देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 321–330

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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३१२ कोसलेषु नृपश्रेष्ठः सूर्यवंशसमुद्भवः पुष्यपुत्रो महातेजा ध्रुवसन्धिरिति स्मृतः धर्मात्मा सत्यसन्धश्च वर्णाश्रमहिते रतः अयोध्यायां समृद्धायां राज्यं चक्रे शुचिव्रतः ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये तथा द्विजाः स्वां स्वां वृत्तिं समास्थाय तद्राज्ये धर्मतोऽभवन् श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ । कोसलदेशमें सूर्यवंशमें एक महातेजस्वी श्रेष्ठ ॥ ४ राजा उत्पन्न हुए । वे महाराज पुष्यके पुत्र थे और ध्रुवसन्धिके नाम से विख्यात थे ॥ ४ ॥

। वे धर्मात्मा, सत्यनिष्ठ तथा वर्णाश्रम-धर्मकी रक्षाके लिये सदा तत्पर रहते थे । पवित्र ॥ ५ व्रतधारी वे ध्रुवसन्धि वैभवशालिनी अयोध्यानगरीमें । राज्य करते थे ॥ ५ ॥

उनके राज्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ॥ ६ द्विजगण तथा अन्य सभी अपनी - अपनी जीविकामें न चौराः पिशुना धूर्तास्तस्य राज्ये च कुत्रचित् । दम्भाः कृतघ्ना मूर्खाश्च वसन्ति किल मानवाः एवं वै वर्तमानस्य नृपस्य कुरुसत्तम द्वे पत्न्यौ रूपसम्पन्ने ह्यासतुः कामभोगदे मनोरमा धर्मपत्नी सुरूपातिविचक्षणा । लीलावती द्वितीया च सापि रूपगुणान्विता विजहार सपत्नीभ्यां गृहेषूपवनेषु च । क्रीडागिरौ दीर्घिकासु सौधेषु विविधेषु च

मनोरमा शुभे काले सुषुवे पुत्रमुत्तमम् ।

सुदर्शनाभिधं पुत्रं राजलक्षणसंयुतम् ॥

लीलावत्यपि तत्पत्नी मासेनैकेन भामिनी ।

सुषुवे सुन्दरं पुत्रं शुभे पक्षे दिने तथा ॥

चकार नृपतिस्तत्र जातकर्मादिकं द्वयोः ।

ददौ दानानि विप्रेभ्यः पुत्रजन्मप्रमोदितः ॥

प्रीतिं तयोः समां राजा चकार सुतयोर्नृप ।

नृपश्चकार सौहार्देष्वन्तरं न कदाचन ॥

चूडाकर्म तयोश्चक्रे विधिना नृपसत्तमः ।

यथाविभवमेवासौ प्रीतियुक्तः परन्तपः ॥

तत्पर रहकर धर्मपूर्वक आचरण करते थे । उनके राज्यमें कहीं भी चोर, निन्दक, धूर्त, पाखण्डी, कृतघ्न ॥ ७ तथा मूर्ख मनुष्य निवास नहीं करते थे॥६-७ ॥ हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार धर्मपूर्वक राज्य करते । हुए उन राजाकी रूपवती तथा आनन्दोपभोग प्रदान ॥ ८ करनेवाली दो पत्नियाँ थीं । उनकी धर्मपत्नी मनोरमा थी, जो सुन्दर रूपवाली तथा परम विदुषी थी और दूसरी पत्नी लीलावती थी; वह भी रूप तथा गुणों से

॥ ९ सम्पन्न थी । ८ - ९ ॥

महाराज ध्रुवसन्धि उन दोनों पत्नियोंके साथ राजभवनों, उपवनों, क्रीड़ापर्वत, बावलियों तथा ॥ १० विभिन्न महलोंमें विहार करते थे ॥१० ॥

रानी मनोरमाने शुभ वेलामें राजलक्षणोंसे सम्पन्न एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया । उसका नाम सुदर्शन ११ | पड़ा ॥ ११ ॥

उनकी दूसरी सुन्दर पत्नी लीलावतीने भी एक माहके भीतर शुभ पक्ष तथा शुभ दिनमें एक १२ सुन्दर पुत्रको जन्म दिया ॥ १२ ॥

महाराज ध्रुवसन्धिने उन दोनों बालकोंका जातकर्म आदि संस्कार किया तथा पुत्र - जन्मसे प्रमुदित एवं उल्लसित होकर उन्होंने ब्राह्मणोंको १३ नानाविध दान दिये ॥१३ ॥

हे राजन्! महाराज ध्रुवसन्धि उन दोनों पुत्रोंपर समान प्रीति रखते थे । वे उन दोनोंके प्रति अपने प्रेम-१४ भावमें कभी भी अन्तर नहीं आने देते थे ॥ १४ ॥

परम तपस्वी उन राजेन्द्रने अपने वैभवके अनुसार बड़े हर्षोल्लास के साथ विधिपूर्वक उन दोनोंका १५ । चूडाकर्म - संस्कार किया ॥१५ ॥

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अ ० १४ ] तृतीय

कृतचूडौ सुतौ कामं जहतुर्नृपतेर्मनः ।

क्रीडमानावुभौ कान्तौ लोकानामनुरञ्जकौ ॥ १६

तयोः सुदर्शनो ज्येष्ठो लीलावत्याः सुतः शुभः ।

शत्रुजित्संज्ञकः कामं चाटुवाक्यो बभूव ह ॥ १७

नृपतेः प्रीतिजनको मञ्जुवाक्चारुदर्शनः ।

प्रजानां वल्लभः सोऽभूत्तथा मन्त्रिजनस्य वै ॥ १८

यथा तस्मिन्नृपः प्रीतिं चकार गुणयोगतः ।

मन्दभाग्यान्मन्दभावो न तथा वै सुदर्शने ॥। १ ९

एवं गच्छति काले तु ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः ।

जगाम वनमध्येऽसौ मृगयाभिरतः सदा ॥ २०

निघ्नन्मृगान् रुरून्कम्बून्सूकरान्गवयाञ्छशान् ।

महिषाञ्छरभान्खड्गांश्चिक्रीड नृपतिर्वने ॥ २१

क्रीडमाने नृपे तत्र वने घोरेऽतिदारुणे ।

उदतिष्ठन्निकुञ्जात्तु सिंहः परमकोपनः ॥ २२

राज्ञा शिलीमुखेनादौ विद्धः क्रोधवशं गतः ।

दृष्ट्वाग्रे नृपतिं सिंहो ननाद मेघनिःस्वनः ॥ २३

कृत्वा चोर्ध्वं स लाङ्गूलं प्रसारितबृहत्सटः । हन्तुं नृपतिमाकाशादुत्पपातातिकोपनः । २४

