देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 191–200
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200
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१८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २
दुर्लभं मानुषं जन्म भुवि ब्राह्मणसत्तम ।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये ब्राह्मणत्वं विशेषतः ॥
कुलेन शीलेन तथा श्रुतेन द्विजोत्तमस्त्वं किल धर्मविच्च । अनार्यभावं कथमागतोऽसि विप्रेन्द्र मां वीक्ष्य च मीनगन्धाम् ॥ मदीये शरीरे द्विजामोघबुद्धे शुभं किं समालोक्य पाणिं ग्रहीतुम् । समीपं समायासि कामातुरस्त्वं कथं नाभिजानासि धर्मं स्वकीयम् ॥ अहो मन्दबुद्धिर्द्विजोऽयं ग्रहीष्य-ले मग्न एवाद्य मां वै गृहीत्वा मनो व्याकुलं पञ्चबाणातिविद्धं न कोऽपीह शक्तः प्रतीपं हि कर्तुम् ॥
इति सञ्चिन्त्य सा बाला तमुवाच महामुनिम् ।
धैर्यं कुरु महाभाग परं पारं नयामि वै ॥
सूत उवाच
पराशरस्तु तच्छ्रुत्वा वचनं हितपूर्वकम् ।
करं त्यक्त्वा स्थितस्तत्र सिन्धोः पारं गतः पुनः ॥
मत्स्यगन्धां प्रजग्राह मुनि: कामातुरस्तदा ।
वेपमाना तु सा कन्या तमुवाच पुरः स्थितम् ॥
दुर्गन्धाहं मुनिश्रेष्ठ कथं त्वं नोपशङ्कसे ।
समानरूपयोः कामसंयोगस्तु सुखावहः ॥
इत्युक्तेन तु सा कन्या क्षणमात्रेण भामिनी ।
कृता योजनगन्धा तु सुरूपा च वरानना ॥
मृगनाभिसुगन्धां तां कृत्वा कान्तां मनोहराम् ।
जग्राह दक्षिणे पाणौ मुनिर्मन्मथपीडितः ॥
ग्रहीतुकामं तं प्राह नाम्ना सत्यवती शुभा ।
मुने पश्यति लोकोऽयं पिता चैव तटस्थितः ॥
पशुधर्मो न मे प्रीतिं जनयत्यतिदारुणः ।
प्रतीक्षस्व मुनिश्रेष्ठ यावद्भवति यामिनी ॥
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर मनुष्यजन्म दुर्लभ १० है । उसमें भी ब्राह्मणकुलमें जन्म लेना तो मैं विशेषरूपसे दुर्लभ मानती हूँ ॥१० ॥
हे विप्रेन्द्र! आप कुलसे, शीलसे तथा वेदाध्ययनसे एक धर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं? मुझ मत्स्यगन्धाको देखकर आप अनाचारयुक्त विचारवाले कैसे हो गये? ११ हे अमोघ बुद्धिवाले ब्राह्मण! मेरे शरीरमें स्थित किस विशेषताको देखकर आप मेरा हाथ पकड़नेके लिये कामासक्त होकर मेरी ओर चले आ रहे हैं? क्या आपको अपने धर्मका ज्ञान नहीं है? ॥ ११-१२ ॥ अहो, ये मन्दबुद्धि ब्राह्मण इस जलमें मुझे १२ पकड़नेको आतुर हो रहे हैं । मेरा स्पर्श करके
कामबाणसे आहत इनका मन व्याकुल हो उठा है ।
इस समय कोई भी इन्हें रोकनेमें समर्थ नहीं है ॥ १३ ॥
ऐसा सोचकर उस निषादकन्याने महामुनि पराशरसे कहा - हे महाभाग! आप धैर्य धारण करें; १३ मैं अभी आपको उस पार ले चलती हूँ ॥१४ ॥
सूतजी बोले- मुनि पराशर उसका हितकारी १४ वचन सुनकर उसका हाथ छोड़ करके वहीं स्थित हो गये और उस पार पहुँच गये ॥१५ ॥
तदनन्तर पराशरमुनिने मत्स्यगन्धाको पकड़ लिया । तब भयसे काँपती हुई वह कन्या सम्मुखस्थित १५ मुनिसे कहने लगी- हे मुनिवर! मैं दुर्गन्धवाली हूँ, मुझसे क्या आपको घृणा नहीं हो रही है? समान १६ रूपवालोंके बीच ही परस्पर सम्बन्ध आनन्ददायक होता है ॥ १६-१७ ॥ मत्स्यगन्धाके ऐसा कहते ही पराशरमुनिने क्षण-१७ मात्रमें अपने तपोबलसे उस भामिनी कन्याको सुमुखी, रूपवती तथा योजनगन्धा बना दिया ॥ १८ ॥
१८ उसे कस्तूरीकी सुगन्धिवाली मनोहर स्त्री बनाकर कामातुर मुनिराजने अपने दाहिने हाथसे उसे पकड़ लिया । तब सत्यवती नामवाली उस १ ९ सुन्दरीने संयोगकी कामनावाले मुनिसे कहा - हे मुने! तटपर स्थित मेरे पिता तथा सभी लोग यहाँ हमें २० देख रहे हैं ॥ १ ९ - २० ॥ हे मुनिश्रेष्ठ! यह भीषण पशुवत् व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगता । जबतक रात नहीं हो जाती, २१ । तबतक प्रतीक्षा कीजिये ॥२१ ॥
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अ ० २ ] रात्रौ व्यवाय उद्दिष्टो दिवा न मनुजस्य हि दिवासङ्गे महान् दोषः पश्यन्ति किल मानवाः कामं यच्छ महाबुद्धे लोकनिन्दा दुरासदा तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या युक्तमुक्तमुदारधीः नीहारं कल्पयामास शीघ्रं पुण्यबलेन वै नीहारे च समुत्पन्ने तटेऽतितमसा युते कामिनी तं मुनिं प्राह मृदुपूर्वमिदं वचः कन्याहं द्विजशार्दूल भुक्त्वा गन्तासि कामतः अमोघवीर्यस्त्वं ब्रह्मन् का गतिर्मे भवेदिति पितरं किं ब्रवीम्यद्य सगर्भा चेद्भवाम्यहम् त्वं गमिष्यसि भुक्त्वा मां किं करोमि वदस्व तत् पराशर उवाच कान्तेऽद्य मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यसि वृणीष्व च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भामिनि सत्यवत्युवाच यथा मे पितरौ लोके न जानीतो हि मानद कन्याव्रतं न मे हन्यात्तथा कुरु द्विजोत्तम पुत्रश्च त्वत्समः कामं भवेदद्भुतवीर्यवान् गन्धोऽयं सर्वदा मे स्याद्यौवनं च नवं नवम् । पराशर उवाच शृणु सुन्दरि पुत्रस्ते विष्ण्वंशसम्भवः शुचिः भविष्यति च विख्यातस्त्रैलोक्ये वरवर्णिनि केनचित्कारणेनाहं जातः कामातुरस्त्वयि
