देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 231–240
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240
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२२२ वातोऽपि न चरेत्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते भक्ष्यभोज्यादिकं राजा तत्रस्थश्च चकार सः स्नानसन्ध्यादिकं कर्म तत्रैव विनिवर्त्य च राजकार्याणि सर्वाणि तत्रस्थश्चाकरोन्नृपः मन्त्रिभिः सह सम्मन्त्र्य गणयन्दिवसानपि कश्चिच्च कश्यपो नाम ब्राह्मणो मन्त्रिसत्तमः शुश्राव च तथा शापं प्राप्तं राज्ञा महात्मना स धनार्थी द्विजश्रेष्ठः कश्यपः समचिन्तयत् व्रजामि तत्र यत्रास्ते शप्तो राजा द्विजेन ह इति कृत्वा मतिं विप्रः स्वगृहान्निः सृतः पथि कश्यपो मन्त्रविद्विद्वान्धनार्थी मुनिसत्तमः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० । महलके भीतर वायुका भी संचरण नहीं हो पाता ॥ ४६ था; क्योंकि उसका प्रवेश सर्वथा वर्जित था । राजा वहीं स्थित रहकर भोजनादि करने लगे । वहीं पर रहते । हुए स्नान एवं सन्ध्यादि कार्योंसे निवृत्त होकर राजा ॥ ४७ मन्त्रियोंसे मन्त्रणा करते तथा शापके दिन गिनते हुए । समस्त राजकार्योंको संचालित करते थे ॥ ४६-४७ ॥ ॥ ४८ इसी बीच किसी कश्यप नामक मन्त्र - विशेषज्ञ ब्राह्मणने सुना कि राजा परीक्षित्को [ सर्पद्वारा काटे । जानेका ] शाप प्राप्त हुआ है । उस धनाभिलाषी ॥ ४ ९ ब्राह्मणश्रेष्ठ कश्यपने विचार किया कि मुनिके द्वारा शापित राजा इस समय जहाँ रह रहे हैं, मैं वहीं पर । जाऊँगा । ऐसा निश्चय करके मन्त्रज्ञ, विद्वान् तथा ॥ ५० धनाभिलाषी वह कश्यप नामक मुनिश्रेष्ठ विप्र अपने ॥ ५१ । घरसे निकलकर रास्तेपर चल पड़ा ॥ ४८–५१ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिद्राज्ञो गुप्तगृहे वासवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः महाराज परीक्षित्को डँसनेके लिये तक्षकका प्रस्थान, मार्गमें मन्त्रवेत्ता कश्यपसे भेंट, तक्षकका एक वटवृक्षको डँसकर भस्म कर देना और कश्यपका उसे पुनः हरा - भरा कर देना, तक्षकद्वारा धन देकर कश्यपको वापस कर देना, सर्पदंशसे राजा परीक्षित्की मृत्यु सूत उवाच तस्मिन्नेव दिने नाम्ना तक्षकस्तं नृपोत्तमम् शप्तं ज्ञात्वा गृहात्तूर्णं निःसृतः पुरुषोत्तमः वृद्धब्राह्मणवेषेण तक्षकः पथि निर्गतः अपश्यत्कश्यपं मार्गे व्रजन्तं नृपतिं प्रति तमपृच्छत्पन्नगोऽसौ ब्राह्मणं मन्त्रवादिनम् । क्व भवांस्त्वरितो याति किञ्च कार्यं चिकीर्षति कश्यप उवाच
परीक्षितं नृपश्रेष्ठं तक्षकश्च प्रधक्ष्यति ।
तत्राहं त्वरितो यामि नृपं कर्तुमपज्वरम् ॥
मन्त्रोऽस्ति मम विप्रेन्द्र विषनाशकरः किल ।
जीवयिष्याम्यहं तं वै जीवितव्येऽधुना किल ॥
सूतजी बोले - [ हे मुनिवृन्द! ] उसी दिन । तक्षक नामक नाग नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को शापित ॥ १ जानकर एक उत्तम मनुष्यका रूप धारण करके अपने घरसे शीघ्र निकल पड़ा । वृद्ध ब्राह्मणके वेषमें । रास्तेपर चलते हुए उस तक्षकने महाराज परीक्षित्के ॥ २ यहाँ जाते हुए कश्यपको देखा॥१-२ ॥ उस नागने उन मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणसे पूछा- आप इतनी शीघ्र गति से कहाँ चले जा रहे हैं और कौन-॥ ३ सा कार्य करनेकी आपकी इच्छा है? ॥३ ॥
कश्यपने कहा- - - महाराज परीक्षित्को तक्षकनाग डँसनेवाला है । अतः मैं उन्हें विषमुक्त करनेके लिये ४ शीघ्रतापूर्वक वहीं जा रहा हूँ ॥४ ॥
हे विप्रेन्द्र! मेरे पास प्रबल विषनाशक मन्त्र है, अतएव यदि उनकी आयु शेष होगी तो मैं उन्हें ५ । जीवित कर दूँगा ॥ ५ ॥
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अ ० १० ] द्वितीय स्कन्ध २२३ तक्षक उवाच
अहं स पन्नगो ब्रह्मंस्तं धक्ष्यामि महीपतिम् ।
निवर्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम् ॥
कश्यप उवाच अहं दष्टं त्वया सर्प नृपं शप्तं द्विजेन वै । जीवयिष्याम्यसन्देहं कामं मन्त्रबलेन वै 11 तक्षक उवाच
यदि त्वं जीवितुं यासि मया दष्टं नृपोत्तमम् ।
मन्त्रशक्तिबलं विप्र दर्शय त्वं ममानघ ॥
