाः सनातनाः । नातः परतरं किञ्चिद् ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महामते ।

ब्रह्मा सृजति लोकान्वै विष्णुः पात्यखिलं जगत् ।

रुद्रः संहरते काले त्रय एतेऽत्र कारणम् ॥ ३

एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।

रजः सत्त्वतमोभिश्च संयुताः कार्यकारकाः ॥ ४

तेषां मध्ये हरिः श्रेष्ठो माधवः पुरुषोत्तमः ।

आदिदेवो जगन्नाथः समर्थः सर्वकर्मसु ॥ ५

नान्यः कोऽपि समर्थोऽस्ति विष्णोरतुलतेजसः ।

स कथं स्वापितः स्वामी विवशो योगमायया ॥ ६

क्व गतं तस्य विज्ञानं जीवतश्चेष्टितं कुतः ।

सन्देहोऽयं महाभाग कथयस्व यथाशुभम् ॥ ७

हो गये - ऋषियोंके इस प्रश्नके उत्तरमें भगवतीकी महिमा सुनाना ऋषिगण बोले- हे महाभाग! हमें इस कथानकमें महान् अद्भुत संशय है । हे महामते! वेदों, शास्त्रों, पुराणों तथा बुद्धिमान् लोगोंकी सदासे यह अवधारणा रही है कि ब्रह्मा, विष्णु तथा शम्भु - ये तीनों देवता सनातन हैं और इस ब्रह्माण्डमें इनसे बढ़कर अन्य कोई नहीं है ॥ १-२ ॥ ब्रह्मा जगत्का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शंकर प्रलयकालमें संहार करते हैं । ये तीनों ही इसमें कारण हैं ॥ ३ ॥

ब्रह्मा, विष्णु और महेश- ये तीनों देवता एक ही मूर्ति तीन स्वरूप हैं । ये लोग क्रमशः रज, सत्त्व और तम - गुणोंसे युक्त होकर अपना - अपना कार्य करते हैं ॥ ४ ॥

उन तीनोंमें माधव, पुरुषोत्तम, आदिदेव जगन्नाथ श्रीहरि श्रेष्ठ हैं और वे सभी कार्य सम्पादित करनेमें समर्थ हैं । अनुपम तेजवाले विष्णुसे बढ़कर सर्वसमर्थ अन्य कोई भी नहीं है । उन जगत्पति विष्णुको योगमायाने विवश करके भला कैसे सुला दिया? ॥ ५-६ ॥ उस समय उन विष्णुकी चेतना कहाँ चली गयी और उनके जीवनकी चेष्टा कहाँ लुप्त हो गयी? हे महाभाग! यह महान् सन्देह उपस्थित है; आप इस विषयमें यथोचित बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥

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अ ० ८ ]

