देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 341–350
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350
पृष्ठ 341
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३३२ गरुडे वाहने संस्थां वैष्णवीं शक्तिमद्भुताम् दृष्ट्वा प्रसन्नवदनः स बभूव नृपात्मजः वने तस्मिन्स्थितः सोऽथ सर्वविद्यार्थतत्त्ववित् मातरं सेवमानस्तु विजहार नदीतटे
शरासनञ्च सम्प्राप्तं विशिखाश्च शिलाशिताः ।
तूणीरकवचं तस्मै दत्तं चाम्बिकया वने ॥
एतस्मिन्समये पुत्री काशिराजस्य सुप्रिया ।
नाम्ना शशिकला दिव्या सर्वलक्षणसंयुता ॥
शुश्राव नृपपुत्रं तं वनस्थञ्च सुदर्शनम् ।
सर्वलक्षणसम्पन्नं शूरं काममिवापरम् ॥
बन्दीजनमुखाच्छ्रुत्वा राजपुत्रं सुसम्मतम् ।
चकमे मनसा तं वै वरं वरयितुं धिया ॥
स्वप्ने तस्याः समागम्य जगदम्बा निशान्तरे ।
उवाच वचनं चेदं समाश्वास्य सुसंस्थिता ॥
वरं वरय सुश्रोणि मम भक्तः सुदर्शनः ।
सर्वकामप्रदस्तेऽस्तु वचनान्मम भामिनि ॥
एवं शशिकला दृष्ट्वा स्वप्ने रूपं मनोहरम् ।
अम्बाया वचनं स्मृत्वा जहर्ष भृशमानिनी ॥
उत्थिता सा मुदा युक्ता पृष्टा मात्रा पुनः पुनः ।
प्रमोदे कारणं बाला नोवाचातित्रपान्विता ॥
जहास मुदमापन्ना स्मृत्वा स्वप्नं मुहुर्मुहुः ।
सखीं प्राह तदान्यां वै स्वप्नवृत्तं सुविस्तरम् ॥
कदाचित्सा विहारार्थमवापोपवनं शुभम् ।
सखीयुक्ता विशालाक्षी चम्पकैरुपशोभितम् ॥
पुष्पाणि चिन्वती बाला चम्पकाधः स्थिताबला । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ । थे । [ इस प्रकारका दिव्य स्वरूप धारणकर ] वाहन ॥ ४३ गरुडपर विराजमान उन अद्भुत वैष्णवी शक्तिको देखकर राजकुमार सुदर्शनके मुखमण्डलपर प्रसन्नता । छा गयी ॥ ४२-४३ ॥ ॥ ४४ इस प्रकार समस्त विद्याओंका रहस्य जाननेवाला वह सुदर्शन उस वनमें रहकर जगदम्बाकी उपासना करता हुआ नदीतटपर विचरण करने लगा । उसी ४५ वनमें भगवती जगदम्बाने उसे धनुष, अनेक तीक्ष्ण बाण, तूणीर तथा कवच प्रदान किये ॥ ४४-४५ ॥ इसी समय सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त ' शशिकला ' नामसे विख्यात काशिराजकी परम प्रिय पुत्रीने उस ४६ वनमें रहनेवाले समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, पराक्रमी तथा दूसरे कामदेवके समान प्रतीत होनेवाले राजकुमार सुदर्शनके विषयमें सुना ॥ ४६-४७ ॥ ४७ बन्दीजनोंके मुखसे अतिसम्मानित राजकुमारके विषयमें सुनकर शशिकलाने मन - ही - मन बुद्धिपूर्वक उसे पतिरूपमें वरण करनेका निश्चय कर लिया ॥ ४८ ॥
४८ [ उसी दिन ] आधी रातको जगदम्बा स्वप्नमें शशिकलाके पास आकर स्थित हो गयीं और उसे आश्वस्त करके यह वचन बोलीं- ' हे सुश्रोणि! ४ ९ सुदर्शन मेरा भक्त है, तुम उसीको अपना पति स्वीकार कर लो । । हे भामिनि! मेरी आज्ञासे वह तुम्हारी सब कामनाएँ पूर्ण करेगा ' ॥ ४ ९ -५० ॥ ५० इस प्रकार स्वप्नमें भगवतीका मनोहर स्वरूप देखकर तथा उनके इस वचनको स्मरण करके परम मानिनी शशिकला प्रसन्न हो गयी ॥ ५१ ॥
५१ वह प्रसन्नताके साथ उठ गयी । उसकी माताने उसे हर्षित देखकर बार - बार प्रसन्नताका कारण पूछा, किंतु उस सुन्दरीने अति लज्जाके कारण कुछ नहीं ५२ बताया ॥ ५२ ॥
स्वप्नका बार - बार स्मरण करके प्रसन्नतासे युक्त होकर वह जोरसे हँस पड़ती थी । तब उसने ५३ अपनी एक अन्य सखीसे स्वप्नका सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक कह दिया ॥ ५३ ॥
किसी दिन वह विशालनयनी शशिकला अपनी ५४ सखीके साथ चम्पाके वृक्षोंसे सुशोभित एक सुन्दर उपवनमें विहारके लिये गयी । वहाँ पुष्प चुनती हुई वह कुमारी एक चम्पावृक्षके नीचे खड़ी हो गयी ।
पृष्ठ 342
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १८ ] अपश्यद् ब्राह्मणं मार्गे आगच्छन्तं त्वरान्वितम् ॥
तं प्रणम्य द्विजं श्यामा बभाषे मधुरं वचः ।
कुतो देशान्महाभाग कृतमागमनं त्वया ॥
द्विज उवाच
भारद्वाजाश्रमाद् बाले नूनमागमनं मम ।
जातं वै कार्ययोगेन किं पृच्छसि वदस्व मे ॥
