देवी भागवत पूर्वार्द्ध — पृष्ठ 431–440

देवी भागवत पूर्वार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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४२२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५

यः कश्चित्तापसः शान्तो जपध्यानपरायणः ।

भवेत्तस्य जपे विघ्नकर्ता वै मघवा परम् ॥५

सतां सत्ययुगं साक्षात्सर्वदैवासतां कलिः ।

मध्यमो मध्यमानां तु क्रियायोगौ युगे स्मृतौ ॥ ६

कश्चित्कदाचिद्भवति सत्यधर्मानुवर्तकः ।

अन्यथान्ययुगानां वै सर्वे धर्मपरायणाः ॥ ७

वासना कारणं राजन् सर्वत्र धर्मसंस्थितौ ।

तस्यां वै मलिनायां तु धर्मोऽपि मलिनो भवेत् ॥ ८

मलिना वासना सत्यं विनाशायेति सर्वथा ।

ब्रह्मणो हृदयाज्जातः पुत्रो धर्म इति स्मृतः ॥ ९

ब्राह्मणः सत्यसम्पन्नो वेदधर्मरतः सदा ।

दक्षस्य दुहितारो हि वृता दश महात्मना ॥ १०

विवाहविधिना सम्यङ् मुनिना गृहधर्मिणा ।

तास्वजीजनयत्पुत्रान्धर्मः सत्यवतां वरः ॥ ११

हरिं कृष्णं नरं चैव तथा नारायणं नृप ।

योगाभ्यासरतो नित्यं हरिः कृष्णो बभूव ह ॥ १२

नरनारायणौ चैव चेरतुस्तप उत्तमम् ।

प्रालेयाद्रिं समागत्य तीर्थे बदरिकाश्रमे ॥ १३

तपस्विषु धुरीणौ तौ पुराणौ मुनिसत्तमौ ।

गृणन्तौ तत्परं ब्रह्म गङ्गाया विपुले तटे ॥ १४

हरेरंशौ स्थितौ तत्र नरनारायणावृषी ।

पूर्णं वर्षसहस्त्रं तु चक्राते तप उत्तमम् ॥ १५

तापितं च जगत्सर्वं तपसा सचराचरम् ।

नरनारायणाभ्यां च शक्रः क्षोभं तदा ययौ ॥ १६

चिन्ताविष्टः सहस्राक्षो मनसा समकल्पयत् ।

किं कर्तव्यं धर्मपुत्रौ तापसौ ध्यानसंयुतौ ॥ १७

सिद्धार्थौ सुभृशं श्रेष्ठमासनं मे ग्रहीष्यतः ।

विघ्नः कथं प्रकर्तव्यस्तपो येन भवेन्न हि ॥ १८

यदि कोई तपस्वी शान्त होकर जप - ध्यानमें लीन हो जाता है तो इन्द्र उसके जपमें विघ्न डालनेहेतु तत्पर हो जाते हैं ॥५ ॥

सज्जन पुरुषोंके लिये हर समय सत्ययुग दिखलायी | पड़ता है और दुष्ट लोगोंके लिये सर्वदा कलियुग ही रहता है । जिस युगमें क्रिया तथा योग व्यवस्थित रहते हैं, वे द्वापर तथा त्रेतारूप मध्यम युग मध्यम कोटिके लोगोंके लिये कहे गये हैं ॥६ ॥

अतः किसी समय भी कोई सत्यधर्मा हो सकता है अथवा सभी युगों में जो चाहे धर्मपरायण हो सकता है । हे राजन्! सर्वत्र धर्मकी स्थितिमें वासना ही प्रधान कारण मानी गयी है । उसमें मलिनता आ जानेपर धर्म भी मलिन हो जाता है । मलिन वासना विनाशके लिये होती है; यह सर्वथा सत्य है ॥ ७ - ८३ ॥ ब्रह्माजीके हृदयसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो धर्म - इस नामसे कहा गया । वह ब्राह्मण सत्यसम्पन्न और वैदिक धर्ममें सदा संलग्न रहनेवाला था । उस गृहस्थधर्मी महात्मा मुनिने पाणिग्रहणकी विधिसे दक्षप्रजापतिकी दस कन्याओंका सम्यक् रूपसे वरण किया । सत्यव्रतियोंमें श्रेष्ठ उस धर्मने उनसे ' हरि ', ' कृष्ण ', ' नर ' और ' नारायण ' नामक चार पुत्र उत्पन्न किये । हे राजन्! उनमें ' हरि ' और ' कृष्ण ' ये दोनों योगाभ्यास करने लगे तथा नर और नारायण ये दोनों हिमालयपर्वतके शिखरपर जाकर ' बदरिकाश्रम ' तीर्थमें कठिन तपस्या करने लगे ॥ ९ –१३ ॥ वे प्राचीन मुनिश्रेष्ठ नर और नारायण तपस्वियोंमें सबसे प्रधान थे । गंगाके विस्तृत तटपर रहकर ब्रह्मचिन्तन करते हुए भगवान् विष्णुके अंशावतार नर - नारायणने वहाँ पूरे एक हजार वर्षोंतक कठोर तप किया । उनके तपसे चराचरसहित सम्पूर्ण संसार सन्तप्त हो गया । इससे इन्द्रके मनमें नर - नारायणके प्रति क्षोभ उत्पन्न हो गया ॥ १४ - १६ ॥ चिन्तित होकर इन्द्रने अपने मनमें सोचा-अब मुझे क्या करना चाहिये? ये धर्मपुत्र नर - नारायण तपस्वी तथा ध्यानपरायण हैं । ये पूर्णरूपसे सिद्ध होकर मेरा श्रेष्ठ आसन ग्रहण कर लेंगे, अतः किस प्रकार विघ्न उत्पन्न करूँ, जिससे तप न कर सकें ॥ १७-१८ ॥

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अ ० ५ ] ४२३

उत्पाद्य कामं क्रोधञ्च लोभं वाप्यतिदारुणम् ।

इत्युद्दिश्य सहस्राक्षः समारुह्य गजोत्तमम् ॥

विघ्नकामस्तु तरसा जगाम गन्धमादनम् ।

गत्वा तत्राश्रमे पुण्ये तावपश्यच्छतक्रतुः ॥

तपसा दीप्तदेहौ तु भास्कराविव चोदितौ ।

ब्रह्मविष्णू किमेतौ वै प्रकटौ वा विभावसू ॥

धर्मपुत्रावृषी एतौ तपसा किं करिष्यतः ।

इति सञ्चिन्त्य तौ दृष्ट्वा तदोवाच शचीपतिः ॥

किं वा कार्यं महाभागौ ब्रूतं धर्मसुतौ किल ।

ददामि वां वरं श्रेष्ठं दातुं यातोऽस्म्यहमृषी ॥

अदेयमपि दास्यामि तुष्टोऽस्मि तपसा किल । व्यास उवाच एवं पुनः पुनः शक्रस्तावुवाच पुरः स्थितः ॥

