देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 311–320

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320

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३०२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १०

सात्त्विकस्तु महाराज दुर्लभो वै मखः स्मृतः ।

वैखानसमुनीनां हि विहितोऽसौ महामखः ॥ ३४

सात्त्विकं भोजनं ये वै नित्यं कुर्वन्ति तापसाः ।

न्यायार्जितञ्च वन्यञ्च तथा ऋष्यं सुसंस्कृतम् ॥ ३५

पुरोडाशपरा नित्यं वियूपा मन्त्रपूर्वकाः ।

श्रद्धाधिका मखा राजन् सात्त्विकाः परमाः स्मृताः ॥ ३६

राजसा द्रव्यबहुलाः सयूपाश्च सुसंस्कृताः ।

क्षत्रियाणां विशाञ्चैव साभिमानाश्च वै मखाः ॥ ३७

तामसा दानवानां वै सक्रोधा मदवर्धकाः ।

सामर्षाः संस्कृताः क्रूरा मखाः प्रोक्ता महात्मभिः ॥ ३८

मुनीनां मोक्षकामानां विरक्तानां महात्मनाम् ।

मानसस्तु स्मृतो यागः सर्वसाधनसंयुतः ॥३

॥ ९

अन्येषु सर्वयज्ञेषु किञ्चिन्यूनं भवेदपि ।

द्रव्येण श्रद्धया वापि क्रियया ब्राह्मणैस्तथा ॥ ४०

देशकालपृथग्द्रव्यसाधनैः सकलैस्तथा ।

नान्यो भवति पूर्णो वै तथा भवति मानसः ॥ ४१

प्रथमं तु मनः शोध्यं कर्तव्यं गुणवर्जितम् ।

शुद्धे मनसि देहो वै शुद्ध एव न संशयः ॥ ४२

इन्द्रियार्थपरित्यक्तं यदा जातं मनः शुचि ।

तदा तस्य मखस्यासौ प्रभवेदधिकारवान् ॥ ४३

तदासौ मण्डपं कृत्वा बहुयोजनविस्तृतम् ।

स्तम्भैश्च विपुलैः श्लक्ष्णैर्यज्ञियद्रुमसम्भवैः ॥ ४४ ।

हे महाराज! सात्त्विक यज्ञ तो अत्यन्त दुर्लभ माना गया है । वह महायज्ञ केवल वानप्रस्थ मुनियोंके लिये ही विहित है ॥ ३४ ॥

हे राजन्! तपमें तत्पर जो लोग नित्य न्यायपूर्वक अर्जित किये गये द्रव्य - पदार्थ, वन्य फल - मूल् तथा ऋषियोंका सुसंस्कृत सात्त्विक आहार ग्रहण करते हैं - ऐसे तपस्वियोंद्वारा नित्य अतिश्रद्धाके साथ पुरोडाशसे सम्पादित किये जानेवाले समन्त्रक तथा यूपविहीन यज्ञ परम सात्त्विक यज्ञ कहे गये हैं ॥ ३५-३६ ॥ जिस यज्ञमें अधिक धन व्यय किया जाता है. जिसमें पशु - बलिके लिये सुन्दर यूप गाड़े जाते हैं तथा जो अभिमानके साथ किये जाते हैं - क्षत्रियों तथा वैश्योंद्वारा सम्पादित किये जानेवाले वे यज्ञ राजस यज्ञ कहे गये हैं ॥ ३७ ॥

महात्माओंने दानवोंद्वारा किये जानेवाले यज्ञोंको तामस यज्ञ कहा है । ऐसे यज्ञ क्रोधभावनाके साथ किये जाते हैं, अहंकारको बढ़ानेवाले होते हैं. ईर्ष्यापूर्वक किये जाते हैं और बड़ी साज - सज्जा तथा क्रूरताके साथ सम्पन्न किये जाते हैं ॥ ३८ ॥

मोक्षकी कामना करनेवाले विरक्त मुनि - महात्माओंके लिये सर्वसाधनसम्पन्न मानस - यज्ञ बताया गया है ॥ ३ ९ ॥ अन्य सभी यज्ञोंमें कुछ कमी हो भी सकती है: क्योंकि वे द्रव्य, श्रद्धा, कर्म, ब्राह्मण, देश, काल तथा अन्य द्रव्यसाधनोंसे सम्पन्न किये जाते हैं । अतः अन्य यज्ञ वैसा पूर्ण नहीं होता, जैसा मानस - यज्ञ सदैव पूर्ण हो जाता है ॥ ४०-४१ ॥ [ इस यज्ञके लिये ] सर्वप्रथम मनको परिशुद्ध तथा गुणसे रहित बनाना चाहिये । मनके शुद्ध हो जानेपर शरीरकी शुद्धि स्वतः हो जाती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४२ ॥

जब मनुष्यका मन इन्द्रियोंके विषयोंका परित्याग करके पवित्र हो जाता है, तभी वह उस मानस-यज्ञको करनेका अधिकारी होता है ॥ ४३ ॥

तत्पश्चात् वह अपने मनमें पवित्र यज्ञीय वृक्षोंसे निर्मित, अनेक सुन्दर - सुन्दर स्तम्भोंसे अलंकृत तथा अनेक योजन विस्तारवाले यज्ञमण्डपकी रचना करके

