देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 371–380

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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३६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३

सुदर्शनस्तदोवाच श्वशुरं संशितव्रतः ।

अस्मान्विसर्जयाशु त्वं गमिष्यामो ह्यशङ्किताः ॥ ४

भारद्वाजाश्रमं पुण्यं गत्वा तत्र समाहिताः ।

निवासाय विचारो वै कर्तव्यः सर्वथा नृप ॥५

नृपेभ्यश्च न कर्तव्यं भयं किञ्चित्त्वयानघ ।

जगन्माता भवानी मे साहाय्यं वै करिष्यति ॥ ६

व्यास उवाच

मतमाज्ञाय जामातुर्नृपसत्तमः ।

विससर्ज धनं दत्त्वा प्रतस्थे सोऽपि सत्वरः ॥ ७

बलेन महताविष्टो ययावनु नृपोत्तमः ।

सुदर्शनो वृतस्तत्र चचाल पथि निर्भयः ॥ ८

रथैः परिवृतः शूरः सदारो रथसंस्थितः ।

गच्छन्ददर्श सैन्यानि नृपाणां रघुनन्दनः ॥

सुबाहुरपि तान्वीक्ष्य चिन्ताविष्टो बभूव ह ।

विधिवत्स शिवां चित्ते जगाम शरणं मुदा ॥ १०

जजापैकाक्षरं मन्त्रं कामराजमनुत्तमम् ।

निर्भयो वीतशोकश्च पल्या सह नवोढया ॥ ११

ततः सर्वे महीपालाः कृत्वा कोलाहलं तदा ।

उत्थिताः सैन्यसंयुक्ता हन्तुकामास्तु कन्यकाम् ॥ १२

काशिराजस्तु तान्दृष्ट्वा हन्तुकामो बभूव ह ।

निवारितस्तदात्यर्थं राघवेण जिगीषता ॥ १३

तत्रापि नेदुः शङ्खाश्च भेर्यश्चानकदुन्दुभिः ।

सुबाहोश्च नृपाणाञ्च परस्परजिघांसताम् ॥ १४

शत्रुजित्तु सुसंवृत्तः स्थितस्तत्र जिघांसया ।

युधाजित्तत्सहायार्थं सन्नद्धः प्रबभूव ह ॥ १५

तब व्रतपरायण सुदर्शनने अपने श्वसुरसे कहा - आप हमें शीघ्र विदा कर दीजिये, हम निःशंक होकर चले जायँगे ॥ ४ ॥

हे राजन्! भारद्वाजमुनिके पवित्र आश्रममें पहुँचनेपर वहीं सावधानीके साथ आगे रहनेके लिये विचार कर लिया जायगा ॥५ ॥

अतः हे पुण्यात्मन्! उन राजाओंसे आप कुछ भी भय न करें; क्योंकि जगज्जननी भगवती मेरी सहायता अवश्य करेंगी ॥ ६ ॥

व्यासजी बोले- अपने जामाता सुदर्शनका ऐसा विचार जानकर नृपश्रेष्ठ सुबाहुने उन्हें धन देकर विदा कर दिया और वे सुदर्शन भी तत्काल चल पड़े । नृपश्रेष्ठ सुबाहु भी एक विशाल सेना लेकर उनके पीछे - पीछे चले । इस प्रकार उन सैनिकोंसे आवृत सुदर्शन निर्भय होकर मार्गमें चले जा रहे थे ॥ ७-८ ॥ रथोंसे घिरे हुए एक रथपर अपनी पत्नीके साथ बैठकर जाते हुए रघुनन्दन सुदर्शनने मार्गमें उन राजाओंके सैनिकों को देखा ॥ ९ ॥

राजा सुबाहु भी उन सैनिकोंको देखकर चिन्तित हुए । तब सुदर्शनने विधिपूर्वक अपने मनमें भगवती जगदम्बाका ध्यान किया और प्रसन्नतापूर्वक उनकी शरण ली । उस समय सुदर्शन एकाक्षर कामराज नामक सर्वोत्तम मन्त्रका जप कर रहे थे, उसके प्रभावसे वे अपनी नवविवाहिता पत्नीके साथ निर्भय तथा चिन्तामुक्त थे ॥ १०-११ ॥ इसी बीच सभी राजा एक साथ कोलाहल करके कन्याका हरण करनेकी इच्छासे अपनी - अपनी सेनाके साथ उनकी ओर बढ़े ॥ १२ ॥

उन्हें ऐसा करते देखकर काशीनरेश सुबाहुने उनको मारनेका विचार किया, किंतु विजयकी इच्छावाले रघुवंशी सुदर्शनने उन्हें मना कर दिया ॥ १३ ॥

उस समय एक दूसरेको मार डालनेकी अभिलाषावाले महाराज सुबाहु तथा अन्य राजाओंकी सेनाओंमें शंख भेरी, नगाड़े और दुन्दुभि बजने लगे ॥ १४ ॥

सुदर्शनको मार डालनेकी इच्छासे शत्रुजित् सैन्य बलसे युक्त होकर बड़ी तत्परता से तैयार खड़ा था और राजा युधाजित् भी उसकी सहायताके लिये

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अ ० २३ ]

केचिच्च प्रेक्षकास्तस्य सहानीकैः स्थितास्तदा ।

युधाजिदग्रतो गत्वा सुदर्शनमुपस्थितः ॥

शत्रुजित्तेन सहितो हन्तुं भ्रातरमानुजः ।

परस्परं ते बाणौघैस्ततक्षुः क्रोधमूर्च्छिताः ॥

सम्मर्दः सुमहांस्तत्र सम्प्रवृत्तः सुमार्गणैः ।

काशीपतिस्तदा तूर्णं सैन्येन बहुना वृतः ॥

साहाय्यार्थं जगामाशु जामातरमनिन्दितम् ।

एवं प्रवृत्ते संग्रामे दारुणे लोमहर्षणे ॥

प्रादुर्बभूव सहसा देवी सिंहोपरि स्थिता ।

नानायुधधरा रम्या वराभूषणभूषिता ॥

दिव्याम्बरपरीधाना मन्दारस्त्रक्सुसंयुता । तां दृष्ट्वा तेऽथ भूपाला विस्मयं परमं गताः