नृपतिस्तरसा वीक्ष्य दधारासिं करे तदा ।

वामे चर्म समादाय स्थितः सिंह इवापरः ॥ २५

सेवकास्तस्य ये सर्वे तेऽपि बाणान्पृथक्पृथक् ।

अमुञ्चन्कुपिताः कामं सिंहोपरि रुषान्विताः ॥ २६

स्कन्ध ३१३ चूडाकर्म- संस्कार हो जानेपर उन दोनों बालकोंने राजाके मनको मोहित कर लिया; वे दोनों कान्तिमान् बालक खेलते समय सभी लोगोंको मुग्ध कर लेते थे ॥ १६ ॥

उन दोनोंमें [ मनोरमाका पुत्र ] सुदर्शन ज्येष्ठ था । लीलावतीका शत्रुजित् नामक पुत्र अत्यन्त सुन्दर तथा मृदुभाषी था ॥ १७ ॥

उसके मधुरभाषी तथा अत्यन्त सुन्दर होनेके कारण राजा उससे अधिक प्रेम करने लगे और उसी तरहसे वह प्रजाजनों तथा मन्त्रियोंका भी प्रियपात्र बन गया ॥ १८ ॥

शत्रुजित्के गुणोंके कारण राजाका जैसा प्रेम उसपर हो गया, वैसा प्रेम सुदर्शनके प्रति नहीं था । वे सुदर्शनके प्रति मन्दभाग्य होनेके कारण कम अनुराग रखने लगे ॥१ ९ ॥ इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर आखेटके प्रति सदा तत्पर रहनेवाले नृपश्रेष्ठ ध्रुवसन्धि आखेटके लिये वनमें गये ॥ २० ॥

वे राजा ध्रुवसन्धि वनमें रुरु मृगों, बनैले सूअरों, गवयों, खरगोशों, भैंसों, शरभों तथा गैंडोंको मारते हुए आखेट करने लगे ॥ २१ ॥

जब महाराज उस गहन तथा महाभयंकर वनमें शिकार खेल रहे थे, उसी समय महान् रोषमें भरा हुआ एक सिंह झाड़ीसे निकला ॥ २२ ॥

पहले तो राजाने उसे बाणसे आहत कर दिया; तब अत्यन्त कोपाविष्ट वह सिंह उन्हें अपने सामने देखकर मेघके समान गरजने लगा ॥ २३ ॥

अपनी पूँछ खड़ी करके तथा गर्दनके लम्बे केशोंको छितराकर अत्यन्त कुपित वह सिंह राजाको मारनेके लिये छलाँग लगाकर उनपर झपटा ॥ २४ ॥

तब उसे देखकर राजाने भी तत्काल अपने हाथमें तलवार धारण कर ली और बायें हाथमें ढाल लेकर दूसरे सिंहके समान खड़े हो गये ॥ २५ ॥

यह देखकर उनके जो सेवकगण थे, वे सभी अत्यन्त कुपित हो उठे और रोषपूर्वक उस सिंहपर अलग - अलग बाणोंसे प्रहार करने लगे ॥ २६ ॥

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३१४ हाहाकारो महानासीत्संप्रहारश्च दारुणः उत्पपात ततः सिंहो नृपस्योपरि दारुणः तं पतन्तं समालोक्य खड्गेनाभ्यहनन्नृपः सोऽपि क्रूरैर्नखाग्रैश्च तत्रागत्य विदारितः स नखैराहतो राजा पपात च ममार वै चुक्रुशुः सैनिकास्ते तु निर्जघ्नुर्विशिखैस्तदा मृतः सिंहोऽपि तत्रैव भूपतिश्च तथा मृतः । सैनिकैर्मन्त्रिमुख्याश्च तत्रागत्य निवेदिताः परलोकगतं भूपं श्रुत्वा ते मन्त्रिसत्तमाः । संस्कारं कारयामासुर्गत्वा तत्र वनान्तिके

परलोकक्रियां सर्वां वसिष्ठो विधिपूर्वकम् ।

कारयामास तत्रैव परलोकसुखावहाम् ॥

प्रजाः प्रकृतयश्चैव वसिष्ठश्च महामुनिः ।

सुदर्शनं नृपं कर्तुं मन्त्रं चक्रुः परस्परम् ॥

धर्मपत्नीसुतः शान्तः पुरुषश्च सुलक्षणः ।

अयं नृपासनार्हश्च ह्यब्रुवन्मन्त्रिसत्तमाः ॥

वसिष्ठोऽपि तथैवाह योग्योऽयं नृपतेः सुतः ।

बालोऽपि धर्मवान् राजा नृपासनमिहार्हति ॥

कृते मन्त्रे मन्त्रिवृद्धैर्युधाजिन्नाम पार्थिवः ।

तत्राजगाम तरसा श्रुत्वा तूज्जयिनीपतिः ॥

मृतं जामातरं श्रुत्वा लीलावत्याः पिता तदा ।

तत्राजगाम त्वरितो दौहित्रप्रियकाम्यया ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ । वहाँ महान् हाहाकार मच गया तथा भीषण ॥ २७ प्रहार होने लगा । इसी बीच वह भयानक सिंह राजापर टूट पड़ा ॥ २७ ॥

। उसे अपने ऊपर झपटते देखकर राजाने खड्गसे उसपर प्रहार किया । उस सिंहने भी राजाके समीप ॥ २८ आकर अपने भयानक तथा तीक्ष्ण नखोंसे राजाको क्षत - विक्षत कर डाला ॥ २८ ॥