का सा शक्तिः पुरा प्रोक्ता यया विष्णुर्जितः प्रभुः ।

कुतो जाता कथं शक्ता का शक्तिर्वद सुव्रत ॥

यस्तु सर्वेश्वरो विष्णुर्वासुदेवो जगद्गुरुः ।

परमात्मा परानन्दः सच्चिदानन्दविग्रहः ॥

सर्वकृत्सर्वभृत्स्रष्टा विरजः सर्वगः शुचिः ।

स कथं निद्रया नीतः परतन्त्रः परात्परः ॥

एतदाश्चर्यभूतो हि सन्देहो नः परन्तप ।

छिन्धि ज्ञानासिना सूत व्यासशिष्य महामते ॥

सूत उवाच

कः सन्देहं भिनत्त्येनं त्रैलोक्ये सचराचरे ।

मुह्यन्ति मुनयः कामं ब्रह्मपुत्राः सनातनाः ॥

नारदः कपिलश्चैव प्रश्नेऽस्मिन्मुनिसत्तमाः ।

किं ब्रवीमि महाभागा दुर्घटेऽस्मिन्विमर्शने ॥

देवेषु विष्णुः कथितः सर्वगः सर्वपालकः ।

यतो विराडिदं सर्वमुत्पन्नं सचराचरम् ॥

ते सर्वे समुपासन्ते नत्वा देवं परात्परम् ।

नारायणं हृषीकेशं वासुदेवं जनार्दनम् ॥

तथा केचिन्महादेवं शङ्करं शशिशेखरम् ।

त्रिनेत्रं पञ्चवक्त्रं च शूलपाणिं वृषध्वजम् ॥

तथा वेदेषु सर्वेषु गीतं नाम्ना त्रियम्बकम् ।

कपर्दिनं पञ्चवक्त्रं गौरीदेहार्धधारिणम् ॥

कैलासवासनिरतं सर्वशक्तिसमन्वितम् भूतवृन्दयुतं देवं दक्षयज्ञविघातकम् प्रथम स्कन्ध १०७ जिस शक्तिके विषयमें आप पहले बता चुके ८ हैं कि उसने भगवान् विष्णुको भी पराभूत कर दिया था, वह कौन - सी शक्ति है? वह शक्ति कहाँसे उद्भूत हुई, शक्तिसम्पन्न कैसे हुई तथा उसका स्वरूप क्या है? हे सुव्रत! यह सब हमें स्पष्टरूपसे ९ बतलाइये ॥ ८ ॥

जो विष्णु हैं वे तो सबके ईश्वर, वासुदेव, जगत्के गुरु, परमात्मा, परम आनन्दस्वरूप तथा १० सच्चिदानन्दकी साक्षात् मूर्ति हैं; सब कुछ करनेमें समर्थ, सबका पालन करनेवाले, सभी चराचरका सृजन करनेवाले, रजोगुणसे रहित, सर्वव्यापी और ११ पवित्र हैं । वे परात्पर विष्णु निद्राकी परतन्त्रतामें कैसे आबद्ध हो गये? ॥९ -१० ॥ हे परन्तप! हमें इस प्रकारका आश्चर्यजनक सन्देह है । हे सूत! हे व्यासशिष्य! हे महामते! आप अपने ज्ञानरूपी खड्गसे हमारे इस सन्देहको नष्ट कर १२ दीजिये ॥ ११ ॥

सूतजी बोले – हे मुनिजन! इस चराचर जगत्में कौन ऐसा है, जो इस शंकाका समाधान कर १३ सके, जबकि ब्रह्माके पुत्र सनकादि मुनि तथा नारद, कपिल आदि भी इस विषयमें मोहित हो जाते हैं? हे मुनिश्रेष्ठ! हे महाभाग! तब इस जटिल समस्याके १४ समाधानमें मैं क्या कहूँ? ॥१२-१३ ॥ देवताओंमें भगवान् विष्णु ही सर्वव्यापी एवं सभी भूतोंके रक्षक कहे गये हैं । उन्हींसे इस चराचर १५ समस्त विराट् संसारकी सृष्टि हुई है ॥१४ ॥

वे सभी देवता परात्पर परमात्माको नमस्कार करके नारायण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दनरूपमें उनकी उपासना करते हैं ॥ १५ ॥

१६ कुछ लोग महादेव, शंकर, शशिशेखर, त्रिनेत्र, पंचवक्त्र, शूलपाणि और वृषभध्वजके रूपमें उन्हींकी उपासना करते हैं ॥ १६ ॥

१७ सभी वेदोंमें भी त्रियम्बक ( त्र्यम्बक ), कपर्दी, पंचवक्त्र, गौरीदेहार्धधारी, कैलासवासी, सर्वशक्ति-। समन्वित, भूतगणोंसे सेवित एवं दक्षयज्ञविध्वंसक आदि ॥ १८ नामोंसे उनका गुणगान किया गया है॥१७-१८ ॥

पृष्ठ 117

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१०८ तथा सूर्यं वेदविदः सायंप्रातर्दिने दिने मध्याह्ने तु महाभागाः स्तुवन्ति विविधैः स्तवैः तथा वेदेषु सर्वेषु सूर्योपासनमुत्तमम् । परमात्मेति विख्यातं नाम तस्य महात्मनः