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अ ० १२ ] तृतीय स्कन्ध ३०३

वेदीं च विशदां तत्र मनसा परिकल्पयेत् ।

अग्नयोऽपि तथा स्थाप्या विधिवन्मनसा किल ॥

ब्राह्मणानाञ्च वरणं तथैव प्रतिपाद्य च ।

ब्रह्माध्वर्युस्तथा होता प्रस्तोता विधिपूर्वकम् ॥

उद्गाता प्रतिहर्ता च सभ्याश्चान्ये यथाविधि ।

पूजनीया प्रयत्नेन मनसैव द्विजोत्तमाः ॥

प्राणोऽपानस्तथा व्यानः समानोदान एव च ।

पावकाः पञ्च एवैते स्थाप्या वेद्यां विधानतः ॥

गार्हपत्यस्तदा प्राणोऽपानश्चाहवनीयकः ।

दक्षिणाग्निस्तथा व्यानः समानश्चावसथ्यकः ॥

सभ्योदानः स्मृता ह्येते पावकाः परमोत्कटाः ।

द्रव्यं च मनसा भाव्यं निर्गुणं परमं शुचि ॥

मन एव तदा होता यजमानस्तथैव तत् ।

यज्ञाधिदेवता ब्रह्म निर्गुणं च सनातनम् ॥

फलदा निर्गुणा शक्तिः सदा निर्वेददा शिवा ।

ब्रह्मविद्याखिलाधारा व्याप्य सर्वत्र संस्थिता ॥

तदुद्देशेन तद् द्रव्यं हुनेत्प्राणाग्निषु द्विजः ।

पश्चाच्चित्तं निरालम्बं कृत्वा प्राणानपि प्रभो ॥

कुण्डलीमुखमार्गेण हुनेद् ब्रह्मणि शाश्वते ।

स्वानुभूत्या स्वयं साक्षात्स्वात्मभूतां महेश्वरीम् ॥

समाधिनैव योगेन ध्यायेच्चेतस्यनाकुलः ।

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ॥

उसमें मन - ही - मन एक विशाल यज्ञवेदीकी कल्पना ४५ करे और उसपर मानसिक अग्निकी विधिपूर्वक स्थापना करे ॥ ४४-४५ ॥ उसी प्रकार [ मनमें ] ब्राह्मणोंका वरण करके ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता, प्रस्तोता, उद्गाता, प्रतिहर्ता तथा अन्य ४६ सभासदोंको नियुक्त करके यथोचित रूपसे प्रयत्नपूर्वक मनसे उनकी पूजा करनी चाहिये ॥ ४६-४७ ॥ प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान — इन ४७ पाँचों अग्नियोंको यज्ञवेदीपर विधानपूर्वक स्थापित करना चाहिये ॥ ४८ ॥

उनमें प्राणको गार्हपत्य अग्नि, अपानको आहवनीय अग्नि, व्यानको दक्षिणाग्नि, समानको आवसथ्य ४८ अग्नि तथा उदानको सभ्य अग्नि कहा गया है । ये पाँचों परम तेजस्वी हैं । इस यज्ञमें मानसिक रूपसे ही दोषरहित तथा परम पवित्र सामग्रियोंकी भी ४ ९ कल्पना करनी चाहिये ॥ ४ ९ -५० ॥ इस यज्ञमें होता तथा यजमान दोनोंके रूपमें मन ही होता है । निर्गुण तथा अविनाशी ब्रह्म इस यज्ञमें अधिदेवता होते हैं ॥ ५१ ॥

५० निर्गुणा पराशक्ति सभी फलोंको प्रदान करनेवाली हैं । उन वैराग्यदायिनी, कल्याणकारिणी, ब्रह्मविद्या, समस्त जगत्की आधारस्वरूपा तथा जगत्‌को ५१ व्याप्त करके सर्वत्र विराजमान रहनेवाली आदिशक्ति-स्वरूपा भगवतीको प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे द्विजको मन: कल्पित हवन - सामग्रियोंकी आहुति अपने प्राणरूपी अग्निमें देनी चाहिये ॥ ५२ 11 ५२ हे प्रभो! मानस हवनके पश्चात् अपने मनको आलम्बनरहित करके कुण्डलिनीके मुखमार्गसे अर्थात् सुषुम्ना रन्ध्रद्वारा शाश्वत ब्रह्ममें अपने प्राणोंकी भी ५३ आहुति दे देनी चाहिये ॥ ५३३ ॥

अपनी अनुभूतिसे स्वयंका साक्षात्कार करके तथा महेश्वरीको अपनी आत्मस्वरूपा जानकर समाधियोगसे शान्तचित्त होकर ध्यान करना ५४ चाहिये ॥५४३ ॥

इस प्रकार जब वह साधक सभी प्राणियोंमें अपने - आपको तथा अपनेमें सभी प्राणियोंको देखने ५५ | लगता है, तब वह भूतात्मा उन कल्याणस्वरूपा

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३०४ यदा पश्यति भूतात्मा तदा पश्यति तां शिवाम् । दृष्ट्वा तां ब्रह्मविद्भूयात्सच्चिदानन्दरूपिणीम् तदा मायादिकं सर्वं दग्धं भवति भूमिप प्रारब्धं कर्ममात्रं तु यावद्देहं च तिष्ठति

जीवन्मुक्तस्तदा जातो मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।

कृतकृत्यो भवेत्तात यो भजेज्जगदम्बिकाम् ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ध्येया श्रीभुवनेश्वरी । श्रोतव्या चैव मन्तव्या गुरुवाक्यानुसारतः