केयं सिंहसमारूढा कुतो वेति समुत्थिता ।

सुदर्शनस्तु तां वीक्ष्य सुबाहुमिति चाब्रवीत ॥

पश्य राजन् महादेवीमागतां दिव्यदर्शनाम् । अनुग्रहाय मे नूनं प्रादुर्भूता दयान्विता

निर्भयोऽहं महाराज जातोऽस्मि निर्भयादपि ।

सुदर्शनः सुबाहुश्च तामालोक्य वराननाम् ॥

प्रणामं चक्रतुस्तस्या मुदितौ दर्शनेन च ननाद च तदा सिंहो गजास्त्रस्ताश्चकम्पिरे ववुर्वाता महाघोरा दिशश्चासन्सुदारुणाः सुदर्शनस्तदा प्राह निजं सेनापतिं प्रति मार्गे व्रज त्वं तरसा भूपाला यत्र संस्थिताः किं करिष्यन्ति राजानः कुपिता दुष्टचेतसः शरणार्थञ्च सम्प्राप्ता देवी भगवती हि नः निरातङ्गैश्च गन्तव्यं मार्गेऽस्मिन्भूपसङ्कुले तृतीय स्कन्ध ३६३ सन्नद्ध थे । उनमें कुछ राजागण अपनी सेनाके साथ १६ दर्शकके रूपमें खड़े थे । तभी युधाजित् आगे बढ़कर सुदर्शनके समक्ष जा डटा । उसके साथ शत्रुजित् भी अपने भाईका वध करनेके लिये आ गया । तब १७ क्रोधके वशीभूत होकर वे सब परस्पर एक - दूसरेपर बाणोंसे प्रहार करने लगे । इस प्रकार वहाँ बाणोंद्वारा बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया । तब काशीनरेश सुबाहु १८ एक विशाल सेना लेकर अपने सुप्रशंसित जामाताकी सहायताके लिये जा पहुँचे ॥ १५–१८३ ॥ इस प्रकार भयानक लोमहर्षक संग्राम छिड़ १ ९ जानेपर सहसा भगवती प्रकट हो गयीं । वे सिंहपर सवार थीं, विविध प्रकारके शस्त्रास्त्र धारण किये थीं, अत्यन्त मनोहर थीं तथा उत्तम आभूषणोंसे अलंकृत २० थीं, दिव्य वस्त्र पहने थीं और मन्दारकी मालासे सुशोभित थीं ॥ १ ९ - २०३ ॥ उन्हें देखकर वे राजागण अत्यन्त चकित हो ॥ २१ गये । वे कहने लगे कि सिंहपर सवार यह स्त्री कौन है और कहाँसे प्रकट हो गयी है? उन्हें देखकर २२ सुदर्शनने सुबाहुसे कहा- हे राजन्! यहाँ प्रादुर्भूत हुई इन दिव्य दर्शनवाली महादेवीको आप देखें । ये दयामयी भगवती निश्चय ही मुझपर अनुग्रह करने के ॥ २३ लिये प्रकट हुई हैं । हे महाराज! मैं निर्भय तो पहले ही था, किंतु अब और भी अधिक निर्भय हो गया ॥ २१–२३३ ॥ २४ सुदर्शन और सुबाहुने उन सुमुखी भगवतीको देखकर उन्हें प्रणाम किया । उनके दर्शनसे वे दोनों । प्रसन्न हो गये । उसी समय भगवतीके सिंहने भीषण ॥ २५ गर्जन किया, जिससे उस रणभूमिमें विद्यमान सभी हाथी भयसे काँपने लगे । उस समय महाभीषण आँधी । चलने लगी और सभी दिशाएँ अत्यन्त भयानक हो ॥ २६ गयीं ॥ २४-२५३ ॥ तब सुदर्शनने अपने सेनापतिसे कहा कि जहाँ । ये राजागण [ मार्ग रोककर ] खड़े हैं, उधर ही तुम ॥ २७ वेगसे आगे बढ़ो । ये दुष्ट तथा कुपित राजालोग हमारा क्या कर लेंगे? अब हमें शरण देनेके लिये । स्वयं भगवती जगदम्बा आ गयी हैं । अतएव हमें ॥ २८ । निर्भय होकर राजाओंसे भरे इस मार्गपर आगे बढ़ना

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३६४

स्मृता मया महादेवी रक्षणार्थमुपागता ।

तच्छ्रुत्वा वचनं सेनापतिस्तेन पथाव्रजत् ॥

युधाजित्तु सुसंक्रुद्धस्तानुवाच महीपतीन् ।

किं स्थिता भयसन्त्रस्ता निघ्नन्तु कन्यकान्वितम् ॥

अवमन्य च नः सर्वान्बलहीनो बलाधिकान् ।

कन्यां गृहीत्वा संयाति निर्भयस्तरसा शिशुः ॥

किं भीताः कामिनीं वीक्ष्य सिंहोपरि सुसंस्थिताम् ।

नोपेक्ष्यो हि महाभागा हन्तव्यो ऽत्र समाहितैः ॥

हत्वैनं संग्रहीष्यामः कन्यां चारुविभूषणाम् ।

नायं केसरिणादत्तां छेत्तुमर्हति जम्बुकः ॥

इत्युक्त्वा सैन्यसंयुक्तः शत्रुजित्सहितस्तदा ।

योद्धुकामः सुसम्प्राप्तो युधाजित्क्रोधसंवृतः ॥

मुमोच विशिखांस्तूर्णं समपुंखाञ्छिलाशितान् ।

धनुराकृष्य कर्णान्तं कर्मारपरिमार्जितान् ॥

हन्तुकामः सुदुर्मेधाः सुदर्शनमथोपरि ॥

सुदर्शनस्तु तान्बाणैश्चिच्छेदापततः क्षणात् ॥

एवं युद्धे प्रवृत्तेऽथ चुकोप चण्डिका भृशम् ।

दुर्गादेवी मुमोचाथ बाणान्युधाजितं प्रति ॥

नानारूपा तदा जाता नानाशस्त्रधरा शिवा ।

सम्प्राप्ता तुमुलं तत्र चकार जगदम्बिका ॥

शत्रुजिन्निहतस्तत्र युधाजिदपि पार्थिवः ।

पतितौ तौ रथाभ्यां तु जयशब्दस्तदाभवत् ॥

विस्मयं परमं प्राप्ता भूपाः सर्वे विलोक्य ताम् ।

निधनं मातुलस्यापि भागिनेयस्य संयुगे ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ चाहिये | मेरे स्मरण करते ही मेरी रक्षाके लिये ये २ ९ भगवती आ गयी हैं । सुदर्शनका वचन सुनकर सेनापति उसी मार्गसे आगे बढ़ा ॥ २६ - २ ९ ॥ अतिशय कुपित होकर युधाजित्ने उन राजाओंसे कहा- तुमलोग भयभीत होकर खड़े क्यों हो; कन्यासहित ३० इस सुदर्शनको मार डालो ॥ ३० ॥

