देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 201–210
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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१ ९ २ निवारयामि यदि मां त्यक्त्वा यास्यति सर्वथा अष्टमोऽयं सुसम्प्राप्तो गर्भो मे मनसीप्सितः न वारयामि चेदद्य सर्वथेयं जले क्षिपेत् भविता वा न वा चाग्रे संशयोऽयं ममाद्भुतः
सम्भवेऽपि च दुष्टेयं रक्षयेद्वा न रक्षयेत् ।
एवं संशयिते कार्ये किं कर्तव्यं मयाधुना ॥
वंशस्य रक्षणार्थं हि यत्नः कार्यः परो मया ।
ततः काले यदा जातः पुत्रोऽयमष्टमो वसुः ॥
मुनेर्येन हृता धेनुर्नन्दिनी स्त्रीजितेन हि ।
तं दृष्ट्वा नृपतिः पुत्रं तामुवाच पतन्पदे ॥
दासोऽस्मि तव तन्वङ्गि प्रार्थयामि शुचिस्मिते ।
पुत्रमेकं पुषाम्येनं देहि जीवितमद्य मे ॥
हिंसिताः सप्त पुत्रा मे करभोरु त्वया शुभाः ।
अष्टमं रक्ष सुश्रोणि पतामि तव पादयोः ॥
अन्यद्वै प्रार्थितं तेऽद्य ददाम्यथ च दुर्लभम् ।
वंशो मे रक्षणीयोऽद्य त्वया परमशोभने ॥
अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे वेदविदो विदुः ।
तस्मादद्य वरारोहे प्रार्थयाम्यष्टमं सुतम् ॥
इत्युक्तापि गृहीत्वा तं यदा गन्तुं समुत्सुका ।
तदातिकुपितो राजा तामुवाचातिदुःखितः ॥
पापिष्ठे किं करोम्यद्य निरयान्न बिभेषि किम् ।
कासि पापकराणां त्वं पुत्री पापरता सदा ॥
यथेच्छं गच्छ वा तिष्ठ पुत्रो मे स्थीयतामिह ।
किं करोमि त्वया पापे वंशान्तकरयानया ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ । यह मुझे त्यागकर चली जायगी । मेरा अभिलषित ॥ २४ आठवाँ गर्भ भी इसे प्राप्त हो गया है । यदि अब भी मैं इसे रोकता नहीं हूँ तो यह इसे भी जलमें । फेंक देगी । यह भी मुझे महान् सन्देह है कि भविष्य में कोई और सन्तति होगी अथवा नहीं । यदि उत्पन्न ॥ २५ हो भी तो पता नहीं कि यह दुष्टा उसकी रक्षा करेगी अथवा नहीं? इस संशयकी स्थितिमें मैं अब क्या करूँ? ॥२३–२६ ॥ २६ वंशकी रक्षाके लिये मुझे कोई दूसरा यत्न करना ही होगा । तदनन्तर यथासमय जब वह आठवाँ ' द्यौ ' नामक वसु पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ, जिसने अपनी २७ स्त्रीके वशीभूत होकर वसिष्ठकी नन्दिनी गौका हरण कर लिया था, तब उस पुत्रको देखकर राजा शन्तनु गंगाजीके पैरोंपर गिरते हुए कहने लगे ॥ २७-२८ ॥ २८ हे तन्वंगि! मैं तुम्हारा दास हूँ । हे शुचिस्मिते! मैं प्रार्थना करता हूँ । मैं इस पुत्रको पालना चाहता हूँ, अतः इसे जीवित ही मुझे दे दो ॥ २ ९ ॥ २ ९ हे करभोरु! तुमने मेरे सात सुन्दर पुत्रोंको मार डाला, किंतु इस आठवें पुत्रकी रक्षा करो । हे सुश्रोणि! मैं तुम्हारे पैरोंपर पड़ता हूँ ॥३० ॥
३० हे परम रूपवती! इसके बदले तुम मुझसे जो माँगोगी, मैं वह दुर्लभ वस्तु भी तुम्हें दूँगा । अब तुम मेरे वंशकी रक्षा करो ॥ ३१ ॥
३१ वेदविद् विद्वानोंने कहा है कि पुत्रहीन मनुष्यकी स्वर्गमें भी गति नहीं होती । इसी कारण सुन्दरि! अब मैं इस आठवें पुत्रके लिये याचना करता हूँ ॥३२ ॥
३२ राजा शन्तनुके ऐसा कहनेपर भी जब गंगा उस पुत्रको लेकर जानेको उद्यत हुईं, तब उन्होंने अत्यन्त कुपित एवं दुःखित होकर उनसे कहा-३३ ' हे पापिनि! अब मैं क्या करूँ? क्या तुम नरकसे भी नहीं डरती? तुम कौन हो? लगता है कि तुम पापियोंकी पुत्री हो, तभी तो तुम सदा पापकर्ममें ३४ लगी रहती हो, अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जाओ या रहो, किंतु यह पुत्र यहीं रहेगा । हे पापिनि! अपने वंशका अन्त करनेवाली ऐसी तुम्हें रखकर भी मैं ३५ | क्या करूँगा? ' ॥ ३३–३५ ॥
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अ ० ४ ] एवं वदति भूपाले सा गृहीत्वा सुतं शिशुम् । गच्छन्ती वचनं कोपसंयुता तमुवाच ह ।
पुत्रकामा सुतं त्वेनं पालयामि वने गता ।
समयो मे गमिष्यामि वचनं ह्यन्यथाकृतम् ॥
गङ्गां मां वै विजानीहि देवकार्यार्थमागताम् ।
वसवस्तु पुरा शप्ता वसिष्ठेन महात्मना ॥
व्रजन्तु मानुषीं योनिं स्थितां चिन्तातुरास्तु माम् ।
दृष्ट्वेदं प्रार्थयामासुर्जननी नो भवानघे ॥
तेभ्यो दत्त्वा वरं जाता पत्नी ते नृपसत्तम ।
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं जानीहि सम्भवो मम ॥
सप्त ते वसवः पुत्रा मुक्ताः शापादृषेस्तु ते ।