राजन्नेवं कृतो यज्ञो मोक्षदो नात्र संशयः ।

अन्ये यज्ञाः सकामास्तु प्रभवन्ति क्षयोन्मुखाः ॥

अग्निष्टोमेन विधिवत्स्वर्गकामो यजेदिति ।

वेदानुशासनं चैतत्प्रवदन्ति मनीषिणः ॥

क्षीणे पुण्ये मृत्युलोकं विशन्ति च यथामति ।

तस्मात्तु मानसः श्रेष्ठो यज्ञोऽप्यक्षय एव सः ॥

न राज्ञा साधितुं योग्यो मखोऽसौ जयमिच्छता ।

तामसस्तु कृतः पूर्वं सर्पयज्ञस्त्वयाधुना ॥

वैरं निर्वाहितं राजंस्तक्षकस्य दुरात्मनः ।

यत्कृते निहताः सर्पास्त्वयाग्नौ कोटिशः परे ॥

देवीयज्ञं कुरुष्वाद्य विततं विधिपूर्वकम् ।

विष्णुना यः कृतः पूर्वं सृष्ट्यादौ नृपसत्तम ॥

तथा त्वं कुरु राजेन्द्र विधिं ते प्रब्रवीम्यहम् ।

ब्राह्मणाः सन्ति राजेन्द्र विधिज्ञा वेदवित्तमाः ॥

देवीबीजविधानज्ञा मन्त्रमार्गविचक्षणाः ।

याजकास्ते भविष्यन्ति यजमानस्त्वमेव हि ॥

कृत्वा यज्ञं विधानेन दत्त्वा पुण्यं मखार्जितम् ।

समुद्धर महाराज पितरं दुर्गतिङ्गतम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ भगवतीका दर्शन प्राप्त कर लेता है और उन ॥ ५६ सच्चिदानन्दस्वरूपिणीका दर्शन करके ब्रह्मज्ञानी हो जाता है T । हे भूपाल! तब उसका सब मायाजनित । प्रपंच जलकर भस्म हो जाता है और केवल ॥ ५७ प्रारब्धकर्मका भोग करनेके लिये ही शरीर रहता है ॥ ५५-५७ ॥ हे तात! तब वह जीवन्मुक्त हो जाता है और ५८ मृत्युके उपरान्त मोक्ष प्राप्त करता है । जो भगवतीको भजता है, वह सब प्रकारसे कृतकृत्य हो जाता है । इसलिये गुरुके वचनोंके अनुसार सम्पूर्ण प्रयत्नके साथ ॥ ५ ९ श्रीभुवनेश्वरी भगवतीका ध्यान, उनके चरित्रका श्रवण तथा मनन करना चाहिये ॥ ५८-५९ ॥ हे राजन्! इस प्रकार किया हुआ यज्ञ मोक्षप्रद ६० होता है; इसमें सन्देह नहीं । इसके अतिरिक्त अन्य सकाम यज्ञ विनाशोन्मुख होते हैं ॥ ६० ॥

मनीषी विद्वान् यह वेदानुशासन बताते हैं कि ६१ स्वर्गकी इच्छावालेको विधिपूर्वक अग्निष्टोम यज्ञ करना चाहिये । मेरी समझसे पुण्य क्षीण होनेपर पुनः उन्हें मृत्युलोकमें आना ही पड़ता है, अतः अक्षय ६२ फलवाला वह मानस - यज्ञ ही श्रेष्ठ है॥६१-६२ ॥ विजयकी इच्छा रखनेवाला राजा इस मानस-यज्ञको सम्पन्न नहीं कर सकता । हे राजन्! अभी ६३ कुछ ही समय पूर्व आपने तामस सर्पयज्ञ किया था, जिसमें आपने दुरात्मा तक्षकसे वैरका बदला चुकाया था और उसमें आपने करोड़ों सर्पोंको अग्निमें ६४ जलाकर मार डाला था॥६३-६४ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! अब आप विधिपूर्वक विस्तृत देवीयज्ञ कीजिये, जिसे पूर्वकालमें सृष्टिके आरम्भमें ६५ भगवान् विष्णुने किया था ॥६५ ॥

हे राजेन्द्र! मैं आपको उसकी विधि बता रहा हूँ, आप वैसा कीजिये । हे राजेन्द्र! आपके यहाँ ६६ वेदोंके पूर्ण ज्ञाता, विधिको जाननेवाले, देवीके बीजमन्त्र विधानके जानकार तथा मन्त्रमार्गके विद्वान् अनेक ब्राह्मण हैं, वे ही उस यज्ञमें आपके याजक ६७ होंगे और आप यजमान बनेंगे ॥ ६६-६७ ॥ हे महाराज! इस प्रकार आप विधिवत् देवीयज्ञ करके उस यज्ञसे मिले हुए पुण्यको अर्पित करके ६८ । अपने दुर्गतिप्राप्त पिताका उद्धार कीजिये ॥६८ ॥

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अ ० १२ ] तृतीय

विप्रावमानजं पापं दुर्घटं नरकप्रदम् ।

तथैव शापजो दोषः प्राप्तः पित्रा तवानघ ॥ ६ ९

तथा दुर्मरणं प्राप्तं सर्पदंशेन भूभुजा ।

अन्तराले तथा मृत्युर्न भूमौ कुशसंस्तरे ॥ ७०

न सङ्ग्रामे न गङ्गायां स्नानदानादिवर्जितम् ।

मरणं ते पितुस्तत्र सौधे जातं कुरूद्वह ॥ ७१

कृपणानि च सर्वाणि नरकस्य नृपोत्तम ।

तत्रैकं कारणं तस्य न जातं चातिदुर्लभम् ॥ ७२

यत्र यत्र स्थितः प्राणी ज्ञात्वा कालं समागतम् ।

साधनानामभावेऽपि ह्यवशश्चातिसङ्कटे ॥ ७३

यदा निर्वेदमायाति मनसा निर्मलेन वै ।

पञ्चभूतात्मको देहो मम किञ्चात्र दुःखदम् ॥ ७४

पतत्वद्य यथाकामं मुक्तोऽहं निर्गुणोऽव्ययः ।

नाशात्मकानि तत्त्वानि तत्र का परिदेवना ॥ ७५

ब्रह्मैवाहं न संसारी सदा मुक्तः सनातनः ।

देहेन मम सम्बन्धः कर्मणा प्रतिपादितः ॥ ७६

तानि सर्वाणि मुक्तानि शुभानि चेतराणि च ।

मनुष्यदेहयोगेन सुखदुःखानुसाधनात् ॥ ७७

विमुक्तोऽतिभयाद् घोरादस्मात्संसारसङ्कटात् ।

इत्येवं चिन्त्यमानस्तु स्नानदानविवर्जितः ॥ ७८

मरणं चेदवाप्नोति स मुच्येज्जन्मदुःखतः ।

एषा काष्ठा परा प्रोक्ता योगिनामपि दुर्लभा ॥ ७ ९

पिता ते नृपशार्दूल श्रुत्वा शापं द्विजोदितम् ।

देहे ममत्वं कृतवान्न निर्वेदमवाप्तवान् ॥ ८०

स्कन्ध ३०५ ब्राह्मणके अपमानसे होनेवाला पाप बड़ा भयंकर और नरकदायक होता है । हे अनघ! आपके पिता वैसे ही शापजनित दोषसे ग्रस्त हो चुके हैं; साथ ही साँपके काटनेसे महाराजकी अकालमृत्यु हुई है और भूमिपर बिछे कुशासनपर नहीं अपितु आकाशमें उनका मरण हुआ है, उनकी मृत्यु न रणस्थलमें हुई है और न गंगातटपर ही अपितु हे कुरुश्रेष्ठ! आपके पिता बिना स्नान - दान आदि किये ही महलमें मर | गये ॥ ६ ९ –७१ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! ये सब कुत्सित साधन नरकके हेतु हैं । राजाके लिये नरकसे बचनेका एक उपाय था; किंतु वह अत्यन्त दुर्लभ उपाय भी उनसे न बन सका ॥ ७२ ॥

