देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 301–310
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310
पृष्ठ 301
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२ ९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १०
स चाष्टमे तथा वर्षे शुभे वै शुभवासरे ।
तस्योपनयनं कर्म चकार विधिवत्पिता ॥ ५६
वेदमध्यापयामास गुरुस्तं वै व्रते स्थितम् ।
नोच्चचार तथोतथ्यः संस्थितो मुग्धवत्तदा ॥ ५७
बहुधा पाठितः पित्रा न दधार मतिं शठः ।
मूढवत्तिष्ठतेऽत्यर्थं तं शुशोच पिता तदा ॥ ५८
एवं कुर्वन्सदाभ्यासं जातो द्वादशवार्षिकः ।
न वेद विधिवत्कर्तुं सन्ध्यावन्दनकं विधिम् ॥ ५ ९
मूर्खोऽभूदिति लोकेषु गता वार्तातिविस्तरा ।
ब्राह्मणेषु च सर्वेषु तापसेष्वितरेषु च ॥६०
जहास लोकस्तं विप्रं यत्र तत्र गतं वने ।
पिता माता निनिन्दाथ मूर्ख तमतिभर्त्सयन् ॥ ६१
निन्दितोऽथ जनैः कामं पितृभ्यामथ बान्धवैः ।
वैराग्यमगमद्विप्रो जगाम वनमप्यसौ ॥ ६२
अन्धो वरस्तथा पङ्गुर्न मूर्खस्तु वरः सुतः ।
इत्युक्तोऽसौ पितृभ्यां वै विवेश काननं प्रति ॥ ६३
गङ्गातीरे शुभे स्थाने कृत्वोटजमनुत्तमम् ।
वन्यां वृत्तिं च संकल्प्य स्थितस्तत्र समाहितः ॥ ६४
नियमं च परं कृत्वा नासत्यं प्रब्रवीम्यहम् ।
स्थितस्तत्राश्रमे रम्ये ब्रह्मचर्यव्रतो हि सः ॥ ६५ ।
आठवें वर्षमें शुभ योग तथा शुभ दिनमें पिता देवदत्तने अपने उस पुत्रका विधिवत् उपनयन - संस्कार सम्पन्न किया ॥ ५६ ॥
ब्रह्मचर्यव्रतमें स्थित उतथ्यको आचार्य वेद पढ़ाने लगे, किंतु वह एक शब्दका भी उच्चारण नहीं कर सका, मूढकी भाँति चुपचाप बैठा रहा ॥५७ ॥
उसके पिताने उसे अनेक प्रकारसे पढ़ानेका प्रयत्न किया, किंतु उस मूर्खकी बुद्धि उस ओर प्रवृत्त नहीं होती थी । वह मूर्खके समान पड़ा रहता था । इससे उसके पिता देवदत्त उसके लिये बहुत चिन्तित हुए ॥ ५८ ॥
इस प्रकार निरन्तर वेदाभ्यास करते हुए वह बालक बारह वर्षका हो गया, किंतु भलीभाँति सन्ध्यावन्दन करनेतककी विधि भी न जान पाया ॥ ५ ९ ॥ सभी ब्राह्मणों, तपस्वियों तथा अन्यान्य लोगों में यह बात विस्तृतरूपसे फैल गयी कि देवदत्तका पुत्र महामूर्ख निकल गया ॥ ६० ॥
हे मुने! वह जहाँ कहीं जाता, लोग उसकी हँसी उड़ाते थे । यहाँतक कि उसके माता - पिता भी उस मूर्खको कोसते हुए उसकी निन्दा किया करते थे ॥ ६१ ॥
इस प्रकार जब सभी लोग, माता - पिता तथा बन्धु - बान्धव उसकी निन्दा करने लगे, तब उस ब्राह्मणबालकके मनमें वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह वनमें चला गया ॥ ६२ ॥
अन्धा या पंगु पुत्र ठीक है, किंतु मूर्ख पुत्र ठीक | नहीं है - माता - पिताके ऐसा कहनेपर वह वनमें चला गया ॥ ६३ ॥
गंगा के किनारे एक उत्तम स्थानपर सुन्दर पर्णकुटी बनाकर वह वनवासीका जीवन व्यतीत करते हुए एकनिष्ठ होकर वहीं रहने लगा ॥ ६४ ॥
' मैं असत्य नहीं बोलूँगा ' – ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करके ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वह उसी सुन्दर आश्रम में रहने लगा ॥ ६५ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सत्यव्रताख्यानवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] -10 D
पृष्ठ 302
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ११ ] तृतीय स्कन्ध २ ९ ३ अथैकादशोऽध्यायः सत्यव्रतद्वारा बिन्दुरहित सारस्वत बीजमन्त्र ' ऐ- ऐ ' का उच्चारण तथा उससे प्रसन्न होकर भगवतीका सत्यव्रतको समस्त विद्याएँ प्रदान करना लोमश उवाच
न वेदाध्ययनं किञ्चिज्जानाति न जपं तथा ।
ध्यानं न देवतानाञ्च न चैवाराधनं तथा ॥
नासनं वेद विप्रोऽसौ प्राणायामं तथा पुनः ।
प्रत्याहारं तु नो वेद भूतशुद्धिञ्च कारणम् ॥
न मन्त्रकीलकं जाप्यं गायत्रीञ्च न वेद सः ।
शौचं स्नानविधिञ्चैव तथाचमनकं पुनः ॥
प्राणाग्निहोत्रं नो वेद बलिदानं न चातिथिम् ।
न सन्ध्यां समिधो होमं विवेद च तथा मुनिः ॥
सोऽकरोत्प्रातरुत्थाय यत्किञ्चिद्दन्तधावनम् ।