कदापि च न सम्मोहो भूतपूर्वो वरानने ।
दृष्ट्वा चाप्सरसां रूपं सदाहं धैर्यमावहम् ॥
दैवयोगेन वीक्ष्य त्वां कामस्य वशगोऽभवम् । तत्किञ्चित्कारणं विद्धि दैवं हि दुरतिक्रमम्
दृष्ट्वाहं चातिदुर्गन्धां त्वां कथं मोहमाप्नुयाम् ।
पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने ॥
वेदविद्भागकर्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये । द्वितीय स्कन्ध १८३ । मनुष्य के लिये कामसंसर्ग रातमें ही विहित है, ॥ २२ दिनमें नहीं । दिनमें संसर्ग करनेसे महान् दोष होता है और बहुत से लोग उसे देख भी लेते हैं ॥ २२ ॥
। हे महाबुद्धे! अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा ॥ २३ करें, लोकनिन्दा अत्यन्त कष्टकर होती है । सत्यवतीका । कहा गया युक्तिसंगत वचन सुनकर उदार बुद्धिवाले ॥ २४ पराशरमुनिने अपने पुण्यबलसे तत्क्षण कुहरा उत्पन्न कर दिया । उस कुहरेके उत्पन्न हो जानेपर अत्यन्त । अन्धकारमय नदीतटपर उस कामिनीने पराशरमुनिसे ॥ २५ मधुर वाणीमें यह वचन कहा - हे द्विजश्रेष्ठ! मैं अभी कन्या हूँ और आप मेरे साथ संसर्ग करके चले । जायँगे । हे ब्रह्मन्! आप अमोघ वीर्यवाले हैं, ऐसी ॥ २६ स्थितिमें मेरी क्या गति होगी? यदि मैं गर्भधारण कर । लूँगी तो पिताको क्या उत्तर दूँगी? हे ब्रह्मन्! मेरे साथ संसर्ग करके आप चले जायँगे तब मैं क्या करूँगी, ॥ २७ उसे बताइये? ॥ २३–२६३ ॥ पराशर बोले - हे प्रिये! आज मुझे प्रसन्न । करके भी तुम कन्या ही बनी रहोगी । हे भामिनि! हे भीरु! तुम जो वर चाहती हो, उसे माँग लो ॥ २७३ ॥
॥ २८ सत्यवती बोली- हे मानद! आप ऐसा वरदान दीजिये, जिससे मेरे माता - पिता लोकमें इसे न जान । सकें । साथ ही हे विप्रवर! आप ऐसा करें, जिससे मेरा ॥ २ ९ कन्याव्रत नष्ट न हो और जो पुत्र उत्पन्न हो, वह आपहीके समान अपूर्व ओजस्वी हो, मेरी यह सुगन्ध सदा बनी रहे और मेरा यौवन नित नूतन बना रहे ॥ २८-२९ ३ ॥ पराशर बोले – हे सुन्दरि! सुनो, तुम्हारा पुत्र ॥ ३० पवित्र तथा भगवान् विष्णुके अंशसे अवतीर्ण होगा ॥ हे सुन्दरि! वह तीनों लोकोंमें विख्यात होगा । मैं ॥ ३१ तुम्हारे ऊपर किसी कारणविशेषसे ही कामासक्त हुआ हूँ । हे सुमुखि! मुझे ऐसा मोह पूर्वमें कभी नहीं हुआ । अप्सराओंके रूपको देखकर भी मैं सदा धैर्य धारण ३२ किये रहा । दैवयोगसे ही तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार कामके वशीभूत हुआ हूँ । इस विषयमें तुम कोई ॥ ३३ विशेष कारण ही समझो, दैवका अतिक्रमण अत्यन्त कठिन है, अन्यथा अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त तुम्हें देखकर मैं इस प्रकार क्यों मोहित होता! हे वरानने! तुम्हारा ३४ पुत्र पुराणोंका रचयिता, वेदोंका विभाग करनेवाला तथा तीनों लोंकोंमें विख्यात होगा ॥ ३० - ३४३ ॥
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१८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ सूत उवाच इत्युक्त्वा तां वशं यातां भुक्त्वा स मुनिसत्तम: ॥
जगाम तरसा स्नात्वा कालिन्दीसलिले मुनिः ।
सापि सत्यवती जाता सद्यो गर्भवती सती ॥
सुषुवे यमुनाद्वीपे पुत्रं काममिवापरम् ।
जातमात्रस्तु तेजस्वी तामुवाच स्वमातरम् ॥
तपस्येव मनः कृत्वा विविशे चातिवीर्यवान् ।
गच्छ मातर्यथाकामं गच्छाम्यहमतः परम् ॥
तपः कर्तुं महाभागे दर्शयिष्यामि वै स्मृतः ।
मातर्यदा भवेत्कार्यं तव किञ्चिदनुत्तमम् ॥
स्मर्तव्योऽहं तदा शीघ्रमागमिष्यामि भामिनि ।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि त्यक्त्वा चिन्तां सुखं वस ॥
इत्युक्त्वा निर्ययौ व्यासः सापि पित्रन्तिकं गता ।
द्वीपे न्यस्तस्तया बालस्तस्माद् द्वैपायनोऽभवत् ॥
जातमात्रो जगामाशु वृद्धिं विष्णवंशयोगतः ।
तीर्थे तीर्थे कृतस्नानश्चचार तप उत्तमम् ॥
एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात् ।
चकार वेदशाखाश्च प्राप्तं ज्ञात्वा कलेर्युगम् ॥
वेदविस्तारकरणाद्व्यासनामाभवन्मुनिः 1 पुराणसंहिताश्चक्रे महाभारतमुत्तमम् ॥