कियन्तं कालमेकोऽयं तव पुत्रो भविष्यति ॥।
गङ्गादत्तमिमं पुत्रं गृहाण शन्तनो स्वयम् ।
वसुं देवं विदित्वैनं सुखं भुंक्ष्व सुतोद्भवम् ॥
गाङ्गेयोऽयं महाभाग भविष्यति बलाधिकः ।
अद्य तत्र नयाम्येनं यत्र त्वं वै मया वृतः ॥
दास्यामि यौवनप्राप्तं पालयित्वा महीपते ।
न मातृरहितः पुत्रो जीवेन्न च सुखी भवेत् ॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे गङ्गा तं गृहीत्वा च बालकम् ।
राजा चातीव दुःखार्तः संस्थितो निजमन्दिरे ॥
भार्याविरहजं दुःखं तथा पुत्रस्य चाद्भुतम् ।
सर्वदा चिन्तयन्नास्ते राज्यं कुर्वन्महीपतिः ॥
एवं गच्छति कालेऽथ नृपतिर्मृगयां गतः ।
निघ्नन्मृगगणान्बाणैर्महिषान्सूकरानपि ॥
गङ्गातीरमनुप्राप्तः स राजा शन्तनुस्तदा ।
नदीं स्तोकजलां दृष्ट्वा विस्मितः स महीपतिः ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —7 A द्वितीय स्कन्ध १ ९ ३ राजाके ऐसा कहनेपर उस नवजात शिशुको ३६ लेकर जाती हुई गंगाने क्रोधपूर्वक उनसे कहा-पुत्रकी कामनावाली मैं भी इस पुत्रको वनमें ले जाकर पालुँगी । शर्तके अनुसार अब मैं चली जाऊँगी; क्योंकि ३७ आपने अपना वचन तोड़ा है । [ हे राजन्! ] मुझे आप गंगा जानिये; देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेके लिये ही मैं यहाँ आयी थी । महात्मा वसिष्ठने प्राचीन काल में ३८ आठों वसुओंको शाप दिया था कि तुम सब मनुष्ययोनिमें जाकर जन्म लो । तब चिन्तासे व्याकुल होकर आठों वसु मुझे वहाँ स्थित देखकर कहने लगे - हे अनघे! ३ ९ आप हमारी माता बनें । अतः हे नृपश्रेष्ठ! उन्हें वरदान देकर मैं आपकी पत्नी बन गयी । आप ऐसा समझ लीजिये कि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके ४० लिये ही मेरा जन्म हुआ है ॥ ३६–४० ॥ वे सातों वसु तो आपके पुत्र बनकर ऋषिके शापसे विमुक्त हो गये । यह आठवाँ वसु कुछ ४१ समयतक आपके पुत्ररूपमें विद्यमान रहेगा । अत: हे महाराज शन्तनु! मुझ गंगाके द्वारा दिये हुए पुत्रको आप स्वीकार कीजिये । इसे आठवाँ वसु जानते हुए ४२ आप पुत्र - सुखका भोग करें; क्योंकि हे महाभाग! यह ' गांगेय ' बड़ा ही बलवान् होगा । अब इसे मैं वहीं ले जा रहीं हूँ, जहाँ मैंने आपका पतिरूपसे वरण ४३ | किया था ॥ ४१–४३ ॥ हे राजन्! इसे पालकर इसके युवा होनेपर मैं ४४ पुनः आपको दे दूँगी; क्योंकि मातृहीन बालक न जी पाता है और न सुखी रहता है ॥ ४४ ॥
ऐसा कहकर उस बालकको लेकर गंगा वहीं ४५ अन्तर्धान हो गयीं । राजा भी अत्यन्त दुःखित होकर अपने राजभवनमें रहने लगे ॥ ४५ ॥
महाराज शन्तनु स्त्री तथा पुत्रके वियोगजन्य ४६ महान् कष्टका सदा अनुभव करते हुए भी किसी प्रकार राज्यकार्य सँभालने लगे ॥४६ ॥
कुछ समय बीतनेपर महाराज आखेटके लिये ४७ वनमें गये । वहाँ अनेक प्रकारके मृगगणों, भैंसों तथा सूकरोंको अपने बाणोंसे मारते हुए वे गंगाजीके तटपर जा पहुँचे । उस नदीमें बहुत थोड़ा जल देखकर वे ४८ । राजा शन्तनु बड़े आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४७-४८ ॥
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१ ९ ४ तत्रापश्यत्कुमारं तं मुञ्चन्तं विशिखान्बहून् आकृष्य च महाचापं क्रीडन्तं सरितस्तटे तं वीक्ष्य विस्मितो राजा न स्म जानाति किञ्चन नोपलेभे स्मृतिं भूपः पुत्रोऽयं मम वा न वा दृष्ट्वाप्यमानुषं कर्म बाणेषु लघुहस्तताम् विद्यां वाप्रतिमां रूपं तस्य वै स्मरसन्निभम् पप्रच्छ विस्मितो राजा कस्य पुत्रोऽसि चानघ नोवाच किञ्चिद्वीरोऽसौ मुञ्चञ्छिलीमुखानथ अन्तर्धानं गतः सोऽथ राजा चिन्तातुरोऽभवत् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ । उन्होंने वहाँ नदीके किनारे खेलते हुए एक ॥ ४ ९ बालकको महान् धनुषको खींचकर बहुतसे बाणोंको छोड़ते हुए देखा । उसे देखकर राजा शन्तनु बड़े विस्मित । हुए और कुछ भी नहीं जान पाये । उन्हें यह भी स्मरण ॥ ५० न हो पाया कि यह मेरा पुत्र है या नहीं ॥ ४ ९ -५० ॥ उस बालकके अतिमानवीय कृत्य, बाण चलाने के । हस्तलाघव, असाधारण विद्या और कामदेवके समान ॥ ५१ सुन्दर रूपको देखकर अत्यन्त विस्मित राजाने उससे पूछा - ' हे निर्दोष बालक! तुम किसके पुत्र हो? ' । किंतु उस वीर बालकने कोई उत्तर नहीं दिया और ॥ ५२ वह बाण चलाता हुआ अन्तर्धान हो गया । तब राजा शन्तनु चिन्तित होकर यह सोचने लगे कि कहीं । यह मेरा ही पुत्र तो नहीं है? अब मैं क्या करूँ और कोऽयं मम सुतो बालः किं करोमि व्रजामि कम् ॥५३ कहाँ जाऊँ? ॥५१–५३ ॥ गङ्गां तुष्टाव भूपालः स्थितस्तत्र समाहितः । दर्शनं सा ददौ चाथ चारुरूपा यथा पुरा