हम सभी बलवानोंका तिरस्कार करके यह बलहीन बालक कन्याको लेकर निर्भीकतापूर्वक बड़े ३१ वेगसे चला जा रहा है ॥ ३१ ॥

सिंहपर विराजमान उस स्त्रीको देखकर तुमलोग क्यों डरते हो? हे महाभाग राजाओ! इस समय ३२ सुदर्शनकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये और अत्यन्त सावधान होकर इसका वध कर देना चाहिये ॥ ३२ ॥

इसे मारकर हम सुन्दर आभूषण धारण करनेवाली कन्याको छीन लेंगे । हम सिंहसदृश वीरोंके भागको ३३ । यह सियार नहीं ले जा सकता ॥३३ ॥

ऐसा कहकर वह युधाजित् अत्यन्त कुपित हो [ अपने दौहित्र ] शत्रुजित् तथा विशाल सेनाको साथ ३४ लिये हुए युद्धकी इच्छासे आ डटा॥॥३४ ॥

अब वह कानतक धनुष खींचकर लोहकारके द्वारा सानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए, शिलापर घिसकर ३५ तेज किये गये तथा समान पुच्छयुक्त बाणोंको शीघ्रतापूर्वक छोड़ने लगा ॥ ३५ ॥

इस प्रकार उसके ऊपर प्रहार करके वह दुर्बुद्धि युधाजित् सुदर्शनको मार डालना चाहता था, किंतु ३६ सुदर्शनने उसके बाणोंको छूटते ही अपने बाणोंसे क्षणभरमें काट डाला ॥ ३६ ॥

वह भीषण युद्ध छिड़ जानेपर भगवती चण्डिका ३७ अत्यन्त क्रुद्ध हो उठीं और युधाजित्पर बाण बरसाने लगीं ॥ ३७ ॥

उस समय कल्याणमयी जगदम्बिका विविध ३८ रूप धारण कर लेती थीं । वे नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र लेकर घमासान युद्ध कर रही थीं ॥ ३८ ॥

कुछ ही क्षणोंमें शत्रुजित् और राजा युधाजित्-दोनों मार डाले गये और अपने - अपने रथोंसे गिर ३ ९ पड़े । उस समय जयजयकारकी ध्वनि होने लगी ॥ ३ ९ ॥ उस युद्धमें भगवतीको तथा मामा और भांजेकी ( नाना - नातीकी ) मृत्यु देखकर सभी राजा बहुत ४० । विस्मयमें पड़ गये ॥ ४० ॥

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अ ० २३ ]

सुबाहुरपि तद् दृष्ट्वा निधनं संयुगे तयोः ।

तुष्टाव परमप्रीतो दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम् ॥

सुबाहुरुवाच

नमो देव्यै जगद्धात्र्यै शिवायै सततं नमः ।

दुर्गायै भगवत्यै ते कामदायै नमो नमः ॥

नमः शिवायै शान्त्यै ते विद्यायै मोक्षदे नमः । विश्वव्याप्त्यै जगन्मातर्जगद्धात्र्यै नमः शिवे नाहं गतिं तव धिया परिचिन्तयन्वै जानामि देवि सगुणः किल निर्गुणायाः किं स्तौमि विश्वजननीं प्रकटप्रभावां भक्तार्तिनाशनपरां परमां च शक्तिम् ॥ वाग्देवता त्वमसि सर्वगतैव बुद्धि-विद्या मतिश्च गतिरप्यसि सर्वजन्तोः त्वां स्तौमि किं त्वमसि सर्वमनोनियन्त्री किं स्तूयते हि सततं खलु चात्मरूपम् ब्रह्मा हरश्च हरिरप्यनिशं स्तुवन्तो नान्तं गताः सुरवराः किल ते गुणानाम् क्वाहं विभेदमतिरम्ब गुणैर्वृतो वै वक्तुं क्षमस्तव चरित्रमहोऽप्रसिद्धः सत्सङ्गतिः कथमहो न करोति कामं प्रासङ्गिकापि विहिता खलु चित्तशुद्धिः जामातुरस्य विहितेन समागमेन प्राप्तं मयाद्भुतमिदं तव दर्शनं वै ब्रह्मापि वाञ्छति सदैव हरो हरिश्च सेन्द्राः सुराश्च मुनयो विदितार्थतत्त्वाः यद्दर्शनं जननि तेऽद्य मया दुरापं प्राप्तं विना दमशमादिसमाधिभिश्च तृतीय स्कन्ध ३६५ महाराज सुबाहु भी रणभूमिमें उन दोनोंका मरण ४१ देखकर बहुत प्रसन्न हुए और दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गाकी स्तुति करने लगे ॥ ४१ ॥

सुबाहु बोले— जगत्‌को धारण करनेवाली देवीको

नमस्कार है । भगवती शिवाको निरन्तर नमस्कार है ।

मनोरथ पूर्ण करनेवाली आप भगवती दुर्गाको बार-४२ बार नमस्कार है ॥ ४२ ॥

आप शिवा और शान्तिदेवीको नमस्कार है । हे मोक्षदायिनि! आप विद्यास्वरूपिणीको नमस्कार ॥ ४३ है । हे जगन्माता! हे शिवे! आप विश्वव्यापिनी तथा जगज्जननीको नमस्कार है ॥ ४३ ॥