धक्ष्याम्येनं च न्यग्रोधं विषदंष्ट्राभिरद्य वै । कश्यप उवाच जीवयिष्ये त्वया दष्टं दग्धं वा पन्नगोत्तम ॥ सूत उवाच
अदशत्पन्नगो वृक्षं भस्मसाच्च चकार तम् ।
उवाच कश्यपं भूयो जीवयैनं द्विजोत्तम ॥
दृष्ट्वा भस्मीकृतं वृक्षं पन्नगेन विषाग्निना ।
सर्वं भस्म समाहृत्य कश्यपो वाक्यमब्रवीत् ॥
पश्य मन्त्रबलं मेऽद्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तम ।
जीवयाम्यद्य वृक्षं वै पश्यतस्ते महाविष ॥
इत्युक्त्वा जलमादाय कश्यपो मन्त्रवित्तमः ।
सिषेच भस्मराशिं तं मन्त्रितेनैव वारिणा ॥
तद्वारिसेचनाज्जातो न्यग्रोधः पूर्ववच्छुभः ।
विस्मयं तक्षकः प्राप्तो दृष्ट्वा तं जीवितं नगम् ॥
तमाह कश्यपं नागः किमर्थं ते परिश्रमः ।
सम्पादयामि तं कामं ब्रूहि वाडव वाञ्छितम् ॥
कश्यप उवाच
वित्तार्थी नृपतिं मत्वा शप्तं पन्नग निःसृतः ।
गृहादहं चोपकर्तुं विद्यया नृपसत्तमम् ॥
तक्षकने कहा- हे ब्रह्मन्! मैं ही वह तक्षकनाग हूँ और मैं ही महाराज परीक्षित्को काहूँगा । मेरे ६ काट लेनेपर आप चिकित्सा करनेमें समर्थ नहीं हो सकेंगे; अतएव आप लौट जाइये ॥ ६ ॥
कश्यपने कहा- हे सर्प! ब्राह्मणके द्वारा शापित किये गये राजाको आपके काटनेके उपरान्त मैं उन्हें ७ अपने मन्त्रबलसे निःसन्देह जीवित कर दूँगा ॥ ७ ॥
तक्षकने कहा- हे विप्र! हे अनघ! यदि आप मेरे काटे हुए नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को जीवित करनेके लिये जा रहे हैं तो आप अपनी मन्त्र - शक्तिका ८ प्रभाव दिखाइये । मैं इसी समय इस वटवृक्षको अपने विषैले दाँतोंसे डँसता हूँ ॥ ८३ ॥
कश्यपने कहा- हे सर्पश्रेष्ठ! आप इसे काट लें अथवा इसे जलाकर भस्म कर दें तो भी मैं इसे ९ पुनः जीवित कर दूँगा ॥९ ॥
सूतजी बोले – नागराज तक्षकने उस वृक्षको डँस लिया और उसे जलाकर भस्म कर दिया । तब उसने कश्यपसे कहा - ' हे द्विजश्रेष्ठ! अब आप इसे १० पुनः जीवित कीजिये ' ॥ १० ॥
तक्षकनागकी विषाग्नि से भस्म हुए वृक्षके सम्पूर्ण भस्मको एकत्र करके कश्यपने यह बात ११ कही - हे महाविषधर नागराज! अब आप मेरे मन्त्रका प्रभाव देखिये । मैं आपके देखते - देखते इस वटवृक्षको जीवन प्रदान करता हूँ ॥ ११-१२ ॥ १२ ऐसा कहकर हाथमें जल लेकर मन्त्रविद् कश्यपने उस जलको अभिमन्त्रित किया और उसे १३ भस्मराशिपर छिड़क दिया । जलके पड़ते ही वह वटवृक्ष पुनः पहलेकी भाँति सुन्दर हो गया । उस वृक्षको इस प्रकार जीवित देखकर तक्षकको बड़ा १४ आश्चर्य हुआ ॥ १३-१४ ॥ उस नागराजने कश्यपसे कहा - हे विप्र! आप इतना परिश्रम किसलिये करेंगे? आपकी वह कामना मैं
१५ ही पूर्ण कर दूँगा । कहिये, आप क्या चाहते हैं? ॥ १५ ॥
कश्यपने कहा- हे पन्नग! मैं धनका अभिलाषी हूँ; नृपश्रेष्ठ परीक्षित्को शापित जानकर अपनी मन्त्रविद्यासे उनका उपकार करनेके लिये मैं अपने १६ घरसे निकला हुआ हूँ ॥ १६ ॥
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२२४ तक्षक उवाच वित्तं गृहाण विप्रेन्द्र यावदिच्छसि पार्थिवात् । ददामि स्वगृहं याहि सकामोऽहं भवाम्यतः सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कश्यपः परमार्थवित् ।
चिन्तयामास मनसा किं करोमि पुनः पुनः ॥
धनं गृहीत्वा स्वगृहं प्रयामि यद्यहं पुनः ।
भविष्यति न मे कीर्तिर्लोके लोभसमाश्रयात् ॥
जीवितेऽथ नृपश्रेष्ठे कीर्तिः स्यादचला मम ।
धनप्राप्तिश्च बहुधा भवेत्पुण्यं च जीवनात् ॥
रक्षणीयं यशः कामं धिग्धनं यशसा विना ।
सर्वस्वं रघुणा पूर्वं दत्तं विप्राय कीर्तये ॥
हरिश्चन्द्रेण कर्णेन कीर्त्यर्थं बहुविस्तरम् ।
उपेक्षेयं कथं भूपं दह्यमानं विषाग्निना ॥
जीवितेऽद्य मया राज्ञि सुखं सर्वजनस्य च ।
अराजके प्रजानाशो भविता नात्र संशयः ॥
प्रजानाशस्य पापं मे भविष्यति मृते नृपे ।
अपकीर्तिश्च लोकेषु धनलोभाद्भविष्यति ॥
इति सञ्चिन्त्य मनसा ध्यानं कृत्वा स कश्यपः ।
गतायुषं च नृपतिं ज्ञातवान्बुद्धिमत्तरः ॥
आसन्नमृत्युं राजानं ज्ञात्वा ध्यानेन कश्यपः ।
गृहं ययौ स धर्मात्मा धनमादाय तक्षकात् ॥
निवर्त्य कश्यपं सर्पः सप्तमे दिवसे नृपम् ।
हन्तुकामो जगामाशु नगरं नागसाह्वयम् ॥
