देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 351–360

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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३४२ व्यास उवाच इत्युक्त्वा तं तदा माता वेपमाना भयाकुला । उवाचाहं त्वया सार्धमागमिष्यामि सर्वथा निमिषार्धं विना त्वां वै नाहं स्थातुमिहोत्सहे । सहैव नय मां वत्स यत्र ते गमने मतिः इत्युक्त्वा निःसृता माता धात्रेयीसंयुता तदा । विप्रैर्दत्ताशिषः सर्वे निर्ययुर्हर्षसंयुताः वाराणस्यां ततः प्राप्तो रथेनैकेन राघवः । ज्ञातः सुबाहुना तत्र पूजितश्चार्हणादिभिः निवेशार्थं गृहं दत्तमन्नपानादिकं तथा सेवकं समनुज्ञाप्य परिचर्यार्थमेव च मिलितास्त्वथ राजानो नानादेशाधिपाः किल युधाजिदपि सम्प्राप्तो दौहित्रेण समन्वितः करूषाधिपतिश्चैव तथा मद्रेश्वरो नृपः । सिन्धुराजस्तथा वीरो योद्धा माहिष्मतीपतिः पाञ्चालः पर्वतीयश्च कामरूपोऽतिवीर्यवान् कार्णाटश्चोलदेशीयो वैदर्भश्च महाबलः अक्षौहिणी त्रिषष्टिश्च मिलिता संख्यया तदा वेष्टिता नगरी सा तु सैन्यैः सर्वत्र संस्थितैः एते चान्ये च बहवः स्वयंवरदिदृक्षया मिलितास्तत्र राजानो वरवारणसंयुताः अन्योन्यं नृपपुत्रास्त इत्यूचुर्मिलितास्तदा सुदर्शनो नृपसुतो ह्यागतोऽस्ति निराकुलः एकाकी रथमारुह्य मात्रा सह महामतिः विवाहार्थमिहायातः काकुत्स्थः किन्नु साम्प्रतम् ॥ एतान् राजसुतांस्त्यक्त्वा ससैन्यान्सायुधानथ किमेनं राजपुत्री सा वरिष्यति महाभुजम् ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ व्यासजी बोले- ऐसा कहकर भयसे व्याकुल तथा काँपती हुई उसकी माता मनोरमाने उससे ॥ ४० कहा- मैं भी तुम्हारे साथ अवश्य चलूँगी । हे पुत्र! मैं तुम्हारे बिना आधे क्षण भी यहाँ नहीं रह सकती, अतएव तुम्हारी जहाँ जानेकी इच्छा है, वहीं मुझे भी ॥ ४१ अपने साथ ले चलो ॥ ४०-४१ ॥ तब ऐसा कहकर अपनी दासीको साथ लेकर माता मनोरमा चल पड़ीं । ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद प्राप्त ॥ ४२ करके वे सभी प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े ॥ ४२ ॥

इसके बाद वह रघुवंशी सुदर्शन एक रथपर आरूढ़ होकर वाराणसी पहुँचा । राजा सुबाहुको ॥ ४३ उसके आनेकी जानकारी होनेपर उन्होंने आदर-सम्मान आदिके द्वारा उसका सत्कार किया । उन । लोगोंके निवासके लिये भवन तथा अन्न - जल ॥ ४४ आदिकी व्यवस्था कर दी तथा उनकी सेवा - शुश्रूषाहेतु सेवकको भी नियुक्त कर दिया ॥ ४३-४४ ॥ । इसके बाद वहाँ अनेक देशोंके राजा - महाराजा ॥ ४५ एकत्र हुए । वहाँ अपने नातीको साथ लेकर युधाजित् भी आया ॥ ४५ ॥

करूषाधिपति, मद्रदेशके महाराज, वीर ॥ ४६ सिन्धुराज, युद्धकुशल माहिष्मतीनरेश, पंचालपति, । पर्वतीय राजा, कामरूपदेशके अति पराक्रमी महाराज, कर्णाटकनरेश, चोलराज और महाबली विदर्भनरेश ॥ ४७ वहाँ आये थे ॥ ४६-४७ ॥ । उन राजाओंकी कुल मिलाकर तिरसठ अक्षौहिणी सेना थी । वहाँ सर्वत्र स्थित उन सैनिकोंसे वह ॥ ४८ वाराणसी नगरी पूरी तरहसे घिर गयी । ४८ ॥ । इनके अतिरिक्त अन्य बहुत - से राजा भी स्वयंवर ॥ ४ ९ देखनेकी इच्छासे बड़े - बड़े हाथियोंपर आरूढ़ होकर उस स्वयंवरमें सम्मिलित हुए ॥ ४ ९ ॥ । उस समय सभी राजकुमार आपसमें मिलकर ॥ ५० । कहने लगे कि राजकुमार सुदर्शन भी निश्चिन्त होकर यहाँ आया है । वह महाबुद्धिमान् सूर्यवंशी सुदर्शन । अपनी माताके साथ इस समय अकेला ही रथपर ५१ चढ़कर विवाहके लिये यहाँ आ पहुँचा है । सैन्यशक्तिसे सम्पन्न तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित इन राजकुमारोंको । छोड़कर क्या वह राजकुमारी बड़ी भुजाओंवाले इस ५२ । सुदर्शनका वरण करेगी? ॥ ५०–५२ ॥

