देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 211–220

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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२०२ सन्तोषितस्तया व्यासो दास्या कामकलाविदा विदुरस्तु समुत्पन्नो धर्मांशः सत्यवाक् शुचिः राज्ये संस्थापितः पाण्डुः कनीयानपि मन्त्रिभिः अन्धत्वाद् धृतराष्ट्रोऽसौ नाधिकारे नियोजितः भीष्मस्यानुमते राज्यं प्राप्तः पाण्डुर्महाबलः विदुरोऽप्यथ मेधावी मन्त्रकार्ये नियोजितः धृतराष्ट्रस्य द्वे भार्ये गान्धारी सौबली स्मृता द्वितीया च तथा वैश्या गार्हस्थ्येषु प्रतिष्ठिता पाण्डोरपि तथा पल्यौ द्वे प्रोक्ते वेदवादिभिः । शौरसेनी तथा कुन्ती माद्री च मद्रदेशजा

गान्धारी सुषुवे पुत्रशतं परमशोभनम् ।

वैश्याप्येकं सुतं कान्तं युयुत्सुं सुषुवे प्रियम् ॥

कुन्ती तु प्रथमं कन्या सूर्यात्कर्णं मनोहरम् ।

सुषुवे पितृगेहस्था पश्चात्पाण्डुपरिग्रहः ॥

ऋषय ऊचुः

किमेतत्सूत चित्रं त्वं भाषसे मुनिसत्तम ।

जनितश्च सुतः पूर्वं पाण्डुना सा विवाहिता ॥

सूर्यात्कर्णः कथं जातः कन्यायां वद विस्तरात् ।

कन्या कथं पुनर्जाता पाण्डुना सा विवाहिता ॥

सूत उवाच

शूरसेनसुता कुन्ती बालभावे यदा द्विजाः ।

कुन्तिभोजेन राज्ञा तु प्रार्थिता कन्यका शुभा ॥

कुन्तिभोजेन सा बाला पुत्री तु परिकल्पिता ।

सेवनार्थं तु दीप्तस्य विहिता चारुहासिनी ॥

दुर्वासास्तु मुनिः प्राप्तश्चातुर्मास्ये स्थितो द्विजः ।

परिचर्या कृता कुन्त्या मुनिस्तोषं जगाम ह ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ | निपुण दासीने व्यासजीको सन्तुष्ट किया, जिसके ॥ ४ परिणामस्वरूप धर्मके अंश, सत्यवादी तथा पवित्र विचारवाले विदुर उत्पन्न हुए ॥४ ॥

। [ बड़े होनेपर भी ] अन्धे होनेके कारण ॥ ५ धृतराष्ट्रको राज्य नहीं दिया गया और छोटे होते हुए भी पाण्डुको ही मन्त्रियोंने राजसिंहासनपर अभिषिक्त । किया । भीष्मकी सम्मतिसे ही महाबली पाण्डुको ॥ राज्य प्राप्त हुआ तथा प्रतिभासम्पन्न विदुरजी मन्त्रणा-कार्यमें नियुक्त किये गये॥५-६ ॥ । धृतराष्ट्रकी दो स्त्रियाँ थीं । उनमें पहली सुबलपुत्री ॥ ७ गान्धारी कही गयी है और दूसरी एक वैश्यपुत्री थी, जो गृहकार्योंमें प्रतिष्ठित की गयी थी ॥ ७ ॥

वेदवादी विद्वानोंने पाण्डुकी भी दो पत्नियाँ ॥ ८ बतायी हैं । एक शूरसेनकी पुत्री कुन्ती और दूसरी मद्रदेशकी राजकुमारी माद्री ॥ ८ ॥

गान्धारीने परम सुन्दर सौ पुत्र उत्पन्न किये एवं ९ वैश्या रानीने युयुत्सु नामका एक कान्तिमान् और प्रिय पुत्र उत्पन्न किया ॥ ९ ॥

कुन्तीने कुमारी अवस्थामें ही अपने पिताके घर १० रहते हुए सूर्यसे कर्ण नामक एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया था; तदनन्तर कुन्तीका विवाह पाण्डुसे हुआ ॥१० ॥

ऋषिगण बोले- हे मुनिवर सूतजी! आप यह कैसी आश्चर्यजनक बात बता रहे हैं? पहले पुत्र ११ उत्पन्न हुआ और बादमें पाण्डुके साथ कुन्तीका विवाह हुआ! ॥ ११ ॥

सूर्यके द्वारा कन्या कुन्तीसे कर्णकी उत्पत्ति कैसे १२ हुई? वह कुन्ती पुनः कन्या कैसे रह गयी, जो । पाण्डुके साथ उसका विवाह हो गया । यह आप विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १२ ॥

सूतजी बोले- हे द्विजगण! शूरसेनकी वह १३ | पुत्री कुन्ती जब शिशु थी, तभी राजा कुन्तिभोजने उस सुन्दर कन्याको माँग लिया था । उन्होंने उस चारुहासिनी कन्याको अपनी पुत्री बनाकर रखा और उसे अग्निहोत्रके १४ काममें नियुक्त कर दिया॥१३-१४ ॥ एक बार महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुँचे और चातुर्मास्य के लिये वहीं रहने लगे । कुन्तीने उनकी १५ | सेवा की, जिससे मुनिवर सन्तुष्ट हुए और उसको