दृष्ट्वा तां चारुसर्वाङ्गीं बभाषे नृपतिः स्वयम् ।
कोऽयं गङ्गे गतो बालो मम त्वं दर्शयाधुना ॥
गङ्गोवाच पुत्रोऽयं तव राजेन्द्र रक्षितश्चाष्टमो वसुः । ददामि तव हस्ते तु गाङ्गेयोऽयं महातपाः
कीर्तिकर्ता कुलस्यास्य भविता तव सुव्रत ।
पाठितस्त्वखिलान्वेदान्धनुर्वेदं च शाश्वतम् ॥
वसिष्ठस्याश्रमे दिव्ये संस्थितोऽयं सुतस्तव ।
सर्वविद्याविधानज्ञः सर्वार्थकुशलः शुचिः ॥
यद्वेद जामदग्न्योऽसौ तद्वेदायं सुतस्तव ।
गृहाण गच्छ राजेन्द्र सुखी भव नराधिप ॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे गङ्गा दत्त्वा पुत्रं नृपाय वै ।
नृपतिस्तु मुदा युक्तो बभूवातिसुखान्वितः ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 7B जब उन्होंने वहीं खड़े होकर समाहितचित्तसे गंगाजीकी स्तुति की तब गंगाजीने प्रसन्न होकर पहले ही समान एक रूपवती स्त्रीके रूपमें उन्हें ॥ ५४ दर्शन दिया ॥ ५४ ॥
सर्वांगसुन्दरी गंगाजीको देखकर राजा शन्तनु बोले - हे गंगे! यह बालक कौन था और कहाँ चला ५५ गया? आप उसे मुझको दिखा दीजिये ॥ ५५ ॥
गंगाजी बोलीं- हे राजेन्द्र! यह आपका ही पुत्र आठवाँ वसु है, जिसे मैंने पाला है । इस महातपस्वी गांगेयको मैं आपको सौंपती हूँ ॥ ५६ ॥
॥ ५६ हे सुव्रत! यह बालक आपके इस कुलकी कीर्तिको बढ़ानेवाला होगा । इसे सभी वेदशास्त्र एवं शाश्वत धनुर्वेदकी शिक्षा दी गयी है ॥ ५७ ॥
५७ आपका यह पुत्र वसिष्ठजीके दिव्य आश्रममें रहा है और सब विद्याओंमें पारंगत, कार्यकुशल एवं सदाचारी है ॥ ५८ ॥
५८ जिस विद्याको जमदग्निपुत्र परशुराम जानते हैं, उसे आपका यह पुत्र जानता है । हे राजेन्द्र! हे नराधिप! आप इसे ग्रहण कीजिये, जाइये और ५ ९ । सुखपूर्वक रहिये ॥ ५ ९ ॥ ऐसा कहकर तथा वह पुत्र राजाको देकर गंगाजी अन्तर्धान हो गयीं । उसे पाकर राजा शन्तनु ६० । बहुत आनन्दित और सुखी हुए ॥ ६० ॥
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अ ० ५ ] द्वितीय स्कन्ध १ ९ ५ समालिङ्गय सुतं राजा समाघ्राय च मस्तकम् । समारोप्य रथे पुत्रं स्वपुरं स प्रचक्रमे गत्वा गजाह्वयं राजा चकारोत्सवमुत्तमम् दैवज्ञं च समाहूय पप्रच्छ च शुभं दिनम् समाहृत्य प्रजाः सर्वाः सचिवान्सर्वशः शुभान् । यौवराज्येऽथ गाङ्गेयं स्थापयामास पार्थिवः
कृत्वा तं युवराजानं पुत्रं सर्वगुणान्वितम् ।
सुखमास स धर्मात्मा न सस्मार च जाह्नवीम् ॥
सूत उवाच एतद्वः कथितं सर्वं कारणं वसुशापजम् । गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिं जाह्नव्याः सम्भवं तथा गङ्गावतरणं पुण्यं वसूनां सम्भवं तथा यः शृणोति नरः पापान्मुच्यते नात्र संशयः पुण्यं पवित्रमाख्यानं कथितं मुनिसत्तमाः यथा मया श्रुतं व्यासात्पुराणं वेदसम्मितम् श्रीमद्भागवतं पुण्यं नानाख्यानकथान्वितम् द्वैपायनमुखोद्भूतं पञ्चलक्षणसंयुतम् ॥ शृण्वतां सर्वपापघ्नं शुभदं सुखदं तथा । इतिहासमिमं पुण्यं कीर्तितं मुनिसत्तमाः राजा शन्तनु पुत्रका आलिंगन करके तथा ॥ ६१ उसका मस्तक सूँघकर और उसे अपने रथपर बैठाकर अपने नगरकी ओर चल पड़े ॥ ६१ ॥
। राजाने हस्तिनापुर जाकर महान् उत्सव किया ॥ ६२ और दैवज्ञको बुलाकर शुभ मुहूर्त पूछा ॥ ६२ ॥
राजा शन्तनुने सब प्रजाजनों तथा सभी श्रेष्ठ मन्त्रियोंको बुलाकर गंगापुत्रको युवराज पदपर बैठा ॥ ६३ दिया ॥ ६३ ॥
उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्रको युवराज बनाकर वे धर्मात्मा शन्तनु सुखपूर्वक रहने लगे । अब उन्हें ६४ गंगाजीकी भी सुधि नहीं रही ॥ ६४ ॥
सूतजी बोले -- इस प्रकार मैंने आप सबको वसुओंके शापका कारण, गंगाके प्राकट्य तथा भीष्मकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कह दिया ॥ ६५ ॥
॥ ६५ जो मनुष्य गंगावतरण तथा वसुओंके उद्भवकी इस पवित्र कथाको सुनता है, वह सब प्रकारके पापोंसे । मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ६६ ॥