शशिकलोवाच तत्राश्रमे महाभाग वर्णनीयं किमस्ति वै । लोकातिगं विशेषेण प्रेक्षणीयतमं किल ब्राह्मण उवाच ध्रुवसन्धिसुतः श्रीमानास्ते सुदर्शनो नृपः । यथार्थनामा सुश्रोणि वर्तते पुरुषोत्तमः तस्य लोचनमत्यन्तं निष्फलं प्रतिभाति मे । येन दृष्टो न वामोरु कुमारस्तु सुदर्शनः एकत्र निहिता धात्रा गुणाः सर्वे सिसृक्षुणा गुणानामाकरं द्रष्टुं मन्ये तेनैव कौतुकात् तव योग्यः कुमारोऽसौ भर्ता भवितुमर्हति योगोऽयं विहितोऽप्यासीन्मणिकाञ्चनयोरिव तृतीय स्कन्ध ३३३ ५५ | तभी उसने मार्गमें शीघ्रतापूर्वक आते हुए किसी ब्राह्मणको देखा । उस ब्राह्मणको प्रणाम करके सुन्दरी शशिकलाने मधुर वाणीमें कहा - हे महाभाग! ५६ आप किस देशसे आये हैं? ॥ ५४–५६ ॥ ब्राह्मणने कहा – हे बाले! एक कार्यवश भारद्वाजमुनिके आश्रमसे मेरा आगमन हुआ है । तुम क्या पूछ रही हो; मुझे बताओ ॥ ५७ ॥
५७ शशिकला बोली- हे महाभाग! उस आश्रममें अत्यन्त प्रशंसनीय, संसारमें सबसे बढ़कर तथा विशेषरूपसे दर्शनीय कौन - सी वस्तु है? ॥ ५८ ॥
॥ ५८ ब्राह्मणने कहा – हे सुश्रोणि! महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र श्रीमान् सुदर्शन वहाँ रहते हैं । पुरुषोंमें श्रेष्ठ वे सुदर्शन अपने नामके अनुरूप ही हैं ॥५ ९ ॥ हे सुन्दरि! जिसने राजकुमार सुदर्शनको ॥ ५ ९ नहीं देखा, मैं तो उसके नेत्रोंको अत्यन्त निष्फल मानता हूँ ॥६० ॥
सृष्टिकी अभिलाषावाले ब्रह्माने कौतूहलवश ॥ ६० उन एक सुदर्शनमें सभी गुणोंको भर दिया है ॥ अतः गुणोंकी खान सुदर्शनको ही मैं देखनेयोग्य ॥ ६१ मानता हूँ ॥६१ ॥
वे राजकुमार तुम्हारे अनुरूप हैं और तुम्हारे पति । होनेयोग्य हैं । मणि और कांचनकी भाँति यह तुम ॥ ६२ । दोनोंका संयोग पहले से ही निश्चित हो चुका है ॥ ६२ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे विश्वामित्रकथोत्तरं राजपुत्रस्य कामबीजप्राप्तिवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
अथाष्टादशोऽध्यायः राजकुमारी शशिकलाद्वारा मन - ही - मन सुदर्शनका वरण करना, काशिराजद्वारा स्वयंवरकी घोषणा, शशिकलाका सखीके माध्यमसे अपना निश्चय माताको बताना व्यास उवाच श्रुत्वा तद्वचनं श्यामा प्रेमयुक्ता बभूव ह प्रतस्थे ब्राह्मणस्तस्मात्स्थानादुक्त्वा समाहितः सा तु पूर्वानुरागाद्वै मग्ना प्रेम्णातिचञ्चला कामबाणहतेवास गते तस्मिन्द्विजोत्तमे व्यासजी बोले- उस ब्राह्मणका वचन सुनकर । सुन्दरी शशिकला प्रेमविभोर हो गयी और वह ॥ १ ब्राह्मण इतना कहकर शान्तभावसे उस स्थानसे चला गया ॥ १ ॥
उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके चले जानेपर वह सुन्दरी । पूर्व अनुरागसे तथा विप्रकी बातोंसे प्रेमातिरेकके ॥ कारण अत्यधिक अधीर हो उठी ॥ २ ॥
पृष्ठ 343
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३३४ अथ कामार्दिता प्राह सखीं छन्दोनुवर्तिनीम् विकारश्च समुत्पन्नो देहे यच्छ्रवणादनु अज्ञातरसविज्ञानं कुमारं कुलसम्भवम् दुनोति मदनः पापः किं करोमि क्व यामि च स्वजेषु वा मया दृष्टः पञ्चबाण इवापरः । तपते मे मनोऽत्यर्थं विरहाकुलितं मृदु
चन्दनं देहलग्नं मे विषवद्भाति भामिनि ।
स्त्रगियं सर्पवच्चैव चन्द्रपादाश्च वह्निवत् ॥
न च हर्म्ये वने शं मे दीर्घिकायां न पर्वते ।
न दिवा न निशायां वा न सुखं सुखसाधनैः ॥
न शय्या न च ताम्बूलं न गीतं न च वादनम् ।
प्रीणयन्ति मनो मेऽद्य न तृप्ते मम लोचने ॥
प्रयाम्यद्य वने तत्र यत्रासौ वर्तते शठः ।
भीतास्मि कुललज्जायाः परतन्त्रा पितुस्तथा ॥
स्वयंवरं पिता मेऽद्य न करोति करोमि किम् ।
दास्यामि राजपुत्राय कामं सुदर्शनाय वै ॥
सन्त्यन्ये पृथिवीपालाः शतशः सम्भृतर्द्धयः ।
रमणीया न मे तेऽद्य राज्यहीनो ऽप्यसौ मतः ॥
व्यास उवाच
एकाकी निर्धनश्चैव बलहीनः सुदर्शनः ।
वनवासी फलाहारस्तस्याश्चित्ते सुसंस्थितः ॥
वाग्बीजस्य जपात्सिद्धिस्तस्या एषाप्युपस्थिता ।
सोऽपि ध्यानपरोऽत्यन्तं जजाप मन्त्रमुत्तमम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ । तदनन्तर उस शशिकलाने अपनी इच्छाके अनुसार ॥ ३ चलनेवाली एक सखीसे कहा कि रससे अनभिज्ञ तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न उस राजकुमारके विषयमें सुनकर मेरे शरीरमें विकार उत्पन्न हो गया है । इस समय । कामदेव मुझे अत्यधिक पीड़ा दे रहा है । अब मैं क्या ॥ ४ करूँ और कहाँ जाऊँ? ॥३-४ ॥ जबसे मैंने स्वप्नमें दूसरे कामदेवके सदृश उस राजकुमारको देखा है, तभीसे विरहसे आकुल हुआ ॥ ५ मेरा कोमल मन अत्यधिक सन्तप्त हो रहा है ॥ ५ ॥
