देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 141–150
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150
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१३२ जानाति विष्णुरमितद्युतिरम्ब साक्षा-त्त्वां सात्त्विकीमुदधिजां सकलार्थदां च को राजसी हर उमां किल तामसीं त्वां वेदाम्बिके न तु पुनः खलु निर्गुणां त्वाम् क्वाहं सुमन्दमतिरप्रतिमप्रभावः क्वायं तवातिनिपुणो मयि सुप्रसादः । जाने भवानि चरितं करुणासमेतं यत्सेवकांश्च दयसे त्वयि भावयुक्तान् वृत्तस्त्वया हरिरसौ वनजेशयापि नैवाचरत्यपि मुदं मधुसूदनश्च । पादौ तवादिपुरुषः किल पावकेन कृत्वा करोति च करेण शुभौ पवित्रौ ॥ वाञ्छत्यहो हरिरशोक इवातिकामं पादाहतिं प्रमुदितः पुरुषः पुराणः । तां त्वं करोषि रुषिता प्रणतं च पादे दृष्ट्वा पतिं सकलदेवनुतं स्मरार्तम् ॥ वक्षःस्थले वससि देवि सदैव तस्य पर्यङ्कवत्सुचरिते विपुलेऽतिशान्ते । सौदामिनीव सुघने सुविभूषिते च किं ते न वाहनमसौ जगदीश्वरोऽपि ॥ त्वं चेज्जहासि मधुसूदनमम्ब कोपा-नैवार्चितोऽपि स भवेत्किल शक्तिहीनः । प्रत्यक्षमेव पुरुषं स्वजनास्त्यजन्ति शान्तं श्रियोज्झितमतीव गुणैर्वियुक्तम् ॥ ब्रह्मादयः सुरगणा न तु किं युवत्यो ये त्वत्पदाम्बुजमहर्निशमाश्रयन्ति । मन्ये त्वयैव विहिताः खलु ते पुमांसः किं वर्णयामि तव शक्तिमनन्तवीर्ये ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ हे अम्ब! यद्यपि परम तेजस्वी भगवान् विष्णु आपको समुद्रसे उत्पन्न, सब प्रकारके मनोरथोंको । सिद्ध करनेवाली साक्षात् सात्त्विकी शक्तिस्वरूपा लक्ष्मीके रूपमें समझते हैं, ब्रह्मा भी आपको राजसी ॥ ४४ शक्तिस्वरूपा सरस्वती तथा शिवजी आपको तामसी शक्तिस्वरूपा महाकालीके रूपमें जानते हैं, तथापि हे अम्बिके! वे भी आपकी निर्गुणात्मिका दिव्य शक्तिको भलीभाँति नहीं जानते ॥ ४४ ॥
हे भवानि! कहाँ तो अत्यन्त मन्दबुद्धि मैं और कहाँ मुझपर अमित महिमाशाली तथा अमोघ प्रभाववाला ॥ ४५ आपका अनुग्रह! मैं आपके कारुणिक चरित्रको जानती हूँ जो कि आप भक्तिभावयुक्त सेवकों पर सर्वदा दया करती हैं ॥ ४५ ॥
यद्यपि कमलवनमें वास करनेवाली कमला होकर आपने भगवान् विष्णुको पतिके रूपमें वरण ४६ किया है, तथापि वे मधुसूदन आनन्ददायक व्यवहार नहीं करते । वे आदिपुरुष विष्णु आदिशक्तिस्वरूपा आपके पवित्र हाथोंसे अपना पादसंवाहन कराकर अपने चरणोंको शुभ तथा पवित्र करते हैं ॥ ४६ ॥
वे पुराणपुरुष भगवान् विष्णु भी प्रसन्न होकर आपके चरणोंका आघात वैसे ही चाहते हैं, जैसे ४७ अशोकवृक्ष अपनी वृद्धिके लिये चाहता है ॥ ४७ ॥
हे सुन्दर चरित्रवाली देवि! आप विष्णुके विशाल, शान्त एवं भूषणोंसे विभूषित वक्षःस्थलरूपी शय्यापर सर्वदा निवास करती हैं । उस समय ऐसा जान पड़ता है, मानो सुन्दर श्याम मेघमें बिजली ४८ चमक रही हो, तब वे जगदीश्वर होते हुए भी क्या आपके वाहन नहीं बन जाते? ॥ ४८ ॥
अम्ब! यदि क्रोधित होकर आप उनको त्याग दें तो वे भगवान् विष्णु अपूजित और शक्तिहीन होकर कुछ नहीं कर पायेंगे; क्योंकि लोकमें भी देखा जाता है कि श्रीहीन, गुणरहित एवं उदासीन पुरुषको उनके ४ ९ कुटुम्बीजन भी त्याग देते हैं ॥ ४ ९ ॥ क्या ब्रह्मादि देवगण भी किसी समय युवतीरूपमें नहीं थे, जो दिन - रात आपके चरणकमलोंका ही आश्रय रखते हैं । मैं तो मानती हूँ कि आपने ही उन्हें पुंस्त्व प्रदान किया था । अतः हे अनन्त पराक्रमशालिनि! ५० मैं आपकी शक्तिका क्या वर्णन कर सकती हूँ? ॥ ५० ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -5 D
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अ ० १३ ] प्रथम स्कन्ध १३३ त्वं नापुमान्न च पुमानिति मे विकल्पो या कासि देवि सगुणा ननु निर्गुणा वा । तां त्वां नमामि सततं किल भावयुक्तो वाञ्छामि भक्तिमचलां त्वयि मातरं तु ॥ सूत उवाच
इति स्तुत्वा महीपालो जगाम शरणं तदा ।
परितुष्टा ददौ देवी तत्र सायुज्यमात्मनि ॥
सुद्युम्नस्तु ततः प्राप पदं परमकं स्थिरम् ।
तस्या देव्याः प्रसादेन मुनीनामपि दुर्लभम् ॥
