देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 331–340

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

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३२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ ऋषिरुवाच

निर्भया वस कल्याणि पुत्रं पालय सुव्रते ।

न ते भयं विशालाक्षि कर्तव्यं शत्रुसम्भवम् ॥

पालयस्व सुतं कान्तं राजा तेऽयं भविष्यति ।

नात्र दुःखं तथा शोकः कदाचित्सम्भविष्यति ॥

व्यास उवाच

इत्युक्ता मुनिना राज्ञी स्वस्था सा सम्बभूव ह ।

उटजे मुनिना दत्ते वीतशोका तदावसत् ॥

सैरन्ध्रीसहिता तत्र विदल्लेन च संयुता ।

सुदर्शनं पालयाना न्यवसत्सा मनोरमा ॥

ऋषि बोले- हे कल्याणि! तुम यहाँ भयरहित होकर निवास करो; हे सुव्रते! अपने पुत्रका पालन-५८ पोषण करो । हे विशालनयने! यहाँ तुम्हें शत्रुओंसे उत्पन्न होनेवाला किसी प्रकारका भी भय नहीं करना चाहिये । तुम अपने इस कान्तिमान् पुत्रका पालन करो, तुम्हारा यह पुत्र आगे चलकर राजा होगा । यहाँ तुम ५ ९ लोगोंको कभी भी कोई दुःख तथा शोक नहीं होगा ॥ ५८-५९ ॥ व्यासजी बोले – मुनिके इस प्रकार कहनेपर महारानी मनोरमा निश्चिन्त हो गयीं और मुनिके द्वारा प्रदान की गयी एक कुटियामें वे शोकरहित ६० होकर निवास करने लगीं ॥ ६० ॥

इस प्रकार सुदर्शनका पालन - पोषण करती हुई वे मनोरमा अपनी दासी तथा मन्त्री विदल्लके साथ ६१ । वहाँ रहने लगीं ॥ ६१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे मनोरमया भारद्वाजाश्रमं प्रति गमनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

अथ षोडशोऽध्यायः युधाजित्का भारद्वाजमुनिके आश्रमपर आना और उनसे मनोरमाको भेजनेका आग्रह करना, प्रत्युत्तरमें मुनिका ' शक्ति हो तो ले जाओ ' – ऐसा कहना व्यास उवाच युधाजित्त्वथ संग्रामाद् गत्वायोध्यां महाबलः मनोरमां च पप्रच्छ सुदर्शनजिघांसया सेवकान् प्रेषयामास क्व गतेति मुहुर्वदन् शुभे दिनेऽथ दौहित्रं स्थापयामास चासने मन्त्रिभिश्च वसिष्ठेन मन्त्रैराथर्वणैः शुभैः अभिषिक्तश्च सम्पूर्णैः कलशैर्जलपूरितैः भेरीशङ्खनिनादैश्च तूर्याणां चाथ निःस्वनैः उत्सवस्तु नगर्यां वै सम्बभूव कुरूद्वह व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] तदनन्तर महाबली । युधाजित्ने रणभूमिसे अयोध्या पहुँचकर सुदर्शनको ॥ १ भी मार डालनेकी इच्छासे मनोरमाके विषयमें लोगोंसे पूछा ॥ १ ॥

' मनोरमा कहाँ चली गयी ' ऐसा बार - बार । कहते हुए उसने सेवकोंको इधर - उधर भेज दिया । ॥ २ तत्पश्चात् किसी शुभ दिनमें अपने दौहित्रको राजसिंहासन पर बैठा दिया ॥ २ ॥

समस्त मन्त्रियोंके साथ गुरु वसिष्ठने अथर्ववेद । कल्याणकारी मन्त्रोंका उच्चारण करके जलपूरित ॥ ३ समस्त कलशोंसे राजकुमार शत्रुजित्का अभिषेक किया ॥३ ॥

हे कुरुनन्दन! उस समय शंख, भेरीके निनादों । तथा तुरहियोंकी ध्वनियोंके साथ पूरे नगरमें ॥ ४ उत्सव मनाया गया ॥४ ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] —11B

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अ ० १६ ] विप्राणां वेदपाठैश्च बन्दिनां स्तुतिभिस्तथा अयोध्या मुदितेवासीज्जयशब्दैः सुमङ्गलैः हृष्टपुष्टजनाकीर्णा स्तुतिवादित्रनिःस्वना नवे तस्मिन्महीपाले पूर्बभौ नूतनेव सा केचित्साधुजना ये वै चक्रुः शोकं गृहे स्थिताः सुदर्शनं विचिन्त्याद्य क्व गतोऽसौ नृपात्मजः मनोरमातिसाध्वी सा क्व गता सुतसंयुता पितास्या निहतः संख्ये राज्यलोभेन वैरिणा इत्येवं चिन्त्यमानास्ते साधवः समबुद्धयः अतिष्ठन्दुःखितास्तत्र शत्रुजिद्वशवर्तिनः युधाजिदपि दौहित्रं स्थापयित्वा विधानतः राज्यञ्च मन्त्रिसात्कृत्वा चलितः स्वां पुरीं प्रति श्रुत्वा सुदर्शनं तत्र मुनीनामाश्रमे स्थितम् हन्तुकामो जगामाशु चित्रकूटं स पर्वतम् निषादाधिपतिं शूरं पुरस्कृत्य बलाभिधम् दुर्दर्शाख्यमगादाशु शृङ्गवेरपुराधिपम् ॥ श्रुत्वा मनोरमा तत्र बभूवातिसुदुःखिता आगच्छन्तं बालपुत्रा भयार्ता सैन्यसंयुतम् तमुवाचातिशोकार्ता मुनिं साश्रुविलोचना किं करोमि क्व गच्छामि युधाजित्समुपस्थितः पिता मे निहतोऽनेन दौहित्रो भूपतिः कृतः सुतं मे हन्तुकामोऽत्र समायाति बलान्वितः तृतीय स्कन्ध ३२३ । ब्राह्मणोंके वेदपाठों, बन्दीजनोंके स्तुतिगान ॥ ५ तथा मंगलकारी जयघोषसे अयोध्यानगरी प्रफुल्लित-सी दिखायी दे रही थी ॥ ५ ॥

