देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 291–300
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
पृष्ठ 291
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८
राजसादर्थसंवृद्धिस्तथा भोगस्तु राजसः ।
सत्त्वं विनिर्गतं तेन तमसश्चापि निग्रहः ॥ ३८
यदा तमो विवृद्धं स्यादुत्कटं सम्बभूव ह ।
तदा वेदे न विश्वासो धर्मशास्त्रे तथैव च ॥ ३ ९
श्रद्धां च तामसीं प्राप्य करोति च धनात्ययम् ।
द्रोहं सर्वत्र कुरुते न शान्तिमधिगच्छति ॥ ४०
जित्वा सत्त्वं रजश्चैव क्रोधनो दुर्मतिः शठः ।
वर्तते कामचारेण भावेषु विततेषु च ॥ ४१
एकं सत्त्वं न भवति रजश्चैकं तमस्तथा ।
सहैवाश्रित्य वर्तन्ते गुणा मिथुनधर्मिणः ॥ ४२
रजो विना न सत्त्वं स्याद्रजः सत्त्वं विना क्वचित् ।
तमो विना न चैवैते वर्तन्ते पुरुषर्षभ ॥ ४३
तमस्ताभ्यां विहीनं तु केवलं न कदाचन ।
सर्वे मिथुनधर्माणो गुणाः कार्यान्तरेषु वै ॥ ४४
अन्योन्यसंश्रिताः सर्वे तिष्ठन्ति न वियोजिताः ।
अन्योन्यजनकाश्चैव यतः प्रसवधर्मिणः ॥ ४५
सत्त्वं कदाचिच्च रजस्तमसी जनयत्युत ।
कदाचित्तु रजः सत्त्वतमसी जनयत्यपि ॥ ४६
कदाचित्तु तमः सत्त्वरजसी जनयत्युभे ।
जनयन्त्येवमन्योन्यं मृत्पिण्डश्च घटं यथा ॥ ४७
बुद्धिस्थास्ते गुणाः कामान्बोधयन्ति परस्परम् ।
देवदत्तविष्णुमित्रयज्ञदत्तादयो यथा ॥ ४८
रजोगुण बढ़ने से धनकी वृद्धि होती है और भोग भी राजसी हो जाता है । उस दशामें सत्त्वगुण दूर चला जाता है और उससे तमोगुण भी दब जाता है ॥ ३८ ॥
जब तमोगुणकी वृद्धि होती है और वह उत्कट | हो जाता है, तब वेद तथा धर्मशास्त्रमें विश्वास नहीं रह जाता । उस समय मनुष्य तामसी श्रद्धा प्राप्त करके धनका दुरुपयोग करता है, सबसे द्रोह करने लगता है तथा उसे शान्ति नहीं मिलती । वह क्रोधी, दुर्बुद्धि तथा दुष्ट मनुष्य सत्त्व तथा रजोगुणको दबाकर अनेकविध तामसिक विचारोंमें लीन रहता हुआ मनमाना आचरण करने लगता है ॥ ३ ९ —४१ ॥ किसी भी प्राणीमें सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण अकेले नहीं रहते; अपितु मिश्रित धर्मवाले वे तीनों गुण एक - दूसरेके आश्रयीभूत होकर रहते | हैं ॥ ४२ ॥
हे पुरुष श्रेष्ठ! रजोगुणके बिना सत्त्वगुण और सत्त्वगुणके बिना रजोगुण कदापि रह नहीं सकते । इसी प्रकार तमोगुणके बिना ये दोनों गुण नहीं रह सकते । इस प्रकार ये गुण परस्पर स्थित रहते हैं । सत्त्वगुण तथा रजोगुणके बिना तमोगुण नहीं रहता; क्योंकि इन मिश्रित धर्मवाले सभी गुणोंकी स्थिति कार्य - कारण-भावसे विभिन्न प्रकारकी होती है॥४३-४४ ॥ ये सभी गुण अन्योन्याश्रयभावसे विद्यमान रहते हैं, अलग - अलग भावसे नहीं । प्रसवधर्मी होने कारण ये एक - दूसरेके उत्पादक भी होते हैं ॥ ४५ ॥
सत्त्वगुण कभी रजोगुणको और कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है; इसी तरह रजोगुण कभी सत्त्वगुणको तथा कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है । इसी प्रकार तमोगुण कभी सत्त्वगुणको एवं कभी रजोगुणको भी उत्पन्न करता है । ये तीनों गुण आपसमें एक - दूसरेको उसी प्रकार उत्पन्न कर देते हैं, जिस प्रकार मिट्टीका लोंदा घड़ेको उत्पन्न कर देता है ॥ ४६-४७ ॥ मनुष्योंकी बुद्धिमें स्थित ये तीनों गुण परस्पर कामनाओंको उसी प्रकार जाग्रत् करते हैं; जैसे देवदत्त, विष्णुमित्र और यज्ञदत्त आदि मिलकर काम करते हैं ॥ ४८ ॥
पृष्ठ 292
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ९ ] तृतीय
यथा स्त्रीपुरुषश्चैव मिथुनौ च परस्परम् ।
तथा गुणाः समायान्ति युग्मभावं परस्परम् ॥ ४ ९
रजसो मिथुने सत्त्वं सत्त्वस्य मिथुने रजः ।
उभे ते सत्त्वरजसी तमसो मिथुने विदुः ॥५०
॥
नारद उवाच
इत्येतत्कथितं पित्रा गुणरूपमनुत्तमम् ।
श्रुत्वाप्येतत्स एवाहं ततोऽपृच्छं पितामहम् ॥ ५१
स्कन्ध २८३ जिस प्रकार स्त्री और पुरुष आपसमें मिथुन-भावको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार ये तीनों गुण परस्पर युग्म - भावको प्राप्त रहते हैं ॥ ४ ९ ॥ रजोगुणका युग्म - भाव होनेपर सत्त्वगुण, सत्त्वगुणका युग्म - भाव होनेपर रजोगुण और तमोगुणके युग्म - भावसे सत्त्वगुण तथा रजोगुण - ये दोनों उत्पन्न होते हैं- ऐसा कहा गया है ॥ ५० ॥