शुश्राव नगरस्यान्ते प्रासादस्थं परीक्षितम् ।
मणिमन्त्रौषधैः कामं रक्ष्यमाणमतन्द्रितम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० तक्षकने कहा- हे विप्रवर! राजासे जितना धन आप चाहते हैं, उतना धन मुझसे अभी ले लें और ॥ १७ अपने घर लौट जायँ, जिससे मैं अपने कृत्यमें सफल हो सकूँ ॥ १७ ॥
सूतजी बोले- तक्षककी यह बात सुनकर परमार्थवेत्ता कश्यपजी मनमें बार - बार सोचने लगे कि १८ अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं धन लेकर अपने घर जाता हूँ तो धनलोलुप होनेके कारण संसारमें मेरी कीर्ति नहीं होगी । यदि राजा जीवित हो १ ९ जाते हैं तो मेरी अचल कीर्ति होगी तथा धन प्राप्तिके साथ - साथ पुण्य भी प्राप्त होगा ॥ १८ - २० ॥ यश ही रक्षणीय है और बिना यशके धनको २० धिक्कार है; क्योंकि प्राचीन कालमें महाराज रघुने कीर्तिके लिये अपना सब कुछ ब्राह्मणको दे दिया था । सत्यवादी हरिश्चन्द्र तथा दानी कर्णने भी केवल २१ कीर्तिके लिये बहुत कुछ किया था । अतः विषकी अग्निसे जलते हुए राजा परीक्षित्की उपेक्षा मैं कैसे करूँ? ॥ २१-२२ ॥ २२ यदि मैं महाराजको जिला दूँ तो सब लोगोंको अत्यन्त सुख मिलेगा और यदि राजा मर गये तो अराजकताके कारण सारी प्रजा नष्ट हो जायगी, इसमें २३ । सन्देह नहीं है ॥ २३ ॥
राजाके मृत हो जाने पर मुझे प्रजानाशका पाप लगेगा तथा संसारमें धन - लोभके कारण मेरी अपकीर्ति २४ भी होगी ॥ २४ ॥
मनमें ऐसा विचार करके परम बुद्धिमान् कश्यपने ध्यान करके जाना कि महाराज परीक्षित्की आयु अब २५ समाप्त हो चुकी है ॥ २५ ॥
इस प्रकार ध्यान- दृष्टिसे धर्मात्मा कश्यप राजाकी मृत्यु निकट जानकर तक्षकसे धन लेकर अपने घर २६ | लौट गये ॥ २६ ॥
कश्यपको लौटाकर वह नाग सातवें दिन राजाको डँसनेकी इच्छासे शीघ्र हस्तिनापुर चला २७ गया ॥ २७ ॥
नगरमें पहुँचते ही उसने सुना कि मणि, मन्त्र तथा औषधियोंसे भलीभाँति सावधानीपूर्वक सुरक्षित २८ । होकर राजा परीक्षित् अपने महलमें रह रहे हैं ॥ २८ ॥
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अ ० १० ]
चिन्ताविष्टस्तदा नागो विप्रशापभयाकुलः ।
चिन्तयामास योगेन प्रविशेयं गृहं कथम् ॥
वञ्चयामि कथं चैनं राजानं पापकारिणम् ।
विप्रशापाद्धतं मूढं विप्रपीडाकरं शठम् ॥
पाण्डवानां कुले जातः कोऽपि नैतादृशो भवेत् ।
तापसस्य गले येन मृतः सर्पो निवेशितः ॥
कृत्वा विगर्हितं कर्म जानन्कालगतिं नृपः ।
रक्षकान्भवने कृत्वा प्रासादमभिगम्य च ॥
मृत्युं वञ्चयते राजा वर्ततेऽद्य निराकुलः ।
तं कथं धक्षयिष्यामि विप्रवाक्येन चोदितः ॥
न जानाति च मन्दात्मा मरणं ह्यनिवर्तनम् ।
तेनासौ रक्षकान्स्थाप्य सौधारूढोऽद्य मोदते ॥
यदि वै विहितो मृत्युर्दैवेनामिततेजसा । स कथं परिवर्तेत कृतैर्यलैस्तु कोटिभिः पाण्डवस्य च दायादो जानन्मृत्युं गतं नृपः । जीवने मतिमास्थाय स्थितः स्थाने निराकुलः
दानपुण्यादिकं राजा कर्तुमर्हति सर्वथा ।
धर्मेण हन्यते व्याधिर्येनायुः शाश्वतं भवेत् ॥
नोचेन्मृत्युविधिं कृत्वा स्नानदानादिकाः क्रियाः ।
मरणं स्वर्गलोकाय नरकायान्यथा भवेत् ॥
द्विजपीडाकृतं पापं पृथग्वास्य च भूपतेः ।
विप्रशापस्तथा घोर आसन्ने मरणे किल ॥
द्वितीय स्कन्ध २२५ [ यह जानकर ] ब्राह्मणके शापसे भयभीत २ ९ सर्पराज तक्षकको बड़ी चिन्ता हुई । वह सोचने लगा कि अब मैं किस उपायसे इस राजभवनमें प्रवेश करूँ? और इस पापी, मूढ, विप्रको पीड़ित करनेवाले तथा मुनिके शापसे आहत इस दुष्ट राजाको मैं ३० कैसे छलूँ? ॥ २ ९ -३० ॥ पाण्डववंशमें ऐसा कोई नहीं हुआ, जिसने इस प्रकार किसी तपस्वी ब्राह्मणके गलेमें मृत सर्प डाल ३१ दिया हो ॥ ३१ ॥
ऐसा निन्दित कर्म करके कालचक्रको जानते हुए भी यह राजा भवनमें रक्षकोंकी नियुक्ति करके राज - भवनमें छिपकर मृत्युकी वंचना कर रहा है और ३२ निश्चिन्त होकर पड़ा है । विप्रके शापानुसार मैं उस राजाको कैसे डसूँ?॥ ३२-३३ ॥ यह मन्दबुद्धि इतना भी नहीं जानता कि ३३ मृत्यु तो अनिवार्य है? इसी कारण यह रक्षकोंकी नियुक्ति करके स्वयं भवनपर चढ़कर आनन्द ले रहा है ॥ ३४ ॥