हृष्ट - पुष्टजनोंसे भरी - पूरी और स्तुतियों तथा । वाद्योंकी ध्वनि निनादित वह अयोध्या उस नये ॥ ६ नरेशके अभिषिक्त होनेपर नवीन पुरीकी भाँति सुशोभित हो रही थी ॥६ ॥

। उस नगरीमें जो कोई भी सज्जनलोग थे, उन्होंने ॥ ७ अपने घरमें ही रहकर शोक मनाया । वे सुदर्शन विषयमें सोचते हुए कह रहे थे कि वह राजकुमार कहाँ चला गया? महान् पतिव्रता वह मनोरमा अपने । पुत्रके साथ कहाँ चली गयी? राज्यलोभी शत्रु ॥ ८ युधाजित्ने युद्धमें उसके पिताको मार डाला ॥ ७-८ ॥ ऐसा विचार करते हुए सबमें समान बुद्धि । रखनेवाले वे साधुजन शत्रुजित्के अधीन होकर दुःखी ॥ ९ मनसे रहने लगे ॥ ९ ॥

इस प्रकार युधाजित् भी विधानपूर्वक अपने । दौहित्रको राजसिंहासनपर बैठाकर तथा राज्यभार मन्त्रियोंको सौंपकर अपनी नगरीको प्रस्थान कर ॥ १० गया ॥ १० ॥

सुदर्शन मुनियोंके आश्रममें रह रहा है - ऐसा । सुनकर युधाजित् उसे मार डालनेकी इच्छासे तत्काल ॥ ११ ही चित्रकूट - पर्वतकी ओर चल पड़ा ॥११ ॥

वह दुर्दर्श नामक श्रृंगवेरपुरके राजाके यहाँ । पहुँचा और उस विशाल सेनासम्पन्न तथा पराक्रमी निषादराजको अगुआ बनाकर उसने शीघ्र ही आगेकी १२ ओर प्रस्थान किया ॥ १२ ॥

युधाजित्को सेनासहित आते हुए सुनकर अबोध । सन्तानवाली वह मनोरमा भयभीत तथा अत्यन्त ॥ १३ दुःखित हो गयी ॥ १३ ॥

अत्यन्त शोकसन्तप्त वह मनोरमा आँखोंमें आँसू | भरकर मुनि भारद्वाजसे बोली कि युधाजित् यहाँ भी आ पहुँचा; अब मैं क्या करूँ तथा कहाँ जाऊँ? ॥ १४ ॥

॥ १४ इसने मेरे पिताका वध कर दिया तथा अपने दौहित्रको राजा बना दिया । अब वह विशाल । सेनाके साथ मेरे पुत्रके वधकी कामनासे यहाँ आ ॥ १५ | रहा है ॥ १५ ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 11 C

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३२४

पुराश्रुतं मया स्वामिन् पाण्डवा वै वने स्थिताः ।

मुनीनामाश्रमे पुण्ये पाञ्चाल्या सहितास्तदा ॥

गतास्ते मृगयां पार्था भ्रातरः पञ्च एव ते । द्रौपदी संस्थिता तत्र मुनीनामाश्रमे शुभे धौम्योऽत्रिर्गालवः पैलो जाबालिर्गौतमो भृगुः । च्यवनश्चात्रिगोत्रश्च कण्वश्चैव जतुः क्रतुः वीतिहोत्र: सुमन्तुश्च यज्ञदत्तोऽथ वत्सलः । राशासनः कहोडश्च यवक्रीर्यज्ञकृत्क्रतुः एते चान्ये च मुनयो भारद्वाजादयः शुभाः । वेदपाठयुताः सर्वे संस्थिताश्चाश्रमे स्थिताः

दासीभिः सहिता तत्र याज्ञसेनी स्थिता मुने ।

आश्रमे चारुसर्वाङ्गी निर्भया मुनिसंवृते ॥

पार्था मृगानुगास्तावत्प्रयाताश्च वनाद्वनम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ हे स्वामिन्! मैंने सुना है कि पूर्वकालमें जब १६ मुनियोंके पवित्र आश्रममें द्रौपदीके साथ पाण्डव निवास कर रहे थे, उसी समय एक दिन वे पाँचों भाई आखेटके लिये चले गये और द्रौपदी वहीं पर मुनियोंके ॥ १७ उस पावन आश्रममें रह गयी थी ॥ १६-१७ ॥ धौम्य, अत्रि, गालव, पैल, जाबालि गौतम, भृगु, च्यवन, अत्रिगोत्रज कण्व, जतु, क्रतु, वीतिहोत्र, ॥ १८ सुमन्तु, यज्ञदत्त, वत्सल, राशासन, कहोड, यवक्री, यज्ञकृत् क्रतु- ये सब और भारद्वाज आदि अन्य

॥ १ ९ । पुण्यात्मा मुनिगण उस पावन आश्रममें विराजमान थे ।

वे सभी वेदपाठ कर रहे थे ॥ १८ - २० ॥

हे मुने! मुनि - समुदाय से सम्पन्न उस आश्रममें ॥ २० । सर्वांगसुन्दरी वह द्रौपदी अपनी दासियोंके साथ निर्भय होकर रहती थी ॥२१ ॥

शत्रुओंको सन्ताप पहुँचाने में समर्थ तथा धनुष-२१ बाण धारण किये वे पाँचों पाण्डव मृगका पीछा करते हुए एक वनसे दूसरे वनमें निकल गये ॥ २२ ॥

धनुर्बाणधरा वीराः पञ्च वै शत्रुतापनाः ॥ २२ इसी बीच समृद्धिशाली सिन्धुनरेश [ जयद्रथ ]