हे भामिनि! इस समय मेरे शरीरमें लगा हुआ चन्दन विषके समान, यह माला सर्पके तुल्य तथा ६ चन्द्रमाकी किरणें अग्निसदृश प्रतीत हो रही हैं ॥ ६ ॥
इस समय महलमें, वनमें, बावलीमें तथा पर्वतपर - कहीं भी मेरे चित्तको शान्ति नहीं मिल पा रही है । नानाविध सुख - साधनोंसे दिनमें अथवा रातमें ७ किसी भी समय सुखकी अनुभूति नहीं हो रही है ॥ ७ ॥
शय्या, ताम्बूल, गायन तथा वादन - इनमें कोई भी चीजें मेरे मनको प्रसन्न नहीं कर पा रही ८ हैं और न तो मेरे नेत्रोंको कोई भी वस्तु तृप्त ही कर पा रही है ॥ ८ ॥
[ जी करता है ] उसी वनमें चली जाऊँ जहाँ ९ वह निष्ठुर विद्यमान है, किंतु कुलकी लज्जाके कारण भयभीत हूँ, और फिर अपने पिताके अधीन भी हूँ॥९॥
क्या करूँ, मेरे पिता अभी मेरा स्वयंवर भी नहीं १० आयोजित कर रहे हैं । [ यदि स्वयंवर हुआ तो ] मैं इच्छापूर्वक अपनेको सुदर्शनको समर्पित कर दूँगी ॥ १० ॥
यद्यपि दूसरे सैकड़ों समृद्धिशाली नरेश हैं, परंतु ११ वे मुझे रमणीय नहीं लगते । राज्यहीन होते हुए भी इस सुदर्शनको मैं अधिक रमणीय मानती हूँ ॥ ११ ॥
व्यासजी बोले – अकेला, निर्धन, बलहीन, वनवासी तथा फलका आहार करनेवाला होते हुए भी सुदर्शन उस शशिकलाके हृदयमें पूर्णरूपसे बस गया १२ था । भगवतीके वाग्बीजमन्त्रके जपसे सुदर्शनको यह सिद्धि प्राप्त हो गयी थी । वह पूर्णरूपसे ध्यानमग्न होकर उस सर्वोत्तम मन्त्रका निरन्तर जप करता रहता १३ | था ॥ १२-१३ ॥
पृष्ठ 344
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १८ ] तृतीय
स्वप्ने पश्यत्यसौ देवीं विष्णुमायामखण्डिताम् ।
विश्वमातरमव्यक्तां सर्वसम्पत्कराम्बिकाम् ॥ १४
शृङ्गवेरपुराध्यक्षो निषादः समुपेत्य तम् ।
ददौ रथवरं तस्मै सर्वोपस्करसंयुतम् ॥ १५
चतुर्भिस्तुरगैर्युक्तं पताकावरमण्डितम् ।
जैत्रं राजसुतं ज्ञात्वा ददौ चोपायनं तदा ॥ १६
सोऽपि जग्राह तं प्रीत्या मित्रत्वेन सुसंस्थितम् ।
वन्यैर्मूलफलैः सम्यगर्चयामास शम्बरम् ॥ १७
कृतातिथ्ये गते तस्मिन्निषादाधिपतौ तदा ।
मुनयः प्रीतियुक्तास्ते तमूचुस्तापसा मिथः ॥ १८
राजपुत्र ध्रुवं राज्यं प्राप्स्यसि त्वं च सर्वथा ।
स्वल्पैरहोभिरव्यग्रः प्रतापान्नात्र संशयः ॥ १ ९
प्रसन्ना तेऽम्बिका देवी वरदा विश्वमोहिनी ।
सहायस्तु सुसम्पन्नो न चिन्तां कुरु सुव्रत ॥ २०
मनोरमां तथोचुस्ते मुनयः संशितव्रताः ।
पुत्रस्ते धराधीशो भविष्यति शुचिस्मिते ॥ २१
सा तानुवाच तन्वङ्गी वचनं वोऽस्तु सत्फलम् ।
दासोऽयं भवतां विप्राः किं चित्रं सदुपासनात् ॥ २२
न सैन्यं सचिवाः कोशो न सहायश्च कश्चन ।
केन योगेन पुत्रो मे राज्यं प्राप्तुमिहार्हति ॥ २३
आशीर्वादैश्च वो नूनं पुत्रोऽयं मे महीपतिः ।
भविष्यति न सन्देहो भवन्तो मन्त्रवित्तमाः ॥ २४
स्कन्ध ३३५ एक बार स्वप्नमें सुदर्शनने उन अव्यक्त, पूर्ण ब्रह्मस्वरूपा, जगज्जननी, विष्णुमाया तथा सभी सम्पदा प्रदान करानेवाली भगवती अम्बिकाका दर्शन किया ॥ १४ ॥
उसी समय श्रृंगवेरपुरके अधिपति निषादने सुदर्शनके पास आकर उसे सब प्रकारकी सामग्रियोंसे परिपूर्ण उत्तम रथ प्रदान किया । उस रथमें चार घोड़े जुते हुए थे और वह सुन्दर पताकासे सुशोभित था । निषादराजने राजकुमार सुदर्शनको विजयशाली समझकर उसे भेंटस्वरूप वह रथ दिया था । सुदर्शनने भी प्रेमपूर्वक उसे स्वीकार कर लिया और मित्ररूपमें आये हुए उस निषादका वन्य फल - मूलोंसे भलीभाँति सत्कार किया ॥ १५ - १७ ॥ तब आतिथ्य स्वीकार करके उस निषादराजके चले जानेपर वहाँके तपस्वी मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर सुदर्शनसे कहने लगे - हे राजकुमार! आप धैर्यवान् हैं; भगवतीकी कृपासे थोड़े ही दिनोंमें निश्चय ही अपना राज्य प्राप्त करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है । हे सुव्रत! विश्वमोहिनी और वरदायिनी भगवती अम्बिका आपके ऊपर प्रसन्न हैं । अब आपको उत्तम सहायक भी मिल गया है, आप चिन्ता न करें ॥ १८-२० ॥ तत्पश्चात् उन व्रतधारी मुनियोंने मनोरमासे कहा - हे शुचिस्मिते! अब आपका पुत्र सुदर्शन शीघ्र ही भूमण्डलका राजा होगा ॥२१ ॥