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अ ० १ ९ ] तृतीय स्कन्ध ३४३ युधाजिदथ राजेशस्तानुवाच महीपतीन् अहमेनं हनिष्यामि कन्यार्थे नात्र संशयः केरलाधिपतिः प्राह तं तदा नीतिसत्तमः नात्र युद्धं प्रकर्तव्यं राजन्निच्छास्वयंवरे बलेन हरणं नास्ति नात्र शुल्कस्वयंवरः कन्येच्छयात्र वरणं विवादः कीदृशस्त्विह अन्यायेन त्वया पूर्वमसौ राज्यात्प्रवासितः दौहित्रायार्पितं राज्यं बलवन्नृपसत्तम काकुत्स्थोऽयं महाभाग कोसलाधिपतेः सुतः कथमेनं राजपुत्रं हनिष्यसि निरागसम् लप्स्यसे तत्फलं नूनमनयस्य नृपोत्तम शास्तास्ति कश्चिदायुष्मञ्जगतोऽस्य जगत्पतिः धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम् मानयं कुरु राजेन्द्र त्यज पापमतिं किल दौहित्रस्तव सम्प्राप्तः सोऽपि रूपसमन्वितः राज्ययुक्तस्तथा श्रीमान् कथं तं न वरिष्यति अन्ये राजसुताः कामं वर्तन्ते बलवत्तराः कन्यास्वयंवरे कन्या स्वीकरिष्यति साम्प्रतम् वृते तथा विवादः कः प्रवदन्तु महीभुजः परस्परं विरोधोऽत्र न कर्तव्यो विजानता । इसके बाद राजा युधाजित्ने उन नरेशोंसे ॥ ५३ कहा - राजकुमारीको प्राप्त करनेके लिये मैं इसे मार डालूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है ॥५३ ॥

। तब महान् नीतिज्ञ केरलनरेशने उस युधाजित्से कहा— हे राजन्! इच्छास्वयंवरमें युद्ध नहीं करना ॥ ५४ चाहिये । यह शुल्कस्वयंवर भी नहीं है, अत: कन्याका बलपूर्वक हरण भी नहीं किया जाना चाहिये । इसमें । तो कन्याकी इच्छासे पति चुनना निर्धारित है; तो फिर ॥ ५५ | इसमें विवाद कैसा? ॥ ५४-५५ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! आपने पहले तो इस सुदर्शनको । अन्यायपूर्वक राज्यसे निकाल दिया और अपने दौहित्रको ॥५६ बलपूर्वक उस राज्यका स्वामी बना दिया ॥ ५६ ॥

हे महाभाग! यह सूर्यवंशी राजकुमार कोसल-। नरेशका सुपुत्र है । इस निरपराध राजकुमारका वध आप क्यों करेंगे? ॥ ५७ ॥

॥ ५७ हे नृपोत्तम! आपको अन्यायका फल अवश्य ही मिलेगा । हे आयुष्मन्! इस संसारपर शासन करनेवाला

कोई और ही जगत्पति परमेश्वर है ॥ ५८ ॥

॥ ५८ धर्मकी जय होती है, अधर्मकी नहीं । सत्यकी जय होती है, असत्यकी नहीं । अतएव हे राजेन्द्र! । आप अन्याय न कीजिये और इस प्रकारके पापमय ॥ ५ ९ विचारका सर्वथा परित्याग कर दीजिये ॥ ५ ९ ॥ आपका दौहित्र यहाँ आया ही है । वह भी । अत्यन्त रूपवान् और राज्य तथा लक्ष्मीसे सम्पन्न है; ॥ ६० तब भला कन्या उसका वरण क्यों नहीं करेगी? ॥ ६० ॥

अन्य एकसे बढ़कर एक बलवान् राजकुमार । आये हैं । इस स्वयंवरमें कन्या शशिकला किसी भी राजकुमारको अपनी इच्छासे चुन लेगी ॥ ६१ ॥

॥ ६१ हे राजागण! अब आप ही लोग बतायें कि इस प्रकारके विवाहमें विवाद ही क्या? विवेकवान् । पुरुषको इस विषय में परस्पर विरोधभाव नहीं रखना ॥ ६२ | चाहिये ॥ ६२ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे राजसंवादवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥

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३४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २० अथ विंशोऽध्यायः राजाओंका सुदर्शनसे स्वयंवरमें आनेका कारण पूछना और सुदर्शनका उन्हें स्वप्नमें भगवतीद्वारा दिया गया आदेश बताना, राजा सुबाहुका शशिकलाको समझाना, परंतु उसका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना व्यास उवाच

इतिवादिनि भूपाले केरलाधिपतौ तदा ।

प्रत्युवाच महाभाग युधाजिदपि पार्थिवः ॥

नीतिरेषा महीपाल यद् ब्रवीति भवानिह ।

समाजे पार्थिवानां वै सत्यवाग्विजितेन्द्रियः ॥

योग्येषु वर्तमानेषु कन्यारत्नं कुलोद्वह ।

अयोग्योऽर्हति भूपाल न्यायोऽयं तव रोचते ॥

भागं सिंहस्य गोमायुर्भोक्तुमर्हति वा कथम् ।

तथा सुदर्शनोऽयं वै कन्यारत्नं किमर्हति ॥

बलं वेदो हि विप्राणां भूभुजां चापजं बलम् ।

किमन्याय्यं महाराज ब्रवीम्यहमिहाधुना ॥

बलं शुल्कं यथा राज्ञां विवाहे परिकीर्तितम् ।

बलवानेव गृह्णातु नाबलस्तु कदाचन ॥

तस्मात्कन्यापणं कृत्वा नीतिरत्र विधीयताम् ।

अन्यथा कलहः कामं भविष्यति महीभुजाम् ॥

एवं विवादे संवृत्ते राज्ञां तत्र परस्परम् ।

आहूतस्तु सभामध्ये सुबाहुर्नृपसत्तमः ॥

समाहूय नृपाः सर्वे तमूचुस्तत्त्वदर्शिनः ।

राजनीतिस्त्वया कार्या विवाहेऽत्र समाहिता ॥

किं ते चिकीर्षितं राजंस्तद्वदस्व समाहितः ।

पुत्र्याः प्रदानं कस्मै ते रोचते नृप चेतसि ॥

सुबाहुरुवाच

पुत्र्या मे मनसा कामं वृतः किल सुदर्शनः ।

मया निवारितात्यर्थं न सा प्रत्येति मे वचः ॥

किं करोमि सुताया मे न वशे वर्तते मनः ।

सुदर्शनस्तथैकाकी सम्प्राप्तोऽस्ति निराकुलः ॥

व्यासजी बोले- हे महाभाग! तब महाराज केरल-नरेशके ऐसा कहनेपर राजा युधाजित्ने कहा- ॥ १ ॥