३४ यदि अमित तेजवाले दैवने मृत्यु निश्चित कर दी है तो करोड़ों प्रकारके प्रयत्नोंसे भी उसे कैसे टाला जा सकता है? ॥ ३५ ॥
पाण्डववंशका उत्तराधिकारी यह राजा परीक्षित् ॥ ३५ अपनेको मृत्युके मुखमें गया हुआ जानते हुए भी जीवित रहनेकी अभिलाषा रखकर सुरक्षित स्थानमें निश्चिन्त होकर पड़ा हुआ है ॥ ३६ ॥
॥ ३६ यह यदि चाहता तो अनेक प्रकारके दान-पुण्य - द्वारा अपनी आयु बढ़ा सकता था; क्योंकि धर्माचरणसे व्याधि नष्ट होती है और उससे आयु स्थिर होती है ॥ ३७ ॥
३७ यदि ऐसा सम्भव नहीं था तो मृत्युके समय सम्पन्न की जानेवाली स्नान, दान आदि क्रियाएँ करके मृत्युके अनन्तर स्वर्गयात्रा कर सकता था, ३८ अन्यथा इसे नरक जाना होगा ॥३८ ॥
मुनिको पीड़ा पहुँचानेका पाप इस राजाको था ही और ब्राह्मणका घोर शाप अलगसे है । अतः अब ३ ९ । इसकी मृत्यु सन्निकट है ॥ ३ ९ ॥ 1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] – 8 A
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२२६ न कोऽपि ब्राह्मणः पार्श्वे य एनं प्रतिबोधयेत् वेधसा विहितो मृत्युरनिवार्यस्तु सर्वथा इति सञ्चिन्त्य सर्पो ऽसौ स्वान्नागान्निकटे स्थितान् कृत्वा तापसवेषांस्तान्प्राहिणोत्सुभुजङ्गमान् फलमूलादिकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः स्वयं च कीटरूपेण फलमध्ये ससार ह निर्गतास्ते तदा नागाः फलान्यादाय सत्वराः ते राजभवनं प्राप्य स्थिताः प्रासादसन्निधौ रक्षकास्तापसान्दृष्ट्वा पप्रच्छ्रुस्तच्चिकीर्षितम् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० । इस समय ऐसा कोई ब्राह्मण भी इसके पास नहीं ॥ ४० है, जो इसे यह बता सके कि विधाताके द्वारा निर्धारित मृत्यु सर्वथा अनिवार्य है ॥ ४० ॥
। ऐसा विचारकर तक्षकनागने अपने निकटवर्ती ॥ ४१ श्रेष्ठ नागोंको तपस्वी ब्राह्मणोंका वेष धारण कराकर राजाके पास भेजा । वे राजाको देनेके लिये । फल- मूल आदि लेकर तैयार हो गये और तक्षकनाग ॥ ४२ भी एक छोटे - से कीटके रूपमें फलके बीचमें छिप गया ॥ ४१-४२ ॥ । तब वे नाग फल आदि लेकर शीघ्र ही ॥ ४३ निकल पड़े और राजभवनमें पहुँचकर महलके पास खडे हो गये ॥ ४३ ॥
। इस प्रकार तपस्वियोंको खड़े देखकर रक्षकोंने ऊचुस्ते भूपतिं द्रष्टुं प्राप्ताः स्मोऽद्य तपोवनात् ॥ ४४ उनसे पूछा कि आपलोगोंकी क्या इच्छा है? तब
अभिमन्युसुतं वीरं कुलार्कं चारुदर्शनम् ।
परिवर्धयितुं प्राप्ता मन्त्रैराथर्वणैस्तथा ॥
निवेदयध्वं राजानं दर्शनार्थागतान्मुनीन् ।
कृत्वाभिषेकान्यास्यामो दत्त्वा मिष्टफलानि च ॥
भारतानां कुले क्वापि न दृष्टा द्वाररक्षकाः ।
न श्रुतं तापसानां तु राज्ञो ऽसन्दर्शनं किल ॥
आरोहामो वयं तत्र यत्र राजा परीक्षितः ।
आशीर्भिर्वर्धयित्वैनं दत्ताज्ञाः प्रव्रजामहे ॥
सूत उवाच
इत्याकर्ण्य वचस्तेषां तापसानां तु रक्षकाः ।
प्रत्यूचुस्तान् द्विजान्मत्वा निदेशं भूपतेर्यथा ॥
ना वो दर्शनं विप्रा राज्ञः स्यादिति नो मतिः ।
श्वः सर्वतापसैरत्र त्वागन्तव्यं नृपालये ॥
अनारोहस्तु प्रासादो विप्राणां मुनिसत्तमाः ।
विप्रशापभयाद्राज्ञा विहितोऽस्ति न संशयः ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -8B उन्होंने कहा – हमलोग महाराजको देखनेके लिये तपोवनसे आये हैं ॥ ४४ ॥
४५ पाण्डवकुलके सूर्य, शुभदर्शन तथा पराक्रमी अभिमन्यु - पुत्र परीक्षित्को अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे आशीर्वाद देनेहेतु हमलोग यहाँ आये हैं ॥ ४५ ॥
आप जाकर महाराजसे कहें कि कुछ मुनिजन ४६ उनसे मिलने आये हैं और वे महाराजका मन्त्राभिषेक करके उन्हें मधुर फल देकर लौट जायेंगे ॥ ४६ ॥
भरतवंशी राजाओंके कुलमें कभी भी द्वाररक्षक ४७ नहीं देखे गये । ऐसा भी कहीं सुना नहीं गया कि तपस्वियोंको राजाका दर्शन न मिले । जहाँ महाराज परीक्षित् विराजमान हैं, वहाँ हमलोग जायँगे और ४८ उन्हें अपने आशीर्वादसे दीर्घायुष्य बनाकर आज्ञा लेकर लौट जायँगे ॥ ४७-४८ ॥ सूतजी बोले- उन तपस्वियों का वचन सुनकर रक्षकोंने उन्हें ब्राह्मण समझकर महाराजका ४ ९ आदेश सुनाते हुए कहा - हे विप्रो! हमारे विचारमें आज आपलोगोंको राजाका दर्शन नहीं हो सकेगा । अतः आप समस्त तपस्वीजन राजभवनमें कल ५० | पधारें ॥ ४ ९ -५० ॥ हे मुनिश्रेष्ठो! विप्रशापसे भयभीत होकर राजाने अपने महलमें ब्राह्मणोंका प्रवेश वर्जित कर रखा है; ५१ । इसमें संशय नहीं है ॥ ५१ ॥