शिष्यानध्यापयामास वेदान्कृत्वा विभागशः ।
सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च ॥
असितं देवलं चैव शुकं चैव स्वमात्मजम् । सूतजी बोले- ऐसा कहकर अपने वशमें ३५ आयी हुई उस कन्याके साथ संसर्ग करके मुनिश्रेष्ठ पराशर तत्काल यमुनानदीमें स्नानकर वहाँसे शीघ्र चले गये । वह साध्वी सत्यवती भी तत्काल गर्भवती ३६ हो गयी ॥ ३५-३६ ॥ [ यथासमय ] सत्यवतीने यमुनाजीके द्वीपमें दूसरे कामदेवके तुल्य एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया । उत्पन्न होते ही उस तेजवान् पुत्रने अपनी मातासे ३७ कहा - हे माता! मनमें तपस्याका निश्चय करके ही अत्यन्त तेजस्वी मैं गर्भमें प्रविष्ट हुआ था । हे महाभागे! अब आप अपनी इच्छानुसार कहीं भी ३८ | चली जायँ और मैं भी यहाँसे तप करनेके लिये जा रहा हूँ । हे माता! आपके स्मरण करनेपर मैं अवश्य ही दर्शन दूँगा । हे माता! जब कोई उत्तम कार्य आ ३ ९ पड़े तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा, मैं शीघ्र ही उपस्थित हो जाऊँगा । हे भामिनि! आपका कल्याण हो, अब मैं चलूँगा । आप चिन्ता छोड़कर सुखपूर्वक ४० रहिये ॥ ३७–४० ॥ ऐसा कहकर व्यासजी चले गये और वह सत्यवती भी अपने पिताके पास चली गयी । सत्यवतीने ४१ बालकको यमुनाद्वीपमें जन्म दिया था । अतः वह बालक ' द्वैपायन ' नामसे विख्यात हुआ ॥ ४१ ॥
विष्णुभगवान्के अंशावतार होनेके कारण वह बालक उत्पन्न होते ही शीघ्र बड़ा हो गया तथा ४२ अनेक तीर्थोंमें स्नान करता हुआ उत्तम तप करने लगा ॥ ४२ ॥
इस प्रकार पराशरमुनिके द्वारा सत्यवतीके ४३ गर्भसे द्वैपायन उत्पन्न हुए और उन्होंने ही कलि-युगको आया जानकर वेदोंको अनेक शाखाओंमें विभक्त किया, वेदोंका विस्तार करनेके कारण ही ४४ उन मुनिका नाम ' व्यास ' पड़ गया । उन्होंने ही विभिन्न पुराणसंहिताओं तथा श्रेष्ठ महाभारतकी रचना की । उन्होंने ही वेदोंके अनेक विभाग ४५ करके उसे अपने शिष्यों – सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, असित, देवल और अपने पुत्र शुकदेवजीको पढ़ाया ॥ ४३ – ४५३ ॥
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अ ० ३ ] द्वितीय सूत उवाच एतच्च कथितं सर्वं कारणं मुनिसत्तमाः ॥ ४६
सत्यवत्याः सुतस्यापि समुत्पत्तिस्तथा शुभा ।
संशयोऽत्र न कर्तव्यः सम्भवे मुनिसत्तमाः ॥ ४७
महतां चरिते चैव गुणा ग्राह्या मुनेरिति ।
कारणाच्च समुत्पत्तिः सत्यवत्या झषोदरे ॥ ४८
पराशरेण संयोगः पुनः शन्तनुना तथा ।
अन्यथा तु मुनेश्चित्तं कथं कामाकुलं भवेत् ॥ ४ ९
अनार्यजुष्टं धर्मज्ञः कृतवान्स कथं मुनिः ।
सकारणेयमुत्पत्तिः कथिताश्चर्यकारिणी ॥ ५०
श्रुत्वा पापाच्च निर्मुक्तो नरो भवति सर्वथा ।
य एतच्छुभमाख्यानं शृणोति श्रुतिमान्नरः ॥ ५१
न दुर्गतिमवाप्नोति सुखी भवति सर्वदा ॥ ५२
स्कन्ध १८५ सूतजी बोले- हे श्रेष्ठ मुनियो! मैंने यह सब उत्पत्तिका कारण आपलोगोंसे बता दिया, साथ ही सत्यवतीके पुत्र व्यासजीकी पवित्र उत्पत्तिका वर्णन कर दिया है । हे श्रेष्ठ मुनिगण! व्यासजीकी इस उत्पत्तिके विषयमें आपलोगोंको सन्देह नहीं करना चाहिये । महापुरुषोंके चरितसे केवल गुण ही ग्रहण करना चाहिये । किसी विशेष कारणसे ही मुनि व्यासका तथा मछलीके उदरसे सत्यवतीका जन्म, पराशरमुनिके साथ उनका संयोग और फिर राजा शन्तनुके साथ उनका विवाह हुआ । अन्यथा मुनि पराशरका चित्त कामासक्त ही क्यों होता? और धर्मके ज्ञाता वे महामुनि पराशर अनार्य लोगोंद्वारा आचरित किया जानेवाला ऐसा कृत्य क्यों करते! किसी विशेष कारणसे युक्त तथा आश्चर्यकारिणी यह उत्पत्ति मैंने बता दी, जिसे सुनकर मनुष्य निश्चितरूपसे पापसे मुक्त हो जाता है । जो श्रुतिपरायण मनुष्य इस शुभ आख्यानको सुनता है; वह दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता है तथा सर्वदा सुखी रहता है॥४६–५२ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे व्यासजन्मवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः राजा शन्तनु, गंगा और ऋषय ऊचुः
उत्पत्तिस्तु त्वया प्रोक्ता व्यासस्यामिततेजसः ।
सत्यवत्यास्तथा सूत विस्तरेण त्वयानघ ॥ १
तथाप्येकस्तु सन्देहश्चित्तेऽस्माकं तु संस्थितः ।
न निवर्तति धर्मज्ञ कथितेन त्वयानघ ॥ २
माता व्यासस्य या प्रोक्ता नाम्ना सत्यवती शुभा ।
सा कथं नृपतिं प्राप्ता शन्तनुं धर्मवित्तमम् ॥ ३
निषादपुत्रीं स कथं वृतवान्नृपतिः स्वयम् ।
धर्मिष्ठः पौरवो राजा कुलहीनामसंवृताम् ॥ ४
शन्तनोः प्रथमा पत्नी का ह्यभूत्कथयाधुना ।
