देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 121–130
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130
पृष्ठ 121
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ सूत उवाच
श्रुत्वा तद्वचनं चोभौ क्रोधव्याकुललोचनौ ।
निराधारौ जलस्थौ च युद्धोद्युक्तौ बभूवतुः ॥
मधुश्च कुपितस्तत्र हरिणा सह संयुगम् ।
कर्तुं प्रचलितस्तूर्णं कैटभस्तु तथा स्थितः ॥
बाहुयुद्धं तयोरासीन्मल्लयोरिव मत्तयोः ।
श्रान्ते मधौ कैटभस्तु संग्राममकरोत्तदा ॥
पुनर्मधुः कैटभश्च युयुधाते पुनः पुनः ।
बाहुयुद्धेन रागान्धौ विष्णुना प्रभविष्णुना ॥
प्रेक्षकस्तु तदा ब्रह्मा देवी चैवान्तरिक्षगा ।
न मम्लतुस्तदा तौ तु विष्णुस्तु ग्लानिमाप्तवान् ॥
पञ्चवर्षसहस्राणि यदा जातानि युद्ध्यता ।
हरिणा चिन्तितं तत्र कारणं मरणे तयोः ॥
पञ्चवर्षसहस्त्राणि मया युद्धं कृतं किल ।
न श्रान्तौ दानवौ घोरौ श्रान्तोऽहं चैतदद्भुतम् ॥
क्व गतं मे बलं शौर्यं कस्माच्चेमावनामयौ ।
किमत्र कारणं चिन्त्यं विचार्य मनसा त्विह ॥
इति चिन्तापरं दृष्ट्वा हरिं हर्षपरावुभौ ।
ऊचतुस्तौ मदोन्मत्तौ मेघगम्भीरनिःस्वनौ ॥
तव नोचेद् बलं विष्णो यदि श्रान्तोऽसि युद्धतः ।
ब्रूहि दासोऽस्मि वां नूनं कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम् ॥
न चेद्युद्धं कुरुष्वाद्य समर्थोऽसि महामते ।
हत्वा त्वां निहनिष्यावः पुरुषं च चतुर्मुखम् ॥
सूत उवाच
श्रुत्वा तद्भाषितं विष्णुस्तयोस्तस्मिन्महोदधौ ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं सामपूर्वं महामनाः ॥
सूतजी बोले- भगवान्का यह वचन सुनते ही उन दैत्योंके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और जलमें १४ खड़े निराधार वे दोनों भयंकर दानव युद्ध करनेको तैयार हो गये ॥ १४ ॥
इनमें मधुदैत्य कुपित होकर विष्णुसे युद्ध करनेके १५ लिये शीघ्र ही चल पड़ा और कैटभ वहीं खड़ा रहा ॥ १५ ॥
दो मतवाले वीरोंके समान मधु और विष्णुमें बाहुयुद्ध होने लगा । जब मधु थक गया तब कैटभ १६ उनसे लड़ने लगा ॥ १६ ॥
इस प्रकार क्रमशः कुपित एवं मदान्ध दोनों दैत्य परम प्रतापी भगवान् विष्णुके साथ बारी - बारीसे १७ बाहुयुद्ध करते रहे ॥ १७ ॥
उस समय वहाँ उस युद्धके द्रष्टा ब्रह्मा और आकाशमें स्थित आदिशक्ति देवी थीं । बहुत दिनों क १८ युद्ध करते करते भी वे दैत्य नहीं थके तब भगवान् विष्णुको ग्लानि होने लगी । इस प्रकार जब युद्ध करते हुए पाँच हजार वर्ष बीत गये तब भगवान् विष्णु उन १ ९ दैत्योंकी मृत्युका उपाय सोचने लगे ॥ १८-१९ ॥ उनके विचारमें आया कि मैंने पाँच हजार वर्षतक इनके साथ युद्ध किया, किंतु ये भयानक २० दानव थके नहीं और मैं थक गया; यह बड़े आश्चर्यकी बात है ॥ २० ॥
मेरा वह पराक्रम और बल कहाँ चला गया? २१ ये दोनों मुझसे लड़ते हुए भी स्वस्थ हैं । इसका कारण क्या है? अब मुझे अच्छी तरह विचार करना चाहिये ॥ २१ ॥
२२ इस प्रकार चिन्तामें पड़े हुए विष्णुको देखकर ये दोनों मतवाले दैत्य अत्यन्त हर्षित हुए और मेघ समान गम्भीर वाणीमें बोले- हे विष्णो! यदि तुझमें अब २३ बल न हो अथवा युद्धसे थक गये हो तो सिरपर हाथ जोड़कर कह दो कि मैं तुम दोनोंका सेवक हूँ अथवा यदि सामर्थ्य हो तो हे महामते! आओ, हमारे साथ २४ युद्ध करो । आज हमलोग तुम्हें मारकर इस चार मुखवाले पुरुष ( ब्रह्मा ) - को भी मार डालेंगे ॥ २२ - २४ ॥ सूतजी बोले- उस महासागरमें उपस्थित महामना विष्णुने उनके वचन सुनकर सामनीतिके अनुसार मधुर २५ । शब्दोंमें कहा – ॥ २५ ॥
पृष्ठ 122
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ९ ] प्रथम स्कन्ध ११३ हरिरुवाच
श्रान्ते भीते त्यक्तशस्त्रे पतिते बालके तथा ।
प्रहरन्ति न वीरास्ते धर्म एष सनातनः ॥
पञ्चवर्षसहस्त्राणि कृतं युद्धं मया त्विह ।
एकोऽहं भ्रातरौ वां च बलिनौ सदृशौ तथा ॥
कृतं विश्रमणं मध्ये युवाभ्यां च पुनः पुनः ।
तथा विश्रमणं कृत्वा युध्येऽहं नात्र संशयः ॥
तिष्ठतं हि युवां तावद् बलवन्तौ मदोत्कटौ ।
विश्रम्याहं करिष्यामि युद्धं वा न्यायमार्गतः ॥
सूत उवाच
इति श्रुत्वा वचस्तस्य विश्रब्धौ दानवोत्तमौ ।
संस्थितौ दूरतस्तत्र संग्रामे कृतनिश्चयौ ॥
अतिदूरे च तौ दृष्ट्वा वासुदेवश्चतुर्भुजः ।