१ हे पृथ्वीपते! आपने अभी - अभी जो कहा है, क्या यही नीति है? राजाओंके समाजमें आप तो सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय माने जाते हैं ॥ २ ॥

हे कुलोद्वह! हे राजन्! योग्य राजाओंके रहते हुए एक अयोग्य व्यक्ति कन्यारत्नको प्राप्त कर ले, क्या यही न्याय आपको अच्छा लगता है? ॥ ३ ॥

३ एक सियार सिंहके भागको खानेका अधिकारी कैसे हो सकता है? उसी प्रकार क्या यह सुदर्शन इस ४ कन्यारत्नको पानेकी योग्यता रखता है? ॥ ४ ॥

ब्राह्मणोंका बल वेद है और राजाओंका बल धनुष । हे महाराज! क्या मैं इस समय अन्यायपूर्ण ५ बात कह रहा हूँ? ॥ ५ ॥

राजाओंके विवाहमें बलको ही शुल्क कहा ६ गया है । यहाँ जो भी बलशाली हो, वह कन्यारत्नको प्राप्त कर ले; बलहीन इसे कदापि नहीं पा सकता ॥ ६ ॥

अतएव कन्याके लिये कोई शर्त निर्धारित करके ७ ही राजकुमारीका विवाह हो - यही नीति इस अवसरपर अपनायी जानी चाहिये; अन्यथा राजाओंमें परस्पर घोर कलहकी स्थिति उत्पन्न हो जायगी ॥ ७ ॥

८ इस प्रकार वहाँ राजाओंमें परस्पर विवाद उत्पन्न हो जानेपर नृपश्रेष्ठ सुबाहु सभामें बुलाये गये ॥ ८ ॥

९ उन्हें बुलवाकर तत्त्वदर्शी राजाओंने उनसे कहा— हे राजन्! इस विवाहमें आप राजोचित नीतिका अनुसरण करें । हे राजन्! आप क्या करना चाहते हैं, उसे सावधान १० होकर बतायें । हे नृप! आप अपने मनसे इस कन्याको किसे प्रदान करना पसन्द करते हैं? ॥ ९ -१० ॥ सुबाहु बोले- मेरी पुत्रीने मन - ही - मन सुदर्शनका ११ वरण कर लिया है । इसके लिये मैंने उसे बहुत रोका, किंतु वह मेरी बात नहीं मानती । मैं क्या करूँ? मेरी पुत्रीका मन वशमें नहीं है और यह सुदर्शन भी १२ निर्भीक होकर यहाँ अकेले आ गया है ॥ ११-१२ ॥

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अ ० २० ] तृतीय व्यास उवाच

सम्पन्नभूभुजः सर्वे समाहूय सुदर्शनम् ।

ऊचुः समागतं शान्तमेकाकिनमतन्द्रिताः ॥ १३

राजपुत्र महाभाग केनाहूतोऽसि सुव्रत ।

एकाकी यः समायातः समाजे भूभृतामिह ॥ १४

न वै सैन्यं न सचिवा न कोशो न बृहद्बलम् ।

किमर्थञ्च समायातस्तत्त्वं ब्रूहि महामते ॥ १५

युद्धकामा नृपतयो वर्तन्तेऽत्र समागमे ।

कन्यार्थं सैन्यसम्पन्नाः किं त्वं कर्तुमिहेच्छसि ॥ १६

भ्राता ते सुबलः शूरः सम्प्राप्तोऽस्ति जिघृक्षया ।

युधाजिच्च महाबाहुः साहाय्यं कर्तुमागतः ॥ १७

गच्छ वा तिष्ठ राजेन्द्र याथातथ्यमुदाहृतम् ।

त्वयि सैन्यविहीने च यथेष्टं कुरु सुव्रत ॥ १८

सुदर्शन उवाच

न बलं न सहायो मे न कोशो दुर्गसंश्रयः ।

न मित्राणि न सौहार्दी न नृपा रक्षका मम ॥ १ ९

अत्र स्वयंवरं श्रुत्वा द्रष्टुकाम इहागतः ।

स्वप्ने देव्या प्रेरितोऽस्मि भगवत्या न संशयः ॥ २०

नान्यच्चिकीर्षितं मेऽद्य मामाह जगदीश्वरी ।

तया यद्विहितं तच्च भविताद्य न संशयः ॥ २१

न शत्रुरस्ति संसारे कोऽप्यत्र जगतीश्वराः ।

सर्वत्र पश्यतो मेऽद्य भवानीं जगदम्बिकाम् ॥ २२

स्कन्ध ३४५ व्यासजी बोले – तत्पश्चात् सभी वैभवशाली राजाओंने सुदर्शनको बुलवाया । उस शान्तस्वभाव सुदर्शनसे राजाओंने सावधान होकर पूछा - हे राजपुत्र! हे महाभाग! हे सुव्रत! तुम्हें यहाँ किसने बुलाया है, जो तुम इस राजसमाजमें अकेले ही चले आये हो? ॥ १३-१४ ॥ तुम्हारे पास न सेना है, न मन्त्री हैं, न कोश है और न अधिक बल ही है । हे महामते! तुम यहाँ किसलिये आये हो? उसे बताओ ॥ १५ ॥

युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले बहुत - से राजागण इस कन्याको प्राप्त करनेकी इच्छासे अपनी - अपनी सेनासहित इस समाजमें विद्यमान हैं । यहाँ तुम क्या करना चाहते हो? ॥ १६ ॥

तुम्हारा शूरवीर भाई शत्रुजित् भी एक महान् सेनाके साथ राजकुमारीको प्राप्त करनेकी इच्छासे यहाँ आया हुआ है और उसकी सहायता करनेके लिये महाबाहु युधाजित् भी आये हैं ॥ १७ ॥