स्नानं च शूद्रवत्तत्र गङ्गायां मन्त्रवर्जितम् ॥
फलान्यादाय वन्यानि मध्याह्नेऽपि यदृच्छया ।
भक्ष्याभक्ष्यपरिज्ञानं न जानाति शठस्तथा ॥
सत्यं ब्रूते स्थितस्तत्र नानृतं वदते पुनः ।
जनैः सत्यतपा नाम कृतमस्य द्विजस्य वै ॥
नाहितं कस्यचित्कुर्यान्न तथाविहितं क्वचित् ।
सुखं स्वपिति तत्रैव निर्भयश्चिन्तयन्निति ॥
कदा मे मरणं भावि दुःखं जीवामि कानने ।
जीवितं धिक्च मूर्खस्य तरसा मरणं ध्रुवम् ॥
दैवेनाहं कृतो मूर्खो नान्योऽत्र कारणं मम ।
प्राप्य चैवोत्तमं जन्म वृथा जातं ममाधुना ॥
यथा वन्ध्या सुरूपा च यथा वा निष्फलो द्रुमः ।
अदुग्धदोहा धेनुश्च तथाहं निष्फलः कृतः ॥
लोमश बोले - [ हे जमदग्ने! ] वह उतथ्य वेदाध्ययन, जप, ध्यान तथा देवताओंकी आराधना १ आदि कुछ भी नहीं जानता था । वह ब्राह्मण आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार भी नहीं जानता था । वह भूतशुद्धि तथा कारणके विषयमें भी कुछ नहीं जानता २ था । वह कीलक मन्त्र, जप, गायत्री नहीं जानता था । उसे सम्यक् रूपसे शौच, स्नान - विधि तथा आचमनतकका ज्ञान नहीं था । वह ब्राह्मण प्राणाग्निहोत्र, वैश्वदेव, ३ अतिथि - सत्कार, सन्ध्या - वन्दन, समिधा तथा होम आदिके विषयमें भी नहीं जानता था ॥ १–४ ॥ प्रात: काल उठकर वह किसी तरह सामान्य ४ रूपसे दन्तधावन कर लेता था, तत्पश्चात् शूद्रकी भाँति बिना मन्त्र बोले ही गंगामें स्नान कर लिया करता था । दोपहरके समय वह अपनी इच्छासे वन्य ५ फल लाकर उन्हें खा लिया करता था । उस मूर्खको भक्ष्य तथा अभक्ष्यका भी ज्ञान नहीं था ॥ ५-६ ॥ वहाँ निवास करता हुआ वह ब्राह्मण सदैव ६ सत्यभाषण करता था और झूठ कभी नहीं बोलता था । [ उसकी इस सत्यनिष्ठासे प्रभावित होकर ] लोगोंने इस ब्राह्मणका नाम ' सत्यतपा ' रख दिया ॥ ७ ॥
७ वह न तो कभी किसीका अहित करता था और न अविहित कार्य ही करता था । वह यही सोचता हुआ निडर होकर उस कुटीमें सोता था कि मेरी मृत्यु ८ कब होगी? मैं इस वनमें दुःखपूर्वक जी रहा हूँ । मुझ मूर्खके जीवनको धिक्कार है, अतः अब मेरा शीघ्र मर जाना ही उत्तम है ॥ ८ - ९ ॥ ९ दैवने ही मुझे मूर्ख बनाया है, इसके अतिरिक्त कोई अन्य कारण मुझे जान नहीं पड़ता । उत्तम कुलमें जन्म - ग्रहण करके भी मैंने अपना जीवन व्यर्थ गँवा १० दिया ॥ १० ॥
जैसे रूपसम्पन्न वन्ध्या स्त्री, फलरहित वृक्ष तथा दूध न देनेवाली गाय - ये सब निरर्थक होते हैं, ११ उसी प्रकार मैं भी निष्फल कर दिया गया हूँ ॥ ११ ॥
पृष्ठ 303
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२ ९ ४ किन्नु निन्दाम्यहं दैवं नूनं कर्म ममेदृशम् । न दत्तं पुस्तकं कृत्वा ब्राह्मणाय महात्मने ।
न वै विद्या मया दत्ता पूर्वजन्मनि निर्मला ।
तेनाहं कर्मयोगेन शठोऽस्मि च द्विजाधमः ॥
न च तीर्थे तपस्तप्तं सेविता न च साधवः ।
न द्विजाः पूजिता द्रव्यैस्तेन जातोऽस्मि दुष्टधीः ॥
वर्तन्ते मुनिपुत्राश्च वेदशास्त्रार्थपारगाः ।
अहं सुमूढः सञ्जातो दैवयोगेन केनचित् ॥
न जानामि तपस्तप्तुं किं करोमि सुसाधनम् ।
मिथ्यायं मेऽत्र सङ्कल्पो न मे भाग्यं शुभं किल ॥
दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम् ।
वृथा श्रमकृतं कार्यं दैवाद्भवति सर्वथा ॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च शक्राद्याः किल देवताः ।
कालस्य वशगाः सर्वे कालो हि दुरतिक्रमः ॥
एवंविधान्वितर्कांस्तु कुर्वाणोऽहर्निशं द्विजः ।
स्थितस्तत्राश्रमे तीरे जाह्नव्याः पावने स्थले ॥
विरक्तः स तु सञ्जातः स्थितस्तत्राश्रमे द्विजः ।
कालातिवाहनं शान्तश्चकार विजने वने ॥
एवं स्थितस्य तु वने विमलोदके वै वर्षाणि तत्र नवपञ्च गतानि कामम् । नाराधनं न च जपं न विवेद मन्त्रं कालातिवाहनमसौ कृतवान्वने वै ॥ जानाति तस्य विततं व्रतमेव लोकः सत्यं वदत्यपि मुनिः किल नामजातम् । जातं यशश्च सकलेषु जनेषु कामं सत्यव्रतोऽयमनिशं न मृषाभिभाषी ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ मैं दैवको दोष क्यों दूँ? निश्चित रूपसे मेरा कर्म १२ ही ऐसा था । मैंने पुस्तक लिखकर उसे किसी महात्मा ब्राह्मणको दान नहीं दिया । मैंने पूर्वजन्ममें उत्तम विद्याका भी दान नहीं किया, इसीलिये प्रारब्धवश इस १३ जन्ममें मूर्ख और अधम ब्राह्मण हुआ हूँ । मैंने किसी तीर्थमें तप नहीं किया और न साधुओंकी सेवा ही