तब उस कोमलांगी मनोरमाने उनसे कहा-आपलोगोंका वचन सफल हो । हे विप्रगण! यह सुदर्शन आपलोगोंका सेवक है । सच्ची उपासनासे सब कुछ सम्भव हो जाता है, इसमें आश्चर्य ही क्या? [ किंतु ] उसके पास न सेना है, न मन्त्री हैं, न कोश है और न कोई सहायक ही है । [ ऐसी दशामें ] किस उपायसे मेरा पुत्र राज्य पानेके योग्य बन सकता है? आपलोग मन्त्रके पूर्णवेत्ता हैं, अतः आपलोगोंके आशीर्वचनोंसे मेरा यह पुत्र निश्चय ही राजा होगा; इसमें सन्देह नहीं है । २२–२४ ॥
पृष्ठ 345
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ व्यास उवाच
रथारूढः स मेधावी यत्र याति सुदर्शनः ।
अक्षौहिणीसमावृत्त इवाभाति स तेजसा ॥
प्रतापो मन्त्रबीजस्य नान्यः कश्चन भूपते ।
एवं वै जपतस्तस्य प्रीतियुक्तस्य सर्वथा ॥
सम्प्राप्य सद्गुरोर्बीजं कामराजाख्यमद्भुतम् ।
जपेद्यस्तु शुचिः शान्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि वापि सुदुर्लभम् ।
प्रसन्नायाः शिवायाश्च यदप्राप्यं नृपोत्तम ॥
ते मन्दास्तेऽतिदुर्भाग्या रोगैस्ते समभिद्रुताः ।
येषां चित्ते न विश्वासो भवेदम्बार्चनादिषु ॥
या माता सर्वदेवानां युगादौ परिकीर्तिता ।
आदिमातेति विख्याता नाम्ना तेन कुरूद्वह ॥
बुद्धिः कीर्तिर्धृतिर्लक्ष्मीः शक्तिः श्रद्धा मतिः स्मृतिः ।
सर्वेषां प्राणिनां सा वै प्रत्यक्षं वै विभासते ॥
न जानन्ति नरा ये वै मोहिता मायया किल ।
न भजन्ति कुतर्कज्ञा देवीं विश्वेश्वरीं शिवाम् ॥
ब्रह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्वासवो वरुणो यमः ।
वायुरग्निः कुबेरश्च त्वष्टा पूषाश्विनौ भगः ॥
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः ।
सर्वे ध्यायन्ति तां देवीं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणीम् ॥
को न सेवेत विद्वान्वै तां शक्तिं परमात्मिकाम् ।
सुदर्शनेन सा ज्ञाता देवी सर्वार्थदा शिवा ॥
ब्रह्मैव सातिदुष्प्राप्या विद्याविद्यास्वरूपिणी ।
योगगम्या परा शक्तिर्मुमुक्षूणां च वल्लभा ॥
व्यासजी बोले -- रथपर सवार होकर मेधावी सुदर्शन जहाँ भी जाता था, वहाँ वह अपने तेजसे एक २५ अक्षौहिणी सेनासे आवृत प्रतीत होता था । हे भूप! यह उस बीजमन्त्रका ही प्रभाव था, दूसरा कोई कारण नहीं; क्योंकि वह सुदर्शन सर्वदा प्रसन्नतापूर्वक २६ उसी मन्त्रका जप किया करता था ॥ २५-२६ ॥ जो मनुष्य किसी सद्गुरुसे कामराज नामक अद्भुत बीजमन्त्र ग्रहण करके शान्त होकर पवित्रतापूर्वक २७ उसका जप करता है, वह अपनी सभी कामनाएँ पूर्ण
कर लेता है । २७ ॥
हे नृपश्रेष्ठ! भूतलपर अथवा स्वर्गमें भी कोई २८ ऐसा अत्यन्त दुर्लभ पदार्थ नहीं है, जो कल्याणकारिणी भगवती प्रसन्न होनेपर न मिल सके ॥ २८ ॥
वे महान् मूर्ख, भाग्यहीन तथा रोगोंसे व्यथित होते हैं, जिनके मनमें जगदम्बाके अर्चन आदिमें २ ९ विश्वास नहीं होता ॥ २ ९ ॥ हे कुरुनन्दन! जो भगवती युगके आदिमें सब देवताओंकी माता कही गयी थीं, इसी कारण आदिमाता— ३० इस नामसे विख्यात हैं; वे ही बुद्धि, कीर्ति, धृति, लक्ष्मी, शक्ति, श्रद्धा, मति और स्मृति आदि रूपोंसे समस्त प्राणियोंमें प्रत्यक्ष दिखायी देती हैं । ३०-३१ ॥ ३१ जो लोग मायासे मोहित हैं, वे उन्हें नहीं जान पाते । कुतर्क करनेवाले मनुष्य उन भुवनेश्वरी भगवती शिवाका भजन नहीं करते ॥ ३२ ॥
३२ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, वरुण, यम, वायु, अग्नि, कुबेर, त्वष्टा, पूषा, दोनों अश्विनीकुमार, भग, आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव एवं मरुद्गण - ये सभी ३३ देवता सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाली उन भगवतीका ध्यान करते हैं ॥ ३३-३४ ॥ कौन ऐसा विद्वान् है, जो उन परमात्मिका ३४ शक्तिकी आराधना न करता हो? सुदर्शनने सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाली उन्हीं कल्याणकारिणी भगवतीको जान लिया था ॥ ३५ ॥
३५ वे विद्या तथा अविद्यास्वरूपा भगवती ही ब्रह्म हैं और अत्यन्त दुष्प्राप्य हैं । वे पराशक्ति योगद्वारा ही अनुभवगम्य हैं और मोक्ष चाहनेवाले लोगोंको ३६ । विशेष प्रिय हैं ॥ ३६ ॥
पृष्ठ 346