तावत्सिन्धुपतिः श्रीमान्मार्गस्थो बलसंयुतः ।

आगतश्चाश्रमाभ्याशे श्रुत्वा तु निगमध्वनिम् ॥

श्रुत्वा वेदध्वनिं राजा मुनीनां भावितात्मनाम् ।

उत्ततार रथात्तूर्णं दर्शनाकाङ्क्षया नृपः ॥

यदा निरगमत्तत्र भृत्यद्वयसमन्वितः ।

वेदपाठयुतान्वीक्ष्य मुनीनुद्यमसंस्थितः ॥

कृताञ्जलिपुटः स्वामिन्संस्थितोऽथ जयद्रथः ।

आश्रमे मुनिभिर्जुष्टे भूपतिः संविवेश ह ॥

तत्रोपविष्टं राजानं द्रष्टुकामाः स्त्रियस्तदा ।

आययुर्मुनिभार्याश्च कोऽयमित्यब्रुवन्नृपम् ॥

तासां मध्ये वरारोहा याज्ञसेनी समागता ।

जयद्रथेन दृष्टा सा रूपेण श्रीरिवापरा ॥

तां विलोक्यासितापाङ्गीं देवकन्यामिवापराम् ।

पप्रच्छ नृपतिर्धौम्यं केयं श्यामा वरानना ॥

1897 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ प्रथम खण्ड ] - 11D वेद - ध्वनि सुनकर अपनी सेनाके साथ आश्रमके पास आ गया ॥ २३ ॥

२३ वेदपाठ सुनकर राजा जयद्रथ पुण्यात्मा मुनियोंके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक रथसे उतरा ॥ २४ ॥

जब वह अपने दो भृत्योंके साथ आगे बढ़ा तो २४ मुनियोंको वेदपाठमें संलग्न देखकर वहीं पर बैठ गया । हे स्वामिन्! राजा जयद्रथ हाथ जोड़कर कुछ देरतक २५ बैठा रहा । इसके बाद वह मुनियोंसे भरे हुए उस आश्रममें प्रविष्ट हुआ ॥ २५-२६ ॥ तत्पश्चात् मुनियोंकी पत्नियाँ तथा अन्य स्त्रियाँ २६ वहाँ बैठे हुए राजा जयद्रथको देखनेकी इच्छासे वहाँ आ गयीं और लोगोंसे पूछने लगीं - यह कौन है? ॥। २७ ॥ उन्हीं स्त्रियोंके साथ परम सुन्दरी द्रौपदी भी २७ आयी थी । जयद्रथकी दृष्टि दूसरी लक्ष्मीके समान प्रतीत हो रही उस द्रौपदीपर पड़ गयी ॥ २८ ॥

२८ दूसरी देवकन्याकी भाँति प्रतीत हो रही उस श्याम नेत्रोंवाली द्रौपदीको देखकर राजा जयद्रथने ऋषि धौम्यसे पूछा कि यह सुन्दर मुखवाली युवती २ ९ | कौन है? ॥ २ ९ ॥

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अ ० १६ ]

भार्या कस्य सुता कस्य नाम्ना का वरवर्णिनी ।

रूपलावण्यसंयुक्ता शचीव वसुधाङ्गता ॥

बबूलवनमध्यस्था लवङ्गलतिका यथा ।

राक्षसीवृन्दगा नूनं रम्भेवाभाति भामिनी ॥

सत्यं वद महाभाग कस्येयं वल्लभाबला ।

राजपत्नीव चाभाति नैषा मुनिवधूर्द्विज ॥

धौम्य उवाच

पाण्डवानां प्रिया भार्या द्रौपदी शुभलक्षणा ।

पाञ्चाली सिन्धुराजेन्द्र वसत्यत्र वराश्रमे ॥

जयद्रथ उवाच

क्व गताः पाण्डवाः पञ्च शूराः सम्प्रति विश्रुताः ।

वसन्त्यत्र वने वीरा वीतशोका महाबलाः ॥

धौम्य उवाच मृगयार्थं गताः पञ्च पाण्डवा रथसंस्थिताः । आगमिष्यन्ति मध्याह्ने मृगानादाय पार्थिवा:

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य उदतिष्ठदसौ नृपः ।

द्रौपदीसन्निधौ गत्वा प्रणम्येदमुवाच ह ॥

कुशलं ते वरारोहे क्व गताः पतयश्च ते । एकादश गतान्यद्य वर्षाणि च वने किल द्रौपदी तु तदोवाच स्वस्ति तेऽस्तु नृपात्मज विश्रमस्वाश्रमाभ्याशे क्षणादायान्ति पाण्डवाः एवं ब्रुवन्त्यां तस्यां तु लोभाविष्टः स भूपतिः । जहार द्रौपदीं वीरोऽनादृत्य मुनिसत्तमान् तृतीय स्कन्ध ३२५ यह किसकी पत्नी है, किसकी पुत्री है और इस ३० परम सुन्दरीका नाम क्या है? रूप तथा सौन्दर्यसे सम्पन्न यह स्त्री तो धरापर उतरकर आयी हुई साक्षात् इन्द्राणीकी भाँति प्रतीत हो रही है ॥ ३० ॥

यह स्त्री बबूलके वनमें स्थित लवंगलता ३१ तथा [ कुरूपा ] राक्षसियोंके समूहमें सचमुच रम्भाके समान प्रतीत हो रही है ॥ ३१ ॥

हे महाभाग! आप सच - सच बताइये कि यह ३२ स्त्री किसकी पत्नी है? हे द्विज! यह तो किसी रानी - जैसी प्रतीत हो रही है; मुनिपत्नी तो यह कदापि नहीं हो सकती ॥ ३२ ॥

धौम्य बोले – - हे सिन्धुराजेन्द्र! समस्त शुभ लक्षणोंवाली यह पाण्डवोंकी प्रिय भार्या तथा ३३ पांचालनरेशकी पुत्री द्रौपदी है । यह इसी पवित्र आश्रममें निवास करती है ॥ ३३ ॥