' आप न तो स्त्री हैं, न पुरुष; न निर्गुण हैं न सगुण ' - ऐसी मेरी धारणा है । अत: आप जैसी भी हों - उन आपको मैं भक्तिपूर्वक बार - बार प्रणाम करती हूँ । आप मातासे मैं यही प्रार्थना करती हूँ कि ५१ आपमें मेरी अचल भक्ति बनी रहे ॥५१ ॥
सूतजी बोले- - इस प्रकार स्तुति करके राजा सुद्युम्न उनके शरणागत हुए और भगवतीने भी ५२ अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उन्हें अपनी सायुज्य मुक्ति प्रदान की । तब उन देवीकी कृपासे सुद्युम्नने मुनियोंके लिये भी अति दुर्लभ शाश्वत परमपद ५३ | प्राप्त किया ॥ ५२-५३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे सुद्युम्नस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः राजा पुरूरवा सूत उवाच
सुद्युम्ने तु दिवं याते राज्यं चक्रे पुरूरवाः ।
सगुणश्च सुरूपश्च प्रजारञ्जनतत्परः ॥
प्रतिष्ठाने पुरे रम्ये राज्यं सर्वनमस्कृतम् ।
चकार सर्वधर्मज्ञः प्रजारक्षणतत्परः ॥
मन्त्रः सुगुप्तस्तस्यासीत्परत्राभिज्ञता तथा ।
सदैवोत्साहशक्तिश्च प्रभुशक्तिस्तथोत्तमा ॥
सामदानादयः सर्वे वशगास्तस्य भूपतेः ।
वर्णाश्रमान्स्वधर्मस्थान्कुर्वन् राज्यं शशास ह ॥
यज्ञांश्च विविधांश्चक्रे स राजा बहुदक्षिणान् ।
दानानि च पवित्राणि ददावथ नराधिपः ॥
तस्य रूपगुणौदार्यशीलद्रविणविक्रमान् ।
श्रुत्वोर्वशी वशीभूता चकमे तं नराधिपम् ॥
ब्रह्मशापाभितप्ता सा मानुषं लोकमास्थिता ।
गुणिनं तं नृपं मत्वा वरयामास मानिनी ॥
और उर्वशीकी कथा सूतजी बोले- सुद्युम्नके दिवंगत हो जानेपर प्रजानुरंजनमें तत्पर, गुणी एवं सुन्दर महाराज पुरूरवा १ राज्य करने लगे । उस रमणीय प्रतिष्ठानपुर में सर्वधर्मज्ञ तथा प्रजाकी रक्षामें तत्पर राजा पुरूरवाने सभीके द्वारा आदरणीय राज्य किया ॥ १-२ ॥ २ उनकी राज्य - मन्त्रणा अच्छी तरहसे गुप्त रहती थी और उन्हें दूसरे राज्योंकी मन्त्रणाओंका भलीभाँति ज्ञान रहता था । उनमें सर्वदा उत्साहशक्ति एवं उत्तम ३ प्रभुशक्ति विद्यमान थी । साम, दान, दण्ड और भेद— ये चारों नीतियाँ उन राजाके वशीभूत थीं । वे चारों वर्णों तथा आश्रमोंके लोगोंसे अपने - अपने धर्मोंका ४ आचरण कराते हुए राज्यका शासन - कार्य करते थे । वे राजा पुरूरवा विपुल दक्षिणावाले विविध यज्ञ करते थे और पवित्र दान किया करते थे ॥ ३--५ ॥ ५ राजा पुरूरवाके रूप, गुण, उदारता, शील, ऐश्वर्य एवं वीरताकी प्रशंसा सुनकर उर्वशी उनके ६ वशीभूत हो गयी; उन दिनों वह भी ब्रह्माके शापसे पृथ्वीपर मनुष्य - योनिमें आयी थी । अतः उस मानिनीने उन राजाको गुणी जानकर उन्हें पतिके रूपमें स्वीकार ७ कर लिया ॥ ६-७ ॥
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समयं चेदृशं कृत्वा स्थिता तत्र वराङ्गना ।
एतावरणकौ राजन्यस्तौ रक्षस्व मानद ॥
घृतं मे भक्षणं नित्यं नान्यत्किञ्चिन्नृपाशनम् ।
नेक्षे त्वां च महाराज नग्नमन्यत्र मैथुनात् ॥
भाषाबन्धस्त्वयं राजन् यदि भग्नो भविष्यति ।
तदा त्यक्त्वा गमिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥
अङ्गीकृतं च तद्राज्ञा कामिन्या भाषितं तु यत् ।
स्थिता भाषणबन्धेन शापानुग्रहकाम्यया ॥
रेमे तदा स भूपालो लीनो वर्षगणान्बहून् । धर्मकर्मादिकं त्यक्त्वा चोर्वश्या मदमोहितः ।
एकचित्तस्तु सञ्जातस्तन्मनस्को महीपतिः ।
न शशाक तया हीनः क्षणमप्यतिमोहितः ॥
एवं वर्षगणान्ते तु स्वर्गस्थः पाकशासनः ।
उर्वशीं नागतां दृष्ट्वा गन्धर्वानाह देवराट् ॥
उर्वशीमानयध्वं भो गन्धर्वाः सर्व एव हि ।
हृत्वरणौ गृहात्तस्य भूपतेः समये किल ॥
उर्वशीरहितं स्थानं मदीयं नातिशोभते ।
येन केनाप्युपायेन तामानयत कामिनीम् ॥
इत्युक्तास्तेऽथ गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ वह वरांगना इस प्रकारकी शर्त रखकर वहीं ८ रहने लगी । [ उसने कहा ] - हे राजन्! ये दोनों भेड़के बच्चे मैं आपके पास धरोहरके रूपमें रखती हूँ । हे मानद! आप इनकी रक्षा करें । हे नृप! [ दूसरी शर्त है कि ] मैं केवल घी ही खाऊँगी ९ और कुछ नहीं और हे महाराज! [ तीसरी शर्त है कि ] सहवासके अतिरिक्त किसी दूसरे समयमें मैं आपको कभी वस्त्रविहीन अवस्थामें न देखूँ । हे १० राजन्! यदि आप इन कही गयी शर्तोंको भंग करेंगे तो मैं उसी समय आपको छोड़कर चली जाऊँगी, यह मैं सत्य कह रही हूँ ॥ ८- –१० ॥ ११ इस प्रकार उस कामिनी उर्वशीने जो कहा था, उसे राजाने स्वीकार कर लिया और उर्वशी शापसे उद्धार पानेकी इच्छासे राजा पुरूरवाको प्रतिज्ञाबद्ध १२ करके वहीं रहने लगी ॥११ ॥