नोचतुस्तावृषी ध्यानसंस्थितौ दृढचेतसौ ।

ततो वै मोहिनीं मायां चकार भयदां वृषः ॥

वृकान्सिंहांश्च व्याघ्रांश्च समुत्पाद्याबिभीषयत् ।

वर्षं वातं तथा वह्निं समुत्पाद्य पुनः पुनः ॥

भीषयामास तौ शक्रो मायां कृत्वा विमोहिनीम् ।

भयतोऽपि वशं नीतौ न तौ धर्मसुतौ मुनी ॥

नरनारायणौ दृष्ट्वा शक्रः स्वभवनं गतः ।

वरदाने प्रलुब्धौ न न भीतौ वह्निवायुतः ॥

व्याघ्रसिंहादिभिः क्रान्तौ चलितौ नाश्रमात्स्वकात् ।

न तयोर्ध्यानभङ्गं वै कर्तुं कोऽपि क्षमोऽभवत् ॥

इन्द्रोऽपि सदनं गत्वा चिन्तयामास दुःखितः ।

चलितौ भयलोभाभ्यां नेमौ मुनिवरोत्तमौ ॥

अब इनके मनमें काम, क्रोध अथवा अत्यन्त १ ९ भीषण लोभ उत्पन्न करके तपमें विघ्न करना चाहिये । यह विचारकर इन्द्र अपने उत्तम ऐरावत हाथीपर सवार होकर उनके तपमें विघ्न डालनेकी इच्छासे गन्धमादनपर्वतपर शीघ्रतापूर्वक जा पहुँचे । वहाँ जाकर २० उन्होंने उस पवित्र आश्रममें तप करते हुए नर-नारायणको देखा ॥ १ ९ -२० ॥ उस समय तपके प्रभावसे दीप्त शरीरवाले वे २१ दोनों ऋषि उगे हुए सूर्यकी भाँति प्रतीत हो रहे थे । [ इन्द्रने सोचा- ] क्या ये ब्रह्मा और विष्णु प्रकट हुए हैं अथवा दो सूर्य उदित हो गये हैं? धर्मके ये दोनों २२ पुत्र अपने तपद्वारा न जाने क्या कर देंगे? ऐसा विचार करके शचीपति इन्द्रने नर - नारायणकी ओर देखकर उनसे कहा- - हे महाभाग धर्मनन्दन! आपलोगोंका २३ क्या कार्य है, बताइये । मैं श्रेष्ठ वर अभी प्रदान करता हूँ । हे ऋषियो! मैं वर देनेके लिये ही आया हूँ । वर अदेय हो तो भी मैं दूँगा; क्योंकि मैं आप लोगोंकी तपस्यासे परम प्रसन्न हूँ ॥ २१ - २३३ ॥ २४ व्यासजी बोले- इस प्रकार उनके सामने खड़े होकर इन्द्रने बार - बार उनसे [ वरदान माँगनेको ] कहा, किंतु ध्यानमग्न तथा दृढ़चित्त वे दोनों ऋषि २५ नहीं बोले । तब इन्द्रने अपनी भयदायिनी मोहिनी माया प्रकट की । उन्होंने भेड़िये, सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक जन्तुओंको उत्पन्न करके उन्हें भयभीत किया । इसी २६ प्रकार वर्षा, वायु तथा अग्नि उत्पन्न करके इन्द्रने अपनी मोहिनी माया रचकर उन दोनोंको भयभीत करनेकी चेष्टा की किंतु धर्मपुत्र वे दोनों मुनि इस २७ भयसे भी वशमें नहीं किये जा सके । ऐसे उन नर-नारायणको देखकर इन्द्र अपने भवन चले गये । वे नर - नारायण वरदानके लोभमें नहीं आये और अग्नि २८ तथा वायुसे भयभीत नहीं हुए । व्याघ्र, सिंह आदिके आक्रमण करनेपर भी वे दोनों अपने आसनसे हिलेतक नहीं । उन दोनोंके ध्यानको भंग करनेमें उस २ ९ समय कोई भी समर्थ नहीं हो सका ॥ २४–२९ ॥ इन्द्र भी अपने घर पहुँचकर दुःखित होकर विचार करने लगे कि मुनिवरोंमें उत्तम ये दोनों ऋषि ३० भय तथा लोभसे विचलित नहीं हुए । वे तो महाविद्या,

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४२४

चिन्तयन्तौ महाविद्यामादिशक्तिं सनातनीम् ।

ईश्वरीं सर्वलोकानां परां प्रकृतिमद्भुताम् ॥

ध्यायतां कः क्षमो लोके बहुमायाविदप्युत । यन्मूलाः सकला माया देवासुरकृताः किल ते कथं बाधितुं शक्ता ध्यायन्ति गतकल्मषाः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०. आदिशक्ति, सनातनी, सब लोकोंकी स्वामिनी और ३१ अद्भुत परा - प्रकृतिका ध्यान कर रहे थे । देवताओं तथा असुरोंके द्वारा रची गयी सारी माया जिन भगवतीसे ही उत्पन्न होती है, उनका ध्यान करनेवालेकं ॥ ३२ विचलित करनेमें कौन समर्थ है, चाहे वह कितना ही बड़ा मायाविज्ञ क्यों न हो? जो लोग कल्मषरहि-। होकर भगवतीका ध्यान करते हैं, वे भला कैसे वाग्बीजं कामबीजञ्च मायाबीजं तथैव च ॥ ३३ विचलित किये जा सकते हैं? देवीका वाग्बीज.