भीष्मः पुत्रोऽथ मेधावी वसोरंशः कथं पुनः ॥ ५
भीष्मके पूर्वजन्मकी कथा ऋषिगण बोले- हे सूतजी! हे अनघ! यद्यपि आपने परम तेजस्वी व्यास तथा सत्यवतीके जन्मकी कथा विस्तारपूर्वक कही तथापि हमलोगोंके चित्तमें एक बड़ी भारी शंका बनी हुई है । हे धर्मज्ञ! हे अनघ! वह शंका आपके कहनेपर भी दूर नहीं हो रही है ॥ १-२ ॥ व्यासजीकी कल्याणमयी माता जो सत्यवती नामसे जानी जाती थीं, वे धर्मात्मा राजा शन्तनुको कैसे प्राप्त हुईं? कुल तथा आचरणसे हीन उस निषादकन्याका पुरुकुलमें उत्पन्न उन धर्मात्मा राजाने स्वयं कैसे वरण कर लिया? ॥ ३४ ॥
आप कृपा करके हमलोगोंको यह भी बतलाइये कि राजा शन्तनुकी पहली पत्नी कौन थी? वसुके । अंशसे उत्पन्न मेधावी भीष्म उनके पुत्र कैसे हुए? ॥ ५ ॥
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१८६ त्वया प्रोक्तं पुरा सूत राजा चित्राङ्गदः कृतः सत्यवत्याः सुतो वीरो भीष्मेणामिततेजसा चित्राङ्गदे हते वीरे कृतस्तदनुजस्तथा विचित्रवीर्यनामासौ सत्यवत्याः सुतो नृपः ज्येष्ठे भीष्मे स्थिते पूर्वं धर्मिष्ठे रूपवत्यपि कृतवान्स कथं राज्यं स्थापितस्तेन जानता
मृते विचित्रवीर्ये तु सत्यवत्यतिदुःखिता ।
वधूभ्यां गोलकौ पुत्रौ जनयामास सा कथम् ॥
कथं राज्यं न भीष्माय ददौ सा वरवर्णिनी ।
न कृतस्तु कथं तेन वीरेण दारसंग्रहः ॥
अधर्मस्तु कृतः कस्माद्व्यासेनामिततेजसा ।
ज्येष्ठेन भ्रातृभार्यायां पुत्रावुत्पादिताविति ॥
पुराणकर्ता धर्मात्मा स कथं कृतवान्मुनिः ।
सेवनं परदाराणां भ्रातुश्चैव विशेषतः ॥
जुगुप्सितमिदं कर्म स कथं कृतवान्मुनिः ।
शिष्टाचारः कथं सूत वेदानुमितिकारकः ॥
व्यासशिष्योऽसि मेधाविन् सन्देहं छेत्तुमर्हसि ।
श्रोतुकामा वयं सर्वे धर्मक्षेत्रे कृतक्षणाः ॥
सूत उवाच
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो महाभिष इति स्मृतः ।
सत्यवान्धर्मशीलश्च चक्रवर्ती नृपोत्तमः ॥
अश्वमेधसहस्त्रेण वाजपेयशतेन च ।
तोषयामास देवेन्द्रं स्वर्गं प्राप महामतिः ॥
एकदा ब्रह्मसदनं गतो राजा महाभिषः ।
सुरा: सर्वे समाजग्मुः सेवनार्थं प्रजापतिम् ॥
गङ्गा महानदी तत्र संस्थिता सेवितुं विभुम् ।
तस्या वासः समुद्धूतं मारुतेन तरस्विना ॥
अधोमुखाः सुराः सर्वे न विलोक्यैव तां स्थिताः ।
राजा महाभिषस्तां तु निःशङ्कः समपश्यत ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ । हे सूतजी! आप यह पहले ही कह चुके हैं कि । ६ सत्यवतीके वीर पुत्र चित्रांगदको अमित तेजवाले भीष्म राजा बनाया था और वीर चित्रांगदके मारे । जानेपर उसके अनुज तथा सत्यवतीके पुत्र विचित्रवीर्यको ॥ ७ उन्होंने राजा बनाया॥६-७ ॥ । रूपसम्पन्न तथा ज्येष्ठ पुत्र धर्मात्मा भीष्मके रहते ॥ ८ हुए विचित्रवीर्यने राज्य कैसे किया और सब कुछ जानते हुए भी भीष्मने उन्हें राज्यपर कैसे स्थापित किया? ॥ ८ ॥
विचित्रवीर्यके मरनेपर अत्यन्त दुःखित माता ९ सत्यवतीने अपनी दोनों पुत्रवधुओंसे दो गोलक पुत्र कैसे उत्पन्न कराये? ॥ ९ ॥
उन सुन्दरी सत्यवतीने उस समय ज्येष्ठ पुत्र १० भीष्मको राजा क्यों नहीं बनाया और उन पराक्रमी भीष्मने अपना विवाह क्यों नहीं किया? ॥ १० ॥
११ अमित तेजस्वी बड़े भाई व्यासजीने ऐसा अधर्म क्यों किया जो कि उन्होंने नियोगद्वारा दो पुत्र उत्पन्न किये? ॥ ११ ॥
१२ पुराणोंके रचयिता व्यासमुनिने धर्मज्ञ होते हुए भी ऐसा कार्य क्यों किया; हे सूतजी! क्या यही वेदोंसे १३ अनुमोदित शिष्टाचार है? ॥ १२-१३ ॥ हे मेधाविन्! आप व्यासजीके शिष्य हैं, इसलिये आप हमारी इन सभी शंकाओंका समाधान करनेमें १४ समर्थ हैं । हम सभी इस धर्मक्षेत्रमें इन प्रश्नोंके उत्तर सुननेको उत्सुक हो रहे हैं ॥१४ ॥
सूतजी बोले - [ हे मुनियो! ] इक्ष्वाकुकुलमें महाभिष नामके एक सत्यवादी, धर्मात्मा और चक्रवर्ती १५ राजा उत्पन्न हुए - ऐसा कहा जाता है ॥ १५ ॥
उन बुद्धिमान् राजाने हजारों अश्वमेध तथा १६ सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करके इन्द्रको सन्तुष्ट किया और स्वर्ग प्राप्त किया था ॥ १६ ॥
एक बार राजा महाभिष ब्रह्मलोक गये । वहाँ १७ प्रजापतिकी सेवाके लिये सभी देवता आये हुए थे । उस समय देवनदी गंगाजी भी ब्रह्माजीकी सेवामें १८ उपस्थित थीं । उस समय तीव्रगामी पवनने उनका वस्त्र उड़ा दिया । सभी देवता अपना सिर नीचा किये उन्हें बिना देखे खड़े रहे, किंतु राजा महाभिष निःशंक १ ९ । भावसे उनकी ओर देखते रह गये ॥ १७-१९ ॥
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अ ० ३ ] द्वितीय