॥ ६६ हे मुनिश्रेष्ठो! मैंने यह पवित्र, पुण्यदायक तथा वेद - सम्मत पौराणिक आख्यान जैसा व्यासजीके । मुखारविन्दसे सुना था, वैसा आपलोगोंसे कह दिया ॥ ६७ ॥
॥ ६७ द्वैपायन व्यासजीके मुखसे निःसृत यह श्रीमद्देवी भागवतमहापुराण बड़ा ही पवित्र, अनेकानेक । कथाओंसे परिपूर्ण तथा सर्ग - प्रतिसर्ग आदि पाँच ६८ पुराण - लक्षणोंसे युक्त है ॥ ६८ ॥
हे मुनिश्रेष्ठो! सुननेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले, कल्याणकारी, सुखदायक तथा पुण्यप्रद ॥ ६ ९ । इस इतिहासका मैंने आपलोगोंसे वर्णन कर दिया ॥ ६ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे देवव्रतोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः मत्स्यगन्धा ( सत्यवती ) - को देखकर राजा शन्तनुका मोहित होना, भीष्मद्वारा आजीवन ब्रह्मचर्य - व्रत धारण करनेकी प्रतिज्ञा करना और शन्तनुका सत्यवतीसे विवाह ऋषय ऊचुः ऋषिगण बोले- हे लोमहर्षणतनय सूतजी! वसूनां सम्भवः सूत कथितः शापकारणात् । आपने शापवश अष्टवसुओंके जन्म तथा गंगाजीकी गाङ्गेयस्य तथोत्पत्तिः कथिता लोमहर्षणे । १ उत्पत्तिका वर्णन किया । हे धर्मज्ञ! व्यासजीकी सत्यवती 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -7C
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१ ९ ६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५
माता व्यासस्य धर्मज्ञ नाम्ना सत्यवती सती ।
कथं शन्तनुना प्राप्ता भार्या गन्धवती शुभा ॥
तन्ममाचक्ष्व विस्तारं दाशपुत्री कथं वृता ।
राज्ञा धर्मवरिष्ठेन संशयं छिन्धि सुव्रत ॥
सूत उवाच
शन्तनुर्नाम राजर्षिर्मृगयानिरतः सदा ।
वनं जगाम निघ्नन्वै मृगांश्च महिषान् रुरून् ॥
चत्वार्येव तु वर्षाणि पुत्रेण सह भूपतिः ।
रममाणः सुखं प्राप कुमारेण यथा हरः ॥
एकदा विक्षिपन्बाणान्विनिघ्नन्खड्गसूकरान् ।
स कदाचिद्वनं प्राप्तः कालिन्दीं सरितां वराम् ॥
महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम् ।
तस्य प्रभवमन्विच्छन्सञ्चचार वनं तदा ॥
न मन्दारस्य गन्धोऽयं मृगनाभिमदस्य न ।
चम्पकस्य न मालत्या न केतक्या मनोहरः ॥
न चानुभूतपूर्वोऽयं वाति गन्धवहः शुभः ।
कुतोऽयमेति वायुर्वै मम घ्राणविमोहनः ॥
इति सञ्चिन्त्यमानोऽसौ बभ्राम वनमण्डलम् ।
मोहितो गन्धलोभेन शन्तनुः पवनानुगः ॥
स ददर्श नदीतीरे संस्थितां चारुदर्शनाम् ।
शृङ्गाररहितां कान्तां सुस्थितां मलिनाम्बराम् ॥
दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं विस्मितः स महीपतिः ।
अस्या देहस्य गन्धोऽयमिति सञ्जातनिश्चयः ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —7 D नामकी साध्वी माता जो पवित्र गन्धवाली थीं, वे २ राजा शन्तनुको पत्नीरूपसे कैसे प्राप्त हुईं? यह हमें विस्तारके साथ बताइये । महान् धर्मनिष्ठ राजा शन्तनुने निषादपुत्री के साथ विवाह क्यों किया? हे सुव्रत! यह बताकर आप हमारे सन्देहका निवारण ३ कीजिये ॥ १- -३ ॥ सूतजी बोले – राजर्षि शन्तनु सदा आखेट करनेमें तत्पर रहते थे । वे वनमें जाकर मृग, महिष तथा रुरुमृगोंका वध किया करते थे ॥४ ॥
४ राजा शन्तनु केवल चार वर्षतक भीष्मके साथ उसी प्रकार सुखसे रहे, जिस प्रकार भगवान् शंकर कार्तिकेयके साथ आनन्दपूर्वक रहते थे ॥ ५ ॥
एक बार वे महाराज शन्तनु वनमें बाण ५ छोड़ते हुए बहुतसे गैंड़ों तथा सूकरोंका वध करते हुए किसी समय नदियोंमें श्रेष्ठ यमुनाके किनारे जा पहुँचे ॥६ ॥
६ राजाने वहाँपर कहींसे आती हुई उत्तम गन्धको सूँघा । तब उस सुगन्धिके उद्गमका पता लगाने के लिये वे वनमें विचरने लगे ॥७ ॥
७ वे बड़े असमंजसमें पड़ गये कि यह मनोहर सुगन्धि न मन्दारपुष्पकी है, न कस्तूरीकी है, न मालतीकी है, न चम्पाकी है और न तो केतकीकी ही है! ॥ ८ ॥
८ मैंने ऐसी अनुपम सुगन्धिका पूर्वमें कभी नहीं अनुभव किया था । [ इस दिव्य सुगन्धिको लेकर ] सुन्दर वायु बह रही है । मेरी घ्राणेन्द्रियको मुग्ध कर ९ । देनेवाली यह वायु कहाँसे आ रही है? ॥ ९ ॥
इस प्रकार सोचते - विचारते राजा शन्तनु गन्धके लोभसे मोहित सुगन्धित वायुका अनुसरण करते हुए १० वनप्रदेशमें विचरण करने लगे ॥ १० ॥
उन्होंने यमुनानदीके तटपर बैठी हुई एक दिव्यदर्शनवाली स्त्रीको देखा, जो मलिन वस्त्र धारण करने और श्रृंगार न करनेपर भी मनोहर दीख ११ रही थी ॥ ११ ॥