अग्निः सर्वत्र वेदेषु संस्तुतो वेदवित्तमैः ।

इन्द्रश्चापि त्रिलोकेशो वरुणश्च तथापरः ॥

यथा गङ्गा प्रवाहैश्च बहुभिः परिवर्तते ।

तथैव सर्वदेवेषु विष्णुः प्रोक्तो महर्षिभिः ॥

त्रीण्येव हि प्रमाणानि पठितानि सुपण्डितैः ।

प्रत्यक्षं चानुमानं च शाब्दं चैव तृतीयकम् ॥

चत्वार्येवेतरे प्राहुरुपमानयुतानि च ।

अर्थापत्तियुतान्यन्ये पञ्च प्राहुर्महाधियः ॥

सप्त पौराणिकाश्चैव प्रवदन्ति मनीषिणः ।

एतैः प्रमाणैर्दुर्ज्ञेयं यद् ब्रह्म परमं च तत् ॥

वितर्कश्चात्र कर्तव्यो बुद्ध्या चैवागमेन च ।

निश्चयात्मिकया युक्त्या विचार्य च पुनः पुनः ॥

प्रत्यक्षतस्तु विज्ञानं चिन्त्यं मतिमता सदा ।

दृष्टान्तेनापि सततं शिष्टमार्गानुसारिणा ॥

विद्वांसोऽपि वदन्त्येवं पुराणैः परिगीयते 1 ।

द्रुहिणे सृष्टिशक्तिश्च हरौ पालनशक्तिता ॥

हरे संहारशक्तिश्च सूर्ये शक्ति: प्रकाशिका ।

धराधरणशक्तिश्च शेषे कूर्मे तथैव च ॥

साद्या शक्तिः परिणता सर्वस्मिन्या प्रतिष्ठिता ।

दाहशक्तिस्तथा वह्नौ समीरे प्रेरणात्मिका ॥

शिवोऽपि शवतां याति कुण्डलिन्या विवर्जितः ।

शक्तिहीनस्तु यः कश्चिदसमर्थः स्मृतो बुधैः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८ । हे महाभागो! वैदिक विद्वान् लोग सूर्य आदि ॥ १ ९ नामोंसे भी नित्य प्रातः, सायं तथा मध्याह्नकालमें सन्ध्या करते समय विविध प्रकारकी स्तुतियोंसे उन्हींकी प्रार्थना करते हैं ॥१ ९ ॥ ॥ २० सभी वेदोंमें सूर्योपासना श्रेष्ठ कही गयी है तथा उन महात्माका नाम ' परमात्मा ' कहा गया है । वेदोंमें सर्वत्र वेदज्ञोंद्वारा अग्निदेवकी भी स्तुति की गयी २१ है । वहाँ त्रिलोकेश इन्द्र, वरुण तथा अन्यान्य देवताओंकी भी स्तुति की गयी है ॥ २०-२१ ॥ जिस प्रकार गंगा अनेक धाराओंमें विद्यमान रहकर २२ प्रवाहित होती हैं, उसी प्रकार महर्षियोंद्वारा भगवान् विष्णु सभी देवताओं में विद्यमान बताये गये हैं ॥ २२ ॥

मनीषी विद्वानोंने तीन प्रकारके मुख्य प्रमाण २३ बताये हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान और तीसरा शब्दप्रमाण । अन्य ( न्याय ) - के पण्डित चार प्रमाण मानते हैं-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्दप्रमाण । परंतु अन्य २४ ( मीमांसाके ) विद्वान् लोग अर्थापत्तिको लेकर पाँच प्रमाण मानते हैं ॥ २३-२४ ॥ पौराणिक विद्वान् सात प्रमाण बताते हैं- इन २५ प्रमाणोंसे भी जो दुर्ज्ञेय है, वह है - परब्रह्म ॥ २५ ॥