की । धन - दानसे मैंने ब्राह्मणोंकी पूजा भी नहीं की ।
१४ इसी कारण मैं ऐसा दुर्बुद्धि हुआ ॥ १२ – १४ ॥
[ मेरे साथ ] बहुत - से मुनिकुमार वेदशास्त्रमें पारंगत हो गये, किंतु मैं न जाने किस दुर्विपाकसे १५ महामूर्ख रह गया ॥ १५ ॥
मैं तप करना भी नहीं जानता, तब कौन - सी साधना करूँ? अब तो मेरा यह सब सोचना भी व्यर्थ १६ है; क्योंकि मेरा भाग्य ही अच्छा नहीं है ॥ १६ ॥
मैं भाग्यको ही सर्वोपरि मानता हूँ । निरर्थक पुरुषार्थको धिक्कार है; क्योंकि परिश्रमसे किया १७ गया कार्य भी प्रारब्धवश सर्वथा विफल हो जाता है ॥ १७ ॥
ब्रह्मा, विष्णु शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता १८ भी कालके वशमें रहते हैं । इसलिये काल सर्वथा अजेय है ॥ १८ ॥
दिन- -रात इस प्रकारके अनेक तर्क - वितर्क करता १ ९ हुआ वह द्विज गंगाके तटपर स्थित उस पावन आश्रममें रहता था ॥ १ ९ ॥ अब वह ब्राह्मण सर्वथा विरक्त हो गया और २० उस निर्जन वनमें स्थित आश्रममें रहता हुआ शान्तचित्त होकर समय बिताने लगा ॥ २० ॥
इस प्रकार निर्मल जलवाले उस वनमें रहते हुए उस ब्राह्मणके चौदह वर्ष बीत गये; पर उसने न कोई जप किया, न आराधना की और न कोई मन्त्र २१ ही वह जान सका, केवल उसने वनमें रहकर कालक्षेप ही किया ॥ २१ ॥
वहाँके लोग केवल उसके इस प्रसिद्ध व्रतको जानते थे कि यह मुनि सदा सत्य बोलता है । अतः सब लोगोंमें उसका यह सुयश फैल गया कि यह सदा २२ । सत्यव्रती है और मिथ्याभाषी नहीं ॥ २२ ॥
पृष्ठ 304
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ११ ] तत्रैकदा तु मृगयां रममाण एव प्राप्तो निषादनिशठो धृतचापबाणः । क्रीडन्वनेऽतिविपुले यमतुल्यदेहः क्रूराकृतिर्हननकर्मणि चातिदक्षः ॥ तेनातिकृष्टेन शरेण विद्धः कोलः किरान धनुर्धरेण । पलायमानो भयविह्वलश्च मुनेः समीपं विद्रुतो जगाम ॥ विकम्पमानो रुधिरार्द्रदेहो यदा जगामाश्रममण्डलं वै । कोलस्तदातीव दयार्द्रभावं प्राप्तो मुनिस्तत्र समीक्ष्य दीनम् ॥ अग्रे व्रजन्तं रुधिरार्द्रदेहं दृष्ट्वा मुनिः सूकरमाशु विद्धम् । दयाभिवेशादतिकम्पमानः सारस्वतं बीजमथोच्चचार ॥ अज्ञातपूर्वं च तथाश्रुतञ्च दैवान्मुखे वै समुपागतञ्च । न ज्ञातवान्बीजमसौ विमूढो ममज्ज शोके स मुनिर्महात्मा ॥ कोलः प्रविश्याश्रममण्डलं तद् गतो निकुञ्जे प्रविलीय गूढम् । अप्राप्तमार्गो दृढनिर्विण्णचेताः प्रवेपमानः शरपीडितत्वात् ॥ ततः क्षणादाकरणान्तकृष्टं चापं दधानोऽतिकरालदेहः । प्राप्तस्तदन्ते स च मृग्यमाणो निषादराजः किल काल एव ॥ दृष्ट्वा मुनिं तत्र कुशासने स्थितं नाम्ना तु सत्यव्रतमद्वितीयम् । व्याधः प्रणम्य प्रमुखे स्थितोऽसौ पप्रच्छ कोलः क्व गतो द्विजेश ॥ तृतीय स्कन्ध २ ९ ५ एक दिन आखेट करता हुआ एक महान् मूर्ख निषाद हाथोंमें धनुष - बाण लिये हुए उसी गहन वनमें आ पहुँचा । यमराजके समान शरीर तथा भीषण २३ आकृतिवाला वह निषाद आखेट करते समय वधकार्यमें बड़ा ही कुशल जान पड़ता था ॥२३ ॥
उस धनुर्धारी किरातने एक सूअरको लक्ष्य करके बड़े जोरसे खींचकर बाण चलाया । तब बाणसे बिँधा हुआ वह सूअर भयभीत होकर भागता हुआ २४ उस मुनिके समीप जा पहुँचा ॥२४ ॥
जब वह सूअर आश्रम - परिधिमें पहुँचा तो भयसे काँप रहा था और उसका शरीर रक्तसे लथपथ था । उस बेचारेको इस दशामें देखकर उस समय २५ सत्यव्रतमुनि अत्यन्त दयार्द्रचित्त हो गये । रक्तसे सराबोर शरीरवाले उस आहत सूअरको अपने आगेसे जाते देखकर दयाके अतिरेकसे काँपते हुए मुनिने बिन्दुरहित सारस्वत बीजमन्त्र ' ऐ - ऐ ' का उच्चारण किया ॥ २५-२६ ॥ २६ उन्हें इसके पूर्व न तो इस मन्त्रका ज्ञान था और न उन्होंने कभी इसे सुना ही था; दैवयोगसे ही उनके मुखसे यह मन्त्र निकल पड़ा । अब भी उन विमूढ़को नहीं मालूम था कि यह सारस्वत बीजमन्त्र २७ है । वे महात्मा सत्यव्रतमुनि तो उस घायल सूअरके शोक में डूबे हुए थे ॥ २७ ॥