हे राजेन्द्र! तुम जाओ अथवा रहो । हमने तो सारी वास्तविकता तुम्हें बतला दी; क्योंकि तुम सेना - विहीन हो I । हे सुव्रत! अब तुम्हारी जो इच्छा हो, वह करो ॥ १८ ॥

सुदर्शन बोला- मेरे पास न सेना है, न कोई सहायक है, न खजाना है, न सुरक्षित किला है, न मित्र हैं, न सुहृद् हैं तथा न तो मेरी रक्षा करनेवाले कोई राजा ही हैं ॥ १ ९ ॥ यहाँपर स्वयंवर होनेका समाचार सुनकर उसे देखनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ । देवी भगवतीने स्वप्नमें मुझे यहाँ आनेकी प्रेरणा दी है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २० ॥

मेरी अन्य कोई अभिलाषा नहीं है । मुझे यहाँ आनेके लिये जगज्जननी भगवतीने आदेश दिया है । उन्होंने जो विधान रच दिया होगा, वह होकर ही रहेगा; इसमें कोई संशय नहीं है ॥२१ ॥

हे राजागण! इस संसारमें मेरा कोई शत्रु नहीं है । मैं सर्वत्र भवानी जगदम्बाको विराजमान देख | रहा हूँ ॥ २२ ॥

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३४६ यः करिष्यति शत्रुत्वं मया सह नृपात्मजाः शास्ता तस्य महाविद्या नाहं जानामि शत्रुताम् यद्भावि तद्वै भविता नान्यथा नृपसत्तमाः का चिन्ता ह्यत्र कर्तव्या दैवाधीनोऽस्मि सर्वदा देवभूतमनुष्येषु सर्वभूतेषु सर्वदा सर्वेषां तत्कृता शक्तिर्नान्यथा नृपसत्तमाः सायं चिकीर्षते भूपं तं करोति नृपाधिपाः निर्धनं वा नरं कामं का चिन्ता वै तदा मम ॥ तामृते परमां शक्तिं ब्रह्मविष्णुहरादयः न शक्ताः स्पन्दितुं देवाः का चिन्ता मे तदा नृपाः अशक्तो वा सशक्तो वा यादृशस्तादृशस्त्वहम् । तदाज्ञया नृपाद्यैव सम्प्राप्तोऽस्मि स्वयंवरे सा यदिच्छति तत्कुर्यान्मम किं चिन्तनेन वै नात्र शङ्का प्रकर्तव्या सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥

ज पराजये लज्जा न मेऽत्राण्वपि पार्थिवाः ।

भगवत्यास्तु लज्जास्ति तदधीनोऽस्मि सर्वथा ॥

व्यास उवाच

इति तस्य तदाकर्ण्य वचनं राजसत्तमाः ।

ऊचुः परस्परं प्रेक्ष्य निश्चयज्ञा नराधिपाः ॥

सत्यमुक्तं त्वया साधो न मिथ्या कर्हिचिद्भवेत् ।

तथाप्युज्जयनीनाथस्त्वां हन्तुं परिकाङ्क्षति ॥

त्वत्कृतेन दयादिष्टा त्वां ब्रवीमो महामते ।

यदुक्तं तत्त्वया कार्यं विचार्य मनसानघ ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २० । हे राजकुमारो! जो कोई भी प्राणी मुझसे ॥ २३ शत्रुता करेगा, उसे महाविद्या जगदम्बा दण्डित करेंगी; मैं तो वैर - भाव जानता ही नहीं ॥ २३ ॥

हे श्रेष्ठ राजाओ! जो होना है, वह अवश्य ही । होगा; उसके विपरीत कुछ भी नहीं हो सकता । अतः ॥ २४ इस विषयमें क्या चिन्ता की जाय? मैं तो सदा प्रारब्धपर भरोसा करता हूँ? ॥२४ ॥

। हे श्रेष्ठ राजाओ! देवताओं, दानवों, मनुष्यों || २५ | तथा सभी प्राणियोंमें एकमात्र जगदम्बाकी शक्ति ही विद्यमान है । उनके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं । है ॥ २५ ॥

२६ हे महाराजाओ! वे जिस मनुष्यको राजा बनाना चाहती हैं, उसे राजा बना देती हैं और जिसे निर्धन । बनाना चाहती हैं, उसे निर्धन बना देती हैं; तब मुझे किस बातकी चिन्ता? ॥ २६ ॥

॥ २७ हे राजाओ! ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी उन महाशक्तिके बिना हिलने - डुलने में भी समर्थ नहीं हैं, तब मुझे क्या चिन्ता? ॥ २७ ॥

॥ २८ मैं शक्तिसम्पन्न हूँ या शक्तिहीन, जैसा भी हूँ वैसा आपके समक्ष हूँ । हे राजाओ! मैं उन्हीं भगवतीकी । आज्ञासे ही इस स्वयंवरमें आया हुआ हूँ ॥ २८ ॥

२ ९ वे भगवती जो चाहेंगीं, सो करेंगीं । मेरे सोचनेसे क्या होगा? मैं यह सत्य कह रहा हूँ, इस विषयमें शंका नहीं करनी चाहिये ॥ २ ९ ॥ हे राजाओ! जय अथवा पराजयमें मुझे अणुमात्र ३० भी लज्जा नहीं है । लज्जा तो उन भगवतीको होगी; क्योंकि मैं तो सर्वथा उन्हींके अधीन हूँ ॥ ३० ॥

व्यासजी बोले – - [ हे राजन्! ] उस सुदर्शनकी यह बात सुनकर सभी श्रेष्ठ राजागण उसके निश्चयको ३१ जान गये और एक - दूसरेको देखकर उन राजाओंने सुदर्शनसे कहा - हे साधो! आपने सत्य कहा है, आपका कथन कभी मिथ्या नहीं हो सकता । तथापि उज्जयिनीपति महाराज युधाजित् आपको मार डालना ३२ चाहते हैं । हे महामते! हमें आपके ऊपर दया आ रही है, इसीलिये हमने आपको यह सब बता दिया । हे अनघ! अब आपको जो उचित जान पड़े, वैसा मनसे ३३ । खूब सोच - समझकर कीजिये॥३१–३३ ॥