दध्यौ च मनसा तत्र कारणं मरणे तयोः ॥
चिन्तनाज्ज्ञानमुत्पन्नं देवीदत्तवरावुभौ ।
कामं वाञ्छितमरणौ न मम्लतुरतस्त्विमौ ॥
वृथा मया कृतं युद्धं श्रमोऽयं मे वृथा गतः ।
करोमि च कथं युद्धमेवं ज्ञात्वा विनिश्चयम् ॥
अकृते च तथा युद्धे कथमेतौ गमिष्यतः ।
विनाशं दुःखदौ नित्यं दानवौ वरदर्पितौ ॥
भगवत्या वरो दत्तस्तया सोऽपि च दुर्घटः ।
मरणं चेच्छया कामं दुःखितोऽपि न वाञ्छति ॥
रोगग्रस्तोऽपि दीनोऽपि न मुमूर्षति कश्चन ।
कथं चेमौ मदोन्मत्तौ मर्तुकामौ भविष्यतः ॥
नन्वद्य शरणं यामि विद्यां शक्तिं सुकामदाम् ।
विना तया न सिध्यन्ति कामाः सम्यक्प्रसन्नया ॥
एवं सञ्चिन्त्यमानस्तु गगने संस्थितां शिवाम् ।
अपश्यद्भगवान्विष्णुर्योगनिद्रां मनोहराम् ॥
विष्णु बोले- यह सनातनधर्म है कि थके हुए, डरे हुए, शस्त्र त्यागे हुए, गिरे हुए एवं बालकपर वीर २६ लोग प्रहार नहीं करते ॥ २६ ॥
मैंने तो यहाँ पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध किया । मैं अकेला हूँ और तुम दोनों भाई समान बलवाले वीर हो २७ और दोनों बीच - बीचमें बारी - बारीसे विश्राम भी करते रहे हो । अब मुझे भी थोड़ा विश्राम कर लेने दो । तत्पश्चात् मैं पुन: लडूंगा, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २७-२८ ॥ २८ बली एवं मदोन्मत्त तुम दोनों भी कुछ विश्राम कर लो, तब मैं विश्राम करके न्यायधर्मानुसार युद्ध
२ ९ करूँगा ॥ । २ ९ ॥
सूतजी बोले- भगवान् विष्णुकी बात सुनकर दोनों दानव भी युद्ध करनेकी इच्छासे कुछ दूर जाकर विश्राम करने लगे । उन्हें बहुत दूर बैठे देखकर ३० चतुर्भुज भगवान् विष्णु उनके मरनेका उपाय सोचने लगे ॥ ३०-३१ ॥ ध्यानकी अवस्थामें होकर विचार करनेपर उन्हें ३१ ज्ञात हो गया कि इन दोनोंको देवीके द्वारा इच्छामृत्युका वरदान प्राप्त है, इसी कारण ये थकते नहीं ॥३२ ॥
वे सोचने लगे कि मैंने व्यर्थ ही युद्ध किया, मेरा ३२ सब परिश्रम व्यर्थ गया । इस ( वरदानकी ) बातको जानकर भी अब मैं कैसे युद्ध करूँ? ॥ ३३ ॥
यदि युद्ध न भी करूँ तो भी ये दैत्य यहाँसे हटेंगे ३३ कैसे? यदि इनका विनाश न होगा तो वरप्राप्त दोनों दुर्धर्ष दैत्य सबको दुःख देते रहेंगे ॥३४ ॥
३४ देवीने जो वरदान इन्हें दिया है, वह भी अत्यन्त कठिन है । अत्यन्त दुःखी, रोगी और दीन - हीन प्राणी भी स्वेच्छया कभी नहीं मरना चाहता, तब भला वे ३५ दोनों मदोन्मत्त दैत्य क्यों मरना चाहेंगे? ॥ ३५-३६ ॥ अतएव अब मैं सब चिन्ता छोड़कर उन आदिशक्ति भगवती विद्यादेवीकी शरणमें जाऊँ, जो ३६ सबकी मनोकामनाएँ सिद्ध करनेवाली हैं; क्योंकि बिना उनके प्रसन्न हुए कोई कामनाएँ पूर्ण नहीं ३७ होतीं ॥ ३७ ॥
ऐसा मनमें विचार करते ही भगवान् विष्णुने आकाशमें स्थित परम सुन्दर स्वरूपवाली योगनिद्रा ३८ । भगवती ' शिवा ' को देखा । उन्हें देखते ही योगेश्वर
पृष्ठ 123
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११४ कृताञ्जलिरमेयात्मा तां च तुष्टाव योगवित् विनाशार्थं तयोस्तत्र वरदां भुवनेश्वरीम् ॥ विष्णुरुवाच नमो देवि महामाये सृष्टिसंहारकारिणि अनादिनिधने चण्डि भुक्तिमुक्तिप्रदे शिवे न ते रूपं विजानामि सगुणं निर्गुणं तथा चरित्राणि कुतो देवि संख्यातीतानि यानि ते अनुभूतो मया तेऽद्य प्रभावश्चातिदुर्घटः यदहं निद्रया लीनः सञ्जातोऽस्मि विचेतनः ब्रह्मणा चातियत्नेन बोधितोऽपि पुनः पुनः न प्रबुद्धः सर्वथाहं सङ्कोचितषडिन्द्रियः अचेतनत्वं सम्प्राप्तः प्रभावात्तव चाम्बिके । त्वया मुक्तः प्रबुद्धोऽहं युद्धं च बहुधा कृतम् श्रान्तोऽहं न च तौ श्रान्तौ त्वया दत्तवरौ वरौ ब्रह्माणं हन्तुमायातौ दानवौ मदगर्वितौ आहूतौ च मया कामं द्वन्द्वयुद्धाय मानदे कृतं युद्धं महाघोरं मया ताभ्यां महार्णवे मरणे वरदानं ते ततो ज्ञातं महाद्भुतम् । ज्ञात्वाहं शरणं प्राप्तस्त्वामद्य शरणप्रदाम् साहाय्यं कुरु मे मात: खिन्नोऽहं युद्धकर्मणा दृप्तौ तौ वरदानेन तव देवार्तिनाशने हन्तुं मामुद्यतौ पापौ किं करोमि क्व यामि च श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ । अनन्त भगवान् विष्णु उन दोनों दैत्योंके विनाशके ३ ९ लिये हाथ जोड़कर वरप्रदायिनी भगवती ‘ भुवनेश्वरी ’ की स्तुति करने लगे ॥ ३८-३९ ॥ विष्णु बोले - हे देवि! हे महामाये! हे सृष्टि-। संहारकारिणि! हे आदि - अन्तरहित! हे चण्डि! हे भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी शिवे! आपको नमस्कार है ॥ ४० ॥