। नखोंके प्रहारसे आहत होकर राजा गिर पड़े ॥ २ ९ और उनकी मृत्यु हो गयी । इससे सभी सैनिक और भी क्रोधित हो उठे; तब वे बाणोंसे सिंहपर भीषण प्रहार करने लगे । इस प्रकार राजा ध्रुवसन्धि तथा वह ॥ ३० सिंह दोनों मर गये । तदनन्तर सैनिकोंने आकर मन्त्रिप्रवरोंको यह समाचार बताया ॥ २ ९ -३० ॥ राजाके परलोकगमनका समाचार सुनकर उन श्रेष्ठ मन्त्रियोंने उस वनमें जाकर उनका दाह-॥ ३१ संस्कार करवाया ॥३१ ॥

वहींपर गुरु वसिष्ठने परलोकमें सुख प्रदान करनेवाले सभी श्राद्ध आदि पारलौकिक कृत्य ३२ विधिपूर्वक सम्पन्न करवाये ॥३२ ॥

तदनन्तर प्रजाजनों, मन्त्रियों तथा महामुनि वसिष्ठने सुदर्शनको राजा बनानेके उद्देश्यसे आपसमें विचार - विमर्श किया ॥ ३३ ॥

३३ श्रेष्ठ मन्त्रियोंने कहा कि सुदर्शन महाराजकी धर्मपत्नी मनोरमाके पुत्र हैं, शान्त स्वभाववाले पुरुष हैं तथा सभी लक्षणोंसे सम्पन्न हैं, अतः ये राजसिंहासन ३४ योग्य हैं ॥ ३४ ॥

गुरु वसिष्ठने भी वही बात कही कि महाराजका यह पुत्र सुदर्शन राजपदके योग्य है; क्योंकि बालक ३५ हु. भी धर्मपरायण राजकुमार ही राजसिंहासनका अधिकारी होता है ॥ ३५ ॥

वयोवृद्ध मन्त्रियोंके द्वारा इस प्रकार विचार करनेके उपरान्त यह समाचार सुनकर उज्जयिनीनरेश ३६ राजा युधाजित् शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे ॥३६ ॥

लीलावती के पिता युधाजित् अपने दामादकी मृत्युके विषयमें सुनकर अपने दौहित्रके हितकी ३७ कामनासे उस समय शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये ॥ ३७ ॥

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अ ० १४ ] तृतीय

वीरसेनस्तथायातः सुदर्शनहितेच्छया ।

कलिङ्गाधिपतिश्चैव मनोरमापिता नृपः ॥ ३८

उभौ तौ सैन्यसंयुक्तौ नृपौ साध्वससंस्थितौ ।

चक्रतुर्मन्त्रिमुख्यैस्तैर्मन्त्रं राज्यस्य कारणात् ॥ ३ ९

युधाजित्तु तदापृच्छज्ज्येष्ठः कः सुतयोर्द्वयोः ।

राज्यं प्राप्नोति ज्येष्ठो वै न कनीयान्कदाचन ॥ ४०

वीरसेनोऽपि तत्राह धर्मपत्नीसुतः किल ।

राज्यार्हः स यथा राजन् शास्त्रज्ञेभ्यो मया श्रुतम् ॥ ४१

युधाजित्पुनराहेदं ज्येष्ठोऽयं च यथा गुणैः ।

राजलक्षणसंयुक्तो न तथायं सुदर्शनः ॥ ४२

विवादोऽत्र सुसम्पन्नो नृपयोस्तत्र लुब्धयोः ।

कः सन्देहमपाकर्तुं क्षमः स्यादतिसङ्कटे ॥ ४३

युधाजिन्मन्त्रिणः प्राह यूयं स्वार्थपराः किल ।

सुदर्शनं नृपं कृत्वा धनं भोक्तुं किलेच्छथ ॥ ४४

युष्माकं तु विचारोऽयं मया ज्ञातस्तथेङ्गितैः ।

शत्रुजित्सबलस्तस्मात्सम्मतो वो नृपासने ॥ ४५

मयि जीवति कः कुर्यात्कनीयांसं नृपं किल ।

त्यक्त्वा ज्येष्ठं गुणार्हञ्च सेनया च समन्वितम् ॥ ४६

नूनं युद्धं करिष्यामि तस्मिन्खड्गस्य मेदिनी ।

धारया च द्विधा भूयाद्युष्माकं तत्र का कथा ॥ ४७

वीरसेनस्तु तच्छ्रुत्वा युधाजितमभाषत ।

बालौ द्वौ सदृशप्रज्ञौ को भेदोऽत्र विचक्षण ॥ ४८

स्कन्ध ३१५ उसी समय सुदर्शनके हित साधनके उद्देश्यसे मनोरमाके पिता कलिंगाधिपति महाराज वीरसेन भी वहाँ आ गये ॥ ३८ ॥

सेनाओंसे सम्पन्न तथा एक - दूसरेसे भयभीत वे दोनों राजा राज्यके अधिकारीका निर्णय करनेके लिये प्रधान अमात्योंके साथ मन्त्रणा करने लगे ॥ ३ ९ ॥ युधाजित्ने पूछा कि इन दोनों राजकुमारोंमें ज्येष्ठ कौन है? ज्येष्ठ ही राज्य प्राप्त करता है, कनिष्ठ कदापि नहीं ॥ ४० ॥

उसी समय वीरसेनने भी कहा- हे राजन्! मैंने शास्त्रविदोंसे ऐसा सुना है कि धर्मपत्नीका पुत्र ही राज्यका अधिकारी माना जाता है ॥४१ ॥

युधाजित्ने पुन: कहा कि यह शत्रुजित् गुणोंके कारण ज्येष्ठ है । यह सुदर्शन राजोचित चिह्नोंसे युक्त होते हुए भी वैसा नहीं है ॥ ४२ ॥

अपने - अपने स्वार्थके वशीभूत उन दोनों राजाओंमें वहाँ विवाद होने लगा । अब उस महासंकटकी परिस्थितिमें उनके सन्देहका समाधान करनेमें कौन समर्थ हो सकता था? ॥ ४३ ॥

युधाजित्ने मन्त्रियोंसे कहा कि आपलोग अवश्य ही स्वार्थपरायण हो गये हैं और सुदर्शनको राजा बनाकर धनका स्वयं उपभोग करना चाहते हैं ॥ ४४ ॥