चित्ते यस्य भवेत्तं तु बाधितुं कोऽपि न क्षमः ।

मायया मोहितः शक्रो भूयस्तस्य प्रतिक्रियाम् ॥

कर्तुं कामवसन्तौ तु समाहूयाब्रवीद्वचः । मनोभव वसन्तेन रत्या युक्तो व्रजाधुना अप्सरोभिः समायुक्तस्तरसा गन्धमादनम् । नरनारायणौ तत्र पुराणावृषिसत्तमौ

कुरुतस्तप एकान्ते स्थितौ बदरिकाश्रमे ।

गत्वा तत्र समीपे तु तयोर्मन्मथ मार्गणैः ॥

चित्तं कामातुरं कार्यं कुरु कार्यं ममाधुना । मोहयित्वोच्चाटयित्वा विशिखैस्ताडयाशु च

वशीकुरु महाभाग मुनी धर्मसुतावपि ।

को ह्यस्मिन् सर्वसंसारे देवो दैत्योऽथ मानवः ॥

यस्ते बाणवशं प्राप्तो न याति भृशताडितः ।

ब्रह्माहं गिरिजानाथश्चन्द्रो वह्निर्विमोहितः ॥

गणना कानयोः काम त्वद्बाणानां पराक्रमे ।

वाराङ्गनागणोऽयं ते सहायार्थं मयेरितः ॥

आगमिष्यति तत्रैव रम्भादीनां मनोरमः ।

एका तिलोत्तमा रम्भा कार्यं साधयितुं क्षमा ॥

त्वमेवैकः ः क्षमः कामं मिलितैः कस्तु संशयः ।

कुरु कार्यं महाभाग ददामि तव वाञ्छितम् ॥

कामबीज और मायाबीज - यह जिसके हृदयमें विद्यमान है, उसे विचलित करनेमें कोई भी समर्थ नहीं ३४ है ॥ ३०–३३३ ॥ अब मायासे मोहित इन्द्रने पुनः उनका प्रतीकार करनेहेतु कामदेव तथा वसन्तको बुलाकर यह वचन ॥ ३५ कहा – हे कामदेव! तुम वसन्त और रतिको लेकर अनेक अप्सराओंके साथ उस गन्धमादनपर्वतपर अभी शीघ्रतापूर्वक जाओ । वहाँ ' नर नारायण ' नामक दो ॥ ३६ प्राचीन श्रेष्ठ ऋषि बदरिकाश्रमके एकान्त स्थानमें स्थित होकर तपस्या कर रहे हैं । हे मन्मथ! उनके पास जाकर तुम अपने बाणोंसे उनके चित्तको ३७ कामासक्त कर दो । उनका मोहन तथा उच्चाटन करके तुम अपने बाणोंसे उन्हें शीघ्र आहत कर डालो: मेरा यह कार्य अभी सिद्ध करो ॥ ३४–३८ ॥ ॥ ३८ इस प्रकार हे महाभाग! धर्मके पुत्र उन दोनों मुनियोंको वशीभूत कर लो । इस सम्पूर्ण संसारमें देवता. ३ ९ दैत्य या मनुष्य कौन ऐसा है, जो तुम्हारे बाणके वशीभूत होकर अत्यन्त कामासक्त न हो जाय? हे कामदेव! जब ब्रह्मा, मैं ( इन्द्र ), शिव, चन्द्रमा या अग्नि भी ४० मोहित हो जाते हैं तब तुम्हारे बाणोंके पराक्रमके सामने उन दोनोंकी क्या गणना है? ॥ ३ ९ -४० ३ ॥ तुम्हारी सहायता के लिये मेरे द्वारा यह रम्भा ४१ आदि अप्सराओंका समूह भेजा जा रहा है, जो वहाँ पहुँच जायगा । अकेली तिलोत्तमा या रम्भा ही इस कार्यको करनेमें समर्थ है अथवा तुम अकेले भी इसे ४२ करनेमें समर्थ हो, तब सभी सम्मिलित रूपसे कार्य सिद्ध कर लेंगे; इसमें सन्देहकी बात ही क्या? हे महाभाग! तुम मेरे इस कार्यको सम्पन्न करो, मैं तुम्हें ४३ । वांछित वस्तु प्रदान करूँगा ॥ ४१-४३ ॥

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अ ० ६ ]

प्रलोभितौ मयात्यर्थं वरदानैस्तपस्विनौ ।

स्थानान्न चलितौ शान्तौ वृथायं मे गतः श्रमः ॥

तथा वै मायया कृत्वा भीषितौ तापसौ भृशम् ।

तथापि नोत्थितौ स्थानाद्देहरक्षापरौ न तौ ॥

व्यास उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा शक्रं प्राह मनोभवः ।

वासवाद्य करिष्यामि कार्यं ते मनसेप्सितम् ॥

यदि विष्णुं महेशं वा ब्रह्माणं वा दिवाकरम् । ध्यायन्तौ तौ तदास्माकं भवितारौ वशौ मुनी देवीभक्तं वशीकर्तुं नाहं शक्तः कथञ्चन । कामराजं महाबीजं चिन्तयन्तं मनस्यलम् तां देवीं चेन्महाशक्तिं संश्रितौ भक्तिभावतः । न तदा मम बाणानां गोचरौ तापसौ किल इन्द्र उवाच गच्छ त्वं च महाभाग सर्वैस्तत्र समुद्यतैः कार्यं ममातिदुःसाध्यं कर्ता हितमनुत्तमम् व्यास उवाच इति तेन समादिष्टा ययुः सर्वे समुद्यताः यत्र तौ धर्मपुत्रौ द्वौ तेपाते दुष्करं तपः चतुर्थ स्कन्ध ४४ बहुत नहीं व्यर्थ ४५ बहुत उठे । नहीं ४२५ मैंने उन दोनों तपस्वियोंको वरदानोंके द्वारा प्रलोभन दिया, किंतु वे अपने स्थानसे विचलित हुए, बल्कि शान्त बैठे रहे । मेरा यह परिश्रम चला गया । मैंने माया रचकर उन तपस्वियोंको डराया, फिर भी वे अपने आसनसे नहीं वे दोनों शरीररक्षाके लिये जरा भी चिन्तित हैं ॥ ४४-४५ ॥ व्यासजी बोले – इन्द्रका यह वचन सुनकर ४६ कामदेवने उनसे कहा - हे इन्द्र! मैं अभी आपका मनोवांछित कार्य करूँगा । यदि वे दोनों मुनि विष्णु, शिव, ब्रह्मा अथवा सूर्य किसीका ध्यान करते होंगे, ॥ ४७ तो वे हमारे वशमें हो जायँगे । मैं केवल कामराज महाबीज ' क्लीं ' का अपने मनमें चिन्तन करनेवाले देवीभक्तको वशमें करनेमें किसी प्रकार भी समर्थ नहीं ॥ ४८ हूँ । यदि वे भक्ति - भावसे महाशक्तिस्वरूपा देवीकी उपासनामें लगे होंगे, तो मेरे बाणोंका प्रभाव उन ॥ ४ ९ तपस्वियोंपर नहीं पड़ेगा ॥ ४६–४९ ॥ इन्द्र बोले - हे महाभाग! जानेके लिये उद्यत इन सभीके साथ तुम वहाँ जाओ । यद्यपि मेरा यह । कार्य अत्यन्त दुःसाध्य है, फिर भी तुम इस हितकर ॥ ५० तथा उत्तम कार्यको पूर्ण कर ही लोगे ॥ ५० ॥