॥ ४० हे देवि! मैं आपके सगुण तथा निर्गुण रूपको । नहीं जानता, फिर आपके जो असंख्य अद्भुत चरित्र हैं, उन्हें कैसे जान पाऊँगा? मैंने आपके अत्यन्त ॥ ४१ दुर्घट प्रभावको आज जाना है जबकि मैं आपके द्वारा प्रेरित योगनिद्रामें विलीन होकर अचेत हो गया
।
था ॥
॥ ४२
किंतु । जाग ॥ ४३ ४१-४२ ॥ ब्रह्माने मुझे बड़े यत्नसे बार - बार जगाया था, मैं अपनी छहों इन्द्रियोंके संकुचित होनेके कारण न सका ॥ ४३ ॥
हे अम्बिके! उस समय मैं आपके प्रभावसे अचेत हो गया था । जब आपने अपना वह प्रभाव हटा लिया तब मैं जगा और मैंने उन दानवोंके साथ ॥ ४४ अनेक प्रकारसे युद्ध किया । उस युद्धमें मैं तो थक गया, किंतु वे नहीं थके; क्योंकि उन्हें आपका वरदान । प्राप्त था । जब वे मदोन्मत्त दानव ब्रह्माजीको मारने ॥ ४५ दौड़े, तब मैंने भी पुनः द्वन्द्व युद्धके लिये उनका आह्वान किया । हे मानप्रदायिनि! उस समय मैंने उनके । साथ महासागरमें घोर युद्ध किया ॥ ४४ - ४६ ॥ ॥ ४६ बादमें मुझे ज्ञात हुआ कि आपने उन्हें इच्छामरणका अद्भुत वरदान दिया है । यह जानकर आज मैं शरणदायिनी आपकी शरणमें आया ॥ ४७ ॥
॥ ४७ अतएव हे माता! अब मेरी सहायता आप ही करें; क्योंकि मैं युद्ध करते - करते बहुत ही खिन्न हो । गया हूँ । हे देवताओंकी पीड़ा हरनेवाली! आपके ॥ ४८ वरदानसे दोनों दानव मदोन्मत्त हो गये हैं ॥ ४८ ॥
वे दोनों पापी दैत्य मुझे मार डालना चाहते । हैं । अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? प्रणाम करते इत्युक्ता सा तदा देवी स्मितपूर्वमुवाच ह ॥ ४ ९ हुए उन जगन्नाथ सनातन वासुदेव विष्णुके ऐसा कहनेपर मुसकराती हुई उन देवीने उनसे कहा-प्रणमन्तं जगन्नाथं वासुदेवं सनातनम् । हे देवदेव! हे हरे! हे विष्णो! आप पुनः उनसे युद्ध
देवदेव हरे विष्णो कुरु युद्धं पुनः स्वयम् ॥ ५० । कीजिये ॥ ४ ९ -५० ॥
पृष्ठ 124
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ९ ] वञ्चयित्वा त्वमौ शूरौ हन्तव्यौ च विमोहितौ मोहयिष्याम्यहं नूनं दानवौ वक्रया दृशा जहि नारायणाशु त्वं मम मायाविमोहितौ सूत उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुस्तस्याः प्रीतिरसान्वितम् ॥ संग्रामस्थलमासाद्य तस्थौ तत्र महार्णवे तदायातौ च तौ वीरौ युद्धकामौ महाबलौ वीक्ष्य विष्णुं स्थितं तत्र हर्षयुक्तौ बभूवतुः तिष्ठ तिष्ठ महाकाम कुरु युद्धं चतुर्भुज दैवाधीनौ विदित्वाद्य नूनं जयपराजयौ सबलो जयमाप्नोति दैवाज्जयति दुर्बलः सर्वथैव न कर्तव्यौ हर्षशोकौ महात्मना पुरा वै बहवो दैत्या जिता दानववैरिणा ॥ अधुना चावयोः सार्धं युध्यमानः पराजितः सूत उवाच इत्युक्त्वा तौ महाबाहू युद्धाय समुपस्थितौ वीक्ष्य विष्णुर्जघानाशु मुष्टिनाद्भुतकर्मणा तावप्यतिबलोन्मत्तौ जघ्नतुर्मुष्टिना हरिम् एवं परस्परं जातं युद्धं परमदारुणम् युध्यमानौ महावीर्यौ दृष्ट्वा नारायणस्तदा ॥ अपश्यत्सम्मुखं देव्याः कृत्वा दीनां दृशं हरिः सूत उवाच तं वीक्ष्य तादृशं विष्णुं करुणारससंयुतम् ॥ जहासातीव ताम्राक्षी वीक्षमाणा तदासुरौ तौ जघान कटाक्षैश्च कामबाणैरिवापरैः मन्दस्मितयुतैः कामं प्रेमभावयुतैरनु दृष्ट्वा मुमुहतुः पापौ देव्या वक्रविलोकनम् प्रथम स्कन्ध ११५ । इन दोनों वीरोंको छलपूर्वक मोहित करके ही ॥ ५१ मारा जा सकता है । मैं अपनी वक्रदृष्टिसे उन्हें मोहित कर दूँगी । हे नारायण! अपनी मायासे जब मैं इन्हें । मोहित कर दूँगी तब आप शीघ्र ही इन दोनोंका वध कर डालियेगा ॥ ५१ ॥ ५२ सूतजी बोले- देवीके प्रीतिरससे पूर्ण वचनोंको सुनकर भगवान् विष्णु उस सागरमें युद्धस्थलमें आकर । खड़े हो गये । तब विष्णुको आते देख वे दोनों युद्धके ॥ ५३ अभिलाषी महाबली दैत्य भी वहाँ आ डटे ॥ ५२-५३ ॥ भगवान् विष्णुको अपने सामने देखकर वे बड़े । प्रसन्न हुए और कहने लगे - हे महाकाम! हे चतुर्भुज! ॥ ५४ ठहरो - ठहरो; हार और जीतको प्रारब्धके अधीन समझकर अब तुम हमारे साथ युद्ध करो । बलवान् । व्यक्ति विजय प्राप्त करता है, किंतु कभी - कभी ॥ ५५ भाग्यवश दुर्बल व्यक्ति भी जीत जाता है ॥ ५४-५५ ॥ आप जैसे महापुरुषको जय या पराजयमें हर्ष । या शोक कभी नहीं करना चाहिये । आपने दानवशत्रु ५६ होकर पूर्वकालमें बहुत - से दैत्योंको अनेक बार हराया । है, परंतु इस समय तो हम दोनोंके साथ लड़ते हुए आप पराजित हो गये हैं ॥ ५६३ ॥