उस श्याम नयनोंवाली स्त्रीको देखकर राजा आश्चर्यमें पड़ गये और उन्हें इस बातका विश्वास हो १२ । गया कि यह सुगन्धि इसी स्त्रीके शरीरकी है ॥ १२ ॥
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अ ० ५ ] द्वितीय तदद्भुतं रूपमतीव सुन्दरं गन्धोऽखिललोकसम्मतः । वयश्च तादृङ् नवयौवनं शुभं दृष्ट्वैव राजा किल विस्मितोऽभवत् ॥ १३ । केयं कुतो वा समुपागताधुना देवाङ्गना वा किमु मानुषी वा । गन्धर्वपुत्री किल नागकन्या जाने कथं गन्धवतीं नु कामिनीम् ॥ १४ सञ्चिन्त्य चैवं मनसा नृपोऽसौ न निश्चयं प्राप यदा ततः स्वयम् । गङ्गां स्मरन्कामवशं गतोऽथ पप्रच्छ कान्तां तटसंस्थितां च ॥ १५ कासि प्रिये कस्य सुतासि कस्मा-दिह स्थिता त्वं विजने वरोरु । एकाकिनी किं वद चारुनेत्रे विवाहिता वा न विवाहितासि ॥ १६ सञ्जातकामोऽहमरालनेत्रे त्वां वीक्ष्य कान्तां च मनोरमां च । ब्रूहि प्रिये यासि चिकीर्षसि त्वं किं चेति सर्वं मम विस्तरेण ॥ १७ इत्येवमुक्ता सुदती नृपेण प्रोवाच तं सस्मितमम्बुजेक्षणा । दाशस्य पुत्रीं त्वमवेहि राजन् कन्यां पितुः शासनसंस्थितां च ॥ १८ तरीमिमां धर्मनिमित्तमेव संवाहयामीह जले नृपेन्द्र । पिता गृहे मेऽद्य गतोऽस्ति कामं सत्यं ब्रवीम्यर्थपते तवाग्रे ॥ १ ९ इत्येवमुक्त्वा विरराम बाला कामातुरस्तां नृपतिर्बभाषे । कुरुप्रवीरं कुरु मां पतिं त्वं वृथा न गच्छेन्ननु यौवनं ते ॥ २० न चास्ति पत्नी मम वै द्वितीया त्वं धर्मपत्नी भव मे मृगाक्षि । दासोऽस्मि तेऽहं वशग: सदैव मनोभवस्तापयति प्रिये माम् ॥ २१ । स्कन्ध १ ९ ७ उसका अद्भुत एवं अतिशय सुन्दर रूप, सब प्राणियोंका मन स्वाभाविक रूपसे अपनी ओर आकर्षित करनेवाली सुगन्धि, उसकी अवस्था तथा उसका वैसा शुभ नवयौवन देखकर राजा शन्तनुको महान् विस्मय हुआ ॥ १३ ॥
यह कौन है और इस समय यह कहाँसे आयी है? यह कोई देवांगना है या मानवी स्त्री, यह कोई गन्धर्वकन्या अथवा नागकन्या है? मैं इस सुगन्धा कामिनीके विषयमें कैसे जानकारी प्राप्त करूँ? ॥१४ ॥
इस प्रकार विचार करके भी वे राजा जब कुछ निश्चय नहीं कर सके, तब तत्क्षण गंगाजीका स्मरण करते हुए वे कामके वशीभूत हो गये और तटपर बैठी हुई उस सुन्दरीसे उन्होंने पूछा - हे प्रिये! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? हे वरोरु! तुम इस निर्जन वनमें क्यों बैठी हो? हे सुनयने! क्या तुम अकेली ही हो? तुम विवाहिता हो या कुमारी; यह बताओ ॥ १५ - १६ ॥ हे अरालनेत्रे! तुम जैसी मनोरमा स्त्रीको देखकर मैं कामातुर हो गया हूँ । हे प्रिये! विस्तारपूर्वक मुझे यह बतलाओ कि तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो? ॥१७ ॥
महाराज शन्तनुके वचन सुनकर वह सुन्दर दाँतोंवाली तथा कमलके समान नयनोंवाली स्त्री मुसकराकर बोली- हे राजन्! आप मुझे निषादकन्या और अपने पिताकी आज्ञामें रहनेवाली कन्या समझें ॥ १८ ॥
हे नृपेन्द्र! मैं अपने धर्मका अनुसरण करती हुई जलमें यह नौका चलाती हूँ । हे अर्थपते! पिताजी अभी ही घर गये हैं । आपके सम्मुख यह बातें मैंने सत्य कही हैं ॥ १ ९ ॥ यह कहकर वह निषादकन्या मौन हो गयी | तब कामसे पीड़ित महाराज शन्तनुने उससे कहा— - मुझ कुरुवंशी वीरको तुम अपना पति बना लो, जिससे तुम्हारा यौवन व्यर्थ न जाय ॥ २० ॥
मेरी कोई दूसरी पत्नी नहीं है । अतः हे मृगनयनी! तुम मेरी धर्मपत्नी बन जाओ । हे प्रिये! मैं सर्वदाके लिये तुम्हारा वशवर्ती दास बन जाऊँगा । मुझे कामदेव पीड़ित कर रहा है ॥ २१ ॥
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१ ९ ८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५ गता प्रिया मां परिहृत्य कान्ता नान्या वृताहं विधुरोऽस्मि कान्ते । त्वां वीक्ष्य सर्वावयवातिरम्यां मनो हि जातं विवशं मदीयम् ॥ श्रुत्वामृतास्वादरसं नृपस्य वचोऽतिरम्यं खलु दाशकन्या । उवाच तं सात्त्विक भावयुक्ता कृत्वातिधैर्यं नृपतिं सुगन्धा ॥ यदात्थ राजन् मयि तत्तथैव मन्येऽहमेतत्तु यथा वचस्ते । नास्मि स्वतन्त्रा त्वमवेहि कामं दाता पिता मेऽर्थय तं त्वमाशु ॥ न स्वैरिणीहास्म्यपि दाशपुत्री पितुर्वशेऽहं सततं चरामि । स चेद्ददाति प्रथितः पिता मे गृहाण पाणिं वशगास्मि तेऽहम् ॥ मनोभवस्त्वां नृप किं दुनोति यथा पुनर्मां नवयौवनां च । दुनोति तत्रापि हि रक्षणीया धृतिः कुलाचारपरम्परासु ॥ सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तस्या नृपतिः काममोहितः ।