जहाँ कहीं भी प्राणी स्थित रहे, कालको समीप आया जानकर साधनोंके अभावमें भी अत्यन्त कष्टके कारण विवश हुआ वह जब हृदयमें वैराग्य- भाव आ जाय, तब निर्मल मनसे यह सोचने लगे कि यह शरीर तो पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु – इन पंचभूतोंसे निर्मित है, तब फिर यह मेरे लिये क्या दुःखदायी हो सकता है! ॥७३-७४ ॥ यह देह अभी नष्ट हो जाय; मैं तो मुक्त, निर्गुण तथा अविनाशी हूँ । ये पंचतत्त्व तो विनाशशील हैं, तब इनके लिये मुझे चिन्ता ही क्या! मैं तो सदा मुक्त और सनातन ब्रह्म हूँ; संसारी जीव नहीं हूँ । इस देहसे मेरा सम्बन्ध केवल कर्मभोगके कारण ही है 1 शरीरद्वारा किये गये उन सभी शुभाशुभ कर्मोंका मेरा बन्धन तो छूट चुका है; क्योंकि मनुष्यशरीरसे मैंने दुःख तथा सुख भोग लिया है और इस अत्यन्त भयानक, घोर तथा भीषण सांसारिक कष्टसे मैं सर्वथा विमुक्त हूँ, इस प्रकारका चिन्तन करता हुआ पुरुष यदि स्नान - दानरहित भी मृत्यु प्राप्त करता है तो भी वह पुनः जन्म लेनेके दुःखसे छूट जाता है । यह सर्वोत्कृष्ट साधन कहा गया है, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है॥७५–७९ ॥ हे नृपसत्तम! आपके पिताने ब्राह्मणके द्वारा दिये गये उस शापको सुनकर भी अपने शरीरके प्रति मोह रखा और वैराग्यका आश्रय नहीं लिया ॥ ८० ॥

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३०६ नीरोगो मम देहोऽयं राज्यं निहतकण्टकम् कथं जीवाम्यहं कामं मन्त्रज्ञानानयन्तु वै औषधं मणिमन्त्रं च यन्त्रं परमकं तथा आरोहणं तथा सौधे कृतवान्नृपतिस्तदा न स्नानं न कृतं दानं न देव्याः स्मरणं कृतम् न भूमौ शयनं चैव दैवं मत्वा परं तथा मग्नो मोहार्णवे घोरे मृतः सौधेऽहिना हतः कृत्वा पापं कलेर्योगात्तापसस्यावमानजम् अवश्यमेव नरकं एतैराचरणैर्भवेत् तस्मात्तं पितरं पापात्समुद्धर नृपोत्तम सूत उवाच इति श्रुत्वा वचस्तस्य व्यासस्यामिततेजसः साश्रुकण्ठोऽतिदुःखार्तो बभूव जनमेजयः धिगिदं जीवितं मेऽद्य पिता मे नरके स्थितः तत्करोमि यथैवाद्य स्वर्गं यात्युत्तरासुतः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ । उनकी यह प्रबल इच्छा थी कि मेरा यह ॥ ८१ शरीर सदा निरोग रहे, मैं निष्कंटक राज्य करता रहूँ और चिरकालतक कैसे जीता रहूँ, [ –इस भावनासे उन्होंने सचिवोंको आज्ञा दी कि सर्पविष । उतारनेका ] मन्त्र जाननेवालोंको बुलाओ ॥ ८१ ॥

॥ ८२ राजाने औषध, मणि, मन्त्र तथा उत्तमोत्तम यन्त्रोंका संग्रह किया और वे एक ऊँचे महलपर । आरूढ़ हो गये । उस समय उन्होंने न स्नान किया, ॥ ८३ न दान दिया और न भगवतीका स्मरण ही किया । दैवको प्रधान मानकर वे भूमिपर भी नहीं सोये ॥ ८२-८३ ॥ । कलिके प्रभावके कारण एक तपस्वीके प्रति ॥ ८४ अपमानजन्य पाप करके घोर मोहरूपी सागरमें डूबकर महलके ऊपर सर्पके डँसनेसे वे मर गये ॥ ऐसे आचरणोंसे अवश्य ही नरक होता है । इसलिये हे नृपश्रेष्ठ! अपने उन पिताका पापसे उद्धार ॥ ८५ कीजिये ॥ ८४-८५ ॥ सूतजी बोले - [ हे ऋषिगण! ] अमित तेजस्वी व्यासजीका यह वचन सुनकर महाराज जनमेजय । बड़े दुःखी हुए और अश्रुप्रवाहके कारण उनका कण्ठ ॥ ८६ रुँध गया । [ मनमें पश्चात्ताप करते हुए वे कहने लगे - ] आज मेरे इस जीवनको धिक्कार है जो कि मेरे पिता नरकमें पड़े हैं । इसलिये अब मैं ऐसा उपाय । करता हूँ, जिससे उत्तरातनय राजा परीक्षित् स्वर्ग चले ॥ ८७ | जायँ ॥ ८६-८७ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे अम्बायज्ञविधिवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः देवीकी आधारशक्तिसे पृथ्वीका अचल होना तथा उसपर सुमेरु आदि पर्वतोंकी रचना, ब्रह्माजीद्वारा मरीचि आदिकी मानसी सृष्टि करना, काश्यपी सृष्टिका वर्णन, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास और स्वर्ग आदिका निर्माण; भगवान् विष्णुद्वारा अम्बायज्ञ करना और प्रसन्न होकर भगवती आद्या-शक्तिद्वारा आकाशवाणीके माध्यमसे उन्हें वरदान देना राजोवाच राजा बोले- हे पितामह! जगत् के कारणस्वरूप हरिणा तु कथं यज्ञः कृतः पूर्वं पितामह । तथा परम शक्तिशाली भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें वह जगत्कारणरूपेण विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ १ यज्ञ कैसे किया? हे महामते! उस यज्ञमें कौन - कौन