उर्वशीके द्वारा मुग्ध किये गये राजा सब धर्म-कर्म त्यागकर अनेक वर्षोंतक भोग - विलासमें पड़े १३ रहे । उसपर आसक्त मनवाले वे सदा उसीका चिन्तन करते रहते थे और उसपर अत्यधिक मोहित होनेके कारण एक क्षण भी उस उर्वशीके बिना नहीं रह १४ सकते थे ॥ १२-१३ ॥ इस प्रकार जब बहुत वर्ष बीत गये, तब देवलोकमें इन्द्रने अपनी सभामें उर्वशीको अनुपस्थित १५ देखकर गन्धर्वोंसे पूछकर कहा - हे गन्धर्वगण! तुम सब लोग वहाँ जाओ और प्रतिज्ञाबद्ध राजाके घरसे भेड़ों को चुराकर उर्वशीको ले आओ; क्योंकि उर्वशीके बिना मुझे यह स्थान अच्छा नहीं लगता । अतः जिस १६ किसी भी उपायसे उस कामिनीको तुमलोग लाओ ॥ १४–१६ ॥ तब इन्द्रके ऐसा कहनेपर विश्वावसु आदि ततो गत्वा महागाढे तमसि प्रत्युपस्थिते ॥ १७ प्रधान गन्धर्वोंने वहाँसे जाकर रात्रिके घोर अन्धकारमें
जह्रुस्तावरणौ देवा रममाणं विलोक्य तम् ।
चक्रन्दतुस्तदा तौ तु ह्रियमाणौ विहायसा ॥
उर्वशी तदुपाकर्ण्य क्रन्दितं सुतयोरिव ।
कुपितोवाच राजानं समयोऽयं कृतो मया ॥
राजा पुरूरवाको विहार करते देख उन दोनों भेड़ोंको चुरा लिया । तब आकाशमार्गमें जाते हुए चुराये गये १८ वे दोनों भेड़ जोर से चिल्लाने लगे॥१७-१८ ॥ अपने पुत्रके समान पाले हुए भेड़ोंका क्रन्दन सुनते ही उर्वशीने क्रोधित होकर राजा पुरूरवासे १ ९ | कहा - हे राजन्! मैंने आपके सम्मुख जो पहली शर्त
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अ ० १३ ] प्रथम स्कन्ध १३५
नष्टाहं तव विश्वासाद्धृतौ चोरैर्ममोरणौ ।
राजन्पुत्रसमावेतौ त्वं किं शेषे स्त्रिया समः ॥
हतास्म्यहं कुनाथेन नपुंसा वीरमानिना ।
उरणौ मे गतौ चाद्य सदा प्राणप्रियौ मम ॥
एवं विलप्यमानां तां दृष्ट्वा राजा विमोहितः ।
नग्न एव ययौ तूर्णं पृष्ठतः पृथिवीपतिः ॥
विद्युत्प्रकाशिता तत्र गन्धर्वैर्नृपवेश्मनि ।
नग्नभूतस्तया दृष्टो भूपतिर्गन्तुकामया ॥
त्यक्त्वोरणौ गताः सर्वे गन्धर्वाः पथि पार्थिवः ।
नग्नो जग्राह तौ श्रान्तो जगाम स्वगृहं प्रति ॥
तदोर्वशीं गतां दृष्ट्वा विललापातिदुःखितः ।
नग्नं वीक्ष्य पतिं नारी गता सा वरवर्णिनी ॥
क्रन्दन्स देशदेशेषु बभ्राम नृपतिः स्वयम् ।
तच्चित्तो विह्वलः शोचन्विवशः काममोहितः ॥
भ्रमन्वै सकलां पृथ्वीं कुरुक्षेत्रे ददर्श ताम् ।
दृष्ट्वा संहृष्टवदनः प्राह सूक्तं नृपोत्तमः ॥
अये जाये तिष्ठ तिष्ठ घोरे न त्यक्तुमर्हसि ।
मां त्वं त्वन्मनसं कान्तं वशगं चाप्यनागसम् ॥
स देहोऽयं पतत्यत्र देवि दूरं हृतस्त्वया ।
खादन्त्येनं वृकाः काकास्त्वया त्यक्तं वरोरु यत् ॥
एवं विलपमानं तं राजानं प्राह चोर्वशी ।
दुःखितं कृपणं श्रान्तं कामार्तं विवशं भृशम् ॥
रखी थी, वह टूट गयी । आपके विश्वासपर मैं धोखे में २० पड़ी; क्योंकि पुत्रके समान मेरे प्रिय भेड़ोंको चोरोंने चुरा लिया फिर भी आप घरमें स्त्रीकी तरह शयन कर रहे हैं ॥ १ ९ -२० ॥ अपनेको वीर समझनेवाले नपुंसक इस अधम २१ स्वामीके द्वारा मैं नष्ट कर दी गयी । सर्वदा प्राणोंके समान मेरे दोनों भेड़ अब चले गये । उर्वशीको इस प्रकार विलाप करती देख प्रेममें आसक्त राजा २२ पुरूरवा चोरोंके पीछे नग्नावस्थामें ही तुरंत दौड़ पड़े ॥ २१-२२ ॥ उसी समय गन्धर्वोंद्वारा वहाँ राजाके भवनमें २३ बिजली चमका दी गयी, जिसके कारण वहाँसे जानेकी इच्छावाली उर्वशीने राजाको नग्न देख लिया ॥ २३ ॥
गन्धर्व उन दोनों भेड़ोंको वहीं मार्गमें छोड़कर २४ भाग गये । थके एवं नग्न राजा भेड़ोंको लेकर अपने घर चले आये । तब वे उर्वशीको वहाँसे गयी हुई देखकर अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगे एवं २५ । लज्जित हुए । पतिको नग्न देखकर वह सुन्दरी उर्वशी चली गयी थी ॥ २४-२५ ॥ व्याकुल, लाचार, कामसे मोहित तथा एकमात्र उर्वशीमें आसक्त चित्तवाले राजा शोक तथा क्रन्दन २६ करते हुए देश - देशमें भ्रमण करने लगे ॥ २६ ॥