व्यासजी बोले- इस प्रकार इन्द्रका आदेश पाकर वे लोग पूरी तैयारीके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ वे धर्मपुत्र नर - नारायण कठोर तपस्या कर ॥ ५१ | रहे थे ॥५१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे नरनारायणकथावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

अथ षष्ठोऽध्यायः कामदेवद्वारा नर - नारायणके समीप वसन्त ऋतुकी सृष्टि, नारायणद्वारा उर्वशीकी उत्पत्ति, अप्सराओं द्वारा नारायणसे स्वयंको अंगीकार करनेकी प्रार्थना व्यास उवाच व्यासजी बोले- सर्वप्रथम उस पर्वत श्रेष्ठ गन्ध-प्रथमं तत्र सम्प्राप्तो वसन्तः पर्वतोत्तमे । मादनपर वसन्त पहुँचा । उस पर्वतपर स्थित सभी वृक्ष पादपाः सर्वे द्विरेफालिविराजिताः ॥ १ पुष्पित हो गये और उनपर भ्रमरोंके समूह मँडराने लगे ॥१ ॥

पुष्पिताः आम, मौलसिरी, रम्य, तिलक, सुन्दर किंशुक, आम्राश्च बकुला रम्यास्तिलकाः किंशुकाः शुभाः । साल, ताल, तमाल तथा महुए- ये सब - के - सब सालास्तालास्तमालाश्च मधूकाः पुष्पिता बभुः ॥ २ फूलोंसे सुशोभित हो गये ॥२ ॥

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४२६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ बभूवुः कोकिलालापा वृक्षाग्रेषु मनोहराः । वल्ल्योऽपि पुष्पिताः सर्वा आलिलिङ्गर्नगोत्तमान् ॥ " ३

प्राणिनः स्वासु भार्यासु प्रेमयुक्ताः स्मरातुराः ।

बभूवुश्चातिमत्ताश्च क्रीडासक्ताः परस्परम् ॥ ४

ववुर्मन्दाः सुगन्धाश्च सुस्पर्शा दक्षिणानिलाः ।

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि मुनीनामपि चाभवन् ॥ ५

रतियुक्तस्ततः कामः पूरयन्पञ्चमार्गणान् ।

चकार त्वरितस्तत्र वासं बदरिकाश्रमे ॥

रम्भा तिलोत्तमाद्याश्च गत्वा तत्र वराश्रमे ।

गानं चक्रुः सुगीतज्ञाः स्वरतानसमन्वितम् ॥ ७

तच्छ्रुत्वा मधुरोद्गीतं कोकिलानाञ्च कूजितम् ।

भ्रमरालिविरावञ्च प्रबुद्धौ तौ मुनीश्वरौ ॥ ८

ऋतुराजमकाले तु दृष्ट्वा तौ पुष्पितं वनम् ।

जातौ चिन्तापरौ तत्र नरनारायणावृषी ॥ ९

किमद्य शिशिरापायः संवृतः समयं विना ।

प्राणिनो विह्वलाः सर्वे लक्ष्यन्ते ऽतिस्मरातुराः ॥ १०

कालधर्मविपर्यासः कथमद्य दुरासदः ।

नरं नारायणः प्राह विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥ ११ ।

नारायण उवाच

पश्य भ्रातरिमे वृक्षाः पुष्पिताः प्रतिभान्ति वै ।

कोकिलालापसङ्घष्टा भ्रमरालिविराजिताः ॥ १२

शिशिरं भीममातङ्गं दारयन्स्वखरैर्नखैः ।

वसन्तकेसरी प्राप्तः पलाशकुसुमैर्मुने ॥ १३

रक्ताशोककरा तन्वी देवर्षे किंशुकाङ्घ्रिका ।

नीलाशोककचा श्यामा विकासिकमलानना ॥ १४ ।

वृक्षोंकी डालियोंपर कोयलोंकी मनोहारिणी कूक आरम्भ हो गयी । पुष्पोंसे लदी हुई सभी लताएँ ऊँच पर्वतोंपर चढ़ने लगीं ॥ ३ ॥

सभी प्राणी अपनी - अपनी भार्याओंमें प्रेमासक्त हो गये तथा मत्त होकर परस्पर क्रीड़ा करने लगे ॥४ मन्द, सुगन्धयुक्त तथा सुखद स्पर्शवाली दक्षिण हवाएँ चलने लगीं । उस समय मुनियोंकी भी वृत्तियाँ अतीव चंचल हो उठीं ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् अपनी भार्या रतिके साथ कामदेव र्भ अपने पंचबाणोंको छोड़ता हुआ तत्काल बदरिकाश्रम पहुँचकर वहाँ रहने लगा ॥६ ॥

संगीतकलामें अत्यन्त प्रवीण रम्भा और तिलोत्तम आदि अप्सराएँ भी उस रमणीक बदरिकाश्रम में पहुँचकर स्वर तथा तानमें आबद्ध गीत गाने लगीं ॥ ७ ॥

उस मधुर गायन, कोयलोंकी कूक तथा भ्रमर-समूहों का गुंजार सुनकर उन दोनों मुनिवरोंका ध्यान भंग हो गया ॥ ८ ॥

असमयमें ही वसन्तका आगमन तथा सम्पूर्ण वनको पुष्पोंसे सुशोभित देखकर वे दोनों नग् तथा नारायणऋषि चिन्तित हो उठे [ वे सोचने लगे कि ] क्या आज समय पूरा हुए बिना ही शिशिर‍ ऋतु बीत गयी? इस समय तो समस्त प्राणी कामसे पीड़ित होनेके कारण अत्यन्त विह्वल दिखायी पड़ रहे हैं । कालके स्वभाव तथा नियममें यह अद्भुत परिवर्तन आज कैसे हो गया? विस्मयके कारण विस्फारित नेत्रोंवाले मुनि नारायण नरसे कहने लगे॥९ –११ ॥ नारायण बोले- हे भाई! देखो, ये सभी वृक्ष पुष्पोंसे लदे हुए सुशोभित हो रहे हैं । इन वृक्षोंपर कोयलोंकी मधुर ध्वनि हो रही है तथा भ्रमरोंकी पंक्तियाँ विराजमान हैं ॥१२ ॥