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अ ० १३ ] के सहायास्तु तत्रासन्ब्राह्मणाः के महामते ऋत्विजो वेदतत्त्वज्ञास्तन्मे ब्रूहि परन्तप पश्चात्करोम्यहं यज्ञं विधिदृष्टेन कर्मणा श्रुत्वा विष्णुकृतं यागमम्बिकायाः समाहितः व्यास उवाच राजञ्छृणु महाभाग विस्तरं परमाद्भुतम् । यथा भगवता यज्ञः कृतश्च विधिपूर्वकः विसर्जिता यदा देव्या दत्त्वा शक्तीश्च तास्त्रयः काजेशाः पुरुषा जाता विमानवरमास्थिताः प्राप्ता महार्णवं घोरं त्रयस्ते विबुधोत्तमाः चक्रुः स्थानानि वासार्थं समुत्पाद्य धरां स्थिताः आधारशक्तिरचला मुक्ता देव्या स्वयं ततः तदाधारा स्थिता जाता धरा मेदः समन्विता मधुकैटभयोर्मेदः संयोगान्मेदिनी स्मृता धारणाच्च धरा प्रोक्ता पृथ्वी विस्तारयोगतः मही चापि महीयस्त्वाद्धृता सा शेषमस्तके गिरयश्च कृताः सर्वे धारणार्थं प्रविस्तराः लोहकीलं यथा काष्ठे तथा ते गिरयः कृताः महीधरा महाराज प्रोच्यन्ते विबुधैर्जनैः जातरूपमयो मेरुर्बहुयोजनविस्तरः कृतो मणिमयैः शृङ्गैः शोभितः परमाद्भुतः मरीचिर्नारदोऽत्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः दक्षो वसिष्ठ इत्येते ब्रह्मणः प्रथिताः सुताः मरीचेः कश्यपो जातो दक्षकन्यास्त्रयोदश ताभ्यो देवाश्च दैत्याश्च समुत्पन्ना ह्यनेकशः तृतीय स्कन्ध ३०७ । ब्राह्मण सहायक थे और कौन - कौन वेदतत्त्वज्ञ विद्वान् ॥ २ ऋत्विज थे? हे परन्तप! यह सब आप मुझे बतायें । भगवान् विष्णुके द्वारा किये गये अम्बायज्ञको सुनकर । बादमें मैं भी सावधान होकर उसी विहित कर्मके ॥ ३ अनुसार यज्ञ करूँगा ॥१-३ ॥ व्यासजी बोले — हे महाभाग! हे राजन्! भगवान् विष्णुने जिस तरह विधिपूर्वक देवीयज्ञ किया था, उस परम अद्भुत प्रसंगको आप विस्तारसे सुनें ॥ ४ ॥

उस समय जब आदिशक्तिने उन्हें विभिन्न ॥ ४ शक्तियाँ प्रदान करके विदा कर दिया, तब श्रेष्ठ विमानपर स्थित वे तीनों ब्रह्मा, विष्णु और महेश पुनः । पुरुषके रूपमें हो गये । [ वहाँसे चलकर ] वे तीनों ॥ श्रेष्ठ देवगण घोर महासागरमें पहुँच गये । वहाँ उन्होंने पृथ्वी उत्पन्न करके उसपर रहनेके लिये स्थान । बनाया और वहीं रहने लगे ॥ ५-६ ॥ ॥ ६ उसी समय देवीने अचल आधारशक्तिको मुक्त किया, जिसके आश्रयसे वह मेदयुक्त पृथ्वी । टिक गयी ॥७ ॥

॥ ७ मधु - कैटभके मेदका संयोग होनेके कारण पृथ्वीको ' मेदिनी ' कहा गया है । धारण करनेकी । शक्ति होनेके कारण उसे ' धरा ' तथा विस्तृत होनेके ॥ ८ कारण उसे ' पृथ्वी ' कहा गया है ॥ ८ ॥

यह पृथ्वी महनीय होनेके कारण ' मही ' कही । जाती है । यह शेषनागके मस्तकपर स्थित है । इसको यथास्थान स्थित रखनेके लिये सभी विशाल पर्वत रचे ॥ गये । जिस प्रकार काठमें लौह कीलें जड़ दी जाती । हैं, उसी प्रकार पृथ्वीको सुस्थिर रखनेके लिये विशाल पर्वत बनाये गये । इसी कारण विद्वान्लोग उन ॥ १० पर्वतोंको ' महीधर ' कहते हैं॥९ -१० ॥ परम अद्भुत सुमेरुपर्वत सोनेका बना हुआ है, । वह मणिमय चोटियोंसे सुशोभित है तथा अनेक ॥ ११ योजन विस्तारवाला है ॥११ ॥

[ उस समय सृष्टिका विकास इस प्रकार । हुआ— ] सर्वप्रथम ब्रह्माके विख्यात मानसिक पुत्र ॥ १२ मरीचि, नारद, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष और वसिष्ठ आदि हुए । तत्पश्चात् मरीचिके पुत्र कश्यप । हुए । दक्षप्रजापतिको तेरह कन्याएँ हुईं । उन्हीं कन्याओंसे ॥ १३ । अनेक देवता एवं दैत्य उत्पन्न हुए॥१२-१३ ॥

पृष्ठ 317

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३०८ ततस्तु काश्यपी सृष्टिः प्रवृत्ता चातिविस्तरा मनुष्यपशुसर्पादिजातिभेदैरनेकधा ब्रह्मणश्चार्धदेहात्तु मनुः स्वायम्भुवोऽभवत् शतरूपा तथा नारी सञ्जाता वामभागतः प्रियव्रतोत्तानपादौ सुतौ तस्या बभूवतुः तिस्रः कन्या वरारोहा ह्यभवन्नतिसुन्दराः एवं सृष्टिं समुत्पाद्य भगवान्कमलोद्भवः चकार ब्रह्मलोकञ्च मेरुशृङ्गे मनोहरम्

वैकुण्ठं भगवान्विष्णू रमारमणमुत्तमम् ।

क्रीडास्थानं सुरम्यञ्च सर्वलोकोपरिस्थितम् ॥

शिवोऽपि परमं स्थानं कैलासाख्यं चकार ह । समासाद्य भूतगणं विजहार यथारुचि

स्वर्गस्त्रिविष्टपो मेरुशिखरोपरि कल्पितः ।

तच्च स्थानं सुरेन्द्रस्य नानारत्नविराजितम् ॥

समुद्रमथनात्प्राप्तः पारिजातस्तरूत्तमः ।

चतुर्दन्तस्तथा नागः कामधेनुश्च कामदा ॥

उचैःश्रवास्तथाश्वो वै रम्भाद्यप्सरसस्तथा ।

इन्द्रेणोपात्तमखिलं जातं वै स्वर्गभूषणम् ॥

धन्वन्तरिश्चन्द्रमाश्च सागराच्च समुद्बभौ ।

स्वर्गस्थितौ विराजेते देवौ बहुगणैर्वृतौ ॥

एवं सृष्टिः समुत्पन्ना त्रिविधा नृपसत्तम ।

देवतिर्यङ्मनुष्यादिभेदैर्विविधकल्पिता ॥

अण्डजाः स्वेदजाश्चैव चोद्भिज्जाश्च जरायुजाः ।

चतुर्भेदैः समुत्पन्ना जीवाः कर्मयुताः किल ॥

एवं सृष्टिं समासाद्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।

विहारं स्वेषु स्थानेषु चक्रुः सर्वे यथेप्सितम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ । उसके बाद काश्यपी सृष्टि संसारमें फैल गयी । ॥ १४ उस सृष्टिमें मनुष्य, पशु और सर्प आदि योनिभेदोंसे अनेक जीव उत्पन्न हुए ॥१४ ॥