मैंने आप लोगोंका यह विचार तो आप सबकी भाव - भंगिमासे पहले ही जान लिया था । शत्रुजित् सुदर्शनसे अधिक बलवान् है, अतः आप लोगोंकी सम्मति तो यह होनी चाहिये कि शत्रुजित् ही राजसिंहासनपर आसीन होनेयोग्य है ॥ ४५ ॥ 1

ऐसा कौन व्यक्ति है, जो मेरे जीवित रहते गुणोंमें बड़े तथा सेनासे सुसज्जित राजकुमारको छोड़कर [ गुणोंमें ] छोटे पुत्रको राजा बना सके ॥ ४६ ॥

इसके लिये मैं निश्चितरूपसे घोर संग्राम करूँगा । मेरे खड्गकी धारसे पृथ्वीके भी दो टुकड़े हो सकते हैं, फिर आप लोगोंकी बात ही क्या! ॥ ४७ ॥

यह सुनकर वीरसेनने युधाजित्से कहा - हे विद्वन्! दोनों ही बालक समान बुद्धि रखते हैं; इनमें । भेद ही क्या है? ॥ ४८ ॥

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३१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५

एवं विवदमानौ तौ संस्थितौ नृपती तदा ।

प्रजाश्च ऋषयश्चैव बभूवुर्व्यग्रमानसाः ॥

समाजग्मुश्च सामन्ताः ससैन्याः क्लेशतत्पराः ।

विग्रहं चाभिकाङ्क्षन्तः परस्परमतन्द्रिताः ॥

निषादा ह्याययुस्तत्र शृङ्गवेरपुराश्रयाः ।

राज्यद्रव्यमपाहर्तुं मृतं श्रुत्वा महीपतिम् ॥

पुत्रौ च बालकौ श्रुत्वा विग्रहं च परस्परम् ।

चौरास्त समाजग्मुर्देशदेशान्तरादपि ॥

सम्मर्दस्तत्र सञ्जातः कलहे समुपस्थिते ।

युधाजिद्वीरसेनश्च युद्धकामौ बभूवतुः ॥

तदनन्तर उन दोनोंको इस प्रकार परस्पर ४ ९ विवाद करते देखकर प्रजाजनों तथा ऋषियोंके मनमें व्यग्रता होने लगी ॥ ४ ९ ॥ तब एक - दूसरेको क्लेश पहुँचानेके लिये ५० उद्यत तथा युद्धकी इच्छावाले दोनों पक्षोंके सामन्त सावधान होकर अपनी - अपनी सेनाओंके साथ वहाँ आ पहुँचे ॥५० ॥

उसी समय महाराज ध्रुवसन्धिकी मृत्युका समाचार ५१ सुनकर शृंगवेरपुरमें रहनेवाले निषादगण राजकोष लूटने के लिये वहाँ आ गये । दोनों राजकुमार अभी बालक हैं तथा वे आपसमें कलह कर रहे हैं - यह सुनकर देश-५२ देशान्तरके चोर - लुटेरे भी वहाँ आ गये ॥ ५१-५२ ॥ इस प्रकार वहाँपर भारी कलह उपस्थित हो जानेपर युद्ध आरम्भ हो गया । युधाजित् तथा वीरसेन ५३ भी युद्धके लिये उद्यत हो गये ॥५३ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे युधाजिद्वीरसेनयोर्युद्धार्थं सज्जीभवनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

O अथ पञ्चदशोऽध्यायः राजा युधाजित् और वीरसेनका युद्ध, वीरसेनकी मृत्यु, राजा ध्रुवसन्धिकी रानी मनोरमाका अपने पुत्र सुदर्शनको लेकर भारद्वाजमुनिके आश्रममें जाना व्यास उवाच संयुगे च सति तत्र भूपयोराहवाय समुपात्तशस्त्रयोः । क्रोधलोभवशयोः समं ततः सम्बभूव तुमुलस्तु विमर्दः

संस्थितः स समरे धृतचाप: पार्थिवः पृथुलबाहुयुधाजित् ।

संयुतः स्वबलवाहनादिकैराहवाय कृतनिश्चयो नृपः ॥

वीरसेन इह सैन्यसंयुतः क्षात्रधर्ममनुसृत्य सङ्गरे ।

पुत्रिकात्मजहिताय पार्थिवः संस्थितः सुरपतेः समतेजाः ॥

स बाणवृष्टिं विससर्ज पार्थिव युधाजितं वीक्ष्य रणे स्थितञ्च । गिरिं तडित्वानिव तोयवृष्टिभिः क्रोधान्वितः सत्यपराक्रमोऽसौ ॥ तथा वहीं निवास करना व्यासजी बोले - – [ हे राजन्! ] युद्ध आरम्भ हो जानेपर क्रोध एवं लोभके वशीभूत उन दोनों राजाओंने ॥ १ लड़नेके लिये शस्त्र उठा लिये और तब उनके बीच भयानक संग्राम आरम्भ हो गया ॥ १ ॥

युद्धके लिये कृतसंकल्प वे विशालबाहु राजा २ युधाजित् धनुष धारण करके अपनी सेना तथा वाहन आदिके साथ रणभूमिमें डट गये ॥ २ ॥

इधर इन्द्रके समान तेजस्वी राजा वीरसेन भी ३ क्षत्रियोचित धर्मका अनुसरण करते हुए अपने दौहित्रके हित - साधनहेतु विशाल सेनाके साथ रणक्षेत्रमें उपस्थित हो गये ॥ ३ ॥

सत्यपराक्रमी राजा वीरसेनने युधाजित्को समरांगणमें उपस्थित देखकर क्रोधयुक्त होकर इस प्रकार बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी, मानो पर्वतपर ४ । मेघ जल बरसा रहा हो ॥४ ॥

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अ ० १५ ] तृतीय तं वीरसेनो विशिखैः शिलाशितैः समावृणोदाशुगमैरजिह्मगैः चिच्छेद बाणैश्च शिलीमुखानसौ तेनैव मुक्तानतिवेगपातिनः ॥ गजरथतुरगाणां सम्बभूवातियुद्धं सुरनरमुनिसङ्खैर्वीक्षितं चातिघोरम् । विततविहगवृन्दैरावृतं व्योम सद्यः पिशितमशितुकामैः काकगृध्रादिभिश्च ॥ ६ तत्राद्भुता क्षतजसिन्धुरुवाह घोरा वृन्देभ्य एव गजवीरतुरङ्गमाणाम् । त्रासावहा नयनमार्गगता नराणां पापात्मनां रविजमार्गभवेव कामम् ॥ ७ कीर्णानि भिन्नपुलिने नरमस्तकानि