हे मुने! यह वसन्तरूपी सिंह अपने पलाशपुष्परूपी तीखे नाखूनोंसे शिशिररूपी भयानक हाथीको विदीर्ण करता हुआ यहाँ आ पहुँचा है ॥१३ ॥

हे देवर्षे! लाल अशोक जिसके हाथ हैं. किंशुकके पुष्प जिसके पैर हैं, नील अशोक जिसके केश हैं, विकसित श्याम कमल जिसका मुख हैं,

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अ ० ६ ]

नीलेन्दीवरनेत्रा सा बिल्ववृक्षफलस्तनी ।

प्रोत्फुल्लकुन्दरदना मञ्जरीकर्णशोभिता ॥

बन्धुजीवाधरा शुभ्रा सिन्धुवारनखोद्भवा ।

पुंस्कोकिलस्वरा पुण्या कदम्बवसना शुभा ॥

बर्हिवृन्दकलापा च सारसस्वननूपुरा ।

वासन्ती बद्धरशना मत्तहंसगतिस्तथा ॥

पुत्रजीवांशुकन्यस्तरोमराजिविराजिता वसन्तलक्ष्मीः सम्प्राप्ता ब्रह्मन् बदरिकाश्रमे ॥

अकाले किमियं प्राप्ता विस्मयोऽयं ममाधुना ।

तपोविघ्नकरा नूनं देवर्षे परिचिन्तय ॥

श्रूयते सुरनारीणां गानं ध्यानविनाशनम् ।

आवयोस्तपिभङ्गाय कृतं मघवता किल ॥

ऋतुराडन्यथाकाले प्रीतिं सञ्जनयेत्कथम् ।

विघ्नोऽयं विहितो भाति भीतेनासुरशत्रुणा ॥

वाताः सुगन्धाः शीताश्च समायान्ति मनोहराः ।

नान्यत्कारणमस्तीह शतक्रतुकृतिं विना ॥

इति ब्रुवति विप्राये देवे नारायणे विभौ ।

सर्वे दृष्टिपथं प्राप्ता मन्मथप्रमुखास्तदा ॥

ददर्श भगवान्सर्वान्नरो नारायणस्तथा ।

विस्मयाविष्टमनसौ बभूवतुरुभावपि ॥

मन्मथं मेनकां चैव रम्भां चैव तिलोत्तमाम् पुष्पगन्धां सुकेशीं च महाश्वेतां मनोरमाम् ॥ प्रमद्वरां घृताचीञ्च गीतज्ञां चारुहासिनीम् चन्द्रप्रभां च सोमां च कोकिलालापमण्डिताम् विद्युन्मालाम्बुजाक्ष्यौ च तथा काञ्चनमालिनीम् एताश्चान्या वरारोहा दृष्टास्ताभ्यां तदान्तिके तासां द्व्यष्टसहस्राणि पञ्चाशदधिकानि च वीक्ष्य तौ विस्मितौ जातौ कामसैन्यं सुविस्तरम् चतुर्थ स्कन्ध ४२७ नीले कमल जिसके नेत्र हैं, बिल्व वृक्षके फल १५ जिसके स्तन हैं, खिले हुए कुन्दके फूल जिसके दाँत हैं, आमके बौर जिसके कान हैं, बन्धुजीव ( गुलदुपहरिया ) - के पुष्प जिसके शुभ्र अधर हैं, १६ सिन्धुवारके पुष्प जिसके नख हैं, कोयलके समान जिसका स्वर है, कदम्बके पुष्प जिस सुन्दरीके पावन वस्त्र हैं, मयूरपंखोंके समूह जिसके आभूषण हैं, १७ सारसोंका स्वर जिसका नूपुर है, माधवी लता जिसकी करधनी है - ऐसी मत्त हंसके समान गतिवाली तथा १८ इंगुदीके पत्तोंको रोमस्वरूप धारण की हुई वसन्तश्री इस बदरिकाश्रममें छायी हुई है ॥१४- १८ ॥ मुझे तो यह महान् आश्चर्य हो रहा है कि १ ९ असमयमें यह यहाँ क्यों आ गयी? हे देवर्षे! आप यह निश्चित समझिये कि इस समय यह हमलोगों की तपस्यामें विघ्न डालनेवाली है ॥ १ ९ ॥ २० ध्यान भंग कर देनेवाला यह देवांगनाओंका गीत सुनायी दे रहा है । ऐसा प्रतीत होता है कि हम २१ दोनोंका तप नष्ट करनेके लिये इन्द्रने ही यह उपक्रम रचा है । अन्यथा ऋतुराज वसन्त अकालमें कैसे प्रीति प्रकट कर सकता है? जान पड़ता है कि भयभीत २२ होकर असुरोंके शत्रु इन्द्रके द्वारा ही यह विघ्न उपस्थित किया गया है । सुरभित, शीतल एवं मनोहर हवाएँ चल रही हैं; इसमें इन्द्रकी चालके अतिरिक्त

२३ अन्य कोई कारण नहीं है । २० - २२ ॥

विप्रवर विभु भगवान् नारायण ऐसा कह ही रहे २४ थे कि कामदेव आदि सभी दिखायी पड़ गये । भगवान् नर तथा नारायणने उन सबको प्रत्यक्ष देखा और इससे । उन दोनोंके मनमें महान् आश्चर्य हुआ ॥ २३-२४ ॥ २५ कामदेव, मेनका, रम्भा, तिलोत्तमा, पुष्पगन्धा, सुकेशी, महाश्वेता, मनोरमा, प्रमद्वरा, गीतज्ञ और । सुन्दर हास्य करनेवाली घृताची, चन्द्रप्रभा, कोकिल ॥ २६ । समान आलाप करनेवाली सोमा, विद्युन्माला, । अम्बुजाक्षी और कांचनमालिनी - इन्हें तथा अन्य भी ॥ २७ बहुत - सी सुन्दर अप्सराओंको नर - नारायणने अपने पास उपस्थित देखा । उनकी संख्या सोलह हजार । पचास थी, कामदेवकी उस विशाल सेनाको देखकर ॥ २८ । वे दोनों मुनि चकित हो गये । २५ - २८ ॥