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १८ ] परमात्मस्वरूपं को वेत्तुमर्हति तां विना या सृष्टिं त्रिविधां कृत्वा दर्शयत्यखिलात्मने सुदर्शनस्तु तां देवीं मनसा परिचिन्तयन् राज्यलाभात्परं प्राप्य सुखं वै कानने स्थितः सापि चन्द्रकलात्यर्थं कामबाणप्रपीडिता नानोपचारैरनिशं दधार दुःखितं वपुः तावत्तस्याः पिता ज्ञात्वा कन्यां पुत्रवरार्थिनीम् सुबाहुः कारयामास स्वयंवरमतन्द्रितः स्वयंवरस्तु त्रिविधो विद्वद्भिः परिकीर्तितः । राज्ञां विवाहयोग्यो वै नान्येषां कथितः किल इच्छास्वयंवरश्चैको द्वितीयश्च पणाभिधः यथा रामेण भग्नं वै त्र्यम्बकस्य शरासनम् ॥ तृतीयः शौर्यशुल्कश्च शूराणां परिकीर्तितः इच्छास्वयंवरं तत्र चकार नृपसत्तमः शिल्पिभिः कारिता मञ्चाः शुभैरास्तरणैर्युताः ततश्च विविधाकाराः सुक्लृप्ताः सभ्यमण्डपाः एवं कृते ऽतिसम्भारे विवाहार्थं सुविस्तरे सखीं शशिकला प्राह दुःखिता चारुलोचना इदं मे मातरं ब्रूहि त्वमेकान्ते वचो मम मया वृतः पतिश्चित्ते ध्रुवसन्धिसुतः शुभः नान्यं वरं वरिष्यामि तमृते वै सुदर्शनम् स मे भर्ता नृपसुतो भगवत्या प्रतिष्ठितः व्यास उवाच इत्युक्ता सा सखी गत्वा मातरं प्राह सत्वरा वैदर्भी विजने वाक्यं मधुरं मञ्जुभाषिणी तृतीय स्कन्ध ३३७ । उन भगवतीके बिना परमात्माका स्वरूप जाननेमें ॥ ३७ कौन समर्थ है? जो तीन प्रकारकी सृष्टि करके सर्वात्मा भगवान्को दिखलाती हैं, उन्हीं भगवतीका । मनसे सम्यक् चिन्तन करता हुआ राजकुमार सुदर्शन ॥ ३८ राज्य - प्राप्ति से भी अधिक सुखका अनुभव करके वनमें रहता था ॥ ३७-३८ ॥ । उधर, वह शशिकला भी कामसे निरन्तर अत्यधिक ॥ ३ ९ पीड़ित रहती हुई नानाविध उपचारोंसे किसी प्रकार अपना दुःखित शरीर धारण किये हुए थी ॥ ३ ९ ॥ । इसी बीच उसके पिता सुबाहुने कन्या शशिकलाको ॥। ४० वरकी अभिलाषिणी जानकर बड़ी सावधानीके साथ स्वयंवर आयोजित कराया ॥ ४० ॥
विद्वानोंने स्वयंवरके तीन प्रकार बताये हैं । वह क्षत्रिय राजाओंके विवाहहेतु उचित कहा गया है, ॥ ४१ अन्यके लिये नहीं । उनमें प्रथम इच्छास्वयंवर है, । जिसमें कन्या अपने इच्छानुसार पति स्वीकार करती है । दूसरा पणस्वयंवर है, जिसमें किसी प्रकारका पण ४२ ( शर्त ) रखा जाता है । जैसे भगवान् श्रीरामने [ जानकीके । स्वयंवरमें ] शिवधनुष तोड़ा था । तीसरा स्वयंवर शौर्यशुल्क है, जो शूरवीरोंके लिये कहा गया है । ॥ ४३ नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उनमें इच्छास्वयंवरका आयोजन किया ॥ ४१ - ४३ ॥ । शिल्पियोंद्वारा बहुत - से मंच बनवाये गये और ॥ ४४ उनपर सुन्दर आसन बिछाये गये । तत्पश्चात्
राजाओं के बैठनेयोग्य विविध आकार - प्रकारके सभा-।
मण्डप बनवाये गये ॥४४ ॥
॥ ४५
इस प्रकार विवाहके लिये सम्पूर्ण सामग्री जुट जानेपर सुन्दर नेत्रोंवाली शशिकलाने दुःखित होकर । अपनी सखीसे कहा - – एकान्तमें जाकर तुम मेरी ॥ ४६ मातासे मेरा यह वचन कह दो कि मैंने अपने मनमें ध्रुवसन्धिके सुन्दर पुत्रका पतिरूपमें वरण कर लिया । है । उन सुदर्शनके अतिरिक्त मैं किसी दूसरेको पति नहीं ॥ ४७ बनाऊँगी; क्योंकि स्वयं भगवतीने राजकुमार सुदर्शनको
मेरा पति निश्चित कर दिया है । ४५ - ४७ ॥
व्यासजी बोले – उसके ऐसा कहनेपर उस । मृदुभाषिणी सखीने शशिकलाकी माता विदर्भसुताके ॥ ४८ पास शीघ्र जाकर एकान्तमें उनसे मधुर वाणीमें कहा—
पृष्ठ 347
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३३८ पुत्री ते दुःखिता प्राह साध्वि त्वां मन्मुखेन यत् शृणु त्वं कुरु कल्याणि तद्धितं त्वरिताधुना भारद्वाजाश्रमे पुण्ये ध्रुवसन्धिसुतोऽस्ति यः स मे भर्ता वृतश्चित्ते नान्यं भूपं वृणोम्यहम् व्यास उवाच राज्ञी तद्वचनं श्रुत्वा स्वपतौ गृहमागते निवेदयामास तदा पुत्रीवाक्यं यथातथम् ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं राजा विस्मितः प्रहसन्मुहुः भार्यामुवाच वैदर्भी सुबाहुस्तु ऋतं वचः सुभ्रु जानासि बालोऽसौ राज्यान्निष्कासितो वने एकाकी सह मात्रा वै वसते निर्जने वने तत्कृते निहतो राजा वीरसेनो युधाजिता स कथं निर्धनो भर्ता योग्यः स्याच्चारुलोचने ब्रूहि पुत्रीं ततो वाक्यं कदाचिदपि विप्रियम् आगमिष्यन्ति राजानः स्थितिमन्तः स्वयंवरे श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ । ' हे साध्वि! आपकी पुत्रीने अत्यन्त दुःखित होकर ॥ ४ ९ मेरे मुखसे आपको जो कहलाया है, उसे आप सुन लें और हे कल्याणि! इस समय शीघ्र ही । उसका हित - साधन करें ' । [ उसका कथन है कि ] भारद्वाजमुनिके आश्रम में जो ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शन ॥ ५० रहते हैं, उनका मैं अपने मनमें पतिरूपमें वरण कर चुकी हूँ । अतः मैं किसी दूसरे राजाका वरण नहीं करूँगी ॥ ४८-५० ॥ । व्यासजी बोले – वह वचन सुनकर रानीने राजाके आनेपर पुत्रीकी सारी बातें ज्यों - की - त्यों ५१ उनको बतायीं ॥५१ ॥