नारदजी बोले - इस प्रकार पिताजीने तीनों गुणोंके अत्युत्तम स्वरूपका वर्णन किया । इसे सुननेके । पश्चात् मैंने पुनः पितामह ब्रह्माजी से पूछा ॥ ५१ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे गुणानां रूपसंस्थानादिवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः गुणोंके परस्पर मिश्रीभावका नारद उवाच
गुणानां लक्षणं तात भवता कथितं किल ।
न तृप्तोऽस्मि पिबन्मिष्टं त्वन्मुखात्प्रच्युतं रसम् ॥
गुणानां तु परिज्ञानं यथावदनुवर्णय ।
येनाहं परमां शान्तिमधिगच्छामि चेतसि ॥
व्यास उवाच
इति पृष्टस्तु पुत्रेण नारदेन महात्मना ।
उवाच च जगत्कर्ता रजोगुणसमुद्भवः ॥
ब्रह्मोवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि गुणानां परिवर्णनम् ।
सम्यङ् नाहं विजानामि यथामति वदामि ते ॥
सत्त्वं तु केवलं नैव कुत्रापि परिलक्ष्यते ।
मिश्रीभावस्तु तेषां वै मिश्रत्वं प्रतिभाति वै ॥
यथा काचिद्वरा नारी सर्वभूषणभूषिता ।
हावभावयुता कामं भर्तुः प्रीतिकरी भवेत् ॥
वर्णन, देवीके बीजमन्त्रकी महिमा नारदजी बोले - हे तात! आपने गुणोंके लक्षणोंका वर्णन किया, किंतु आपके मुखसे निःसृत वाणीरूपी १ मधुर रसका पान करता हुआ मैं अभी भी तृप्त नहीं हुआ हूँ ॥१ ॥
अतएव अब आप इन गुणोंके सूक्ष्म ज्ञानका यथावत् वर्णन कीजिये, जिससे मैं अपने हृदयमें परम शान्तिका अनुभव कर सकूँ ॥ २ ॥
व्यासजी बोले - अपने पुत्र महात्मा नारदके इस प्रकार पूछनेपर रजोगुणसे आविर्भूत सृष्टि-निर्माता ब्रह्माजीने कहा ॥३ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे नारद! सुनिये, अब मैं गुणों का विस्तृत वर्णन करूँगा; यद्यपि मैं इस विषयमें सम्यक् ज्ञान नहीं रखता फिर भी अपनी बुद्धिके ४ अनुसार आपसे वर्णन कर रहा हूँ ॥ ४ ॥
केवल सत्त्वगुण कहीं भी परिलक्षित नहीं होता है । गुणोंका परस्पर मिश्रीभाव होनेके कारण वह ५ सत्त्वगुण भी मिश्रित दिखायी देता है ॥ ५ ॥
जिस प्रकार सब भूषणोंसे विभूषित तथा हाव-भावसे युक्त कोई सुन्दरी स्त्री अपने पतिको विशेष ६ प्रिय होती है तथा माता - -1 पिता एवं बन्धु - बान्धवोंके
पृष्ठ 293
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२८४ मातापित्रोस्तथा सैव बन्धुवर्गस्य प्रीतिदा दुःखं मोहं सपत्नीषु जनयत्यपि सैव हि एवं सत्त्वेन तेनैव स्त्रीत्वमापादितेन च रजसस्तमसश्चैव जनिता वृत्तिरन्यथा रजसा स्त्रीकृतेनैव तमसा च तथा पुनः । अन्योन्यस्य समायोगादन्यथा प्रतिभाति वै
अवस्थानात्स्वभावेषु न वै जात्यन्तराणि च ।
लक्ष्यन्ते विपरीतानि योगान्नारद कुत्रचित् ॥
यथा रूपवती नारी यौवनेन विभूषिता ।
लज्जामाधुर्ययुक्ता च तथा विनयसंयुता ॥
कामशास्त्रविधिज्ञा च धर्मशास्त्रेऽपि सम्मता । भर्तुः प्रीतिकरी भूत्वा सपत्नीनां च दुःखदा ।
मोहदुःखस्वभावस्था सत्त्वस्थेत्युच्यते जनैः ।
तथा सत्त्वं विकुर्वाणमन्यभावं विभाति वै ॥
चौरैरुपद्रुतानां हि साधूनां सुखदा भवेत् ।
दुःखा मूढा च दस्यूनां सैव सेना तथागुणा ॥
विपरीतप्रतीतिं वै जनयन्ति स्वभावतः ।
यथा च दुर्दिनं जातं महामेघघनावृतम् ॥
विद्युत्स्तनितसंयुक्तं तिमिरेणावगुण्ठितम् ।
सिञ्चद्भूमिं प्रवर्षद्वै तमोरूपमुदाहृतम् ॥
यदेतत्कर्षकाणां वै तदेवातीव दुर्दिनम् ।
बीजोपस्करयुक्तानां सुखदं प्रभवत्युत ॥
अप्रच्छन्नगृहाणाञ्च दुर्भगानां विशेषतः ।
तृणकाष्ठगृहीतानां दुःखदं गृहमेधिनाम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ । लिये भी प्रीतिकर होती है, किंतु वही स्त्री अपनी ॥ ७ सौतोंके मनमें दुःख और मोह उत्पन्न करती है । इसी प्रकार सत्त्वगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर रजोगुण और । तमोगुणसे मिलने पर भिन्न वृत्ति उत्पन्न होती है । ऐसे ॥ ८ ही रजोगुण तथा तमोगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर एक - दूसरेके परस्पर संयोगके कारण विपरीत भावना प्रतीत होती है ॥ ६ – ९ ॥ हे नारद! यदि ये तीनों गुण परस्पर मिश्रित न ॥ होते तो उनके स्वभावमें एक - सी ही प्रवृत्ति रहती, किंतु तीनों गुणोंमें मिश्रण होनेके कारण ही विभिन्नताएँ दिखायी देती हैं ॥१० ॥