इस प्रकार समस्त भूमण्डलपर भ्रमण करते हुए उन्होंने उर्वशीको कुरुक्षेत्रमें देखा । उसे देखते ही २७ प्रसन्न मुखवाले नृपश्रेष्ठ राजा पुरूरवाने मधुर वाणीमें कहा- हे प्रिये! ठहरो - ठहरो । हे कठोरहृदये! मैं अब भी तुमपर आसक्त हूँ, मैं तुम्हारे वशमें हूँ; अतः मुझ २८ निरपराधी पतिको तुम मत छोड़ो ॥ २७-२८ ॥ हे देवि! जिस शरीरसे तुमने इतना प्रेम किया था, जिसे तुमने यहाँतक खींच लिया, वह शरीर आज यहीं गिर जायगा । हे सुन्दरि! तुम्हारे द्वारा त्यक्त इस २ ९ देहको भेड़िये और कौए खा जायेंगे ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार विलाप करते हुए दुःखित, दीन, थके, कामातुर और अत्यन्त लाचार राजा पुरूरवासे ३० । उर्वशी कहने लगी ॥ ३० ॥
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१३६ उर्वश्युवाच मूर्खोऽसि नृपशार्दूल ज्ञानं कुत्र गतं तव क्वापि सख्यं न च स्त्रीणां वृकाणामिव पार्थिव न विश्वासो हि कर्तव्यः स्त्रीषु चौरेषु पार्थिवैः गृहं गच्छ सुखं भुंक्ष्व मा विषादे मनः कृथाः इत्येवं बोधितो राजा न विवेदातिमोहितः दुःखं च परमं प्राप्तः स्वैरिणीस्नेहयन्त्रितः सूत उवाच
इति सर्वं समाख्यातमुर्वशीचरितं महत् ।
वेदे विस्तरितं चैतत्संक्षेपात्कथितं मया ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ उर्वशी बोली - हे राजेन्द्र! आप मूर्ख हैं ॥ आपका ज्ञान कहाँ चला गया? हे पृथ्वीपते! भेड़ियोंके ॥ ३१ समान स्त्रियोंकी किसीसे मित्रता नहीं होती । अतः राजाओंको चाहिये कि वे स्त्रियों और चोरोंपर कभी । भी विश्वास न करें । अब आप अपने घर जाइये, सुख भोगिये और मनमें किसी प्रकारकी चिन्ता मत ॥ ३२ कीजिये ॥ ३१-३२ ॥ । इस प्रकार अत्यन्त विषयासक्त होनेके कारण उर्वशीके समझानेपर भी राजाको ज्ञान नहीं हुआ । उस ॥ ३३ स्वेच्छाचारिणी अप्सराके स्नेहमें जकड़े रहनेके कारण उन्हें अपार दुःख प्राप्त हुआ ॥३३ ॥
सूतजी बोले - [ हे मुनिजन! ] इस प्रकार मैंने उर्वशीके महान् चरित्रका वर्णन आपलोगोंसे संक्षेपमें ३४ । कर दिया, जो वेदमें विस्तारपूर्वक वर्णित है ॥३४ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां प्रथमस्कन्धे पुरूरवस उर्वश्याश्च चरित्रवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः व्यासपुत्र शुकदेवके अरणिसे उत्पन्न होनेकी कथा तथा व्यासजीद्वारा सूत उवाच दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं व्यासश्चिन्तापरोऽभवत् । किं करोमि न मे योग्या देवकन्येयमप्सराः एवं चिन्तयमानं तु दृष्ट्वा व्यासं तदाप्सराः भयभीता हि सञ्जाता शापं मा विसृजेदयम् सा कृत्वाथ शुकीरूपं निर्गता भयविह्वला । कृष्णस्तु विस्मयं प्राप्तो विहङ्गीं तां विलोकयन् कामस्तु देहे व्यासस्य दर्शनादेव सङ्गतः । मनोऽतिविस्मितं जातं सर्वगात्रेषु विस्मितः
स तु धैर्येण महता निगृह्णन्मानसं मुनिः ।
न शशाक नियन्तुं च स व्यासः प्रसृतं मनः ॥
उनसे गृहस्थधर्मका वर्णन सूतजी बोले- उस सुन्दरी असितापांगी घृताचीको देखकर व्यासजी बड़े असमंजसमें पड़े और सोचने ॥ १ लगे कि यह देवकन्या अप्सरा मेरे योग्य नहीं है, अतः अब मैं क्या करूँ? वह अप्सरा भी व्यासजीको । चिन्तित होता देखकर भयभीत हो गयी कि कहीं ये मुझे शाप न दे दें ॥ १-२ ॥ ॥ २ तत्पश्चात् भयसे व्याकुल वह अप्सरा एक शुकीका रूप धारण करके उड़ गयी । व्यासजी उसे पक्षीके रूपमें देखकर आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ३ ॥
॥ ३ उसे देखनेमात्रसे व्यासजीके शरीरमें कामका संचार हो आया और प्रत्यंगमें कामका प्रवेश हो जानेके कारण उनका मन अत्यन्त विस्मयमें पड़ ॥ ४ गया ॥४ ॥
बड़ी धीरताके साथ मनको रोकनेकी चेष्टा करते हुए भी उस चंचल मनको वे व्यासमुनि वशमें ५ करनेमें समर्थ नहीं हुए ॥ ५ ॥
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अ ० १४ ]
बहुशो गृह्यमाणं च घृताच्या मोहितं मनः ।
भावित्वान्नैव विधृतं व्यासस्यामिततेजसः ॥
मन्थनं कुर्वतस्तस्य मुनेरग्निचिकीर्षया ।
अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमथापतत् ॥