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अ ० ६ ] द्वितीय

ददौ मन्त्रं शुभं तस्यै येनाहूतः सुरः स्वयम् ।

समायाति तथा कामं पूरयिष्यति वाञ्छितम् ॥ १६

गते मुनौ ततः कुन्ती निश्चयार्थं गृहे स्थिता ।

चिन्तयामास मनसा कं सुरं समचिन्तये ॥ १७

उदितश्च तदा भानुस्तया दृष्टो दिवाकरः ।

मन्त्रोच्चारं तया कृत्वा चाहूतस्तिग्मगुस्तदा ॥ १८

मण्डलान्मानुषं रूपं कृत्वा सर्वातिपेशलम् ।

अवातरत्तदाकाशात्समीपे तत्र मन्दिरे ॥ १ ९

दृष्ट्वा देवं समायान्तं कुन्ती भानुं सुविस्मिता ।

वेपमाना रजोदोषं प्राप्ता सद्यस्तु भामिनी ॥ २०

कृताञ्जलिः स्थिता सूर्यं बभाषे चारुलोचना ।

सुप्रीता दर्शनेनाद्य गच्छ त्वं निजमण्डलम् ॥ २१

सूर्य उवाच

आहूतोऽस्मि कथं कुन्ति त्वया मन्त्रबलेन वै ।

न मां भजसि कस्मात्त्वं समाहूय पुरोगतम् ॥ २२

कामार्तोऽस्म्यसितापाङ्गि भज मां भावसंयुतम् ।

मन्त्रेणाधीनतां प्राप्तं क्रीडितुं नय मामिति ॥ २३

कुन्त्युवाच

कन्यास्म्यहं तु धर्मज्ञ सर्वसाक्षिन्नमाम्यहम् ।

तवाप्यहं न दुर्वाच्या कुलकन्यास्मि सुव्रत ॥ २४

सूर्य उवाच

लज्जा मे महती चाद्य यदि गच्छाम्यहं वृथा ।

वाच्यतां सर्वदेवानां यास्याम्यत्र न संशयः ॥ २५

शस्यामि तं द्विजं चाद्य येन मन्त्रः समर्पितः ।

त्वां चापि सुभृशं कुन्ति नोचेन्मां त्वं भजिष्यसि ॥ २६

कन्याधर्मः स्थिरस्ते स्यान्न ज्ञास्यन्ति जनाः किल ।

मत्समस्तु तथा पुत्रो भविता ते वरानने ॥ २७

स्कन्ध २०३ एक ऐसे मन्त्रका उपदेश दिया, जिसके प्रयोगसे आवाहित किये गये देवता स्वयं उपस्थित होंगे और उसकी अभिलाषा पूर्ण करेंगे ॥ १५-१६ ॥ दुर्वासामुनिके वहाँसे चले जानेपर अपने गृहमें बैठी हुई कुन्ती उस मन्त्रकी परीक्षाके लिये मनमें सोचने लगी कि मैं किस देवताका ध्यान करूँ? ॥ १७ ॥

उसने पूर्व दिशामें उदित होते हुए सूर्यको देखा और उस मन्त्रका उच्चारण करके उसने सूर्यका आवाहन किया । तब सूर्य अपने मण्डलसे अत्यन्त सुन्दर मनुष्यका रूप धारण करके आकाशसे कुन्तीके पास उस भवनमें उतर आये ॥ १८-१९ ॥ सूर्यदेवको आते हुए देखकर कुन्ती आश्चर्यचकित हो गयी । वह सुन्दरी काँपती हुई तत्काल रजोधर्मको प्राप्त हो गयी ॥ २० ॥

उस समय सुन्दर नेत्रवाली कुन्ती हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी और सूर्यसे बोली- मैं आपके दर्शनसे प्रसन्न हो गयी; अब आप अपने मण्डलको चले जाइये ॥ २१ ॥

सूर्य बोले - हे कुन्ति! तुमने मन्त्रबलसे मुझे क्यों बुलाया है? तुम मुझे बुला करके भी अपने समक्ष उपस्थित मुझ सूर्यकी सेवा क्यों नहीं करती? ॥ २२ ॥

हे चारुलोचने! मैं इस समय कामार्त हूँ, अतः प्रेमके साथ मेरा सेवन करो । मन्त्रके द्वारा अधीनताको प्राप्त मुझको तुम विहार करनेके लिये ले चलो ॥२३ ॥

कुन्ती बोली - हे धर्मज्ञ! मैं अभी कन्या हूँ ॥ हे सर्वसाक्षिन्! मैं आपको प्रणाम करती हूँ । सुव्रत! आप मेरे प्रति अनुचित बातें न कहें; क्योंकि मैं कुलीन कन्या हूँ ॥२४ ॥

सूर्य बोले- यदि मैं इस समय व्यर्थ लौट जाता हूँ तो मेरे लिये बड़ी लज्जाकी बात होगी और मैं सभी देवताओंमें निन्दाका पात्र बनूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ २५ ॥

कुन्ति! यदि तुम मेरे साथ रमण नहीं करोगी तो मैं तुम्हें तथा उस मुनिको शाप दे दूँगा, जिसने तुम्हें वह मन्त्र बताया है । हे सुन्दरि! तुम्हारा कन्याधर्म स्थिर रहेगा । इस रहस्यको लोग नहीं जान सकेंगे तथा हे वरानने! मेरे समान ही तेजस्वी पुत्र तुमको । प्राप्त होगा ॥ २६-२७ ॥।

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२०४ इत्युक्त्वा तरणिः कुन्तीं तन्मनस्कां सुलज्जिताम् भुक्त्वा जगाम देवेशो वरं दत्त्वातिवाञ्छितम् ॥ गर्भं दधार सुश्रोणी सुगुप्ते मन्दिरे स्थिता । धात्री वेद प्रिया चैका न माता न जनस्तथा

गुप्तः सद्मनि पुत्रस्तु जातश्चातिमनोहरः ।

कवचेनातिरम्येण कुण्डलाभ्यां समन्वितः ॥

द्वितीय इव सूर्यस्तु कुमार इव चापरः ।

करे कृत्वाथ धात्रेयी तामुवाच सुलज्जिताम् ॥

कां चिन्तां करभोरु त्वमाधत्सेऽद्य स्थितास्म्यहम् ।

मञ्जूषायां सुतं कुन्ती मुञ्चन्ती वाक्यमब्रवीत् ॥

किं करोमि सुतार्ताहं त्यजे त्वां प्राणवल्लभम् ।

मन्दभाग्या त्यजामि त्वां सर्वलक्षणसंयुतम् ॥

पातु त्वां सगुणागुणा भगवती सर्वेश्वरी चाम्बिका स्तन्यं सैव ददातु विश्वजननी कात्यायनी कामदा । द्रक्ष्येऽहं मुखपङ्कजं सुललितं प्राणप्रियार्हं कदा त्यक्त्वा त्वां विजने वने रविसुतं दुष्टा यथा स्वैरिणी ॥ पूर्वस्मिन्नपि जन्मनि त्रिजगतां माता न चाराधिता न ध्यातं पदपङ्कजं सुखकरं देव्याः शिवायाश्चिरम् । तेनाहं सुत दुर्भगास्मि सततं त्यक्त्वा पुनस्त्वां वने तप्स्यामि प्रिय पातकं स्मृतवती बुद्ध्या कृतं यत्स्वयम् ॥ सूत उवाच इत्युक्त्वा तं सुतं कुन्ती मञ्जूषायां धृतं किल । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ । यह कहकर सूर्यदेव अपनी ओर आसक्त मनवाली २८ एवं लज्जाशील उस कुन्तीसे संसर्ग करके तथा उसे मनोवांछित वरदान देकर चले गये ॥ २८ ॥