इसलिये इस विषयमें बुद्धि, शास्त्र एवं २६ निश्चयात्मिका युक्तिसे बार - बार विचार करके अनुमान करना चाहिये । साथ ही सन्मार्गका अनुसरण करनेवाले दृष्टान्तद्वारा इस प्रत्यक्ष विज्ञानका चिन्तन बुद्धिमान् २७ मनुष्यको सर्वदा करते रहना चाहिये ॥ २६-२७ ॥ प्रायः सभी पुराण तथा विद्वान् ऐसा कहते हैं कि ब्रह्मामें सृष्टि करनेकी शक्ति, विष्णुमें पालन २८ करनेकी शक्ति, शिवमें संहार करनेकी शक्ति, सूर्यमें प्रकाश करनेकी शक्ति तथा शेष और कच्छपमें पृथ्वीको धारण करनेकी शक्ति स्वभावतः विद्यमान २ ९ रहती है ॥ २८-२९ ॥ इस प्रकार एकमात्र वे आद्याशक्ति ही स्वरूपभेदसे सभीमें व्याप्त रहती हैं । वे ही अग्निमें दाहकत्व ३० । शक्ति तथा वायुमें संचारशक्ति हैं ॥ ३० ॥

कुण्डलिनी शक्तिके बिना शिव भी ' शव ' बन जाते हैं । विद्वान् लोग शक्तिहीन जीवको निर्जीव एवं ३१ । असमर्थ कहते हैं ॥ ३१ ॥

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अ ० ८ ]

एवं सर्वत्र भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च ।

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महातपाः ॥

शक्तिहीनं तु निन्द्यं स्याद्वस्तुमात्रं चराचरम् ।

अशक्तः शत्रुविजये गमने भोजने तथा ॥

एवं सर्वगता शक्तिः सा ब्रह्मेति विविच्यते ।

सोपास्या विविधैः सम्यग्विचार्या सुधिया सदा ॥

विष्णौ च सात्त्विकी शक्तिस्तया हीनो ऽप्यकर्मकृत् ।

द्रुहिणे राजसी शक्तिर्यया हीनो ह्यसृष्टिकृत् ॥

शिवे च तामसी शक्तिस्तया संहारकारकः ।

इत्यूह्यं मनसा सर्वं विचार्य च पुनः पुनः ॥

शक्तिः करोति ब्रह्माण्डं सा वै पालयतेऽखिलम् ।

इच्छया संहरत्येषा जगदेतच्चराचरम् ॥

न विष्णुर्न हरः शक्रो न ब्रह्मा न च पावकः ।

न सूर्यो वरुणः शक्तः स्वे स्वे कार्ये कथञ्चन ॥

तया युक्ता हि कुर्वन्ति स्वानि कार्याणि ते सुराः 1 सैव कारणकार्येषु प्रत्यक्षेणावगम्यते ॥

सगुण निर्गुणास तु द्विधा प्रोक्ता मनीषिभिः ।

सगुणा रागिभिः सेव्या निर्गुणा तु विरागिभिः ॥

धर्मार्थकाममोक्षाणां स्वामिनी सा निराकुला ।

ददाति वाञ्छितान्कामान्पूजिता विधिपूर्वकम् ॥

न जानन्ति जना मूढास्तां सदा माययावृताः ।

जानन्तोऽपि नराः केचिन्मोहयन्ति परानपि ॥

पण्डिताः स्वोदरार्थं वै पाखण्डानि पृथक्पृथक् प्रवर्तयन्ति कलिना प्रेरिता मन्दचेतसः ॥ प्रथम स्कन्ध १० ९ अतएव हे मुनिजनो! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त ३२ सभी पदार्थ इस संसारमें शक्तिके बिना सर्वथा हेय हैं; क्योंकि स्थावर - जंगम सभी जीवोंमें वह शक्ति ही काम करती है । यहाँतक कि शक्तिहीन पुरुष शत्रुपर विजयी होने, चलने - फिरने तथा भोजन करनेमें भी ३३ सर्वथा असमर्थ रहता है॥३२-३३ ॥ वह सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली आदिशक्ति ही ' ब्रह्म ' कहलाती है । बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि ३४ | वह अनेक प्रकारके यत्नोंद्वारा सम्यक् रूपसे उसकी उपासना करे तथा उसका चिन्तन करे ॥ ३४ ॥