सापि तं प्रेमसंयुक्तं नृपं ज्ञातवती नदी ।
दृष्ट्वा तौ प्रेमसंयुक्तौ निर्लज्जौ काममोहितौ ॥ २०
ब्रह्मा चुकोप तौ तूर्णं शशाप च रुषान्वितः ।
मर्त्यलोकेषु भूपाल जन्म प्राप्य पुनर्दिवम् ॥ २१
पुण्येन महताविष्टस्त्वमवाप्स्यसि सर्वथा ।
गङ्गां तथोक्तवान्ब्रह्मा वीक्ष्य प्रेमवतीं नृपे ॥ २२
विमनस्कौ तु तौ तूर्णं निःसृतौ ब्रह्मणोऽन्तिकात् ।
स नृपांश्चिन्तयित्वाथ भूर्लोके धर्मतत्परान् ॥ २३
प्रतीपं चिन्तयामास पितरं पुरुवंशजम् ।
एतस्मिन्समये चाष्टौ वसवः स्त्रीसमन्विताः ॥ २४
वसिष्ठस्याश्रमं प्राप्ता रममाणा यदृच्छया ।
पृथ्वादीनां वसूनां च मध्ये कोऽपि वसूत्तमः ॥ २५
द्यौर्नामा तस्य भार्याथ नन्दिनीं गां ददर्श ह ।
दृष्ट्वा पतिं सा पप्रच्छ कस्येयं धेनुरुत्तमा ॥ २६
द्यौस्तामाह वसिष्ठस्य गौरियं शृणु सुन्दरि ।
दुग्धमस्याः पिबेद्यस्तु नारी वा पुरुषोऽथ वा ॥ २७
अयुतायुर्भवेन्नूनं सदैवागतयौवनः ।
तच्छ्रुत्वा सुन्दरी प्राह मृत्युलोकेऽस्ति मे सखी ॥ २८
उशीनरस्य राजर्षेः पुत्री परमशोभना ।
तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां पयस्विनीम् ॥ २ ९
आनयस्वाश्रमं श्रेष्ठं नन्दिनीं कामदां शुभाम् ।
यावदस्याः पयः पीत्वा सखी मम सदैव हि ॥ ३०
मानुषेषु भवेदेका जरारोगविवर्जिता ।
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या द्यौर्जहार च नन्दिनीम् ॥ ३१
अवमन्य मुनिं दान्तं पृथ्वाद्यैः सहितोऽनघः ।
हृतायामथ नन्दिन्यां वसिष्ठस्तु महातपाः ॥ ३२
आजगामाश्रमपदं फलान्यादाय सत्वरः ।
नापश्यत यदा धेनुं सवत्सां स्वाश्रमे मुनिः ॥ ३३
स्कन्ध १८७ उन गंगानदीने भी राजाको अपनेपर प्रेमासक्त जाना । उन दोनोंको इस प्रकार मुग्ध देखकर ब्रह्माजी क्रोधित हो गये और कोपाविष्ट होकर शीघ्र ही उन दोनोंको शाप दे दिया— हे राजन्! मनुष्यलोकमें तुम्हारा जन्म होगा । वहाँ जब तुम अधिक पुण्य एकत्र कर लोगे, तब पुनः स्वर्गलोकमें आओगे । गंगाको महाभिष-राजापर प्रेमासक्त जानकर ब्रह्माजीने उन्हें [ गंगाको ] भी उसी प्रकार शाप दे दिया । २०-२२ ॥ इस प्रकार वे दोनों दुःखी मनसे ब्रह्माजीके पाससे शीघ्र ही चले गये । राजा अपने मनमें सोचने लगे कि इस मृत्युलोकमें कौन ऐसे राजा हैं, जो धर्मपरायण हैं । ऐसा विचारकर उन्होंने पुरुवंशीय महाराज ' प्रतीप ' को ही पिता बनानेका निश्चय कर लिया । इसी बीच आठों वसु अपनी - अपनी स्त्रीके साथ विहार करते हुए स्वेच्छया महर्षि वसिष्ठके आश्रमपर आ पहुँचे । उन पृथु आदि वसुओंमें ' द्यौ ' नामक एक श्रेष्ठ वसु थे । उनकी पत्नीने ' नन्दिनी ' गौको देखकर अपने पतिसे पूछा कि यह सुन्दर गाय किसकी है? ॥२३–२६ ॥ द्यौने उससे कहा- हे सुन्दरि! सुनो, यह महर्षि वसिष्ठजीकी गाय है । इस गायका दूध स्त्री या पुरुष जो कोई भी पीता है, उसकी आयु दस हजार वर्षकी हो जाती है और उसका यौवन सर्वदा बना रहता है । यह सुनकर उस सुन्दरी स्त्रीने कहा- मृत्युलोकमें मेरी एक सखी है । मेरी वह सखी राजर्षि उशीनरकी परम सुन्दरी कन्या है । हे महाभाग! उसके लिये अत्यन्त सुन्दर तथा सब प्रकारकी कामनाओंको देनेवाली इस गायको बछड़े - सहित अपने आश्रममें ले चलिये । जब मेरी सखी इसका दूध पीयेगी तब वह निर्जरा एवं रोगरहित होकर मनुष्योंमें एकमात्र अद्वितीय बन जायगी । उसका वचन सुनकर द्यौ नामके वसुने ' पृथु • ' आदि अष्टवसुओंके साथ जितेन्द्रिय मुनिका अपमान करके नन्दिनीका अपहरण कर लिया ॥ २७–३१३ ॥ नन्दिनीका हरण हो जानेपर महातपस्वी वसिष्ठ फल लेकर शीघ्र ही अपने आश्रम आ गये । जब मुनिने अपने आश्रममें बछड़े सहित नन्दिनीगायको नहीं | देखा तब वे तेजस्वी वनों एवं गुफाओंमें उसे ढूँढ़ने
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१८८ मृगयामास तेजस्वी गह्वरेषु वनेष्वपि । नासादिता यदा धेनुश्चुकोपातिशयं मुनिः वारुणिश्चापि विज्ञाय ध्यानेन वसुभिर्हताम् । वसुभिर्मे हृता धेनुर्यस्मान्मामवमन्य वै
तस्मात्सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः ।
एवं शशाप धर्मात्मा वसूंस्तान्वारुणिः स्वयम् ॥
श्रुत्वा विमनसः सर्वे प्रययुर्दुः खिताश्च ते ।
शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः ॥
प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः शरणं गताः ।
मुनिस्तानाह धर्मात्मा वसून्दीनान्पुरः स्थितान् ॥
अनुसंवत्सरं सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ ।
येनेयं विहृता धेनुर्नन्दिनी मम वत्सला ॥
तस्माद् द्यौर्मानुषे देहे दीर्घकालं वसिष्यति ।