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४२८ प्रणम्याग्रे स्थिताः सर्वा देववाराङ्गनास्तदा दिव्याभरणभूषाढ्या दिव्यमालोपशोभिताः जगुश्छलेन ताः सर्वाः पृथिव्यामतिदुर्लभम् तत्तथावस्थितं दिव्यं मन्मथादिविवर्धनम् ॥ शुश्राव भगवान्विष्णुर्नरो नारायणस्तदा । श्रुत्वा प्रोवाच तास्तत्र प्रीत्या नारायणो मुनिः

आस्यतां सुखमत्रैव करोम्यातिथ्यमद्भुतम् ।

भवत्योऽतिथिधर्मेण प्राप्ताः स्वर्गात्सुमध्यमाः ॥

व्यास उवाच

साभिमानस्तु सञ्जातस्तदा नारायणो मुनिः ।

इन्द्रेण प्रेषिता नूनं तथा विघ्नचिकीर्षया ॥

वराक्यः का इमाः सर्वाः सृजाम्यद्य नवाः किल ।

एताभ्यो दिव्यरूपाश्च दर्शयामि तपोबलम् ॥

इति सञ्चिन्त्य मनसा करेणोरुं प्रताड्य वै ।

तरसोत्पादयामास नारीं सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥

नारायणोरुसम्भूता ह्युर्वशीति ततः शुभा ।

ददृशुस्ताः स्थितास्तत्र विस्मयं परमं ययुः ॥

तासां च परिचर्यार्थं तावतीश्चातिसुन्दरीः ।

प्रादुश्चकार तरसा तदा मुनिरसम्भ्रमः ॥

गायन्त्यश्च हसन्त्यश्च नानोपायनपाणयः ।

प्रणेमुस्ता मुनी सर्वाः स्थिताः कृत्वाञ्जलिं पुरः ॥

तां वीक्ष्य विभ्रमकरीं तपसो विभूतिं देवाङ्गना हि मुमुहुः प्रविमोहयन्त्यः । ऊचुश्च तौ प्रमुदिताननपद्मशोभा रोमोद्गमोल्लसितचारुनिजाङ्गवल्ल्यः ॥ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ । उस समय दिव्य वस्त्र तथा आभूषणोंसे विभूषित ॥ २ ९ और दिव्य मालाओंसे सुशोभित देवलोककी वे अप्सराएँ प्रणाम करके सामने खड़ी हो गयीं ॥ २ ९ ॥ । तत्पश्चात् वे अनेक प्रकारके हाव - भाव प्रदर्शित ३० करती हुई छलपूर्वक पृथ्वीतलपर अत्यन्त दुर्लभ एवं कामवासनावर्धक गीत गाने लगीं । भगवान् नर-नारायणने उस गीतको सुना । तदनन्तर उसे सुनकर नारायणमुनिने प्रेमपूर्वक उनसे कहा- - तुमलोग आनन्दसे ॥ ३१ बैठो, मैं तुम्हारा अद्भुत आतिथ्य सत्कार करूँगा । ह सुन्दरियो! तुमलोग स्वर्गसे यहाँ आयी हो, अतएव हमारी अतिथिस्वरूपा हो ॥ ३०-३२ ॥ ३२ व्यासजी बोले – हे राजन्! उस समय मुनि नारायण अभिमानमें आकर सोचने लगे कि निश्चितरूपसे इन्द्रने हमारे तपमें बाधा डालनेकी इच्छासे इन्हें भेजा है । ये सब बेचारी क्या चीज हैं, मैं अभी अपना तपोबल ३३ दिखाता हूँ और इनसे भी अधिक दिव्य रूपवाली नवीन अप्सराएँ उत्पन्न करता हूँ ॥ ३३-३४ ॥ मनमें ऐसा विचार करके उन्होंने हाथसे अपनी ३४ जंघापर आघातकर तत्काल एक सर्वांगसुन्दरी स्त्री उत्पन्न कर दी ॥ ३५ ॥

वह सुन्दरी भगवान् नारायणके ऊरुदेश ( जंघा ) -३५ से उत्पन्न हुई थी, अतः उसका नाम उर्वशी पड़ा । वहाँ उपस्थित वे अप्सराएँ उर्वशीको देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं ॥ ३६ ॥

३६ तदनन्तर उन अप्सराओंकी सेवाके लिये मुनिने तत्काल उतनी ही अन्य अत्यन्त सुन्दर अप्सराएँ उत्पन्न कर दीं । हाथमें विविध प्रकारके उपहार लिये ३७ हँसती हुई तथा मधुर गीत गाती हुई उन सब अप्सराओंने उन मुनियोंको प्रणाम किया और वे हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़ी हो गयीं ॥ ३७-३८ ॥ ३८ लोगोंको मोहमें डाल देनेवाली वे [ इन्द्रप्रेषित ] अप्सराएँ तपस्याकी विभूति उस विस्मयकारिणी उर्वशीको देखकर अपनी सुध - बुध खो बैठीं । उन अप्सराओंके मुखकमल आनन्दातिरेकसे खिल उठे तथा उनके मनोहर शरीररूपी वल्लरियोंपर रोमांचरूपी अंकुर निकल आये । वे अप्सराएँ उन दोनों मुनियोंसे ३ ९ | कहने लगीं – ॥ ३ ९ ॥

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अ ० ६ ] चतुर्थ स्कन्ध ४२ ९ कुर्युः कथं स्तुतिमहो तपसो महत्त्वं धैर्यं तथैव भवतामभिवीक्ष्य बालाः । अस्मत्कटाक्षविषदिग्धशरेण दग्धः को वा न तत्र भवतां मनसो व्यथा न ॥ ४० ज्ञातौ युवां नरहरेः परमांशभूतौ देवौ मुनी शमदमादिनिधी सदैव । सेवानिमित्तमिह नो गमनं न कामं कार्यं हरेः शतमखस्य विधातुमेव ॥ ४१ भाग्येन केन युवयोः किल दर्शनं नः

सम्पादितं न विदितं खलु सञ्चितं तत् ।

चित्तं क्षमं निजजने विहितं युवाभ्या-मस्मद्विधे किल कृतागसि तापमुक्तम् ॥ ४२

कुर्वन्ति नैव विबुधास्तपसो व्ययं वै शापेन तुच्छफलदेन महानुभावाः । व्यास उवाच इत्थं निशम्य वचनं सुरकामिनीनां तावूचतुर्मुनिवरौ विनयानतानाम् ॥ ४३ प्रीतौ प्रसन्नवदनौ जितकामलोभौ धर्मात्मजौ निजतपोरुचिशोभिताङ्गौ । नरनारायणावूचतुः ब्रुवन्तु वाञ्छितान् कामान्ददावस्तुष्टमानसौ ॥ ४४