भगवान् विष्णुमें सात्त्विकी शक्ति रहती है, ३५ जिसके बिना वे अकर्मण्य हो जाते हैं । ब्रह्मामें राजसी शक्ति है, वे भी शक्तिहीन होकर सृष्टिकार्य नहीं कर सकते और शिवमें तामसी शक्ति रहती है, जिसके बलपर वे संहार - कृत्य सम्पादित करते हैं । इस ३६ विषयपर मनसे बार - बार विचार करके तर्क - वितर्क करते रहना चाहिये ॥ ३५-३६ ॥ शक्ति ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी रचना करती है, ३७ सबका पालन करती है और इच्छानुसार इस चराचर जगत्का संहार करती है ॥ ३७ ॥

उसके बिना विष्णु, शिव, इन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि, ३८ सूर्य और वरुण कोई भी अपने - अपने कार्यमें किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हो सकते ॥ ३८ ॥

वे देवगण शक्तियुक्त होनेपर ही अपने - अपने ३ ९ कार्योंको सम्पादित करते रहते हैं । प्रत्येक कार्य-कारणमें वही शक्ति प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है ॥ ३ ९ ॥ मनीषी पुरुषोंने शक्तिको सगुणा और निर्गुणा भेदसे दो प्रकारका बताया है । सगुणा शक्तिकी ४० उपासना आसक्तजनों और निर्गुणा शक्तिकी उपासना अनासक्तजनोंको करनी चाहिये ॥ ४० ॥

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चारों पदार्थोंकी ४१ स्वामिनी वे ही निर्विकार शक्ति हैं । विधिवत् पूजा करनेसे वे सब प्रकारके मनोरथ पूर्ण करती हैं ॥ ४१ ॥

सदा मायासे घिरे हुए अज्ञानी लोग उस महाशक्तिको ४२ जान नहीं पाते । यहाँतक कि कुछ विद्वान् पुरुष उन्हें जानते हुए भी दूसरोंको भ्रममें डालते हैं । कुछ मन्दबुद्धि । पण्डित अपने उदरकी पूर्ति के लिये कलिसे प्रेरित होकर ४३ । अनेक प्रकारके पाखण्ड करते हैं ॥ ४२-४३ ॥

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११० कलावस्मिन्महाभागा नानाभेदसमुत्थिताः नान्ये युगे तथा धर्मा वेदबाह्याः कथञ्चन विष्णुश्चरत्यसावुग्रं तपो वर्षाण्यनेकशः ब्रह्मा हरस्त्रयो देवा ध्यायन्तः कमपि ध्रुवम् कामयानाः सदा कामं ते त्रयः सर्वदैव हि । यजन्ति यज्ञान्विविधान्ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः

ते वै शक्तिं परां देवीं ब्रह्माख्यां परमात्मिकाम् ।

ध्यायन्ति मनसा नित्यं नित्यां मत्वा सनातनीम् ॥

तस्माच्छक्तिः सदा सेव्या विद्वद्भिः कृतनिश्चयैः ।

निश्चयः सर्वशास्त्राणां ज्ञातव्यो मुनिसत्तमाः ॥

कृष्णाच्छ्रुतं मया चैतत्तेन ज्ञातं तु नारदात् ।

पितुः सकाशात्तेनापि ब्रह्मणा विष्णुवाक्यतः ॥

न श्रोतव्यं न मन्तव्यमन्येषां वचनं बुधैः ।

शक्तिरेव सदा सेव्या विद्वद्भिः कृतनिश्चयैः ॥

प्रत्यक्षमपि द्रष्टव्यमशक्तस्य विचेष्टितम् ।

अतः सर्वेषु भूतेषु ज्ञातव्या शक्तिरेव हि ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ । हे महाभागो! इस कलिमें बहुत प्रकारके ॥ ४४ अवैदिक तथा भेदमूलक धर्म उत्पन्न होते हैं; दूसरे युगोंमें नहीं होते ॥ ४४ ॥