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अ ० २० ] तृतीय स्कन्ध ३४७ सुदर्शन उवाच

सत्यमुक्तं भवद्भिश्च कृपावद्भिः सुहृज्जनैः ।

किं ब्रवीमि पुनर्वाक्यमुक्त्वा नृपतिसत्तमाः ॥

न मृत्युः केनचिद्भाव्यः कस्यचिद्वा कदाचन ।

दैवाधीनमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥

स्ववशोऽयं न जीवोऽस्ति स्वकर्मवशगः सदा । तत्कर्म त्रिविधं प्रोक्तं विद्वद्भिस्तत्त्वदर्शिभिः

सञ्चितं वर्तमानञ्च प्रारब्धञ्च तृतीयकम् ।

कालकर्मस्वभावैश्च ततं सर्वमिदं जगत् ॥

न देवो मानुषं हन्तुं शक्तः कालागमं विना । हतं निमित्तमात्रेण हन्ति कालः सनातनः यथा पिता मे निहतः सिंहेनामित्रकर्षणः । तथा मातामहोऽप्येवं युद्धे युधाजिता हतः यत्नकोटिं प्रकुर्वाणो हन्यते दैवयोगतः जीवेद्वर्षसहस्राणि रक्षणेन विना नरः नाहं बिभेमि धर्मिष्ठाः कदाचिच्च युधाजितः दैवमेव परं मत्वा सुस्थितोऽस्मि सदा नृपाः स्मरणं सततं नित्यं भगवत्याः करोम्यहम् विश्वस्य जननी देवी कल्याणं सा करिष्यति पूर्वार्जितं हि भोक्तव्यं शुभं वाप्यशुभं तथा स्वकृतस्य च भोगेन कीदृक्शोको विजानताम् स्वकर्मफलयोगेन प्राप्य दुःखमचेतनः निमित्तकारणे वैरं करोत्यल्पमतिः किल सुदर्शन बोला- आप सब बड़े कृपालु एवं सहृदय - जनोंने सत्य ही कहा है, किंतु हे श्रेष्ठ राजागण! अब मैं अपनी पूर्वकथित बात फिरसे क्या ३४ दोहराऊँ! ॥ ३४ ॥

किसीकी भी मृत्यु किसीसे भी कभी भी नहीं हो सकती; क्योंकि यह सम्पूर्ण चराचर जगत् तो ३५ दैवके अधीन है ॥ ३५ ॥

यह जीव भी स्वयं अपने वशमें नहीं है; यह सदा अपने कर्मके अधीन रहता है । तत्त्वदर्शी ॥ ३६ विद्वानोंने उस कर्मके तीन प्रकार बतलाये हैं-संचित, वर्तमान तथा प्रारब्ध | यह सम्पूर्ण जगत् काल, कर्म तथा स्वभावसे व्याप्त है ॥ ३६-३७ ॥ बिना कालके आये देवता भी किसी ३७ मनुष्यको मारनेमें समर्थ नहीं हो सकते । किसीको भी मारनेवाला तो निमित्तमात्र होता है; वास्तविकता यह है कि सभीको अविनाशी काल ही मारता ॥ ३८ है ॥ ३८ ॥

जैसे शत्रुओंका शमन सिंहने मार डाला । वैसे ही ॥ ३ ९ युधाजित्ने मार डाला ॥ ३ ९ ॥ प्रारब्ध पूरा हो जानेपर । भी अन्ततः मनुष्य मर ही अनुकूल रहनेपर बिना किसी करनेवाले मेरे पिताको मेरे नानाको भी युद्धमें करोड़ों प्रयत्न करनेपर जाता है और दैवके रक्षाके ही वह हजारों ॥ ४० वर्षोंतक जीवित रहता है ॥४० ॥

हे धर्मनिष्ठ राजाओ! मैं युधाजित्से कभी नहीं । डरता । मैं दैवको ही सर्वोपरि मानकर पूर्णरूपसे ॥ ४१ निश्चिन्त रहता हूँ ॥ ४१ ॥

मैं नित्य - निरन्तर भगवतीका स्मरण करता रहता । हूँ । विश्वकी जननी वे भगवती ही कल्याण करेंगी ॥ ४२ ॥

॥ ४२ पूर्वजन्ममें किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मोंका फल प्राणीको भोगना ही पड़ता है; तो फिर । अपने द्वारा किये गये कर्मका फल भोगनेमें विवेकी पुरुषों को शोक कैसा? ॥ ४३ ॥

॥ ४३ अपने द्वारा उपार्जित कर्मफल भोगनेमें दुःख प्राप्त होनेके कारण अज्ञानी तथा अल्पबुद्धिवाला । प्राणी निमित्त कारणके प्रति शत्रुता करने लगता ॥ ४४ है ॥ ४४ ॥

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३४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०