सूतजी बोले- ऐसा कहकर वे दोनों महाबाहु ॥ ५७ दैत्य युद्ध करनेको तत्पर हो गये । तब वहाँ अवसर । देखकर ज्यों ही विचित्रकर्मा विष्णुने उन दोनोंपर ॥ ५८ मुष्टिसे प्रहार किया, त्यों ही उन दोनों बलोन्मत्त दैत्योंने भी विष्णुपर मुष्टिप्रहार किया ॥ ५७-५८ ॥ । इस प्रकार उनमें परस्पर महाभयंकर युद्ध ५ ९ होने लगा । उन दोनों महाबलशाली दानवोंको युद्धरत देखकर नारायण श्रीहरिने दीन दृष्टिसे भगवतीकी । ओर देखा ॥५ ९ ३ ॥ सूतजी बोले – विष्णुकी ऐसी करुणाजनक ६० दीन दशा देखकर अरुण नेत्रोंवाली भगवती उन दोनों दैत्योंकी ओर देखकर हँसने लगीं और उन्होंने । दूसरे कामबाणोंके समान, मन्द मुसकानयुक्त तथा ॥ ६१ प्रेमभावसे भरे अपने कटाक्षोंसे उनपर प्रहार किया । इस प्रकार देवीके कटाक्षको देखकर वे पापी मधु-। कैटभ अत्यन्त मोहित हो गये । वे कामान्ध दानव ॥ ६२ । अपने ऊपर भगवतीकी विशेष अनुकम्पा जानकर
पृष्ठ 125
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९
विशेषमिति मन्वानौ कामबाणातिपीडितौ ।
वीक्षमाणौ स्थितौ तत्र तां देवीं विशदप्रभाम् ॥
हरिणापि च तद् दृष्टं देव्यास्तत्र चिकीर्षितम् ।
मोहितौ तौ परिज्ञाय भगवान्कार्यवित्तमः ॥
उवाच तौ हसन् श्लक्ष्णं मेघगम्भीरया गिरा ।
वरं वरयतां वीरौ युवयोर्योऽभिवाञ्छितः ॥
ददामि परमप्रीतो युद्धेन युवयोः किल ।
दानवा बहवो दृष्टा युध्यमाना मया पुरा ॥
युवयोः सदृशः कोऽपि न दृष्टो न च वै श्रुतः ।
तस्मात्तुष्टोऽस्मि कामं वै निस्तुलेन बलेन च ॥
भ्रात्रोश्च वाञ्छितं कामं प्रयच्छामि महाबलौ । सूत उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोः साभिमानौ स्मरातुरौ ॥
वीक्षमाणा महामायां जगदानन्दकारिणीम् ।
तमूचतुश्च कामार्तौ विष्णुं कमललोचनौ ॥
हरे न याचकावावां त्वं किं दातुमिहेच्छसि ।
ददाव तुल्यं देवेश दातारौ नौ न याचकौ ॥
प्रार्थय त्वं हृषीकेश मनोऽभिलषितं वरम् ।
तुष्टौ स्वस्तव युद्धेन वासुदेवाद्भुतेन च ॥
तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच जनार्दनः ।
भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि ॥
सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोर्दानवौ चातिविस्मितौ ।
वञ्चिताविति मन्वानौ तस्थतुः शोकसंयुतौ ॥
विचार्य मनसा तौ तु दानवौ विष्णुमूचतुः ।
प्रेक्ष्य सर्वं जलमयं भूमिं स्थलविवर्जिताम् ॥
कामबाणसे अत्यन्त पीड़ित होने लगे और अपूर्व ६३ शोभाशालिनी भगवतीको देखते हुए वे वहीं खड़े हो गये ॥ ६०–६३ ॥ भगवान् विष्णु भी देवीके उस प्रयत्नको समझ ६४ गये । दोनों कामी दानवोंको देवीकी मायासे विमोहित जानकर स्वकार्यसाधक भगवान् विष्णुने वहाँ मेघके समान गम्भीर एवं मधुर वचनोंके द्वारा उन दोनोंका ६५ उपहास करते हुए कहा - हे वीरो! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँगो ॥ ६४-६५ ॥ तुम दोनोंके युद्धसे मैं अत्यन्त हर्षित हूँ, अतः ६६ मैं तुम्हें मनोभिलषित वर दूँगा । यद्यपि पूर्वकालमें भी मेरेद्वारा अनेक दानव युद्ध करते हुए देखे गये हैं, किंतु तुम दोनों भाइयोंके समान मैंने किसीको देखा - सुना ६७ नहीं । तुम दोनोंके अतुलनीय बलको देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ । हे महाबली दानवो! मैं तुम दोनों भाइयोंकी वांछित कामनाएँ पूर्ण करूँगा ॥ ६६-६७३ ॥ सूतजी बोले – विष्णुका यह वचन सुनकर ६८ कमलके समान नेत्रवाले कामपीड़ित वे दोनों दैत्य जगदानन्ददायिनी भगवती महामायाको देखते हुए विष्णुसे अभिमानपूर्वक बोले ॥ ६८-६९ ॥ ६ ९ हे विष्णो! हमलोग याचक नहीं हैं, अतः आप हमलोगों को देना क्यों चाहते हैं? हे देवेश! यदि आप लेना चाहें तो आप जो माँगिये हम दे सकते हैं; ७० क्योंकि हमलोग भिक्षुक नहीं हैं, दाता हैं । हे हृषीकेश! आप अपना मनोभिलषित वरदान माँगिये । हे वासुदेव! आपके अद्भुत युद्धसे हमलोग आपपर ७१ अत्यन्त प्रसन्न हैं ॥ ७०-७१ ॥ उन दोनोंका वचन सुनकर भगवान् विष्णुने उत्तर दिया- ' यदि तुम दोनों मेरे ऊपर प्रसन्न हो तो यही ७२ वरदान दो कि तुम दोनों भाई अब मेरे ही हाथों मारे जाओ ' ॥७२ ॥