उसे सुनकर राजा सुबाहु आश्चर्यमें पड़ गये । और बार - बार मुसकराते हुए वे अपनी भार्या ॥ ५२ विदर्भराजकुमारीसे यथार्थ बात कहने लगे - ॥ ५२ ॥
हे सुभ्रु! तुम तो यह जानती ही हो कि वह । बालक राज्यसे निकाल दिया गया है और निर्जन ॥ ५३ वनमें अकेले ही अपनी माताके साथ रहता है । उसीके लिये राजा वीरसेन युधाजित्के द्वारा मार डाले गये ॥ हे सुनयने! वह निर्धन योग्य पति कैसे हो सकता है? ॥५३-५४ ॥ ॥ ५४ तुम यह बात पुत्री शशिकलासे कह दो कि बड़े - से - बड़े प्रतिष्ठित राजा इस स्वयंवरमें आनेवाले । हैं । अत: उनके प्रति ऐसी अप्रिय बात वह कभी भी ॥ ५५ | न बोले ॥ ५५ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे शशिकलया मातरं प्रति संदेशप्रेषणं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः माताका शशिकलाको समझाना, शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना, सुदर्शन तथा अन्य राजाओंका स्वयंवरमें मार डालनेकी बात कहनेपर व्यास उवाच
भर्त्रा साभिहिता बालां पुत्रीं कृत्वाङ्कसंस्थिताम् ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं समाश्वास्य शुचिस्मिताम् ॥ १
किं वृथा सुदति त्वं हि विप्रियं मम भाषसे ।
पिता ते दुःखमाप्नोति वाक्येनानेन सुव्रते ॥ २
आगमन, युधाजित्द्वारा सुदर्शनको केरलनरेशका उन्हें समझाना व्यासजी बोले- पतिके ऐसा कहनेपर रानीने सुन्दर मुसकानवाली उस कन्याको अपनी गोदमें बैठाकर उसे आश्वासन दे करके यह मधुर वचन कहा- - हे सुदति! तुम मुझसे ऐसी अप्रिय एवं निष्प्रयोजन बात क्यों कह रही हो? हे सुव्रते! इस कथनसे तुम्हारे पिता बहुत दुःखित हो रहे हैं ॥ १-२ ॥
पृष्ठ 348
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १ ९ ]
सुदर्शनोऽतिदुर्भाग्य राज्यभ्रष्टो निराश्रयः ।
बलकोषविहीनश्च परित्यक्तस्तु बान्धवैः ॥
मात्रा सह वनं प्राप्तः फलमूलाशनः कृशः ।
न ते योग्यो वरोऽयं वै वनवासी च दुर्भगः ॥
राजपुत्राः कृतप्रज्ञा रूपवन्तः सुसम्मताः ।
तवार्हाः पुत्रि सन्त्यन्ये राजचिह्वैरलङ्कृताः ॥
भ्रातास्य वर्तते कान्तः स राज्यं कोसलेषु वै ।
करोति रूपसम्पन्नः सर्वलक्षणसंयुतः ॥
अन्यच्च कारणं सुभ्रु शृणु यच्च मया श्रुतम् ।
युधाजित्सततं तस्य वधकामोऽस्ति भूमिपः ॥
दौहित्रः स्थापितस्तेन राज्ये कृत्वातिसङ्गरम् ।
वीरसेनं नृपं हत्वा सम्मन्त्र्य सचिवैः सह ॥
भारद्वाजाश्रमं प्राप्तं हन्तुकामः सुदर्शनम् ।
मुनिना वारितः पश्चाज्जगाम निजमन्दिरम् ॥
शशिकलोवाच
मातर्ममेप्सितः कामं वनस्थोऽपि नृपात्मजः ।
शर्यातिवचनेनैव सुकन्या च पतिव्रता ॥
च्यवनञ्च यथा प्राप्य पतिशुश्रूषणे रता ।
पतिशुश्रूषणं स्त्रीणां स्वर्गदं मोक्षदं तथा ॥
अकैतवकृतं नूनं सुखदं भवति स्त्रियाः ।
भगवत्या समादिष्टं स्वप्ने वरमनुत्तमम् ॥
तमृतेऽहं कथं चान्यं संश्रयामि नृपात्मजम् ।
मच्चित्तभित्तौ लिखितो भगवत्या सुदर्शनः ॥
तं विहाय प्रियं कान्तं करिष्येऽहं न चापरम् । तृतीय स्कन्ध ३३ ९ वह सुदर्शन बड़ा ही अभागा, राजच्युत, आश्रयहीन ३ और सेना तथा कोशसे विहीन है; बन्धु - बान्धवोंने उसका परित्याग कर दिया है । वह अपनी माताके साथ वनमें रहकर फल - मूल खाता है और अत्यन्त ४ दुर्बल है । इसलिये वह मन्दभाग्य एवं वनवासी बालक सर्वथा तुम्हारे योग्य वर नहीं है ॥ ३-४ ॥ हे पुत्रि! तुम्हारे योग्य अनेक राजकुमार यहाँ उपस्थित हैं; जो बुद्धिमान्, रूपवान्, सम्माननीय और ५ राजचिह्नोंसे अलंकृत हैं । इसी सुदर्शनका एक कान्तिमान्, रूपसम्पन्न तथा सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त भाई भी है, जो इस समय कोसलदेशमें राज्य करता है ॥ ५-६ ॥ ६ हे सुभ्रु! इसके अतिरिक्त मैंने एक और जो बात सुनी है, तुम उसे सुनो- राजा युधाजित् उस सुदर्शनका वध करनेके लिये सतत प्रयत्नशील रहता है ॥ ७ ॥