इस प्रकार उस सुश्रोणी कुन्तीने गर्भ धारण किया और वह अत्यन्त गुप्त भवनमें रहने लगी । ॥ २ ९ केवल उसकी एक प्रिय दासी ही इस रहस्यको जानती थी, कुन्तीके माता - पिता भी इसे नहीं जानते थे ॥ २ ९ ॥ ३० यथासमय उसी गुप्त भवनमें कुन्तीको एक अत्यन्त सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सुन्दर कवच तथा दो कुण्डलोंसे युक्त था और दूसरे सूर्य तथा कुमार कार्तिकेयके समान प्रतीत हो रहा था । धात्रीने ३१ उसे अपने हाथमें उठाकर लज्जायुक्त कुन्तीसे कहा- | — हे सुन्दरि! मैं यहाँ हूँ, अत: तुम किस बातकी चिन्ता कर रही हो? ॥३०-३१३ ॥ तत्पश्चात् काष्ठमंजूषामें पुत्रको छोड़ती हुई ३२ कुन्ती कहने लगी- हे पुत्र! मैं क्या करूँ? मैं अत्यन्त दुःखित हूँ, जो कि तुझ प्राणप्रियको त्याग रही हूँ । मैं अभागिन तुझ सर्वलक्षणसम्पन्नका परित्याग कर दे ३३ रही हूँ ॥ ३२-३३ ॥ सगुणा, निर्गुणा तथा सबकी स्वामिनी वे भगवती अम्बिका तुम्हारी रक्षा करें । वे जगज्जननी कामप्रदा कात्यायनी तुम्हें दुग्धपान करायें । हे पुत्र! तुम साक्षात् सूर्यनारायणके पुत्र हो और मेरे प्राणप्रिय हो - ऐसे तुमको इस निर्जन वनमें एक दुष्ट तथा ३४ कुलटा स्त्रीकी भाँति छोड़कर मैं कब तुम्हारा अति सुन्दर मुखकमल देख पाऊँगी ॥३४ ॥

हे पुत्र! प्रतीत होता है कि मैंने पूर्वजन्ममें भी तीनों लोकोंकी जननी भगवतीकी आराधना नहीं की थी तथा भगवती शिवाके सुखदायक चरणकमलका भी मैंने कभी ध्यान नहीं किया था; इसी कारण मैं ३५ । सदा अभागिनी हूँ । हे प्रिय! मैं तुम्हें इस वनमें त्यागकर जान - बूझकर स्वयं किये गये इस पापका स्मरण करती हुई सन्ताप सहूँगी ॥ ३५ ॥

सूतजी बोले- इस प्रकार कहकर कुन्तीने मंजूषामें रखे हुए उस पुत्रको लोगोंकी दृष्टिसे बचाते धात्रीहस्ते ददौ भीता जनदर्शनतस्तथा ॥ ३६ | हुए भयभीतभावसे धात्रीके हाथमें दे दिया ॥ ३६ ॥

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अ ० ६ ] द्वितीय

स्नात्वा त्रस्ता तदा कुन्ती पितृवेश्मन्युवास सा ।

मञ्जूषा वहमाना च प्राप्ता ह्यधिरथेन वै ॥ ३७

राधा सूतस्य भार्या वै तयासौ प्रार्थितः सुतः ।

कर्णोऽभूद् बलवान्वीरः पालितः सूतसद्मनि ॥ ३८

कुन्ती विवाहिता कन्या पाण्डुना सा स्वयम्वरे ।

माद्री चैवापरा भार्या मद्रराजसुता शुभा ॥ ३ ९

मृगयां रममाणस्तु वने पाण्डुर्महाबलः ।

जघान मृगबुद्धया तु रममाणं मुनिं वने ॥ ४०

शप्तस्तेन तदा पाण्डुर्मुनिना कुपितेन च ।

स्त्रीसङ्गं यदि कर्तासि तदा ते मरणं ध्रुवम् ॥ ४१

इति शप्तस्तु मुनिना पाण्डुः शोकसमन्वितः ।

त्यक्त्वा राज्यं वने वासं चकार भृशदुःखितः ॥ ४२

कुन्ती माद्री च भार्ये द्वे जग्मतुः सह सङ्गते ।

सेवनार्थं सतीधर्मं संश्रिते मुनिसत्तमाः ॥ ४३

गङ्गातीरे स्थितः पाण्डुर्मुनीनामाश्रमेषु च ।

शृण्वानो धर्मशास्त्राणि चकार दुश्चरं तपः ॥ ४४

कथायां वर्तमानायां कदाचिद्धर्मसंश्रितम् ।

अशृणोद्वचनं राजा सुपृष्टं मुनिभाषितम् ॥ ४५

अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे गन्तुं परन्तप ।

येन केनाप्युपायेन पुत्रस्य जननं चरेत् ॥ ४६

अंशजः पुत्रिकापुत्रः क्षेत्रजो गोलकस्तथा ।

कुण्डः सहोढः कानीनः क्रीतः प्राप्तस्तथा वने ॥ ४७

दत्त: केनापि चाशक्तौ धनग्राहिसुताः स्मृताः ।

उत्तरोत्तरतः पुत्रा निकृष्टा इति निश्चयः ॥ ४८

स्कन्ध २०५ तत्पश्चात् स्नान करके भयभीत वह कुन्ती अपने पिताके घरमें रहने लगी । जलमें बहती हुई वह मंजूषा अधिरथ नामक सूतको प्राप्त हुई । उस सूतकी भार्या राधा थी । उसने बच्चेको माँग लिया । इस प्रकार सूतके घरमें पलकर वह कर्ण बलवान् तथा वीर हो गया ॥ ३७-३८ ॥ इसके बाद स्वयंवरमें कुन्तीका विवाह पाण्डुके साथ हुआ । उनकी दूसरी पत्नी मद्रदेशके राजाकी सुलक्षणा कन्या माद्री थी ॥ ३ ९ ॥ एक बार वनमें आखेट करनेमें तत्पर महाबली पाण्डुने मृग समझकर रमण करते हुए एक मुनिपर प्रहार कर दिया । तब उस कुपित मुनिने पाण्डुको शाप दे दिया कि यदि तुम स्त्रीके साथ संसर्ग करोगे तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है ॥ ४०-४१ ॥ मुनिके यह शाप दे देनेपर पाण्डु शोकाकुल हो गये । वे राज्य त्यागकर अत्यन्त दुःखित हो वनमें रहने लगे ॥ ४२ ॥