सो s विचिन्त्य तथा पातं ममन्थारणिमेव च ।
तस्माच्छुकः समुद्भूतो व्यासाकृतिमनोहरः ॥
विस्मयं जनयन्बालः सञ्जातस्तदरण्यजः ।
यथाध्वरे समिद्धोऽग्निर्भाति हव्येन दीप्तिमान् ॥
व्यासस्तु सुतमालोक्य विस्मयं परमं गतः ।
किमेतदिति सञ्चिन्त्य वरदानाच्छिवस्य वै ॥
तेजोरूपी शुको जातोऽप्यरणीगर्भसम्भवः ।
द्वितीयोऽग्निरिवात्यर्थं दीप्यमानः स्वतेजसा ॥
विलोकयामास तदा व्यासस्तु मुदितं सुतम् ।
दिव्येन तेजसा युक्तं गार्हपत्यमिवापरम् ॥
गङ्गान्तः स्नापयामास समागत्य गिरेस्तदा ।
पुष्पवृष्टिस्तु खाज्जाता शिशोरुपरि तापसाः ॥
जातकर्मादिकं चक्रे व्यासस्तस्य महात्मनः ।
देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥
जगुर्गन्धर्वपतयो मुदितास्ते
मुदितास्ते दिदृक्षवः ।
विश्वावसुर्नारदश्च तुम्बुरुः शुकसम्भवे ॥
तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे देवा विद्याधरास्तथा ।
दृष्ट्वा व्याससुतं दिव्यमरणीगर्भसम्भवम् ॥
अन्तरिक्षात्पपातोर्व्यां दण्डः कृष्णाजिनं शुभम् कमण्डलुस्तथा दिव्यः शुकस्यार्थे द्विजोत्तमाः ॥ प्रथम स्कन्ध १३७ इस प्रकार घृताचीद्वारा मोहित तेजस्वी व्यासजीका ६ मन अनेक यत्न करनेपर भी भावी संयोगके कारण उनके वशमें न हो सका ॥ ६ ॥
इसी बीच अग्नि निकालनेके लिये मन्थन करते समय एकाएक उनका तेज उस अरणीपर गिर गया, ७ किंतु उसके गिरनेपर ध्यान न देकर वे अरणिमन्थन करते रहे । उस अरणीसे उन्हींके सदृश मनोहर ८ स्वरूपवाले ‘ शुक ' उत्पन्न हो गये॥७-८ ॥ अरणीसे उत्पन्न वह बालक विस्मय पैदा करते हुए उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जिस प्रकार हवन करते समय घृताहुति पड़नेसे प्रकट अग्नि दीप्तिमान् हो उठती है ॥ ९ ॥
उस पुत्रको देखकर ‘ यह क्या! ' – ऐसा सोचकर व्यासजी अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये [ और विचार १० करने लगे कि यह ] शिवके वरदानसे ही तो उत्पन्न नहीं हुआ है! ॥१० ॥
इस प्रकार अरणीगर्भसे उत्पन्न वह तेजस्वी पुत्र ११ शुक अपने तेजसे दूसरे अग्निके तुल्य देदीप्यमान प्रतीत हो रहा था ॥११ ॥
व्यासजीने दिव्य देहधारी द्वितीय गार्हपत्य १२ अग्निके समान तेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्नतासे देखा और पर्वतसे नीचे उतरकर गंगाजलसे उसको नहलाया । हे तपस्वियो! उस समय आकाशसे उस शिशुके ऊपर १३ पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ॥ १२-१३ ॥ व्यासजीने उस महात्मा शिशुका जातकर्म आदि संस्कार किया । उस समय देवताओंने दुंदुभियाँ बजायीं १४ तथा अप्सराओंने नृत्य किया ॥१४ ॥
उस बालकके दर्शनकी लालसावाले विश्वावसु, नारद, तुम्बुरु आदि सभी गन्धर्वराज प्रसन्न होकर १५ शुकके जन्मपर गान करने लगे । सभी देवता तथा विद्याधर भी अरणीके गर्भ से उत्पन्न उस दिव्य व्यासपुत्रको देखकर प्रसन्नतापूर्वक स्तुति करने १६ लगे ॥ १५-१६ ॥ हे द्विजोत्तम! उसी समय शुकदेवजीके लिये । आकाशसे दिव्य दण्ड, कमण्डलु और शुभ कृष्ण १७ । मृगचर्म पृथ्वीपर आ गिरे ॥ १७ ॥
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१३८
सद्यः स ववृधे बालो जातमात्रोऽतिदीप्तिमान् ।
तस्योपनयनं चक्रे व्यासो विद्याविधानवित् ॥
उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससंग्रहाः ।
उपतस्थुर्महात्मानं यथास्य पितरं तथा ॥
यतो दृष्टं शुकीरूपं घृताच्याः सम्भवे तदा ।
शुकेति नाम पुत्रस्य चकार मुनिसत्तमः ॥
बृहस्पतिमुपाध्यायं कृत्वा व्याससुतस्तदा ।
व्रतानि ब्रह्मचर्यस्य चकार विधिपूर्वकम् ॥
सोऽधीत्य निखिलान्वेदान् सरहस्यान्ससंग्रहान् ।
धर्मशास्त्राणि सर्वाणि कृत्वा गुरुकुले शुकः ॥
गुरवे दक्षिणां दत्त्वा समावृत्तो मुनिस्तदा ।
आजगाम पितुः पार्श्वं कृष्णद्वैपायनस्य च ॥
दृष्ट्वा व्यासः शुकं प्राप्तं प्रेम्णोत्थाय ससम्भ्रमः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ उत्पन्न होते ही वह अति तेजस्वी शिशु १८ | शीघ्रतापूर्वक बड़ा हो गया, तब वैदिक विधानके मर्मज्ञ व्यासजीने उसका उपनयनसंस्कार भी कर दिया ॥ १८ ॥