१० जैसे कोई रूपवती स्त्री यौवन, लज्जा, माधुर्य तथा विनयसे युक्त हो, साथ ही वह धर्मशास्त्र अनुकूल हो तथा कामशास्त्रको जाननेवाली हो, तो ११ वह अपने पतिके लिये प्रीतिकर होती है; किंतु सौतोंके लिये कष्ट देनेवाली होती है ॥ ११-१२ ॥ [ सौतोंके लिये ] मोह तथा दुःख देनेवाली होनेपर १२ भी कुछ लोगोंके द्वारा वह सत्त्वगुणी कही जाती है और सत्त्वगुणके अनेक शुभ कार्य करनेपर भी वह सौतोंको विपरीत भाववाली प्रतीत होती है ॥ १३ ॥
१३ जैसे राजाकी सेना चोरोंसे पीड़ित सज्जनोंके लिये सुख देनेवाली होती है, किंतु वही सेना चोरोंके लिये दुःखदायिनी, मूढ़ तथा गुणहीन होती है ॥ १४ ॥
१४ इससे प्रकट होता है कि स्वाभाविक गुण भी विपरीत लक्षणोंवाले दीख पड़ते हैं । जैसे किसी दिन जब चारों ओर काले - काले मेघ घिर आये हों, बिजली चमक रही हो, मेघ गरज रहे हों, अन्धकारसे १५ आच्छादित हो और घनघोर वर्षाके कारण सूखी भूमि सिंच रही हो, तब भी लोग उसे तमोरूप गाढ़ान्धकारसे व्याप्त दुर्दिन नामसे ही पुकारते हैं । एक ओर वही १६ दुर्दिन किसानोंको खेत जोतने तथा बीज बोनेकी सुविधा देनेके कारण सुखदायी प्रतीत होता है, किंतु दूसरी ओर वही दुर्दिन उन अभागे गृहस्थोंके लिये १७ दुःखदायी हो जाता है, जिनके घर अभी छाये नहीं जा सके हैं और जो तृण, काष्ठ आदिके संग्रहमें व्यस्त हैं । साथ ही वही दुर्दिन उन स्त्रियोंके हृदयमें १८ शोक उत्पन्न करता है, जिनके पति परदेश गये हों ।
पृष्ठ 294
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ९ ] तृतीय
प्रोषितभर्तृकाणां वै मोहदं प्रवदन्त्यपि ।
स्वभावस्था गुणाः सर्वे विपरीता विभान्ति वै ॥ १ ९
लक्षणानि पुनस्तेषां शृणु पुत्र ब्रवीम्यहम् ।
लघुप्रकाशकं सत्त्वं निर्मलं विशदं सदा ॥ २०
यदाङ्गानि लघून्येव नेत्रादीनीन्द्रियाणि च ।
निर्मलं च तथा चेतो गृह्णाति विषयान्न तान् ॥ २१
तदा सत्त्वं शरीरे वै मन्तव्यञ्च समुत्कटम् ।
जृम्भां स्तम्भं च तन्द्रां च चलञ्चैव रजः पुनः ॥ २२
यदा तदुत्कटं जातं देहे यस्य च कस्यचित् ।
कलिं मृगयते कर्तुं गन्तुं ग्रामान्तरं तथा ॥ २३
चलचित्तश्च सोऽत्यर्थं विवादे चोद्यतस्तथा ।
गुरुमावरणं कामं तमो भवति तद्यदा ॥ २४
तदाङ्गानि गुरूण्याशु प्रभवन्त्यावृतानि च ।
इन्द्रियाणि मनः शून्यं निद्रां नैवाभिवाञ्छति ॥ २५
गुणानां लक्षणान्येवं विज्ञेयानीह नारद । नारद उवाच विभिन्नलक्षणाः प्रोक्ताः पितामह गुणास्त्रयः ॥ २६
कथमेकत्र संस्थाने कार्यं कुर्वन्ति शाश्वतम् ।
परस्परं मिलित्वा हि विभिन्नाः शत्रवः किल ॥ २७
एकत्रस्थाः कथं कार्यं कुर्वन्तीति वदस्व मे । ब्रह्मोवाच शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि गुणास्ते दीपवृत्तयः ॥ २८
प्रदीपश्च यथा कार्यं प्रकरोत्यर्थदर्शनम् ।
वर्तिस्तैलं यथार्चिश्च विरुद्धाश्च परस्परम् ॥ २ ९
विरुद्धं हि तथा तैलमग्निना सह सङ्गतम् ।
तैलं वर्तिविरोध्येव पावकोऽपि परस्परम् ॥ ३०
एकत्रस्थाः पदार्थानां प्रकुर्वन्ति प्रदर्शनम् । स्कन्ध २८५ उसी प्रकार ये सत्त्वादि गुण अपनी स्वाभाविक परिस्थितिमें रहते हुए भी अन्य गुणोंसे मिलनेपर विपरीत दृष्टिगोचर होते हैं ॥ १५–१९ ॥ हे पुत्र! अब मैं उन गुणोंके लक्षण पुनः बता । रहा हूँ; सुनो । सत्त्वगुण सूक्ष्म, प्रकाशक, स्वच्छ, निर्मल एवं व्यापक होता है । जब मानवके सम्पूर्ण अंग और नेत्र आदि इन्द्रियाँ हल्के हों, मन निर्मल हो तथा वह उन राजस एवं तामस विषयोंको न ग्रहण करता हो, तब यह समझ लेना चाहिये कि शरीरमें अब सत्त्वगुण प्रधानरूपसे विद्यमान है । जब जिस किसीकी देहमें रजोगुण प्रधानरूपसे विद्यमान रहता है तब यह बार - बार जम्हाई, स्तम्भन, तन्द्रा तथा चंचलता उत्पन्न करता है । इसी प्रकार जब अत्यन्त कलह करनेका मन चाहता हो, अन्यत्र जानेकी इच्छा हो, चित्त चंचल हो और वाद - विवादमें उलझनेकी प्रवृत्ति हो, मनमें काम - भावनाका गहरा परदा पड़ जाय, तब यह समझ ले कि शरीरमें तमोगुणकी प्रधानता है । उस समय शरीरके अंग भारी हो जाते हैं, इन्द्रियाँ तामसिक भावोंके वशीभूत रहती हैं, चित्त विमूढ़ रहता है और वह निद्राकी इच्छा नहीं करता । हे नारद! इस प्रकार सभी गुणोंके लक्षण समझना चाहिये ॥ २०–२५३ ॥ नारदजी बोले - हे पितामह! आपने तीनों गुणोंको भिन्न - भिन्न लक्षणोंवाला बताया, तो फिर ये एक स्थानमें होकर निरन्तर कार्य कैसे करते हैं? विपरीत होते हुए भी शत्रुरूप ये गुण एकत्र होकर परस्पर मिल करके किस प्रकार कार्य करते हैं; यह मुझे बताइये ॥ २६-२७३ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे पुत्र! सुनो, मैं बताता हूँ । उन तीनों गुणोंका स्वभाव दीपकके समान है । जैसे दीपकमें तेल, बत्ती और अग्निशिखा तीनों परस्पर विरोधी धर्मवाले हैं, परंतु तीनोंके सहयोगसे ही दीपक वस्तुओं आदिका दर्शन कराता है । यद्यपि आग साथ मिला हुआ तेल आगका विरोधी है और तेल बत्ती तथा अग्निका विरोधी है तथापि वे एकत्र होकर वस्तुओंका दर्शन कराते हैं॥२८–३०३ ॥