ते शप्ताः पथि गच्छन्तीं गङ्गां दृष्ट्वा सरिद्वराम् ॥
ऊचुस्तां प्रणताः सर्वे शप्तां चिन्तातुरां नदीम् ।
भविष्यामो वयं देवि कथं देवाः सुधाशनाः ॥
मानुषाणां च जठरे चिन्तेयं महती हि नः ।
तस्मात्त्वं मानुषी भूत्वा जनयास्मान्सरिद्वरे ॥
शन्तनुर्नाम राजर्षिस्तस्य भार्या भवानघे ।
जाताञ्जाताञ्जले चास्मान्निः क्षिपस्व सुरापगे ॥
एवं शापविनिर्मोक्षो भविता नात्र संशयः ।
तथेत्युक्ताश्च ते सर्वे जग्मुर्लोकं स्वकं पुनः ॥
गङ्गापि निर्गता देवी चिन्त्यमाना पुनः पुनः ।
महाभिषो नृपो जातः प्रतीपस्य सुतस्तदा ॥
शन्तनुर्नाम राजर्षिर्धर्मात्मा सत्यसङ्गरः ।
प्रतीपस्तु स्तुतिं चक्रे सूर्यस्यामिततेजसः ॥
तदा च सलिलात्तस्मान्निःसृता वरवर्णिनी I दक्षिणं शालसंकाशमूरुं भेजे शुभानना ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३ लगे, जब वह गाय नहीं मिली तब वरुणपुत्र मुनि ॥ ३४ वसिष्ठजी ध्यानयोगसे उसे वसुओंके द्वारा हरी गयी जानकर अत्यन्त कुपित हुए । वसुओंने मेरी अवमानना करके मेरी गौ चुरा ली है । वे सभी मानवयोनिमें जन्म ॥ ३५ ग्रहण करेंगे, इसमें सन्देह नहीं है । इस प्रकार धर्मात्मा वसिष्ठजीने उन वसुओंको शाप दिया ॥ ३२-३६ ॥ यह सुनकर वे सभी वसु खिन्नमनस्क और दुःखित ३६ । हो गये और वहाँसे चल दिये । हमें शाप दे दिया गया है - यह जानकर वे ऋषि वसिष्ठके पास पहुँचे और ३७ उन्हें प्रसन्न करते हुए वे सभी वसु उनके शरणागत हो गये । तब धर्मात्मा मुनि वसिष्ठजीने उन सामने खड़े वसुओंको देखकर कहा— - तुमलोगोंमेंसे [ सात वसु ] ३८ एक - एक वर्षके अन्तरालसे ही शापसे मुक्त हो जायँगे; परंतु जिसने मेरी प्रिय सवत्सा नन्दिनीका अपहरण किया है, वह ' द्यौ ' नामक वसु मनुष्य- शरीरमें ही ३ ९ बहुत दिनोंतक रहेगा ॥ ३७–३९ ३ । उन अभिशप्त वसुओंने मार्गमें जाती हुई नदियोंमें ४० उत्तम गंगाजीको देखकर उन अभिशप्त तथा चिन्तातुर गंगाजी प्रणामपूर्वक कहा - हे देवि! अमृत पीनेवाले हम देवता मानवकुक्षिसे कैसे उत्पन्न होंगे, यह हमें ४१ महान् चिन्ता है, अतः हे नदियोंमें श्रेष्ठ! आप ही मानुषी बनकर हमलोगोंको जन्म दें । पृथ्वीपर शन्तनु नामक एक राजर्षि हैं, हे अनघे! आप उन्हींकी भार्या ४२ बन जायँ और हे सुरापगे! हमें क्रमशः जन्म लेनेपर आप जलमें छोड़ती जायँ । आपके ऐसा करनेसे ४३ हमलोग भी शापसे मुक्त हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है । गंगाजीने जब उनसे ' तथास्तु ' कह दिया तब वे सब वसु अपने - अपने लोकको चले गये और ४४ | गंगाजी भी बार- बार विचार करती हुई वहाँसे चली गयीं ॥ ४०–४४३ ॥ उस समय राजा महाभिषने राजा प्रतीपके पुत्रके ४५ रूपमें जन्म लिया । उन्हींका नाम शन्तनु पड़ा, जो सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा राजर्षि हुए । महाराज प्रतीपने ४६ । परम तेजस्वी भगवान् सूर्यकी आराधना की । उस समय जलमेंसे एक परम सुन्दर स्त्री निकल पड़ी और वह सुमुखी आकर तुरंत ही महाराजके शाल वृक्षके ४७ समान विशाल दाहिने जंघेपर विराजमान हो गयी ।
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अ ० ३ ] द्वितीय स्कन्ध १८ ९
अङ्के स्थितां स्त्रियं चाह मा पृष्ट्वा किं वरानने ।
ममोरावास्थितासि त्वं किमर्थं दक्षिणे शुभे ॥
सा तमाह वरारोहा यदर्थं राजसत्तम ।
स्थितास्म्यङ्के कुरुश्रेष्ठ कामयानां भजस्व माम् ॥
तामवोचदथो राजा रूपयौवनशालिनीम् ।
नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनीम् ॥
स्थिता दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्य च भामिनि ।
अपत्यानां स्नुषाणां च स्थानं विद्धि शुचिस्मिते ॥
स्नुषा मे भव कल्याणि जाते पुत्रेऽतिवाञ्छिते ।
भविष्यति च मे पुत्रस्तव पुण्यान्न संशयः ॥
तथेत्युक्त्वा गता सा वै कामिनी दिव्यदर्शना ।
राजा चापि गृहं प्राप्तश्चिन्तयंस्तां स्त्रियं पुनः ॥
ततः कालेन कियता जाते पुत्रे वयस्विनि ।
वनं जिगमिषू राजा पुत्रं वृत्तान्तमूचिवान् ॥
वृत्तान्तं कथयित्वा तु पुनरूचे निजं सुतम् ।
यदि प्रयाति सा बाला त्वां वने चारुहासिनी ॥
कामयाना वरारोहा तां भजेथा मनोरमाम् ।
न प्रष्टव्या त्वया कासि मन्नियोगान्नराधिप ॥
धर्मपत्नीं च तां कृत्वा भविता त्वं सुखी किल । सूत उवाच एवं सन्दिश्य तं पुत्रं भूपतिः प्रीतमानसः ॥
दत्त्वा राज्यश्रियं सर्वां वनं राजा विवेश ह ।
तत्रापि च तपस्तप्त्वा समाराध्य पराम्बिकाम् ॥
जगाम स्वर्गं राजासौ देहं त्यक्त्वा स्वतेजसा ।
राज्यं प्राप महातेजाः शन्तनुः सार्वभौमिकम् ॥