न तथाहं विजानामि वैरं शोकं भयं तथा ।

निःशङ्कमिह सम्प्राप्तः समाजे भूभृतामिह ॥

एकाकी द्रष्टुकामोऽहं स्वयंवरमनुत्तमम् ।

भविष्यति च यद्भाव्यं प्राप्तोऽस्मि चण्डिकाज्ञया ॥

भगवत्याः प्रमाणं मे नान्यं जानामि संयतः ।

तत्कृतं च सुखं दुःखं भविष्यति च नान्यथा ॥

युधाजित्सुखमाप्नोतु न मे वैरं नृपोत्तमाः ।

यः करिष्यति मे वैरं स प्राप्स्यति फलं तथा ॥

व्यास उवाच

इत्युक्तास्ते तथा तेन सन्तुष्टा भूभुजः स्थिताः ।

सोऽपि स्वमाश्रमं प्राप्य सुस्थितः सम्बभूव ह ॥

अपरेऽह्नि शुभे काले नृपाः सम्मन्त्रिताः किल ।

सुबाहुना नृपेणाथ रुचिरे वै स्वमण्डपे ॥

दिव्यास्तरणयुक्तेषु मञ्चेषु रचितेषु च ।

उपविष्टाश्च राजानः शुभालङ्करणैर्युताः ॥

दिव्यवेषधराः कामं विमानेष्वमरा इव ।

दीप्यमानाः स्थितास्तत्र स्वयंवरदिदृक्षया ॥

इति चिन्तापराः सर्वे कदा साप्यागमिष्यति ।

भाग्यवन्तं नृपश्रेष्ठं श्रुतपुण्यं वरिष्यति ॥

यदा सुदर्शनं दैवात्स्त्रजा सम्भूषयेदिह ।

विवादो वै नृपाणां च भविता नात्र संशयः ॥

इत्येवं चिन्त्यमानास्ते भूपा मञ्चेषु संस्थिताः ।

वादित्रघोषः सुमहानुत्थितो नृपमण्डपे ॥

उनकी भाँति मैं वैर, शोक तथा भयको नहीं ४५ जानता । अतः मैं राजाओंके इस समाजमें भयरहित होकर आया हुआ हूँ ॥ ४५ ॥

जो होना है, वह तो होकर ही रहेगा । मैं तो भगवतीके आदेशसे इस उत्कृष्ट स्वयंवरको देखनेकी ४६ अभिलाषासे यहाँ अकेला ही आया हूँ ॥ ४६ ॥

मैं भगवतीके वचनको ही प्रमाण मानता हूँ और उनकी आज्ञाके अधीन रहता हुआ मैं अन्य ४७ किसीको नहीं जानता । उन्होंने सुख - दुःखका जो विधान कर दिया है, वही प्राप्त होगा, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं ॥४७ ॥

४८ श्रेष्ठ राजाओ! युधाजित् सुखी रहें । मेरे मनमें उनके प्रति वैरभाव नहीं है । जो मुझसे शत्रुता करेगा, वह उसका फल पायेगा ॥ ४८ ॥

व्यासजी बोले- उस सुदर्शनके इस प्रकार कहनेपर वहाँ उपस्थित सभी राजा अत्यन्त प्रसन्न ४ ९ हो गये । वह भी अपने निवासमें आकर शान्तभावसे बैठ गया ॥ ४ ९ ॥ तदनन्तर दूसरे दिन शुभ मुहूर्तमें राजा ५० सुबाहुने अपने भव्य मण्डपमें सभी राजाओंको बुलाया ॥ ५० ॥

उस मण्डपमें दिव्य आसनोंसे सुशोभित पूर्णरूपसे सजाये गये मंचोंपर मनोहारी आभूषणोंसे अलंकृत ५१ राजागण विराजमान हुए ॥ ५१ ॥

स्वयंवर देखनेकी इच्छासे वहाँ मंचोंपर विराजमान वे दिव्य वेषधारी देदीप्यमान राजागण विमानपर बैठे ५२ हुए देवताओंकी भाँति प्रतीत हो रहे थे ॥ ५२ ॥

सभी राजा इस बात के लिये बहुत चिन्तित थे कि वह राजकुमारी कब आयेगी और किस ५३ पुण्यवान् तथा भाग्यशाली श्रेष्ठ नरेशका वरण करेगी? ॥ ५३ ॥

संयोगवश यदि राजकुमारीने सुदर्शनके गलेमें माला डाल दी तो राजाओंमें परस्पर कलह होने ५४ लगेगा; इसमें सन्देह नहीं है ॥५४ ॥

मंचोंपर विराजमान राजालोग ऐसा सोच ही रहे थे तभी राजा सुबाहुके भवनमें वाद्योंकी ध्वनि होने ५५ | लगी ॥ ५५ ॥

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अ ० २० ] तृतीय

अथ काशीपतिः प्राह सुतां स्नातां स्वलंकृताम् ।

मधूकमालासंयुक्तां क्षौमवासोविभूषिताम् ॥५६

विवाहोपस्करैर्युक्तां दिव्यां सिन्धुसुतोपमाम् ।

चिन्तापरां सुवसनां स्मितपूर्वमिदं वचः ॥ ५७

उत्तिष्ठ पुत्र सुनसे करे धृत्वा शुभां स्त्रजम् ।

व्रज मण्डपमध्येऽद्य समाजं पश्य भूभुजाम् ॥ ५८

गुणवान् रूपसम्पन्नः कुलीनश्च नृपोत्तमः ।

तव चित्ते वसेद्यस्तु तं वृणुष्व सुमध्यमे ॥ ५ ९

देशदेशाधिपाः सर्वे मञ्चेषु रचितेषु च ।

संविष्टाः पश्य तन्वङ्गि वरयस्व यथारुचि ॥ ६०

व्यास उवाच

तं तथा भाषमाणं वै पितरं मितभाषिणी ।

उवाच वचनं बाला ललितं धर्मसंयुतम् ॥ ६१

शशिकलोवाच

नाहं दृष्टिपथे राज्ञां गमिष्यामि पितः किल ।

कामुकानां नरेशानां गच्छन्त्यन्याश्च योषितः ॥ ६२

धर्मशास्त्रे श्रुतं तात मयेदं वचनं किल ।

एक एव वरो नार्या निरीक्ष्यः स्यान्न चापरः ॥ ६३

सतीत्वं निर्गतं तस्या या प्रयाति बहूनथ ।

संकल्पयन्ति ते सर्वे दृष्ट्वा मे भवतात्त्विति ॥ ६४

स्वयंवरे स्वजं धृत्वा यदागच्छति मण्डपे ।

सामान्या सा तदा जाता कुलटेवापरा वधूः ॥ ६५

वारस्त्री विपणे गत्वा यथा वीक्ष्य नरान्स्थितान् ।

गुणागुणपरिज्ञानं करोति निजमानसे ॥ ६६

स्कन्ध ३४ ९ तत्पश्चात् स्नान करके भलीभाँति अलंकृत, मधूक पुष्पकी माला धारण किये, रेशमी वस्त्रसे सुशोभित, विवाह के अवसरपर धारणीय सभी पदार्थोंसे युक्त, लक्ष्मीके सदृश दिव्य स्वरूपवाली, चिन्तामग्न तथा सुन्दर वस्त्रोंवाली शशिकलासे मुसकराकर महाराज सुबाहुने यह वचन कहा- ॥ ५६-५७ ॥ हे सुन्दर नासिकावाली पुत्रि! उठो और हाथमें यह सुन्दर माला लेकर मण्डपमें चलो और वहाँपर विराजमान राजाओंके समुदायको देखो ॥ ५८ ॥