केशावृतानि च विभान्ति यथैव सिन्धौ ।

तुम्बीफलानि विहितानि विहर्तुकामै-बलैर्यथा रविसुताप्रभवैश्च नूनम् ॥ ८

वीरं मृतं भुवि गतं पतितं रथाद्वै गृध्रः पलार्थमुपरि भ्रमतीति मन्ये । जीवोऽप्यसौ निजशरीरमवेक्ष्य कान्तं काङ्क्षत्यहोऽतिविवशोऽपि पुनः प्रवेष्टुम् ॥ ९ आजौ हतोऽपि नृवरः सुविमानरूढः स्वाङ्के स्थितां सुरवधूं प्रवदत्यभीष्टम् । पश्याधुना मम शरीरमिदं पृथिव्यां बाणाहतं निपतितं करभोरु कान्तम् ॥ १० एको हतस्तु रिपुणैव गतोऽन्तरिक्षं देवाङ्गनां समधिगम्य युतो विमाने । तावत्प्रिया हुतवहे सुसमर्प्य देहं जग्राह कान्तमबला सबला स्वकीया ॥ ११ स्कन्ध ३१७ राजा वीरसेनने पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये, द्रुतगामी तथा सीधे प्रवेश करनेवाले बाणोंसे युधाजित्को आच्छादित कर दिया और युधाजित्के द्वारा छोड़े गये अत्यन्त तीव्रगामी बाणोंको उन्होंने अपने बाणोंसे टुकड़े - टुकड़े कर दिया ॥ ५ ॥

इस प्रकार हाथियों, रथों तथा घोड़ोंसे अतिभयंकर युद्ध होने लगा जिसे देवता, मनुष्य तथा मुनिगण देख रहे थे । मांसभक्षणकी लालसावाले कौए, गीध आदि पक्षियोंके विस्तृत समूहसे शीघ्र ही वहाँका आकाशमण्डल ढक गया ॥ ६ ॥

उस युद्धभूमिमें हाथियों, घोड़ों तथा सैन्यसमूहोंके शरीरसे निकले रक्तसे अद्भुत तथा भयंकर नदी बह चली, जो लोगोंको उसी प्रकार दिखायी पड़ रही थी, जैसे यमलोकके मार्ग में प्रवाहित वैतरणी पापियोंको भयावह दीखती है ॥ ७ ॥

[ तीव्र धारके वेगसे ] कटे हुए तटवाली उस नदीमें मनुष्योंके केशयुक्त इधर - उधर बिखरे मस्तक, खेलनेमें तत्पर बालकोंद्वारा यमुनामें फेंके गये तुम्बीफलोंके समान प्रतीत हो रहे थे ॥ ८ ॥

रथसे गिरे हुए किसी मृत वीरको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देखकर मांसकी इच्छासे गीध उसके ऊपर मँडराने लगता था, इससे ऐसा प्रतीत होता था मानो उस वीरका जीव अपने शरीरको अति सुन्दर देखकर अत्यन्त विवश हो उसमें पुनः प्रवेश करने की इच्छा कर रहा हो॥९॥

युद्धभूमिमें हत कोई वीर योद्धा सुन्दर विमानमें आरूढ़ होकर अपनी गोदमें बैठी हुई किसी देवांगनासे अपना मनोभाव इस प्रकार व्यक्त करता था - - हे करभोरु! इस समय बाणोंसे आहत होकर धरतीपर पड़े हुए मेरे इस कान्तियुक्त शरीरको देखो ॥ १० ॥

शत्रुके द्वारा मारा गया एक वीर ज्यों ही अन्तरिक्षमें पहुँचा और अप्सराके पास जाकर विमानमें बैठा, त्यों ही उसकी अपनी प्रिय स्त्री अपना शरीर अग्निको भलीभाँति समर्पित करके पुनः दिव्य शरीर । पाकर अपने पतिके पास जा पहुँची ॥ ११ ॥

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३१८ युद्धे मृतौ च सुभटौ दिवि सङ्गतौ ता-वन्योन्यशस्त्रनिहतौ सह सम्प्रयातौ तत्रैव जघ्नतुरलं परमाहितास्त्रा-वेकाप्सरोऽर्थविहतौ कलहाकुलौ च कश्चिद्युवा समधिगम्य सुराङ्गनां वै रूपाधिकां गुणवतीं किल भक्तियुक्तः स्वीयान् गुणान्प्रविततान्प्रवदंस्तदासौ तां प्रेमदामनुचकार च योगयुक्तः ॥ भौमं रजोऽतिविततं दिवि संस्थितञ्च रात्रिं चकार तरणिञ्च समावृणोद्यत् । मग्नं तदेव रुधिराम्बुनिधावकस्मात् प्रादुर्बभूव रविरप्यतिकान्तियुक्तः ॥ कश्चिद् गतस्तु गगनं किल देवकन्यां सम्प्राप्य चारुवदनां किल भक्तियुक्ताम् । नाङ्गीचकार चतुरो व्रतनाशभीतो यास्यत्ययं मम वृथा ह्यनुकूलशब्दः ॥

सङ्ग्रामे संवृते तत्र युधाजित्पृथिवीपतिः ।

जघान वीरसेनं तं बाणैस्तीत्रैः सुदारुणैः ॥

निहतः स पपातोर्व्यां छिन्नमूर्धा महीपतिः ।

प्रभग्नं तद्द्बलं सर्वं निर्गतं च चतुर्दिशम् ॥

मनोरमा हतं श्रुत्वा पितरं रणमूर्धनि ।

भयत्रस्ताथ सञ्जाता पितुर्वैरमनुस्मरन् ॥

हनिष्यति युधाजिद्वै पुत्रं मम दुराशयः ।

राज्यलोभेन पापात्मा सेति चिन्तापराभवत् ॥

किं करोमि क्व गच्छामि पिता मे निहतो रणे ।

भर्ता चापि मृतोऽद्यैव पुत्रोऽयं मम बालकः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ उस युद्धमें दो वीर परस्पर एक - दूसरेके शस्त्र-। प्रहारसे आहत होकर मर गये और साथ - साथ ही स्वर्गलोकमें पहुँचे । वहाँपर भी एक अप्सराको प्राप्त करनेके लिये वे दोनों वीर शस्त्रयुक्त होकर एक-॥ १२ दूसरेको मारने हेतु युद्ध करने लगे ॥ १२ ॥