गतो दाशपतेर्गेहं तस्या याचनहेतवे ॥
दृष्ट्वा नृपतिमायान्तं दाशोऽतिविस्मयं गतः ।
प्रणामं नृपतेः कृत्वा कृताञ्जलिरभाषत ॥
दाश उवाच
दासोऽस्मि तव भूपाल कृतार्थोऽहं तवागमे ।
आज्ञां देहि महाराज यदर्थमिह चागमः ॥
राजोवाच
धर्मपत्नीं करिष्यामि सुतामेतां तवानघ ।
त्वया चेद्दीयते मह्यं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥
दाश उवाच
कन्यारत्नं मदीयं चेद्यत्त्वं प्रार्थयसे नृप ।
दातव्यं तु प्रदास्यामि न त्वदेयं कदाचन ॥
तस्याः पुत्रो महाराज त्वदन्ते पृथिवीपतिः ।
सर्वथा चाभिषेक्तव्यो नान्यः पुत्रस्तवेति वै ॥
मेरी प्रियतमा मुझे छोड़कर चली गयी है, तबसे मैंने अपना दूसरा विवाह नहीं किया । हे कान्ते! मैं इस समय विधुर हूँ । तुम जैसी सर्वांगसुन्दरीको २२ देखकर मेरा मन अपने वशमें नहीं रह गया है ॥ २२ ॥
राजाकी अमृतरसके समान मधुर तथा मनोहारी बात सुनकर वह दाशकन्या सुगन्धा सात्त्विक भावसे युक्त होकर धैर्य धारण करके राजासे बोली – हे २३ | राजन्! आपने मुझसे जो कुछ कहा, वह यथार्थ है; किंतु आप अच्छी तरह जान लीजिये कि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ । मेरे पिताजी ही मुझे दे सकते हैं । अतएव आप उन्हींसे मेरे लिये याचना कीजिये ॥ २३-२४ ॥ मैं एक निषादकी कन्या होती हुई भी स्वेच्छाचारिणी २४ नहीं हूँ । मैं सदा पिताके वशमें रहती हुई सब काम करती हूँ । यदि मेरे पिताजी मुझे आपको देना स्वीकार कर लें तब आप मेरा पाणिग्रहण कर लीजिये और मैं सदाके लिये आपके अधीन हो जाऊँगी ॥ २५ ॥
२५ हे राजन्! परस्पर आसक्त होनेपर भी कुलकी मर्यादा तथा परम्पराके अनुसार धैर्य धारण करना चाहिये ॥ २६ ॥
सूतजी बोले – उस सुगन्धाकी यह बात सुनकर कामातुर राजा उसे माँगनेके लिये निषादराजके घर २६ गये ॥ २७ ॥
इस प्रकार महाराज शन्तनुको अपने घर आया देखकर निषादराजको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्हें २७ प्रणाम करके हाथ जोड़कर वह बोला - ॥२८ ॥
निषादने कहा – हे राजन्! मैं आपका दास २८ हूँ । आपके आगमनसे मैं कृतकृत्य हो गया । हे महाराज! आप जिस कार्यके लिये आये हों, मुझे आज्ञा दीजिये ॥ २ ९ ॥ २ ९ राजा बोले- हे अनघ! यदि आप अपनी यह कन्या मुझे प्रदान कर दें तो मैं इसे अपनी धर्मपत्नी बना लूँगा; यह मैं सत्य कह रहा हूँ ॥३० ॥
३० निषादने कहा - हे महाराज! यदि आप मेरे इस कन्यारत्नके लिये प्रार्थना कर रहे हैं तो मैं अवश्य दूँगा; क्योंकि देनेयोग्य वस्तु तो कभी अदेय नहीं होती ३१ है; किंतु हे महाराज! आपके बाद इस कन्याका पुत्र ही राजाके रूपमें अभिषिक्त होना चाहिये, आपका ३२ | दूसरा पुत्र नहीं ॥ ३१-३२ ॥
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अ ०५ ] सूत उवाच श्रुत्वा वाक्यं तु दाशस्य राजा चिन्तातुरोऽभवत् गाङ्गेयं मनसा कृत्वा नोवाच नृपतिस्तदा कामातुरो गृहं प्राप्तश्चिन्ताविष्टो महीपतिः न सस्नौ बुभुजे नाथ न सुष्वाप गृहं गतः चिन्तातुरं तु तं दृष्ट्वा पुत्रो देवव्रतस्तदा गत्वापृच्छन्महीपालं तदसन्तोषकारणम् ॥ दुर्जयः कोऽस्ति शत्रुस्ते करोमि वशगं तव का चिन्ता नृपशार्दूल सत्यं वद नृपोत्तम किं तेन जातेन सुतेन राजन् दुःखं न जानाति न नाशयेद्यः ऋणं ग्रहीतुं समुपागतोऽ प्राग्जन्मजं नात्र विचारणास्ति विमुच्य राज्यं रघुनन्दनोऽपि ताताज्ञया दाशरथिस्तु रामः वनं गतो लक्ष्मणजानकीभ्यां सहैव शैलं किल चित्रकूटम् ॥ सुतो हरिश्चन्द्रनृपस्य राजन् यो रोहितश्चेति प्रसिद्धनामा क्रीतोऽथ पित्रा विपणोद्यतश्च दासार्पितो विप्रगृहे तु नूनम् ॥ तथाजिगर्तस्य नाम्ना शुनःशेप इति इति प्रसिद्धः क्रीतस्तु पित्राप्यथ यूपबद्धः सम्मोचितो गाधिसुतेन पश्चात् ॥ पित्राज्ञया जामदग्न्येन पूर्वं छिन्नं शिरो मातुरिति प्रसिद्धम् अकार्यमप्याचरितं च तेन गुरोरनुज्ञा च गरीयसी कृता इदं शरीरं तव भूपते न क्षमोऽस्मि नूनं वद किं करोम्यहम् न शोचनीयं मयि वर्तमाने-ऽप्यसाध्यमर्थं प्रतिपादयाम्यदः द्वितीय स्कन्ध १ ९९ सूतजी बोले- निषादकी बात सुनकर राजा । शन्तनु चिन्तित हो उठे । उस समय मनमें भीष्मका ॥ ३३ स्मरण करके राजा कुछ भी उत्तर न दे सके ॥३३ ॥