सूतजी बोले- विष्णुका वचन सुनकर दोनों भाई चकित हो गये और अपनेको उनके द्वारा ठगा ७३ हुआ समझकर शोकसे चिन्तित हो गये ॥ ७३ ॥
कुछ देरके बाद मनमें विचारकर सम्पूर्ण भूमिको स्थलरहित तथा वहाँ सर्वत्र जल ही - जल देखकर ७४ उन्होंने विष्णुसे कहा- हे जनार्दन विष्णो! आपने
पृष्ठ 126
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ९ ]
हरे योऽयं वरो दत्तस्त्वया पूर्वं जनार्दन ।
सत्यवागसि देवेश देहि तं वाञ्छितं वरम् ॥
निर्जले विपुले देशे हनस्व मधुसूदन ।
वध्यावावां तु भवतः सत्यवाग्भव माधव ॥
स्मृत्वा चक्रं तदा विष्णुस्तावुवाच हसन्हरिः ।
हन्म्यद्य वां महाभागौ निर्जले विपुले स्थले ॥
इत्युक्त्वा देवदेवेश ऊरू कृत्वातिविस्तरौ ।
दर्शयामास तौ तत्र निर्जलं च जलोपरि ॥
नास्त्यत्र दानवौ वारि शिरसी मुञ्चतामिह ।
सत्यवागहमद्यैव भविष्यामि च वां तथा ॥
तदाकर्ण्य वचस्तथ्यं विचिन्त्य मनसा च तौ ।
वर्धयामासतुर्देहं योजनानां सहस्त्रकम् ॥
भगवान्द्विगुणं चक्रे जघनं विस्मितौ तदा ।
शीर्षे सन्दधतां तत्र जघने परमाद्भुते ॥
रथांगेन तदा छिन्ने विष्णुना प्रभविष्णुना ।
जघनोपरि वेगेन प्रकृष्टे शिरसी तयोः ॥
गतप्राणौ तदा जातौ दानवौ मधुकैटभौ ।
सागरः सकलो व्याप्तस्तदा वै मेदसा तयोः ॥
मेदिनीति ततो जातं नाम पृथ्व्याः समन्ततः ।
अभक्ष्या मृत्तिका तेन कारणेन मुनीश्वराः ॥
इति वः कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽस्मि सुनिश्चितम् ।
महाविद्या महामाया सेवनीया सदा बुधैः ॥
प्रथम स्कन्ध ११७ हम लोगोंको पहले जो वरदान देने को कहा था, यदि ७५ आप सत्यवादी हैं तो पहले उस वांछित वरको प्रदान कीजिये ॥ ७४-७५ ॥ हे मधुसूदन! आप हमें किसी निर्जल प्रदेशकी सुविस्तृत भूमिपर मारिये तभी हम आपसे मारे जा ७६ सकेंगे, अन्यथा नहीं । अतः हे माधव अब आप सत्यवादी बनिये ॥ ७६ ॥
तब भगवान् विष्णुने अपने सुदर्शन चक्रका ७७ स्मरण करके उन दानवोंसे हँसते हुए कहा - ' ' हे महाभागो! [ तुम्हारे कथनानुसार ] निर्जल तथा सुविस्तृत भूमिपर ही मैं आज तुम दोनोंको मारूँगा ' ॥ ७७ ॥
ऐसा कहकर देवताओंके आराध्य भगवान् ७८ विष्णुने अपनी दोनों जाँघोंको सुविस्तृत करके जलके ऊपर ही स्थल दिखा दिया और उनसे कहा — ‘ दैत्यो! [ देखो, ] यहाँ जल नहीं है, पृथ्वी है । ७ ९ अतः यहींपर तुम दोनों अपना सिर रखो । ऐसा करनेसे ही आज हम और तुम दोनों सत्यवादी सिद्ध होंगे ' ॥ ७८-७९ ॥ उस समय विष्णुका तथ्यपूर्ण वचन सुनकर तथा ८० अपने मनमें विचार करके उन दोनों दैत्योंने अपना शरीर बढ़ाकर हजारों योजन लम्बा - चौड़ा कर लिया ॥ ८० ॥
तब भगवान् विष्णुने भी अपनी दोनों जाँघोंको ८१ बढ़ाकर उससे भी द्विगुणित कर दिया । यह देखकर वे दोनों दैत्य बड़े विस्मयमें पड़ गये, [ परंतु अपनी बात सत्य प्रमाणित करनेके लिये ] उन्होंने अपने-अपने मस्तक उस अत्यन्त अद्भुत जंघेपर रख दिये । ८२ उसी समय प्रतापी भगवान् विष्णुने अपने सुदर्शन चक्रसे जंघेपर स्थित उनके विशाल सिरोंको वेगपूर्वक धड़ से अलग कर दिया ॥ ८१-८२ ॥ ८३ जब दोनों दैत्य मधु और कैटभ मर गये, तब उन्हींकी मेद ( चर्बी ) - से सम्पूर्ण सागर पट गया । हे मुनीश्वरो! तभी से पृथ्वीका नाम ' मेदिनी ' पड़ गया और इसीलिये मृत्तिका भी अभक्ष्य मानी जाने ८४ लगी ॥ ८३-८४ ॥ आपलोगोंने जो प्रश्न किया था, उसका ठीक-ठीक उत्तर मैंने दे दिया । बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये ८५ कि वे महामाया महाविद्याकी सर्वदा उपासना करते
पृष्ठ 127
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
११८ आराध्या परमा शक्तिः सर्वैरपि सुरासुरैः नातः परतरं किञ्चिदधिकं भुवनत्रये सत्यं सत्यं पुनः सत्यं वेदशास्त्रार्थनिर्णयः पूजनीया परा शक्तिर्निर्गुणा सगुणाथवा श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० । रहें; क्योंकि वे पराशक्ति ही समस्त देव - दानवोंद्वारा ॥ ८६ आराध्य हैं । उनसे बढ़कर कोई दूसरा देवता तीनों लोकोंमें नहीं है ॥ ८५-८६ ॥ यह बात सर्वदा सत्य है एवं वेदों तथा शास्त्रोंका निष्कर्ष है कि सगुण अथवा निर्गुणरूपमें । सर्वदा उस पराशक्तिका ही पूजन करते रहना ॥ ८७ | चाहिये ॥ ८७ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे हरिकृतमधुकैटभवधवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः व्यासजीकी ऋषय ऊचुः