१ ९ उत्पन्न होते ही रहस्यों तथा संग्रहोंसहित सभी वेद उन महात्माके समक्ष वैसे ही उपस्थित हो गये, जैसे उसके पिता व्यासजीमें वे विद्यमान थे ॥ १ ९ ॥ २० अरणि - मन्थनके समय मुनिश्रेष्ठ व्यासजीने घृताची अप्सराको शुकीके रूपमें देखा था, इसलिये उन्होंने इस बालकका नाम शुक रख दिया ॥ २० ॥
२१ व्याससुत शुकदेवने बृहस्पतिको अपना आचार्य मानकर विधिवत् ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया । गुरुकुल निवासकर रहस्यों तथा संग्रहोंसहित सभी २२ वेदों तथा धर्मशास्त्रोंका अध्ययन करके, तदनन्तर गुरुको दक्षिणा देकर वे शुकदेवमुनि अपने पिता व्यासजीके पास आ गये ॥ २१–२३ ॥ २३ शुकदेवको आया देखकर व्यासजीने शीघ्रताके साथ प्रसन्नतापूर्वक उठकर बारंबार उनका आलिंगन आलिलिङ्ग मुहुर्ग्राणं मूर्ध्नि तस्य चकार ह ॥२४ किया और उनका सिर सूँघा । परम पवित्र व्यासजीने
पप्रच्छ कुशलं व्यासस्तथा चाध्ययनं शुचिः ।
आश्वास्य स्थापयामास शुकं तत्राश्रमे शुभे ॥
दारकर्म ततो व्यासः शुकस्य पर्यचिन्तयत् ।
कन्यां मुनिसुतां कान्तामपृच्छदतिवेगवान् ॥
शुकं प्राह सुतं व्यासो वेदोऽधीतस्त्वयानघ ।
धर्मशास्त्राणि सर्वाणि कुरु भार्यां महामते ॥
गार्हस्थ्यं च समासाद्य यज देवान्पितॄनथ ।
ऋणान्मोचय मां पुत्र प्राप्य दारान्मनोरमान् ॥
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च ।
तस्मात्पुत्र महाभाग कुरुष्वाद्य गृहाश्रमम् ॥
कृत्वा गृहाश्रमं पुत्र सुखिनं कुरु मां शुक ।
आशा मे महती पुत्र पूरयस्व महामते ॥
शुकदेवजीके कुशलक्षेम तथा अध्ययनके विषयमें पूछा तथा उन्हें आश्वस्त करके अपने पावन आश्रममें २५ रख लिया ॥ २४-२५ ॥ तत्पश्चात् व्यासजी शुकदेवजीके विवाहके विषयमें सोचने लगे । एक दिन परम तेजस्वी व्यासजीने २६ शुकदेवजीसे किसी सुन्दर मुनिकन्याकी चर्चा की ॥ २६ ॥
उन्होंने अपने पुत्र शुकदेवसे कहा- हे पवित्रात्मन्! तुमने वेद तथा सभी धर्मशास्त्रोंका अध्ययन कर लिया २७ है । अत: हे महामते! अब तुम विवाह कर लो और गृहस्थ आश्रममें रहकर देवताओं और पितरोंका यजन करो और हे पुत्र! तुम सुन्दर स्त्रीको स्वीकारकर २८ मुझे भी ऋणसे मुक्त कर दो ॥ २७-२८ ॥ अपुत्रकी गति नहीं होती और उसे स्वर्ग कदापि नहीं मिलता । इसलिये हे महाभाग पुत्र! अब तुम २ ९ गृहस्थ आश्रममें प्रवेश करो और हे शुक! हे पुत्र! गृहस्थी बसाकर मुझे भी आनन्दित करो । ऐसा करके हे महामते! हे पुत्र! तुम मेरी महान् आशा परिपूर्ण ३० | करो ॥ २ ९ -३० ॥
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अ ० १४ ]
तपस्तप्त्वा महाघोरं प्राप्तोऽसि त्वमयोनिजः ।
देवरूपी महाप्राज्ञ पाहि मां पितरं शुक ॥
सूत उवाच
इति वादिनमभ्याशे प्राप्तः प्राह शुकस्तदा ।
विरक्तः सोऽतिरक्तं तं साक्षात्पितरमात्मनः ॥
शुक उवाच
किं त्वं वदसि धर्मज्ञ वेदव्यास महामते ।
तत्त्वेन शाधि शिष्यं मां त्वदाज्ञां करवाण्यलम् ॥
व्यास उवाच
त्वदर्थे यत्तपस्तप्तं मया पुत्र शतं समाः ।
प्राप्तस्त्वं चातिदुःखेन शिवस्याराधनेन च ॥
ददामि तव वित्तं तु प्रार्थयित्वाथ भूपतिम् ।
सुखं भुंक्ष्व महाप्राज्ञ प्राप्य यौवनमुत्तमम् ॥
शुक उवाच
किं सुखं मानुषे लोके ब्रूहि तात निरामयम् ।
दुःखविद्धं सुखं प्राज्ञा न वदन्ति सुखं किल ॥
स्त्रियं कृत्वा महाभाग भवामि तद्वशानुगः ।
सुखं किं परतन्त्रस्य स्त्रीजितस्य विशेषतः ॥
कदाचिदपि मुच्येत लोहकाष्ठादियन्त्रितः ।
पुत्रदारैर्निबद्धस्तु न विमुच्येत कर्हिचित् ॥
विण्मूत्रसम्भवो देहो नारीणां तन्मयस्तथा ।
कः प्रीतिं तत्र विप्रेन्द्र विबुधः कर्तुमिच्छति ॥
अयोनिजोऽहं विप्रर्षे योनौ मे कीदृशी मतिः न वाञ्छाम्यहमग्रेऽपि योनावेव समुद्भवम् विट्सुखं किमु वाञ्छामि त्यक्त्वात्मसुखमद्भुतम् आत्मारामश्च भूयोऽपि न भवत्यतिलोलुपः प्रथम स्कन्ध १३ ९ शुक! कठिन तपस्या करके मैंने तुम्हारे - जैसा ३१ अयोनिज पुत्र पाया है । हे महाप्राज्ञ! तुम देवतारूप हो, अतः मुझ पिताकी रक्षा करो ॥ ३१ ॥
सूतजी बोले - [ हे ऋषियो! ] ऐसा कहनेवाले व्यासजीके पास उपस्थित विरक्त शुकदेवजीने गृहस्थ-आश्रममें अनुरक्त अपने पिता से कहा ॥ ३२ ॥