जयद्रथ बोला - विख्यात पराक्रमी पाँचों पाण्डव कहाँ गये हुए हैं? क्या वे महान् बलशाली ३४ वीर निश्चिन्त होकर इस समय इसी वनमें रह रहे हैं? ॥ ३४ ॥

धौम्य बोले – पाँचों पाण्डव इस समय रथपर आरूढ़ होकर आखेटके लिये वनमें गये हुए हैं । वे राजागण मध्याह्नकालमें मृगोंको लेकर ॥ ३५ आ जायँगे ॥ ३५ ॥

मुनिका यह वचन सुनकर वह राजा जयद्रथ अपने आसनसे उठा और द्रौपदीके पास जाकर उन्हें ३६ प्रणाम करके इस प्रकार बोला- हे परम सुन्दरि! आप सकुशल तो हैं न, आपके पतिगण कहाँ गये हुए हैं? आपको वनमें निवास करते हुए आज ग्यारह वर्ष बीत ॥ ३७ चुके हैं ॥ ३६-३७ ॥ तत्पश्चात् द्रौपदीने कहा - हे राजकुमार! । आपका कल्याण हो । अभी थोड़ी ही देरमें पाण्डव आ जायँगे, तबतक आप आश्रमके समीप ही विश्राम ॥ ३८ कीजिये ॥ ३८ ॥

उसके ऐसा कहने पर लोभसे आक्रान्त उस वीर जयद्रथने मुनिवरोंकी अवहेलना करके द्रौपदीका ॥ ३ ९ । हरण कर लिया ॥ ३ ९ ॥

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३२६ कस्यचिन्नैव विश्वासः कर्तव्यः सर्वथा बुधैः कुर्वन्दुःखमवाप्नोति दृष्टान्तस्त्वत्र वै बलिः वैरोचनसुतः श्रीमान्धर्मिष्ठः सत्यसङ्गरः यज्ञकर्ता च दाता च शरण्यः साधुसम्मतः नाधर्मे निरतः क्वापि प्रह्लादस्य च पौत्रकः एकोनशतयज्ञान्वै स चकार सदक्षिणान् सत्त्वमूर्तिः सदा विष्णुः सेव्यः स योगिनामपि निर्विकारोऽपि भगवान्देवकार्यार्थसिद्धये ॥ कश्यपाच्च समुद्भूतो विष्णुः कपटवामनः राज्यं छलेन हृतवान्महीं चैव ससागराम् सोऽभवत्सत्यवाग्राजा बलिर्वैरोचनिस्तदा कपटं कृतवान्विष्णुरिन्द्रार्थे तु मया श्रुतम् अन्यः किं न करोत्येवं कृतं वै सत्त्वमूर्तिना वामनं रूपमास्थाय यज्ञपातं चिकीर्षता न च विश्वसितव्यं वै कदाचित्केनचित्तथा लोभश्चेतसि चेत्स्वामिन्कीदृक्पापकृतं भयम् लोभाहताः प्रकुर्वन्ति पापानि प्राणिनः किल । परलोकाद्भयं नास्ति कस्यचित्कर्हिचिन्मुने मनसा कर्मणा वाचा परस्वादानहेतुतः प्रपतन्ति नराः सम्यग्लोभोपहतचेतसः देवानाराध्य सततं वाञ्छन्ति च धनं नराः न देवास्तत्करे कृत्वा समर्था दातुमञ्जसा श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ । [ मनोरमाने कहा – हे स्वामिन्! ] अतएत्र ॥ ४० बुद्धिमान् लोगोंको चाहिये कि वे किसीपर भी विश्वास न करें, ऐसा करनेवाला व्यक्ति दुःख प्राप्त करता है । इस विषयमें राजा बलि उदाहरण । हैं । विरोचनपुत्र राजा बलि वैभवसम्पन्न, धर्मपरायण. ॥ ४१ सत्यप्रतिज्ञ, यज्ञकर्ता, दानी, शरणदाता तथा साधुजनोंके सम्मान्य थे॥४०-४१ ॥ । प्रह्लादके पौत्र वे राजा बलि कभी अधर्मका ॥ ४२ आचरण नहीं करते थे । उन्होंने दक्षिणायुक्त निन्यानवे यज्ञ किये थे, फिर भी सत्त्वगुणकी साक्षात् मूर्ति. । योगियोंद्वारा सदा आराधित तथा विकारोंसे रहित ४३ भगवान् विष्णु भी देवताओंका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये कश्यपसे उत्पन्न हुए और उन्होंने वामनका कपटवेष धारण करके छलपूर्वक उनका राज्य तथा । सागरसमेत पृथ्वी ले ली ॥४२–४४ ॥ ॥ ४४ विरोचनके पुत्र बलि एक सत्यवादी राजा थे मैंने तो ऐसा सुना है कि भगवान् विष्णुने इन्द्रके लिये । ही यह कपट किया था ॥ ४५ ॥

॥ ४५ जब साक्षात् सत्त्वकी मूर्ति भगवान् विष्णुने बलिका यज्ञ ध्वंस करनेकी कामनासे वामनरूप धारण । करके ऐसा किया, तब अन्य लोग क्यों नहीं करेंगे? ॥ ४६ ॥

॥ ४६ अतएव हे स्वामिन्! किसीपर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि यदि चित्तमें लोभ रहता । है तो पाप करनेमें किसी भी प्रकारका डर ही ॥ ४७ क्या? ॥ ४७ ॥

हे मुने! लोभके वशीभूत प्राणी सभी प्रकारके पाप कर बैठते हैं । उस समय किसीको परलोकका ॥ ४८ किंचिन्मात्र भी भय नहीं रहता ॥ ४८ ॥

लोभसे नष्ट हुए चित्तवाले प्राणी दूसरोंका धन । हड़पनेके लिये मन, वचन तथा कर्मसे सम्यक् तत्पर रहते हैं ॥४ ९ ॥ ॥ ४ ९ देवताओंकी निरन्तर आराधना करके मनुष्य उनसे धनकी कामना करते हैं । यह निश्चित है कि । वे देवता अपने हाथोंसे धन उठाकर उन्हें देनेमें पूरी ॥ ५० । तरहसे समर्थ नहीं हैं ॥ ५० ॥