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अ ० १० ] द्वितीय
तदोचुस्तानथो विप्राः फलमूलजलानि च ।
विप्राशिषश्च राज्ञेऽथ ग्राहयन्तु सुरक्षकाः ॥ ५२
ते गत्वा नृपतिं प्रोचुस्तापसानागताञ्जनाः ।
राजोवाचानयध्वं वै फलमूलादिकं च यत् ॥ ५३
पृच्छध्वं तापसान्कार्यं प्रातरागमनं पुनः ।
प्रणामं कथयध्वं मे नाद्य सन्दर्शनं मम ॥ ५४
ते गत्वाथ समादाय फलमूलादिकं च यत् ।
राज्ञे समर्पयामासुर्बहुमानपुरःसरम् ॥ ५५
गतेषु तेषु नागेषु विप्रवेषावृतेषु च ।
फलान्यादाय राजासौ सचिवानिदमब्रवीत् ॥५६
सुहृदो भक्षयन्त्वद्य फलान्येतानि सर्वशः ।
अद्मयहं चैकमेतद्वै फलं विप्रार्पितं महत् ॥ ५७ ।
इत्युक्त्वा तत्फलं दत्त्वा सुहृद्भ्यश्चोत्तरासुतः ।
करे कृत्वा फलं पक्वं ददार नृपतिः स्वयम् ॥ ५८
विदारितं फलं राज्ञा तत्र कृमिरभूदणुः ।
स कृष्णनयनस्ताम्रो दृष्टो भूपतिना स्वयम् ॥ ५ ९
तं दृष्ट्वा नृपतिः प्राह सचिवान्विस्मितानथ ।
अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम् ॥ ६०
अङ्गीकरोमि तं शापं कृमिको मां दशत्वयम् ।
एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवायां संन्यवेशयत् ॥ ६१ ।
अस्तं याते दिवानाथे धृतः कण्ठेऽथ कीटकः ।
तक्षकस्तु तदा जातः कालरूपी भयानकः ॥ ६२
राजा संवेष्टितस्तेन दष्टश्चापि महीपतिः ।
मन्त्रिणो विस्मयं प्राप्ता रुरुदुर्भृशदुःखिताः ॥ ६३
घोररूपमहिं वीक्ष्य दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः ।
चुकुशू रक्षकाः सर्वे हाहाकारो महानभूत् ॥ ६४
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -4C स्कन्ध २२७ तब ब्राह्मणोंने उनसे कहा- हमलोगोंकी ओरसे ये • फल- मूल तथा जल आप रक्षकगण राजाको दे दें और हमलोगोंका आशीर्वाद पहुँचा दें ॥ ५२ ॥
उन्होंने राजाके पास जाकर तपस्वियोंके आगमनकी बात बता दी । इसपर राजाने आज्ञा दी कि वे लोग फल - मूल आदि जो कुछ दे रहे हैं, उन्हें यहाँ लाओ और उन तपस्वियोंके आनेका कारण पूछ लो और उन्हें पुन: कल प्रातः आनेको कह दो । साथ ही मेरी ओरसे उन्हें प्रणाम कहकर यह भी कह देना कि आज मेरा मिलना सम्भव नहीं है ॥ ५३-५४ ॥ उन द्वारपालोंने तपस्वियोंके पास जाकर उनके दिये हुए फल - मूल आदि लाकर आदरपूर्वक राजाको अर्पित कर दिये ॥ ५५ ॥
उन विप्रवेषमें आये नागोंके चले जानेपर महाराजने फलोंको लेकर मन्त्रियोंसे कहा- हे सचिवो! आपलोग भी इन फलोंका सम्यक् सेवन कीजिये । मैं तो तपस्वियोंद्वारा अर्पित यही एक बड़ा फल खाऊँगा ॥ ५६-५७ ॥ ऐसा कहकर उत्तरासुत राजा परीक्षित्ने सब फल अपने सुहृद् सचिवोंमें बाँट दिये और एक सुन्दर पका फल हाथमें लेकर उसे स्वयं विदीर्ण किया ॥५८ ॥
जिस फलको राजाने चीरा, उसमें ताम्र वर्णवाला तथा काले नेत्रवाला एक छोटा - सा कीट राजाको दिखायी दिया । उसे देखकर राजाने अपने आश्चर्यचकित मन्त्रियोंसे कहा — सूर्य अस्त हो रहे हैं, अतः अब मुझे विषका भय नहीं है । मैं ब्राह्मणके उस शापको अंगीकार करता हूँ कि यह कीट मुझे काट ले । ऐसा कहकर महाराज परीक्षित्ने उसे अपने गलेपर रख लिया । सूर्यके अस्त होते ही गलेपर स्थित वह कीट साक्षात् कालस्वरूप भयानक तक्षकके रूपमें परिणत हो गया ॥ ५ ९ –६२ ॥ उस नागने तत्काल राजाको लपेट लिया तथा उन्हें डँस लिया । यह देखते ही सभी मन्त्री आश्चर्यमें पड़ गये और अत्यधिक दुःखित होकर विलाप करने लगे ॥ ६३ ॥
भयंकर रूपवाले उस सर्पको देखकर सभी सचिवगण भयभीत होकर वहाँसे भागने लगे और सभी रक्षकगण चिल्लाने लगे । इस प्रकार वहाँ महान् हाहाकार मच गया ॥६४ ॥
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२२८ वेष्टितो भोगिभोगेन विनष्टबहुपौरुषः नोवाच नृपतिः किञ्चिन्न चचालोत्तरासुतः उत्थिताग्निशिखा घोरा विषजा तक्षकाननात् । प्रजज्वाल नृपं त्वाशु गतप्राणं श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ । उस सर्पके शरीरसे बद्ध हो जानेके कारण ॥ ६५ राजाका महान् बल प्रभावहीन हो गया, जिससे वे उत्तरापुत्र परीक्षित् कुछ भी बोल पाने तथा हिल - डुल सकनेमें असमर्थ हो गये ॥ ६५ ॥