प्रजां वै पालयामास धर्मदण्डो महीपतिः ॥
अंकमें बैठी हुई उस स्त्रीसे राजाने पूछा - ' हे ४८ वरानने! तुम मुझसे बिना पूछे ही मेरे शुभ दाहिने जंघेपर क्यों बैठ गयी? ' ॥ ४५ – ४८ ॥ उस सुन्दरीने उनसे कहा – ' हे नृपश्रेष्ठ! हे ४ ९ कुरुश्रेष्ठ! मैं जिस कामनासे आपके अंकमें बैठी हूँ, उस कामनावाली मुझे आप स्वीकार करें ' ॥ ४ ९ ॥ उस रूपयौवनसम्पन्ना सुन्दरीसे राजाने कहा-५० ‘ मैं किसी सुन्दरी परस्त्रीको कामकी इच्छासे नहीं स्वीकार करता ' ॥ ५० ॥
हे भामिनि! हे शुचिस्मिते! तुम मेरे दाहिने ५१ जंघेपर प्रेमपूर्वक आकर बैठ गयी हो, उसे तुम पुत्रों तथा पुत्रवधुओंका स्थान समझो । अतः हे कल्याणि! ५२ मेरे मनोवांछित पुत्रके उत्पन्न होनेपर तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ । तुम्हारे पुण्यसे मुझे पुत्र हो जायगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ५१-५२ ॥ ५३ वह दिव्य दर्शनवाली कामिनी ' तथास्तु ' कहकर चली गयी और उस स्त्रीके विषयमें सोचते हुए राजा प्रतीप भी अपने घर चले गये ॥ ५३ ॥
५४ समय बीतनेपर पुत्रके युवा होनेपर वन जानेकी इच्छावाले राजाने अपने पुत्रको वह समस्त पूर्व ५५ वृत्तान्त कह सुनाया ॥५४ ॥
सारी बात बताकर राजाने अपने पुत्रसे कहा-' यदि वह सुन्दरी बाला तुम्हें कभी वनमें मिले और ५६ | अपनी अभिलाषा प्रकट करे तो उस मनोरमाको स्वीकार कर लेना तथा उससे मत पूछना कि तुम कौन हो? यह मेरी आज्ञा है, उसे अपनी धर्मपत्नी बनाकर तुम सुखी रहोगे ' ॥ ५५-५६३ ॥ ५७ सूतजी बोले- इस प्रकार अपने पुत्रको आदेश देकर महाराज प्रतीप प्रसन्नताके साथ उन्हें सारा राज्य - वैभव सौंपकर वनको चले गये । वहाँ जाकर ५८ वे तप करके तथा आदिशक्ति भगवती जगदम्बिकाकी आराधना करके अपने तेजसे शरीर छोड़कर स्वर्ग ५ ९ चले गये । महातेजस्वी राजा शन्तनुने सार्वभौम राज्य प्राप्त किया और वे धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ६० | करने लगे ॥ ५७–६० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे प्रतीपसकाशाच्छन्तनुजन्मवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
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१ ९ ० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ अथ चतुर्थोऽध्यायः गंगाजीद्वारा राजा शन्तनुका पतिरूपमें वरण, सात पुत्रोंका जन्म तथा गंगाका उन्हें अपने जलमें प्रवाहित करना, आठवें पुत्रके रूपमें भीष्मका जन्म तथा उनकी शिक्षा - दीक्षा सूत उवाच प्रतीपेऽथ दिवं याते शन्तनुः सत्यविक्रमः बभूव मृगयाशीलो निघ्नन्व्याघ्रान्मृगान्नृपः स कदाचिद्वने घोरे गङ्गातीरे चरन्नृपः ददर्श मृगशावाक्षीं सुन्दरीं चारुभूषणाम् ॥ दृष्ट्वा तां नृपतिर्मग्नः पित्रोक्तेयं वरानना । रूपयौवनसम्पन्ना साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा पिबन्मुखाम्बुजं तस्या न तृप्तिमगमन्नृपः । हृष्टरोमाभवत्तत्र व्याप्तचित्त इवानघः
महाभिषं सापि मत्वा प्रेमयुक्ता बभूव ह ।
किञ्चिन्मन्दस्मितं कृत्वा तस्थावग्रे नृपस्य च ॥
वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं राजा प्रीतमना भृशम् ।
उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वयन् श्लक्ष्णया गिरा ॥
देवी वा त्वं च वामोरु मानुषी वा वरानने ।
गन्धर्वी वाथ यक्षी वा नागकन्याप्सरापि वा ॥
यासि कासि वरारोहे भार्या मे भव सुन्दरि ।
प्रेमयुक्तस्मितैव त्वं धर्मपत्नी भवाद्य मे ॥
सूत उवाच
राजा तां नाभिजानाति गङ्गेयमिति निश्चितम् ।
महाभिषं समुत्पन्नं नृपं जानाति जाह्नवी ॥
पूर्वप्रेमसमायोगाच्छ्रुत्वा वाचं नृपस्य ताम् ।
उवाच नारी राजानं स्मितपूर्वमिदं वचः ॥
स्त्र्युवाच
जानामि त्वां नृपश्रेष्ठ प्रतीपतनयं शुभम् ।
का न वाञ्छति चार्वङ्गी भावित्वात्सदृशं पतिम् ॥
सूतजी बोले- प्रतीपके स्वर्ग चले जानेपर । सत्यपराक्रमी राजा शन्तनु व्याघ्र तथा मृगोंको मारते ॥ १ हुए मृगयामें तत्पर हो गये ॥१ ॥
किसी समय गंगा के किनारे घने वनमें विचरण । करते हुए राजाने मृगके बच्चे- जैसी आँखोंवाली तथा २ सुन्दर आभूषणोंसे युक्त एक सुन्दर स्त्रीको देखा ॥ २ ॥
उसे देखकर राजा शन्तनु हर्षित हो गये और सोचने लगे कि साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान रूप-॥ ३ यौवनसे सम्पन्न यह स्त्री वही है, जिसके विषय में पिताजीने मुझे बताया था ॥ ३ ॥
॥ ४ उसके मुखकमलका पान करते हुए राजा तृप्त नहीं हुए । हर्षातिरेकसे उन निष्पाप राजाको रोमांच हो गया और उनका चित्त उस स्त्रीमें रम गया ॥४ ॥