। तब कामातुर तथा चिन्तित राजा राजमहलमें चले गये । उन्होंने घर जानेपर न स्नान किया, न ॥ ३४ भोजन किया और न शयन ही किया ॥ ३४ ॥
। तब उन्हें चिन्तित देखकर पुत्र देवव्रत राजाके पास ३५ जाकर उनकी इस चिन्ताका कारण पूछने लगे —हे । नृपश्रेष्ठ! कौन - सा ऐसा शत्रु है जिसको आप जीत न ॥ ३६ सके; मैं उसे आपके अधीन कर दूँ । हे नृपोत्तम! आपकी क्या चिन्ता है, मुझे सही - सही बताइये ॥ ३५-३६ ॥ । हे राजन्! भला उस उत्पन्न हुए पुत्रसे क्या लाभ? जो पैदा होकर अपने पिताका दुःख न समझे ॥ ३७ तथा उसको दूर करनेका उपाय न कर सके । ऐसा कुपुत्र तो पूर्वजन्मके किसी ऋणको वापस लेनेके लिये यहाँ आता है; इसमें किसी प्रकारका सन्देह । नहीं है ॥ ३७ ॥
दशरथके पुत्र रामचन्द्रजी भी पिताकी आज्ञासे ३८ राज्य त्यागकर लक्ष्मण और सीताके साथ वनमें चले गये तथा चित्रकूटपर्वतपर निवास करने लगे ॥ ३८ ॥
। इसी प्रकार हे राजन्! राजा हरिश्चन्द्रका पुत्र जो रोहित नामसे प्रसिद्ध था, अपने पिताके इच्छानुसार बिकनेके लिये तत्पर हो गया और खरीदा हुआ वह ३ ९ बालक ब्राह्मणके घरमें सेवकका कार्य करने लगा ॥ ३ ९ ॥ 4 ' अजीगर्त ' ब्राह्मणका एक श्रेष्ठ पुत्र था, जो । शुनःशेप नामसे प्रसिद्ध था । खरीद लिये जानेपर वह पिताके द्वारा यूपमें बाँध दिया गया, जिसे बादमें ४० विश्वामित्रने छुड़ाया था ॥ ४० ॥
पूर्वकालमें पिताकी आज्ञासे ही परशुरामने अपनी । माताका सिर काट दिया था, ऐसा लोकमें प्रसिद्ध है । इस अनुचित कर्मको करके भी उन्होंने पिताकी ॥ ४१ आज्ञाका महत्त्व बढ़ाया था ॥ ४१ ॥
हे पृथ्वीपते! यह मेरा शरीर आपका ही है । यद्यपि मैं समर्थ नहीं हूँ; फिर भी आप कहिये मैं । आपकी क्या सेवा करूँ? मेरे रहते आपको किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं होनी चाहिये । मैं आपका ॥ ४२ असाध्य कार्य भी तत्काल पूरा करूँगा ॥ ४२ ॥
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२०० प्रब्रूहि राजंस्तव कास्ति चिन्ता निवारयाम्यद्य धनुर्गृहीत्वा देहेन मे चेच्चरितार्थता वा भवत्वमोघा भवतश्चिकीर्षा ॥ धिक् तं सुतं यः पितुरीप्सितार्थं मो s पि सन्न प्रतिपादयेद्यः । जातेन किं तेन सुतेन कामं पितुर्न चिन्तां हि समुद्धरेद्यः ॥ सूत उवाच
निशम्येति वचस्तस्य पुत्रस्य शन्तनुर्नृपः ।
लज्जमानस्तु मनसा तमाह त्वरितं सुतम् ॥
राजोवाच
चिन्ता मे महती पुत्र यस्त्वमेकोऽसि मे सुतः ।
शूरोऽतिबलवान्मानी संग्रामेष्वपराङ्मुखः ॥
एकापत्यस्य मे तात वृथेदं जीवितं किल ।
मृते त्वयि मृधे क्वापि किं करोमि निराश्रयः ॥
एषा मे महती चिन्ता तेनाद्य दुःखितोऽस्म्यहम् ।
नान्या चिन्तास्ति मे पुत्र यां तवाग्रे वदाम्यहम् ॥
सूत उवाच
तदाकर्ण्याथ गाङ्गेयो मन्त्रिवृद्धानपृच्छत ।
न मां वदति भूपालो लज्जया परिप्लुतः ॥
वित्त वार्तां नृपस्याद्य पृष्ट्वा यूयं विनिश्चयात् ।
सत्यं ब्रुवन्तु मां सर्वं तत्करोमि निराकुलः ॥
तच्छ्रुत्वा ते नृपं गत्वा संविज्ञाय च कारणम् ।
शशंसुर्विदितार्थस्तु गाङ्गेयस्तदचिन्तयत् ॥
सहितस्तैर्जगामाशु दाशस्य सदनं तदा ।
प्रेमपूर्वमुवाचेदं विनम्रो जाह्नवीसुतः ॥
गाङ्गेय उवाच
पित्रे देहि सुतां तेऽद्य प्रार्थयामि सुमध्यमाम् ।
माता मेऽस्तु सुतेयं ते दासोऽस्म्यस्याः परन्तप ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ हे राजन्! आप बताइये कि आपको किस । बातकी चिन्ता है? मैं अभी धनुष लेकर उसका निवारण कर दूँगा । यदि मेरे इस शरीर से भी आपका कार्य सिद्ध हो सके तो मैं आपकी अभिलाषा पूर्ण ४३ करनेको तत्पर हूँ । उस पुत्रको धिक्कार है, जो समर्थ होकर भी अपने पिताकी इच्छाको पूर्ण नहीं करता । जिस पुत्रके द्वारा पिताकी चिन्ता दूर न हुई, उस पुत्रका जन्म लेनेका क्या प्रयोजन? ॥ ४३-४४ ॥ ४४ सूतजी बोले- अपने पुत्र गांगेयका वचन सुनकर महाराज शन्तनु मनमें लज्जित होते हुए उससे शीघ्र ही कहने लगे ॥ ४५ ॥