तक्षकके मुखसे विषजनित भयंकर आगकी ज्वालाएँ उठने लगीं । उस भीषण ज्वालाने क्षणभरमें चकार ह ॥ ६६ राजाको जला दिया और शीघ्र ही उन्हें निष्प्राण कर हत्वाशु जीवितं राज्ञस्तक्षको गगने गतः । जगद्दग्धं तु कुर्वाणं ददृशुस्तं जना इह
स पपात गतप्राणो राजा दग्ध इव द्रुमः ।
चुक्रुशुश्च जनाः सर्वे मृतं दृष्ट्वा नराधिपम् ॥
दिया ॥ ६६ ॥
इस प्रकार क्षणमात्रमें ही राजाका प्राण हरकर वह तक्षकनाग आकाशमें चला गया । वहाँ लोगोंने ॥ ६७ संसारको भस्मसात् कर देनेकी सामर्थ्यवाले उस तक्षकको देखा ॥ ६७ ॥
वे राजा परीक्षित् प्राणहीन होकर जले हुए वृक्षकी भाँति गिर पड़े और राजाको मृत देखकर सभी ६८ । लोग विलाप करने लगे ॥६८ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे परीक्षिन्मरणं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
अथैकादशोऽध्यायः जनमेजयका राजा बनना और उत्तंककी प्रेरणासे सर्प - सत्र करना, आस्तीकके कहनेसे सूत उवाच
गतप्राणं तु राजानं बालं पुत्रं समीक्ष्य च ।
चक्रुश्च मन्त्रिणः सर्वे परलोकस्य सत्क्रियाः ॥
गङ्गातीरे दग्धदेहं भस्मप्रायं महीपतिम् ।
अगुरुभिश्चाभियुक्तायां चितायामध्यरोपयन् ॥
दुर्मरणे मृतस्यास्य चक्रुश्चैवौर्ध्वदैहिकीम् ।
क्रियां पुरोहितास्तस्य वेदमन्त्रैर्विधानतः ॥
ददुर्दानानि विप्रेभ्यो गाः सुवर्णं यथोचितम् ।
अन्नं बहुविधं तत्र वस्त्राणि विविधानि च ॥
सुमुहूर्ते सुतं बालं प्रजानां प्रीतिवर्धनम् ।
सिंहासने शुभे तत्र मन्त्रिणः संन्यवेशयन् ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] –8D राजाद्वारा सर्प - सत्र रोकना सूतजी बोले- सभी मन्त्रियोंने राजा परीक्षित्को मृतक तथा उनके पुत्र जनमेजयको अबोध जानकर १ उनकी परलोक - सम्बन्धी क्रियाएँ सम्यक् प्रकारसे सम्पन्न कीं ॥१ ॥
शरीर दग्ध हो जानेसे भस्मीभूत हुए राजाको उन मन्त्रियोंने गंगाके किनारे अगरुसे बनायी गयी २ चितापर रखा ॥ २ ॥
अकालमृत्युको प्राप्त राजा परीक्षित्की और्ध्वदैहिक क्रिया राजाके पुरोहितोंद्वारा वैदिक मन्त्रोंके साथ ३ विधिवत् सम्पन्न की गयी ॥३ ॥
मन्त्रियोंने ब्राह्मणोंको गायें, सुवर्ण, अनेक प्रकारके अन्न तथा नाना प्रकारके वस्त्र यथोचित ४ रूपसे दानमें दिये ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् मन्त्रियोंने प्रजाओंके प्रति प्रीति-सम्वर्धन करनेवाले राजपुत्र जनमेजयको शुभ मुहूर्तमें ५ । सुन्दर राजसिंहासनपर आसीन किया ॥ ५ ॥
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अ ० ११ ] द्वितीय स्कन्ध २२ ९
पौरा जानपदा लोकाश्चक्रुस्तं नृपतिं शिशुम् ।
जनमेजयनामानं राजलक्षणसंयुतम् ॥
धात्रेयी शिक्षयामास राजचिह्नानि सर्वशः ।
दिने दिने वर्धमानः स बभूव महामतिः ॥
प्राप्ते चैकादशे वर्षे तस्मै कुलपुरोहितः ।
यथोचितां ददौ विद्यां जग्राह स यथोचिताम् ॥
धनुर्वेदं कृपः पूर्णं ददावस्मै सुसंस्कृतम् ।
अर्जुनाय यथा द्रोणः कर्णाय भार्गवो यथा ॥
सम्प्राप्तविद्यो बलवान्बभूव दुरतिक्रमः ।
धनुर्वेदे तथा वेदे पारगः परमार्थवित् ॥
धर्मशास्त्रार्थकुशलः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
चकार राज्यं धर्मात्मा पुरा धर्मसुतो यथा ॥
ततः सुवर्णवर्माख्यो राजा काशिपतिः किल ।
वपुष्टमां शुभां कन्यां ददौ पारीक्षिताय च ॥
स तां प्राप्यासितापाङ्गीं मुमुदे जनमेजयः ।
काशिराजसुतां कान्तां प्राप्य राजा यथा पुरा ॥
विचित्रवीर्यो मुमुदे सुभद्रां च यथार्जुनः ।
विजहार महीपालो वनेषूपवनेषु च ॥
तया कमलपत्राक्ष्या शच्या शतक्रतुर्यथा ।
प्रजास्तस्य सुसन्तुष्टा बभूवुः सुखलालिताः ॥
मन्त्रिणः कर्मकुशलाश्चक्रुः कार्याणि सर्वशः । पुरवासी तथा जनपदवासी प्रजाओंने राजलक्षणोंसे ६ सम्पन्न जनमेजय नामक उस बालकको अपने राजाके रूपमें स्वीकार किया ॥ ६ ॥