यान्तु स्वर्गं गृहीत्वेमामुर्वशीं चारुलोचनाम् ।

उपायनमियं बाला गच्छत्वद्य मनोहरा ॥ ४५

दत्तावाभ्यां मघवतः प्रीणनायोरुसम्भवा ।

स्वस्त्यस्तु सर्वदेवेभ्यो यथेष्टं प्रव्रजन्तु च ॥ ४६

( न कस्यापि तपोविघ्नं प्रकर्तव्यमतः परम् । ) अहो! हम मूर्ख अप्सराएँ आपकी स्तुति कैसे करें? हम तो आपके धैर्य तथा तपके प्रभावको देखकर परम विस्मयमें पड़ गयी हैं । ऐसा कौन है जो हमलोगोंके कटाक्षरूपी विषसे बुझे बाणोंसे दग्ध न हो गया हो, फिर भी आपके मनको थोड़ी भी व्यथा नहीं हुई ॥ ४० ॥

अब हमलोगोंको ज्ञात हो गया कि आप दोनों देवस्वरूप मुनि साक्षात् भगवान् विष्णुके परम अंश हैं और सदा ही शम, दम आदि गुणोंके निधान हैं । आप दोनोंकी सेवाके लिये यहाँ हमारा आगमन नहीं हुआ है, अपितु देवराज इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये ही हम सब यहाँ आयी हुई हैं ॥ ४१ ॥

न जाने हमारे किस भाग्यसे आप दोनों मुनिवरोंके दर्शन हुए । हम यह नहीं जान पा रही हैं कि हमारे द्वारा सम्पादित किस संचित पुण्यकर्मका यह फल है । [ शाप देनेमें समर्थ होते हुए भी ] आप दोनों मुनियोंने हम जैसे अपराधीजनोंको स्वजन समझकर अपने चित्तको क्षमाशील बनाया और हमें सन्तापरहित कर दिया । विवेकशील महानुभाव तुच्छ फल देनेवाले शापको उपयोगमें लाकर अपने तपका अपव्यय नहीं करते ॥ ४२३ ॥

व्यासजी बोले- उन अति विनम्र देवसुन्दरियोंका वचन सुनकर प्रसन्न मुखमण्डलवाले, काम तथा लोभको जीत लेनेवाले तथा अपनी तपस्याके प्रभावसे देदीप्यमान अंगोंवाले वे धर्मपुत्र मुनिवर नर-नारायण प्रेमपूर्वक कहने लगे ॥ ४३३ ॥

नर - नारायण बोले- हम दोनों तुम सभीपर अत्यन्त प्रसन्न हैं । तुमलोग अपने वांछित मनोरथ बताओ, हम उसे देंगे । इस सुन्दर नयनोंवाली उर्वशीको भी अपने साथ लेकर तुम सब स्वर्गके लिये प्रस्थान करो । उपहारस्वरूप यह मनोहर युवती अब यहाँसे तुमलोगोंके साथ जाय ॥ ४४-४५ ॥ ऊरुसे प्रादुर्भूत इस उर्वशीको इन्द्रके प्रसन्नार्थ हमने उनको दे दिया है । सभी देवताओंका कल्याण हो और अब सभी लोग इच्छानुसार यहाँसे प्रस्थान करें ॥ ४६ ॥ ( अब इसके बाद तुमलोग किसीकी

तपस्या में विघ्न मत उत्पन्न करना । )

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४३० देव्य ऊचुः

क्व गच्छामो महाभाग प्राप्तास्ते पादपङ्कजम् ।

नारायण सुरश्रेष्ठ भक्त्या परमया मुदा ॥

वाञ्छितं चेद्वरं नाथ ददासि मधुसूदन ।

तुष्टः कमलपत्राक्ष ब्रवीमो मनसेप्सितम् ॥

पतिस्त्वं भव देवेश वरमेनं परन्तप ।

भवामः प्रीतियुक्तास्त्वां सेवितुं जगदीश्वर ॥

त्वया चोत्पादिता नार्यः सन्त्यन्याश्चारुलोचनाः ।

उर्वश्याद्यास्तथा यान्तु स्वर्गं वै भवदाज्ञया ॥

स्त्रीणां षोडशसाहस्रं तिष्ठत्वत्र शतार्धकम् ।

सेवां तेऽत्र करिष्यामो युवयोस्तापसोत्तमौ ॥

वाञ्छितं देहि देवेश सत्यवाग्भव माधव ।

आशाभङ्गो हि नारीणां हिंसनं परिकीर्तितम् ॥

कामार्तानाञ्च मुनिभिर्धर्मज्ञैस्तत्त्वदर्शिभिः ।

भाग्ययोगादिह प्राप्ताः स्वर्गात्प्रेमपरिप्लुताः ॥

त्यक्तुं नार्हसि देवेश समर्थोऽसि जगत्पते । नारायण उवाच पूर्णं वर्षसहस्त्रं तु तपस्तप्तं मयात्र वै ॥

जितेन्द्रियेण चार्वङ्ग्यः कथं भङ्गं करोम्यतः ।

नेच्छा कामे सुखे काचित्सुखधर्मविनाशके ॥

पशूनामपि साधर्म्ये रमेत मतिमान्कथम् । अप्सरस ऊचुः शब्दादीनां च पञ्चानां मध्ये स्पर्शसुखं वरम् ॥

आनन्दरसमूलं वै नान्यदस्ति सुखं किल ।

अतोऽस्माकं महाराज वचनं कुरु सर्वथा ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ देवियाँ बोलीं- हे महाभाग! हे नारायण! हे सुरश्रेष्ठ! परमभक्तिके साथ प्रसन्नतापूर्वक हम ४७ सभी अप्सराएँ आपके चरणकमलोंका सांनिध्य प्राप्त कर चुकी हैं; अब हम सब कहाँ जायँ? ॥। ४७ ॥ हे नाथ! हे मधुसूदन! हे कमलपत्राक्ष! यदि ४८ आप हमारे ऊपर प्रसन्न होकर वांछित वरदान देना चाहते हैं, तो हम अपने मनकी इच्छा प्रकट कर रही हैं ॥ ४८ ॥