हे मुनिवरो! उनकी दोनों पत्नियाँ माद्री और कुन्ती भी सतीधर्मका आश्रय लेकर उनकी सेवा करनेके लिये उनके साथ ही वनमें चली गयीं ॥ ४३ ॥

राजा पाण्डु गंगाजीके तटपर मुनियोंके आश्रमोंमें रहने लगे और धर्मशास्त्रोंका श्रवण करते हुए कठिन तपस्या करने लगे ॥ ४४ ॥

किसी समय कथाप्रसंगमें सम्यक् प्रकारसे पूछने पर किसी मुनिके द्वारा कहा गया यह धार्मिक वचन राजाने सुना- हे परन्तप! अपुत्रकी गति नहीं होती; वह स्वर्ग जानेका अधिकारी नहीं होता अतएव जिस किसी भी उपायसे पुत्र उत्पन्न करना | चाहिये ॥ ४५-४६ II अंशज, पुत्रिकापुत्र, क्षेत्रज, गोलक, कुण्ड, सहोढ, कानीन, क्रीत, वनमें प्राप्त, पालन करनेमें असमर्थ किसीका दिया हुआ - इतने प्रकारके पुत्र पिताकी सम्पत्तिके उत्तराधिकारी कहे गये हैं, इनमें उत्तरोत्तर एक दूसरेसे निकृष्ट पुत्र हैं; यह । सुनिश्चित है ॥ ४७-४८ ॥

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२०६ इत्याकर्ण्य तदा प्राह कुन्तीं कमललोचनाम् सुतमुत्पादयाशु त्वं मुनिं गत्वा तपोऽन्वितम् ममाज्ञया न दोषस्ते पुरा राज्ञा महात्मना । वसिष्ठाज्जनितः पुत्रः सौदासेनेति मे श्रुतम्

तं कुन्ती वचनं प्राह मम मन्त्रोऽस्ति कामदः ।

दत्तो दुर्वाससा पूर्वं सिद्धिदः सर्वथा प्रभो ॥

निमन्त्रयेऽहं यं देवं मन्त्रेणानेन पार्थिव ।

आगच्छेत्सर्वथासौ वै मम पार्श्वं निमन्त्रितः ॥

भर्तुर्वाक्येन सा तत्र स्मृत्वा धर्मं सुरोत्तमम् ।

सङ्गम्य सुषुवे पुत्रं प्रथमं च युधिष्ठिरम् ॥

वायोर्वृकोदरं पुत्रं जिष्णुं चैव शतक्रतोः ।

वर्षे वर्षे त्रयः पुत्राः कुन्त्या जाता महाबलाः ॥

माद्री प्राह पतिं पाण्डुं पुत्रं मे कुरु सत्तम ।

किं करोमि महाराज दुःखं नाशय मे प्रभो ॥

प्रार्थिता पतिना कुन्ती ददौ मन्त्रं दयान्विता ।

एकपुत्रप्रबन्धेन माद्री पतिमते स्थिता ॥

स्मृत्वा तदाश्विनौ देवौ मद्रराजसुता सुतौ ।

नकुलः सहदेवश्च सुषुवे वरवर्णिनी ॥

एवं ते पाण्डवाः पञ्च क्षेत्रोत्पन्नाः सुरात्मजाः । वर्षवर्षान्तरे जाता वने तस्मिन्द्विजोत्तमाः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ । यह सुनकर राजा पाण्डुने कमलके समान ॥ ४ ९ नेत्रवाली कुन्तीसे कहा- तुम किसी तपोनिष्ठ मुनिके पास जाकर शीघ्र पुत्र उत्पन्न करो । मेरी आज्ञा होने के कारण तुम्हें दोष नहीं लगेगा । मैंने सुना है कि पूर्वकालमें महात्मा राजा सौदासने वसिष्ठसे पुत्र ॥ ५० उत्पन्न कराया था ॥ ४ ९ -५० ॥ कुन्ती उनसे यह वचन बोली- सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाला एक मन्त्र मेरे पास है । हे प्रभो! ५१ पूर्वकालमें महर्षि दुर्वासाने सिद्धि प्रदान करनेवाला वह मन्त्र मुझे प्रदान किया था ॥ ५१ ॥

हे राजन्! मैं इस मन्त्रद्वारा जिस देवताका ५२ आवाहन करूँगी, वह निमन्त्रित होकर निश्चय ही मेरे पास आ जायगा ॥ ५२ ॥

पतिकी आज्ञासे वहाँ कुन्तीने देवताओंमें श्रेष्ठ धर्मराजका स्मरण करके उनके संयोगसे सर्वप्रथम ५३ । युधिष्ठिरको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया ॥५३ ॥

तत्पश्चात् उसने वायुके द्वारा भीमको और इन्द्रके द्वारा अर्जुनको उत्पन्न किया । इस प्रकार एक-५४ एक वर्षके अन्तरालमें कुन्तीके तीन महाबली पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ५४ ॥

इसके बाद माद्रीने भी अपने पति पाण्डुसे कहा - हे श्रेष्ठ! मुझे भी पुत्र प्रदान कीजिये । हे ५५ महाराज! मैं क्या करूँ? हे प्रभो! मेरा दुःख दूर कीजिये ॥ ५५ ॥

तब पति पाण्डुके प्रार्थना करनेपर दयालु ५६ कुन्तीने वह मन्त्र माद्रीको बता दिया । सुन्दरी माद्रीने भी एक पुत्रकी प्राप्ति के लिये पतिसे अनुमति पाकर अश्विनीकुमारोंका स्मरण करके नकुल और सहदेव ५७ नामक दो पुत्र उत्पन्न किये ॥ ५६-५७ ॥ हे मुनिवरो! इस प्रकार वे पाँचों पाण्डव देवताओंके पुत्र थे । वे क्षेत्रज पुत्रके रूपमें उस वनमें क्रमशः एक - एक वर्षके अन्तरसे उत्पन्न हुए ॥ ५८ ॥