राजा बोले- हे पुत्र! मुझे यही महान् चिन्ता ४५ है कि तुम मेरे इकलौते पुत्र हो । यद्यपि तुम बलवान्, स्वाभिमानी, रणस्थलमें पीठ न दिखानेवाले साहसी पुत्र हो तथापि केवल एक पुत्र होनेके कारण मुझ पिताका जीवन व्यर्थ है; क्योंकि यदि कहीं किसी ४६ समरमें तुम्हें अमरगति प्राप्त हो गयी तो मैं असहाय होकर क्या कर सकूँगा? यही मुझे सबसे बड़ी चिन्ता ४७ लगी है; इसी कारण मैं आजकल दुःखित रहता हूँ । हे पुत्र! इसके अतिरिक्त मुझे दूसरी कोई चिन्ता नहीं है, जिसे मैं तुम्हारे सामने कहूँ ॥ ४६–४८ ॥ ४८ सूतजी बोले- यह सुनकर गांगेयने वृद्ध मन्त्रियोंसे पूछा कि लज्जासे परिपूर्ण महाराज मुझे कुछ बता नहीं रहे हैं ॥ ४ ९ ॥ आपलोग राजाकी भावना जानकर सही एवं ४ ९ निश्चित कारण मुझे बताइये; मैं प्रसन्नतापूर्वक उसे सम्पन्न करूँगा ॥५० ॥
५० यह सुनकर मन्त्रिगण राजाके पास गये और सब कारण सही - सही जानकर उन्होंने युवराज गांगेयसे आकर कह दिया । तब उनका अभिप्राय ५१ जानकर गांगेय विचार करने लगे । मन्त्रियोंके साथ गंगापुत्र देवव्रत उस निषादके घर शीघ्र गये और ५२ प्रेमके साथ विनम्र होकर यह कहने लगे ॥ ५१-५२ ॥ गांगेय बोले - हे परन्तप! आप अपनी सुन्दरी कन्या मेरे पिताजीके लिये प्रदान कर दें - यही मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ । आपकी ये कन्या मेरी माता ५३ हों और मैं इनका सेवक रहूँगा ॥ ५३ ॥
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अ ० ६ ] दाश उवाच
त्वं गृहाण महाभाग पत्नीं कुरु नृपात्मज ।
पुत्रोऽस्या न भवेद् राजा वर्तमाने त्वयीति वै ॥
गाङ्गेय उवाच
मातेयं मम दाशेयी राज्यं नैव करोम्यहम् ।
पुत्रोऽस्याः सर्वथा राज्यं करिष्यति न संशयः ॥
दाश उवाच
सत्यं वाक्यं मया ज्ञातं पुत्रस्ते बलवान्भवेत् ।
सोऽपि राज्यं बलान्नूनं गृह्णीयादिति निश्चयः ॥
गाङ्गेय उवाच न दारसंग्रहं नूनं करिष्यामि हि सर्वथा सत्यं मे वचनं तात मया भीष्मं व्रतं कृतम् सूत उवाच एवं कृतां प्रतिज्ञां तु निशम्य झषजीवकः ददौ सत्यवतीं तस्मै राज्ञे सर्वाङ्गशोभनाम् अनेन विधिना तेन वृता सत्यवती प्रिया न जानाति परं जन्म व्यासस्य नृपसत्तमः द्वितीय स्कन्ध २०१ निषादने कहा— हे महाभाग! हे नृपनन्दन! आप स्वयं ही इसे अपनी भार्या बनाइये; क्योंकि ५४ आपके रहते इसका पुत्र राजा नहीं हो सकेगा ॥ ५४ ॥
गांगेय बोले- आपकी यह कन्या मेरी माता है । मैं राज्य नहीं करूँगा । इसका पुत्र ही निश्चितरूपसे राज्य करेगा; इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ५५ ॥
५५ निषादने कहा- मैंने आपकी बात सही मान ली; परंतु यदि आपका पुत्र बलवान् हुआ तो वह बलपूर्वक राज्यको निश्चय ही ले लेगा ॥ ५६ ॥
५६ गांगेय बोले- हे तात! मैं कभी विवाह नहीं करूँगा; मेरा यह वचन सर्वथा सत्य है - यह मैंने । भीष्म प्रतिज्ञा कर ली ॥ ५७ ॥
॥ ५७ सूतजी बोले- गांगेयद्वारा की गयी ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर निषादने उन राजा शन्तनुको अपनी सर्वांगसुन्दरी । कन्या सत्यवती सौंप दी ॥ ५८ ॥
॥ ५८ इस प्रकार राजा शन्तनुने प्रिया सत्यवतीसे । विवाह कर लिया । वे नृपश्रेष्ठ शन्तनु पूर्वमें सत्यवतीसे ॥ ५ ९ व्यासजीका जन्म नहीं जानते थे ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे देवव्रतप्रतिज्ञावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः दुर्वासाका कुन्तीको अमोघ कामद मन्त्र देना, मन्त्रके प्रभावसे कन्यावस्थामें ही कर्णका जन्म, कुन्तीका राजा पाण्डुसे विवाह, शापके कारण पाण्डुका सन्तानोत्पादनमें असमर्थ होना, मन्त्र - प्रयोगसे कुन्ती और माद्रीका पुत्रवती होना, पाण्डुकी मृत्यु और पाँचों पुत्रों को लेकर कुन्तीका हस्तिनापुर आना सूत उवाच
एवं सत्यवती तेन वृता शन्तनुना किल ।
द्वौ पुत्रौ च तया जातौ मृतौ कालवशादपि ॥
व्यासवीर्यात्तु सञ्जातो धृतराष्ट्रोऽन्ध एव च ।
मुनिं दृष्ट्वाथ कामिन्या नेत्रसम्मीलने कृते ॥
श्वेतरूपा यतो जाता दृष्ट्वा व्यासं नृपात्मजा ।
व्यासकोपात्समुत्पन्नः पाण्डुस्तेन न संशयः ॥
सूतजी बोले- इस प्रकार उन शन्तनुने सत्यवतीसे विवाह कर लिया । उसको [ चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक ] दो पुत्र उत्पन्न हुए और कालवश वे दोनों १ मृत्युको भी प्राप्त हो गये ॥ १ ॥
पुनः व्यासजीके तेजसे धृतराष्ट्र उत्पन्न हुए, जो जन्मसे ही अन्धे थे; क्योंकि मुनिको देखकर उस २ स्त्रीने अपने नेत्र बन्द कर लिये थे ॥२ ॥
तत्पश्चात् छोटी रानी व्यासजीको देखकर पीली पड़ गयी, जिससे व्यासजीके कोपके कारण उससे ३ । पीतवर्ण पाण्डुका जन्म हुआ; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