राजकुमारकी धात्रीने उन्हें सब प्रकारके राजोचित गुणों की शिक्षा दी । इस प्रकार दिन - प्रतिदिन ७ वृद्धिको प्राप्त होते हुए वे महान् बुद्धिमान् हो गये ॥७ ॥
उनकी ग्यारह वर्षकी अवस्था होनेपर कुल-८ पुरोहितने उन्हें यथोचित शिक्षा प्रदान की और उन्होंने उसे सम्यक् रूपसे ग्रहण किया ॥८ ॥
जिस प्रकार द्रोणाचार्यने अर्जुनको तथा भार्गव परशुरामने कर्णको धनुर्विद्यामें प्रशिक्षित किया, उसी ९ प्रकार कृपाचार्यने जनमेजयको भलीभाँति परिष्कृत धनुर्विद्या प्रदान की ॥ ९ ॥
इस प्रकार सम्पूर्ण विद्या प्राप्त करके वे जनमेजय १० वेद तथा धनुर्वेदमें पूर्ण पारंगत, बलशाली, अपराजेय तथा परमार्थवेत्ता हो गये ॥१० ॥
वे धर्मशास्त्र के अर्थोंका विवेचन करनेमें ११ कुशल, सत्यनिष्ठ, इन्द्रियजित् और धर्मात्मा थे 1 उन्होंने पूर्वमें धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरकी भाँति राज्य - शासन किया ॥ ११ ॥
इसके बाद सुवर्णवर्मा नामवाले काशिपति राजाने १२ शुभ गुणोंवाली अपनी कन्या वपुष्टमाका पाणिग्रहण जनमेजयके साथ सम्पन्न कर दिया ॥ १२ ॥
जिस प्रकार प्राचीन कालमें काशिराजकी १३ पुत्रीको पाकर विचित्रवीर्य तथा सुभद्राको पाकर अर्जुन अत्यन्त आह्लादित हुए थे, उसी प्रकार उस श्याम नयनोंवालीको अपनी कान्ताके रूपमें पाकर जनमेजय अति प्रसन्न हुए । कमलपत्रके समान १४ नेत्रोंवाली उस वपुष्टमाके साथ वनों और उपवनोंमें राजा जनमेजय उसी प्रकार विहार करने लगे जिस प्रकार इन्द्राणीके साथ इन्द्र । उनके द्वारा सुखपूर्वक १५ रक्षित प्रजा अति सन्तुष्ट थी । जनमेजयके कार्यकुशल सभी मन्त्री समस्त कार्योंको सम्यक् प्रकारसे करते थे ॥ १३ – १५३ ॥
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२३० एतस्मिन्नेव काले तु मुनिरुत्तङ्कनामकः तक्षकेण परिक्लिष्टो हस्तिनापुरमभ्यगात् वैरस्यापचितिं कोऽस्य प्रकुर्यादिति चिन्तयन् परीक्षितसुतं मत्वा तं नृपं समुपागतः कार्याकार्यं न जानासि समये नृपसत्तम अकर्तव्यं करोष्यद्य कर्तव्यं न करोषि वै किं त्वां सम्प्रार्थयाम्यद्य गतामर्षं निरुद्यमम् अवैरज्ञमतन्त्रज्ञं बालचेष्टासमन्वितम् । जनमेजय उवाच किं वैरं न मया ज्ञातं न किं प्रतिकृतं मया ॥ तद्वद त्वं महाभाग करोमि यदनन्तरम् । उत्तङ्क उवाच पिता ते निहतो भूप तक्षकेण दुरात्मना ॥ मन्त्रिणस्त्वं समाहूय पृच्छ स्वपितृनाशनम् । सूत उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं राजा पप्रच्छ मन्त्रिसत्तमान् ॥ ऊचुस्ते द्विजशापेन दष्टः सर्पेण वै मृतः । जनमेजय उवाच शापोऽत्र कारणं राज्ञः शप्तस्य मुनिना किल ॥ तक्षकस्य तु को दोषो ब्रूहि मे मुनिसत्तम । उत्तङ्क उवाच तक्षकेण धनं दत्त्वा कश्यपः सन्निवारितः ॥
न स किं तक्षको वैरी पितृहा तव भूपते ।
भार्या रुरोः पुरा भूप दष्टा सर्पेण सा मृता ॥
अविवाहिता तु मुनिना जीविता च पुनः प्रिया ।
रुरुणापि कृता तत्र प्रतिज्ञा चातिदारुणा ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ ॥ १६ इसी समय तक्षकके द्वारा पीड़ित उत्तंक नामक मुनिका हस्तिनापुरमें आगमन हुआ । ' इस सर्पकी । शत्रुताका बदला कौन ले सकता है ' - ऐसा सोचते ॥ १७ हुए वे परीक्षित् - पुत्र जनमेजयको यह कार्य कर सकनेवाला समझकर उनके पास आये और बोले-। भूपवर! आपको यह ज्ञान नहीं है कि इस समय ॥ १८ क्या करणीय है और क्या अकरणीय है? आप इस समय न करनेयोग्य कार्य कर रहे हैं और करनेयोग्य कार्य नहीं कर रहे हैं । आपसदृश रोषहीन, पुरुषार्थरहित, ॥ १ ९ वैरभावके ज्ञानसे शून्य, प्रतीकार आदि उपायोंको न जाननेवाले तथा बालकोंके समान स्वभाववाले राजासे अब मैं क्या कहूँ? ॥१६–१९ ३ ॥ जनमेजय बोले- मैंने किस शत्रुताको नहीं २० जाना और उसका प्रतीकार नहीं किया? हे महाभाग! आप मुझे वह बतायें, जिससे मैं उसे सम्पन्न कर | सकूँ ॥ २०३ ॥
उत्तंक बोले- हे राजन्! आपके पिता परीक्षित् २१ दुष्टात्मा तक्षक नागद्वारा मार डाले गये थे । आप मन्त्रियोंको बुलाकर अपने पिताकी मृत्युके विषय में पूछिये ॥ २१ ॥
२२ सूतजी बोले- उत्तंकका वचन सुनकर राजाने मन्त्रिप्रवरोंसे पूछा । तब उन्होंने बताया कि ब्राह्मणद्वारा शापित होनेके कारण एक सर्पने उन्हें डँस लिया और वे मर गये ॥ २२३ ॥