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अ ० १६ ]

अन्यस्यानीयते वित्तं प्रयच्छन्ति मनीषितम् ।

वाणिज्येनाथ दानेन चौर्येणापि बलेन वा ॥

विक्रयार्थं गृहीत्वा च धान्यवस्त्रादिकं बहु ।

देवानर्चयते वैश्यो महर्द्धिर्मे भवेदिति ॥

नात्र किं परवित्तेच्छा वाणिज्येन परन्तप ।

ग्रहणकाले तु सम्प्राप्ते महर्घञ्चापि काङ्क्षति ॥

एवं हि प्राणिनः सर्वे परस्वादानतत्पराः ।

वर्तन्ते सततं ब्रह्मन् विश्वासः कीदृशः पुनः ॥

वृथा तीर्थं वृथा दानं वृथाध्ययनमेव च ।

लोभमोहावृतानां वै कृतं तदकृतं भवेत् ॥

तस्मादेनं महाभाग विसर्जय गृहं प्रति ।

सपुत्राहं वसिष्यामि जानकीवद् द्विजोत्तम ॥

इत्युक्तोऽसौ मुनिस्तावद् गत्वा युधाजितं नृपम् ।

उवाच वचनं राज्ञे भारद्वाजः प्रतापवान् ॥

गच्छ राजन् यथाकामं स्वपुरं नृपसत्तम ।

नेयं मनोरमाभ्येति बालपुत्रा सुदुःखिता ॥

युधाजिदुवाच मुने मुञ्च हठं सौम्य विसर्जय मनोरमाम् । न च यास्याम्यहं मुक्त्वा नेष्याम्यद्य बलात्पुनः ऋषिरुवाच

नयस्व यदि शक्तिस्ते बलेनाद्य ममाश्रमात् ।

विश्वामित्रो यथा धेनुं वसिष्ठस्य मुनेः पुरा ॥

तृतीय स्कन्ध ३२७ किंतु व्यवसाय, दान, चोरी अथवा बलपूर्वक ५१ लूट आदि किसी भी माध्यमसे मनुष्यका अभिलषित धन [ उन देवताओंके द्वारा ] दूसरेके पाससे ला करके उन्हें दे दिया जाता है ॥५१ ॥

५२ विक्रय करनेके लिये पर्याप्त धान्य तथा वस्त्र आदिका संग्रह करके वैश्य इस भावनासे देवताओंकी पूजा करता है कि ' मेरे पास विपुल धन हो जाय । ' हे परन्तप! क्या इस व्यापारके द्वारा दूसरोंका धन ५३ ग्रहण करनेकी उन्हें इच्छा नहीं होती? वस्तुका संग्रह करनेके बादसे ही वह भाव महँगा होनेकी इच्छा करने लगता है ॥ ५२-५३ ॥ ५४ हे ब्रह्मन्! इस प्रकार सभी प्राणी दूसरोंका धन ले लेनेके लिये निरन्तर तत्पर रहते हैं तो फिर विश्वास कैसा? ॥ ५४ ॥

५५ लोभ तथा मोहसे घिरे हुए लोगोंका तीर्थ, दान, अध्ययन - सब व्यर्थ हो जाता है; उनका किया हुआ वह सारा कर्म न करनेके समान हो जाता है ॥ ५५ ॥

५६ अतः हे महाभाग! इस युधाजित्को घर लौटा दीजिये । हे द्विजोत्तम! जानकीकी भाँति मैं अपने पुत्रके साथ यहीं निवास करूँगी ॥५६ ॥

५७ मनोरमाके ऐसा कहनेपर तेजस्वी भारद्वाजमुनि राजा युधाजित्के पास जाकर उनसे बोले - हे राजन्! हे नृपश्रेष्ठ! अपने इच्छानुसार आप अपने नगरको ५८ चले जायँ । छोटे बालकवाली यह मनोरमा बड़ी दु: खी है; वह नहीं आ रही है ॥ ५७-५८ ॥ युधाजित् बोला - हे सौम्य मुने! आप हठ छोड़ दीजिये और मनोरमाको विदा कीजिये, इसे छोड़कर मैं नहीं जाऊँगा, [ यदि आप नहीं मानेंगे तो ] ॥ ५ ९ मैं इसे अभी बलपूर्वक ले जाऊँगा ॥५ ९ ॥ ऋषि बोले- जैसे प्राचीन कालमें विश्वामित्र वसिष्ठमुनिकी गौ ले जानेके लिये उद्यत हुए थे, उसी प्रकार यदि आपमें शक्ति हो तो आज मेरे आश्रमसे ६० । इसे बलपूर्वक ले जाइये ॥ ६० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे युधाजिद्भारद्वाजयोः संवादवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

पृष्ठ 337

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३२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ अथ सप्तदशोऽध्यायः युधाजित्का अपने प्रधान अमात्यसे परामर्श करना, प्रधान अमात्यका इस सन्दर्भमें वसिष्ठ - विश्वामित्र - प्रसंग सुनाना और परामर्श मानकर युधाजित्का वापस लौट जाना, बालक सुदर्शनको दैवयोगसे कामराज नामक बीजमन्त्रकी प्राप्ति, भगवतीकी आराधनासे सुदर्शनको उनका प्रत्यक्ष दर्शन होना तथा काशिराजकी कन्या शशिकलाको स्वप्न में भगवतीद्वारा सुदर्शनका वरण करनेका आदेश देना व्यास उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनेस्तत्रावनीपतिः ।