पृष्ठ 295
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ नारद उवाच एवं प्रकृतिजाः प्रोक्ता गुणाः सत्यवतीसुत विश्वस्य कारणं ते वै मया पूर्वं यथाश्रुतम् । व्यास उवाच इत्युक्तं नारदेनाथ मम सर्वं सविस्तरम्
गुणानां लक्षणं सर्वं कार्यं चैव विभागशः ।
आराध्या परमा शक्तिर्यया सर्वमिदं ततम् ॥
सगुणा निर्गुणा चैव कार्यभेदे सदैव हि ।
अकर्ता पुरुषः पूर्णो निरीहः परमोऽव्ययः ॥
करोत्येषा महामाया विश्वं सदसदात्मकम् ।
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः सूर्यश्चन्द्रः शचीपतिः ॥
अश्विनौ वसवस्त्वष्टा कुबेरो यादसां पतिः ।
वह्निर्वायुस्तथा पूषा सेनानीश्च विनायकः ॥
सर्वे शक्तियुताः शक्ताः कर्तुं कार्याणि स्वानि च ।
अन्यथा तेऽप्यशक्ता वै प्रस्पन्दितुमनीश्वराः ॥
सा चैव कारणं राजन् जगतः परमेश्वरी ।
समाराधय तां भूप कुरु यज्ञं जनाधिप ॥
पूजनं परया भक्त्या तस्या एव विधानतः ।
महालक्ष्मीर्महाकाली तथा महासरस्वती ॥
ईश्वरी सर्वभूतानां सर्वकारणकारणम् ।
सर्वकामार्थदा शान्ता सुखसेव्या दयान्विता ॥
नामोच्चारणमात्रेण वाञ्छितार्थफलप्रदा । देवैराराधिता पूर्व पूर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥
मोक्षकामैश्च विविधैस्तापसैर्विजितात्मभिः ।
अस्पष्टमपि यन्नाम प्रसङ्गेनापि भाषितम् ॥
ददाति वाञ्छितानर्थान्दुर्लभानपि सर्वथा ।
ऐ ऐ इति भयार्तेन दृष्ट्वा व्याघ्रादिकं वने ॥
नारदजी बोले – हे सत्यवतीसुत व्यासजी! ॥ ३१ । ये सत्त्वादि तीनों गुण भी प्रकृतिसे उत्पन्न कहे गये हैं और ये जगत् के कारण हैं, जैसा मैंने पहले भी सुना है ॥ ३१ १ ॥ व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] इस प्रकार ॥ ३२ नारदजीने विस्तारपूर्वक गुणोंके लक्षण और उनके विभागोंके सहित कार्योंको भी मुझे बतलाया है । सर्वदा उन्हीं परमशक्तिकी आराधना करनी चाहिये, ३३ जिनसे यह समस्त संसार व्याप्त है । वे भगवती कार्यभेदसे सगुणा और निर्गुणा दोनों हैं । वह परमपुरुष तो अकर्ता, पूर्ण, निःस्पृह तथा परम अविनाशी है; ३४ ये महामाया ही सत् और असद्रूप जगत्की रचना करती हैं । ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार, आठों वसु, विश्वकर्मा, कुबेर, वरुण, ३५ अग्नि, वायु, पूषा, कुमार कार्तिकेय और गणपति— ये सभी देवता उन्हीं महामायाकी शक्तिसे युक्त होकर ३६ अपने - अपने कार्य करनेमें समर्थ होते हैं । हे मुनीश्वरो! यदि ऐसा न हो तो वे हिलने - डुलने में भी समर्थ नहीं हो सकते ॥ ३२ – ३७ ॥ ३७ हे राजन्! वे परमेश्वरी ही इस जगत्की परम कारण हैं, अतः हे नरपते! अब आप उन्हीं की आराधना करें, उन्हींका यज्ञ करें और परम भक्तिके ३८ साथ विधिवत् उन्हींका पूजन करें । वे ही महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती हैं । वे सब जीवोंकी अधीश्वरी, समस्त कारणोंकी एकमात्र कारण, सभी ३ ९ मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली, शान्तस्वरूपिणी, सुखपूर्वक सेवनीय तथा दयासे परिपूर्ण हैं ॥ ३८-४० ॥ ये भगवती नामोच्चारणमात्रसे ही मनोवांछित ४० फल देनेवाली हैं । पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओं तथा मोक्षकी कामना करनेवाले अनेक ४१ जितेन्द्रिय तपस्वियोंने उनकी आराधना की थी । किसी प्रसंगवश अस्पष्टरूपसे ही उच्चारित किया गया उनका नाम सर्वथा दुर्लभ मनोरथोंको भी पूर्ण कर देता ४२ है ॥ ४१–४२३ || हे नृपश्रेष्ठ! इस सम्बन्धमें एक दृष्टान्त है— सत्यव्रत नामके एक मुनिने वनमें व्याघ्रादि हिंसक ४३ | पशुओंको देखकर भयसे पीड़ित होकर ' ऐ - ऐ '
पृष्ठ 296
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १० ]
बिन्दुहीनमपीत्युक्तं वाञ्छितं प्रददाति वै ।
तत्र सत्यव्रतस्यैव दृष्टान्तो नृपसत्तम ॥
प्रत्यक्ष एव चास्माकं मुनीनां भावितात्मनाम् ।