२३ जनमेजय बोले- मेरे पिता राजा परीक्षित्की मृत्युका कारण तो मुनिद्वारा प्रदत्त शाप था । हे मुनिश्रेष्ठ! मुझे यह बताइये कि इसमें तक्षकका क्या दोष था? ॥२३३ ॥
२४ उत्तंक बोले- तक्षकने कश्यप नामक ब्राह्मणको धन देकर आपके पितातक पहुँचनेसे रोक दिया था । हे राजन्! आपके पिताका हन्ता वह तक्षक क्या २५ आपका शत्रु नहीं है? हे भूप! प्राचीन कालमें मुनि रुरुकी भार्याको सर्पने डँस लिया था और वह मर गयी थी । वह अविवाहिता थी । मुनि रुरुने अपनी उस २६ | प्रियाको पुनः जीवित कर दिया और उन्होंने वहींपर
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अ ० ११ ]
यं यं सर्पं प्रपश्यामि तं तं हन्म्यायुधेन वै ।
एवं कृत्वा प्रतिज्ञां स शस्त्रपाणी रुरुस्तदा ॥
व्यचरत्पृथिवीं राजन्निघ्नन्सर्पान्यतस्ततः ।
एकदा स वने घोरं डुण्डुभं जरसान्वितम् ॥
अपश्यद्दण्डमुद्यम्य हन्तुं तं समुपाययौ ।
अभ्यहन्रुषितो विप्रस्तमुवाचाथ डुण्डुभः ॥
नापराध्नोमि ते विप्र कस्मान्मामभिहंसि वै । रुरुरुवाच प्राणप्रिया मे दयिता दष्टा सर्पेण सा मृता ॥ प्रतिज्ञेयं तदा सर्प दुःखितेन मया कृता । डुण्डुभ उवाच नाहं दशामि तेऽन्ये वै ये दशन्ति भुजङ्गमाः शरीरसमयोगेन न मां हिंसितुमर्हसि । उत्तङ्क उवाच श्रुत्वा तां मानुषीं वाणीं सर्पेणोक्तां मनोहराम् ॥ रुरुः पप्रच्छ कोऽसि त्वं कस्माद् डुण्डुभतां गतः । सर्प उवाच ब्राह्मणोऽहं पुरा विप्र सखा मे खगमाभिधः ॥
विप्रो धर्मभृतां श्रेष्ठः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
समया वञ्चितो मौर्य्यात्सर्पं कृत्वा च तार्णकम् ॥
भयं च प्रापितोऽत्यर्थमग्निहोत्रगृहे स्थितः ।
तेन भीतेन शप्तोऽहं विह्वलेनातिवेपिना ॥
भव सर्पो मन्दबुद्धे येनाहं धर्षितस्त्वया ।
मया प्रसादितोऽत्यर्थं सर्पेणासौ द्विजोत्तमः ॥
मामुवाचाथ तत्क्रोधात्किञ्चिच्छान्तिमवाप्य च ।
रुरुस्ते मोचिता शापस्यास्य सर्प भविष्यति ॥
प्रमतेस्तु सुतो नूनमिति मां सोऽब्रवीद्वचः ।
सोऽहं सर्पो रुरुस्त्वं च शृणु मे परमं वचः ॥
द्वितीय स्कन्ध २३१ अत्यन्त भीषण प्रतिज्ञा की कि मैं जिस किसी भी २७ सर्पको देखूँगा, उसे तत्काल आयुधसे मार डालूँगा । हे राजन्! इस प्रकार प्रतिज्ञा करके हाथमें शस्त्र लेकर मुनि रुरु सर्पोंका वध करते हुए इधर - उधर २८ घूमते रहे । एक बार उन्हें वनमें एक बूढ़ा डुंडुभ साँप दिखायी दिया । वे लाठी उठाकर रोषपूर्वक २ ९ उसे मारनेके लिये तत्पर हुए, तब डुंडुभने उन ब्राह्मणसे कहा — हे विप्र! मैं आपके प्रति कोई अपराध नहीं कर रहा हूँ तो फिर आप मुझे क्यों मार रहे हैं? ॥ २४–२९ ९ ३ ॥ ३० रुरु बोले- मेरी प्राणप्रिया भार्याको सर्पने डँस लिया था और उसकी मृत्यु हो गयी थी । अत: हे सर्प! उसी समय से दुःखित होकर मैंने ऐसी प्रतिज्ञा कर ली थी ॥ ३० ०३ ॥ ॥ ३१ डुंडुभ बोला- मैं किसीको काटता नहीं । जो सर्प काटते हैं, वे दूसरे होते हैं । इसलिये सर्पसदृश शरीर होनेके कारण मुझे आप मत मारिये ॥ ३१ ॥ ३२ उत्तंक बोले- मनुष्यके समान उसकी सुन्दर वाणी सुनकर रुरुने पूछा- तुम कौन हो? और डुंडुभयोनिको कैसे प्राप्त हो गये? ॥ ३२३ ॥
सर्प बोला- हे विप्र! पहले मैं ब्राह्मण था और ३३ ' खगम ' नामका मेरा एक ब्राह्मण मित्र था । वह धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय था । एक बार अपनी मूर्खतावश मैंने तृणका सर्प बनाकर ३४ उसे धोखेमें डाल दिया॥३३-३४ ॥ उस समय वह अग्निहोत्रगृहमें विद्यमान था, ३५ सर्पको देखकर अत्यन्त डर गया । भयसे थर - थर काँपते हुए उस ब्राह्मणने विह्वल होकर मुझे शाप दे दिया - हे मन्दबुद्धि! तुमने सर्प दिखाकर मुझे डराया ३६ है, अत: तुम सर्प हो जाओ । सर्परूपमें मैंने उस ब्राह्मणकी बड़ी प्रार्थना की । तब उस ब्राह्मणने क्रोधसे ३७ थोड़ा शान्त होनेपर मुझसे कहा — हे सर्प! प्रमतिपुत्र रुरु तुम्हें इस शापसे मुक्त करेंगे । उन्होंने यह बात स्वयं मुझसे कही थी । मैं वही सर्प हूँ और आप रुरु ३८ | हैं | आप मेरे वचनको ध्यानपूर्वक सुनिये - ब्राह्मणोंके