मन्त्रिवृद्धं समाहूय पप्रच्छ तमतन्द्रितः ॥

किं कर्तव्यं सुबुद्धेऽत्र मयाद्य वद सुव्रत ।

बलान्नयामि तां कामं सपुत्राञ्च सुभाषिणीम् ॥

रिपुरल्पोऽपि नोपेक्ष्यः सर्वथा शुभमिच्छता ।

राजयक्ष्मेव संवृद्धो मृत्यवे परिकल्पयेत् ॥

नात्र सैन्यं न योद्धास्ति यो मामत्र निवारयेत् ।

गृहीत्वा हन्मि तं तत्र दौहित्रस्य रिपुं किल ॥

निष्कण्टकं भवेद्राज्यं यताम्यद्य बलादहम् ।

हते सुदर्शने नूनं निर्भयोऽसौ भवेदिति ॥

प्रधान उवाच

साहसं न हि कर्तव्यं श्रुतं राजन् मुनेर्वचः ।

विश्वामित्रस्य दृष्टान्तः कथितस्तेन मारिष ॥

पुरा गाधिसुतः श्रीमान्विश्वामित्रो ऽतिविश्रुतः ।

विचरन्स नृपश्रेष्ठो वसिष्ठाश्रममभ्यगात् ॥

नमस्कृत्य च तं राजा विश्वामित्रः प्रतापवान् ।

उपविष्टो नृपश्रेष्ठो मुनिना दत्तविष्टरः ॥

निमन्त्रितो वसिष्ठेन भोजनाय महात्मना ।

ससैन्यश्च स्थितो राजा गाधिपुत्रो महायशाः ॥

व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] भारद्वाजमुनिका यह वचन सुनकर राजा युधाजित्ने अपने प्रधान १ अमात्यको बुलाकर बड़ी सावधानीसे उनसे पूछा— हे सुबुद्धे! आप बतायें कि अब मुझे क्या करना चाहिये? हे सुव्रत! क्या मधुर वचन बोलनेवाली २ मनोरमाको पुत्रसहित बलपूर्वक ले चलूँ? अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह तुच्छ शत्रुकी भी उपेक्षा न करे; क्योंकि वह राजयक्ष्मा रोगके ३ समान बढ़कर मृत्युका कारण बन जाता है ॥ १–३ ॥ यहाँ न कोई सेना है और न कोई योद्धा ही है जो मुझे रोक सके । अतः मैं अपने दौहित्रके शत्रु उस ४ सुदर्शनको पकड़कर अभी मार डालूँगा । यदि मैं बलपूर्वक इस प्रयत्नमें सफल हो जाता हूँ तो उसका राज्य निष्कंटक हो जायगा । सुदर्शनके मर जानेपर ५ निश्चय ही वह निर्भय हो जायगा ॥ ४-५ ॥ प्रधान अमात्यने कहा- हे राजन्! ऐसा दुःसाहस नहीं करना चाहिये । अभी आपने भारद्वाजमुनिका वचन सुना ही है । हे मान्य! उन्होंने [ इस सम्बन्धमें ] ६ विश्वामित्रका दृष्टान्त दिया है ॥ ६ ॥

प्राचीन समय में गाधितनय विश्वामित्र एक समृद्धिशाली तथा प्रसिद्ध राजा थे । एक बार वे ७ महाराज घूमते हुए महर्षि वसिष्ठके आश्रममें जा पहुँचे ॥७ ॥

प्रतापी राजाओंमें श्रेष्ठ वे महाराज विश्वामित्र ८ उन्हें प्रणाम करके मुनिद्वारा प्रदत्त आसनपर बैठ गये । उसके बाद महात्मा वसिष्ठजीने उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया, तब वे महायशस्वी गाधिपुत्र विश्वामित्र ९ अपने सैनिकों सहित उपस्थित हो गये ॥८ - ९ ॥

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अ ० १७ ] तृतीय स्कन्ध ३२ ९

नन्दिन्यासादितं सर्वं भक्ष्यभोज्यादिकं च यत् ।

भुक्त्वा राजा ससैन्यश्च वाञ्छितं तत्र भोजनम् ॥

प्रतापं तञ्च नन्दिन्याः परिज्ञाय स पार्थिवः ।

ययाचे नन्दिनीं राजा वसिष्ठं मुनिसत्तमम् ॥

विश्वामित्र उवाच

मुने धेनुसहस्त्रं ते घटोध्नीनां ददाम्यहम् ।

नन्दिनीं देहि मे धेनुं प्रार्थयामि परन्तप ॥

वसिष्ठ उवाच

होमधेनुरियं राजन्न ददामि कथञ्चन ।

सहस्त्रञ्चापि धेनूनां तवेदं तव तिष्ठतु ॥

विश्वामित्र उवाच

अयुतं वाथ लक्ष्यं वा ददामि मनसेप्सितम् ।

देहि मे नन्दिनीं साधो ग्रहीष्यामि बलादथ ॥

वसिष्ठ उवाच

कामं गृहाण नृपते बलादद्य यथारुचि ।

नाहं ददामि ते राजन्स्वेच्छया नन्दिनीं गृहात् ॥

तच्छ्रुत्वा नृपतिर्भृत्यानादिदेश महाबलान् ।

नयध्वं नन्दिनीं धेनुं बलदर्पसुसंस्थिताः ॥

ते भृत्या जगृहुस्तां तु हठादाक्रम्य यन्त्रिताम् ।

वेपमाना मुनिं प्राह सुरभिः साश्रुलोचना ॥

मुनेत्यजसि मां कस्मात्कर्षयन्ति सुयन्त्रिताम् । मुनिस्तां प्रत्युवाचेदं त्यजे नाहं सुदुग्धदे

बलान्नयति राजासौ पूजितोऽद्य मया शुभे ।

किं करोमि न चेच्छामि त्यक्तुं त्वां मनसा किल ॥

उस समय भक्ष्य तथा भोज्य आदि जो भी १० आवश्यक हुआ, वह सब उनकी नन्दिनी गौने उपस्थित कर दिया । सेनासमेत राजा विश्वामित्र मनोवांछित भोजन करके इसे नन्दिनी गौका प्रभाव समझकर वे राजा उन मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीसे नन्दिनी ११ गौ माँगने लगे ॥१०-११ ॥ विश्वामित्र बोले – हे मुने! मैं आपको पर्याप्त दूध देनेवाली हजारों गौएँ दूँगा; आप मुझे यह अपनी नन्दिनी गौ दे दीजिये | हे परन्तप! मैं यही १२ प्रार्थना कर रहा हूँ ॥ १२ ॥