इसी बीच बाणकी पीड़ाके कारण अत्यन्त सन्तप्तचित्त तथा काँपते हुए शरीरवाला वह सूअर २८ कोई दूसरा मार्ग न पाकर सत्यव्रतके आश्रममण्डलमें प्रविष्ट होकर कहीं झाड़ीमें छिप गया ॥ २८ ॥
थोड़ी देर बाद कानतक खींचे धनुषको धारण किये हुए दूसरे कालके समान विकराल देहवाला वह निषादराज भी उस सूअरको खोजता हुआ मुनिके २ ९ निकट आ पहुँचा ॥ २ ९ ॥। वहाँ कुशासनपर बैठे हुए अद्वितीय सत्यव्रतमुनिको देखकर वह व्याध प्रणाम करके उनके सामने खड़ा हो गया और पूछने लगा - हे द्विजराज! वह सूअर ३० | कहाँ गया? ॥३० ॥
पृष्ठ 305
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२ ९ ६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ जानामि तेऽहं सुव्रतं प्रसिद्धं तेनाद्य पृच्छे मम बाणविद्धः । क्षुधार्दितं मे सकलं कुटुम्बं विभर्तुकामः किल आगतोऽस्मि ॥ वृत्तिर्ममैषा विहिता विधात्रा नान्यास्ति विप्रेन्द्र ऋतं ब्रवीमि । भर्तव्यमेवेह कुटुम्बमञ्जसा केनाप्युपायेन शुभाशुभेन ॥ सत्यं ब्रवीत्वद्य सत्यव्रतोऽसि क्षुधातुरो वर्तते पोष्यवर्गः । क्वासौ गतः सूकरो बाणविद्धः पृच्छाम्यहं वाडव ब्रूहि तूर्णम् ॥ तेनेति पृष्टः स निर्मा वितर्कमग्नः प्रबभूव कामम् । सत्यव्रतं S भवेन्न भग्नं न दृष्ट इत्युच्चरितेन किं वै ॥ गतोऽत्र कोलः शरविद्धदेहः कथं ब्रवीम्यद्य मृषामृषा वा । क्षुधार्दितोऽयं परिपृच्छतीव दृष्ट्वा हनिष्यत्यपि सूकरं वै ॥ सत्यं न सत्यं खलु यत्र हिंसा दयान्वितं चानृतमेव सत्यम् । हितं नराणां भवतीह येन तदेव सत्यं न तथान्यथैव ॥ हितं कथं स्यादुभयोर्विरुद्धयो-स्तदुत्तरं किं न यथा मृषा वचः । विचारयन्वाडव धर्मसङ्क न प्राप वक्तुं वचनं यथोचितम् ॥ मैं आपके सत्यभाषणके प्रसिद्ध व्रतको जानता हूँ इसीलिये पूछता हूँ कि मेरे बाणसे घायल हुआ वह सूअर किधर गया? मेरा सारा परिवार भूखसे पीड़ित ३१ है । मैं उनकी क्षुधा - शान्तिकी इच्छासे ही यहाँ आया हूँ ॥ ३१ ॥
विप्रेन्द्र! विधाता मेरी यही जीविका निर्धारित की है । इसके अतिरिक्त मेरा दूसरा कोई साधन नहीं है, यह मैं सत्य कहता हूँ । अच्छे - बुरे किसी भी उपायसे अपने परिवारका पालन - पोषण तो ३२ निश्चितरूपसे करना ही चाहिये ॥ ३२ ॥
आप सत्यव्रत हैं, अतः मुझे अब सच - सच बता दीजिये । मेरा सारा कुटुम्ब भूखसे व्याकुल है । अतः हे विप्र! मैं आपसे पुनः पूछ रहा हूँ कि मेरे बाणसे घायल वह सूअर किधर गया है? आप मुझे शीघ्र ३३ बता दें ॥३३ ॥
उस व्याधके इस प्रकार बार - बार पूछनेपर महात्मा सत्यव्रतमुनि बड़े असमंजसमें पड़ गये और मनमें सोचने लगे कि अब मैं क्या करूँ? जिससे मेरा सत्यव्रत नष्ट न हो और मुझे यह भी न कहना पड़े ३४ कि ' मैंने उसे नहीं देखा है ' ॥ ३४ ॥
' तुम्हारे बाणसे घायल वह सूअर भाग गया । ' यह मिथ्या मैं कैसे कहूँ? और यदि इसे सच बता देता हूँ तो यह क्षुधासे आतुर होकर बार - बार सूअरको पूछ रहा है, अतः उसे खोजकर अवश्य ही ३५ मार डालेगा ॥३५ ॥
वह सत्य वास्तविक सत्य नहीं है जिससे किसी जीवकी हिंसा होती हो तथा वह असत्य भी सत्य ही है, जो दयासे युक्त हो । जिसके द्वारा प्राणियोंका कल्याण हो, वही सत्य है और जो इसके विपरीत है, ३६ वह असत्य है ॥ ३६ ॥
इन परस्पर विरोधी प्रसंगोंमें मेरा हित कैसे हो! मैं क्या उत्तर दूँ, जिससे मेरी बात झूठी न हो । [ लोमशमुनिने कहा ] – हे ब्राह्मण! ऐसा विचार करते हुए वे सत्यव्रतमुनि धर्मसंकटमें पड़ गये और ३७ । व्याधको यथोचित उत्तर नहीं दे सके ॥ ३७ ॥
पृष्ठ 306
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ११ ] तृतीय बाणाहतं वीक्ष्य दयान्वितञ्च कोलं तदन्ते समुदाहृतं वचः । तेन प्रसन्ना निजबीजतः शिवा विद्यां दुरापां प्रददौ च तस्मै ॥ ३८
बीजोच्चारणतो देव्या विद्या प्रस्फुरिताखिला ।