॥ ५८ एक बार राजा पाण्डुने माद्रीको निर्जन आश्रममें देखकर अपनी मृत्यु निकट आयी होनेके कारण एकस्मिन्समये पाण्डुर्माद्रीं दृष्ट्वाथ निर्जने । अत्यन्त कामातुर हो पकड़ लिया । माद्रीके द्वारा आश्रमे चातिकामार्तो जग्राहागतवैशसः ॥ ५ ९ ' नहीं - नहीं ' - ऐसा कहकर बार - बार निषेध करनेपर

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अ ० ६ ]

मामा मामेति बहुधा निषिद्धोऽपि तया भृशम् ।

आलिलिङ्ग प्रियां दैवात्पपात धरणीतले ॥

यथा वृक्षगता वल्ली छिन्ने पतति वै द्रुमे ।

तथा सा पतिता बाला कुर्वन्ती रोदनं बहु ॥

प्रत्यागता तदा कुन्ती रुदती बालकास्तथा ।

मुनयश्च महाभागाः श्रुत्वा कोलाहलं तदा ॥

मृतः पाण्डुस्तदा सर्वे मुनयः संशितव्रताः ।

सहाग्निभिर्विधिं कृत्वा गङ्गातीरे तदादहन् ॥

चक्रे सहैव गमनं माद्री दत्त्वा सुतौ शिशू । कुन्त्यै धर्मं पुरस्कृत्य सतीनां सत्यकामतः जलदानादिकं कृत्वा मुनयस्तत्र वासिनः पञ्चपुत्रयुतां कुन्तीमनयन्हस्तिनापुरम् तां प्राप्तां च समाज्ञाय गाङ्गेयो विदुरस्तथा नगरीं धृतराष्ट्रस्य सर्वे तत्र समाययुः पप्रच्छुश्च जनाः सर्वे कस्य पुत्रा वरानने पाण्डोः शापं समाज्ञाय कुन्ती दुःखान्विता तदा तानुवाच सुराणां वै पुत्राः कुरुकुलोद्भवाः विश्वासार्थं समाहूताः कुन्त्या सर्वे सुरास्तदा आगत्य खे तदा तैस्तु कथितं नः सुताः किल भीष्मेण सत्कृतं वाक्यं देवानां सत्कृताः सुताः गता नागपुरं सर्वे तानादाय सुतान्वधूम् भीष्मादयः प्रीतचित्ताः पालयामासुरर्थतः एवं पार्थाः समुत्पन्ना गाङ्गेयेनाथ पालिताः द्वितीय स्कन्ध २०७ भी उन्होंने बलपूर्वक अपनी उस प्रियाका आलिंगन ६० कर लिया और वे दैववश [ शापके कारण ] पृथ्वीपर गिर पड़े ॥५ ९ -६० ॥ जैसे वृक्षपर चढ़ी हुई लता वृक्षके कट जानेपर ६१ गिर पड़ती है, वैसे ही वह रानी माद्री भी बहुत रुदन करती हुई गिर पड़ी ॥ ६१ ॥

उस समय कोलाहल सुनकर रोती हुई कुन्ती, सभी ६२ बालक और महाभाग मुनिगण भी वहाँ आ गये ॥ ६२ ॥

इस प्रकार जब पाण्डु मर गये, तब सभी व्रतधारी मुनियोंने गंगाके तटपर चिता लगाकर उनका ६३ दाह संस्कार कर दिया । तत्पश्चात् अपने दोनों पुत्र कुन्तीको सौंप करके सती - धर्मका पालन करते हुए वह माद्री सत्यकी कामनासे उनके साथ ही सती हो । ६४ गयी ॥ ६३-६४ ॥ वहाँके निवासी मुनिगण जलांजलि आदि देकर । पाँचों पुत्रोंसहित कुन्तीको हस्तिनापुर ले आये ॥ ६५ ॥

॥ ६५ धृतराष्ट्रकी नगरी हस्तिनापुरमें कुन्तीके आनेका समाचार पाकर भीष्म, विदुर आदि सभी लोग । वहाँ आ पहुँचे ॥६६ ॥

॥ ६६ सभी लोगोंने कुन्तीसे पूछा – हे सुमुखि! ये किसके पुत्र हैं? तब कुन्ती अत्यन्त दुःखित होकर । पाण्डुकी शापजन्य मृत्युका उल्लेख करके बोली– ॥ ६७ कुरुवंशमें उत्पन्न हुए ये सब बालक देवताओंके पुत्र हैं । उन्हें विश्वास दिलानेके लिये कुन्तीने उस । समय सभी देवताओंका आह्वान भी किया, तब उन ॥ ६८ देवताओंने आकाशमें प्रकट होकर कहा - ये पाँचों निःसन्देह हमलोगोंके पुत्र हैं । भीष्मने देवताओंके 1 वचनका अनुमोदन किया तथा कुन्तीके पाँचों पुत्रोंका ॥ ६ ९ स्वागत किया ॥ ६७–६९ ॥ तत्पश्चात् उन पुत्रों तथा वधू कुन्तीको लेकर । भीष्म आदि सभी लोग हस्तिनापुर चले गये और ॥ ७० प्रसन्नचित्त होकर प्रयत्नपूर्वक उनका पालन - पोषण करने लगे । इस प्रकार पाण्डव उत्पन्न हुए और ॥ ७१ । भीष्मने उनका परिपालन किया ॥ ७०-७१ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे युधिष्ठिरादीनामुत्पत्तिवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

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२०८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ अथ सप्तमोऽध्यायः धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरसे दुर्योधनके पिण्डदानहेतु धन माँगना, भीमसेनका प्रतिरोध; धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती, विदुर और संजयका वनके लिये प्रस्थान, वनवासी धृतराष्ट्र तथा माता कुन्तीसे मिलनेके लिये युधिष्ठिरका भाइयोंके साथ वनगमन, विदुरका महाप्रयाण, धृतराष्ट्रसहित पाण्डवोंका व्यासजीके आश्रमपर आना, देवीकी कृपासे व्यासजीद्वारा महाभारत - युद्धमें मरे कौरवों - पाण्डवोंके परिजनोंको बुला देना सूत उवाच पञ्चानां द्रौपदी भार्या सा मान्या सा पतिव्रता पञ्च पुत्रास्तु तस्याः स्युर्भर्तृभ्योऽतीव सुन्दराः अर्जुनस्य तथा भार्या कृष्णस्य भगिनी शुभा सुभद्रा या हृता पूर्वं जिष्णुना हरिसम्मते तस्यां जातो महावीरो निहतोऽसौ रणाजिरे । अभिमन्युर्हतास्तत्र द्रौपद्याश्च सुताः किल