३२ शुकदेवजी बोले - हे महामते! हे धर्मज्ञ! हे वेदव्यास! आप क्या कह रहे हैं, मुझ शिष्यको आप तत्त्वज्ञानका उपदेश दें; मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ३३ ॥
३३ व्यासजी बोले - हे पुत्र! तुम्हारे लिये मैंने सैकड़ों वर्ष कष्ट सहकर जो तपस्या की और शिवजीकी आराधना की, उसके फलस्वरूप मैंने तुम्हें पाया है । किसी राजासे माँगकर मैं तुम्हें प्रचुर धन ३४ दूँगा, हे महाप्राज्ञ! तुम श्रेष्ठ यौवन प्राप्त करके सुखका उपभोग करो ॥ ३४-३५ ॥ शुकदेवजी बोले- हे तात! आप बतायें कि ३५ इस मनुष्यलोकमें भला विपत्तिरहित कौन - सा सुख है? बुद्धिमान् लोग दुःखसे युक्त सुखको सुख नहीं कहते हैं ॥३६ ॥
हे महाभाग! स्त्री पाकर मैं उसीके वशमें हो ३६ जाऊँगा । तब भला आप ही बताइये, परतन्त्र होकर और विशेषतः स्त्रीके वशमें रहकर मैं कौन - सा सुख पा सकूँगा? ॥३७ ॥
३७ लौह या काष्ठके फन्देमें जकड़ा हुआ पुरुष कदाचित् छूट भी सकता है, किंतु पुत्र - कलत्रके बन्धनमें फँसा हुआ प्राणी कभी भी बन्धनमुक्त नहीं ३८ हो पाता ॥ ३८ ॥
यह शरीर विष्ठा एवं मूत्रसे परिपूर्ण रहता है; वैसे ही स्त्रियोंका शरीर भी होता है । हे विप्रेन्द्र! तब ३ ९ कौन बुद्धिमान् पुरुष उससे प्रीति करना चाहेगा! ॥ ३ ९ ॥ हे विप्रशिरोमणे! मैं अयोनिज हूँ, तब योनिजन्य । सुखमें मेरी बुद्धि कैसे होगी? मैं भविष्यमें भी अपनी ॥ ४० उत्पत्ति किसी योनिमें नहीं चाहता ॥ ४० ॥
अतः अद्भुत अध्यात्म सुखको छोड़कर मैं विट्-। मूत्रजन्य सुखको क्यों चाहूँ? अपने - आपमें रमण ॥ ४१ करनेवाला कभी विषय - सुखका लोभी नहीं होता ॥ ४१ ॥
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१४० प्रथमं पठिता वेदा मया विस्तारिताश्च ते हिंसामयास्ते पठिताः कर्ममार्गप्रवर्तकाः बृहस्पतिर्गुरुः प्राप्तः सोऽपि मग्नो गृहार्णवे अविद्याग्रस्तहृदयः कथं तारयितुं क्षमः रोगग्रस्तो यथा वैद्यः पररोगचिकित्सकः तथा गुरुर्मुमुक्षोर्मे गृहस्थोऽयं विडम्बना कृत्वा प्रणामं गुरवे त्वत्समीपमुपागतः त्राहि मां तत्त्वबोधेन भीतं संसारसर्पतः संसारेऽस्मिन्महाघोरे भ्रमणं नभचक्रवत् न च विश्रमणं क्वापि सूर्यस्येव दिवानिशि किं सुखं तात संसारे निजतत्त्वविचारणात् मूढानां सुखबुद्धिस्तु विट्सु कीटसुखं यथा अधीत्य वेदशास्त्राणि संसारे रागिणश्च ये । तेभ्यः परो न मूर्खोऽस्ति सधर्माः श्वाश्वसूकरैः
मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य वेदशास्त्राण्यधीत्य च ।
बध्यते यदि संसारे को विमुच्येत मानवः ॥
नातः परतरं लोके क्वचिदाश्चर्यमद्भुतम् ।
पुत्रदारगृहासक्तः पण्डितः परिगीयते ॥
न बाध्यते यः संसारे नरो मायागुणैस्त्रिभिः ।
स विद्वान्स च मेधावी शास्त्रपारं गतो हि सः ॥
किं वृथाध्ययनेनात्र दृढबन्धकरेण च ।
पठितव्यं तदेवाशु मोचयेद्भवबन्धनात् ॥
गृह्णाति पुरुषं यस्माद् गृहं तेन प्रकीर्तितम् ।
क्व सुखं बन्धनागारे तेन भीतोऽस्म्यहं पितः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ । मैंने सांगोपांग वेदोंका अध्ययन किया और ॥ ४२ जाना कि वे हिंसामय हैं तथा कर्ममार्गके प्रवर्तक हैं । मुझे गुरुरूपमें बृहस्पति प्राप्त हुए, वे भी गृहस्थीके । सागरमें डूबे हुए हैं । अविद्याग्रस्त हृदयवाले वे मेरा ॥ ४३ उद्धार कैसे कर सकते हैं? ॥ ४२-४३ ॥ जैसे कोई रोगग्रस्त वैद्य दूसरेके रोगकी । चिकित्सा करता हो, उसी प्रकार मुझ मोक्षार्थीके गुरु गृहस्थ हैं, यह विडम्बना ही है । इसलिये ऐसे गुरुको ॥ ४४ नमस्कार करके मैं आपके पास आया हूँ । अब आप । तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर मेरी रक्षा करें; क्योंकि मैं इस संसाररूपी सर्पसे अत्यन्त भयभीत हूँ ॥ ४४-४५ ॥ ॥ ४५ इस महाभयंकर संसार - चक्रमें प्राणिमात्रको सर्वदा नक्षत्रोंकी भाँति चक्कर काटना पड़ता है और सूर्यकी । भाँति दिन - रात उन्हें भी कभी विश्राम करनेका अवसर ॥ ४६ नहीं मिलता ॥ ४६ ॥
हे तात! इस संसारमें आत्मज्ञानको छोड़कर कौन-। सा सुख है? मूढ जनोंको सुखकी वैसी ही प्रतीति होती ॥ ४७ है, जैसी विष्ठाके कीड़ोंको विष्ठामें होती है ॥ ४७ ॥
वेदशास्त्रोंको पढ़कर भी जो सांसारिक सुखमें फँसे रहते हैं, भला उनसे बढ़कर मूर्ख और कौन ॥ ४८ होगा? उन्हें तो कुत्ते, घोड़े एवं सूअर आदि पशुओंके समान धर्मवाला समझना चाहिये ॥ ४८ ॥