कोई अनुरागमय युवा वीर अतिशय रूपवती तथा गुणवती अप्सराको प्राप्त करके अत्यन्त । बढ़ा - चढ़ाकर अपने गुणोंका वर्णन करते हुए उसके प्रति भक्तिपरायण होकर प्रयत्नपूर्वक उस प्रेमदायिनीके १३ गुण आदिका अनुकरण करने लगा ॥१३ ॥

घोर युद्धके कारण रणभूमिसे उड़ी हुई अत्यधिक धूलने अन्तरिक्षस्थित सूर्यको ढक दिया और दिनमें ही रात हो गयी । पुनः वही धूल जब अथाह रक्त-सिन्धु में विलीन हो जाती तब अत्यन्त प्रभावाले सूर्य १४ अचानक प्रकट हो जाते ॥ १४ ॥

कोई युवक वीर युद्धमें मरकर स्वर्ग पहुँचा तो उसे एक सुन्दर रूपवाली देवकन्या मिली, जो उसके ऊपर आसक्त हो गयी । किंतु ब्रह्मचर्यव्रतके नाश होनेसे भयभीत उस चतुर वीरने उसे स्वीकार नहीं किया; [ उसने सोचा कि ऐसा करनेसे ] मेरे अनुरूप १५ यह ब्रह्मचारी शब्द व्यर्थ हो जायगा ॥ १५ ॥

तदनन्तर घोर संग्राम छिड़ जानेपर राजा युधाजित्ने अपने तीक्ष्ण तथा अत्यन्त भीषण बाणोंसे वीरसेनको १६ | मार डाला ॥ १६ ॥

इस प्रकार कटे मस्तकवाले महाराज वीरसेन पृथ्वीपर गिर पड़े । उनकी सम्पूर्ण सेना नष्ट हो गयी १७ । और चारों दिशाओंमें भाग गयी ॥१७ ॥

अपने पिता वीरसेनको समरांगणमें मारा गया सुनकर तथा अपने पिताके वैरका स्मरण १८ करते हुए मनोरमा भयसे व्याकुल हो गई । वह इस चिन्तामें पड़ गई कि बुरे विचारोंवाला वह पापी युधाजित् राज्यके लोभसे मेरे पुत्रको अवश्य ही १ ९ | मार डालेगा ॥ १८-१९ ॥ अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पिताजी युद्धमें मारे गये तथा पतिदेव भी मर चुके हैं और मेरा २० यह पुत्र अभी बालक ही है ॥ २० ॥

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अ ० १५ ] तृतीय

लोभोऽतीव च पापिष्ठस्तेन को न वशीकृतः ।

किं न कुर्यात्तदाविष्टः पापं पार्थिवसत्तमः ॥ २१

पितरं मातरं भ्रातॄन्गुरून्स्वजनबान्धवान् ।

हन्ति लोभसमाविष्टो जनो नात्र विचारणा ॥ २२

अभक्ष्यभक्षणं लोभादगम्यागमनं तथा ।

करोति किल तृष्णार्तो धर्मत्यागं तथा पुनः ॥ २३

न सहायोऽस्ति मे कश्चिन्नगरेऽत्र महाबलः ।

यदाधारे स्थिता चाहं पालयामि सुतं शुभम् ॥ २४

हते पुत्रे नृपेणाद्य किं करिष्याम्यहं पुनः ।

न मे त्रातास्ति भुवने येन वै सुस्थिता ह्यहम् ॥ २५

सापि वैरयुता कामं सपत्नी सर्वदा भवेत् ।

लीलावती न मे पुत्रे भविष्यति दयावती ॥ २६

युधाजिति समायाते न मे निःसरणं भवेत् ।

ज्ञात्वा बालं सुतं सोऽद्य कारागारं नयिष्यति ॥ २७

श्रूयते हि पुरेन्द्रेण मातुर्गर्भगतः शिशुः ।

कृन्तितः सप्तधा पश्चात्कृतास्ते सप्त सप्तधा ॥ २८

प्रविश्य चोदरं मातुः करे कृत्वाल्पकं पविम् ।

एकोनपञ्चाशदपि तेऽभवन्मरुतो दिवि ॥ २ ९

सपन्यै गरलं दत्तं सपत्न्या नृपभार्यया ।

गर्भनाशार्थमुद्दिश्य पुरैतद्वै मया श्रुतम् ॥ ३०

जातस्तु बालकः पश्चाद्देहे विषयुतः किल ।

तेनासौ सगरो नाम विख्यातो भुवि मण्डले ॥ ३१

जीवमानोऽथ भर्ता वै कैकेय्या नृपभार्यया ।

रामः प्रव्राजितो ज्येष्ठो मृतो दशरथो नृपः ॥ ३२

स्कन्ध ३१ ९ लोभ बड़ा ही पापी होता है, इसने किसको अपने वशमें नहीं किया । लोभसे ग्रस्त हो जानेपर श्रेष्ठ राजा भी कौन - सा पाप नहीं कर सकता । लोभसे अभिभूत मनुष्य अपने माता - पिता, भाई, गुरु तथा बन्धु - बान्धवोंको भी मार डालता है; इसमें सन्देह नहीं है । लोभके कारण मनुष्य अभक्ष्यका भक्षण तथा अगम्या स्त्रीके साथ गमन भी कर लेता है; यहाँतक कि लोभसे व्याकुल होकर वह धर्मका त्याग भी कर देता है॥२१–२३ ॥ अब इस नगरमें कोई बलवान् पुरुष मुझे सहायता देनेवाला भी नहीं रह गया, जिसके आश्रयमें रहकर मैं अपने सुन्दर पुत्रका पालन कर सकूँ ॥ २४ ॥