ब्राह्मणानां समाजेषु तस्योदाहरणं बुधैः ॥
कथ्यमानं मया राजञ्छ्रुतं सर्वं सविस्तरम् ।
अनक्षरो महामूर्खो नाम्ना सत्यव्रतो द्विजः ॥
श्रुत्वाक्षरं कोलमुखात्समुच्चार्य स्वयं ततः । बिन्दुहीनं प्रसङ्गेन जातोऽसौ विबुधोत्तमः ऐकारोच्चारणाद्देवी तुष्टा भगवती तदा । चकार कविराजं तं दयार्द्रा परमेश्वरी तृतीय स्कन्ध २८७ शब्दका उच्चारण किया था । उस बिन्दुरहित बीज -४४ मन्त्र ( ऐं ) - का उच्चारण करनेके फलस्वरूप उसे भगवतीने मनोवांछित फल प्रदान कर दिया था । यह दृष्टान्त हम पुण्यात्मा मुनियोंके लिये प्रत्यक्ष ही है ॥ ४३-४४ ॥ ४५ हे राजन्! ब्राह्मणोंकी सभामें विद्वानोंके द्वारा उदाहरणके रूपमें उस सत्यव्रतके कहे जाते हुए सम्पूर्ण आख्यानको मैंने विस्तारपूर्वक सुना था । ४६ सत्यव्रत नामवाले उस निरक्षर तथा महामूर्ख ब्राह्मणने वह ' ऐ - ऐ ' शब्द एक कोलके मुखसे सुनकर स्वयं भी उसका उच्चारण किया । बिन्दुरहित ' ऐं ' बीजका ॥ ४७ उच्चारण करनेसे भी वह श्रेष्ठ विद्वान् हो गया । ऐकारके उच्चारणमात्र से भगवती प्रसन्न हो गयीं और दयार्द्र होकर उन परमेश्वरीने उसे कविराज बना ॥ ४८ | दिया ॥ ४५–४८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे गुणपरिज्ञानवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः देवीके बीजमन्त्रकी महिमाके प्रसंगमें सत्यव्रतका आख्यान जनमेजय उवाच कोऽसौ सत्यव्रतो नाम ब्राह्मणो द्विजसत्तमः कस्मिन्देशे समुत्पन्नः कीदृशश्च वदस्व मे ॥ कथं तेन श्रुतः शब्दः कथमुच्चारितः पुनः । सिद्धिश्च कीदृशी जाता तस्य विप्रस्य तत्क्षणात् कथं तुष्टा भवानी सा सर्वज्ञा सर्वसंस्थिता । विस्तरेण वदस्वाद्य कथामेतां मनोरमाम् सूत उवाच इति पृष्टस्तदा राज्ञा व्यासः सत्यवतीसुतः । उवाच परमोदारं वचनं रसवच्छुचि व्यास उवाच शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि कथां पौराणिकीं शुभाम् । श्रुता मुनिसमाजेषु मया पूर्वं कुरूद्वह जनमेजय बोले- वह द्विजश्रेष्ठ सत्यव्रत नामक । ब्राह्मण कौन था, वह किस देशमें पैदा हुआ था तथा १ कैसा था? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
उस ब्राह्मणने ' ऐ ' शब्द कैसे सुना और फिर स्वयं भी कैसे उसका उच्चारण किया? उच्चारण ॥ २ करते ही उसी क्षण उस ब्राह्मणको कैसी सिद्धि प्राप्त हुई? सर्वत्र विराजमान रहनेवाली तथा सब कुछ जाननेवाली वे भवानी उसपर किस प्रकार प्रसन्न हो ॥ ३ गयीं? अब आप यह मनोरम कथा विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये ॥ २-३ ॥ सूतजी बोले - राजा जनमेजयके यह पूछनेपर ॥ ४ सत्यवतीसुत व्यासजी सरस, पवित्र एवं परम उदार वचन कहने लगे ॥ ४ ॥
व्यासजी बोले — हे राजन्! सुनिये, मैं वह पवित्र पौराणिक कथा कह रहा हूँ । हे कुरुनन्दन! पूर्वकालमें ॥ ५ मुनियोंके समाजमें मैंने यह कथा सुनी थी ॥ ५ ॥
पृष्ठ 297
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १०
एकदाहं कुरुश्रेष्ठ कुर्वस्तीर्थाटनं शुचि ।
सम्प्राप्तो नैमिषारण्यं पावनं मुनिसेवितम् ॥
प्रणम्याहं मुनीन्सर्वान् स्थितस्तत्र वराश्रमे ।
विधिपुत्रास्तु यत्रासञ्जीवन्मुक्ता महाव्रताः ॥
कथाप्रसङ्ग एवासीत्तत्र विप्रसमागमे ।
जमदग्निस्तु पप्रच्छ मुनीनेवं सभास्थितः ॥
जमदग्निरुवाच
सन्देहोऽस्ति महाभागा मम चेतसि तापसाः ।
समाजेषु मुनीनां वै निःसन्देहो भवाम्यहम् ॥
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो मघवा वरुणोऽनलः ।
कुबेरः पवनस्त्वष्टा सेनानीश्च गणाधिपः ॥
सूर्योऽश्विनौ भगः पूषा निशानाथो ग्रहास्तथा ।
आराधनीयतमः कोऽत्र वाञ्छितार्थफलप्रदः ॥
सुखसेव्यश्च सततं चाशुतोषश्च मानदाः ।
ब्रुवन्तु मुनयः शीघ्रं सर्वज्ञाः संशितव्रताः ॥
एवं प्रश्ने कृते तत्र लोमशो वाक्यमब्रवीत् ।
जमदग्ने शृणुष्वैतद्यत्पृष्टं वै त्वयाधुना ॥
सेवनीयतमा शक्तिः सर्वेषां शुभमिच्छताम् ।
परा प्रकृतिराद्या च सर्वगा सर्वदा शिवा ॥
देवानां जननी सैव ब्रह्मादीनां महात्मनाम् ।
आदिप्रकृतिमूलं सा संसारपादपस्य वै ॥
स्मृता चोच्चारिता देवी ददाति किल वाञ्छितम् ।
सर्वदैवार्द्रचित्ता सा वरदानाय सेविता ॥
इतिहासं प्रवक्ष्यामि शृण्वन्तु मुनयः शुभम् ।
अक्षरोच्चारणादेव यथा प्राप्तं द्विजेन वै ॥
कोसलेषु द्विजः कश्चिद्देवदत्तेति विश्रुतः ।
अनपत्यश्चकारेष्टिं पुत्राय विधिपूर्वकम् ॥