। स्वयं भगवान् विष्णु भी अनेक वर्षोंतक कठोर तप करते हैं और ब्रह्मा तथा शिवजी भी ऐसा ही करते ॥ ४५ हैं । ये तीनों देवता निश्चित ही किसीका ध्यान करते हुए कठिन तपस्या करते रहते हैं ॥ ४५ ॥

इसी प्रकार अपनी इच्छाओं की पूर्तिके लिये ब्रह्मा, ॥ ४६ विष्णु, महेश – ये तीनों ही देवता अनेक प्रकारके यज्ञ सदा करते हैं । वे उन पराशक्ति, ब्रह्म नामवाली परमात्मिका देवीको नित्य एवं सनातन मानकर सर्वदा ४७ मनसे उन्हींका ध्यान करते हैं ॥ ४६-४७ ॥। हे मुनिश्रेष्ठ! सब शास्त्रोंका यही निश्चय जानना चाहिये कि दृढनिश्चयी विद्वानोंके द्वारा वे आदिशक्ति ही सदा सेवनीय हैं ॥ ४८ ॥

४८ यह गुप्त रहस्य मैंने कृष्णद्वैपायनसे सुना है जिसे उन्होंने नारदजीसे, नारदजीने अपने पिता ब्रह्माजीसे और ब्रह्माजीने भी भगवान् विष्णुके मुखसे ४ ९ | सुना था ॥ ४ ९ ॥। इसलिये विद्वान् पुरुषोंको चाहिये कि वे न तो किसी अन्यकी बात सुनें और न मानें तथा दृढप्रतिज्ञ होकर सर्वदा शक्तिकी ही उपासना करें ॥ ५० ॥

५० शक्तिहीन असमर्थ पुरुषका व्यवहार तो प्रत्यक्ष ही देखा जाता है [ कि वह कुछ कर नहीं पाता ] । इसलिये सर्वव्यापिनी आदिशक्ति जगज्जननी भगवतीको ५१ । ही जाननेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ ५१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे आराध्यनिर्णयवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

अथ नवमोऽध्यायः भगवान् विष्णुका मधु - कैटभसे पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध करना, विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा मोहित मधु - कैटभका विष्णुद्वारा वध सूत उवाच सूतजी बोले - [ हे मुनिजनो! ] जब जगद्गुरु यदा विनिर्गता निद्रा देहात्तस्य जगद्गुरोः । भगवान् विष्णुके शरीरसे निद्रादेवी निकलीं; उस समय नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ १ | उनके नेत्र, मुख, नासिका, भुजा, हृदय तथा वक्ष: स्थलसे

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अ ० ९ ]