। ब्रह्माके दाहिने आधे शरीरसे स्वायम्भुव मनु ॥ १५ उत्पन्न हुए तथा बायें भागसे स्त्रीके रूपमें शतरूपा उत्पन्न हुईं ॥ १५ ॥

। उन्हीं शतरूपासे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक ॥ १६ दो पुत्र उत्पन्न हुए तथा तीन अत्यन्त सुन्दर और उत्तम गुणोंवाली पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं ॥ १६ ॥

। इस प्रकार सृष्टिरचना करके कमलसे उत्पन्न ॥ १७ भगवान् ब्रह्माजीने सुमेरुपर्वतके शिखरपर एक सुन्दर ब्रह्मलोक बनाया ॥ १७ ॥

भगवान् विष्णुने भी लक्ष्मीजीके विहार करनेयोग्य १८ वैकुण्ठलोक बनाया । वह अत्यन्त रमणीय तथा उत्तम क्रीडास्थान सभी लोकोंके ऊपर विराजमान है ॥ १८ ॥

शिवजीने भी कैलास नामक एक उत्तम स्थान ॥ १ ९ बना लिया, जिसमें वे भूतगणोंको साथ लेकर इच्छानुसार विहार करने लगे ॥ १ ९ ॥ सुमेरुपर्वतके एक शिखरपर देवलोक स्वर्गकी २० रचना हुई । वह इन्द्रलोक अनेक प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित तथा इन्द्रका निवास था ॥ २० ॥

समुद्रमन्थनसे सर्वोत्तम वृक्ष पारिजात, चार २१ दाँतोंवाला ऐरावत हाथी, कामना पूर्ण करनेवाली कामधेनु, उच्चैःश्रवा घोड़ा और रम्भा आदि २२ अनेक अप्सराएँ निकलीं । इन्द्रने स्वर्गको सुशोभित करनेवाले इन सबको अपने पास रख लिया । धन्वन्तरिवैद्य तथा चन्द्रमा भी समुद्रसे निकले; वे दोनों देव अनेक २३ गुणोंसे युक्त होकर स्वर्गमें रहते हुए शोभा पाने लगे ॥ २१–२३ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! इस तरह तीन प्रकारकी सृष्टि हुई । २४ देवता, पशु - पक्षी और मानव आदि अनेक भेदोंसे यह सृष्टि कल्पित है । अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज तथा जरायुज – इन चार भेदोंसे अनेक जीवोंकी सृष्टि हुई । २५ उन सभी जीवोंके साथ कर्मका बन्धन लगा हुआ है । इस प्रकार सृष्टि करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश — ये सब अपने - अपने लोकोंमें इच्छापूर्वक विहार करने २६ | लगे ॥ २४–२६ ॥

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अ ० १३ ]

एवं प्रवर्तिते सर्गे भगवान्प्रभुरच्युतः ।

महालक्ष्म्या समं तत्र चिक्रीड भुवने स्वके ॥

एकस्मिन्समये विष्णुर्वैकुण्ठे संस्थितः पुरा ।

सुधासिन्धुस्थितं द्वीपं सस्मार मणिमण्डितम् ॥

यत्र दृष्ट्वा महामायां मन्त्रश्चासादितः शुभः ।

स्मृत्वा तां परमां शक्तिं स्त्रीभावं गमितो यया ॥

यज्ञं कर्तुं मनश्चक्रे अम्बिकाया रमापतिः ।

उत्तीर्य भुवनात्तस्मात्समाहूय महेश्वरम् ॥

ब्रह्माणं वरुणं शक्रं कुबेरं पावकं यमम् ।

वसिष्ठं कश्यपं दक्षं वामदेवं बृहस्पतिम् ॥

सम्भारं कल्पयामास यज्ञार्थं चातिविस्तरम् ।

महाविभवसंयुक्तं सात्त्विकं च मनोहरम् ॥

मण्डपं विततं तत्र कारयामास शिल्पिभिः ।

ऋत्विजो वरयामास सप्तविंशतिसुव्रतान् ॥

चितिञ्च कारयामास वेदीश्चैव सुविस्तराः ।

प्रजेपुर्ब्राह्मणा मन्त्रान्देव्या बीजसमन्वितान् ॥

जुहुवुस्ते हविः कामं विधिवत्परिकल्पिते ।

कृते तु वितते होमे वागुवाचाशरीरिणी ॥

विष्णुं तदा समाभाष्य सुस्वरा मधुराक्षरा ।

विष्णो त्वं भव देवानां हरे श्रेष्ठतमः सदा ॥

मान्यश्च पूजनीयश्च समर्थश्च सुरेष्वपि ।

सर्वे त्वामर्चयिष्यन्ति ब्रह्माद्याश्च सवासवाः ॥

प्रभविष्यन्ति भो भक्त्या मानवा भुवि सर्वतः I वरदस्त्वं च सर्वेषां भविता मानवेषु वै ॥

कामदः सर्वदेवानां परमः परमेश्वरः ।

सर्वयज्ञेषु मुख्यस्त्वं पूज्यः सर्वैश्च याज्ञिकैः ॥

तृतीय स्कन्ध ३० ९ इस प्रकार सृष्टिके विस्तृत हो जानेपर अच्युत २७ भगवान् विष्णु अपने लोकमें लक्ष्मीके साथ विराजमान होकर आनन्द करने लगे ॥ २७ ॥