हे सुमध्यमे! उन राजाओंमें जो गुणसम्पन्न, रूपवान् और उत्तम कुलमें उत्पन्न श्रेष्ठ राजा तुम्हारे मनमें बस जाय, उसका वरण कर लो ॥५ ९ ॥ देश - देशान्तरके सभी राजागण सम्यक् रूपसे सजाये गये मंचोंपर विराजमान हैं । हे तन्वंगि! इन्हें देखो और अपनी इच्छाके अनुसार वरण कर लो ॥ ६० ॥

व्यासजी बोले- तब ऐसा कहते हुए अपने पितासे मितभाषिणी उस कन्या शशिकलाने लालित्यपूर्ण एवं धर्मसंगत बात कही ॥ ६१ ॥

शशिकला बोली- हे पिताजी! मैं इन राजाओंके सम्मुख बिलकुल नहीं जाऊँगी । ऐसे कामासक्त राजाओंके सामने अन्य प्रकारकी स्त्रियाँ ही जाती हैं ॥ ६२ ॥

हे तात! मैंने धर्मशास्त्रोंमें यह वचन सुना है कि नारीको एक ही वरपर दृष्टि डालनी चाहिये, किसी दूसरेपर नहीं ॥ ६३ ॥

जो स्त्री अनेक पुरुषोंके समक्ष उपस्थित होती है, उसका सतीत्व विनष्ट हो जाता है; क्योंकि उसे देखकर वे सभी अपने मनमें यही संकल्प कर लेते हैं कि यह स्त्री किसी तरहसे मेरी हो जाय ॥ ६४ ॥

कोई स्त्री अपने हाथमें जयमाल लेकर जब स्वयंवरमण्डपमें आती है तो वह एक साधारण स्त्री हो जाती है और उस समय वह एक व्यभिचारिणी स्त्रीकी भाँति प्रतीत होती है ॥ ६५ ॥

जिस प्रकार एक वारांगना बाजारमें जाकर वहाँ स्थित पुरुषोंको देखकर अपने मनमें उनके गुण-दोषोंका आकलन करती है और जैसे अनेक प्रकारके | चंचल भावोंसे युक्त वह वेश्या किसी कामी पुरुषको

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३५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१ नैकभावा यथा वेश्या वृथा पश्यति कामुकम् । बिना किसी प्रयोजनके व्यर्थ ही देखती रहती है, उसी तथाहं मण्डपे गत्वा कुर्वे वारस्त्रिया कृतम् ॥ ६७ प्रकार स्वयंवर - मण्डपमें जाकर मुझे भी उसीके सदृश व्यवहार करना पड़ेगा ॥ ६६-६७ ॥ इस समय मैं अपने कुलके वृद्धजनोंद्वारा स्थापित वृद्धैरेतैः कृतं धर्मं न करिष्यामि साम्प्रतम् । किये गये इस स्वयंवरनियमका पालन नहीं करूँगी । पत्नीव्रतं तथा कामं करिष्येऽहं धृतव्रता ॥ ६८ मैं अपने संकल्पपर अटल रहती हुई पत्नीव्रत - धर्मका सामान्या प्रथमं गत्वा कृत्वा संकल्पितं बहु वृणोति चैकं तद्वद्वै वृणोमि कथमद्य वै ॥

सुदर्शनो मया पूर्वं वृतः सर्वात्मना पितः ।

तमृते नान्यथा कर्तुमिच्छामि नृपसत्तम ॥

विवाहविधिना देहि कन्यादानं शुभे दिने ।

सुदर्शनाय नृपते यदीच्छसि शुभं मम ॥

पूर्णरूपसे आचरण करूँगी ॥ ६८ ॥

सामान्य कन्या स्वयंवर - मण्डपमें पहुँचकर पहले । अनेक संकल्प - विकल्प करनेके पश्चात् अन्ततः ६ ९ किसी एकका वरण कर लेती है; उसके समान मैं भी पतिका वरण क्यों करूँ? ॥६ ९ ॥ हे पिताजी! मैंने पूरे मनसे सुदर्शनका पहले ही वरण कर लिया है । हे महाराज! उस सुदर्शनके ७० अतिरिक्त मैं किसी अन्यको पतिके रूपमें स्वीकार नहीं कर सकती ॥ ७० ॥

हे राजन्! यदि आप मेरा हित चाहते हैं तो किसी शुभ दिनमें वैवाहिक विधि - विधान से कन्यादान ७१ करके मुझे सुदर्शनको सौंप दीजिये ॥ ७१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे स्वपितरं प्रति शशिकलावाक्यं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

अथैकविंशोऽध्यायः राजा सुबाहुका राजाओंसे अपनी कन्याकी इच्छा बताना, युधाजित्का क्रोधित होकर सुबाहुको फटकारना तथा अपने दौहित्रसे शशिकलाका विवाह करनेको कहना, माताद्वारा शशिकलाको पुनः समझाना, किंतु शशिकलाका अपने निश्चयपर दृढ़ रहना व्यास उवाच