वाल्मीकेश्च यथा पूर्वं तथा स ह्यभवत्कविः ॥ ३ ९
तमुवाच द्विजो व्याधं सम्मुखस्थं धनुर्धरम् ।
सत्यकामस्तु धर्मात्मा श्लोकमेकं दयापरः ॥ ४०
या पश्यति न सा ब्रूते या ब्रूते सा न पश्यति ।
अहो व्याध स्वकार्यार्थिन् किं पृच्छसि पुनः पुनः ॥ ४१
इत्युक्तस्तु तदा तेन गतोऽसौ पशुहा पुनः ।
निराशः सूकरे तस्मिन्परावृत्तो निजालये ॥ ४२
ब्राह्मणस्तु कविर्जातः प्राचेतस इवापरः ।
प्रसिद्धः सर्वलोकेषु नाम्ना सत्यव्रतो द्विजः ॥ ४३
सारस्वतं ततो बीजं जजाप विधिपूर्वकम् ।
पण्डितश्चातिविख्यातो द्विजोऽसौ धरणीतले ॥ ४४
प्रतिपर्वसु गायन्ति ब्राह्मणा यद्यशः सदा ।
आख्यानं चातिविस्तीर्णं स्तुवन्ति मुनयः किल ॥ ४५
तच्छ्रुत्वा सदनं तस्य समागत्य तदाश्रमे ।
येन त्यक्तः पुरा तेन गृहं नीतोऽतिमानितः ॥ ४६
तस्माद्राजन्सदा सेव्या पूजनीया च भक्तितः ।
आदिशक्तिः परा देवी जगतां कारणं हि सा ॥ ४७
तस्या यज्ञं महाराज कुरु वेदविधानतः ।
सर्वकामप्रदं नित्यं निश्चयं कथितं पुरा ॥ ४८
स्कन्ध २ ९ ७ बाणसे आहत सूअरको देखकर मुनि सत्यव्रतके द्वारा जो करुणायुक्त ' ऐ- ऐ ' शब्द उच्चरित हो गया था; उस अपने बीजमन्त्रसे प्रसन्न होकर भगवती शिवाने उन्हें दुर्लभ विद्या दे दी ॥ ३८ ॥
देवीके बीजमन्त्रका उच्चारण करते ही मुनि सत्यव्रतके हृदयमें समस्त विद्याएँ प्रस्फुटित हो गयीं और वे उसी प्रकार कवि हो गये, जिस प्रकार पूर्वकालमें महर्षि वाल्मीकि ॥ ३ ९ ॥ तत्पश्चात् सत्यकाम, धर्मात्मा तथा दयालु ब्राह्मण सत्यव्रतने अपने सामने खड़े उस धनुर्धारी व्याधसे एक श्लोक इस प्रकार कहा- जो ( आँख ) देखती है, वह बोलती नहीं है और जो ( वाणी ) बोलती है, वह देखती नहीं । अतः अपने ही प्रयोजनकी सिद्धिमें तत्पर हे व्याध! तुम बार - बार क्यों पूछ रहे हो? ॥४०-४१ ॥ उस मुनिके ऐसा कहनेपर पशुओंका वध करनेवाला वह व्याध उस सूअरसे निराश होकर अपने घर लौट गया ॥ ४२ ॥
इस प्रकार वे सत्यव्रत नामक ब्राह्मण दूसरे वाल्मीकिके समान कवि हो गये और समस्त लोकोंमें प्रख्यात हो गये ॥ ४३ ॥
तत्पश्चात् उन सत्यव्रतब्राह्मणने सारस्वत बीजमन्त्रका विधिपूर्वक जप किया और वे पृथ्वीतलपर पण्डितके रूपमें अत्यधिक विख्यात हो गये ॥ ४४ ॥
अब ब्राह्मणलोग प्रत्येक पर्वपर उनका यशोगान करने लगे और मुनिगण उनके विस्तृत आख्यानकी निरन्तर प्रशंसा करने लगे ॥ ४५ ॥
उनका महान् यश सुनकर उनके परिवारके वे ही लोग, जिन्होंने उन्हें पहले त्याग दिया था, उनके आश्रममें आकर विशेष आदर सम्मानके साथ उन्हें घर ले गये ॥४६ ॥
अतः हे राजन्! उन आदिशक्ति तथा जगत्की कारणस्वरूपा परादेवीकी सदा भक्तिपूर्वक सेवा तथा पूजा करनी चाहिये ॥ ४७ ॥
हे महाराज! आप मेरे द्वारा पहले ही बताये गये सर्वकामप्रदायक अम्बामखका अनुष्ठान वैदिक विधिके अनुसार नित्य नियमपूर्वक कीजिये ॥ ४८ ॥
पृष्ठ 307
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२ ९ ८ स्मृता सम्पूजिता भक्त्या ध्याता चोच्चारिता स्तुता ददाति वाञ्छितानर्थान्कामदा तेन कीर्त्यते अनुमानमिदं राजन् कर्तव्यं सर्वथा बुधैः दृष्ट्वा रोगयुतान्दीनान्क्षुधितान्निर्धनाञ्छठान् जनानार्तांस्तथा मूर्खान्पीडितान्वैरिभिः सदा दासानाज्ञाकरान्क्षुद्रान्विकलान्विह्वलानथ अतृप्तान्भोजने भोगे सदार्तानजितेन्द्रियान् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ । वे भगवती स्मरण करने, पूजा करने, श्रद्धापूर्वक ॥ ४ ९ ध्यान करने, नामोच्चारण करने तथा स्तुति करनेसे [ परम प्रसन्न होकर ] सभी इच्छित मनोरथोंको पूर्ण । कर देती हैं । इसीलिये वे ' कामदा ' कही जाती ॥ ५० हैं ॥ ४ ९ ॥ हे राजन्! रुग्ण, दीन, क्षुधापीड़ित, धनहीन, । शठ, दुःखी, मूर्ख, शत्रुओंसे सदा प्रताड़ित, आज्ञाके ॥ ५१ अधीन रहनेवाले दास, क्षुद्र, विकल, अशान्त, भोजन तथा भोगसे अतृप्त, सदा कष्टमें रहनेवाले, अजितेन्द्रिय, । अधिक तृष्णायुक्त, शक्तिहीन तथा सदैव मानसिक रोगोंसे पीड़ित रहनेवाले प्राणियोंको देखकर बुद्धिमानोंको तृष्णाधिकानशक्तांश्च सदाधिपरिपीडितान् ॥ ५२ तथा विभवसम्पन्नान् पुत्रपौत्रविवर्धनान् पुष्टदेहांश्च सम्भोगैः संयुतान्वेदवादिनः राजलक्ष्म्या युताञ्छूरान्वशीकृतजनानथ स्वजनैरवियुक्तांश्च सर्वलक्षणलक्षितान् व्यतिरेकान्वयाभ्यां च विचेतव्यं विचक्षणैः एभिर्न पूजिता देवी सर्वार्थफलदा शिवा समाराधिता च तथा नृभिरेभिः सदाम्बिका यतोऽमी सुखिनः सर्वे संसारेऽस्मिन्न संशयः व्यास उवाच इति राजञ्छूतं तत्र मया मुनिसमागमे लोमशस्य मुखात्कामं देवीमाहात्म्यमुत्तमम्