एक समयकी बात है — भगवान् विष्णु वैकुण्ठमें २८ विराजमान थे ॥ उन्हें एकाएक अमृतसागरमें विद्यमान तथा मणियोंसे सुशोभित उस द्वीपका स्मरण हो आया, जहाँ महामायाका दर्शन करके उन्होंने शुभ मन्त्र प्राप्त २ ९ किया था । तदनन्तर जिन भगवतीके द्वारा वे पुरुषसे स्त्री बना दिये गये थे, उन परमशक्तिका स्मरण करके लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णुने अम्बायज्ञ करनेका मनमें ३० निश्चय कर लिया ॥ २८-२९ ३ ॥ इसके बाद अपने धामसे उतरकर उन्होंने शिव, ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, कुबेर, अग्नि, यम, वसिष्ठ, ३१ कश्यप, दक्ष, वामदेव तथा बृहस्पतिको आमन्त्रित करके अत्यन्त विस्तारके साथ यज्ञ सम्पन्न करनेके ३२ लिये अत्यधिक मूल्यवाली, सात्त्विक तथा मनोरम बहुत - सी सामग्रियाँ एकत्र कीं ॥ ३०-३२ ॥ उन्होंने शिल्पियोंद्वारा विशाल यज्ञमण्डप ३३ बनवाया और सत्ताईस महान् व्रती ऋत्विजोंका वरण किया । तत्पश्चात् अग्निस्थापनके लिये बड़ी - बड़ी वेदियाँ बनायी गयीं । ब्राह्मणगण बीजसहित ३४ देवीमन्त्रोंका जप करने लगे॥३३-३४ ॥ विधिवत् प्रज्वलित की गयी अग्निमें वे ब्राह्मण यथेच्छ हव्य - पदार्थकी आहुति देने लगे । इस प्रकार ३५ विस्तृत होमकृत्य सम्पन्न होते ही भगवान् विष्णुको सम्बोधित करके मधुर अक्षरों तथा स्पष्ट स्वरोंसे युक्त आकाशवाणी हुई । हे हरे! हे विष्णो! आप सदा ३६ देवताओंमें श्रेष्ठतम होंगे । सभी देवगणोंमें आप मान्य, पूज्य तथा समर्थ होंगे । संसारमें इन्द्रसहित ब्रह्मा आदि ३७ । सभी देवता आपकी अर्चना करेंगे॥३५–३७ ॥ हे विष्णो! पृथ्वीपर सभी मानव आपकी भक्तिसे युक्त होकर रहेंगे और आप सभी मनुष्योंको वर ३८ देनेवाले होंगे ॥ ३८ ॥

आप सभी देवताओंको वांछित फल प्रदान करनेवाले महान् परमेश्वर होंगे । सभी यज्ञोंमें प्रधानरूपसे ३ ९ । सभी याज्ञिकोंके द्वारा आप ही पूजे जायँगे ॥ ३ ९ ॥

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३१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३

त्वां जनाः पूजयिष्यन्ति वरदस्त्वं भविष्यसि ।

श्रयिष्यन्ति च देवास्त्वां दानवैरतिपीडिताः ॥

शरणस्त्वञ्च सर्वेषां भविता पुरुषोत्तम ।

पुराणेषु च सर्वेषु वेदेषु विततेषु च ॥

त्वं वै पूज्यतमः कामं कीर्तिस्तव भविष्यति ।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भूतले ॥

तदांशेनावतीर्याशु कर्तव्यं धर्मरक्षणम् ।

अवताराः सुविख्याताः पृथिव्यां तव भागशः ॥

भविष्यन्ति धरायां वै माननीया महात्मनाम् ।

अवतारेषु सर्वेषु नानायोनिषु माधव ॥

विख्यातः सर्वलोकेषु भविता मधुसूदन ।

अवतारेषु सर्वेषु शक्तिस्ते सहचारिणी ॥

भविष्यति ममांशेन सर्वकार्यप्रसाधिनी ।

वाराही नारसिंही च नानाभेदैरनेकधा ॥

नानायुधाः शुभाकाराः सर्वाभरणमण्डिताः ।

ताभिर्युक्तः सदा विष्णो सुरकार्याणि माधव ॥

तत्सर्वं मद्दत्तवरदानतः ।

तास्त्वया नावमन्तव्याः सर्वदा गर्वलेशतः ॥

पूजनीयाः प्रयत्नेन माननीयाश्च सर्वथा ।

नूनं ता भारते खण्डे शक्तयः सर्वकामदाः ॥

भविष्यन्ति मनुष्याणां पूजिता: प्रतिमासु च ।

तासां तव च देवेश कीर्तिः स्यादखिलेष्वपि ॥

द्वीपेषु सप्तस्वपि च विख्याता भुवि मण्डले ।

ताश्च त्वां वै महाभाग मानवा भुवि मण्डले ॥

अर्चयिष्यन्ति वाञ्छार्थं सकामाः सततं हरे ।

अर्चासु चोपहारैश्च नानाभावसमन्विताः ॥

पूजयिष्यन्ति वेदोक्तैर्मन्त्रैर्नामजपैस्तथा । लोग आपकी पूजा करेंगे और आप उनके लिये ४० वरदाता होंगे । राक्षसोंके द्वारा अत्यधिक प्रताड़ित किये जानेपर देवगण आपका आश्रय ग्रहण करेंगे । हे पुरुषोत्तम! आप सभीके शरणदाता होंगे । अत्यन्त ४१ विस्तारवाले वेदों तथा सभी पुराणोंमें आप ही पूज्यतम होंगे और आपकी महान् कीर्ति होगी ॥ ४०-४१३ ॥ इस पृथ्वीतलपर जब जब धर्मका ह्रास होगा ४२ तब - तब आप शीघ्र अपने अंशसे अवतार लेकर धर्मकी रक्षा करेंगे । आपके अंशसे उत्पन्न वे समस्त ४३ अवतार पृथ्वीपर अत्यन्त प्रसिद्ध होंगे और महात्मागण आपके उन अवतारोंका सम्मान करेंगे । हे माधव! नानाविध योनियोंमें आपके द्वारा लिये गये अवतारोंमें ४४ आप सभी लोकोंमें विख्यात होंगे । हे मधुसूदन! उन सभी अवतारोंमें मेरे अंशसे उत्पन्न शक्ति सदा आपकी सहचारिणी होगी और आपके समस्त कार्योंको ४५ सम्पन्न करेगी । वह शक्ति वाराही, नारसिंही आदि भेदोंसे अनेक प्रकारकी होगी ॥ ४२ – ४६ ॥ वे शक्तियाँ सभी प्रकारके आभूषणोंसे ४६ अलंकृत, भव्य स्वरूपवाली एवं नानाविध शस्त्रास्त्रोंसे सज्जित होंगी । हे विष्णो! आप उन शक्तियोंसे सदैव ४७ युक्त रहेंगे । हे माधव! मेरे द्वारा प्रदत्त वरदानके प्रभावसे आप देवताओंके समस्त कार्य सिद्ध करेंगे । आप लेशमात्र भी अभिमान करके उन शक्तियोंका ४८ कभी अपमान न कीजियेगा, अपितु हर प्रकारसे प्रयत्नपूर्वक उन शक्तियोंका पूजन तथा सम्मान कीजियेगा ॥ ४७-४८३ ॥ ४ ९ समस्त कामनाओंको प्रदान करनेवाली वे शक्तियाँ भारतवर्षमें मनुष्योंद्वारा विविध प्रतिमाओंमें प्रतिष्ठित होकर पूजी जायँगी । हे देवेश! उन शक्तियोंकी ५० तथा आपकी कीर्ति पृथ्वीमण्डल तथा समस्त सातों द्वीपोंमें प्रसिद्ध होगी ॥ ४ ९ -५० ३ ॥ ५१ हे महाभाग! भूमण्डलपर सकाम मनुष्य अपने मनोरथोंको पूर्ण करनेके लिये आपकी तथा उन शक्तियोंकी निरन्तर उपासना करेंगे । हे हरे! वे लोग ५२ अर्चनाओंमें अनेक भावोंसे युक्त होकर नानाविध उपहारों, वैदिक मन्त्रों तथा नामजपसे आपकी आराधना