५ वह स्त्री भी उन्हें राजा महाभिष जानकर प्रेमासक्त हो गयी । वह मन्द मन्द मुसकराती हुई राजा सामने खड़ी हो गयी । उस सुन्दरीको देखकर राजा ६ अत्यन्त प्रेमविवश हो गये तथा कोमल वाणीसे उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वचन कहने लगे ॥ ५-६ ॥ हे वामोरु! हे सुमुखि! तुम कोई देवी, मानुषी, 67 गन्धर्वी, यक्षी, नागकन्या अथवा अप्सरा तो नहीं हो । हे वरारोहे! तुम जो कोई भी हो, मेरी भार्या बन ८ जाओ । हे सुन्दरि! तुम प्रेमपूर्वक मुसकरा रही हो; अब मेरी धर्मपत्नी बन जाओ ॥ ७-८ ॥ सूतजी बोले - राजा शन्तनु तो निश्चितरूपसे नहीं जान सके कि ये वे ही गंगा हैं, किंतु गंगाने उन्हें ९ पहचान लिया कि ये शन्तनुके रूपमें उत्पन्न वही राजा महाभिष हैं । पूर्वकालीन प्रेमवश राजा शन्तनुके उस वचनको सुनकर उस स्त्रीने मन्द मुसकान करके १० | यह वचन कहा ॥ ९ -१० ॥ स्त्री बोली - हे नृपश्रेष्ठ! मैं यह जानती हूँ कि आप महाराज प्रतीपके योग्य पुत्र हैं । अतः भला कौन ऐसी स्त्री होगी, जो संयोगवश अपने अनुरूप पुरुषको ११ । पाकर भी उसे पतिरूपमें स्वीकार न करेगी ॥११ ॥
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अ ० ४ ]
वाग्बन्धेन नृपश्रेष्ठ वरिष्यामि पतिं किल ।
शृणु मे समयं राजन् वृणोमि त्वां नृपोत्तम ॥
यच्च कुर्यामहं कार्यं शुभं वा यदि वाशुभम् ।
न निषेध्या त्वया राजन्न वक्तव्यं तथाप्रियम् ॥
यदा च त्वं नृपश्रेष्ठ न करिष्यसि मे वचः ।
तदा मुक्त्वा गमिष्यामि यथेष्टदेशं मारिष ॥
स्मृत्वा जन्म वसूनां सा प्रार्थनापूर्वकं हृदि ।
महाभिषस्य प्रेमाथ विचिन्त्यैव च जाह्नवी ॥
तथेत्युक्ताथ सा देवी चकार नृपतिं पतिम् ।
एवं वृता नृपेणाथ गङ्गा मानुषरूपिणी ॥
नृपस्य मन्दिरं प्राप्ता सुभगा वरवर्णिनी ।
नृपतिस्तां समासाद्य चिक्रीडोपवने शुभे ॥
सापि तं रमयामास भावज्ञा वै वराङ्गना ।
न बुबोध नृपः क्रीडन्गतान्वर्षगणानथ ॥
स तया मृगशावाक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा ।
सा सर्वगुणसम्पन्ना सोऽपि कामविचक्षणः ॥
रेमाते मन्दिरे दिव्ये रमानारायणाविव ।
एवं गच्छति काले सा दधार नृपतेस्तदा ॥
गर्भं गङ्गा वसुं पुत्रं सुषुवे चारुलोचना ।
जातमात्रं सुतं वारि चिक्षेपैवं द्वितीयके ॥
तृतीयेऽथ चतुर्थेऽथ पञ्चमे षष्ठ एव च ।
सप्तमे वा हते पुत्रे राजा चिन्तापरोऽभवत् ॥
किं करोम्यद्य वंशो मे कथं स्यात्सुस्थिरो भुवि ।
सप्त पुत्रा हता नूनमनया पापरूपया ॥
द्वितीय स्कन्ध १ ९ १ हे नृपश्रेष्ठ! वचनबद्ध करके ही मैं आपको १२ अपना पति स्वीकार करूँगी । हे राजन्! हे नृपोत्तम! अब आप मेरी शर्त सुनिये, जिससे मैं आपका वरण कर सकूँ ॥१२ ॥
१३ हे राजन्! मैं भला - बुरा जो भी कार्य करूँ, आप मुझे मना नहीं करेंगे तथा न कोई अप्रिय बात ही कहेंगे । जिस समय आप मेरा यह वचन नहीं मानेंगे, उसी समय हे मान्य नृपश्रेष्ठ! मैं १४ आपको त्यागकर जहाँ चाहूँगी, उस जगह चली जाऊँगी ॥ १३-१४ ॥ उस समय प्रार्थनापूर्वक वसुओंके जन्म ग्रहण १५ करनेका स्मरण करके तथा महाभिषके पूर्वकालीन प्रेमको अपने मनमें सोच करके गंगाजीने राजा शन्तनुके ‘ तथास्तु ' कहनेपर उन्हें अपना पति बनाना १६ स्वीकार कर लिया । इस प्रकार मानवीरूप धारण करनेवाली रूपवती तथा सुन्दर वर्णवाली गंगा महाराज शन्तनुकी पत्नी बनकर राजभवनमें पहुँच गयीं । राजा १७ शन्तनु उन्हें पाकर सुन्दर उपवनमें विहार करने लगे ॥ १५–१७ ॥ भावोंको जाननेवाली वे १८ शन्तनुके साथ विहार करने महाराज शन्तनुको क्रीडा करते पर उन्हें समय बीतनेका बोध १ ९ मृगलोचनाके साथ उसी प्रकार प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र । तथा चतुर शन्तनु भी दिव्य नारायणकी भाँति विहार करने २० सुन्दरी गंगा भी राजा लगीं । उनके साथ अनेक वर्ष बीत गये, ही न हुआ । वे उन विहार करते थे जिस सर्वगुणसम्पन्ना गंगा भवनमें लक्ष्मी तथा लगे ॥ १८-१९ ३ ॥ इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर गंगाजीने महाराज शन्तनुसे गर्भ धारण किया और यथासमय उन सुनयनीने एक वसुको पुत्ररूपमें जन्म दिया । उन्होंने २१ उस बालकको उत्पन्न होते ही तत्काल जलमें फेंक दिया । इस प्रकार दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठें तथा सातवें पुत्रके मारे जानेपर राजा शन्तनुको बड़ी २२ चिन्ता हुई ॥ २०- -२२ ॥ [ उन्होंने सोचा— ] अब मैं क्या करूँ? मेरा वंश इस पृथ्वीपर सुस्थिर कैसे होगा? इस पापिनीने २३ । मेरे सात पुत्र मार डाले । यदि इसे रोकता हूँ तो