७ उसने घोर संग्राम करके [ इसके नाना ] राजा वीरसेनको मारकर पुनः मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करके अपने दौहित्र शत्रुजित्को राज्यपर अभिषिक्त ८ कर दिया है । इसके बाद भारद्वाजमुनिके आश्रममें शरणलिये उस सुदर्शनको मारनेकी इच्छासे वह वहाँ भी पहुँचा, किंतु मुनिके मना करनेपर अपने घर ९ लौट गया ॥ ८ - ९ ॥ शशिकला बोली- हे माता! मुझे तो वह वनवासी राजकुमार ही अत्यन्त अभीष्ट है । [ पूर्व-कालमें ] शर्यातिकी आज्ञासे ही उनकी पतिव्रता पुत्री सुकन्या च्यवनमुनिके पास जाकर उनकी सेवामें तत्पर १० हो गयी थी । उसी प्रकार मैं पतिसेवा करूँगी; पतिकी सेवा - शुश्रूषा स्त्रियोंके लिये स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली होती है । अपने पतिके लिये कपटरहित ११ व्यवहार स्त्रियोंके लिये निश्चित रूपसे सुखदायक होता है॥१०-११३ ॥ स्वयं भगवती उस सर्वश्रेष्ठ वरका वरण करने के १२ लिये मुझे स्वप्नमें आज्ञा दे चुकी हैं । अतः उनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारका वरण कैसे करूँ? स्वयं भगवतीने मेरे चित्तकी भित्तिपर सुदर्शनको १३ ही अंकित कर दिया है । अतः उस प्रिय सुदर्शनको छोड़कर मैं किसी अन्य राजकुमारको पति नहीं बनाऊँगी ॥ १२-१३३ १ ॥
पृष्ठ 349
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ व्यास उवाच प्रत्यादिष्टाथ वैदर्भी तया बहुनिदर्शनैः ॥
भर्तारं सर्वमाचष्ट पुत्र्योक्तं वचनं भृशम् ।
विवाहस्य दिनादर्वागाप्तं श्रुतसमन्वितम् ॥
द्विजं शशिकला तत्र प्रेषयामास सत्वरम् ।
यथा न वेद मे तातस्तथा गच्छ सुदर्शनम् ॥
भारद्वाजाश्रमे ब्रूहि मद्वाक्यात्तरसा विभो ।
पित्रा मे सम्भृतः कामं मदर्थेन स्वयंवरः ॥
आगमिष्यन्ति राजानो बलयुक्ता ह्यनेकशः ।
मया त्वं वै वृतश्चित्ते सर्वथा प्रीतिपूर्वकम् ॥
भगवत्या समादिष्टः स्वप्ने मम सुरोपम ।
विषमद्मि हुताशे वा प्रपतामि प्रदीपिते ॥
वरये त्वदृते नान्यं पितृभ्यां प्रेरितापि वा ।
मनसा कर्मणा वाचा संवृतस्त्वं मया वरः ॥
भगवत्याः प्रसादेन शर्मावाभ्यां भविष्यति ।
आगन्तव्यं त्वयात्रैव दैवं कृत्वा परं बलम् ॥
यदधीनं जगत्सर्वं वर्तते सचराचरम् ।
भगवत्या यदादिष्टं न तन्मिथ्या भविष्यति ॥
यद्वशे देवताः सर्वा वर्तन्ते शङ्करादयः ।
वक्तव्योऽसौ त्वया ब्रह्मन्नेकान्ते वै नृपात्मजः ॥
यथा भवति मे कार्यं तत्कर्तव्यं त्वयानघ ।
इत्युक्त्वा दक्षिणां दत्त्वा मुनिर्व्यापारितस्तया ॥
गत्वा सर्वं निवेद्याशु तत्र प्रत्यागतो द्विजः ।
सुदर्शनस्तु तज्ज्ञात्वा निश्चयं गमने तदा ॥
चकार मुनिना तेन प्रेरितः परमादरात् । व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] उस समय उस १४ शशिकलाने अनेक प्रमाणोंके द्वारा विदर्भराजकुमारी अपनी माताको समझा दिया । तत्पश्चात् पुत्रीके द्वारा कही गयी सभी बातोंको महारानीने अपने पतिसे १५ | बताया ॥ १४३ ॥
उधर शशिकलाने विवाहके कुछ दिनों पूर्व ही एक विश्वस्त तथा वेदनिष्ठ ब्राह्मणको शीघ्र ही वहाँ १६ भेज दिया । [ जाते समय उसने ब्राह्मणसे कहा कि ] आप सुदर्शनके पास इस प्रकार जायँ, जिसे मेरे पिता न जान पायें ॥ १५-१६ ॥ १७ हे विभो! आप बहुत शीघ्र ही भारद्वाजके आश्रम पहुँचकर सुदर्शनको मेरी ओरसे कहिये कि मेरे पिताने मेरे विवाहार्थ एक स्वयंवर आयोजित १८ किया है; उसमें अनेक बलवान् राजा आयेंगे, किंतु मैं तो मनसे अत्यन्त प्रेमपूर्वक हर तरहसे आपका वरण कर चुकी हूँ । हे देवोपम राजकुमार! मुझे १ ९ भगवतीने स्वप्नमें आपको वरण करनेका आदेश दिया है । मैं विष खा लूँगी अथवा जलती हुई अग्निमें कूद पहुँगी, किंतु माता - पिताके द्वारा बहुत प्रेरित किये २० जानेपर भी मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्यका वरण नहीं करूँगी; क्योंकि मैं मन, वचन तथा कर्मसे आपको अपना पति मान चुकी हूँ । भगवतीकी कृपासे २१ हम दोनोंका कल्याण होगा । प्रारब्धको प्रबल मानकर आप इस स्वयंवरमें अवश्य आयें । २२ जगत् जिनके अधीन है तथा देवगण जिनके वशमें रहते हैं, आदेश दिया है, वह कभी भी २३ हे ब्रह्मन्! आप उस राजकुमारसे बताइयेगा । हे निष्पाप! आप वही यह सम्पूर्ण चराचर शंकर आदि सभी उन भगवतीने जो असत्य नहीं होगा । यह सब एकान्तमें कीजियेगा, जिससे मेरा काम बन जाय ॥ १७ – २३३ ॥ २४ ऐसा कहकर और दक्षिणा देकर शशिकलाने उस ब्राह्मणको भेज दिया । वह ब्राह्मण सुदर्शनसे सारी बातें कहकर शीघ्र ही वापस आ गया । उन बातोंको २५ जानकर राजकुमार सुदर्शनने स्वयंवरमें जानेका निश्चय कर लिया; उन भारद्वाजमुनिने भी उसे आदरपूर्वक भेज दिया ॥ २४-२५३ ॥