हे देवेश! आप हमारे पति बन जायँ । हे ४ ९ परन्तप! हमलोगोंके इसी वरदानको पूर्ण कीजिये हे जगदीश्वर! आपकी सेवा करनेमें हम सभीक प्रसन्नता होगी ॥ ४ ९ ॥ ५० आपने जिन उर्वशी आदि सुन्दर नयनोंवाली अन्य रमणियोंको उत्पन्न किया है, वे अब आपकी आज्ञासे स्वर्ग चली जायँ । हे श्रेष्ठ तपस्वियो! हम ५१ सोलह हजार पचास अप्सराएँ यहीं रहेंगी और यहाँ हम सब आप दोनोंकी सेवा करेंगी ॥ ५०-५१ ॥ हे देवेश! आप हमारा मनोवांछित वर ५२ दीजिये और अपने सत्यव्रतका पालन कीजिये । हे माधव! धर्मज्ञ तथा तत्त्वदर्शी मुनियोंने प्रेमासक्त स्त्रियोंकी आशाको भंग करना हिंसा बताया है । ५३ दैवयोगसे हम अप्सराएँ भी स्वर्गसे यहाँ आकर आप दोनोंके प्रेमरससे संसिक्त हो गयी हैं । हे देवेश! आप हमारा त्याग न कीजिये । हे जगत्पते! आप तो सर्वसमर्थ हैं ॥ ५२-५३३ ॥ नारायण बोले- इन्द्रियोंको जीतकर मैंने ५४ पूरे एक हजार वर्षोंतक यहाँ तपस्या की है. अतएव हे सुन्दरियो! उसे कैसे नष्ट कर दूँ? सुख तथा धर्मका नाश करनेवाले वासनात्मक ५५ सुखमें मेरी कोई रुचि नहीं है । पाशविक धर्मके समान सुखमें विवेकशील पुरुष कैसे प्रवृत्त हो सकता है? ॥ ५४-५५३ ॥ अप्सराएँ बोलीं- शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा ५६ गन्ध - इन पाँच सुखोंमें स्पर्श - सुख सर्वश्रेष्ठ है । यह आनन्दरसका मूल है और इससे बढ़कर अन्य कोई भी सुख नहीं है । अतः हे महाराज! आप हमारी ५७ | बात मान लीजिये ॥ ५६-५७ ॥

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अ ० ७ ] चतुर्थ स्कन्ध ४३१ निर्भरं सुखमासाद्य चरस्व गन्धमादने । पूर्ण आनन्द प्राप्त करते हुए आप गन्धमादन-यदि वाञ्छसि नाकत्वं नाधिको गन्धमादनात् ॥ ५८ | पर्वतपर विचरण कीजिये । यदि आप स्वर्ग - प्राप्तिकी आकांक्षा रखते हैं तो यह निश्चय जान लीजिये कि वह स्वर्ग इस गन्धमादनसे अच्छा नहीं है । अत: हम सभी अप्सराओंको अंगीकार करके आप इस दिव्य रमस्वात्र शुभे स्थाने प्राप्य सर्वाः सुराङ्गनाः || ५ ९ स्थानमें विहार कीजिये ॥ ५८-५९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे अप्सरसां नारायणसमीपे प्रार्थनाकरणं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः अप्सराओंके प्रस्तावसे नारायणके मनमें ऊहापोह और नरका उन्हें समझाना तथा अहंकारके कारण प्रह्लादके व्यास उवाच

इत्याकर्ण्य वचस्तासां धर्मपुत्रः प्रतापवान् ।

विमर्शमकरोच्चित्ते किं कर्तव्यं मयाधुना ॥

हास्योऽहं मुनिवृन्देषु भविष्याम्यद्य सङ्गमात् ।

अहंकारादिदं प्राप्तं दुःखं नात्र विचारणा ।

मूलं धर्मविनाशस्य प्रथमं यदहड्ङ्कृतिः ॥

मूलं संसारवृक्षस्य यतः प्रोक्तो महात्मभिः ।

दृष्ट्वा मौनं समाधाय न स्थितोऽहं समागतम् ॥

वाराङ्गनागणं जुष्टं तेनासं दुःखभाजनम् ।

उत्पादितास्तथा नार्यो मया धर्मव्ययेन वै ॥

तास्तु मां बाधितुं वृत्ताः कामार्ताः प्रमदोत्तमाः ।

ऊर्णनाभिरिवाद्याहं जालेन स्वकृतेन वै ॥

बद्धोऽस्मि सुदृढेनात्र किं कर्तव्यमतः परम् ।

यदि चिन्तां समुत्सृज्य सन्त्यजाम्यबला इमाः ॥

शप्त्वा भ्रष्टा वजिष्यन्ति सर्वा भग्नमनोरथाः ।

मुक्तोऽहं सञ्चरिष्यामि विजने परमं तपः ॥

तस्मात्क्रोधं समुत्पाद्य त्यक्ष्यामि सुन्दरीगणम् । साथ हुए युद्धका स्मरण कराना व्यासजी बोले – उन देवांगनाओंका वचन सुनकर धर्मपुत्र प्रतापी नारायण अपने मनमें विचार १ | करने लगे कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये? यदि मैं इस समय विषयभोगमें लिप्त होता हूँ तो मुनिसमुदायमें उपहासका पात्र बनूँगा । अहंकारसे ही मुझे यह दु: ख प्राप्त हुआ है; इसमें कोई संशय नहीं । धर्मके विनाशका मूल तथा प्रधान कारण २ अहंकार है । अतः महात्माओंने उसे संसाररूपी वृक्षका मूल कहा है ॥ १-२ ॥ इन वारांगनाओंके समूहको आया हुआ देखकर ३ मेँ मौन धारणकर स्थित नहीं रह सका और प्रसन्नतापूर्वक मैंने इनसे वार्तालाप किया, इसीलिये मैं दुःखका भाजन हुआ । अपने धर्मका व्यय करके मैंने उन ४ उर्वशी आदि स्त्रियोंकी व्यर्थ रचना की । ये कामार्त अप्सराएँ मेरी तपस्यामें विघ्न डालनेमें प्रवृत्त हैं । मकड़ियोंके द्वारा बनाये गये जालकी भाँति अब ५ अपने ही द्वारा उत्पादित सुदृढ़ जालमें मैं बुरी तरह फँस गया हूँ, अब मुझे क्या करना चाहिये? यदि चिन्ता छोड़कर इन स्त्रियोंको अस्वीकार कर ६ देता हूँ तो अपना मनोरथ निष्फल हुआ पाकर ये भ्रष्ट स्त्रियाँ मुझे शाप देकर चली जायँगी । तब इनसे छुटकारा पाकर मैं निर्जन स्थानमें कठोर तप ७ करूँगा । अतएव क्रोध उत्पन्न करके मैं इनका परित्याग कर दूँगा ॥३–७३ ॥