हे देवि! मैं सगुण प्राणी अपनी बुद्धिसे बहुत । प्रकारसे चिन्तन करके भी आप निर्गुणा भगवतीकी गतिको नहीं जान पाता । हे विश्वजननि! प्रत्यक्ष ४४ प्रभाववाली, भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेमें तत्पर तथा परम शक्तिस्वरूपा आपकी स्तुति मैं कैसे करूँ? ॥ ४४ ॥

आप ही देवी सरस्वती हैं, आप ही बुद्धिरूपसे । सबके भीतर विराजमान हैं, आप ही सब प्राणियोंकी विद्या, मति और गति हैं और आप ही सबके मनका नियन्त्रण करती हैं, तब मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ? ॥ ४५ सर्वव्यापी आत्माके रूपकी भी स्तुति भला कभी की जा सकती है? ॥ ४५ ॥

देवताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु और शिव निरन्तर । आपकी स्तुति करते हुए भी आपके गुणोंके पार नहीं जा सके । तब हे अम्ब! भेदबुद्धिवाला, सत्त्व आदि गुणोंसे ॥ ४६ आबद्ध तथा अप्रसिद्ध एक तुच्छ जीव मैं आपके चरित्रका वर्णन करनेमें कैसे समर्थ हो सकता हूँ? ॥ ४६ ॥

अहो! सत्संग कौन - सा मनोरथ पूर्ण नहीं कर । देता? आपके इस प्रासंगिक संगसे ही मेरा चित्त शुद्ध हो गया । [ आपके भक्त ] अपने इस जामाता सुदर्शनके संगके प्रभावसे मैंने अनायास आपका यह अद्भुत ॥ ४७ दर्शन पा लिया ॥ ४७ ॥

हे जननि! ब्रह्मा, शिव, भगवान् विष्णु, इन्द्र-सहित सभी देवता तथा तत्त्वज्ञानी मुनिलोग भी आपके । जिस दर्शनको चाहते हैं, वह आपका दुर्लभ दर्शन मुझे बिना शम, दम तथा समाधि आदिके ही प्राप्त ॥ ४८ | हो गया ॥ ४८ ॥

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३६६ क्वाहं सुमन्दमतिराशु तवावलोकं क्वेदं भवानि भवभेषजमद्वितीयम् ज्ञातासि देवि सततं किल भावयुक्ता भक्तानुकम्पनपरामरवर्गपूज्या किं वर्णयामि तव देवि चरित्रमेतद् यद्रक्षितोऽस्ति विषमेऽत्र सुदर्शनोऽयम् । शत्रू हतौ सुबलिनौ तरसा त्वयाद्य भक्तानुकम्पि चरितं परमं पवित्रम् नाश्चर्यमेतदिति देवि विचारितेऽर्थे त्वं पासि सर्वमखिलं स्थिरजङ्गमं वै त्रातस्त्वया च विनिहत्य रिपुर्दयातः संरक्षितोऽयमधुना ध्रुवसन्धिसूनुः भक्तस्य सेवनपरस्य स्वयशोऽतिदीप्तं कर्तुं भवानि रचितं चरितं त्वयैतत् नोचेत्कथं सुपरिगृह्य सुतां मदीयां युद्धे भवेत्कुशलवाननवद्यशीलः शक्तासि जन्ममरणादिभयान्विहन्तुं किं चित्रमत्र किल भक्तजनस्य कामम् । त्वं गीयसे जननि भक्तजनैरपारा श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ हे भवानि! कहाँ अतिशय मन्दमति मैं और कहाँ । भवरूपी रोगके लिये औषधिस्वरूप आपका यह शीघ्र अद्वितीय दर्शन! हे देवि! मुझे ज्ञात हो गया कि आप ॥ ४ ९ सदा भावनायुक्त रहती हैं । देवसमूहद्वारा पूजी जानेवाली आप अपने भक्तोंपर अनुकम्पा करती हैं ॥ ४ ९ ॥ हे देवि! आपने इस भीषण संकटके समय जिस प्रकार इस सुदर्शनकी रक्षा की है, आपके इस चरित्रका मैं किस तरह वर्णन करूँ? आपने आज इसके दो बलवान् शत्रुओंको तत्काल मार डाला । ॥ ५० भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाला आपका यह चरित्र परम पवित्र है ॥ ५० ॥

हे देवि! विशेष विचार करनेपर ज्ञात होता है । कि आपका ऐसा करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आप अखिल स्थावर - जंगम जगत्की रक्षा ॥ ५१ करती हैं । आपने शत्रुको मारकर दयालुतावश ध्रुवसन्धिके पुत्र इस सुदर्शनकी इस समय रक्षा की ॥ ५१ ॥

हे भवानि! अपने सेवापरायण भक्तके यशको । अत्यन्त उज्ज्वल बनानेके लिये ही आपने इस चरित्रकी रचना की है, नहीं तो मेरी कन्याका ॥ ५२ पाणिग्रहण करके यह असमर्थ सुदर्शन युद्धमें सकुशल जीवित कैसे बच सकता था? ॥ ५२ ॥

जब आप अपने भक्तोंके जन्म - मरण आदि भयोंको नष्ट करनेमें समर्थ हैं, तब उसकी लौकिक अभिलाषा पूर्ण कर देना कौन बड़ी बात है? हे जननि! आप त्वं पापपुण्यरहिता सगुणागुणा च ॥५३ पाप - पुण्यसे रहित, सगुणा तथा निर्गुणा हैं; इसी त्वद्दर्शनादहमहो सुकृती कृतार्थो

जातोऽस्मि देवि भुवनेश्वरि धन्यजन्मा ।

बीजं न ते न भजनं किल वेद्मि मात-ज्ञतिस्तवाद्य महिमा प्रकटप्रभाव: ॥

व्यास उवाच

एवं स्तुता तदा देवी प्रसन्नवदना शिवा ।

उवाच तं नृपं देवी वरं वरय सुव्रत ॥

कारण भक्तजन सदा आपके गुण गाते रहते हैं ॥ ५३ ॥

हे देवि! हे भुवनेश्वरि! आज आपके दर्शनसे मैं पवित्र, कृतार्थ और धन्य जन्मवाला हो गया । है माता! मैं न आपका भजन जानता हूँ और न तो बीजमन्त्र जानता हूँ । मैं आपकी प्रत्यक्ष प्रभाववाली ५४ महिमाको आज जान गया ॥५४ ॥