यदि राजा युधाजित् मेरे पुत्रको मार डाले, तो मैं फिर क्या करूँगी? इस संसारमें मेरा कोई रक्षक नहीं है, जिसके सहारे मैं निश्चिन्त रह सकूँ? ॥ २५ ॥

मेरी सौत लीलावती भी सदा मुझसे वैरभाव रखती है, अत: वह भी मेरे पुत्रपर दया नहीं करेगी ॥ २६ ॥

युधाजित्के रणभूमिसे लौटकर आ जानेपर मेरा यहाँसे निकल भागना सम्भव नहीं हो सकेगा; वह मेरे पुत्रको बालक जानकर उसे कारागारमें डाल देगा ॥ २७ ॥

सुना जाता है कि पूर्वकालमें इन्द्रने अपने वज्रको अत्यन्त छोटा बनाकर अपनी सौतेली माता दितिके गर्भमें प्रवेश करके गर्भस्थ शिशुको काटकर उसके सात टुकड़े कर दिये थे । इसके बाद उसने पुनः एक - एक टुकड़ेके सात - सात खण्ड कर दिये थे । वे ही आगे चलकर देवलोकमें उनचास मरुत्के रूपमें प्रतिष्ठित हुए ॥ २८-२९ ॥ मैंने यह भी सुना है कि पूर्वकालमें एक राजाकी किसी रानीने अपनी सौतके गर्भको नष्ट करनेके उद्देश्यसे उसे विष दे दिया था । कुछ समय बीतनेपर वह बालक विषके साथ उत्पन्न हुआ, इसीसे वह भूमण्डलपर ' सगर ' नामसे प्रसिद्ध

हो गया । ३० - ३१ ॥

महाराज दशरथकी भार्या कैकेयीने पतिके जीवनकालमें ही उनके ज्येष्ठ पुत्र रामचन्द्रको वनवास दे दिया था, जिसके फलस्वरूप राजा दशरथकी मृत्यु | भी हो गयी ॥ ३२ ॥

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३२० मन्त्रिणस्त्ववशाः कामं ये मे पुत्रं सुदर्शनम् राजानं कर्तुकामा वै युधाजिद्वशगाश्च ते ॥

न मे भ्राता तथा शूरो यो मां बन्धात्प्रमोचयेत् ।

महत्कष्टं च सम्प्राप्तं मया वै दैवयोगतः ॥

उद्यमः सर्वथा कार्यः सिद्धिर्दैवाद्धि जायते ।

उपायं पुत्ररक्षार्थं करोम्यद्य त्वरान्विता ॥

इति सञ्चिन्त्य सा बाला विदल्लं चातिमानिनम् ।

निपुणं सर्वकार्येषु चिन्त्यं मन्त्रिवरोत्तमम् ॥

समाहूय तमेकान्ते प्रोवाच बहुदुःखिता ।

गृहीत्वा बालकं हस्ते रुदती दीनमानसा ॥

पिता मे निहतः संख्ये पुत्रोऽयं बालकस्तथा ।

युधाजिद् बलवान् राजा किं विधेयं वदस्व मे ॥

तामुवाच विदल्लोऽसौ नात्र स्थातव्यमेव च ।

गमिष्यामो वने कामं वाराणस्याः पुनः किल ॥

तत्र मे मातुलः श्रीमान्वर्तते बलवत्तरः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ । जो मन्त्री मेरे पुत्र सुदर्शनको राजा बनाना ३३ चाहते थे, वे भी अब विवश होकर युधाजित्के अधीन हो गये हैं । मेरा भाई भी ऐसा योद्धा नहीं है, जो मुझे बन्धनसे छुड़ा सके । दैवयोगसे मैं ३४ महान् संकटमें पड़ गयी हूँ । फिर भी उद्योग तो सर्वथा करना ही चाहिये, सफलता तो दैवके आधीन है । अत: अब मैं अपने पुत्रकी रक्षाके लिये शीघ्र ही ३५ कोई उपाय करूँगी ॥ ३३–३५ ॥ ऐसा सोचकर वह रानी अतिसम्मानित, सभी कार्योंमें दक्ष तथा विचार - कुशल श्रेष्ठ मन्त्रिप्रवर ३६ विदल्लको बुलवाकर उन्हें एकान्तमें ले गयी और बालकको हाथमें लेकर रोती हुई दीन मनवाली उस मनोरमाने अत्यन्त दुःखित होकर उनसे कहा— ३७ मेरे पिता युद्धमें मारे गये और मेरा यह पुत्र अभी अबोध बालक है । राजा युधाजित् बलवान् हैं । [ ऐसी परिस्थितिमें ] मुझे क्या करना चाहिये? ३८ मुझे बतायें ॥३६–३८ ॥ तब विदल्लने उससे कहा- अब यहाँ नहीं रहना चाहिये, हमलोग यहाँसे वाराणसीके वनमें ३ ९ चलेंगे । वहाँ सुबाहु नामसे विख्यात मेरे मामा रहते हैं । वे समृद्धिशाली तथा महाबलशाली हैं; वे ही

सुबाहुरिति विख्यातो रक्षिता स भविष्यति ॥। ४० हमारे रक्षक होंगे ॥ ३ ९ -४० ॥

युधाजिद्दर्शनोत्कण्ठमनसा नगराद् बहिः ।

निर्गत्य रथमारुह्य गन्तव्यं नात्र संशयः ॥

इत्युक्ता तेन सा राज्ञी गत्वा लीलावतीं प्रति ।

उवाच पितरं द्रष्टुं गच्छाम्यद्य सुलोचने ॥

इत्युक्त्वा रथमारुह्य सैरन्ध्रीसंयुता तदा ।

विदल्लेन च संयुक्ता निःसृता नगराद् बहिः ॥

त्रस्ता ह्यार्तातिकृपणा पितुः शोकसमाकुला ।

दृष्ट्वा युधाजितं भूपं पितरं गतजीवितम् ॥

संस्कार्य च त्वरायुक्ता वेपमाना भयाकुला ।

दिनद्वयेन सम्प्राप्ता राज्ञी भागीरथीतटम् ॥

मनमें युधाजितके दर्शनकी लालसासे नगरसे बाहर निकल चलना चाहिये और रथपर सवार हो ४१ प्रस्थान कर देना चाहिये; इसमें शंकाकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४१ ॥