सूत पूर्वं त्वया प्रोक्तं व्यासेनामिततेजसा ।
कृत्वा पुराणमखिलं शुकायाध्यापितं शुभम् ॥
व्यासेन तु तपस्तप्त्वा कथमुत्पादितः शुकः ।
विस्तरं ब्रूहि सकलं यच्छुतं कृष्णतस्त्वया ॥
सूत उवाच
प्रवक्ष्यामि शुकोत्पत्तिं व्यासात्सत्यवतीसुतात् ।
यथोत्पन्नः शुकः साक्षाद्योगिनां प्रवरो मुनिः ॥
मेरुशृङ्गे महारम्ये व्यासः सत्यवतीसुतः ।
तपश्चचार सोऽत्युग्रं पुत्रार्थं कृतनिश्चयः ॥
जपन्नेकाक्षरं मन्त्रं वाग्बीजं नारदाच्छ्रुतम् ।
ध्यायन्परां महामायां पुत्रकामस्तपोनिधिः ॥
अग्नेर्भूमेस्तथा वायोरन्तरिक्षस्य चाप्ययम् ।
वीर्येण सम्मितः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह ॥
अतिष्ठत्स गताहारः शतसंवत्सरं प्रभुः ।
आराधयन्महादेवं तथैव च सदाशिवाम् ॥
तपस्या और वर - प्राप्ति ऋषिगण बोले – हे सूतजी! आपने हमें पहले ही बतला दिया है कि असीम तेजवाले व्यासजीने १ कल्याणकारी समस्त पुराणोंकी रचना करके उन्हें शुकदेवजीको पढ़ाया ॥ १ ॥
व्यासजीने घोर तप करके शुकदेवजीको किस प्रकार पुत्ररूपमें प्राप्त किया? व्यासजीके मुखसे २ आपने जो कुछ सुना है, वह सब हमसे विस्तारपूर्वक कहिये ॥ २ ॥
सूतजी बोले- सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे जिस प्रकार योगिजनोंमें श्रेष्ठ साक्षात् मुनिस्वरूप शुकदेवजी ३ उत्पन्न हुए, उत्पत्तिके उस इतिहासको मैं आपलोगोंको बता रहा हूँ ॥३ ॥
सत्यवतीके पुत्र महर्षि व्यास पुत्र - प्राप्तिके लिये ४ दृढ संकल्पकर अत्यन्त मनोहर सुमेरुपर्वतके शिखरपर कठोर तपस्या करने लगे ॥ ४ ॥
नारदजीसे सुने गये एकाक्षर वाग्बीज मन्त्रका जप करते हुए तपोनिधि व्यासजी पुत्र - प्राप्तिकी ५ कामनासे परात्परा महामायामें अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए मन - ही - मन सोच रहे थे कि अग्नि, भूमि, वायु एवं आकाश – इनकी शक्तिसे सम्पन्न पुत्रकी ६ मुझे प्राप्ति हो ॥ ५ - ६ ॥ इस प्रकार प्रभुतासम्पन्न वे व्यासजी निराहार रहते हुए. सौ वर्षोंतक शंकर एवं सदाशिवा भगवतीकी ७ आराधनामें लीन रहे ॥७ ॥
पृष्ठ 128
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १० ]
शक्तिः सर्वत्र पूज्येति विचार्य च पुनः पुनः ।
अशक्तो निन्द्यते लोके शक्तस्तु परिपूज्यते ॥
यत्र पर्वत शृङ्गे वै कर्णिकारवनाद्भुते ।
क्रीडन्ति देवताः सर्वे मुनयश्च तपोऽधिकाः ॥
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनौ तथा ।
वसन्ति मुनयो यत्र ये चान्ये ब्रह्मवित्तमाः ॥
तत्र हेमगिरेः शृङ्गे संगीतध्वनिनादिते ।
तपश्चचार धर्मात्मा व्यासः सत्यवतीसुतः ॥
ततोऽस्य तेजसा व्याप्तं विश्वं सर्वं चराचरम् ।
अग्निवर्णा जटा जाता पाराशर्यस्य धीमतः ॥
ततोऽस्य तेज आलक्ष्य भयमाप शचीपतिः ।
तुरासाहं तदा दृष्ट्वा भयत्रस्तं श्रमातुरम् ॥
उवाच भगवान् रुद्रो मघवन्तं तथास्थितम् । शङ्कर उवाच कथमिन्द्राद्य भीतोऽसि किं दुःखं ते सुरेश्वर ॥
अमर्षो नैव कर्तव्यस्तापसेषु कदाचन ।
तपश्चरन्ति मुनयो ज्ञात्वा मां शक्तिसंयुतम् ॥
न त्वेतेऽहितमिच्छन्ति तापसाः सर्वथैव हि ।
इत्युक्तवचनः शक्रस्तमुवाच वृषध्वजम् ॥
कस्मात्तपस्यति व्यासः कोऽर्थस्तस्य मनोगतः । शिव उवाच पाराशर्यस्तु पुत्रार्थी तपश्चरति दुश्चरम् ॥ पूर्णवर्षशतं जातं ददाम्यद्य सुतं शुभम् । सूत उवाच इत्युक्त्वा वासवं रुद्रो दयया मुदिताननः ॥
गत्वा ऋषिसमीपं तु तमुवाच जगद्गुरुः ।
उत्तिष्ठ वासवीपुत्र पुत्रस्ते भविता शुभः ॥
सर्वतेजोमयो ज्ञानी कीर्तिकर्ता तवानघ ।
अखिलस्य जनस्यात्र वल्लभस्ते सुतः सदा ॥
भविष्यति गुणैः पूर्णः सात्त्विकैः सत्यविक्रमः । प्रथम स्कन्ध ११ ९ अनेकशः विचार करते हुए महर्षि व्यास इस ८ निष्कर्षपर पहुँचे कि शक्ति ही सर्वत्र पूजनीया है । निर्बल प्राणी लोकमें निन्दाका पात्र होता है और शक्तिशालीकी पूजा की जाती है ॥ ८ ॥