सुबाहुरपि तच्छ्रुत्वा युक्तमुक्तं तया तदा ।

चिन्ताविष्टो बभूवाशु किं कर्तव्यमितः परम् ॥ १

सङ्गताः पृथिवीपालाः ससैन्याः सपरिग्रहाः ।

उपविष्टाश्च मञ्चेषु योद्धुकामा महाबलाः ॥ २

यदि ब्रवीमि तान्सर्वान्सुता नायाति साम्प्रतम् ।

तथापि कोपसंयुक्ता हन्युर्मां दुष्टबुद्धयः ॥ ३

व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] महाराज सुबाहु पुत्रीके द्वारा कही गयी युक्तिसंगत बातें सुनकर इस चिन्तामें पड़ गये कि अब आगे क्या किया जाय? अपने - अपने सैनिकों तथा सेवकोंके साथ यहाँ आये हुए और युद्धकी इच्छावाले अनेक महाबली नरेश मंचोंपर बैठे हुए हैं ॥ १-२ ॥ इस समय यदि मैं उन सभीसे यह कहूँ कि कन्या नहीं आ रही है, तो दुष्ट बुद्धिवाले वे राजा क्रोधित होकर मुझे मार ही डालेंगे ॥ ३ ॥

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अ ० २१ ] तृतीय

न मे सैन्यबलं तादृङ्न दुर्गबलमद्भुतम् ।

येनाहं नृपतीन्सर्वान् प्रत्यादेष्टुमिहोत्सहे ॥ ४

सुदर्शनस्तथैकाकी ह्यसहायोऽधनः शिशुः ।

किं कर्तव्यं निमग्नोऽहं सर्वथा दुःखसागरे ॥ ५

इति चिन्तापरो राजा जगाम नृपसन्निधौ ।

प्रणम्य तानुवाचाथ प्रश्रयावनतो नृपः ॥ ६

किं कर्तव्यं नृपाः कामं नैति मे मण्डपे सुता ।

बहुशः प्रेर्यमाणापि सा मात्रापि मयापि च ॥ ७

मूर्ध्ना पतामि पादेषु राज्ञां दासोऽस्मि साम्प्रतम् ।

पूजादिकं गृहीत्वाद्य व्रजन्तु सदनानि वः ॥ ८

ददामि बहुरत्नानि वस्त्राणि च गजान् रथान् । गृहीत्वाद्य कृपां कृत्वा व्रजन्तु भवनान्युत । ९

न वशे मे सुता बाला यदि म्रियेत खेदिता ।

तदा मे स्यान्महद्दुःखं तेन चिन्तातुरोऽस्म्यहम् ॥ १०

भवन्तः करुणावन्तो महाभाग्या महौजसः ।

किमेतया दुहित्रा मे मन्दया दुर्विनीतया ॥ ११

अनुग्राह्योऽस्मि वः कामं दासोऽहमिति सर्वथा ।

सुता सुतेव मन्तव्या भवद्भिः सर्वथा मम ॥ १२

व्यास उवाच

श्रुत्वा सुबाहुवचनं नोचुः केचन भूमिपाः ।

युधाजित्क्रोधताम्राक्षस्तमुवाच रुषान्वितः ॥ १३

राजन् मूर्खोऽसि किं ब्रूषे कृत्वा कार्यं सुनिन्दितम् ।

स्वयंवरः कथं मोहाद्रचितः संशये सति ॥ १४

स्कन्ध ३५१ मेरे पास न तो वैसा सैन्यबल है और न तो सुरक्षार्थ अद्भुत किला ही है, जिससे मैं इस समय उन सभीको पराजित कर सकूँ ॥४ ॥

यह बालक सुदर्शन भी निस्सहाय, निर्धन तथा अकेला है । मैं तो हर तरहसे दुःखसागरमें डूब चुका हूँ । अब मुझे इस समय क्या करना चाहिये? ॥५ ॥

इस प्रकार चिन्ताकुल राजा सुबाहु राजाओंके पास गये और उन सबको प्रणाम करके अत्यन्त विनीतभावसे उन्होंने कहा - हे महाराजाओ! अब मैं क्या करूँ? मेरे तथा अपनी माताके द्वारा बहुत प्रेरित किये जानेपर भी मेरी पुत्री मण्डपमें नहीं आ रही है ॥ ६-७ ॥ मैं आपलोगोंका दास हूँ और सभी राजाओंके चरणोंपर अपना सिर रखकर निवेदन करता हूँ कि आपलोग पूजा - सत्कार ग्रहण करके इस समय अपने - अपने घर लौट जायँ ॥ ८ ॥

मैं आपलोगों को बहुत - से रत्न, वस्त्र, हाथी तथा रथ देता हूँ । इन्हें स्वीकारकर कृपा करके आपलोग अपने - अपने भवन चले जायँ ॥ ९ ॥

मेरी पुत्री मेरे वशमें नहीं है । यदि वह बेचारी

खिन्न होकर मर गयी तो मुझे महान् दुःख होगा ।

इसीसे मैं अत्यन्त चिन्तित हूँ ॥ १० ॥

आपलोग बड़े दयालु, भाग्यवान् तथा महान् तेजस्वी हैं तो फिर मेरी इस मन्द बुद्धिवाली अविनीत कन्यासे आपलोगों को क्या लाभ होगा? ॥ ११ ॥

मैं आपलोगोंका हर तरहसे सेवक हूँ, अतएव आपलोग मुझपर कृपा करें । आप सभी लोग मेरी इस पुत्रीको अपनी ही पुत्री समझें ॥ १२ ॥

व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] सुबाहुका वचन सुनकर अन्य राजागण तो नहीं बोले, किंतु क्रोधसे आँखें लाल करके युधाजित्ने उनसे रोषपूर्वक कहा— हे राजन्! आप तो बड़े मूर्ख हैं । ऐसा निन्दनीय कृत्य करनेके बाद भी आप कैसे इस प्रकारकी बात बोल रहे हैं? यदि संशयकी स्थिति थी तो आपने अज्ञानतावश । स्वयंवरका आयोजन ही क्यों किया? ॥ १३-१४ ॥