निःसृत्य गगने तस्थौ तामसी शक्तिरुत्तमा ।

उदतिष्ठज्जगन्नाथो जृम्भमाणः पुनः पुनः ॥

तदापश्यत् स्थितं तत्र भयत्रस्तं प्रजापतिम् ।

उवाच च महातेजा मेघगम्भीरया गिरा ॥

विष्णुरुवाच

किमागतोऽसि भगवंस्तपस्त्यक्त्वात्र पद्मज ।

कस्माच्चिन्तातुरोऽसि त्वं भयाकुलितमानसः ॥

ब्रह्मोवाच

त्वत्कर्णमलजौ देव दैत्यौ च मधुकैटभौ ।

हन्तुं मां समुपायातौ घोररूपौ महाबलौ ॥

भयात्तयोः समायातस्त्वत्समीपं जगत्पते ।

त्राहि मां वासुदेवाद्य भयत्रस्तं विचेतनम् ॥

विष्णुरुवाच

तिष्ठाद्य निर्भयो जातस्तौ हनिष्याम्यहं किल ।

युद्धायाजग्मतुर्मूढौ मत्समीपं गतायुषौ ॥

सूत उवाच

एवं वदति देवेशे दानवौ तौ महाबलौ ।

विचिन्वानावजं चोभौ संप्राप्तौ मदगर्वितौ ॥

निराधारौ जले तत्र संस्थितौ विगतज्वरौ ।

तावूचतुर्मदोन्मत्तौ ब्रह्माणं मुनिसत्तमाः ॥

पलायित्वा समायातः सन्निधावस्य किं ततः ।

युद्धं कुरु हनिष्यावः पश्यतोऽस्यैव सन्निधौ ॥

पश्चादेनं हनिष्यावः सर्पभोगोपरिस्थितम् ।

त्वमद्य कुरु संग्रामं दासोऽस्मीति च वा वद ॥

सूत उवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुस्तावुवाच जनार्दनः ।

कुरुतं समरं कामं मया दानवपुङ्गवौ ॥

हरिष्यामि मदं चाहं युवयोर्मत्तयोः किल । आगच्छतं महाभागौ श्रद्धा चेद्वां महाबलौ । प्रथम स्कन्ध १११ निकलकर वे श्रेष्ठ तामसी शक्ति आकाशमें स्थित हो २ गयीं, तब भगवान् विष्णु भी बार - बार जम्हाई लेते हुए उठ खड़े हुए ॥ १-२ ॥ तब वहाँ भगवान् विष्णुने भयसे काँपते हुए ३ ब्रह्माको देखा और उन महातेजस्वी विष्णुने मेघ समान गम्भीर वाणीमें कहा ॥३ ॥

विष्णु बोले – हे कमलोद्भव ब्रह्माजी! आप तपस्या छोड़कर यहाँ कैसे आ गये हैं? आप इतने ४ चिन्तित एवं भयभीत क्यों हो रहे हैं? ॥ ४ ॥

ब्रह्माजी बोले- हे देव! आपके कानोंके मैलसे दो महादानव पैदा हो गये हैं, जो महाभयंकर एवं महाबली हैं, जिनका नाम मधु और कैटभ है । उन्हीं ५ दोनोंके भयसे मैं आपके पास आया हूँ । हे जगत्पते! हे वासुदेव! आप मुझ भयभीत तथा किंकर्तव्यविमूढ़की रक्षा कीजिये ॥ ५-६ ॥ ६ विष्णु बोले- ब्रह्मन्! अब आप निर्भय हो जाइये । उनकी मृत्यु निकट है, इसीलिये वे यहाँ युद्ध करनेके लिये आयेंगे और मैं उन दोनों दैत्योंका वध ७ करूँगा ॥७ ॥

सूतजी बोले- इस प्रकार भगवान् विष्णु ब्रह्मासे कह ही रहे थे कि वे दोनों मतवाले महाबली दैत्य ब्रह्माजीको ढूँढ़ते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥८ ॥

८ हे श्रेष्ठ मुनियो! वे दैत्य उस महासागरके जलमें बिना किसी अवलम्बके निश्चिन्त होकर खड़े थे । उन अहंकारी राक्षसोंने ब्रह्माजीसे कहा— ' तुम भागकर इनके पास क्यों आये? अब तुम युद्ध करो । इनके देखते - देखते ही हमलोग तुम्हें मार डालेंगे ' ॥ ९ -१० ॥ १० तत्पश्चात् शेषशय्यापर सोनेवाले इस पुरुषको भी मार डालेंगे । इसलिये तुम हम दोनों भाइयोंसे या तो युद्ध करो अथवा यह कहो कि ' मैं तुम्हारा ११ सेवक हूँ ' ॥ ११ ॥

सूतजी बोले – उन दैत्योंका वचन सुनकर भगवान् विष्णुने कहा— अरे दानवेन्द्रो! तुम दोनों मेरे १२ साथ यथेच्छ युद्ध करो । मैं तुम दोनों दैत्योंका घमण्ड चूर - चूर कर डालूँगा । हे महाभागो! तुम दोनोंकी लड़ने की इच्छा है और अपनेको महायोद्धा समझ रहे १३ हो तो आ जाओ ॥ १२-१३ ॥