९ जहाँ पर्वत - शिखरपर कर्णिकार पुष्पके अद्भुत वनमें देवता एवं महातपस्वी मुनिवृन्द विहार करते हैं; १० जहाँ सूर्य, वसु, रुद्र, पवन, अश्विनीकुमारद्वय एवं ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अन्य मुनिजन निवास करते हैं; मधुर संगीतकी ध्वनिसे मुखरित उसी सुमेरुपर्वतकी ११ चोटीपर सत्यवतीनन्दन धर्मात्मा व्यासजीने तपस्या की॥९ –११ ॥ १२ उनके इस तपश्चरणके प्रभावसे समग्र चराचर जगत् व्याप्त हो गया और महामेधासम्पन्न पराशरपुत्र व्यासजीकी जटा अग्निवर्ण हो गयी ॥ १२ ॥
१३ तदनन्तर व्यासजीका यह तेज देखकर इन्द्र भयभीत हो गये । तब इन्द्रको भयाक्रान्त तथा व्याकुल देखकर भगवान् शंकरजी उनसे कहने लगे - ॥ १३३ ॥
१४ शंकरजी बोले- हे सुरेश्वर! आपको क्या दुःख है? हे इन्द्र! आज आप इस तरह भयग्रस्त क्यों हैं? तपस्वियोंसे कभी भी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये; १५ क्योंकि मुनिगण मुझे शक्तिसम्पन्न जानकर ही तपस्या करते हैं । ये तपस्वी मुनिलोग कभी भी किसीका १६ अपकार नहीं चाहते हैं | शंकरजीके ऐसा कहनेपर इन्द्र उनसे बोले - व्यासजी ऐसा तप किसलिये कर रहे हैं, उनकी क्या मनोकामना है? ॥ १४ – १६३ ॥ शिवजी बोले- व्यासजी पुत्र - प्राप्तिकी कामनासे १७ यह कठोर तप कर रहे हैं । इन्हें तपस्या करते हुए पूरे एक सौ वर्ष हो चुके हैं, अतः मैं इन्हें कल्याणकारी पुत्र प्रदान करूँगा ॥ १७ ॥
१८ सूतजी बोले- दयाभावसे युक्त प्रसन्न मुखवाले जगद्गुरु भगवान् शंकर इन्द्रसे ऐसा कहकर मुनि व्यासजीके पास जाकर बोले - हे वासवीपुत्र! उठो, १ ९ तुम्हें कल्याणकारी पुत्र अवश्य प्राप्त होगा । हे निष्पाप! तुम्हारा वह पुत्र सभी प्रकारके तेजोंसे २० सम्पन्न, ज्ञानवान्, यशस्वी और सभी लोगोंका सदा अतिशय प्रिय, समस्त सात्त्विक गुणोंसे सम्पन्न तथा सत्यरूपी पराक्रमसे युक्त होगा ॥ १८ - २० ३ ॥
पृष्ठ 129
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० सूत उवाच तदाकर्ण्य वचः श्लक्ष्णं कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥
शूलपाणिं नमस्कृत्य जगामाश्रममात्मनः ।
स गत्वाश्रममेवाशु बहुवर्षश्रमातुरः ॥
अरणीसहितं गुह्यं ममन्थाग्निं चिकीर्षया ।
मन्थनं कुर्वतस्तस्य चित्ते चिन्ताभरस्तदा ॥
प्रादुर्बभूव सहसा सुतोत्पत्तौ महात्मनः ।
मन्थानारणिसंयोगान्मन्थनाच्च समुद्भवः ॥
पावकस्य यथा तद्वत्कथं मे स्यात्सुतोद्भवः ।
पुत्रारणिस्तु या ख्याता सा ममाद्य न विद्यते ॥
तरुणी रूपसम्पन्ना कुलोत्पन्ना पतिव्रता ।
कथं करोमि कान्तां च पादयोः शृङ्खलासमाम् ॥
पुत्रोत्पादनदक्षां च पातिव्रत्ये सदा स्थिताम् ।
पतिव्रतापि दक्षापि रूपवत्यपि कामिनी ॥
सदा बन्धनरूपा च स्वेच्छासुखविधायिनी ।
शिवोऽपि वर्तते नित्यं कामिनीपाशसंयुतः ॥
कथं करोम्यहं चात्र दुर्घटं च गृहाश्रमम् ।
एवं चिन्तयतस्तस्य घृताची दिव्यरूपिणी ॥
प्राप्ता दृष्टिपथं तत्र समीपे गगने स्थिता ।
तां दृष्ट्वा चञ्चलापाङ्गीं समीपस्थां वराप्सराम् ॥
पञ्चबाणपरीताङ्गस्तूर्णमासीद् धृतव्रतः ।
चिन्तयामास च तदा किं करोम्यद्य संकटे ॥
धर्मस्य पुरतः प्राप्ते कामभावे दुरासदे ।
अङ्गीकरोमि यद्येनां वञ्चनार्थमिहागताम् ॥
हसिष्यन्ति महात्मानस्तापसा मां तु विह्वलम् ।
तपस्तप्त्वा महाघोरं पूर्णवर्षशतं त्विह ॥
सूतजी बोले- तब शूलपाणि शंकरजीका मधुर २१ वचन सुनकर उन्हें प्रणामकर द्वैपायन व्यासजीने अपने आश्रमके लिये प्रस्थान किया । वहाँ पहुँचकर कई वर्षोंतक घोर तप करनेके कारण अतिशय श्रान्त २२ महर्षि व्यास अरणीमें समाहित अग्निको प्रकट करनेकी मासे अरण - मन्थन करने लगे । मन्थन कर रहे व्यासजीके मनमें उस समय महान् चिन्ता हो रही २३ थी॥२१–२३ ॥ मन्थन तथा अरणिके पारस्परिक संयोगसे प्रकटित अग्निको देखकर व्यासजीके मनमें अचानक २४ पुत्रोत्पत्तिका विचार आया कि अरणि - मन्थनजनित अग्निकी भाँति मुझे पुत्र कैसे उत्पन्न हो? क्योंकि पुत्र प्रदान करनेवाली अरणी - रूपी वह रूपवती, २५ उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा पतिव्रता युवती स्त्री मेरे पास है नहीं, साथ ही पैरोंकी श्रृंखलाके समान स्त्रीको मैं कैसे अंगीकार करूँ? पुत्र उत्पन्न करनेमें २६ कुशल और पातिव्रत्य धर्ममें सदा तत्पर रहनेवाली पत्नी मुझे कैसे मिले? पतिपरायणा, निपुण, रूपवती - कैसी भी स्त्री हो; वह सदा बन्धनकी २७ कारण ही बनी रहती है । स्त्री सदा अपनी इच्छाके अनुसार सुख प्राप्त करना चाहती है । शंकरजी भी नित्य स्त्रीके मोहपाशमें फँसे हुए रहते हैं । अतः अब २८ मैं अत्यन्त विषम गृहस्थाश्रम - धर्मको किस प्रकार अंगीकार करूँ? ॥ २४ – २८३ व्यासजी ऐसा विचार कर ही रहे थे कि आकाशमें २ ९ समीपमें ही स्थित घृताची नामक अप्सरा उन्हें दृष्टि-गोचर हुई । चंचल कटाक्षोंवाली उस श्रेष्ठ अप्सराको पासमें ही स्थित देखकर कठोर नियम - संयम धारण ३० करनेवाले व्यासजी शीघ्र ही कामबाणसे आहत अंगोंवाले हो गये और सोचने लगे कि अब इस विषम ३१ संकटके समय मैं क्या करूँ? ॥ २ ९ – ३१ ॥ धर्मके समक्ष इस दुर्जय कामवासनाके वशीभूत होकर यदि मैं छलनेके लिये यहाँ उपस्थित हुई ३२ | इस अप्सराको स्वीकार करता हूँ, तब ऐसी स्थितिमें महात्मा तथा तपस्वीगण मुझ कामासक्तिसे विह्वलका यह उपहास करेंगे कि सौ वर्षोंतक कठिन तपस्या ३३ करनेके पश्चात् भी एक अप्सराको देखकर महातपस्वी
पृष्ठ 130
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ११ ]
दृष्ट्वाप्सरां च विवशः कथं जातो महातपाः ।
कामं निन्दापि भवतु यदि स्यादतुलं सुखम् ॥
गृहस्थाश्रमसम्भूतं सुखदं पुत्रकामदम् ।
स्वर्गदं च तथा प्रोक्तं ज्ञानिनां मोक्षदं तथा ॥
न भविष्यति तन्नूनमनया देवकन्यया ।
नारदाच्च मया पूर्वं श्रुतमस्ति कथानकम् ।
यथोर्वशीवशो राजा पराभूतः पुरूरवाः ॥
प्रथम स्कन्ध १२१ व्यास इतने विवश कैसे हो गये? और फिर ३४ यदि इसमें अतुलनीय सुख हो तो ऐसी निन्दा भी होती रहे । अर्थात् उसकी उपेक्षा भी की जा सकती है ॥ ३२-३४ ॥ गृहस्थाश्रम पुत्र - प्राप्तिकी कामना पूर्ण करनेवाला, ३५ स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा ज्ञानियोंको मोक्ष देनेवाला कहा गया है । किंतु वैसा सुख इस देवकन्यासे नहीं प्राप्त होगा । पूर्वकालमें मैंने नारदजीसे एक कथा सुनी थी जिसमें राजा पुरूरवा उर्वशीके वशीभूत ३६ । होकर अत्यन्त संकटमें पड़ गये थे ॥ ३५-३६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शिववरदानवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
अथैकादशोऽध्यायः बुधके ऋषय ऊचुः
aisi पुरूरवा राजा कोर्वशी देवकन्यका ।
कथं कष्टं च सम्प्राप्तं तेन राज्ञा महात्मना ॥
सर्वं कथानकं ब्रूहि लोमहर्षणजाधुना ।
श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वन्मुखाब्जच्युतं रसम् ॥
अमृतादपि मिष्टा ते वाणी सूत रसात्मिका ।
न तृप्यामो वयं सर्वे सुधया च यथामराः ॥
सूत उवाच
शृणुध्वं मुनयः सर्वे कथां दिव्यां मनोरमाम् ।
वक्ष्याम्यहं यथाबुद्ध्या श्रुतां व्यासवरोत्तमात् ॥
गुस्तु दयिता भार्या तारा नामेति विश्रुता ।
रूपयौवनयुक्ता सा चार्वङ्गी मदविह्वला ॥
गतैकदा विधोर्धाम यजमानस्य भामिनी ।
दृष्टा च शशिनात्यर्थं रूपयौवनशालिनी ॥
कामातुरस्तदा जातः शशी शशिमुखीं प्रति ।
सापि वीक्ष्य विधुं कामं जाता मदनपीडिता ॥
तावन्योन्यं प्रेमयुक्तौ स्मरार्तौ च बभूवतुः ।
तारा शशी मदोन्मत्तौ कामबाणप्रपीडितौ ॥
जन्मकी कथा ऋषिगण बोले- हे सूतजी! वे राजा पुरूरवा कौन थे तथा वह देवकन्या उर्वशी कौन थी? उस १ मनस्वी राजाने किस प्रकार संकट प्राप्त किया? ॥ १ ॥
हे लोमहर्षणतनय! आप इस समय पूरा कथानक विस्तारपूर्वक कहें । हम सभी लोग आपके मुखारविन्दसे २ निःसृत रसमयी वाणीको सुननेके इच्छुक हैं ॥२ ॥
हे सूतजी! आपकी वाणी अमृतसे भी बढ़कर ३ मधुर एवं रसमयी है । जिस प्रकार देवगण अमृत-पानसे कभी तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार आपके कथा - श्रवणसे हम तृप्त नहीं होते ॥ ३ ॥
सूतजी बोले – हे मुनियो! अब आपलोग उस ४ दिव्य तथा मनोहर कथाको सुनिये, जिसे मैंने परम श्रेष्ठ व्यासजीके मुखसे सुना है । मैं उसे अपनी बुद्धिके अनुसार वैसा ही कहूँगा ॥४ ॥
५ सुरगुरु बृहस्पतिकी पत्नीका नाम ' तारा ' था । वह रूप - यौवनसे सम्पन्न तथा सुन्दर अंगोंवाली थी ॥ ५ ॥
६ एक बार वह सुन्दरी अपने यजमान चन्द्रमा घर गयी । उस रूप तथा यौवनसे सम्पन्न चन्द्रमुखी कामिनीको देखते ही चन्द्रमा उसपर आसक्त हो गये । ७ तारा भी चन्द्रमाको देखकर आसक्त हो गयी । इस प्रकार वे दोनों तारा तथा चन्द्रमा एक- दूसरेको ८ देखकर प्रेमविभोर हो गये॥६–८ ॥