वसिष्ठ बोले – हे राजन्! यह गौ होमके लिये हविष्य प्रदान करती है । अतः मैं इसे किसी प्रकार भी नहीं दे सकता । आपकी हजार गौएँ आपके ही पास रहें ॥१३ ॥

१३ विश्वामित्र बोले- हे साधो! मैं आपकी इच्छाके अनुसार दस हजार अथवा एक लाख गौएँ दे रहा हूँ, आप नन्दिनी मुझे दे दीजिये, नहीं तो मैं इसे बलपूर्वक ग्रहण कर लूँगा ॥१४ ॥

१४ वसिष्ठ बोले – हे नृपते! जैसी आपकी रुचि हो, आप इसे बलपूर्वक अभी ले लीजिये, किंतु हे राजन्! मैं तो इस नन्दिनीको स्वेच्छासे अपने आश्रमसे आपको नहीं दूँगा ॥ १५ ॥

१५ यह सुनकर राजा विश्वामित्रने अपने महाबली अनुचरोंको आदेश दिया कि तुमलोग इस नन्दिनी गौको ले चलो । तब बलके अभिमानमें चूर उन अनुचरोंने आक्रमण करके उस धेनुको बलपूर्वक बाँधकर पकड़ १६ लिया ॥ १६३ ॥

तब आँखोंमें आँसू भरकर काँपती हुई उस नन्दिनीने मुनिसे कहा - हे मुने! आप मुझे १७ क्यों त्याग रहे हैं? ये सब मुझे बाँधकर खींच रहे हैं ॥१७३ ॥

वसिष्ठजीने उससे कहा- हे उत्तम दूध देनेवाली ॥ १८ । नन्दिनी! मैं तुम्हें त्याग नहीं रहा हूँ । ये राजा तुम्हें बलपूर्वक ले जा रहे हैं; जबकि मैंने अभी इनका स्वागत किया है । हे शुभे! मैं क्या करूँ? मैं अपने १ ९ । मनसे तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता ॥ १८-१९ ॥

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३३० इत्युक्ता मुनिना धेनुः क्रोधयुक्ता बभूव ह हम्भारवं चकाराशु क्रूरशब्दं सुदारुणम् उद्गतास्तत्र देहात्तु दैत्या घोरतरास्तदा सायुधास्तिष्ठ तिष्ठेति ब्रुवन्तः कवचावृताः सैन्यं सर्वं हतं तैस्तु नन्दिनी प्रतिमोचिता । एकाकी निर्गतो राजा विश्वामित्रो ऽतिदुःखितः

हन्त पापो ऽतिदीनात्मा निन्दन् क्षात्रबलं महत् ।

ब्राह्मं बलं दुराराध्यं मत्वा तपसि संस्थितः ॥

तप्त्वा बहूनि वर्षाणि तपो घोरं महावने ।

ऋषित्वं प्राप गाधेयस्त्यक्त्वा क्षात्रं विधिं पुनः ॥

तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मा कृथा वैरमद्भुतम् ।

कुलनाशकरं नूनं तापसैः सह संयुगम् ॥

मुनिवर्यं व्रजाद्य त्वं समाश्वास्य तपोनिधिम् ।

सुदर्शनोऽपि राजेन्द्र तिष्ठत्वत्र यथासुखम् ॥

बालोऽयं निर्धनः किं ते करिष्यति नृपाहितम् ।

वृथा ते वैरभावोऽयमनाथे दुर्बले शिशौ ॥

दया सर्वत्र कर्तव्या दैवाधीनमिदं जगत् ।

ईर्ष्यया किं नृपश्रेष्ठ यद्भाव्यं तद्भविष्यति ॥

वज्रं तृणायते राजन् दैवयोगान्न संशयः ।

तृणं वज्रायते क्वापि समये दैवयोगतः ॥

शशको हन्ति शार्दूलं मशको वै तथा गजम् ।

साहसं मुञ्च मेधाविन् कुरु मे वचनं हितम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ । मुनिके ऐसा कहनेपर वह धेनु क्रोधित हो गयी ॥ २० और कर्कश शब्दोंवाला अत्यन्त भयंकर हम्भारव करने लगी ॥२० ॥

। उसी समय उसके शरीरसे महाभयंकर दैत्य ' ठहरो - ठहरो ' – ऐसा कहते हुए निकल पड़े । वे ॥ २१ शस्त्र धारण किये हुए थे और उनका शरीर कवचसे ढँका हुआ था ॥२१ ॥

उन्होंने सारी सेनाका संहार कर दिया और ॥ २२ नन्दिनीको उनसे छुड़ा लिया । तब अत्यन्त व्यथित होकर राजा विश्वामित्र अकेले ही घर लौट गये । [ वे अपने मनमें सोचने लगे - ] हाय! मैं कितना पापी २३ एवं दीनात्मा हूँ । क्षत्रियबलकी निन्दा करते हुए वे विश्वामित्र ब्राह्मणके बलको महान् तथा दुराराध्य समझकर तप करने लगे । महावनमें अनेक वर्षोंतक कठोर तपस्या करके विश्वामित्रने क्षात्रधर्मका त्याग २४ । करके अन्तमें ऋषित्व प्राप्त कर लिया ॥ २२ - २४ ॥ अतः हे राजेन्द्र! आप भी ऐसा अद्भुत वैर न करें; क्योंकि तपस्वियोंके साथ किया जानेवाला युद्ध २५ निश्चित ही कुलका नाश करनेवाला होता है ॥ २५ ॥

अतः आप तपोनिधि मुनिवर भारद्वाजके पास अभी जाइये और उन्हें आश्वासन दीजिये । हे २६ राजेन्द्र! सुदर्शनको यहीं छोड़ दीजिये, जिससे वह आनन्दपूर्वक रह सके ॥ २६ ॥