हे कुरुश्रेष्ठ! एक बार तीर्थाटन करता हुआ ६ मैं मुनियोंद्वारा सेवित पवित्र क्षेत्र नैमिषारण्यमें जा पहुँचा । वहाँ सभी मुनियोंको प्रणाम करके मैं एक उत्तम आश्रममें ठहर गया, जहाँ ब्रह्माके पुत्र महाव्रती ७ एवं जीवन्मुक्त मुनि निवास कर रहे थे ॥६-७ ॥ उस ब्राह्मणसमाजमें कथाका ही प्रसंग चल रहा था । सभामें उपस्थित महर्षि जमदग्निने सब ८ मुनियोंसे यह पूछा — ॥ ८ ॥
जमदग्नि बोले - हे महाभाग तपस्वियो! मेरे मनमें एक शंका है । निश्चय ही इस मुनिसमाजमें मैं शंकारहित हो जाऊँगा । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, ९ वरुण, अग्नि, कुबेर, वायु, विश्वकर्मा, कार्तिकेय, गणेश, सूर्य, दोनों अश्विनीकुमार, भग, पूषा, चन्द्रमा और सभी ग्रह - इन सबमें सबसे अधिक आराधनीय १० तथा अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला कौन है? उनमें कौन देवता सदा सेव्य और शीघ्र प्रसन्न होनेवाला है? हे मानद! हे सर्वज्ञ! हे व्रतधारी मुनिगण! आप १ ९ हमें शीघ्र बतायें ॥ ९ –१२ ॥ इस प्रकार जमदग्निके प्रश्न करनेपर लोमश-ऋषिने कहा- हे जमदग्ने! आपने इस समय जो १२ पूछा है, उसे सुनिये । अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले सभी लोगोंके लिये वे एकमात्र महाशक्ति ही आराधनीय हैं । वे ही परा - प्रकृति आदिस्वरूपा, १३ सर्वगामिनी, सर्वदायिनी और कल्याणकारिणी हैं वे ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओंकी जननी हैं और वे ही संसाररूपी वृक्षकी मूलरूपिणी आदिप्रकृति १४ हैं ॥ १३–१५ ॥ वे भगवती केवल नामका उच्चारण तथा स्मरण १५ करते ही निश्चितरूपसे अभीष्ट फल प्रदान करती हैं । जो लोग उनकी उपासना करते हैं, उन्हें वरदान देनेके लिये वे सर्वदा दयालुचित्त रहती हैं ॥ १६ ॥
१६ हे मुनिगण! उनके नामाक्षरके उच्चारण-मात्र से ही एक ब्राह्मणने जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की थी, वह पवित्र वृत्तान्त मैं आपलोगों से कहता हूँ, १७ सुनिये - ॥ १७ ॥
कोसलदेशमें देवदत्त नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहता था । वह नि: सन्तान था, इसलिये उसने पुत्रप्राप्तिके १८ । लिये विधिपूर्वक यज्ञ किया ॥ १८ ॥
पृष्ठ 298
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १० ]
तमसातीरमास्थाय कृत्वा मण्डपमुत्तमम् ।
द्विजानाहूय वेदज्ञान्सत्रकर्मविशारदान् ॥
कृत्वा वेदीं विधानेन स्थापयित्वा विभावसून् ।
पुत्रेष्टिं विधिवत्तत्र चकार द्विजसत्तमः ॥
ब्रह्माणं कल्पयामास सुहोत्रं मुनिसत्तमम् ।
अध्वर्युं याज्ञवल्क्यञ्च होतारं च बृहस्पतिम् ॥
प्रस्तोतारं तथा पैलमुद्गातारं च गोभिलम् ।
सभ्यानन्यान्मुनीन्कृत्वा विधिवत्प्रददौ वसु ॥
उद्गाता सामगः श्रेष्ठः सप्तस्वरसमन्वितम् ।
रथन्तरमगायत्तु स्वरितेन समन्वितम् ॥
तदास्य स्वरभङ्गोऽभूत्कृते श्वासे मुहुर्मुहुः ।
देवदत्तश्चुकोपाशु गोभिलं प्रत्युवाच ह ॥
मूर्खोऽसि मुनिमुख्याद्य स्वरभङ्गस्त्वया कृतः ।
काम्यकर्मणि सञ्जाते पुत्रार्थं यजतश्च मे ॥
गोभिलस्तु तदोवाच देवदत्तं सुकोपितः ।
मूर्खस्ते भविता पुत्रः शठः शब्दविवर्जितः ॥
सर्वप्राणिशरीरे तु श्वासोच्छ्वासः सुदुर्ग्रहः ।
न मेऽत्र दूषणं किञ्चित्स्वरभङ्गे महामते ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य गोभिलस्य महात्मनः ।
शापाद्भीतो देवदत्तस्तमुवाचातिदुःखितः ॥
कथं क्रुद्धोऽसि विप्रेन्द्र वृथा मयि निरागसि ।
अक्रोधना हि मुनयो भवन्ति सुखदाः सदा ॥
स्वल्पेऽपराधे विप्रेन्द्र कथं शप्तस्त्वया ह्यहम् ।
अपुत्रोऽहं सुतप्तः प्राक् तापयुक्तः पुनः कृतः ॥
मूर्खपुत्रादपुत्रत्वं वरं वेदविदो विदुः ।
तथापि ब्राह्मणो मूर्खः सर्वेषां निन्द्य एव हि ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 10 A तृतीय स्कन्ध २८ ९ तमसानदीके तटपर पहुँचकर उसने उत्तम यज्ञ-१ ९ मण्डप बनवाया और वेदज्ञ तथा यज्ञकर्ममें निपुण ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके विधिपूर्वक यज्ञवेदी बनवाकर तथा अग्नि- स्थापन करके उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने विधिवत् २० पुत्रेष्टि यज्ञ आरम्भ कर दिया ॥१ ९ -२० ॥ उसने उस यज्ञमें मुनिवर सुहोत्रको ' ब्रह्मा ', याज्ञवल्क्यको ' अध्वर्यु ' तथा बृहस्पतिको ' होता ', २१ पैलमुनिको ' प्रस्तोता ' तथा गोभिलको ‘ उद्गाता ’ बनाया एवं अन्यान्य उपस्थित मुनियोंको यज्ञका सभासद् बनाकर उन्हें विधिवत् प्रचुर धन प्रदान २२ किया ॥ २१-२२ ॥ सामवेदका गान करनेवाले श्रेष्ठ उद्गाता गोभिलमुनि सातों स्वरोंसे युक्त तथा स्वरितसे समन्वित २३ रथन्तर सामका गान करने लगे ॥२३ ॥