इति सञ्चिन्त्य राजेन्द्र कर्तव्यं च सदार्चनम् ।
भक्त्या परमया देव्याः प्रीत्या च पुरुषर्षभ ॥
यह अनुमान कर लेना चाहिये कि इन लोगोंने भगवतीक सम्यक् उपासना नहीं की है । इसी प्रकार । वैभवयुक्त, पुत्र - पौत्रादिसे सम्पन्न, हृष्ट - पुष्ट शरीरवाले, ॥ ५३ भोगयुक्त, वेदवादी, राजलक्ष्मीसे सम्पन्न, पराक्रमी, लोगोंको अपने वशमें रखनेवाले, स्वजनोंके साथ । आनन्दपूर्वक रहनेवाले और समस्त उत्तम लक्षणोंसे ॥ ५४ युक्त लोगोंको देखकर यह अनुमान कर लेना चाहिये कि इन लोगोंने भगवतीकी उपासना की है । इस प्रकार । पण्डितजनोंको व्यतिरेक - अन्वयके क्रमसे यह जान ॥ ५५ लेना चाहिये कि उपर्युक्त [ दीन आदि ] लोगोंने सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली शिवाकी पूजा नहीं की है । तथा उपर्युक्त [ विभवयुक्त ] लोगोंने भगवती अम्बाकी ॥ ५६ सर्वदा विधिपूर्वक आराधना की है, जिससे ये सभी लोग इस संसारमें सुखी हैं । इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है ॥ ५०-५६ ॥ । व्यासजी बोले- हे राजन्! मैंने नैमिषारण्यतीर्थमें मुनियोंके समाजमें लोमशऋषिके मुखसे भगवतीका ॥ ५७ यह अत्युत्तम माहात्म्य सुना ॥५७ ॥
हे राजेन्द्र! हे पुरुषश्रेष्ठ! इसपर सम्यक् विचार करके परम भक्तिके साथ प्रेमपूर्वक भगवतीकी सदा ५८ । अर्चना करनी चाहिये ॥५८ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सत्यव्रताख्यानवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
पृष्ठ 308
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १२ ] तृतीय स्कन्ध २ ९९ अथ द्वादशोऽध्यायः सात्त्विक, राजस और तामस यज्ञोंका वर्णन; मानसयज्ञकी महिमा और व्यासजीद्वारा राजा जनमेजयको राजोवाच
वद यज्ञविधिं सम्यग्देव्यास्तस्याः समन्ततः ।
श्रुत्वा करोम्यहं स्वामिन् यथाशक्ति ह्यतन्द्रितः ॥ १
पूजाविधिं च मन्त्रांश्च होमद्रव्यमसंशयम् ।
ब्राह्मणाः कतिसंख्याश्च दक्षिणाश्च तथा पुनः ॥ २
व्यास उवाच
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्या यज्ञं विधानतः ।
त्रिविधं तु सदा ज्ञेयं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ३
सात्त्विकं राजसं चैव तामसं च तथापरम् ।
मुनीनां सात्त्विकं प्रोक्तं नृपाणां राजसं स्मृतम् ॥ ४
तामसं राक्षसानां वै ज्ञानिनां तु गुणोज्झितम् ।
विमुक्तानां ज्ञानमयं विस्तरात्प्रब्रवीमि ते ॥ ५
देशः कालस्तथा द्रव्यं मन्त्राश्च ब्राह्मणास्तथा ।
श्रद्धा च सात्त्विकी यत्र तं यज्ञं सात्त्विकं विदुः ॥ ६
द्रव्यशुद्धिः क्रियाशुद्धिर्मन्त्रशुद्धिश्च भूमिप ।
भवेद्यदि तदा पूर्णं फलं भवति नान्यथा ॥ ७
अन्यायोपार्जितेनैव द्रव्येण सुकृतं कृतम् ।
न कीर्तिरिह लोके च परलोके न तत्फलम् ॥ ८
तस्मान्न्यायार्जितेनैव कर्तव्यं सुकृतं सदा ।
यशसे परलोकाय भवत्येव सुखाय च ॥ ९
प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र पाण्डवैस्तु मखः कृतः ।
राजसूयः क्रतुवरः समाप्तवरदक्षिणः ॥ १०
देवी - यज्ञके लिये प्रेरित करना राजा बोले- हे स्वामिन्! अब आप उन देवीके यज्ञकी विधिका पूर्णरूपसे सम्यक् वर्णन कीजिये । उसे सुनकर मैं यथाशक्ति प्रमादरहित होकर वह यज्ञ करूँगा ॥१ ॥
उस यज्ञकी पूजा - विधि, उसके मन्त्र, होमद्रव्य, उसमें कितने ब्राह्मण हों और दक्षिणा — इन सभी के बारेमें निःसंकोच बताइये ॥ २ ॥