अभिमन्योर्वरा भार्या वैराटी चातिसुन्दरी ।

कुलान्ते सुषुवे पुत्रं मृतो बाणाग्निना शिशुः ॥

जीवितः स तु कृष्णेन भागिनेयसुतः स्वयम् ।

द्रौणिबाणाग्निनिर्दग्धः प्रतापेनाद्भुतेन च ॥

परिक्षीणेषु वंशेषु जातो यस्माद्वरः सुतः ।

तस्मात्परीक्षितो नाम विख्यातः पृथिवीतले ॥

निहतेषु च पुत्रेषु धृतराष्ट्रोऽतिदुःखितः ।

तस्थौ पाण्डवराज्ये च भीमवाग्बाणपीडितः ॥

गान्धारी च तथातिष्ठत् पुत्रशोकातुरा भृशम् ।

सेवां तयोर्दिवारात्रं चकारार्तो युधिष्ठिरः ॥

विदुरोऽप्यतिधर्मात्मा प्रज्ञानेत्रमबोधयत् ।

युधिष्ठिरस्यानुमते भ्रातृपार्श्वे व्यतिष्ठत ॥

सूतजी बोले - [ हे मुनिगण! ] माननीया द्रौपदी । उन पाँचों पाण्डवोंकी पतिव्रता पत्नी थी । उन द्रौपदीको ॥ १ अत्यन्त सुन्दर पाँच पुत्र उन पतियोंसे उत्पन्न हुए ॥१ ॥

अर्जुनकी एक दूसरी सुन्दर पत्नी श्रीकृष्णकी । बहन सुभद्रा थीं, जिन्हें अर्जुनने पूर्वकालमें भगवान् ॥ २ श्रीकृष्णकी अनुमति से हर लिया था ॥ २ ॥

उन्हीं सुभद्राके गर्भसे महान् वीर अभिमन्युका जन्म हुआ । वह संग्राम - भूमिमें मारा गया था । उसी युद्धमें द्रौपदीके पाँचों पुत्र भी मारे गये थे ॥ ३ ॥

॥ ३ वीर अभिमन्युकी श्रेष्ठ तथा अत्यन्त सुन्दर पत्नी महाराज विराटकी पुत्री उत्तरा थी । [ महाभारतके युद्धमें ] कुरुकुलका नाश हो जानेपर उसने एक पुत्र ४ उत्पन्न किया था; वह द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी बाणाग्निसे [ पहले गर्भमें ही ] मर गया था, किंतु बादमें भगवान् श्रीकृष्णने अश्वत्थामाकी बाणाग्निसे ५ निर्दग्ध अपने भांजेके पुत्रको अपने अद्भुत प्रतापसे पुनः जीवित कर दिया था ॥ ४-५ ॥ कुरुवंशके समाप्त होनेपर वह श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न ६ हुआ था; इसलिये वह बालक ‘ परीक्षित् ’ नामसे पृथ्वीतलपर प्रसिद्ध हुआ ॥ ६ ॥

अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेपर अत्यन्त दुःखित ७ राजा धृतराष्ट्र भीमके वाग्बाणोंसे सन्तप्त रहते हुए अब पाण्डवोंके राज्यमें रहने लगे । वैसे ही गान्धारी भी अत्यन्त दुःखी होकर जीवन - यापन करने लगी । दुःखित युधिष्ठिर दिन - रात उन दोनोंकी सेवा ८ करने लगे ॥ ७-८ ॥ महान् धर्मात्मा विदुर युधिष्ठिरकी अनुमतिसे अपने भाई धृतराष्ट्रके पासमें ही रहते थे और वे उन ९ । प्रज्ञाचक्षुको समझाते - बुझाते रहते थे ॥ ९ ॥

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अ ० ७ ] द्वितीय स्कन्ध २० ९

धर्मपुत्रोऽपि धर्मात्मा चकार सेवनं पितुः ।

पुत्रशोकोद्भवं दुःखं तस्य विस्मारयन्निव ॥

यथा शृणोति वृद्धोऽसौ तथा भीमो ऽतिरोषितः ।

वाग्बाणेनाहनत्तं तु श्रावयन्संस्थिताञ्जनान् ॥

मया पुत्रा हताः सर्वे दुष्टस्यान्धस्य ते रणे ।

दुःशासनस्य रुधिरं पीतं हृद्यं तथा भृशम् ॥

भुनक्ति पिण्डमन्धोऽयं मया दत्तं गतत्रपः ।

ध्वांक्षवद्वा श्ववच्चापि वृथा जीवत्यसौ जनः ॥

एवंविधानि रूक्षाणि श्रावयत्यनुवासरम् ।

आश्वासयति धर्मात्मा मूर्खोऽयमिति च ब्रुवन् ॥

अष्टादशैव वर्षाणि स्थित्वा तत्रैव दुःखितः ।

धृतराष्ट्रो वने यानं प्रार्थयामास धर्मजम् ॥

अयाचत धर्मपुत्रं धृतराष्ट्रो महीपतिः ।

पुत्रेभ्योऽहं ददाम्यद्य निर्वापं विधिपूर्वकम् ॥

वृकोदरेण सर्वेषां कृतमत्रौर्ध्वदैहिकम् ।

न कृतं मम पुत्राणां पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥

ददासि चेद्धनं मह्यं कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम् ।

गमिष्येऽहं वनं तप्तुं तपः स्वर्गफलप्रदम् ॥

एकान्ते विदुरेणोक्तो राजा धर्मसुतः शुचिः ।

धनं दातुं मनश्चक्रे धृतराष्ट्राय चार्थिने । ॥

समाहूय निजान्सर्वानुवाच पृथिवीपतिः ।

धनं दास्ये महाभागाः पित्रे निर्वापकामिने ॥

तच्छ्रुत्वा वचनं भ्रातुर्ज्येष्ठस्यामिततेजसः ।

संग्रहेऽस्य महाबाहुर्मारुतिः कुपितोऽब्रवीत् ॥

धनं देयं महाभाग दुर्योधनहिताय किम् ।

अन्धोऽपि सुखमाप्नोति मूर्खत्वं किमतः परम् ॥

धर्मपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिर भी अपने पितातुल्य १० धृतराष्ट्रके पुत्रशोकजनित दुःखको विस्मारित कराते हुए उनकी सेवा करने लगे ॥१० ॥