विदल्लके ऐसा कहनेपर रानी मनोरमा लीलावती के ४२ पास गयी और बोली – हे सुनयने! मैं [ तुम्हारे ] पिताजीका दर्शन करने जा रही हूँ ॥ ४२ ॥

ऐसा कहकर मनोरमा एक दासी और ४३ मन्त्री विदल्लको साथ लेकर रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकल गयी । उस समय बहुत डरी हुई, दुःखित, अत्यन्त दीन तथा पिताके मृत्युजन्य शोकसे ४४ व्याकुल वह मनोरमा राजा युधाजित्से मिलकर तत्काल अपने मृत पिताका दाहसंस्कार कराकर भयसे व्याकुल हो काँपती हुई दो दिनोंमें गंगाजीके तटपर ४५ | पहुँच गयी ॥ ४३–४५ ॥

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अ ० १५ ] तृतीय स्कन्ध ३२१

निषादैर्लुण्ठिता तत्र गृहीतं सकलं वसु ।

रथञ्चापि गृहीत्वा ते निर्गता दस्यवः शठाः ॥

रुदती सुतमादाय चारुवस्त्रा मनोरमा ।

निर्ययौ जाह्नवीतीरे सैरन्ध्रीकरलम्बिता ॥

आरुह्य च भयाच्छीघ्रमुडुपं सा भयाकुला ।

तीर्त्वा भागीरथीं पुण्यां ययौ त्रिकूटपर्वतम् ॥

भारद्वाजाश्रमं प्राप्ता त्वरया च भयाकुला ।

संवीक्ष्य तापसांस्तत्र सञ्जाता निर्भया तदा ॥

मुनिना सा ततः पृष्टा कासि कस्य परिग्रहः ।

कष्टेनात्र कथं प्राप्ता सत्यं ब्रूहि शुचिस्मिते ॥

देवी वा मानुषी वासि बालपुत्रा वने कथम् ।

राज्यभ्रष्टेव वामोरु भासि त्वं कमलेक्षणे ॥

एवं सा मुनिना पृष्टा नोवाच वरवर्णिनी ।

रुदती दुःखसन्तप्ता विदल्लं च समादिशत् ॥

विदल्लस्तमुवाचेदं ध्रुवसन्धिर्नृपोत्तमः ।

तस्य भार्या धर्मपत्नी नाम्ना चेयं मनोरमा ॥

सिंहेन निहतो राजा सूर्यवंशी महाबलः ।

पुत्रोऽयं नृपतेस्तस्य नाम्ना चैव सुदर्शनः ॥

अस्याः पितातिधर्मात्मा दौहित्रार्थं मृतो रणे ।

युधाजिद्भयसन्त्रस्ता सम्प्राप्ता विजने वने ॥

त्वामेव शरणं प्राप्ता बालपुत्रा नृपात्मजा ।

त्राता भव महाभाग त्वमस्या मुनिसत्तम ॥

आर्तस्य रक्षणे पुण्यं यज्ञाधिकमुदाहृतम् ।

भयत्रस्तस्य दीनस्य विशेषफलदं स्मृतम् ॥

वहाँके निषादोंने उसे लूट लिया तथा उसका ४६ सारा धन और रथ छीन लिया । सब कुछ लेकर वे धूर्त दस्यु चले गये । तब वह रोती हुई अपने पुत्रको लेकर सैरंध्रीके हाथका सहारा लेकर किसी प्रकार ४७ गंगाके तटपर गयी और एक छोटी - सी नौकापर डरती हुई बैठकर पवित्र गंगाको पार करके वह भयाक्रान्त मनोरमा त्रिकूटपर्वतपर पहुँच गयी ॥ ४६–४८ ॥ ४८ वह भयभीत मनोरमा भारद्वाजमुनिके आश्रममें शीघ्रतासे पहुँची । तब वहाँ तपस्वियोंको देखकर वह निर्भय हो गयी । तदनन्तर भारद्वाजमुनिने पूछा — हे ४ ९ शुचिस्मिते! तुम कौन हो, किसकी पत्नी हो? इतने कष्टसे तुम यहाँ कैसे आ गयी हो? मुझसे सत्य कहो । तुम कोई देवी हो अथवा मानवी हो । अपने इस बालक पुत्रके साथ वनमें क्यों विचरण कर रही ५० हो? हे सुन्दरि! हे कमलनयने! तुम राज्यभ्रष्ट - जैसी प्रतीत हो रही हो ॥ ४ ९ –५१ ॥ मुनिके पूछनेपर उस रूपवती रानीने कुछ भी ५१ उत्तर नहीं दिया और दुःखसे सन्तप्त होकर रोती हुई उसने अपने मन्त्री विदल्लको सारी बातें बतानेके लिये संकेत किया ॥५२ ॥

५२ तब विदल्लने मुनिसे कहा- - ध्रुवसन्धि एक श्रेष्ठ नरेश थे । ये उन्हींकी मनोरमा नामवाली धर्मपत्नी हैं ॥५३ ॥

५३ सूर्यवंशमें उत्पन्न उन महाबली महाराजको सिंहने मार डाला । सुदर्शन नामका यह बालक उन्हीं राजाका पुत्र है ॥ ५४ ॥

५४ इनके अत्यन्त धर्मात्मा पिता अपने इसी दौहित्रके लिये संग्राममें मारे गये । अतएव युधाजित्के भयसे संत्रस्त होकर ये इस निर्जन वनमें आयी हुई हैं हैं । ॥ ५५ ॥

५५ हे महाभाग! हे मुनिश्रेष्ठ! अबोध पुत्रवाली ये राजपुत्री अब आपकी शरणमें आयी हैं । अतः आप इनकी रक्षा कीजिये ॥ ५६ ॥

५६ किसी दुःखी प्राणीकी रक्षा करनेमें यज्ञ करनेसे भी अधिक पुण्य बताया गया है । भयभीत तथा दीनकी रक्षाको तो और भी अधिक फलदायक कहा ५७ | गया है ॥ ५७ ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 11 A