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अ ० १४ ] तृतीय महिमा तव भूर्लोके स्वर्गे च मधुसूदन ॥ ५३ । पूजनाद्देवदेवेश वृद्धिमेष्यति मानवैः । व्यास उवाच इति दत्त्वा वरान्वाणी विरराम खसम्भवा ॥ ५४

भगवानपि प्रीतात्मा ह्यभवच्छ्रवणादिव ।

समाप्य विधिवद्यज्ञं भगवान्हरिरीश्वरः ॥ ५५

विसर्जयित्वा तान्देवान्ब्रह्मपुत्रान्मुनीनथ ।

जगामानुचरैः सार्धं वैकुण्ठं गरुडध्वजः ॥५६

स्वानि स्वानि च धिष्ण्यानि पुनः सर्वे सुरास्ततः ।

मुनयो विस्मिता वार्तां कुर्वन्तस्ते परस्परम् ॥ ५७

ययुः प्रमुदिताः कामं स्वाश्रमान्पावनानथ ॥ ५८

श्रुत्वा वाणीं परमविशदां व्योमजां श्रोत्ररम्यां सर्वेषां वै प्रकृतिविषये भक्तिभावश्च जातः । चक्रुः सर्वे द्विजमुनिगणाः पूजनं भक्तियुक्ता-स्तस्याः कामं निखिलफलदं चागमोक्तं मुनीन्द्राः ॥ ५ ९ स्कन्ध ३११ करेंगे । हे मधुसूदन! हे देवदेवेश! मनुष्योंके द्वारा सुपूजित होनेके कारण आपकी महिमा पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोकमें वृद्धिको प्राप्त होगी ॥ ५१ – ५३३ ॥ व्यासजी बोले- इस प्रकार भगवान् विष्णुको वरदान देकर वह आकाशवाणी चुप हो गयी । उसे सुनते ही भगवान् विष्णु भी प्रसन्नचित्त हो गये । तत्पश्चात् यज्ञका विधिपूर्वक समापन करके तथा उन देवताओं, ब्रह्मपुत्रों और मुनियोंको विदा करके सर्वसमर्थ गरुडध्वज भगवान् विष्णु अपने अनुचरोंके साथ वैकुण्ठलोकको चले गये ॥ ५४–५६ ॥ तदनन्तर विस्मयके साथ यज्ञविषयक वार्ता करते हुए वे समस्त देवता अपने - अपने लोकोंको तथा मुनिजन अपने - अपने पवित्र आश्रमोंको अति प्रसन्नता-पूर्वक चले गये ॥ ५७-५८ ॥ आकाशसे प्रादुर्भूत उस कर्णप्रिय तथा परम विशद वाणीको सुनकर सबके हृदयमें परा प्रकृतिके प्रति भक्तिभाव उत्पन्न हो गया । हे मुनीन्द्रो! अतएव वे सभी ब्राह्मण तथा मुनिजन भक्तिपरायण होकर उन भगवतीका पूजन करने लगे, जो वेदशास्त्रोंमें वर्णित है तथा सम्पूर्ण वांछित । फलोंको प्रदान करनेवाला है ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे अम्बिकामखस्य विष्णुनानुष्ठानवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः देवीमाहात्म्यसे सम्बन्धित राजा ध्रुवसन्धिकी कथा, ध्रुवसन्धिकी मृत्युके बाद राजा युधाजित् और वीरसेनका जनमेजय उवाच

श्रुतो वै हरिणा क्लृप्तो यज्ञो विस्तरतो द्विज ।

महिमानं तथाम्बाया वद विस्तरतो मम ॥

श्रुत्वा देव्याश्चरित्रं वै कुर्वे मखमनुत्तमम् ।

प्रसादात्तव विप्रेन्द्र भविष्यामि च पावनः ॥

व्यास उवाच

शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्याश्चरितमुत्तमम् ।

इतिहासं पुराणञ्च कथयामि सुविस्तरम् ॥

अपने - अपने दौहित्रोंके पक्षमें विवाद जनमेजय बोले — हे द्विज! मैंने विष्णुद्वारा किये गये देवीयज्ञके विषयमें विस्तारपूर्वक सुन लिया । अब १ आप मुझे विस्तृतरूपसे भगवतीकी महिमा बताइये ॥ १ ॥

हे विप्रेन्द्र! देवीका चरित्र सुनकर मैं भी वह २ उत्कृष्ट देवीयज्ञ अवश्य करूँगा और इस प्रकार आपकी कृपासे पवित्र हो जाऊँगा ॥२ ॥

व्यासजी बोले- हे राजन्! सुनिये, अब मैं भगवतीके उत्तम चरित्रका वर्णन करूँगा । मैं इसके ३ साथ - साथ विस्तृत इतिहास तथा पुराण भी कहूँगा ॥ ३ ॥