जिस किसी भी प्रकार यह वृद्ध धृतराष्ट्र सुन ले ११ [ यह ध्यानमें रखकर ] भीम अत्यन्त क्रोधित होकर अपने वचनरूपी बाणोंसे उनपर सर्वदा प्रहार किया करते थे । वहाँ उपस्थित लोगोंको सुना - सुनाकर भीम कहा करते १२ थे कि मैंने इस दुष्ट अन्धेके सभी पुत्रोंको रणभूमिमें मार डाला और दुःशासनके हृदयका रक्त जी- भरके पी लिया है । अब यह अन्धा निर्लज्ज होकर मेरे दिये हुए पिण्डको १३ कौओं एवं कुत्तोंकी भाँति खाता है । अब तो यह व्यर्थ ही जीवन बिता रहा है ॥ ११ – १३ ॥ भीम इस प्रकारकी कठोर बातें प्रतिदिन उन्हें सुनाते १४ थे; परंतु धर्मात्मा युधिष्ठिर यह कहते हुए धृतराष्ट्रको धैर्य प्रदान करते थे कि यह भीम मूर्ख है ॥ १४ ॥

इस प्रकार उस दुःखी धृतराष्ट्रने अठारह वर्षतक १५ वहाँ रहकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे वनमें जानेकी इच्छा प्रकट की । महाराज धृतराष्ट्रने धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे यह भी प्रार्थना की कि अब मैं अपने पुत्रोंके लिये विधि-१६ पूर्वक पिण्डदान करूँगा । यद्यपि भीमने सभीका और्ध्वदैहिककर्म कर दिया था, किंतु पूर्व वैरका १७ स्मरण करते हुए उन्होंने मेरे पुत्रोंका नहीं किया । अतः यदि आप मुझे कुछ धन दें तो मैं अपने पुत्रोंका और्ध्वदैहिककर्म करके स्वर्गफल देनेवाला तप करनेके १८ लिये वनमें चला जाऊँगा॥१५–१८ ॥ विदुरने भी एकान्तमें पवित्रात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे जब ऐसा कहा तब उन्होंने धनार्थी धृतराष्ट्रको धन १ ९ देनेका निश्चय कर लिया । राजा युधिष्ठिरने परिवारके सभी जनोंको बुलाकर कहा - हे महाभाग! मैं कौरवोंका श्राद्ध करनेके इच्छुक ज्येष्ठ पिताको धन प्रदान २० करूँगा ॥ १ ९ -२० ॥ महातेजस्वी ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरका वचन सुनकर वायुपुत्र महाबली भीमने अत्यन्त क्रोधित २१ होकर कहा - हे महाभाग! दुर्योधनके कल्याणके लिये राजकोषका धन क्यों दिया जाय? इससे अन्धे धृतराष्ट्रको भी सुख मिलेगा; इससे बड़ी मूर्खता और २२ | क्या होगी? ॥ २१ - २२ ॥

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२१० तव दुर्मन्त्रितेनाथ दुःखं प्राप्ता वने वयम् द्रौपदी च महाभागा समानीता दुरात्मना विराटभवने वासः प्रसादात्तव सुव्रत । दासत्वं च कृतं सर्वैर्मत्स्यस्यामितविक्रमैः

देविता त्वं न चेज्ज्येष्ठः प्रभवेत्संक्षयः कथम् ।

सूपकारो विराटस्य हत्वाभूवं तु मागधम् ॥

बृहन्नला कथं जिष्णुर्भवेद् बालस्य नर्तकः ।

कृत्वा वेषं महाबाहुर्योषाया वासवात्मजः ॥

गाण्डीवशोभितौ हस्तौ कृतौ कङ्कणशोभितौ ।

मानुषं च वपुः प्राप्य किं दुःखं स्यादतः परम् ॥

दृष्ट्वा वेणीं कृतां मूर्ध्नि कज्जलं लोचने तथा ।

असिं गृहीत्वा तरसा छेद्मयहं नान्यथा सुखम् ॥

अपृष्ट्वा च महीपालं निक्षिप्तोऽग्निर्मया गृहे ।

दग्धुकामश्च पापात्मा निर्दग्धोऽसौ पुरोचनः ॥

कीचका निहताः सर्वे त्वामपृष्ट्वा जनाधिप ।

न तथा निहताः सर्वे सभार्या धृतराष्ट्रजाः ॥

मूर्खत्वं तव राजेन्द्र गन्धर्वेभ्यश्च मोचिताः ।

दुर्योधनादयः कामं शत्रवो निगडीकृताः ॥

दुर्योधनहितायाद्य धनं दातुं त्वमिच्छसि ।

नाहं ददे महीपाल सर्वथा प्रेरितस्त्वया ॥

इत्युक्त्वा निर्गते भीमे त्रिभिः परिवृतो नृपः ।

ददौ वित्तं सुबहुलं धृतराष्ट्राय धर्मजः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ । आपकी दूषित मन्त्रणाके फलस्वरूप ही ॥ २३ हमलोगोंने वनवासका कठोर कष्ट सहा । दुरात्मा दुःशासन महारानी द्रौपदीको अपमानपूर्वक सभामें खींच लाया ॥ २३ ॥

हे सुव्रत! आपकी कृपासे ही हमलोगोंको विराट ॥ २४ । राजाके घर रहना पड़ा तथा हम अमित पराक्रमवालोंको मत्स्यदेशके राजाकी दासता करनी पड़ी थी ॥ २४ ॥

हम सबमें ज्येष्ठ आप यदि जुआ न खेलते तो २५ हम लोगोंकी दुर्गति क्यों होती? मगधनरेश जरासंधका वध करनेवाले मुझको राजा विराटके यहाँ रसोइया बनना पड़ा ॥ २५ ॥

आपके ही कारण इन्द्रपुत्र महाबाहु अर्जुनको विराट २६ | राजाके यहाँ स्त्रीका रूप धारण करके उनके बच्चोंको नृत्यकी शिक्षा देनेके लिये बृहन्नला बनना पड़ा । गाण्डीव धनुषके स्थानपर अर्जुनको अपने हाथोंमें कंकण २७ धारण करना पड़ा । मनुष्यका शरीर पाकर भला इससे बड़ा कष्ट और क्या हो सकता है? अर्जुनके सिरपर चोटी और आँखों में काजलकी बातका स्मरण करके तो मनमें यही आता है कि मैं अभी तलवार लेकर २८ शीघ्र ही धृतराष्ट्रका सिर काट दूँ; इसके अतिरिक्त मुझे शान्ति नहीं मिल सकती ॥ २६–२८ ॥ आप महाराजसे बिना पूछे ही मैंने लाक्षागृहमें २ ९ अग्नि लगा दी थी, जिससे हमलोगोंको जलानेकी इच्छावाला वह पापी पुरोचन स्वयं जल गया ॥ २ ९ ॥ हे राजन्! मैंने आपसे परामर्श किये बिना ही जैसे सभी कीचकोंका वध कर डाला, वैसे ही ३० स्त्रियोंसमेत धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंका भी वध मैं नहीं कर पाया ॥ ३० ॥