दुर्लभ मानवतनको पाकर तथा वेदशास्त्रोंका ४ ९ अध्ययन करके भी यदि मनुष्य इस संसारमें बँधता है, तो दूसरा भला कौन बन्धनमुक्त हो सकता है? इससे बढ़कर संसारमें कोई दूसरी अद्भुत बात नहीं है ५० कि पुत्र - कलत्र और घरके बन्धनमें पड़ा हुआ भी पण्डित कहलाता है! ॥ ४ ९ -५० ॥ जो मनुष्य इस संसारमें मायाके सत्त्व, रज, तम-रूपी तीनों गुणोंसे बाँधा नहीं जाता है; वही विद्वान्, ५१ बुद्धिमान् एवं शास्त्रमें पारंगत है ॥ ५१ ॥
दृढ़ बन्धनमें डालनेवाले व्यर्थ विद्याध्ययनसे क्या लाभ? उसीका अध्ययन करना चाहिये, जो ५२ शीघ्र ही भवबन्धनसे मुक्त कर दे ॥५२ ॥
पुरुषको बन्धनमें जकड़ लेनेके कारण ही उसे गृह कहा गया है । अतः ऐसे बन्धनरूप घरमें सुख ५३ । कहाँ? हे पिताजी! इसीलिये मैं भयभीत हूँ ॥ ५३ ॥
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अ ० १४ ] प्रथम
as बुधा मन्दमतयो विधिना मुषिताश्च ये ।
ते प्राप्य मानुषं जन्म पुनर्बन्धं विशन्त्युत ॥ ५४
व्यास उवाच
न गृहं बन्धनागारं बन्धने न च कारणम् ।
मनसा यो विनिर्मुक्तो गृहस्थोऽपि विमुच्यते ॥ ५५
न्यायागतधनः कुर्वन्वेदोक्तं विधिवत्क्रमात् ।
गृहस्थोऽपि विमुच्येत श्राद्धकृत्सत्यवाक् शुचिः ॥ ५६
ब्रह्मचारी यतिश्चैव वानप्रस्थो व्रतस्थितः ।
गृहस्थं समुपासन्ते मध्याह्नातिक्रमे सदा ॥५७
श्रद्धया चान्नदानेन वाचा सूनृतया तथा ।
उपकुर्वन्ति धर्मस्था गृहाश्रमनिवासिनः ॥ ५८
गृहाश्रमात्परो धर्मो न दृष्टो न च वै श्रुतः ।
वसिष्ठादिभिराचार्यैर्ज्ञानिभिः समुपाश्रितः ॥ ५ ९
किमसाध्यं महाभाग वेदोक्तानि च कुर्वतः ।
स्वर्गं मोक्षं च सज्जन्म यद्यद्वाञ्छति तद्भवेत् ॥ ६०
आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति धर्मविदो विदुः ।
तस्मादग्निं समाधाय कुरु कर्माण्यतन्द्रितः ॥ ६१
देवान्पितृन्मनुष्यांश्च सन्तर्प्य विधिवत्सुत ।
पुत्रमुत्पाद्य धर्मज्ञ संयोज्य च गृहाश्रमे ॥ ६२
त्यक्त्वा गृहं वनं गत्वा कर्तासि व्रतमुत्तमम् ।
वानप्रस्थाश्रमं कृत्वा संन्यासं च ततः परम् ॥ ६३
इन्द्रियाणि महाभाग मादकानि सुनिश्चितम् ।
अदारस्य दुरन्तानि पञ्चैव मनसा सह ॥ ६४
स्कन्ध १४१ जो अज्ञानी, मन्दबुद्धि तथा अभागे मनुष्य हैं; वे इस मानव - जन्मको पाकर भी पुनः बन्धनमें पड़ जाते हैं ॥५४ ॥
व्यासजी बोले- गृह बन्धनागार नहीं है और न बन्धनका कारण ही है । जो मनसे बन्धनमुक्त है, वह गृहस्थ - आश्रममें रहते हुए भी मुक्त हो जाता है ॥ ५५ ॥
जो न्यायमार्ग से धनोपार्जन करता है, शास्त्रोक्त कर्मोंका विधिवत् सम्पादन करता है, पितृश्राद्ध आदि यज्ञ करता है, सर्वदा सत्य बोलता है तथा पवित्र रहता है, वह गृहमें रहते हुए भी मुक्त हो जाता है ॥५६ ॥
ब्रह्मचारी, संन्यासी, वानप्रस्थी तथा व्रतोपवास करनेवाला – ये सब मनुष्य मध्याह्नोत्तरकालमें गृहस्थके पास ही जाते हैं । वे धार्मिक गृहस्थ श्रद्धाके साथ मधुर वचनोंद्वारा सबका सत्कार करते एवं अन्नदानसे उन्हें उपकृत करते हैं ॥ ५७-५८ ॥ गृहस्थ - आश्रमसे बढ़कर कोई दूसरा आश्रम देखा या सुना नहीं गया । वसिष्ठ आदि आचार्यों और तत्त्वज्ञानियोंने इसका आश्रय ग्रहण किया है ॥ ५ ९ ॥ हे महाभाग! वेदोक्त कर्म करनेवाले गृहस्थके लिये क्या असाध्य रह जाता है? वह स्वर्ग, मोक्ष अथवा उत्तम कुलमें जन्म - जो कुछ भी चाहता है, वह हो जाता है । ' एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें जाना चाहिये ' – ऐसा धर्मज्ञोंने बताया है । अतः आलस्यरहित होकर गृहस्थसम्बन्धी कर्मोंको सम्पादित करो ॥ ६०-६१ ॥ हे धर्मज्ञ पुत्र! देवताओं, पितरों एवं आश्रित-जनको विधिवत् सन्तुष्ट करके, पुत्र उत्पन्न करके और उसे भी गृहस्थ आश्रममें लगाकर पुनः गृह त्यागकर वनमें जाकर श्रेष्ठ व्रतका आश्रय ग्रहण करो । वहाँ वानप्रस्थ - आश्रम पूर्ण करके उसके बाद संन्यास धारण करो॥६२-६३ ॥ हे महाभाग! इन्द्रियाँ मनुष्यको निश्चितरूपसे प्रमत्त बना देती हैं । जो मनुष्य स्त्रीरहित होता है, उसे । मन पाँचों इन्द्रियोंसहित विकल कर देता है ॥ ६४ ॥