बार - बार श्वास लेनेके कारण गोभिलका स्वर भंग हो गया । तब देवदत्तको क्रोध आ गया और उसने २४ तुरंत गोभिलमुनिसे कहा- हे मुनिमुख्य! तुम मूर्ख हो, तुमने आज मेरेद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये किये जाते हुए इस काम्यकर्ममें स्वरभंग कर दिया ॥ २४-२५ ॥ २५ तब गोभिलमुनि अत्यन्त क्रोधित होकर देवदत्तसे कहने लगे- [ इस यज्ञके फलस्वरूप उत्पन्न २६ होनेवाला ] तुम्हारा पुत्र मूर्ख, शठ और गूँगा होगा । हे महामते! सभी प्राणियोंके शरीरमें श्वास आता-जाता रहता है । इसे रोक पाना बड़ा कठिन है । अतः २७ ऐसी स्थितिमें स्वरभंग हो जानेमें मेरा कुछ भी दोष नहीं है ॥ २६-२७ ॥ महात्मा गोभिलका यह वचन सुनकर शापसे २८ | भयभीत देवदत्तने अत्यन्त दुःखी होकर उनसे कहा- हे विप्रवर! आप मुझ निर्दोषपर व्यर्थ ही क्यों क्रुद्ध हैं? मुनिलोग तो सदा क्रोधरहित और २ ९ सुखदायक होते हैं ॥ २८-२९ ॥ हे विप्र! थोडेसे अपराधपर आपने मुझे शाप क्यों दे दिया? पुत्रहीन होनेके कारण मैं तो पहलेसे ३० ही बहुत दुःखी था, उसपर भी शाप देकर आपने मुझे और भी दुःखी कर दिया । वेदके विद्वानोंने कहा है कि मूर्ख पुत्रकी अपेक्षा पुत्रहीन रहना अच्छा है । ३१ उसपर भी मूर्ख ब्राह्मण तो सबके लिये निन्दनीय होता
पृष्ठ 299
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२ ९ ० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १०
पशुवच्छूद्रवच्चैव न योग्यः सर्वकर्मसु ।
किं करोमीह मूर्खेण पुत्रेण द्विजसत्तम ॥
यथा शूद्रस्तथा मूर्खो ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
न पूजार्हो न दानार्हो निन्द्यश्च सर्वकर्मसु ॥
देशे वै वसमानश्च ब्राह्मणो वेदवर्जितः ।
करदः शूद्रवच्चैव मन्तव्यः स च भूभुजा ॥
नासने पितृकार्येषु देवकार्येषु स द्विजः ।
मूर्खः समुपवेश्यश्च कार्यस्य फलमिच्छता ॥
राज्ञा शूद्रसमो ज्ञेयो न योज्यः सर्वकर्मसु ।
कर्षकस्तु द्विजः कार्यो ब्राह्मणो वेदवर्जितः ॥
विना विप्रेण कर्तव्यं श्राद्धं कुशचटेन वै ।
न तु विप्रेण मूर्खेण श्राद्धं कार्यं कदाचन ॥
आहारादधिकं चान्नं न दातव्यमपण्डिते ।
दाता नरकमाप्नोति ग्रहीता तु विशेषतः ॥
धिग्राज्यं तस्य राज्ञो वै यस्य देशेऽबुधा जनाः ।
पूज्यन्ते ब्राह्मणा मूर्खा दानमानादिकैरपि ॥
आसने पूजने दाने यत्र भेदो न चाण्वपि ।
मूर्खपण्डितयोर्भेदो ज्ञातव्यो विबुधेन वै ॥
मूर्खा यत्र सुगर्विष्ठा दानमानपरिग्रहैः ।
तस्मिन्देशे न वस्तव्यं पण्डितेन कथञ्चन ॥
असतामुपकाराय दुर्जनानां विभूतयः ।
पिचुमन्दः फलाढ्योऽपि काकैरेवोपभुज्यते ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —10 B है । वह पशु एवं शूद्रके समान सभी कार्योंमें अयोग्य ३२ माना जाता है । अतः हे विप्रवर! मूर्ख पुत्रको लेकर मैं क्या करूँगा? ॥ ३०–३२ ॥ मूर्ख ब्राह्मण शूद्रतुल्य होता है; इसमें सन्देह नहीं है; क्योंकि वह न तो पूजाके योग्य होता है और ३३ न दान लेनेका पात्र ही होता है । वह सब कार्यों में निन्द्य होता है ॥ ३३ ॥
किसी देशमें रहता हुआ वेदशास्त्रविहीन ब्राह्मण ३४ कर देनेवाले शूद्रकी भाँति एक राजाके द्वारा समझा जाना चाहिये ॥ ३४ ॥
फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि ३५ देव तथा पितृकार्योंके अवसरपर उस मूर्ख ब्राह्मणको आसनपर न बैठाये ॥ ३५ ॥
राजा भी वेदविहीन ब्राह्मणको शूद्रके समान समझे और उसे शुभ कार्योंमें नियुक्त न करे, बल्कि ३६ उसे कृषिके काम में लगा दे ॥ ३६ ॥
ब्राह्मणके अभावमें कुशके चटसे स्वयं श्राद्धकार्य कर लेना ठीक है, किंतु मूर्ख ब्राह्मणसे कभी भी ३७ श्राद्धकार्य नहीं कराना चाहिये ॥३७ ॥
मूर्ख ब्राह्मणको भोजनसे अधिक अन्न नहीं देना चाहिये; क्योंकि देनेवाला व्यक्ति नरकमें जाता है और लेनेवाला तो विशेषरूपसे नरकगामी होता ३८ है ॥ ३८ ॥