हे राजेन्द्र! यह आपकी नासमझी ही थी कि ३१ जब गन्धर्वोंने दुर्योधन आदि हमारे शत्रुओंको बन्दी बना लिया था, तब आपने ही उन्हें छुड़ा दिया ॥ ३१ ॥

हे राजन्! आज पुनः उसी दुष्ट दुर्योधनके

कल्याणके लिये आप धन देनेकी इच्छा कर रहे हैं ।

३२ आपके कहनेपर भी मैं उन्हें धन नहीं देने दूँगा ॥ ३२ ॥

ऐसा कहकर भीमके चले जानेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने [ अर्जुन, नकुल तथा सहदेव - इन ] तीनोंकी ३३ । सम्मति लेकर धृतराष्ट्रको बहुत सा धन दे दिया ॥ ३३ ॥

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अ ० ७ ] द्वितीय स्कन्ध २११ कारयामास विधिवत्पुत्राणां चौर्ध्वदैहिकम् ददौ दानानि विप्रेभ्यो धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः कृत्वौर्ध्वदैहिकं सर्वं गान्धारीसहितो नृपः प्रविवेश वनं तूर्णं कुन्त्या च विदुरेण च सञ्जयेन परिज्ञातो निर्गतोऽसौ महामतिः पुत्रैर्निवार्यमाणापि शूरसेनसुता गता विलपन्भीमसेनोऽपि तथान्ये चापि कौरवाः गङ्गातीरात्परावृत्य ययुः सर्वे गजाह्वयम् ते गत्वा जाह्नवीतीरे शतयूपाश्रमं शुभम् कृत्वा तृणैः कुटीं तत्र तपस्तेपुः समाहिताः गतान्यब्दानि षट् तेषां यदा याता हि तापसाः विरहादनुजानिदमब्रवीत् स्वप्ने दृष्टा मया कुन्ती दुर्बला वनसंस्थिता मनो मे जायते द्रष्टुं मातरं पितरौ तथा विदुरं च महात्मानं सञ्जयं च महामतिम् रोचते यदि वः सर्वान् व्रजाम इति मे मतिः ततस्ते भ्रातरः सर्वे सुभद्रा द्रौपदी तथा वैराटी च महाभागा तथा नागरिको जनः प्राप्ताः सर्वजनैः सार्धं पाण्डवा दर्शनोत्सुकाः शतयूपाश्रमं प्राप्य ददृशुः सर्व एव ते विदुरो न यदा दृष्टो धर्मस्तं पृष्टवांस्तदा क्वास्ते स विदुरो धीमांस्तमुवाचाम्बिकासुतः विरक्तश्चरते क्षत्ता निरीहो निष्परिग्रहः कुतोऽप्येकान्तसंवासी ध्यायते ऽन्तः सनातनम् । तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने धन लेकर अपने ॥ ३४ पुत्रोंका विधिवत् श्राद्धकर्म कराया और ब्राह्मणोंको विविध दान दिये ॥ ३४ ॥

। इस प्रकार अपने पुत्रोंका श्राद्धकर्म करके ॥ ३५ गान्धारीसहित महाराज धृतराष्ट्र कुन्ती तथा विदुरके साथ शीघ्र ही वनमें चले गये ॥ ३५ ॥

। संजयद्वारा सबको यह समाचार मिला कि ॥ ३६ महामति धृतराष्ट्र वनमें जा रहे हैं, उस समय अपने पुत्रोंके मना करनेपर भी शूरसेनकी पुत्री कुन्ती उनके । साथ चली गयी ॥ ३६ ॥

यह देखकर भीम भी रोने लगे । वे तथा ॥ ३७ अन्यान्य सभी कौरव उन लोगोंको गंगातटतक पहुँचाकर । पुनः हस्तिनापुरको लौट आये ॥ ३७ ॥

॥ ३८ तत्पश्चात् धृतराष्ट्र आदि गंगातटपर स्थित शुभ शतयूप - आश्रममें पहुँचे और वहाँ पर्णकुटी बनाकर । एकचित्त हो तपस्या करने लगे ॥ ३८ ॥

जब वे तपस्वी चले गये और इस प्रकार छ: ॥ ३ ९ वर्ष बीत गये, तब उनके विरहसे सन्तप्त युधिष्ठिर । अपने भाइयोंसे कहने लगे- मैंने स्वप्न देखा है कि वनमें रहती हुई माता कुन्ती अत्यन्त दुर्बल हो गयी ॥ ४० हैं, अतः माता तथा पितृजनोंको देखनेकी मनमें इच्छा हो रही है । साथ ही महात्मा विदुर तथा महाबुद्धिमान् । संजयसे भी मिलनेकी मेरी इच्छा है । यदि आप ॥ ४१ लोगोंको भी यह उचित प्रतीत होता हो तो हमलोग वहाँ चलें - ऐसा मेरा विचार है ॥ ३ ९ - ४१ ॥ । तब वे सभी भाई, सुभद्रा, द्रौपदी, महाभागा ॥ ४२ उत्तरा तथा अन्यान्य नागरिकजन वहाँ एकत्र हुए । दर्शनके लिये उत्सुक उन पाण्डवोंने सभी लोगोंके । साथ शतयूप- आश्रममें जाकर धृतराष्ट्र आदिको ॥ ४३ | देखा ॥ ४२-४३ ॥ वहाँ जब विदुरजी दिखायी नहीं दिये, तब । धर्मराज युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रसे पूछा – वे बुद्धिमान् ॥ ४४ विदुरजी कहाँ हैं? तब अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्रने उनसे कहा- विदुर तो विरक्त एवं निष्काम होकर तथा सब । कुछ त्यागकर कहीं एकान्तमें रहते हुए अन्तःकरणमें ॥ ४५ परमात्माका ध्यान कर रहे होंगे ॥ ४४-४५ ॥