व्यासजी बोले – हे राजन्! सुनिये, अब मैं आपसे देवीके यज्ञका विधानपूर्वक वर्णन करूँगा । अनुष्ठानमें विहित कर्मके अनुसार यह यज्ञ सात्त्विक, राजस तथा तामस भेदसे सदा तीन प्रकारका समझा जाना चाहिये । मुनियोंके लिये सात्त्विक यज्ञ, राजाओंके लिये राजस यज्ञ, राक्षसोंके लिये तामस यज्ञ, ज्ञानियों के लिये निर्गुण यज्ञ और वैराग्ययुक्त लोगोंके लिये ज्ञानमय यज्ञ कहा गया है; मैं आपसे विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ ॥ ३–५ ॥ जिस यज्ञमें देश, काल, द्रव्य, मन्त्र, ब्राह्मण तथा श्रद्धा- ये सब सात्त्विक हों; उसे सात्त्विक यज्ञ कहा गया है ॥६ ॥
हे भूपाल! यदि द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और मन्त्रशुद्धिके साथ यज्ञ सम्पन्न होता है, तब पूर्ण फलकी प्राप्ति अवश्य होती है; अन्यथा नहीं होती ॥७ ॥
अन्यायके द्वारा उपार्जित किये गये धनसे यदि पुण्य - कार्य किया जाता है तो इस लोकमें यशकी प्राप्ति नहीं होती और परलोकमें उसका कोई फल भी नहीं मिलता है, इसलिये न्यायपूर्वक उपार्जित धनसे ही सदा पुण्यकार्य करना चाहिये । ऐसा कार्य इस लोकमें कीर्ति तथा परलोकमें आनन्दके लिये होता है ॥ ८ - ९ ॥ हे राजेन्द्र! आपके सामने इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । पाण्डवोंने यज्ञोंमें उत्तम राजसूय यज्ञ किया था, | जिसकी समाप्तिपर उन्होंने श्रेष्ठ दक्षिणा भी दी थी,
पृष्ठ 309
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३०० यत्र साक्षाद्धरिः कृष्णो यादवेन्द्रो महामनाः ब्राह्मणाः पूर्णविद्याश्च भारद्वाजादयस्तथा कृत्वा यज्ञं सुसम्पूर्णं मासमात्रेण पाण्डवैः प्राप्तं महत्तरं कष्टं वनवासश्च दारुणः पीडनञ्चैव पाञ्चाल्यास्तथा द्यूते पराजयः । वनवासो महत्कष्टं क्व गतं मखजं फलम्
दासत्वञ्च विराटस्य कृतं सर्वैर्महात्मभिः ।
कीचकेन परिक्लिष्टा द्रौपदी च प्रमद्वरा ॥
आशीर्वादा द्विजातीनां क्व गताः शुद्धचेतसाम् ।
भक्तिर्वा वासुदेवस्य क्व गता तत्र सङ्कटे ॥
न रक्षिता तदा बाला केनापि द्रुपदात्मजा ।
प्राप्तकेशग्रहा काले साध्वी च वरवर्णिनी ॥
किमत्र चिन्तनीयं वै धर्मवैगुण्यकारणम् ।
केशवे सति देवेशे धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे ॥
भवितव्यमिति प्रोक्ते निष्फलः स्यात्तदागमः ।
वेदमन्त्रास्तथान्ये च वितथाः स्युरसंशयम् ॥
साधनं निष्फलं सर्वमुपायश्च निरर्थकः ।
भवितव्यं भवत्येव वचने प्रतिपादके ॥
आगमोऽप्यर्थवादः स्यात्क्रियाः सर्वा निरर्थकाः ।
स्वर्गार्थञ्च तपो व्यर्थं वर्णधर्मश्च वै तथा ॥
सर्वं प्रमाणं व्यर्थं स्याद्भवितव्ये कृते हृदि ।
उभयञ्चापि मन्तव्यं दैवं चोपाय एव च ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ । जिसमें महामनस्वी यादवेन्द्र साक्षात् भगवान् कृष्ण ॥ ११ विद्यमान थे और भारद्वाज आदि पूर्णतः विद्यानिष्ठ ब्राह्मणोंने जिस यज्ञका सम्पादन किया था, उस । यज्ञको विधिवत् सम्पन्न करनेके पश्चात् एक मासके भीतर ही पाण्डवोंको महान् कष्ट प्राप्त हुआ तथा ॥ १२ कठोर वनवास भोगना पड़ा॥१०–१२ ॥ द्रौपदीका अपमान हुआ, युधिष्ठिरकी जुएमें पराजय हुई, पाण्डवोंको वनवास हुआ और उन्हें ॥ १३ तरह - तरहका घोर कष्ट मिला, तब यज्ञसे होनेवाला फल कहाँ चला गया? ॥१३ ॥
महामनस्वी पाण्डवोंको राजा विराटकी दासता १४ करनी पड़ी और नारियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदीको कीचकने प्रताड़ित किया । उस संकटकालमें विशुद्ध हृदयवाले ब्राह्मणोंके आशीर्वाद कहाँ चले गये थे और कृष्णकी १५ भक्ति कहाँ चली गयी थी? ॥ १४-१५ ॥ जिस समय परम सुन्दरी पतिव्रता द्रौपदीको बाल पकड़कर घसीटा जा रहा था, उस समय उस बेचारीकी रक्षा किसीने भी नहीं की ॥ १६ ॥
१६ जिस यज्ञमें देवाधीश भगवान् श्रीकृष्ण रहे हों और जिस यज्ञके कर्ता धर्मराज युधिष्ठिर हों, उस यज्ञका विपरीत फल मिलनेका कारण अवश्य ही १७ धर्मानुष्ठानमें कोई कमी रही होगी - ऐसा समझना चाहिये ॥ १७ ॥