उस राजाके राज्यको धिक्कार है, जिसके राज्यमें मूर्खलोग निवास करते हैं और मूर्ख ब्राह्मण ३ ९ भी दान, सम्मान आदिसे पूजित होते हैं, साथ ही जहाँ मूर्ख और पण्डितके बीच आसन, पूजन और दानमें रंचमात्र भी भेद नहीं माना जाता । अतः विज्ञ पुरुषको ४० चाहिये कि वह मूर्ख और पण्डितकी जानकारी अवश्य कर ले ॥ ३ ९ -४० ॥ जहाँ दान, मान तथा परिग्रहसे मूर्खलोग महान् गौरवशाली माने जाते हैं, उस देशमें पण्डितजनको ४१ किसी प्रकार भी नहीं रहना चाहिये । दुर्जन व्यक्तियोंकी सम्पत्तियाँ दुर्जनोंके उपकारके लिये ही होती हैं । जैसे अधिक फलोंसे लदे हुए नीमके वृक्षका उपभोग ४२ केवल कौए ही करते हैं ॥ ४१-४२ ॥
पृष्ठ 300
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १० ]
भुक्त्वान्नं वेदविद्विप्रो वेदाभ्यासं करोति वै ।
क्रीडन्ति पूर्वजाः तस्य स्वर्गे प्रमुदिताः किल ॥
गोभिलातः किमुक्तं वै त्वया वेदविदुत्तम । संसारे मूर्खपुत्रत्वं मूर्खपुत्रत्वं मरणादतिगर्हितम् ॥
कृपां कुरु महाभाग शापस्यानुग्रहं प्रति ।
दीनोद्धारणशक्तोऽसि पतामि तव पादयोः ॥।
लोमश उवाच
इत्युक्त्वा देवदत्तस्तु पतितस्तस्य पादयोः ।
स्तुवन्दीनहृदत्यर्थं कृपणः साश्रुलोचनः ॥
गोभिलस्तु तदा तत्र दृष्ट्वा तं दीनचेतसम् ।
क्षणकोपा महान्तो वै पापिष्ठाः कल्पकोपनाः ॥
जलं स्वभावतः शीतं पावकातपयोगतः ।
उष्णं भवति तच्छीघ्रं तद्विना शिशिरं भवेत् ॥
दयावान्गोभिलस्त्वाह देवदत्तं सुदुःखितम् ।
मूर्खो भूत्वा सुतस्ते वै विद्वानपि भविष्यति ॥
इति दत्तवरः सोऽथ मुदितोऽभूद् द्विजर्षभः ।
इष्टिं समाप्य विप्रान्वै विससर्ज यथाविधि ॥
कालेन कियता तस्य भार्या रूपवती सती! गर्भं दधार काले सा रोहिणी रोहिणीसमा ॥
गर्भाधानादिकं कर्म चकार विधिवद् द्विजः ।
पुंसवनविधानञ्च शृङ्गारकरणं तथा ॥
सीमन्तोन्नयनञ्चैव कृतं वेदविधानतः ।
ददौ दानानि मुदितो मत्वेष्टिं सफलां तथा ॥
शुभेऽह्नि सुषुवे पुत्रं रोहिणी रोहिणीयुते ।
दिने लग्ने शुभेऽत्यर्थं जातकर्म चकार सः ॥
पुत्रदर्शनकं कृत्वा नामकर्म चकार च ।
उतथ्य इति पुत्रस्य कृतं नाम पुराविदा ॥
तृतीय स्कन्ध २ ९ १ वेदज्ञ ब्राह्मण जिसका अन्न खाकर वेदाभ्यास ४३ करता है, उसके पूर्वज परम प्रसन्न होकर स्वर्गमें विहार करते हैं ॥ ४३ ॥
अतएव हे वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ गोभिल मुने! आपने ४४ यह क्या कह दिया । इस संसारमें मूर्ख पुत्रका पिता होना तो मृत्यु भी बढ़कर कष्टप्रद होता है ॥ ४४ ॥
हे महाभाग! अब आप इस शापसे मेरा उद्धार ४५ करनेकी कृपा कीजिये । आप दीनोंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं । मैं आपके पैरोंपर पड़ता हूँ ॥ ४५ ॥
लोमश बोले- यह कहकर देवदत्त अत्यन्त दीनहृदय तथा असहाय होकर नेत्रोंमें आँसू भरकर ४६ । स्तुति करता हुआ मुनिके पैरोंपर गिर पड़ा ॥ ४६ ॥
तब उस दीनहृदय देवदत्तको देखकर गोभिल-मुनिको दया आ गयी | महात्मालोग क्षणभरके लिये ४७ ही कोप करते हैं, किंतु पापियोंका कोप कल्पपर्यन्त बना रहता है । जल स्वभावतः शीतल होता है । वही जल अग्नि तथा धूपके संयोगसे गर्म हो जाता है, किंतु ४८ पुनः उनका संयोग हटते ही वह शीघ्र शीतल हो जाता है । तब दयालु गोभिलमुनिने अत्यन्त दुःखित देवदत्तसे कहा- तुम्हारा पुत्र मूर्ख होकर भी बादमें ४ ९ विद्वान् हो जायगा ॥ ४७–४९ ॥ इस प्रकार वर पा लेनेपर द्विजवर देवदत्त प्रसन्न हो गये । उन्होंने विधिवत् पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त करके ५० ब्राह्मणोंको विदा किया ॥ ५० ॥
कुछ समय बीतने पर देवदत्तकी पतिव्रता तथा रूपवती भार्या रोहिणी जो रोहिणीके समान शुभ ५१ लक्षणोंवाली थी, उसने यथासमय गर्भधारण किया ॥ ५१ ॥
देवदत्तने विधि - विधानके साथ गर्भाधान आदि ५२ कर्म किये । तत्पश्चात् पुंसवन, श्रृंगारकरण तथा सीमन्तोन्नयन - संस्कार वेद - विधिके साथ सम्पन्न किये । उस समय अपने यज्ञको सफल जानकर प्रसन्न मनसे ५३ उन्होंने बहुत - से दान दिये ॥ ५२-५३ ॥ रोहिणी नक्षत्रयुक्त शुभ दिनमें रोहिणीने पुत्रको जन्म दिया । देवदत्तने शुभ दिन और मुहूर्तमें ५४ | नवजात शिशुका जातकर्म - संस्कार किया और पुत्रदर्शन करके यथासमय उसका नामकरण भी कर दिया । पूर्व बातोंको जाननेवाले देवदत्तने अपने पुत्रका नाम ५५ | ' उतथ्य ' रखा ॥ ५४-५५ ॥ 1897 श्रीमद्देवी... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -10 C