व्यासजी बोले – महाराज सुबाहुके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवती शिवाका मुखमण्डल प्रसन्नताएँ भर गया । तब भगवतीने उन राजासे कहा- हे सुव्रत. ५५ । तुम वर माँगो ॥ ५५ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सुबाहुकृतदेवीस्तुतिवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

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अ ० २४ ] तृतीय स्कन्ध ३६७ अथ चतुर्विंशोऽध्यायः सुबाहुद्वारा भगवती दुर्गासे सदा काशीमें रहनेका वरदान माँगना तथा देवीका वरदान देना, सुदर्शनद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीका उसे अयोध्या जाकर राज्य करनेका आदेश देना, राजाओंका सुदर्शनसे अनुमति व्यास उवाच

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा भवान्याः स नृपोत्तमः ।

प्रोवाच वचनं तत्र सुबाहुर्भक्तिसंयुतः ॥ १

सुबाहुरुवाच

एकतो देवलोकस्य राज्यं भूमण्डलस्य च ।

एकतो दर्शनं ते वै न च तुल्यं कदाचन ॥ २

दर्शनात्सदृशं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु नास्ति मे ।

कं वरं देवि याचेऽहं कृतार्थोऽस्मि धरातले ॥ ३

एतदिच्छाम्यहं मातर्याचितुं वाञ्छितं वरम् ।

तव भक्तिः सदा मेऽस्तु निश्चला ह्यनपायिनी ॥ ४

नगरेऽत्र त्वया मातः स्थातव्यं मम सर्वदा ।

दुर्गादेवीति नाम्ना वै त्वं शक्तिरिह संस्थिता ॥ ५

रक्षा त्वया च कर्तव्या सर्वदा नगरस्य ह ।

यथा सुदर्शनस्त्रातो रिपुसंघादनामयः ॥ ६

तथात्र रक्षा कर्तव्या वाराणस्यास्त्वयाम्बिके ।

यावत्पुरी भवेद्भूमौ सुप्रतिष्ठा सुसंस्थिताः ॥ ७

तावत्त्वयात्र स्थातव्यं दुर्गे देवि कृपानिधे ।

वरोऽयं मम ते देयः किमन्यत्प्रार्थयाम्यहम् ॥ ८

विविधान्सकलान्कामान्देहि मे विद्विषो जहि ।

अभद्राणां विनाशञ्च कुरु लोकस्य सर्वदा ॥ ९

व्यास उवाच

इति सम्प्रार्थिता देवी दुर्गा दुर्गतिनाशिनी ।

तमुवाच नृपं तत्र स्तुत्वा वै संस्थितं पुरः ॥ १०

दुर्गोवाच

राजन् सदा निवासो मे मुक्तिपुर्यां भविष्यति ।

रक्षार्थं सर्वलोकानां यावत्तिष्ठति मेदिनी ॥ ११

लेकर अपने - अपने राज्योंको प्रस्थान व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] उन भवानीका वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ सुबाहुने भक्तिसे युक्त होकर यह बात कही - ॥१ ॥

सुबाहु बोले - हे माता! एक ओर देवलोक तथा समस्त भूमण्डलका राज्य और दूसरी ओर आपका दर्शन; वे दोनों तुल्य कभी नहीं हो सकते ॥ २ ॥

आपके दर्शनसे बढ़कर समस्त त्रिलोकीमें कोई भी वस्तु नहीं है । हे देवि! मैं आपसे क्या वर माँगूँ? मैं तो इस जगतीतलमें आपके दर्शनसे ही कृतकृत्य हो गया ॥ ३ ॥

हे माता! मैं तो यही अभीष्ट वर माँगना चाहता हूँ कि आपकी स्थिर तथा अखण्ड भक्ति मेरे हृदयमें बनी रहे ॥४ ॥

हे माता! आप मेरी नगरी काशीमें सदा निवास करें । आप शक्तिस्वरूपा होकर दुर्गादेवीके नामसे यहाँ विराजमान रहें और सर्वदा नगरकी रक्षा करती रहें । हे अम्बिके! इस समय आपने जिस तरह शत्रुदलसे सुदर्शनकी रक्षा की है और उसे विकार - रहित बना दिया है, उसी तरह आप सदा वाराणसीकी रक्षा करें । हे देवि!! हे कृपानिधे! जबतक भूलोकमें काशीनगरी सुप्रतिष्ठित होकर विद्यमान रहे, तबतक आप यहाँ विराजमान रहें— आप मुझे यही वरदान दें, इसके अतिरिक्त मैं आपसे । और दूसरा क्या माँगूँ? ॥ ५–८ ॥ आप मेरी विविध प्रकारकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करें, मेरे शत्रुओं का नाश करें और जगत् के सभी अमंगलोंको सदाके लिये नष्ट कर डालें ॥ ९ ॥

व्यासजी बोले- इस प्रकार राजा सुबाहुके सम्यक् प्रार्थना करनेपर दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गा स्तुति करके अपने समक्ष खड़े राजा सुबाहुसे कहने लगीं - ॥१० ॥

दुर्गाजी बोलीं – हे राजन्! जबतक यह पृथिवी रहेगी, तबतक सभी लोकोंकी रक्षाके लिये मैं निरन्तर । इस मुक्तिपुरी काशीमें निवास करूँगी ॥ ११ ॥

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३६८

अथो सुदर्शनस्तत्र समागम्य मुदान्वितः ।

प्रणम्य परया भक्त्या तुष्टाव जगदम्बिकाम् ॥

अहो कृपा ते कथयाम्यहं किं त्रातस्त्वया यत्किल भक्तिहीनः । भक्तानुकम्पी सकलो जनोऽस्ति श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ इसके बाद सुदर्शन बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ १२ आकर उन्हें प्रणाम करके परम भक्तिके साथ उनकी स्तुति करने लगे - ॥१२ ॥