हे राजन्! यह दीन बालक आपका क्या अहित कर सकेगा? ऐसे दुर्बल एवं अनाथ बालकके २७ प्रति आपका यह वैरभाव व्यर्थ है ॥२७ ॥

हे नृपश्रेष्ठ! सर्वत्र दया करनी चाहिये । यह संसार सदा दैवके अधीन रहता है । ईर्ष्या २८ करनेसे क्या लाभ? जो होनी होगी, वह तो होकर ही रहेगी ॥२८ ॥

हे राजन्! दैवयोगसे कभी वज्र तृण बन २ ९ जाता है और किसी समय तृण वज्र बन जाता है; इसमें सन्देह नहीं है । दैवयोगसे ही खरगोश सिंहको और मच्छर हाथीको मार देता है । अत: हे मेधाविन्! आप दुःसाहस छोड़िये तथा मेरा हितकर वचन ३० | मानिये ॥ २ ९ -३० ॥

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अ ० १७ ] तृतीय स्कन्ध ३३१ व्यास उवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य युधाजिन्नृपसत्तमः ।

प्रणम्य तं मुनिं मूर्ध्ना जगाम स्वपुरं नृपः ॥

मनोरमापि स्वस्थाभूदाश्रमे तत्र संस्थिता ।

पालयामास पुत्रं तं सुदर्शनमृतव्रतम् ॥

दिने दिने कुमारोऽसौ जगामोपचयं ततः ।

मुनिबालगतः क्रीडन्निर्भयः सर्वतः शुभः ॥

एकस्मिन्समये तत्र विदल्लं समुपागतम् ।

क्लीबे मुनिपुत्रस्तमामन्त्रयत्तदन्तिके ॥

सुदर्शनस्तु तच्छ्रुत्वा दधारैकाक्षरं स्फुटम् ।

अनुस्वारायुतं तच्च प्रोवाचापि पुनः पुनः ॥

बीजं वै कामराजाख्यं गृहीतं मनसा तदा ।

जजाप बालकोऽत्यर्थं धृत्वा चेतसि सादरम् ॥

भावियोगान्महाराज कामराजाख्यमद्भुतम् ।

स्वभावेनैव तेनेत्थं गृहीतं बालकेन वै ॥

तदासौ पञ्चमे वर्षे प्राप्य मन्त्रमनुत्तमम् ।

ऋषिच्छन्दोविहीनञ्च ध्यानन्यासविवर्जितम् ॥

प्रजपन्मनसा नित्यं क्रीडत्यपि स्वपित्यपि ।

विसस्मार न तं मन्त्रं ज्ञात्वा सारमिति स्वयम् ॥

वर्षे चैकादशे प्राप्ते कुमारोऽसौ नृपात्मजः ।

मुनिना चोपनीतोऽथ वेदमध्यापितस्तथा ॥

धनुर्वेदं तथा साङ्गं नीतिशास्त्रं विधानतः । अभ्यस्ताः सकला विद्यास्तेन मन्त्रबलादिव कदाचित्सोऽपि प्रत्यक्षं देवीरूपं ददर्श ह रक्ताम्बरं रक्तवर्णं रक्तसर्वाङ्गभूषणम् व्यासजी बोले - [ हे जनमेजय! ] मन्त्रीकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ राजा युधाजित् भारद्वाजमुनिको ३१ । सिर झुकाकर प्रणाम करके अपने पुरको चले गये । तब रानी मनोरमा भी निश्चिन्त हो गयीं और उस आश्रममें रहती हुई अपने सत्यव्रती पुत्र सुदर्शनका ३२ पालन करने लगीं ॥३१-३२ ॥ अब वह सुन्दर कुमार मुनिबालकोंके साथ सर्वत्र निर्भय होकर क्रीड़ा करता हुआ दिनोंदिन ३३ बढ़ने लगा । एक दिन सुदर्शनके पास आये हुए विदल्लको किसी मुनिकुमारने ' क्लीब ' इस नामसे पुकारा ॥ ३३-३४ ॥ ३४ उसे सुनकर सुदर्शनने उसके एकाक्षर ' क्ली ' शब्दको स्पष्टरूपसे धारण कर लिया और उस अनुस्वारविहीन अक्षरका ही वह बार - बार उच्चारण ३५ करने लगा ॥ ३५ ॥

बालकने इस कामराज नामक बीजमन्त्रको मनसे ग्रहण कर लिया और उसे हृदयंगम करके आदरपूर्वक ३६ जपना प्रारम्भ कर दिया । हे महाराज! दैवयोगसे ही उस बालक सुदर्शनको यह कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र स्वयमेव प्राप्त हो गया ॥ ३६-३७ ॥ ३७ उस समय केवल पाँच वर्षकी अवस्थामें ही वह ऋषि तथा छन्दसे विहीन और ध्यान तथा न्यासरहित मन्त्र प्राप्तकर मन ही मन उसे जपता ३८ हुआ खेलता तथा सोता था; उस मन्त्रको स्वयं सबका सार समझकर वह सुदर्शन उसे कभी नहीं भूलता ३ ९ था ॥ ३८-३९ ॥ मुनिने ग्यारहवें वर्षमें उस राजकुमारका उपनयन संस्कार किया और उसे वेद पढ़ाया एवं सांगोपांग ४० धनुर्वेद तथा नीतिशास्त्रकी विधिवत् शिक्षा दी । उस बालकने उसी मन्त्रके प्रभावसे समस्त विद्याओंका सम्यक् अभ्यास कर लिया ॥ ४०-४१ ॥ ॥ ४१ एक बार उसने देवीके रूपका प्रत्यक्ष दर्शन भी किया । उस समय वे लाल वस्त्र धारण किये । थीं, उनके विग्रहका रंग भी लाल था और उनके ॥ ४२ । सभी अंगोंमें रक्तवर्णके ही आभूषण सुशोभित हो रहे