यदि कहा जाय कि प्रारब्ध ही ऐसा था तो १८ सभी शास्त्र निष्फल हो जायँगे और वेद - मन्त्र तथा अन्य धर्मग्रन्थ निरर्थक सिद्ध होंगे; इसमें संशय नहीं है । प्रारब्ध तो अवश्यम्भावी है, इस १ ९ कथनको यदि स्वीकार कर लिया जाय तो सभी साधन निष्फल और सभी उपाय व्यर्थ हो जायँगे; सभी वेद - शास्त्र अर्थवादके रूपमें परिणत हो जायँगे, सभी क्रियाएँ निरर्थक हो जायँगी और स्वर्ग-२० प्राप्तिके लिये तप तथा वर्ण - धर्म सब व्यर्थ हो जायँगे । केवल प्रारब्धको ही हृदयमें धारण करनेसे सभी प्रमाण व्यर्थ हो जायँगे । अतएव भाग्य तथा २१ । उपाय दोनोंको मानना चाहिये ॥ १८ - २१ ॥
पृष्ठ 310
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १२ ]
कृते कर्मणि चेत्सिद्धिर्विपरीता यदा भवेत् ।
वैगुण्यं कल्पनीयं स्यात्प्राज्ञैः पण्डितमौलिभिः ॥
तत्कर्म बहुधा प्रोक्तं विद्वद्भिः कर्मकारिभिः ।
कर्तृभेदान्मन्त्रभेदाद् द्रव्यभेदात्तथा पुनः ॥
यथा मघवता पूर्वं विश्वरूपो वृतो गुरुः ।
विपरीतं कृतं तेन कर्म मातृहिताय वै ॥
देवेभ्यो दानवेभ्यस्तु स्वस्तीत्युक्त्वा पुनः पुनः असुरा मातृपक्षीयाः कृतं तेषाञ्च रक्षणम् ॥
दैत्यान् दृष्ट्वातिसम्पुष्टांश्चुकोप मघवा तदा ।
शिरांसि तस्य वज्रेण चिच्छेद तरसा हरिः ॥
क्रियावैगुण्यमत्रैव कर्तृभेदादसंशयम् ।
नोचेत्पञ्चालराजेन रोषेणापि कृता क्रिया ॥
भारद्वाजविनाशाय पुत्रस्योत्पादनाय च ।
धृष्टद्युम्नः समुत्पन्नो वेदिमध्याच्च द्रौपदी ॥
पुरा दशरथेनापि पुत्रेष्टिस्तु कृता यदा ।
अपुत्रस्य सुतास्तस्य चत्वारः सम्प्रजज्ञिरे ॥
अतः क्रिया कृता युक्त्या सिद्धिदा सर्वथा भवेत् । अयुक्त्या विपरीता स्यात्सर्वथा नृपसत्तम पाण्डवानां यथा यज्ञे किञ्चिद्वैगुण्ययोगतः । विपरीतं फलं प्राप्तं निर्जितास्ते दुरोदरे सत्यवादी तथा राजन् धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः द्रौपदी च तथा साध्वी तथान्येऽप्यनुजाः शुभाः कुद्रव्ययोगाद्वैगुण्यं समुत्पन्नं मखेऽथवा । साभिमानैः कृताद्वापि दूषणं समुपस्थितम् तृतीय स्कन्ध ३०१ कर्म करनेपर भी यदि विपरीत परिणाम प्राप्त २२ होता है तो पण्डितशिरोमणि विद्वानोंको सोचना चाहिये कि कार्य करनेमें कोई कमी अवश्य रह गयी थी ॥२२ ॥
कर्मशील विद्वानोंने कर्तृभेद, मन्त्रभेद तथा २३ द्रव्यभेदसे उस कर्मको अनेक प्रकारवाला बताया है ॥ २३ ॥
पूर्वकालमें इन्द्रने यज्ञमें आचार्यके रूपमें विश्वरूपका २४ वरण किया था । उस विश्वरूपने अपने मातृपक्ष दानवोंके हितार्थ विपरीत कार्य किया । देवताओं तथा दानवों दोनोंका कल्याण हो - ऐसा बार - बार कहकर २५ उसने मातृपक्षके जो असुर थे, उनकी भी रक्षा की । तदनन्तर दानवोंको अत्यन्त हृष्ट - पुष्ट देखकर इन्द्र कुपित हो उठे और उन्होंने वज्रसे तत्काल उस २६ विश्वरूपके सिर काट दिये ॥ २४-२६ ॥ इससे यह निस्सन्देह सिद्ध हो जाता है कि कर्ताके भेदसे विपरीत फल हो जाता है । यदि इसे न २७ मानें तो ठीक नहीं; क्योंकि पञ्चालनरेश द्रुपदने रोषपूर्वक द्रोणाचार्य नाशके निमित्त एक पुत्र उत्पन्न होनेके लिये यज्ञ किया था । [ इसके परिणामस्वरूप ] २८ यज्ञवेदीके मध्यभागसे धृष्टद्युम्न तथा द्रौपदी—
ये दोनों उत्पन्न हुए । २७-२८ ॥
पूर्वकालमें जब महाराज दशरथने पुत्रेष्टि यज्ञ २ ९ किया तो उन पुत्रहीन राजा दशरथके भी चार पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २ ९ ॥। अतः हे नृपश्रेष्ठ! युक्तिपूर्वक किया गया कोई भी कार्य हर प्रकारसे सिद्धि प्रदान करनेवाला होता ॥ ३० है और युक्तिपूर्वक न किया गया कार्य सर्वथा विपरीत फल प्रदान करनेवाला होता है ॥ ३० ॥
जैसे पाण्डवों के यज्ञमें किसी दोषके कारण ही ॥ ३१ उन्हें विपरीत फल मिला और जुएमें वे हार गये । हे राजन्! युधिष्ठिर सत्यवादी तथा धर्मपुत्र थे, द्रौपदी भी । एक पतिव्रता स्त्री थी एवं युधिष्ठिरके अन्य छोटे भाई ॥ ३२ भी पुण्यात्मा थे, किंतु अन्यायोपार्जित द्रव्योंके प्रयोगके कारण उस यज्ञमें वैगुण्य उत्पन्न हुआ अथवा उन्होंने अभिमानपूर्वक यज्ञ किया था, जिससे दोष उत्पन्न ॥ ३३ | हुआ ॥ ३१–३३ ॥