अहो! मैं आपकी कृपाका वर्णन कहाँतक करूँ! आपने मुझ जैसे भक्तिहीनकी भी रक्षा कर ली अपने भक्तोंपर तो सभी लोग अनुकम्पा करते हैं, विमुक्तभक्तेरवनं व्रतं ते ॥ १३ किंतु भक्तिरहित प्राणीकी भी रक्षा करनेका व्रत आपने त्वं देवि सर्वं सृजसि प्रपञ्चं श्रुतं मया पालयसि स्वसृष्टम् । त्वमत्सि संहारपरे च काले न तेऽत्र चित्रं मम रक्षणं वै ॥ करोमि किं ते वद देवि कार्यं क्व वा व्रजामीत्यनुमोदयाशु । कार्ये विमूढोऽस्मि तवाज्ञयाहं गच्छामि तिष्ठे विहरामि मातः ॥ व्यास उवाच

तं तथा भाषमाणं तु देवी प्राह दयान्विता ।

गच्छायोध्यां महाभाग कुरु राज्यं कुलोचितम् ॥

स्मरणीया सदाहं ते पूजनीया प्रयत्नतः ।

शं विधास्याम्यहं नित्यं राज्ये ते नृपसत्तम ॥

अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां नवम्याञ्च विशेषतः ।

मम पूजा प्रकर्तव्या बलिदानविधानतः ॥

अर्चा मदीया नगरे स्थापनीया त्वयानघ ।

पूजनीया प्रयत्नेन त्रिकालं भक्तिपूर्वकम् ॥

शरत्काले महापूजा कर्तव्या मम सर्वदा ।

नवरात्रविधानेन भक्तिभावयुतेन च ॥

चैत्रेऽश्विने तथाषाढे माघे कार्यो महोत्सवः ।

नवरात्रे महाराज पूजा कार्या विशेषतः ॥

कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां मम भक्तिसमन्वितैः ।

कर्तव्या नृपशार्दूल तथाष्टम्यां सदा बुधैः ॥

ही ले रखा है ॥ १३ ॥

मैं सुना है कि आप ही समस्त विश्व - प्रपंचकी रचना करती हैं और अपनेद्वारा सृजित उस जगत्का पालन करती हैं तथा यथोचित समय उपस्थित होनेपर उसे अपनेमें समाहित कर लेती हैं; तब आपने जो मेरी १४ रक्षा की, उसमें कोई आश्चर्य नहीं ॥ १४ ॥

हे देवि! अब यह बताइये कि मैं आपका कौन-सा कार्य करूँ; मैं कहाँ जाऊँ? मुझे शीघ्र आदेश दीजिये । मैं इस समय किंकर्तव्यविमूढ हो रहा हूँ । हे माता! मैं आपकी ही आज्ञासे जाऊँगा, ठहरूँगा या १५ । विहार करूँगा ॥ १५ ॥

व्यासजी बोले- ऐसा कहते हुए उस सुदर्शनसे भगवतीने दयापूर्वक कहा— - हे महाभाग! अब तुम अयोध्या जाओ और अपने कुलकी मर्यादाके अनुसार १६ राज्य करो ॥ १६ ॥

हे नृपश्रेष्ठ! तुम प्रयत्नके साथ सदा मेरा स्मरण १७ तथा पूजन करते रहना और मैं भी तुम्हारे राज्यका सर्वदा कल्याण करती रहूँगी ॥१७ ॥

अष्टमी, चतुर्दशी और विशेष करके नवमी १८ तिथिको विधि - विधानसे मेरी पूजा अवश्य करते रहना । हे अनघ! तुम अपने नगरमें मेरी प्रतिमा स्थापित करना और प्रयत्नके साथ भक्तिपूर्वक तीनों १ ९ समय मेरा पूजन करते रहना॥१८-१९ ॥ शरत्कालमें सर्वदा नवरात्रविधानके अनुसार भक्तिभावसे युक्त होकर मेरी महापूजा करनी चाहिये । २० हे महाराज! चैत्र, आश्विन, आषाढ़ तथा माघमासमें नवरात्र के अवसरपर मेरा महोत्सव मनाना चाहिये और २१ विशेषरूपसे मेरी महापूजा करनी चाहिये ॥ २०-२१ ॥ हे नृपशार्दूल! विज्ञजनोंको चाहिये कि वे भक्तियुक्त होकर कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तथा अष्टमीको २२ । सदा मेरी पूजा करें ॥ २२ ॥

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अ ० २४ ] व्यास उवाच

इत्युक्त्वान्तर्हिता देवी दुर्गा दुर्गतिनाशिनी ।

नता सुदर्शनेनाथ स्तुता च बहुविस्तरम् ॥

अन्तर्हितां तु तां दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते ।

प्रणेमुस्तं समागम्य यथा शक्रं सुरास्तथा ॥

सुबाहुरपि तं नत्वा स्थितश्चाग्रे मुदान्वितः ।

ऊचुः सर्वे महीपाला अयोध्याधिपतिं तदा ॥

त्वमस्माकं प्रभुः शास्ता सेवकास्ते वयं सदा ।

कुरु राज्यमयोध्यायां पालयास्मान्नृपोत्तम ॥

त्वत्प्रसादान्महाराज दृष्टा विश्वेश्वरी शिवा ।

आदिशक्तिर्भवानी सा चतुर्वर्गफलप्रदा ॥

धन्यस्त्वं कृतकृत्योऽसि बहुपुण्यो धरातले ।

यस्माच्च त्वत्कृते देवी प्रादुर्भूता सनातनी ॥

न जानीमो वयं सर्वे प्रभावं नृपसत्तम ।

चण्डिकायास्तमोयुक्ता मायया मोहिताः सदा ॥

धनदारसुतानां च चिन्तनेऽभिरताः सदा ।

मग्ना महार्णवे घोरे कामक्रोधझषाकुले ॥

पृच्छामस्त्वां महाभाग सर्वज्ञोऽसि महामते ।

केयं शक्तिः कुतो जाता किंप्रभावा वदस्व तत् ॥

भव त्वं नौश्च संसारे साधवोऽति दयापराः ।

तस्मान्नो वद काकुत्स्थ देवीमाहात्म्यमुत्तमम् ॥

यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा ।

तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामस्त्वं ब्रूहि नृवरोत्तम ॥