पृष्ठ 350
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १ ९ ] व्यास उवाच गमनायोद्यतं पुत्रं तमुवाच मनोरमा ॥
वेपमानातिदुःखार्ता जातत्रासाश्रुलोचना ।
कुत्र गच्छि पुत्राद्य समाजे भूभृतां किल ॥
एकाकी कृतवैरश्च किं विचिन्त्य स्वयंवरे ।
युधाजिद्धन्तुकामस्त्वां समेष्यति महीपतिः ॥
न तेऽन्योऽस्ति सहायश्च तस्मान्मा व्रज पुत्रक ।
एकपुत्रातिदीनास्मि तवाधारा निराश्रया ॥
नार्हसि त्वं महाभाग निराशां कर्तुमद्य माम् ।
पिता मे निहतो येन सोऽपि तत्रागतो नृपः ॥
एकाकिनं गतं तत्र युधाजित्त्वां हनिष्यति । सुदर्शन उवाच भवितव्यं भवत्येव नात्र कार्या विचारणा ॥
आदेशाच्च जगन्मातुर्गच्छाम्यद्य स्वयंवरे ।
मा शोकं कुरु कल्याणि क्षत्रियासि वरानने ॥
न बिभेमि प्रसादेन भगवत्या निरन्तरम् । व्यास उवाच इत्युक्त्वा रथमारुह्य गन्तुकामं सुदर्शनम् ॥
दृष्ट्वा मनोरमा पुत्रमाशीर्भिश्चान्वमोदयत् ।
अग्रतस्तेऽम्बिका पातु पार्वती पातु पृष्ठतः ॥
( पार्वती पार्श्वयोः पातु शिवा सर्वत्र साम्प्रतम् । )
वाराही विषमे मार्गे दुर्गा दुर्गेषु कर्हिचित् ।
कालिका कलहे घोरे पातु त्वां परमेश्वरी ॥
मण्डपे तत्र मातङ्गी तथा सौम्या स्वयंवरे ।
भवानी भूपमध्ये तु पातु वां भवमोचनी ॥
गिरिजा गिरिदुर्गेषु चामुण्डा चत्वरेषु च ।
कामगा काननेष्वेवं रक्षतु त्वां सनातनी ॥
विवादे वैष्णवी शक्तिरवतात्त्वां रघूद्वह ।
भैरवी च रणे सौम्य शत्रूणां वै समागमे ॥
सर्वदा सर्वदेशेषु पातु त्वां भुवनेश्वरी ।
महामाया जगद्धात्री सच्चिदानन्दरूपिणी ॥
तृतीय स्कन्ध ३४१ व्यासजी बोले- तब अत्यधिक दुःखसे व्याकुल, २६ काँपती हुई तथा भयभीत मनोरमा गमनके लिये तत्पर अपने पुत्र सुदर्शनसे आँखों में आँसू भरकर बोली - पुत्र! तुम इस समय राजाओंके उस समाजमें २७ कहाँ जा रहे हो? तुम अकेले हो और तुमसे शत्रुता रखनेवाला राजा युधाजित् तुम्हें मारनेकी इच्छासे उस २८ स्वयंवरमें अवश्य आयेगा, फिर तुम क्या सोचकर वहाँ जा रहे हो? तुम्हारा कोई सहायक भी नहीं है । इसलिये हे पुत्र! वहाँ मत जाओ । तुम ही मेरे २ ९ एकमात्र पुत्र हो और मैं अति दीन हूँ तथा मुझ आश्रयहीनके लिये तुम्हीं एकमात्र आधार हो । हे ३० महाभाग! इस समय तुम मुझे निराश मत करो । जिसने मेरे पिताका वध कर दिया है, वह राजा युधाजित् भी वहाँ आयेगा और वहाँ तुझ अकेले गये हुको मार डालेगा ॥ २६- – ३० ३ ॥ ३१ सुदर्शन बोला- होनी तो होकर रहती है, इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये । हे कल्याणि! ३२ जगज्जननीके आदेशसे मैं आज स्वयंवरमें जा रहा हूँ । हे वरानने! तुम क्षत्राणी हो, अतः इस विषयमें चिन्ता मत करो । भगवतीकी सदा अपने ऊपर कृपा रहनेके कारण मैं किसीसे भी भयभीत नहीं होता ॥ ३१- १- ३२३ ॥ ३३ व्यासजी बोले- ऐसा कहकर रथपर आरूढ़ होकर स्वयंवरमें जानेके लिये उद्यत पुत्र सुदर्शनको ३४ देखकर मनोरमाने इन आशीर्वादोंसे उसका अनुमोदन किया - भगवती अम्बिका आगेसे, पार्वती पीछेसे, ( पार्वती दोनों पार्श्वभागमें तथा शिवा सर्वत्र तुम्हारी रक्षा करें । ) विषम मार्गमें वाराही, किसी भी प्रकार ३५ दुर्गम स्थानोंमें दुर्गा और भयानक संग्राममें परमेश्वरी कालिका तुम्हारी रक्षा करें । उस मण्डपमें देवी मातंगी, स्वयंवरमें भगवती सौम्या तथा भव - बन्धनसे ३६ मुक्त करनेवाली भवानी राजाओंके बीचमें तुम्हारी रक्षा करें । इसी प्रकार पर्वतीय दुर्गम स्थानोंमें गिरिजा, ३७ चौराहोंपर देवी चामुण्डा तथा वनोंमें सनातनी कामगादेवी तुम्हारी रक्षा करें । हे रघूद्वह! विवादमें भगवती वैष्णवी तुम्हारी रक्षा करें । हे सौम्य! शत्रुओंके साथ ३८ युद्धमें भैरवी तुम्हारी रक्षा करें । जगत्को धारण करनेवाली सच्चिदानन्दस्वरूपिणी महामाया भुवनेश्वरी ३ ९ । सभी स्थानोंपर सर्वदा तुम्हारी रक्षा करें ॥ ३३–३९ ॥