व्यास उवाच

इति पृष्टस्तदा तैस्तु ध्रुवसन्धिसुतो नृपः ।

विचिन्त्य मनसा देवीं तानुवाच मुदान्वितः ॥

तृतीय स्कन्ध ३६ ९ व्यासजी बोले – राजा सुदर्शनके स्तुति तथा प्रणाम करनेके अनन्तर ऐसा कहकर दुर्गतिनाशिनी भगवती दुर्गा अन्तर्धान हो गयीं ॥ २३ ॥

२३ उन भगवतीको अन्तर्हित देखकर वहाँ उपस्थित सभी राजाओंने आकर सुदर्शनको उसी प्रकार प्रणाम किया जैसे देवता इन्द्रको प्रणाम करते हैं ॥ २४ ॥

२४ महाराज सुबाहु भी उन्हें प्रणाम करके बड़े हर्षपूर्वक उनके समक्ष खड़े हो गये । तदनन्तर उन सभी २५ और राज्य २६ काम राजाओंने अयोध्यापति सुदर्शनसे कहा- ॥ २५ ॥

हे नृपश्रेष्ठ! आप हमारे स्वामी तथा शासक हैं हम आपके सेवक हैं । अब आप अयोध्या में करें और हमारा पालन करें ॥ २६ ॥

हे महाराज! आपकी कृपासे हमने धर्म - अर्थ-- मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थोंको देनेवाली उन विश्वेश्वरी, शिवा और आदिशक्ति भवानीका दर्शन पा २७ लिया ॥ २७ ॥

आप इस धरतीपर धन्य, कृतकृत्य और बड़े पुण्यात्मा हैं; क्योंकि आपके लिये साक्षात् सनातनी २८ देवी प्रकट हुईं ॥ २८ ॥

हे नृपसत्तम! तमोगुणसे युक्त और सदा मायासे मोहित रहनेवाले हम सभी लोग भगवती चण्डिकाका २ ९ प्रभाव नहीं जानते । हम सदा धन, स्त्री और पुत्रोंकी चिन्तामें व्यग्र रहकर काम - क्रोधरूपी मत्स्योंसे भरे घोर महासागरमें डूबे रहते हैं ॥ २ ९ -३० ॥ ३० हे महाभाग! हे महामते! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव हम आपसे यह पूछ रहे हैं कि ये शक्ति कौन हैं, कहाँसे उत्पन्न हुई हैं और इनका कैसा प्रभाव है? ३१ वह सब बताइये ॥ ३१ ॥

साधु पुरुष बड़े दयालु होते हैं । अतएव आप हमारे लिये इस संसार - सागरकी नौका बन जाइये । हे ३२ काकुत्स्थ! अब आप भगवतीके उत्तम माहात्म्यका वर्णन कीजिये ॥ ३२ ॥

हे नृपश्रेष्ठ! उनका जो प्रभाव हो, जो स्वरूप ३३ हो तथा वे जैसे प्रकट हुई हों; यह सब हम आपसे सुनना चाहते हैं, आप बतायें ॥ ३३ ॥

व्यासजी बोले — राजाओंके यह पूछनेपर ध्रुव-सन्धिके पुत्र राजा सुदर्शन मन - ही - मन भगवतीका ३४ । स्मरण करके हर्षपूर्वक उनसे कहने लगे - ॥३४ ॥

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३७० सुदर्शन उवाच किं ब्रवीमि महीपालास्तस्याश्चरितमुत्तमम् । ब्रह्मादयो न जानन्ति सेशाः सुरगणास्तथा

सर्वस्याद्या महालक्ष्मीर्वरेण्या शक्तिरुत्तमा ।

सात्त्विकीयं महीपाला जगत्पालनतत्परा ॥

सृजते या रजोरूपा सत्त्वरूपा च पालने ।

संहारे च तमोरूपा त्रिगुणा सा सदा मता ॥

निर्गुणा परमा शक्तिः सर्वकामफलप्रदा ।

सर्वेषां कारणं सा हि ब्रह्मादीनां नृपोत्तमाः ॥

निर्गुणा सर्वथा ज्ञातुमशक्या योगिभिर्नृपाः ।

सगुणा सुखसेव्या सा चिन्तनीया सदा बुधैः ॥

राजान ऊचुः

बाल एव वनं प्राप्तस्त्वं तु नूनं भयातुरः ।

कथं ज्ञाता त्वया देवी परमा शक्तिरुत्तमा ॥

उपासिता कथं चैव पूजिता च कथं नृप ।

या प्रसन्ना तु साहाय्यं चकार त्वरयान्विता ॥

सुदर्शन उवाच

बालभावान्मया प्राप्तं बीजं तस्याः सुसम्मतम् ।

स्मरामि प्रजपन्नित्यं कामबीजाभिधं नृपाः ॥

ऋषिभिः कथ्यमाना सा मया ज्ञाताम्बिका शिवा ।

स्मरामि तां दिवारात्रं भक्त्या परमया पराम् ॥

व्यास उवाच

तन्निशम्य वचस्तस्य राजानो भक्तितत्पराः ।

तां मत्वा परमां शक्तिं निर्ययुः स्वगृहान्प्रति ॥

सुबाहुरगमत्काश्यां तमापृच्छ्य सुदर्शनम् ।

सुदर्शनोऽपि धर्मात्मा निर्जगाम सुकोसलान् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ सुदर्शन बोले - हे राजाओ! उन जगदम्बाके उत्तम चरित्रको मैं क्या कहूँ; क्योंकि ब्रह्मा आदि तथा ॥ ३५ इन्द्रसहित सभी देवता भी उन्हें नहीं जानते ॥ ३५ ॥

हे राजाओ! वे भगवती सबकी महालक्ष्मीके रूपमें प्रतिष्ठित हैं, वे उत्तम सात्त्विकी शक्तिके रूपमें समस्त ३६ करनेमें तत्पर रहती हैं ॥ ३६ ॥

वे अपने रजोगुणी स्वरूपसे सत्वगुणी स्वरूपसे पालन करती ३७ स्वरूपसे इसका संहार करती हैं, आदिस्वरूपा हैं. वरेण्य हैं और विश्वका पालन सृष्टि करती. और तमोगुणी इसी कारण वे त्रिगुणात्मिका कही गयी हैं । परम शक्तिस्वरूपा निर्गुणा भगवती समस्त कामनाएँ पूर्ण कर देती हैं । हे ३८ श्रेष्ठ राजाओ! वे ब्रह्मा आदि सभी देवताओंकी भी आदिकारण हैं ॥ ३७-३८ ॥ हे राजाओ! योगीलोग भी निर्गुणा भगवतीको ३ ९ जाननेमें सर्वथा असमर्थ हैं । अत: बुद्धिमानोंको चाहिये कि सरलतापूर्वक सेवनीय सगुणा भगवतीकी निरन्तर आराधना करें ॥ ३ ९ ॥ राजागण बोले- बाल्यावस्थामें ही आप वनवासी ४० । हो गये थे तथा भयसे व्याकुल थे । तब आपको उन उत्तम परमा शक्तिका ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ? ॥। ४० ॥ हे नृप! आपने उनकी उपासना और पूजा कैसे ४१ की, जिससे शीघ्रतापूर्वक प्रसन्न होकर उन्होंने आपकी सहायता की ॥ ४१ ॥

सुदर्शन बोले - हे राजाओ! बाल्यकालमें ही मुझे उनका अतिश्रेष्ठ बीजमन्त्र प्राप्त हो गया था । मैं उसी कामराज नामक बीजमन्त्रका सदा जप करता ४२ हुआ भगवतीका स्मरण करता रहता हूँ ॥ ४२ ॥

ऋषियोंके द्वारा उन कल्याणमयी भगवती के विषयमें बताये जानेपर मैंने उन्हें जाना और तभीसे मैं ४३ परम भक्तिके साथ दिन - रात उन परा शक्तिका स्मरण किया करता हूँ ॥४३ ॥

व्यासजी बोले — सुदर्शनका वचन सुनकर वे राजा भी भक्तिपरायण हो गये और उन देवीको ही ४४ परम शक्ति मानकर अपने - अपने घर चले गये ॥ ४४ ॥

सुदर्शनसे अनुमति लेकर महाराज सुबाहु काशी चले गये और धर्मात्मा सुदर्शन वहाँसे अयोध्याकी ४५ | ओर चल पड़े ॥ ४५ ॥

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अ ० २५ ]

मन्त्रिणस्तु नृपं श्रुत्वा हतं शत्रुजितं मृधे ।

जितं सुदर्शनञ्चैव बभूवुः प्रेमसंयुताः ॥

आगच्छन्तं नृपं श्रुत्वा तं साकेतनिवासिनः ।

उपायनान्युपादाय प्रययुः सम्मुखे जनाः ॥

तथा प्रकृतयः सर्वे नानोपायनपाणयः ।

ध्रुवसन्धिसुतं मत्वा मुदिताः प्रययुः प्रजाः ॥

स्त्रियोपसंयुतः सोऽथ प्राप्यायोध्यां सुदर्शनः ।

सम्मान्य सर्वलोकांश्च ययौ राजा निवेशनम् ॥

बन्दिभिः स्तूयमानस्तु वन्द्यमानश्च मन्त्रिभिः ।

कन्याभिः कीर्यमाणश्च लाजैः सुमनसैस्तथा ॥

तृतीय स्कन्ध ३७१ राजा शत्रुजित् युद्धमें मारा गया और सुदर्शन ४६ विजयी हुए - यह सुनकर मन्त्रीलोग प्रेमसे प्रफुल्लित हो उठे ॥ ४६ ॥

राजा सुदर्शनके आगमनका समाचार सुनकर साकेतके निवासी विविध प्रकारके उपहार लेकर ४७ उनके सम्मुख उपस्थित हुए और सब राजकर्मचारीगण भी हाथोंमें नाना प्रकारकी भेंट - सामग्री लेकर आये । महाराज ध्रुवसन्धिके पुत्र सुदर्शनको राजाके रूपमें ४८ जानकर अयोध्याकी समस्त प्रजा आनन्दविभोर हो गयी ॥ ४७-४८ ॥ अपनी स्त्रीके साथ अयोध्यामें पहुँचकर सब लोगोंका सम्मान करके राजा सुदर्शन राजभवनमें गये । ४ ९उस समय बन्दीजन उनकी स्तुति कर रहे थे, मन्त्रीगण उनकी वन्दना कर रहे थे और कन्याएँ उनके ऊपर लाजा ( धानका लावा ) तथा पुष्प बिखेर ५० | रही थीं ॥ ४ ९ -५० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे सुदर्शनेन देवीमहिमवर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः सुदर्शनका शत्रुजित्की माताको सान्त्वना देना, सुदर्शनद्वारा अयोध्यामें तथा राजा सुबाहुद्वारा व्यास उवाच

गत्वायोध्यां नृपश्रेष्ठो गृहं राज्ञः सुहृद्वृतः ।

शत्रुजिन्मातरं प्राह प्रणम्य शोकसंकुलाम् ॥

मातर्न ते मया पुत्रः संग्रामे निहतः किल ।

न पिता ते युधाजिच्च शपे ते चरणौ तथा ॥

दुर्गया तौ हतौ संख्ये नापराधो ममात्र वै ।

अवश्यंभाविभावेषु प्रतीकारो न विद्यते ॥

न शोकोऽत्र त्वया कार्यो मृतपुत्रस्य मानिनी ।

स्वकर्मवशगो जीवो भुङ्क्ते भोगान्सुखासुखान् ॥

काशीमें देवी दुर्गाकी स्थापना व्यासजी बोले- अयोध्या पहुँचकर नृपश्रेष्ठ सुदर्शन अपने मित्रोंके साथ राजभवनमें गये 1 । वहाँपर १ शत्रुजित्की परम शोकाकुल माताको प्रणामकर उन्होंने कहा - हे माता! मैं आपके चरणोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके पुत्र तथा आपके पिता युधाजित्‌को २ युद्धमें मैंने नहीं मारा है ॥ १-२ ॥ स्वयं भगवती दुर्गाने रणभूमिमें उनका वध किया है; इसमें मेरा अपराध नहीं है । होनी तो अवश्य होकर रहती है, उसे टालनेका कोई उपाय नहीं ३ है ॥ ३ ॥

हे मानिनि! अपने मृत पुत्रके विषयमें आप शोक न करें; क्योंकि जीव अपने पूर्वकर्मोंके अधीन होकर ४ । सुख - दुःखरूपी भोगोंको भोगता है ॥४ ॥